प्रतिक्रियात्मकता और निष्कर्षात्मक बेचैनी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


प्रतिक्रियात्मकता और निष्कर्षात्मक बेचैनी
( संदर्भ के लिए पिछली प्रविष्टि ‘सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती’ देखें )

“आप बहुत ज़ल्दी में लगते हैं, प्रतिक्रियात्मक हैं, निष्कर्षात्मक बेचैनी से भरे हुए हैं। ”  मैं आपसे सच कह रहा हूँ कि इन चीजों को मैं अधिक महसूस नहीं करता। अब मेरी मानसिकता का निर्माण जैसे जैसे और जिस वातावरण में हुआ हो, वैसे ही मैं बन गया हूँ। लेकिन आखिर बेचैनी क्यों है? और प्रतिक्रियात्मक होने की बात पर कभी इतना ध्यान नहीं दिया है। आपने दिलाया है, इसके लिए शुक्रिया। लेकिन मैं आपका विश्लेषण जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसा कैसे बन गया?

हमें लगता है, प्रतिक्रियात्मकता का मतलब यह होता है कि किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार आदि के साथ मुखातिब होते समय, उसके साथ अंतर्क्रिया करने के बजाए उससे सामना होते ही, बिना ज़्यादा माथापच्ची किए, उस पर तुरंत अपनी तात्कालिक प्रतिक्रिया, या उस वक़्त जितना भी बूझ पाया जा रहा होता है उसी के हिसाब से, अपनी सहमति या असहमति की तात्कालिक प्रतिक्रिया को अभिव्यक्त करने को उद्यत हो उठना। प्रतिक्रियात्मकता का मुख्य लक्षण सिर्फ़ प्रतिक्रिया करने के लिए प्रतिक्रिया करना जैसा ही कुछ है। गति का तृतीय नियम, हर क्रिया की, उसी के परिमाण के बराबर विपरीत दिशा में एक समान प्रतिक्रिया होती है। जैसी क्रिया, उसी के विरोध में वैसी ही प्रतिक्रिया। यही प्रतिक्रियात्मकता का मूल है।

निष्कर्षात्मक बेचैनी से हमारा अभिप्राय यह था कि आप कुछ करने के लिए ( जो भी आप अपने लिए अपनी सक्रियता का लक्ष्य रखते हैं ) इतने उद्यत हैं और उसमें तुरंत जुट जाना चाहते हैं और इसलिए उसकी सैद्धांतिकी या वैचारिक आधारों पर अधिक और अतिरिक्त माथापच्ची करने का आपके पास समय नहीं है, इसलिए आप उनकी समस्या पैदा होते ही यह चाहने लगते हैं कि तुरत उनका समाधान निकले, तुरत कोई निश्चयात्मक निष्कर्ष निकले, नहीं निकल रहा हो तो तात्कालिक कोई निष्कर्ष मान लिया जाए और आगे बढ़ा जाए। यही जल्दबाज़ी, यही कुछ करने के लिए तुरंत मैदान में उतरने की तड़प आपको सैद्धांतिक और वैचारिक मामलों पर निष्कर्षात्मक बैचैनी से भर देती है शायद। यही बात पहुंचाना हमारा लक्ष्य था।

अब देखिए, हम काफ़ी समय निकालकर और लगाकर आपके लिए कुछ वाज़िब और गूढ़ लिखने की कोशिश करते हैं और आप उसे पढ़ते ही तुरत उस पर प्रतिक्रिया देकर/लिखकर मुक्त हो लेते हैं। गेंद फिर हमारे पाले में पहुंच जाती है कि लीजिए संभालिए और निबटिए।

हमारी जुंबिश पर आपके तात्कालिक निष्कर्षों और प्रतिक्रियात्मकता की बानगी एक बार दोबारा देखिए। – ( पहले हँसी आई – इस वाक्य में कुछ नया नहीं था – कुछ लगा और इस पर सोचूंगा – यह बात सही है, मैं मानता हूँ इसे – अब मेरी मानसिकता का निर्माण जैसे जैसे और जिस वातावरण में हुआ हो, वैसे ही मैं बन गया हूँ – तो इसे मैं अच्छा मानता हूँ या कहें कि खुद को विजयी मानने लगता हूँ – लेकिन क्या शिक्षा इतनी जल्दी प्रभाव में या आदत में आ जाएगी – ऐसा लगता है कि आप नाराज हो गये – उनका जिक्र करने का मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि वे बड़े महत्व के हैं – तकनीकी वाली बात का उल्लेख किसी बड़े महत्व के नजरिये से नहीं किया था – बुद्ध या बौद्ध की स्थिति वास्तव में कुछ अलग है – भगतसिंह! महासत्य है – यह बात स्पष्ट हो रही है कि एक जैसा इतिहास रहा है मानव का – वैसे भाषा का मुद्दा भी बहुत सही नहीं लगता – पता कर के बताऊंगा बाद में – जो कहा वही है कि भाषा का असर कम्प्यूटर पर पड़ता है – ऐसा नहीं कि वैदिक गणित साफ बेकार है – इन मामलों में गुणाकर मुळे को अधिकृत और वैज्ञानिक मानता हूँ – स्वदेशी मैंने वैसे स्वीकार नहीं किया है, जैसा शायद आप बताना चाह रहे हैं –)

