प्रतिक्रियात्मकता और निष्कर्षात्मक बेचैनी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


प्रतिक्रियात्मकता और निष्कर्षात्मक बेचैनी
( संदर्भ के लिए पिछली प्रविष्टि ‘सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती’ देखें )

“आप बहुत ज़ल्दी में लगते हैं, प्रतिक्रियात्मक हैं, निष्कर्षात्मक बेचैनी से भरे हुए हैं। ”  मैं आपसे सच कह रहा हूँ कि इन चीजों को मैं अधिक महसूस नहीं करता। अब मेरी मानसिकता का निर्माण जैसे जैसे और जिस वातावरण में हुआ हो, वैसे ही मैं बन गया हूँ। लेकिन आखिर बेचैनी क्यों है? और प्रतिक्रियात्मक होने की बात पर कभी इतना ध्यान नहीं दिया है। आपने दिलाया है, इसके लिए शुक्रिया। लेकिन मैं आपका विश्लेषण जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसा कैसे बन गया?

हमें लगता है, प्रतिक्रियात्मकता का मतलब यह होता है कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार आदि के साथ मुखातिब होते समय, उसके साथ अंतर्क्रिया करने के बजाए उससे सामना होते ही, बिना ज़्यादा माथापच्ची किए, उस पर तुरंत अपनी तात्कालिक प्रतिक्रिया, या उस वक़्त जितना भी बूझ पाया जा रहा होता है उसी के हिसाब से, अपनी सहमति या असहमति की तात्कालिक प्रतिक्रिया को अभिव्यक्त करने को उद्यत हो उठना। प्रतिक्रियात्मकता का मुख्य लक्षण सिर्फ़ प्रतिक्रिया करने के लिए प्रतिक्रिया करना जैसा ही कुछ है। गति का तृतीय नियम, हर क्रिया की, उसी के परिमाण के बराबर विपरीत दिशा में एक समान प्रतिक्रिया होती है। जैसी क्रिया, उसी के विरोध में वैसी ही प्रतिक्रिया। यही प्रतिक्रियात्मकता का मूल है।

निष्कर्षात्मक बेचैनी से हमारा अभिप्राय यह था कि आप कुछ करने के लिए ( जो भी आप अपने लिए अपनी सक्रियता का लक्ष्य रखते हैं ) इतने उद्यत हैं और उसमें तुरंत जुट जाना चाहते हैं और इसलिए उसकी सैद्धांतिकी या वैचारिक आधारों पर अधिक और अतिरिक्त माथापच्ची करने का आपके पास समय नहीं है, इसलिए आप उनकी समस्या पैदा होते ही यह चाहने लगते हैं कि तुरत उनका समाधान निकले, तुरत कोई निश्चयात्मक निष्कर्ष निकले, नहीं निकल रहा हो तो तात्कालिक कोई निष्कर्ष मान लिया जाए और आगे बढ़ा जाए। यही जल्दबाज़ी, यही कुछ करने के लिए तुरंत मैदान में उतरने की तड़प आपको सैद्धांतिक और वैचारिक मामलों पर निष्कर्षात्मक बैचैनी से भर देती है शायद। यही बात पहुंचाना हमारा लक्ष्य था।

अब देखिए, हम काफ़ी समय निकालकर और लगाकर आपके लिए कुछ वाज़िब और गूढ़ लिखने की कोशिश करते हैं और आप उसे पढ़ते ही तुरत उस पर प्रतिक्रिया देकर/लिखकर मुक्त हो लेते हैं। गेंद फिर हमारे पाले में पहुंच जाती है कि लीजिए संभालिए और निबटिए।

हमारी जुंबिश पर आपके तात्कालिक निष्कर्षों और प्रतिक्रियात्मकता की बानगी एक बार दोबारा देखिए। – ( पहले हँसी आई – इस वाक्य में कुछ नया नहीं था – कुछ लगा और इस पर सोचूंगा – यह बात सही है, मैं मानता हूँ इसे – अब मेरी मानसिकता का निर्माण जैसे जैसे और जिस वातावरण में हुआ हो, वैसे ही मैं बन गया हूँ – तो इसे मैं अच्छा मानता हूँ या कहें कि खुद को विजयी मानने लगता हूँ – लेकिन क्या शिक्षा इतनी जल्दी प्रभाव में या आदत में आ जाएगी – ऐसा लगता है कि आप नाराज हो गये – उनका जिक्र करने का मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि वे बड़े महत्व के हैं – तकनीकी वाली बात का उल्लेख किसी बड़े महत्व के नजरिये से नहीं किया था – बुद्ध या बौद्ध की स्थिति वास्तव में कुछ अलग है – भगतसिंह! महासत्य है – यह बात स्पष्ट हो रही है कि एक जैसा इतिहास रहा है मानव का – वैसे भाषा का मुद्दा भी बहुत सही नहीं लगता – पता कर के बताऊंगा बाद में – जो कहा वही है कि भाषा का असर कम्प्यूटर पर पड़ता है – ऐसा नहीं कि वैदिक गणित साफ बेकार है – इन मामलों में गुणाकर मुळे को अधिकृत और वैज्ञानिक मानता हूँ – स्वदेशी मैंने वैसे स्वीकार नहीं किया है, जैसा शायद आप बताना चाह रहे हैं –)

अब आपकी भाषा और उसमें अहम् की बानगी देखिए। – ( इस वाक्य ने मुझे कुछ मजबूर किया है – यह बात सही है, मैं मानता हूँ इसे – भाग्य की बात सुनते ही मुझे क्रोध आ जाता है – मैं इससे खुश नहीं कि – मैं स्पष्ट मानता हूँ कि – मैंने उन्हें शब्दों में रखा है – मैं मानता हूँ कि धर्मपाल – मेरा उद्देश्य यह नहीं था – मैं खंडन करना चाहता हूँ कि वेदों में – अगर मुझे कुछ गलत लगे या अवैज्ञानिक लगे – उस व्याख्या को मैं स्वीकारता हूँ – व्यवस्था को मैं इस आदर्श के लक्ष्य में एक पड़ाव मानता हूँ – यह मेरा बिलकुल मानना नहीं है – मैं हर तरह के निजीकरण के खिलाफ़ हूँ – मेरा चले तो सारे पूंजीपतियों – उसे मैं स्वीकारता हूँ और स्वयं – व्यवस्था मुझे सही लगती है – विकल्प मुझे गलत नहीं लगता – मैंने अपनी किताब में कई जगह – बातों ने मुझे कहीं परेशान किया तो – मैंने पहले भी कहा है कि मैं जब यह – मैं इस बारे में इतना ही कहूंगा कि मैं महीनों से देख रहा था कि – मैं अपनी जिज्ञासा रखता ही नहीं कहीं )

क्या वाकई ऐसा नहीं लगता कि लाल किले की प्राचीर से एक महान नेता बोल रहा है। या कि ये वाक्यांश गांधी, जवाहर, जेपी, लोहिया आदि के लेखों/भाषणों से लिए गए हैं। क्या यह आपका अतिआत्मविश्वास नहीं है कि आप जिन अवधारणाओं को अभी ठीक से समझते भी नहीं उन पर इतनी गज़ब की प्रतिक्रिया देने का साहस रखते हैं।

जब हम वैचारिक उथल-पुथल से गुजर रहे होते हैं या कि बहस-मुहाबिसे में अपना पक्ष भी रख रहे होते हैं तो हमारी भाषा काफ़ी संयत होनी चाहिए। वह निष्कर्षात्मक और आत्मपरक नहीं के बराबर दिखनी चाहिए। तभी सार्थक संवाद संभव हो सकता है। वरना वह सिर्फ़ एक बयान मात्र रह जाता है, हमारी व्यक्तिगत उद्‍घोषणा मात्र। इस तरह हम सही विचार या बात को भी कमजोर कर रहे होते हैं।

इस बार आपकी भाषा में कुछ अच्छे प्रयोग भी मिले, उनकी बानगी भी देख लीजिए, जिससे उनका प्रयोग करना आप बढ़ा सकें, और आपको यह भी ना लगे कि हम तो सिर्फ़ आपकी खिंचाई ही करते रहते हैं। – ( यह वाक्य तो वाकई गम्भीर है। कुछ लगा और इस पर सोचूंगा – मुझे ऐसा लगता है – यह बात ऐसे ही कह दी – मैं भी महसूस करता हूँ कि – अब यह बात स्पष्ट हो रही है कि – हमें अपना कलंकित इतिहास – मैं स्वयं बहुत नहीं जानता लेकिन – भी तो सोचा जा सकता है – अलावा हम क्या विकल्प दे सकते हैं – हम वापस मन और स्वयं से – अब हम इन बहस जैसी )

मैं और मेरा के झमेले से उत्तम पुरुष में लिखकर मुक्त हुआ जा सकता है?….. दुबारा माफ़ी मांगता है यह व्यक्ति। उत्तम पुरुष में बात करना कैसा रहेगा? अब से लिखना भी क्या इसी में करें?

हां यह तो है ही, परंतु शनैः शनैः इसको समझ का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। इसका प्रयोग हमें निरंतर इस हेतु सचेत करता रहेगा। परंतु यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हर जगह और असहज प्रयोग व्यंग्य या मज़ाक सा भी लग सकता है, अतः सचेत होकर करें।

जब कोई विचार रखा जा रहा है, तो मैं के स्थान पर हम का प्रयोग विनम्रता लाता है। यदि विरोधी विचार रखना हो तो शुरुआत इस तरह से की जा सकती है कि हमें लगता है, हमें महसूस होता है, हमने कहीं पढ़ा था, आदि। नितांत व्यक्तिगत रवैया रखना हो तो, मैं या मुझे का प्रयोग भी किया जा सकता है, यथा मैं सोचता हूं, मुझे लगता है, आदि ( जैसा कि आप करते भी हैं )। जब आप अपनी कमजोरी, अपनी कमतरी का उल्लेख कर रहे हैं तो वहां मैं, मुझे ( हमें तो है ही ) कहना ही आपको कमियों के लिए स्वयं उत्तरदायित्व लेना प्रदर्शित कर सकता है। आदि-आदि। इसे आपके सामने विस्तार से रखने की जरूरत नहीं है, आप जानते हैं।

मैं इससे खुश नहीं कि मेरे सवालों को बहस समझा गया कहीं-कहीं। मैं स्पष्ट मानता हूँ कि बातों पर सवाल उठे और मैंने उन्हें शब्दों में रखा है। उसमें मेरी सोच शामिल होगी ही।

बात यह नहीं है कि हमें सही समझा गया या नहीं, हमारा स्पष्ट मानना क्या है, हमारे शब्दों और सोच को समझा गया या नहीं। हमें यह समझना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि हमें ही इसके लिए सचेत होना पड़ेगा कि अपनी बात या विचार को रखते समय हमारे द्वारा प्रयुक्त भाषा हमारे मंतव्यों को ठीक तरह से परावर्तित कर पा रही है या नहीं? हमारे द्वारा काम में ली गई भाषाई शब्दावली और उसकी प्रस्तुति हमारे इच्छित को ठीक तरह से संप्रेषित कर पा रही है या नहीं ? और इसके लिए हमें थोड़ा संयत होकर, सोच समझकर लिखना/कहना/बोलना सीखना होगा। कुछ कहने से पहले अपनी बात को तौलना होगा। अपने लिखे को कई-कई बार पढ़ना और संशोधित करना सीखना होगा। और यह तात्कालिक प्रतिक्रियात्मकता के साथ नहीं हो सकता। यही बात हम आप तक पहुंचाना चाह रहे हैं।

‘अपनी मान्यताएं बनाना, बिगाड़ना, गलत मानना, सही मानना, अपने दृष्टिकोण को तय करना आपका अधिकार है।’…यह वाक्य मुझे अप्रत्यक्ष रूप से अयोग्य शिष्य और अहंकारी साबित करता है…

यह इसलिए कहा गया था कि आप संवाद के साथ-साथ अपनी सापेक्ष स्वतंत्रता को भी सचेत रूप से महसूस कर सकें और किसी भी तरह के लिहाज़ और दबाब से अपने चिंतन को मुक्त रख सकें। आपको कोई बाध्यता नहीं महसूस हो।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण

आपने कहा था कि मैं अतिरिक्त सचेत होने लगता हूँ, तब असहजता आ जाती है और यह भी कहा था कि मैं अतिरिक्त ध्यान न दूँ। भला यह कैसे होगा? ध्यान कम जाय या न जाय, इसके लिए क्या करें?

ध्यान देना या नहीं देना, किसी चीज़ के प्रति सचेत होना या ना होना, उस चीज़ के प्रति आपके कन्सर्न्स, उसके प्रति आपके रवैये पर निर्भर करती है। यदि उसके साथ आपके कन्सर्न्स है, आप उसके प्रति लगाव या महत्त्वपूर्णता का रवैया रखते हैं तो आप कितनी भी कोशिशे कीजिए, आपका ध्यान उधर बरबस जाता ही रहेगा, आप उसके प्रति सचेत होते ही रहेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि चीज़ों के प्रति अपने कन्सर्न्स, अपने संबंधों को बदले बिना, उनके प्रति अपने रवैयों को बदले बिना उन पर ध्यान जाना या उनके प्रति सचेत होना ख़त्म किया नहीं जा सकता। बिना संबंधों और रवैयों को बदले किन्हीं चीज़ों से सिर्फ़ ध्यान हटाने की कोशिश करना एक आध्यात्मिक कोशिश करने की तरह है जो व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है। यह पलायन है, हल या निपटारा नहीं।

जैसे कि मान लीजिए हमें अपना मज़ाक उड़ाए जाने पर क्रोध आता है। क्रोध इसलिए आता है क्योंकि हम अपने अहम् को, अपनी इज्ज़त को, अपने आत्मसम्मान को बहुत ही अधिक महत्त्व देते हैं और किन्हीं भी परिस्थितियों में इनके साथ समझौता करने का रवैया नहीं रखते। इसलिए हम इस बात के प्रति बहुत सचेत रह सकते हैं कि इस पर कोई आंच नहीं आए। जरा भी कोई ऐसी परिस्थितियां बनती हैं जिनसे हमारी इज्ज़त, अहम् और आत्मसम्मान पर कोई खतरा महसूस होता है हम असहज होने लगते हैं, थोड़ा अधिक होने पर हम क्रोध में आ जाते हैं और अगर स्थितियां ज़्यादा बिगड़ जाएं तो हमारा व्यवहार अधिक ही उग्र हो सकता है।

अब यदि हम अपनी इस आदत या क्रोध की प्रतिक्रिया को बदलना चाहते हैं। सामान्यतः किया यह जाता है कि हम ऐसी स्थितियों से बचने की कोशिश करने लगते हैं, ऐसी स्थितियां बनती लगने पर वहां से खिसक लेना चाहते हैं, कुछ हो भी जाए और हमें क्रोध आने भी लगे तो उस क्रोध से लड़ने लगते हैं, जबरन उस स्थान पर, उन लोगों पर आ रहे क्रोध को दबाने की कोशिश करते हैं। कुछ तरीकों के अनुसार कुछ लोग गिनती गिनने लग सकते हैं, गाना गुनगुनाने लग सकते हैं। तात्कालिक रूप से इस तरह के तरीक़े कारगर से लग सकते हैं, पर वास्तव में होते नहीं। क्योंकि यहां मूल कारण वहीं हैं, उसकी प्रतिक्रियास्वरूप पैदा हुआ क्रोध भी वहीं है, सिर्फ़ उसके तात्कालिक रूप से प्रदर्शन को स्थगित किया जा रहा है, हमारी बन चुकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को दबाया, उसका दमन किया जा रहा है। इससे और भी कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं, यह दबाया हुआ क्रोध और कहीं निकल सकता है।

इसके स्थायी हल वही हो सकते है जैसा कि ऊपर कहा गया था, हालांकि वह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है पर समाधान वही हैं। यानि हमें अपनी स्वभाव बन गई प्रवृत्तियों, कन्सर्न्स, हमारे रवैयों से आंतरिक लड़ाई करनी पड़ेगी। हमें समझना होगा कि इज्ज़त, अहम् और आत्मसम्मान क्या चीज़ होते हैं, इनकी हमारे जीवन और बाकी समाज और परिवेश के साथ अंतर्संबंधों में इनकी कितनी महत्त्वपूर्णता भूमिका होती है, समझनी चाहिए। हमें तुलना करना सीखना पड़ेगा कि कब आत्मसम्मान महत्त्वपूर्ण होता है और कब बाकी चीज़ें, मतलब सामने वाला व्यक्ति, उसके साथ हमारे संबंध। हमें भी यह भी समझना होगा कि क्या वास्तव में हमारा आत्मसम्मान एक छुईमुई की तरह है जिसे किसी का भी जरा सा स्पर्श मुरझा सकता है। क्या इसे अधिक लचीला और मजबूत नहीं होना चाहिए जिस पर छोटे-मोटे मज़ाक कोई असर ना डाल पाएं। यानि हमें हमारे आत्मसम्मान के प्रति हमारे कन्सर्न्स, संबंधों को समझना और बदलना होगा।

दूसरी बात हमें ऐसे हालात में अपने प्रतिक्रियात्मक रवैयों को भी समझना होगा। हमें देखना होगा कि हमारी प्रतिक्रियाएं किस-किस तरह की अनैच्छिक स्थितियों को पैदा कर देती है, हमें, हमारे व्यक्तित्व को किस तरह सबके सामने कमजोरी या मखौल का विषय बना सकती है, कैसे हमारी प्रतिक्रियाएं हमारे सामाजिक अस्तित्व से मेल नहीं खाती और हम एक गैरजिम्मेदाराना असामाजिक व्यवहार करने लग सकते हैं। हमें हमारे रवैयों को अधिक जिम्मेदार, अधिक सामाजिक बनाना सीखना होगा। यानि इन्हें भी समझना और बदलना होगा।

जब आत्मसम्मान के प्रति हमारे कन्सर्न्स और हमारे रवैये में धीरे-धीरे ही सही उचित बदलाव किये जाएंगे तभी यह संभव हो सकेगा कि प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा होने पर भी हमें वाकई में क्रोध ही नहीं आए, उन्हें हम सहजता से लेना सीख सकें, हमारे प्रतिक्रियात्मक व्यवहार का नियंत्रण करना सीख सकें। एक बेहतर मनुष्य बन सकें।

शायद अब आप समझ सकते हैं कि आपको जिन चीज़ों से तकलीफ़ पैदा होती है, जिनके प्रति आपमें सचेतनता पैदा होती है, असहजता आती है, उन चीज़ों के प्रति अपने संबंधों और रवैयों में बदलाव ही वैसी स्थितियां पैदा कर सकता है कि आपका उन पर ध्यान ही ना जाए।

जैसे कि, जब हमने अपने आपको इस बात के प्रति भली-भांति मुतमइन कर लिया है और इसको व्यवहार में उतार लिया है कि व्यक्ति का पहनावा उसके आंतरिक व्यक्तित्व का आइना नहीं होता और बाहरी प्रस्तुति कोई मायने नहीं रखती तो आपका ध्यान लोगों के पहनावे पर जाएगा ही नहीं कि किसने किस वक़्त क्या पहना था, आपने क्या पहना था। अब आप यदि आप मानते हैं कि इससे फर्क पड़ता है, आप भी इन्हीं चीज़ों के हिसाब से व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया करते हैं तो आप कितना भी कोशिश करलें, आपका ध्यान लोगों के पहनावों पर जाता ही रहेगा।

यदि हमको लगता है कि हमारी असफलता, हमसे हुई कोई हरकत से हमारी छवि, जिसे कि हम बहुत महानता के साथ जोड चुके हैं, पर दाग लगा सकती हैं, हमको कमजोर साबित कर सकती है, हमारा मज़ाक उड़वा सकती है, तो जाहिर है ऐसी किसी भी सार्वजनिक क्रियाकलापों में, व्यवहार में उतरते वक़्त हम असहज होंगे ही, उससे बचने की कोशिश करेंगे, उससे डरेंगे। और ऐसा तब अधिक होने की संभावना होती है जब हमें अपनी इस महान छवि के प्रति अधिक आत्मविश्वास भी ना हो।

ओह इस पर काफ़ी लंबा लिख गये हैं। बहुत इशारे हो चुके हैं, आप बात को शायद समझ पाएं।

परीक्षा में लिखते समय कुछ घबड़ाहट का अनुभव हुआ।….उस समय के बाद बार-बार यह महसूस हुआ कि घबड़ाहट और हाथ में कम्पन होता है।….जैसे मान लीजिए मैं बीस छात्रों की कक्षा में पढ़ाने जाता हूँ, तो मुझे घबड़ाहट क्यों होनी चाहिए, चाहे वह किसी तरह की हो।

किसी भी परीक्षा का मतलब हमारी, हमारे व्यक्तित्व की जांच ही होती है, और यह हम भली भांति जानते ही हैं। ऐसे ही कई लोगों के बीच प्रस्तुत होना भी अप्रत्यक्ष रूप से यही ही है। हमारे भय, हमारी दुश्चिंताएं हमारे अवचेतन का हिस्सा बन जाती हैं, और अनुकूल परिस्थितियों के पैदा होते ही जाने-अनजाने ही हमको प्रभावित करती ही हैं। इसलिए यह होता ही है, हो सकता ही है।

ऊपर काफ़ी कुछ कहा ही जा चुका है।

लड़कियों से भी कुछ हद तक बात करने में घबड़ाहट होती है।….जैसे मुझे कह दिया जाय किसी कक्षा में मैं पढ़ाने जाऊँ जिसमें लड़कियाँ (शायद बच्चियाँ नहीं) हों, तो शायद परेशानी होने लगे।…एक आदत रही है कि लड़कियों की आँखों में आँखें डालकर कम देखते हैं या बात करते हैं।

लड़कियों वाले मामले में भी ऊपर वाली बात तो रहती ही है, एक और मसला जुड जाता है, विपरीत लिंगी होने का। एक उम्र के बाद, परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं के दौरान, स्त्री और पुरुष की संकल्पनाएं आकार लेने लगती हैं। समझ में उनके बीच का अलगाव बढ़ता है, साथ ही उनकी एकता के रहस्यमयी साये भी कल्पना में गहराने लगते हैं। दोनों के बीच की अंतर्संबंधता कुछ समझ में आती है, कुछ घटाघोप बनाती है। फलस्वरूप विपरीत लिंगी के साथ झिझक और असहजता बढ़ने लगती है। और भी कई चीज़ें आती है जिन्हें आप भली भांति जानते ही हैं।

कई सारी मानसिक उलझनें, जो एकांतिक कल्पनालोक का हिस्सा होती हैं, एक दूसरे का सामना होते ही उभर आती हैं, चेतनता के केन्द्रीय ढ़ांचे में हावी हो जाती हैं और व्यक्ति असहज व्यवहार को अभिशप्त हो जाता है। लगभग सभी इस प्रक्रिया से गुजरते हैं, और अधिकतर इससे पार नहीं पा पाते। आजकल की शहरी संस्कृति में सहशिक्षा तथा और भी कई अन्य घटकों के कारण यह असहजता थोड़ी कम रहती है, या यूं भी कह सकते हैं इससे पार पाने और आगे बढ़ने के अधिक अवसर उपल्ब्ध होते जाते हैं।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय