गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण पर चर्चा की थी, इस बार हम आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान
( application of mathematics and modern science )

math.jpg__800x600_q85_cropएक चौकोर मैदान के क्षेत्रफल को नापने के वास्ते एक मापने के दंड का उपयोग करने के बजाय हम केवल उसकी दो समलंब भुजाएं माप सकते हैं और फिर प्राप्त अंकों को गुणा करके पल भर में सारे मैदान का क्षेत्रफल नाप सकते हैं।

विज्ञान, इंजीनियरी तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में गणित का महत्व और अनुप्रयोग इस तथ्य पर आधारित है कि हम नापजोख के विभिन्न साधनों के द्वारा भौतिक वस्तुओं तथा उनके अनुगुणों पर कुछ अंकों को आरोपित कर सकते हैं और उसके उपरांत वस्तुओं के साथ श्रमसाध्य क्रियाएं करने के बजाय कुछ गणितीय नियमों के अनुसार इन अंकों के साथ संक्रियाएं ( operations ) कर सकते हैं। उसके पश्चात हम प्राप्त अंकों को पुनः भौतिक वस्तुओं पर लागू कर सकते हैं और उन्हें वस्तु के अन्य अनुगुणॊं तथा विशेषताओं को जानने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। परिमाण ( quantity ) और गुण ( quality ) का द्वंद्वात्मक संयोजन इस बात में स्पष्टतः अभिव्यक्त होता है। गणित कुछ सीमाओं के अंदर वस्तुओं के परिमाणात्मक लक्षणों के ज़ारिये उनकी असीम व विविधतापूर्ण गुणात्मक विशेषताओं का वर्णन करना संभव बना देता है। चूंकि परिमाणात्मक लक्षणों का वर्णन सापेक्षतः सुस्पष्ट, सरल सूत्रों तथा समीकरणों में व्यक्त गणितीय क़ायदों से किया जा सकता है, इसलिए वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) के संज्ञान की प्रक्रिया सरलीकृत, द्रुत और सुविधापूर्ण हो जाती है।

हमारे युग में गणित ने विज्ञान की अनेक शाखाओं में पैठ बना ली है। अब वैज्ञानिकगण ऐसे अधिकाधिक जटिल अमूर्तों, अपकर्षणों ( abstractions ) का उपयोग करने लगे हैं, जिन्हें संवेद बिंबों ( sensory images ) में परिणत नहीं किया जा सकता है, इसलिए नियमों तथा सिद्धांतों को जटिल गणितीय समीकरणों के ज़रिये निरूपित करना होता है। बीसवीं सदी के मध्य से कंप्यूटरों का बहुत तेज़ी से विकास हुआ और अब उनकी बदौलत अत्यंत जटिल गणनाओं को पूर्वलिखित कार्यक्रमों ( programmes ) के ज़रिये शीघ्रता से और विश्वसनीय ढंग से करना और उन समस्याओं को हल करना संभव हो गया है जो पहले व्यक्ति के लिए या तो बेहद कठिन या अत्यंत श्रमसाध्य होती थीं।

गणित, ऐसे पूर्णतः प्रमाणित प्रमेयों ( theorems ) तथा क़ायदों ( rules ) पर आधारित है, जो वस्तुगत सत्य हैं, किसी के संकल्प या इच्छाओं पर निर्भर नहीं है और इसीलिए हमारे परिवेशीय जगत के बारे में निश्चित ज्ञान हासिल करना संभव बनाता हैं। किंतु जिस प्रकार परिणाम को गुण से विच्छेदित नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार संज्ञान की गणितीय विधि को विभिन्न विज्ञानों की गुणात्मकतः भिन्न अन्य विधियों से विच्छेदित नहीं किया जा सकता है। समसामयिक वैज्ञानिक ज्ञान की सारी विधियों का एकत्व ( unity ) ही, उनके वस्तुगत सत्य की और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर उनके प्रभाव की गारंटी करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियों पर चर्चा की थी, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण
( models and modelling in scientific cognition )

Proline_modelआधुनिक विज्ञान में प्रयुक्त एक सबसे सामान्य विधि मॉडल निर्माण ( modelling ) है। मॉडल तथा मॉडल निर्माण क्या है? शब्द “मॉडल” का मतलब है एक नमूना, प्रतिरूप या रूपांकन अथवा एक त्रिआयामीय चित्रण, किंतु यह स्वयं अपने आप में कोई स्पष्टीकरण नहीं है, क्योंकि विज्ञान में संकल्पना “मॉडल” ने एक विशेष आशय ग्रहण कर लिया है।

वस्तुएं अक्सर छानबीन के लिए समुपयुक्त नहीं होतीं। वे बहुत बड़ी या बहुत क़ीमती हो सकती हैं, बहुत जटिल या अनुपलब्ध हो सकती हैं। इस स्थिति में एक ऐसी वस्तु बनायी या खोजी जाती है जो कुछ सारभूत मामलों में दिलचस्पी की वस्तु या प्रक्रिया के समान हों, यानी स्थानापन्न ( substitute ) हों। यदि इस वस्तु का अध्ययन हो सकता हो और प्राप्त परिणामों को समुचित त्रुटि सुधारों तथा समंजनों ( adjustments ) के साथ अध्ययनाधीन वस्तु के संज्ञान के लिए प्रयुक्त या लागू किया जा सकता हो, तो इसे मॉडल कहा जायेगा। एक मॉडल की रचना या चयन, उसका अध्ययन तथा प्राप्त परिणामों को मुख्य वस्तु के संज्ञान के लिए इस्तेमाल करने को मॉडल निर्माण कहते हैं।

मानवसम वानर ( anthropoid apes ) कुछ मामलों में मनुष्य के समान होते हैं। वैज्ञानिकों ने बहुत पहले यह खोज की कि मेकाक बंदर की रीसस ( rhesus ) प्रजाति का रुधिर मनुष्य के रुधिर के समान होता है। इस रुधिर का अध्ययन करके उन्होंने विशेष अनुगुणों की खोज की जो रीसस-फ़ैक्टर कहलाता है। रुधिर की समानता को आधार बनाकर उन्होंने प्राप्त परिणामों को मानव रुधिर पर लागू किया और पता लगाया कि उसमें भी वैसे ही अनुगुण होते हैं। इस मामले में बंदर का रुधिर, मानव रुधिर का मॉडल था।

इंजीनियरी में मौलिक वस्तु या प्राक्-रूप ( prototype ) को बनाने से पहले अक्सर मॉडल का निर्माण तथा अध्ययन किया जाता है, ताकि बाद में किये जानेवाले निर्माण में कई ग़लतियों और कठिनाइयों से बचा जा सके। एक विशाल बिजलीघर के निर्माण से पहले उसका एक समानुपातिक तकनीकी मॉडल बनाया जाता है और उसे लेकर कई प्रयोग किये जाते हैं। इससे प्राप्त जानकारी को वास्तविक बिजलीघर बनाते समय ध्यान में रखा जाता है।

इन उदाहरणों में मॉडल की भूमिका नितांत भौतिक वस्तुओं द्वारा अदा की गयी है। किंतु आधुनिक विज्ञान में तथाकथित वैचारिक, प्रत्ययिक मॉडलों ( ideal models ) का व्यापक उपयोग होने लगा है। उनमें, मसलन, तथाकथित मानसिक प्रयोग शामिल हैं। एक अतिजटिल, खर्चीला प्रयोग शुरू करने से पहले एक वैज्ञानिक अपनी कल्पना में अपेक्षित औज़ारों के एक पूरे सेट की रचना करता है और उन्हें लेकर विभिन्न कार्यकलाप करता है और कभी-कभी सहायक साधनों के रूप में नक़्शों, रेखाचित्रों तथा आरेखों का उपयोग भी करता है। वह इन सारी कार्रवाइयों के बाद ही अपना असली प्रयोग करने का इरादा या तो त्याग देता है ( यदि मानसिक प्रयोग असफल हुआ है ) अथवा उसके व्यावहारिक कार्यान्वयन में जुट जाता है।

मॉडलों तथा मॉडल निर्माण की एक क़िस्म गणितीय मॉडल निर्माण है। इसमें स्थानापन्न वस्तु के रूप में भौतिक वस्तुओं या प्रक्रियाओं को लेने के बजाय गणितीय समीकरणों की एक प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इन समीकरणों में प्रेक्षणों तथा प्रयोगों से प्राप्त विविध आंकिक आधार-सामग्री को प्रतिस्थापित करके तथा उन समीकरणों को हल करके वैज्ञानिक विभिन्न प्रक्रियाओं के परिमाणात्मक अभिलक्षणों ( quantitative characteristics ) का सही-सही मूल्यांकन कर सकता है और उन कठिनाइयों का पूर्वानुमान लगा सकता है, जो व्यवहार में पैदा हो सकती हैं। आधुनिक विज्ञान के सारे क्षेत्रों में, विशेषतः इंजीनियरी तथा नियंत्रण ( control ) के सिद्धांत में गणितीय मॉडलों का व्यापक प्रयोग किया जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
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साम्यानुमान पद्धति

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की पद्धतियों निगमन और आगमन के एकत्व पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की एक और पद्धति साम्यानुमान को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


साम्यानुमान पद्धति
( Analogy method )

0a33f9cc19f71fa47abc506a979d1618संज्ञान में वैज्ञानिक अपाकर्षणों ( abstractions ) की भूमिका असाधारण महत्व की होती है। लेकिन संज्ञानात्मक प्रक्रिया अपाकर्षणों की विरचना ( formulation ) पर समाप्त नहीं होती, क्योंकि वे अध्ययनाधीन विषय के संपूर्ण सार ( essence ) को प्रकट नहीं कर सकते। अपाकृष्ट चिंतन ( abstract thought ) अपूर्ण, सामान्य और अद्वंद्वात्मक होता है, जबकि द्वंद्वात्मक चिंतन ( dialectical thought ) गहन रूप से वैज्ञानिक, स्पष्ट, सुसंगत, निश्चायक, यानी मूर्त ( concrete ) होता है। आगमन और निगमन के साथ ही विचार को मूर्त बनाने का एक और प्रमुख उपकरण है साम्यानुमान ( analogy )। इसका विशिष्ट लक्षण है एक विशेष ( particular ) से दूसरे विशेष की ओर विचार की गति। साम्यानुमान आगमन और निगमन के बीच एक प्रकार की मध्यवर्ती, संक्रामी ( transitional ) स्थिति में होता है।

साम्यानुमान एक प्रकार का अनुमानित ( inferred ) ज्ञान होता है, जिसमें वस्तुओं के बीच कुछ मामलों की समानताओं को अन्य मामलों मे उनकी समानता पर निष्कर्ष निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका यह मतलब है कि साम्यानुमान से पहले अध्ययनाधीन वस्तु के संबंध में प्रारंभिक संक्रियाओं ( operations ) का एक सेट पूरा हो चुकना चाहिये। ये संक्रियाएं हैं, पहली, वस्तु के अलग-अलग पक्षों, अनुगुणों, संपर्कों व संबंधों के बारे में अनुभवात्मक ज्ञान का स्वांगीकरण ( assimilation ) और उनका व्यवस्थापन; दूसरी, एक उपयुक्त तुल्यरूप ( analogue ) का ( समरूपता दर्शाने के लिए एक नमूने model का ) चुनाव, जिसके अनुगुणों का सर्वांगीण अध्ययन किया गया है तथा जिसके साथ साम्यानुमान लगाया जायेगा; और तीसरी, तुलनाधीन वस्तुओं के समान लक्षणों तथा नमूने में विद्यमान उस लक्षण के बीच आवश्यक व मौलिक संबंध का निर्धारण करना, जिसे अध्ययनाधीन वस्तु को अंतरित ( transferred ) करना है।

अनुसंधान की प्रारंभिक और सरलतम कार्य-विधि, विभिन्न वस्तुओं या घटनाओं की समान विशेषताओं को सही-सही निर्दिष्ट करना है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि पहला, जितनी अधिक समान विशेषताएं संभव हों, उन सबको निर्धारित करना और, दूसरा, इन वस्तुओं या घटनाओं की मूलभूत, अंतर्निहित विशेषताओं में समानता पर जोर देना और गौण तथा सांयोगिक विशेषताओं को पृथक करना। अध्ययनाधीन वस्तुओं, घटनाओं या प्रक्रियाओं की समानताओं तथा भेदों को जितनी ज़्यादा पूर्णता से विश्लेषित किया जाता है, साम्यानुमान के निष्कर्ष उतने ही सही, उतने ही अधिक प्रसंभाव्य ( probable ) होते हैं

अन्य अनुगुणों या पक्षों की समानताओं के आधार पर वस्तुओं या घटनाओं के कुछ अनुगुणों या पक्षों की समानता पर निकाला गया कोई भी निष्कर्ष हमेशा प्रसंभाव्य होता है। साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की प्रसंभाव्यता को बढ़ाने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शर्त यह है कि समानुरूप वस्तुओं या घटनाओं का व्यापक, सर्वांगीण और गहन अध्ययन किया जाये। अध्ययनाधीन वस्तुओं का हमारा ज्ञान जितना पूर्णतर होगा, उनकी संख्या का महत्व उतना ही कम होगा। जहां वस्तुओं का अच्छा अन्वेषण न हुआ हो, उनका सार प्रकाश में न लाया गया हो और उनके भेदों को ध्यान में न रखा गया हो, वहां साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की अच्छी प्रसंभाव्यता का कोई आधार नहीं होता।

साथ ही, यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि तुलनाधीन वस्तुएं पूर्णतः समान नहीं भी हो सकती हैं। साम्यानुमान निश्चित विशेषताओं के अनुसार केवल कुछ ही मामलों में उनकी अनुरूपता ( correspondence ) को प्रमाणित करता है। प्रत्येक तुलना अपूर्ण होती है, प्रत्येक तुलना में तुलनाधीन वस्तुओं या धारणाओं के एक या कुछ पक्षों के संदर्भ में समरूपता दिखलायी जाती है, जबकि अन्य पक्षों को अस्थायी रूप से तथा शर्त के साथ अपाकर्षित ( abstracted ) किया जाता है। चूंकि साम्यानुमान के निष्कर्ष केवल प्रसंभाव्य होते है, इसलिए यह तार्किक प्रमाण के औज़ार का काम नहीं कर सकता है। पर इसके बावजूद यह संज्ञान की एक सबसे अधिक प्रयुक्त पद्धति है।

साम्यानुमान को लागू करने के नियमों की तथा उसका कुशलता से इस्तेमाल करने की जानकारी व्यावहारिक काम में बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। समानुरूपी प्रक्रियाओं, घटनाओं तथा जीवन की स्थितियों के विश्लेषण से विभिन्न समस्याओं के लिए इष्टतम ( optimal ) समाधान खोजना और यह फ़ैसला करना संभव हो जाता है कि ठोस स्थितियों में कैसा व्यवहार किया जाये। मिलते-जुलते संसूचकों ( indicators ) के एक सेट के आधार पर एक प्रक्रिया या घटना के विकास की दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है और उसके अवांछित परिणामों से बचने तथा उसके सकारात्मक तत्वों को सुदृढ़ बनाने के लिए, उस पर प्रभाव डालने के तरीक़े व साधनों का निर्धारण किया जा सकता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय अविराम

निगमन और आगमन का एकत्व

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की आगमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम निगमन और आगमन के एकत्व को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


निगमन और आगमन का एकत्व
( unity of deduction and induction )

abstract-paintingबाहर से देखने पर निगमनात्मक तथा आगमनात्मक विधियां विपरीत दिशाओं में हैं, किंतु अंदर से वे वैज्ञानिक ज्ञान की सारी प्रणाली के द्रुत विकास को बढ़ावा देनेवाले एक गहन द्वंद्वात्मक एकत्व ( dialectical unity ) की रचना करती हैं। इसके साथ ही आगमनात्मक पद्धति की सीमाओं को, उनके परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान की समस्यामूलक प्रकृति को भी ध्यान में रखना चाहिये। आगमन विधि की ख़ामी यह है कि यह अध्ययनाधीन वस्तु के विकास की प्रक्रिया को ध्यान में नहीं रख सकती है, जबकि निगमन विचाराधीन वस्तु के रूपांतरण की ऐतिहासिक अवस्थाओं के अनुसार संरचित होता है। इसी तरह निगमनात्मक पद्धति की भी अपनी कमजोरियां है कि वह बुनियादी सामान्य आधारिकाओं की कुल तादाद तथा उन आधारिकाओं की सत्यता को प्रमाणित करने की अक्षमता से सीमित होता है।

संज्ञान की वास्तविक प्रक्रिया में आगमन और निगमन की एकता होती है। यह एकता इन दोनों पद्धतियों के फ़ायदों को इस्तेमाल करना संभव बना देती है, इससे एक की ख़ामी का असर दूसरी के गुण से दूर हो जाता है। आगमन, निगमन से अनिवार्यतः संपूरित ( supplemented ) होता है और उसमें निगमन के तत्व शामिल होते हैं। यह विचाराधीन वस्तुओं में एक समान लक्षणों को सही-सही दर्शाने तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि उनके बीच से मूलभूत तत्वों को अलग करता है तथा उनके पारस्परिक संयोजनों व संबंधों को प्रकट करता है, जो निगमन के कुछ तत्वों के बिना असंभव है। दूसरी तरफ़, निगमन को प्रारंभिक आधारिकाओं की सच्चाई तथा तर्क-संगति को ध्यान में रखे बिना तर्कणा की प्रणाली में परिणत नहीं किया जा सकता, जो  एक ऐसी चीज़ है, जिसे आगमन के तत्वों को शामिल करके सुनिश्चित बनाया जाता है।

आगमन और निगमन की पद्धतियों के उपयोग की आवश्यकता वहां पर होती है, जहां प्राप्त सूचना के आधार पर अनुमान लगाकर ज्ञान हासिल किया जाता है। इन पद्धतियों के उपयोग में पारंगत होने से, एक ओर तो, वास्तविकता के तथ्यों तथा घटनाओं के दैनिक व्यावहारिक कार्यों के सामान्यीकरण में दूसरी ओर, सामान्य कार्यों और प्रस्थापनाओं के आधार पर व्यावहारिक समस्याओं के ठोस समाधान पाने में मदद मिलती है।

शिक्षाशास्त्रीय आगमन व निगमन की विधियों के कुशल उपयोग से शिक्षा तथा काम में बहुत व्यावहारिक सहायता मिलती है। आगमन और निगमन का शिक्षाशास्त्रीय उपयोग अनुमानित ज्ञान हासिल करने की तदनुरूप पद्धतियों से इस बात में भिन्न है कि इसका लक्ष्य आधारिकाओं से निष्कर्ष निकालना नहीं, बल्कि ज्ञान की एक इकाई से दूसरी में जाना, विविध संकल्पनाओं ( concepts ) और प्रस्थापनाओं ( propositions ) को प्रकट करना होता है। अध्ययन की हुई सामग्री को व्यवस्थित करने में उसे आगमनात्मक ढंग से भी पेश किया जा सकता है और निगमनात्मक ढंग से भी। यदि वह सामग्री अलग-अलग तथ्यों से सामान्य प्रस्थापनाओं की ओर संक्रमण के रूप में व्यवस्थित व प्रस्तुत की गयी है, तो प्रयुक्त पद्धति आगमनात्मक है, और अगर समस्या का प्रस्तुतीकरण सामान्य प्रस्थापनाओं से प्रारंभ होता है और बाद में अलग-अलग तथ्यों की ओर संक्रमण किया गया है, तो प्रयुक्त पद्धति निगमनात्मक है।

लगभग सभी समस्याओं को आगमनात्मक और निगमनात्मक, दोनों ही तरीक़ों से पेश किया जा सकता है। पद्धति का चुनाव सामान्यतः प्रस्तुतिकरण के लक्ष्यों, स्वयं समस्या की विशिष्टताओं और उन लोगों की विशेषताओं के अनुसार किया जाता है, जिनके सामने वह समस्या पेश की जानी है। समस्या को पेश करने की एक सुप्रचलित, आसानी से समझ में आनेवाली विधि आगमन की सहायता से उपलब्ध होती है, जबकि पेश की जानेवाली प्रस्थापनाओं के परिशुद्ध प्रमाण के लिए निगमन की आवश्यकता होती है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अध्ययन में इन दोनों पद्धतियों का इस्तेमाल होना चाहिये, प्रत्येक विषय में वरीयता ( preference ) उसे देनी चाहिये, जो शिक्षार्थी को समस्या की अंतर्वस्तु ( content ) को अधिक अच्छी तरह से समझने में तथा प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करने में समर्थ बनाती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
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संज्ञान की आगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की आगमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञान की आगमनात्मक विधियां
( Inductive methods of cognition )

0f24f7b9d45120a9cfeb10222c763e8dजहां निगमनात्मक ( deductive ) विधि के ज़रिये ज्ञान के सैद्धांतिक स्तर से आनुभविक स्तर की ओर जाना संभव है, वहीं आगमनात्मक ( inductive ) विधि से उल्टी दिशा में जाना संभव हो जाता है, यानी आनुभविक स्तर से सैद्धांतिक स्तर की ओर।

व्यवहार में और वैज्ञानिक प्रेक्षण तथा प्रयोग में वैज्ञानिकगण किसी घटना, प्रकृति या सामाजिक जीवन से संबंधित एकसमान तथ्यों को कमोबेश बड़ी संख्या में संचित करते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या संयोग तथा परिवर्तनों के अधीन अलग-अलग, असमन्वित ( uncoordinated ) तथ्यों से उनका संनियमन ( govern ) करने वाले वस्तुगत नियमों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है? वैज्ञानिक ज्ञान की रचना करनेवाली आगमनात्मक विधि क़ायदों का, एक तरह का ऐसा समुच्चय है, जिसकी मदद से संवेदनों द्वारा किये गये प्रेक्षणों तथा अलग-अलग तथ्यों के आनुभविक ज्ञान से उनकी बुनियाद में निहित नियमों तक, उनके सार के सैद्धांतिक ज्ञान तक पहुंचा जा सकता है।

आगमन ( induction ), चिंतन का पृथक-पृथक विशेष ( particular ) तथ्यों से सामान्य प्रस्थापना ( general proposition ) की ओर, कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर आना है। आगमन प्रांरभिक आधारिकाओं ( premises ) से अधिक व्यापक सामान्यीकारक निष्कर्ष निकालना संभव बनाता है। आगमनात्मक पद्धति संज्ञानात्मक प्रक्रिया की उन शुरुआती मंज़िलों में कारगर होती है, जब मनुष्य को अनुभवात्मक ज्ञान का बोध होता है, जब वह तथ्यों व आधार-सामग्री का संचय व सामान्यीकरण करता है, एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) को निरूपित करता है और उसकी सच्चाई को जांचता है। इस पद्धति का एक गुण यह है कि इसे केवल एक ही विशेष तथ्य के आधार पर भी विश्लेषण और सामान्यीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी विशेषता स्वयंसिद्ध हैं।

आगमनात्मक पद्धति के सुव्यवस्थित उपयोग से ठोस स्थितियों का विश्लेषण करने, तथ्यात्मक सामग्री का सामान्यीकरण करने, प्राक्कल्पनाओं को पेश करने तथा उनकी सच्चाई परखने की क्षमता विकसित होती है। आगमनात्मक विधि का अनुप्रयोग गणितीय सांख्यिकी तथा प्रसंभाव्यता के सिद्धांत ( theory of probability ) के वैज्ञानिक संज्ञान में व्यापक उपयोग से संबंद्ध है। प्रसंभाव्यता सिद्धांत के ज़रिये प्रयोगों, आदि की एक पूरी श्रृंखला में कुछ अनुगुणों ( properties ) के विकास की प्रसंभावना का परिमाणात्मक ( quantitative ) अनुमान लगाया जा सकता है। यदि प्रक्रिया या अनुगुण के स्थायित्व की प्रसंभाव्यता की कोटि बहुत ऊंची है, तो उनके ज्ञान को विज्ञान का नियम माना जा सकता है।

पृथक्कीकृत ( isolated ) भौतिक प्रणालियों में ऊर्जा के नियम ( क्लासिक तापगतिकी का दूसरा नियम ), प्राकृतिक वरण ( natural selection ) का डार्विनीय नियम तथा आधुनिक विज्ञान की अन्य नियमितताओं ( regularities ) तथा नियमों की खोज ऐसे ही की गयी थी। अलग-अलग आंशिक प्रेक्षणों से अधिक सामान्य सैद्धांतिक ज्ञान की तरफ़ जाना संभव बनानेवाली आगमनात्मक विधि विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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संज्ञान की निगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक पद्धतियों के वर्गीकरण पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञान की निगमनात्मक विधियां
( Deductive methods of cognition )

B-2nd-Place-OA-Tuttle-Conditionsकिसी भी विज्ञान के नियम, प्राक्कल्पनाएं तथा सिद्धांत ज्ञान का एक विशेष स्तर होती हैं जिसे सैद्धांतिक ( theoretical ) कहा जाता है। प्रत्यक्ष प्रेक्षणों तथा प्रयोगों पर, यानी संवेद प्रत्यक्षों पर आधारित ज्ञान उसका दूसरा स्तर है, जिसे आनुभविक ( empirical ) स्तर कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान में ज्ञान के सैद्धांतिक तथा आनुभविक स्तर के बीच बड़े जटिल संबंध होते हैं। आधुनिक भौतिकी, साइबरनेटिकी, खगोलविद्या, जैविकी तथा अन्य विज्ञानों के सिद्धांत, प्राक्कल्पनाएं और नियम अत्यंत अमूर्त ( abstract ) होते हैं और उन्हें ऐसी किन्हीं दृश्य, रैखिक मॉडलों, संकल्पनाओं तथा कथनों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है जो संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत घटनाओं के तुल्य या उन पर अनुप्रयोज्य ( applicable ) हों। ज्ञान के इन रूपों को आम तौर पर गणित के समीकरणों जैसे जटिल प्रतीकात्मक रूपों तथा अमूर्त तर्किक फ़ार्मूलों में व्यक्त किया जाता है। इनको यथार्थता ( reality ) पर लागू करने तथा उनकी सत्यता को परखने के लिए ज्ञान के आनुभविक स्तर की तुलना सैद्धांतिक स्तर से करनी पड़ती है, उनका आमना-सामना करना पड़ता है। इसके लिए संज्ञान की निगमनात्मक विधि ( deductive method ) का इस्तेमाल किया जाता है।

निगमन पद्धति में चिंतन, सामान्य ( general ) से विशेष ( particular ) की ओर जाता हैइस विधि में सामान्य सिद्धांतों, आधारिकाओं ( premises ) से, कम सामान्य या विशिष्ट निष्कर्ष प्राप्त किये जाते हैं। निगमनात्मक पद्धति सैद्धांतिक सामग्री को तार्किक क्रम तथा पूर्णता प्रदान करती है, उसे प्रमाणित व व्यवस्थित करने में मदद देती है। इस विधि में एक सिद्धांत की प्रमुख प्रारंभिक प्राक्कल्पनाओं ( hypotheses ) तथा नियमों को सुसंगत ढंग तथा सख़्ती से परिभाषित, तार्किक और गणितीय क़ायदों द्वारा रूपांतरित ( transform ) किया जाता है। इन रूपांतरणों के फलस्वरूप सूत्रों, प्रमेयों ( theorems ) या प्रस्थापनाओं ( propositions ) की एक लंबी श्रृंखला बन जाती है जो कुछ नियमितताओं को व्यक्त करती है या अध्ययनाधीन वस्तु के निश्चित अनुगुणों ( properties ) तथा संपर्कों ( connections ) का वर्णन करती है। प्रारंभिक बुनियादी नियमों और प्राक्कल्पनाओं से व्युत्पन्न ( derived ) इस ज्ञान की रचना प्रक्रिया को निगमन ( deduction ) कहते हैं और प्राप्त ज्ञान निगमनात्मक ज्ञान है।

निगमनात्मक पद्धति का एक गुण यह है कि इसकी सहायता से निकाले गये निष्कर्ष भली भांति प्रमाण्य ( demonstrable ) होते हैं और परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान सच्चा और प्रामाणिक ( authentic ) होता है। सही-सही आधारिकाओं से हम तार्किक ढंग से आवश्यक सहज परिणामों को निगमित कर सकते हैं। अगर हमारे पूर्वाधार सही हैं और हम उन पर चिंतन के नियमों को सही ढ़ंग से लागू करते है, तो हमारे निष्कर्ष वास्तविकता के साथ मेल खाते है उसके अनुरूप होते हैं

निगमनात्मक विधि से एक ऐसे क्लिष्ट और अमूर्त सिद्धांतों, जिनमें की प्रत्यक्ष अनुभूतियों का, आनुभाविक स्तर की प्रामाणिकता का अभाव होता है, की बुनियादी प्रस्थापनाओं और नियमों की एक सापेक्षतः छोटी सी संख्या से विभिन्न रूपांतरणों के ज़रिये इस तरह के निष्कर्षों तथा उपप्रमेयों की एक बहुत बड़ी संख्या हासिल करना संभव हो जाता है, जिनको की प्रत्यक्ष संवेदों की अनुभूतियों द्वारा आनुभविक स्तर पर प्रमाणित किया जा सकता है। इस तरह प्रत्यक्षीकृत भौतिक यथार्थता पर अनुप्रयोज्य सिद्धांतों तथा नियमों को एक आनुभविक, यानी संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत आशय प्रदान किया जाता है।

उदाहरण के लिए, फ़ार्मूलों में निहित चरों की तुलना कुछ उपस्करों ( instruments ) के पैमानों, विभिन्न विद्युतीय सुइयों या प्रदर्शन पटों के पाठ्यांकों या साधारण दृश्य और श्रव्य प्रेक्षणों, आदि से की जाती है। इस तरह, ज्ञान के सैद्धांतिक और आनुभविक स्तरों के बीच संबंध को और विस्तृतम अर्थ में प्रयोग, प्रेक्षण तथा व्यवहार के साथ सिद्धांत के संबंध को निगमनात्मक विधि से उद्घाटित किया जाता है। मसलन, क्वांटम यांत्रिकी के बुनियादी नियम, स्वयं यथार्थता ( reality ) पर प्रत्यक्ष अनुप्रयोज्य नहीं हैं और प्रायोगिक प्रेक्षणों के परिणामों के साथ तुल्य नहीं हैं। लेकिन गणितीय रूपांतरणों की बदौलत क्वांटम भौतिकी के बुनियादी नियमों की सत्यता को प्रदर्शित ही नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके अत्यंत व्यापक व्यावहारिक अनुप्रयोग ( application ) भी खोजे जा सकते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

प्रयोग और प्रेक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा की थी, इस बार वैज्ञानिक संज्ञान के अन्य रूपों प्रयोग और प्रेक्षण की महत्ता को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
प्रयोग और प्रेक्षण
( experiment and observation )

tumblr_inline_nb2v8c7iR91qkck9xजब एक खगोलविद ( astronomer ) अपनी रेडियोदूरबीन ( radio telescope ) से अंतरिक्ष की रहस्यमय गहराइयों से आनेवाली रेडियो तरंगों या एक्स-किरणों को ग्रहण करता है, तो वह एक ऐसे तारे या तारा-पुंज की खोज कर सकता है, जो सामान्य प्रकाशिक दूरबीन ( optical telescope ) के लिए अदृश्य ( invisible ) हैं। एक जैविकीविद ( biologist ) प्रयोगशाला या प्राकृतिक दशाओं में जानवरों का प्रेक्षण करके उनके व्यवहार की किसी ऐसी नियमितताओं की खोज कर सकता है, जो पहले अज्ञात थीं। प्रेक्षण ( observation ) दृश्य, श्रव्य तथा अन्य संवेदनों के द्वारा संवेदनात्मक अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया पर आधारित होता है

हम सामान्य जीवन में काम पर या वैज्ञानिक अनुसंधान ( research ) के समय जो सूचनाएं प्राप्त करते हैं, उनमें से बहुत सारी प्रेक्षणों पर आधारित होती हैं। लेकिन वैज्ञानिक प्रेक्षण दैनंदिन प्रेक्षणों से गुणात्मकतः ( qualitatively ) भिन्न होते हैं। मसलन, ऐसे प्रेक्षण निम्नांकित तरीक़ों से किये जाते हैं : (१) विशेष उपकरणों, औज़ारों व यंत्रों के ज़रिये ; (२) विशेष कार्यक्रम या योजनानुसार, नियमतः पहले से चयनित वस्तुओं पर किये जाते हैं ; (३) वे सख़्ती से परिभाषित लक्ष्य ( aim ) के मुताबिक़ होते हैं, यानी असंबंधित तथ्यों ( facts ) को मात्र जमा करके नहीं, बल्कि ऐसे तथ्यों के संकलन से जिनसे नयी प्राक्कल्पना प्रस्तुत करना या पूर्व प्रस्तुत प्राक्कल्पनाओं की परीक्षा करना संभव हो सके ; (४) प्रेक्षण, नियमतः ऐसी वस्तुओं व घटनाओं का किया जाता है, जो दैनिक जीवन में नहीं पायी जातीं ; और अंतिम (५) प्रेक्षण ऊंची सटीकता ( high accuracy ), सूक्ष्मता ( precision ) और विश्वसनीयता ( reliability ), आदि की आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए। परंतु इस सबके बावजूद, सबसे जटिल तथा सटीक वैज्ञानिक प्रेक्षण भी हमें घटना की गहराई तथा सार ( essence ) तक पहुंचने में सक्षम नहीं बना सकते। क्यों ?

कोई भी प्रेक्षण, चाहे वह सबसे सही उपकरणों से क्यों न किया गया हो, अध्ययनाधीन वस्तु या घटना को बदले या रूपांतरित ( transform ) किये बिना उसे उसकी प्राकृतिक अवस्था ( natural state ) में ही रहने देता है। परंतु किसी भी वस्तु के गहन आंतरिक संयोजनों ( deep inter connections ) को जानने के लिए उसे रूपांतरित करना, उसमें फेर-बदल करना और यह पता लगाना आवश्यक है कि रूपांतरण की प्रक्रिया के दौरान उसका व्यवहार कैसा होता है। इसके लिए उस वस्तु को उसकी आम कड़ियों तथा दशाओं से पृथक करना, उसे दूसरी दशाओं में रखना तथा उसके क्रियाकलाप की व्यवस्था को बदलना होता है ; उसे उसके विभिन्न भागों में विभाजित करना, अन्य वस्तुओं के साथ टकराना तथा अनपेक्षित परिस्थितियों ( unexpected circumstances ) में काम तथा संक्रिया ( operation ) करने के लिए बाध्य करना होता है। यही वैज्ञानिक प्रयोग ( scientific experiment ) की या प्रायोगिक अनुसंधान की विषयवस्तु भी है। फलतः प्रयोग, व्यवहार ( practice ) का एक विशेष वैज्ञानिक रूप ( form ) है। प्रयोग के दौरान किये जानेवाले प्रेक्षण निष्क्रिय ( passive ) नहीं, बल्कि ‘जीवंत चिंतन-मनन’ ( living contemplation ) के रूप में सक्रिय ( active ) होते हैं। चूंकि प्रयोग स्थापित नियमों और पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों यानी एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की पुष्टि या खंड़न करने और नये नियमों व सिद्धांतों को निरूपित करने के लक्ष्यों के पूर्णतः अनुरूप होता है, इसलिए यह वैज्ञानिक संज्ञान और ज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रयोगों को कई रूपों में विभाजित करने का रिवाज है : (१) अन्वेषणात्मक ( exploratory ), इसका मक़सद नयी घटनाओं, नये अनुगुणों या घटनाओं के बीच पहले से अज्ञात संपर्कों का पता लगाना है ; (२) परीक्षणात्मक ( testing or checking ), इसका लक्ष्य प्राक्कल्पना की पुष्टि या खंडन करना और उसकी सटीकता का अनुमान लगाना है ; (३) रचनात्मक ( constructive ), जिसके दौरान ऐसे नये पदार्थों, नयी संरचनाओं या नयी सामग्री की रचना की जाती है जो पहले प्रकृति में विद्यमान नहीं थी ; और (४) नियंत्रणात्मक ( control ), जिसका लक्ष्य माप उपकरणों, यंत्रों और औज़ारों की जांच तथा समंजन ( adjustment ) करना है।

प्रायोगिक क्रियाकलाप के ये सभी रूप अक्सर एक ही प्रयोग में अंतर्गुथित ( interwoven ) होते हैं। मसलन, शुक्र ग्रह तक एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला के प्रक्षेपण से सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत की कई प्रस्थापनाओं की सटीकता की पुष्टि करना ( परीक्षणात्मक प्रयोग ), ग्रह के वायुमंडल में तथा सतह पर नयी घटनाओं की खोज करना संभव हुआ ( अन्वेषणात्मक प्रयोग ) और उस सिलसिले में नितांत नये यंत्रों तथा उपस्करों का निर्माण किया गया ( रचनात्मक प्रयोग ) और संक्रियाशील उपकरणों की विश्वसनीयता का परीक्षण किया गया ( नियंत्रणात्मक प्रयोग )।

आधुनिक विज्ञान का एक विशिष्ट लक्षण यह है कि अब संज्ञान ( cognition ) की एक सामान्य वैज्ञानिक विधि के रूप में प्रयोगों का न केवल प्राकृतिक विज्ञानों तथा इंजीनियरी में, बल्कि सामाजिक जीवन में भी व्यापक अनुप्रयोग ( application ) होता है। वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की दशाओं में संज्ञान तथा वास्तविकता ( reality ) को रूपांतरित करने की प्रायोगिक विधियां उद्योग, कृषि, प्रबंध और प्रशासन के सारे क्षेत्रों में आम ( common ) हो गयी हैं। इसमें हम सामाजिक व्यवहार पर विज्ञान के प्रभाव के एक सर्वाधिक शक्तिशाली कार्यतंत्र ( mechanism ) को देखते हैं। यही इसका स्पष्टीकरण है कि प्रत्येक सचेत व्यक्ति को संज्ञान तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में प्रयोग की भूमिका ( role ) को समझने की जरूरत क्यों हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
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