अब आपकी भाषा और उसमें अहम् की बानगी देखिए। – ( इस वाक्य ने मुझे कुछ मजबूर किया है – यह बात सही है, मैं मानता हूँ इसे – भाग्य की बात सुनते ही मुझे क्रोध आ जाता है – मैं इससे खुश नहीं कि – मैं स्पष्ट मानता हूँ कि – मैंने उन्हें शब्दों में रखा है – मैं मानता हूँ कि धर्मपाल – मेरा उद्देश्य यह नहीं था – मैं खंडन करना चाहता हूँ कि वेदों में – अगर मुझे कुछ गलत लगे या अवैज्ञानिक लगे – उस व्याख्या को मैं स्वीकारता हूँ – व्यवस्था को मैं इस आदर्श के लक्ष्य में एक पड़ाव मानता हूँ – यह मेरा बिलकुल मानना नहीं है – मैं हर तरह के निजीकरण के खिलाफ़ हूँ – मेरा चले तो सारे पूंजीपतियों – उसे मैं स्वीकारता हूँ और स्वयं – व्यवस्था मुझे सही लगती है – विकल्प मुझे गलत नहीं लगता – मैंने अपनी किताब में कई जगह – बातों ने मुझे कहीं परेशान किया तो – मैंने पहले भी कहा है कि मैं जब यह – मैं इस बारे में इतना ही कहूंगा कि मैं महीनों से देख रहा था कि – मैं अपनी जिज्ञासा रखता ही नहीं कहीं )

क्या वाकई ऐसा नहीं लगता कि लाल किले की प्राचीर से एक महान नेता बोल रहा है। या कि ये वाक्यांश गांधी, जवाहर, जेपी, लोहिया आदि के लेखों/भाषणों से लिए गए हैं। क्या यह आपका अतिआत्मविश्वास नहीं है कि आप जिन अवधारणाओं को अभी ठीक से समझते भी नहीं उन पर इतनी गज़ब की प्रतिक्रिया देने का साहस रखते हैं।

जब हम वैचारिक उथल-पुथल से गुजर रहे होते हैं या कि बहस-मुहाबिसे में अपना पक्ष भी रख रहे होते हैं तो हमारी भाषा काफ़ी संयत होनी चाहिए। वह निष्कर्षात्मक और आत्मपरक नहीं के बराबर दिखनी चाहिए। तभी सार्थक संवाद संभव हो सकता है। वरना वह सिर्फ़ एक बयान मात्र रह जाता है, हमारी व्यक्तिगत उद्‍घोषणा मात्र। इस तरह हम सही विचार या बात को भी कमजोर कर रहे होते हैं।

इस बार आपकी भाषा में कुछ अच्छे प्रयोग भी मिले, उनकी बानगी भी देख लीजिए, जिससे उनका प्रयोग करना आप बढ़ा सकें, और आपको यह भी ना लगे कि हम तो सिर्फ़ आपकी खिंचाई ही करते रहते हैं। – ( यह वाक्य तो वाकई गम्भीर है। कुछ लगा और इस पर सोचूंगा – मुझे ऐसा लगता है – यह बात ऐसे ही कह दी – मैं भी महसूस करता हूँ कि – अब यह बात स्पष्ट हो रही है कि – हमें अपना कलंकित इतिहास – मैं स्वयं बहुत नहीं जानता लेकिन – भी तो सोचा जा सकता है – अलावा हम क्या विकल्प दे सकते हैं – हम वापस मन और स्वयं से – अब हम इन बहस जैसी )

मैं और मेरा के झमेले से उत्तम पुरुष में लिखकर मुक्त हुआ जा सकता है?….. दुबारा माफ़ी मांगता है यह व्यक्ति। उत्तम पुरुष में बात करना कैसा रहेगा? अब से लिखना भी क्या इसी में करें?

हां यह तो है ही, परंतु शनैः शनैः इसको समझ का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। इसका प्रयोग हमें निरंतर इस हेतु सचेत करता रहेगा। परंतु यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हर जगह और असहज प्रयोग व्यंग्य या मज़ाक सा भी लग सकता है, अतः सचेत होकर करें।

जब कोई विचार रखा जा रहा है, तो मैं के स्थान पर हम का प्रयोग विनम्रता लाता है। यदि विरोधी विचार रखना हो तो शुरुआत इस तरह से की जा सकती है कि हमें लगता है, हमें महसूस होता है, हमने कहीं पढ़ा था, आदि। नितांत व्यक्तिगत रवैया रखना हो तो, मैं या मुझे का प्रयोग भी किया जा सकता है, यथा मैं सोचता हूं, मुझे लगता है, आदि ( जैसा कि आप करते भी हैं )। जब आप अपनी कमजोरी, अपनी कमतरी का उल्लेख कर रहे हैं तो वहां मैं, मुझे ( हमें तो है ही ) कहना ही आपको कमियों के लिए स्वयं उत्तरदायित्व लेना प्रदर्शित कर सकता है। आदि-आदि। इसे आपके सामने विस्तार से रखने की जरूरत नहीं है, आप जानते हैं।

मैं इससे खुश नहीं कि मेरे सवालों को बहस समझा गया कहीं-कहीं। मैं स्पष्ट मानता हूँ कि बातों पर सवाल उठे और मैंने उन्हें शब्दों में रखा है। उसमें मेरी सोच शामिल होगी ही।

बात यह नहीं है कि हमें सही समझा गया या नहीं, हमारा स्पष्ट मानना क्या है, हमारे शब्दों और सोच को समझा गया या नहीं। हमें यह समझना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि हमें ही इसके लिए सचेत होना पड़ेगा कि अपनी बात या विचार को रखते समय हमारे द्वारा प्रयुक्त भाषा हमारे मंतव्यों को ठीक तरह से परावर्तित कर पा रही है या नहीं? हमारे द्वारा काम में ली गई भाषाई शब्दावली और उसकी प्रस्तुति हमारे इच्छित को ठीक तरह से संप्रेषित कर पा रही है या नहीं ? और इसके लिए हमें थोड़ा संयत होकर, सोच समझकर लिखना/कहना/बोलना सीखना होगा। कुछ कहने से पहले अपनी बात को तौलना होगा। अपने लिखे को कई-कई बार पढ़ना और संशोधित करना सीखना होगा। और यह तात्कालिक प्रतिक्रियात्मकता के साथ नहीं हो सकता। यही बात हम आप तक पहुंचाना चाह रहे हैं।

‘अपनी मान्यताएं बनाना, बिगाड़ना, गलत मानना, सही मानना, अपने दृष्टिकोण को तय करना आपका अधिकार है।’…यह वाक्य मुझे अप्रत्यक्ष रूप से अयोग्य शिष्य और अहंकारी साबित करता है…

यह इसलिए कहा गया था कि आप संवाद के साथ-साथ अपनी सापेक्ष स्वतंत्रता को भी सचेत रूप से महसूस कर सकें और किसी भी तरह के लिहाज़ और दबाब से अपने चिंतन को मुक्त रख सकें। आपको कोई बाध्यता नहीं महसूस हो।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है

मुझे कुछ रुखापन नहीं लगा।…..क्योंकि लेखों से दिखता है कि…..समीक्षक हैं और समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे…..एक बात चलते-चलते कि लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे? चापलूसी से, नहीं, ठीक नहीं है। यह तो राजनीति के नेताओं की तरकीब है। लोग स्वीकारते नहीं हैं क्योंकि सब का अहं प्रबल हो जाता है।

आपके नाम, पारिवारिक पृष्ठभूमि और उन मानवश्रेष्ठ के जरिए आपसे किये गए संवाद पर आपकी तात्कालिक प्रतिक्रिया जानने को मिली। आपका नाम जानने के बाद यह संभव हो गया कि अंतर्जाल के जरिए आपकी और भी कार्यवाहियों से परिचित हुआ जा सके। उनसे भी थोड़ा बहुत गुजरना हुआ। आपने कह ही दिया है इसलिए निश्चिंत रहा जा सकता है कि आप रूखेपन और प्रत्यक्षता को समझ सकते हैं, और इसे हमारी बेरूखी और ह्रदयहीनता नहीं समझेंगे। कि आप चीज़ों को समझने की प्रक्रियाओं में हैं। अतएव आपसे कुछ कठोर भी कहा जा सकता है, आप उसे अन्यथा नहीं लेंगे।

कुछ मनुष्य तुरंत प्रतिक्रियात्मक होते हैं, उतावले से। उनका दिमाग़ ऐसे अनुकूलन का अभ्यस्त होता है, जो तुरंत जवाबी प्रतिक्रिया देता है, और उसे अपनी तात्कालिकता के साथ तुरंत व्यक्त कर देता है। यह कोई ग़लत बात नहीं है, पर इससे यह परिलक्षित होता है कि उसमें धेर्य की कमी है, उसमें अच्छे श्रोता या पाठक होने की प्रवृत्ति नहीं है। वे चीज़ों के साथ अंतर्क्रिया करके उन्हें आत्मसात्कृत करने की बज़ाए उनसे सीधी लड़ाई छेड़ने को, सचेत और सतर्क हो उठते हैं।

ये ज्ञान को, चीज़ों को समझने की प्रक्रिया और पद्धति के लिए ज़्यादा अच्छे लक्षण नहीं हैं। तात्कालिक तुरंत प्रतिक्रियात्मकता, अंतर्विरोधों के साथ, उनसे सकारात्मक द्वंद और संघर्ष करके अपने को विकसित करने का ज़रिया बनाने की जगह, नकारात्मक प्रतिरोध यानि कि विरोधी से, मान्यताओं के विपरीत से जाते लगते विचारों के साथ एक सुरक्षात्मक, सतर्क व्यवहार के लिए प्रेरित करती है। और मनुष्य इस प्रक्रिया में उलझता जाता है, अपने को और रूढ़ बनाता जाता है।

हालांकि आप इसकी इन शुरुआती प्रवृत्तियों से आगे निकल चुके हैं, और बातों को समझने और सही से लगते को स्वीकारने की दिशा में काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं, पर इसे और विकसित करने की आवश्यकता है।

आपको आपकी कई उलझनों और बातों पर हम विस्तार से, हालांकि क्लिष्ट सांद्रता और कई गंभीर इशारों के साथ लिख ही चुके हैं। आपको भी उनसे उसी गंभीरता के साथ गुजरना चाहिए, गुजरते रहना चाहिए। कई सूत्र वाक्य वहां कहे गये ही थे। धेर्य के साथ समझने की कोशिश की जानी चाहिए, अपने यथार्थ को समझते और उसके साथ गुनते हुए। किन्हीं बातों पर यदि आवश्यकता महसूस करते हैं तो और भी खुलकर संवाद किया जा सकता है

थोड़ा सा प्रतिवाद, आपकी वाज़िब बात को ही आगे बढ़ाते हुए :

‘समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे’

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है, किसी भी क्रिया के लिए। यानि प्रदत्त क्षण में, या तात्कालिक संदर्भों में, आपके लक्ष्य क्या हैं, एकाधिक लक्ष्य होने की अवस्थाओं में प्राथमिकता पर क्या है, यह हमारी कार्यवाहियों को तय करते हैं, या यह कहें कि करने चाहिएं। समीक्षा में या आलोचना में भी ऐसा ही होना चाहिए।

जब यह लक्ष्य प्राथमिकता पर है कि सार्वजनिक रूप से विचार का खंड़न या मंड़न, दत्त परिस्थितियों में ज़्यादा आवश्यक हो गया है तो आपका कहा शत-प्रतिशत सही है। अब संभावित प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखना आवश्यक नहीं है।

पर यदि लक्ष्य आलोचना के साथ-साथ, समीक्षित विचार या उससे संबंधित व्यक्ति में, नकारात्मकता को उभारे बिना, उसे अपनी प्रस्तुति पर पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत करवाना हो, यानि उसके विकास की संभावनाओं को ज़िंदा रखना हो, तो स्वाभाविकतः समीक्षा को, उसकी भाषा को, आवश्यक रूप से संयत और संवाद के लिए प्रेरित करने वाली होना चाहिए।

और यदि लक्ष्य वैयक्तिक रूप से उसकी व्यक्तिगत चेतना में, समझ में सचमुच ही सकारात्मक हस्तक्षेप करना हो तो फिर हमारी क्रियाविधियां, भाषा, संवाद का स्तर, उसके ज्ञान और समझ के स्तर के अनुरूप ही रखना होगा, वरना बीच का अंतराल हमारे लक्ष्य को असंभव बना देगा। एक बार संवाद सेतु खत्म, तो हस्तक्षेप की सभी संभावनाएं ख़त्म।

और यह भी होता है कि, हमारा लक्ष्य इनमें से कु्छ भी ना हो, हम सिर्फ़ अपने को केन्द्र में रखकर, अपने हितों और संभावनाओं के पल्लवन के लाभार्थ यह कार्य कर रहे हों, अपने आपको स्थापित करने का लक्ष्य ही सिर्फ़ हमारे दिमाग़ में हो, तो फिर हम किसी भी तरह से, तर्क-कुतर्क करने को स्वतंत्र होते हैं। आप देख ही रहे होंगे, आजकल यही ज़्यादा हो रहा है।

आपकी एक और बात ‘लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे?’ पर भी उपरोक्त में ही कुछ इशारे हो गये हैं।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय