विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत अंतर्विरोधों के अन्य रूपों पर चर्चा की थी, इस बार हम विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार

image007अभी तक जो कुछ बताया गया है उसका समाहार करने के लिए हम द्वंद्ववाद ( dialectics ) के एक सबसे महत्त्वपूर्ण नियम, विरोधियों की एकता और संघर्ष के नियम ( law of unity and struggle of opposites ) को, निम्न सार के रूप में निरूपित कर सकते हैं:

( १ ) प्रकृति, समाज तथा चिंतन की किसी भी घटना में विरोधी ( opposing ) पहलू, अनुगुण, लक्षण, उपप्रणालियां या तत्व होते हैं, जो एक दूसरे से अनिवार्यतः जुड़े होते हैं या अंतर्क्रियाशील होते हैं, यानि वे एक एकत्व ( unity ) होते हैं।

( २ ) एकत्व की रचना करने वाले विरोधियों ( opposites ) के बीच द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध ( dialectical contradiction ) का संबंध होता है।

( ३ ) मुख्य आंतरिक अंतर्विरोधों ( internal contradiction ) की उत्पत्ति, वृद्धि और समाधान सारी गति के और विशेषतः विकास के स्रोत ( source of development ) हैं। अंतर्विरोधों का समाधान विकास का निर्णायक क्षण, विकास का मुख्य कारण होता है।

( ४ ) विकास के दौरान कुछ विरोधियों ( प्रतिपक्षों ) का अन्य में द्वंद्वात्मक संक्रमण ( transition ) होता है, और विरोधियों की टक्कर ( clash ), अंतर्क्रिया ( interaction ) व अंतर्वेधन ( interpenetration ) होता है।

( ५ ) नयी अविपर्येय ( irreversible ) घटनाएं, प्रक्रियाएं, अनुगुण या लक्षण, आदि उत्पन्न होते हैं, जो पहले विद्यमान नहीं थे और वे विरोधियों के संघर्ष ( struggle ) के द्वारा, उनके अंतर्संपरिवर्तन ( interconversion ) व अंतर्वेधन तथा एक दूसरे में संक्रमण के द्वारा तथा अंतर्विरोधों के समाधान ( solution ) के ज़रिये उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार, विरोधियों की एकता और संघर्ष के नियम का सार्विक स्वरूप ( universal character ) है और इसकी समझ का विश्वदृष्टिकोणीय ( world-outlook ), विधितंत्रीय ( methodological ) तथा वैचारिक ( ideological ) महत्त्व बहुत अधिक है। एक वस्तु या घटना के विश्लेषण में उसके अंतर्विरोधों से शुरुआत की जानी चाहिये और उसके विरोधी पक्षों, गुणों तथा प्रवृत्तियों की एकता व संघर्ष को समझना चाहिए और इस तरह से उनके अंतर्संबंधों ( interrelations ) को स्पष्ट करना चाहिए। वस्तुओं और घटनाओं की ऐसी जांच ही उनके सार तक पहुंचने का एकमात्र तरीका है।

विचाराधीन घटनाओं में अंतर्भूत ( immanent ) तथा बुनियादी ( basic ) अंतर्विरोधों का पता लगाने से उन घटनाओं के विकास के प्रेरक बलों का ही नहीं, बल्कि उनके विकास के नियमों का ज्ञान प्राप्त करने में भी मदद मिलती है। चूंकि अंतर्विरोध तथा उनके समाधान के तरीक़े विविधतापूर्ण हैं, इसलिए व्यवहार में उत्पन्न होनेवाले अंतर्विरोधों की विशिष्टताओं को पहचानना और प्रदत्त दशाओं में उनके समाधान के इष्टतम ( optimal ) तरीक़ों का कुशलता से पता लगाना महत्त्वपूर्ण है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

विकास का उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूलो के अंतर्गत सार्विक संपर्क के उसूल को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम विकास के उसूल पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूल
विकास का उसूल

emergence_michael_kabotieद्वंद्ववाद ( dialectics ) का दूसरा बुनियादी उसूल, विकास का उसूल है। इसका सार यह है कि विश्व को पूर्व-निष्पन्न ( ready made ) वस्तुओं के समुच्चय ( set, collection ) के रूप में नहीं, अपितु प्रक्रियाओं ( processes ) के समुच्चय के रूप में ग्रहण करना चाहिए, जिसमें स्थायी ( permanent ) प्रतीत होनेवाली वस्तुएं सतत आविर्भाव तथा अवसान ( continuative emersion and expiration ) के अविरत परिवर्तन क्रम से गुजरती हैं, जिसमें ऊपर से दिखाई देनेवाली सारी आकस्मिकता ( casualness ) के बावजूद अंततोगत्वा एक अग्रगति ( precession ) अपने लिए रास्ता बना लेती है।

विश्व में जारी परिवर्तन अपने स्वभाव व दिशा में भिन्न होते हैं। इनमें से कुछ एक दूसरे के संबंध में पिंडो की गति होते हैं, अन्य किसी एक वस्तु के गुणों, संरचना तथा कार्य में परिवर्तन होते हैं। कुछ परिवर्तन विपर्येय ( reversible ) होते हैं यानि जिन्हें पुनः पहली स्थिति में लौटाया जा सकता है, एक दूसरे में बदला जा सकता है ( पानी – बर्फ़ – पानी ), और दूसरे अविपर्येय ( irreversible ) होते हैं यानि उन्हें पुनः पहली स्थिति में लौटाया नहीं जा सकता ( भ्रूण – जीव शरीर )। कुछ नयी चीज़, जिसका पहले अस्तित्व नहीं था, पृथक परिवर्तनों के दौरान उत्पन्न हो सकती है। कुछ प्रक्रियाओं का आशय निम्न से उच्चतर और सरल से जटिलतर में संक्रमण ( transition ) है, तो अन्य का उच्चतर से निम्नतर में और जटिल से सरलतम में संक्रमण होता है। ‘विकास’, ‘प्रगति’ तथा ‘प्रतिगमन’ जैसी संकल्पनाओं को परिवर्तन के विभिन्न प्रकारों के संज्ञा-पदों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

विकास ( development ) एक प्रकार की गति है, जिसमें किसी किसी वस्तु अथवा प्रक्रिया की आंतरिक संरचना में परिवर्तन सम्मिलित होते हैं। जब हम कहते हैं कि एक प्रणाली विकसित होती है, तो हमारा मतलब उसकी संरचना ( structure ) में एक आंतरिक ( internal ), गुणात्मक रूपातंरण ( qualitative transformation ) से होता है। संरचनात्मक परिवर्तन अविपर्येय होते हैं और उनकी एक सुस्पष्ट दिशा होती है। इस तरह से कहा जा सकता है कि जिन प्रक्रियाओं में अविपर्येय परिवर्तन होते हैं और किसी नयी चीज़ की उत्पत्ति होती है वे आम तौर पर विकास की प्रक्रियाएं कही जाती हैं

प्रकृति, समाज तथा चिंतन में विकास की तुलना तथा विश्लेषण कर के भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialistic dialectics ) विकास के उन सबसे सामान्य लक्षणों ( general characteristics ) को प्रकाश में लाता है, जो इसे गति के अन्य रूपों से विभेदित करते हैं। ये लक्षण निम्नांकित हैं: ( १ ) विकास की काल में एक दिशा होती है, अतीत से वर्तमान तथा भविष्य को, ( २ ) विकास एक अविपर्येय प्रक्रिया है, ( ३ ) किसी भी विकास के दौरान ऐसी नयी चीज़ उत्पन्न होती है, जिसका पहले अस्तित्व नहीं था, ( ४ ) विकास की प्रक्रिया नियम-संचालित होती है और विकास के अलग-अलग रूपों और सामान्य विकास दोनों के वस्तुगत नियम होते हैं। ये गुण-विशेषताएं ( attributes ) एक सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रवर्ग, यानि “विकास” के अर्थ का निर्धारण करते हैं जो प्रकृति, समाज तथा चिंतन की सारी घटनाओं से संबंधित है।

उच्चतर क़िस्म के संगठन की ओर प्रगतिशील विकास को प्रगति ( progress ) कहते हैं और विपरीत दिशा में होनेवाले परिवर्तन प्रतिगमन ( regression ) कहलाते हैं। विकास, प्रगति और प्रतिगमन की जटिल द्वंद्वात्मक अंतर्क्रिया है। विश्व की, उसके विकास की, मनुष्यजाति के विकास की और मनुष्यों के मन में इस विकास के प्रतिबिंब की सच्ची अवधारणा केवल द्वंद्ववाद की पद्धतियों के द्वारा ही की जा सकती है, जो उद्भावना और तिरोभावना के बीच, प्रगतिशील और प्रतिगामी ( progressive and regressive ) परिवर्तनों के बीच असंख्य क्रिया-प्रतिक्रियाओं को निरंतर ध्यान में रखता है।

blending-the-elements-of-creation-फलतः, सारे विश्व की गति को एक ही दिशा में होनेवाला – आरोही ( प्रगतिशील ) या अवरोही ( प्रतिगामी ) – विकास नहीं माना जा सकता है। केवल अलग-अलग प्रणालियों और प्रक्रियाओं के संबंध में ही निश्चित दिशा में होनेवाले परिवर्तन की बात कही जा सकती है। प्रगति और प्रतिगमन के बीच सहसंबंध ( correlation ) भौतिक जगत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होता है। अजैव जगत में ‘उदासीन’ प्रक्रियाएं हावी होती हैं ( इनमें प्रगतिशील व प्रतिगामी, दोनों ही तरह के परिवर्तन शामिल होते हैं )। लेकिन जैव प्रकृति में परिवर्तनों की मुख्य प्रवृत्ति प्रगतिशील होती है : जीवित प्राणियों के अधिक जटिल आंतरिक संगठन, संरचना तथा कार्यों की ओर। लेकिन यहां भी प्रगति में प्रतिगमन के तत्वों का मेल पाया जाता है।

यद्यपि समाज प्रगति के रास्ते में चलता है, तथापि प्रगति सीधी-सरल नहीं होती। इतिहास में कई विपर्ययों और तीव्र पुनरावर्तनों का होना ज्ञात है, पर इसके बावजूद इसकी सामान्य दिशा आरोही ( ascending ) और प्रगतिशील है। इतिहास में एक दूसरी का अनुक्रमण ( sequencing ) करनेवाली सभी सामाजिक व्यवस्थाएं मानव-समाज के निम्नावस्था से ऊपर की ओर अंतहीन विकास-क्रम की केवल अल्पकालिक मंज़िलें हैं।

यद्यपि गति और विकास के सार्विक ( universal ) होने का तथ्य अविवादास्पद ( uncontroversial ) है, तथापि जैसा कि हम शुरुआत में ही परिचित हो चुके हैं, विश्व प्रक्रिया को समझने के दो दृष्टिकोण हैं, विकास की दो संकल्पनाएं हैं – अधिभूतवादी और द्वंद्ववादी। विकास की द्वंद्वात्मक संकल्पना ( dialectical concept ), गति व विकास के स्रोत के बारे में, उनके स्वभाव, क्रिया-विधि, रूप तथा दिशा के बारे में वस्तुगत एवं विज्ञानसम्मत विवेचना और व्याख्या करती है। वहीं अधिभूतवादी संकल्पना ( metaphysical concept ) इस संदर्भ में आत्मगत ( subjectively ) रूप से, गति व विकास के स्रोतों को समझने में ग़लती करती है, वह विकास को पहले से ही विद्यमान ( existing ) में सामान्य घटती या बढ़ती ( decrease or increase ) समझती है, स्थायित्व ( stability ) को निरपेक्ष बनाती है तथा गति और विकास के अंतर्विरोधात्मक स्वभाव ( contradictory nature ) को समझने में नाकामयाब हो जाती है।

आज के प्रभुत्व प्राप्त वर्ग द्वारा प्रतिपादित विकास की अधिभूतवादी संकल्पना का एक निश्चित वर्ग उद्देश्य है। वह अपनी वर्ग हितबद्धता को ध्यान में रखते हुए, विकास की संकल्पना को इस तरह से पेश करती है, जिससे सामाजिक प्रगति के विचार को ठुकरा या विरुपित ( deform ) कर दिया जाए, शोषक समाज को शाश्वत, वर्गों के बीच संघर्ष को व्यर्थ और एक शोषणविहीन समतामूलक समाज की ओर अवश्यंभावी संक्रमण को, समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण ( revolutionary transformation ) की आवश्यकता को धूमिल कर दिया जाए।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद मूलतः क्रांतिकारी है। यह लोगों को आस-पास के जगत की सारी प्रक्रियाओं और घटनाओं को गति और विकास में देखना सिखलाता है। प्रकृति और समाज में जारी वास्तविक प्रक्रियाओं को अधिक गंभीर और परिपूर्ण रूप से, एकता और संघर्ष की द्वंद्वात्मकता के साथ समझना सिखाता है। यह प्रकृति और समाज के विकास को रेखांकित करते हुए, समाज के क्रांतिकारी रूपांतरण की संभावनाओं को प्रदर्शित करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

सार्विक संपर्क का उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद और संकलनवाद के बीच अंतर को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम द्वंद्ववाद का व्यवस्थित निरूपण शुरू करते हुए इसके बुनियादी उसूलो के अंतर्गत सार्विक संपर्क के उसूल पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अब हम द्वंद्ववाद के व्यवस्थित विवेचन ( systematic deliberation ) और सटीक निरूपण ( accurate representation ) की ओर आगे बढ़ते हैं। सार्विक ( universal ) संबंधों के एक विज्ञान के रूप में द्वंद्वंवाद, गति और विकास के सामान्य नियमों का विज्ञान है। यह सार्विक संबंध के उसूल और, गति तथा विकास के उसूल को घनिष्ठता के साथ मिलाकर विचार करता है, क्योंकि भौतिक जगत में संबंध का मतलब है अंतर्क्रिया और अंतर्क्रिया ही गति और विकास की रचना करती है। हम यहां इन्हीं सार्विक संबंधों के उसूलों और गति एवं विकास के नियमों को थोड़ा सा विस्तार और व्यवस्थित रूप से समझने की कोशिश करेंगे। शुरुआत करेंगे कुछ बुनियादी उसूलों से।

द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूल
सार्विक संपर्क का उसूल
संपर्क और अंतर्क्रिया

drip-painting-decadence3घटनाओं के बीच सार्विक संपर्क ( universal contact ) भौतिक जगत की सर्वाधिक सामान्य नियमितता ( regularity ) है। इसका आधार यह है कि विश्व की सारी वस्तुओं, प्रक्रियाओं तथा घटनाओं में एक सर्वनिष्ठ गुण ( common property ) है, वह है उनकी भौतिक प्रकृति। यहां सार्विक संपर्क का तात्पर्य यह है कि किसी भी वस्तु या घटना की उत्पत्ति, परिवर्तन, विकास तथा गुणात्मकतः नई अवस्था में रूपांतरण ( transformation ) अकेले अलग-थलग होना असंभव है। ऐसा केवल दूसरी वस्तुओं, घटनाओं तथा भौतिक प्रणालियों के साथ अंतर्संबंध ( interrelation ) तथा अंतर्निर्भरता ( interdependence ) में ही हो सकता है। कोई भी एक वस्तु या प्रणाली ( object or system ), संबंधों के एक बहु-शाखीय जाल ( multi-branched network ) द्वारा अन्य वस्तुओं या प्रणालियों के साथ जुड़ी है और इनमें से कुछ में परिवर्तन ( change ) होने पर अन्य में भी निश्चित ही परिवर्तन होते हैं।

सार्विक संपर्क की संकल्पना ( concept ) में संबंधों के समस्त प्रकार और रूप शामिल हैं। अंतर्क्रिया ( interaction ) उस संपर्क का एक सार्विक लक्षण ( characteristic ) है। अंतर्क्रिया का अर्थ वे सारे प्रकार, विधियां तथा रूप हैं, जिनके द्वारा वस्तुएं और प्रक्रियाएं एक दूसरी को प्रभावित करती हैं। जब वस्तुएं अंतर्क्रिया करती हैं, इसका अवश्यंभावी फल उनका पारस्परिक परिवर्तन तथा गति ( motion ) होता है। वास्तविक वस्तुओं के बीच अनगिनत अंतर्क्रियाओं का जाल ही अपनी समग्रता ( totality ) में, विकास की विश्व प्रक्रिया का आधार होता है

मसलन, सौरमंडल में ग्रहों के साथ सूर्य की अंतर्क्रिया का अवश्यंभावी परिणाम सूर्य के गिर्द उनका घूमना होता है। जैव और अजैव प्रकृति के बीच अंतर्क्रिया केवल पौधों व जानवरों को ही नहीं, बल्कि उनके पर्यावरण को भी बदल देती है। भौतिक उत्पादन के दौरान मनुष्य प्रकृति के साथ अंतर्क्रिया करते है और इस प्रकार प्रकृति को तथा स्वयं को भी परिवर्तित करते हैं।

वस्तुगत जगत की चीज़ें और घटनाएं केवल अंतर्क्रिया ही नहीं करती, बल्कि परस्पर आश्रित ( mutually dependent ) भी होती हैं। वस्तुओं तथा घटनाओं के ऐसे अन्योन्याश्रय ( interdependence ) का मतलब यह है कि विकास के दौरान वे एक दूसरे को प्रभावित करती हैं, एक दूसरे का निर्धारण करती हैं तथा परस्पर निर्भर होती हैं।

alfred-gockel-evolution-18897परस्पर निर्भरता प्रकृति, सामाजिक जीवन तथा मानव चेतना में सर्वत्र पाई जाती है। उदाहरणार्थ, आधुनिक भौतिकी ने इलेक्ट्रोन के द्रव्यमान तथा उसकी गति के वेग की परस्पर निर्भरता को साबित कर दिया है। सामाजिक जीवन में, आपसी निर्भरता के भौतिक सामाजिक संबंध व्यक्तियों के मानस में परावर्तित ( reflect ) होते हैं, उनकी विचार-धारा को तद्‍अनुसार अनुकूलित ( conditioned ) बनाते हैं, जो अपनी बारी में ख़ुद सक्रिय प्रतिप्रभाव डालती है। मानव चेतना में संवेदनों ( sensations ) और संकल्पनाओं ( concepts ) के बीच घनिष्ठ अंतर्निर्भरता होती है।

सार्विक संपर्क तथा अंतर्क्रिया के सिद्धांत का, विश्व-दृष्टिकोण ( word-outlook ) यानि मनुष्य के दुनिया को देखने-समझने के नज़रिए के संबंध में बड़ा महत्त्व है। यह विश्व की भौतिक एकता ( materialistic unity ) की गहनतर समझ प्रदान करता है, इसके जरिए हम वस्तुओं तथा घटनाओं को उनके आपसी अंतर्संबंधों, निर्भरताओं और परस्पर अंतर्क्रियाओं के साथ देखने में सक्षम बनते हैं, उनको उनकी वास्तविकताओं ( actualities ) के साथ बेहतरी से जानने-समझने के योग्य बनते हैं।

सार्विक संपर्क और अंतर्क्रिया अपने रूपों में असीम विविधतापूर्ण है। वस्तुगत जगत की एकता और अखंडता ( integrity ) तथा इस जगत की वस्तुओं और घटनाओं की विविधता के द्वारा ही संपर्क के इन रूपों की प्रकृति और विविधता ( diversity ) का निर्धारण होता है। भौतिक जगत की प्रत्येक अलग-अलग वस्तु या घटना के अनेकानेक विविध पहलू तथा गुण होते हैं और फलतः, अन्य वस्तुओं और घटनाओं के साथ तथा शेष सारे विश्व के साथ अनगिनत अंतर्संबंध भी होते हैं। ये संबंध सतत गतिमान, परिवर्तनशील व विकासमान हैं। विकास के दौरान एक दूसरे के साथ तथा शेष विश्व के साथ उनके अंतर्संबंध लगातार बदलते रहते हैं। फलतः, वास्तविकता के सार्विक संपर्कों के रूप अत्यंत गतिशील ( dynamic ) भी हैं और जटिल ( complex ) व विविधतापूर्ण भी

द्वंद्ववाद के सारे प्रवर्ग ( categories ) और नियम ( laws ) किसी ना किसी प्रकार से इस विश्व की वास्तविकता के संपर्कों और संबंधों को अभिव्यक्त करते हैं। इन संपर्कों के विविध रूप अलग-थलग नहीं, बल्कि एक अखंड प्रणाली हैं। अंतर्क्रिया के रूप भी इतने ही विविध हैं। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण यांत्रिक, भौतिक, जैविक और सामाजिक रूप हैं। इनमें से प्रत्येक में अनगिनत अंतर्क्रियाएं शामिल होती हैं और साथ ही साथ वे अन्य रूपों के साथ जटिल और विविधतापूर्ण अंतर्क्रियाएं करते हैं।

सार्विक संपर्क और अंतर्क्रिया की संकल्पना मानव संज्ञान ( cognition ) और व्यावहारिक कार्यकलाप के लिए असाधारण महत्त्व की है। वास्तव में, मानव द्वारा विश्व के संज्ञान का सारा इतिहास, इन्हीं सार्विक संपर्को और अंतर्क्रियाओं के असीम विविधतापूर्ण रूपों के रहस्यों में गहरे पैठने का, उनके व्यावहारिक उपयोग का ही इतिहास है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

द्वंद्ववाद और संकलनवाद

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने गति के उद्‍गम को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम द्वंद्ववाद और संकलनवाद पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद और संकलनवाद
( चिंतन में अंतर्विरोधों का परावर्तन )

new-15-75-x-75चिंतन में अंतर्विरोध ( contradiction ) किस तरह परावर्तित ( reflect ) होते हैं?, इस प्रश्न की पूरी समझ के लिए हमें निम्नांकित बातों को ध्यान में रखना चाहिए : हमारा चिंतन केवल तभी शुद्ध होगा जब वह अंतर्विरोध रहित हो। निस्संदेह, एक ही समय में और एक चीज़ के बारे में परस्पर विरोधी रायें प्रकट नहीं की जानी चाहिए। चिंतन में अंतर्विरोधों को आने देने से हम निर्दोष चिंतन के नियमों का उल्लंघन कर देते हैं। मिसाल के लिए, एक ही व्यक्ति के बारे में एक साथ यह कहना असंभव है कि वह जीवित और मृत है। बेशक, मनुष्य मरते हैं, किंतु यदि मनुष्य जीवित है तो हम उसपर इसी अनुगुण को आरोपित करेंगे और इस तथ्य के बावजूद करेंगे कि आज से कुछ वर्षों बाद वह मर जायेगा। और जब ऐसा होगा तो हम उस विचाराधीन मनुष्य के बारे में कहेंगे कि वह मर गया है।

किंतु हम यह देख और साबित कर चुके हैं कि विश्व में घटनाएं व्याघाती ( अंतर्विरोधी, contradictory ) होती हैं। १७वीं सदी से प्रकाशिकी के क्षेत्र में एक विवाद चल पड़ा था – क्या प्रकाश निर्बाध व तरंगनुमा और इसलिए तरंगों के नियमाधीन होता है, या बाधित, कणिकीय और इसलिए कणों के नियमाधीन होता है। प्रकाश के दो परस्पर विरोधी सिद्धांत बन गये : तरंगीय और कणिकीय। इनमें से कौनसा सिद्धांत सही है, कौनसा वास्तविकता ( actuality ) को अधिक सटीक रूप से परावर्तित करता है – इस प्रश्न को लेकर अनेकानेक वाद-विवाद हुए और दोनों के पक्ष में युक्तियां पेश की गयीं। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि इन दो निष्कर्षों में से केवल एक ही सत्य हो सकता है। किंतु विज्ञान के विकास से यह तथ्य निखरकर सामने आया कि यह ‘विलक्षण’ घटना एक अंतर्विरोधी द्वंद्वात्मक ( dialectic ) प्रकृति की है। बाद में यह साबित कर दिया गया कि प्रकाश एक ही काल में तरंग की और कणों की गति है।

१९वीं सदी में यह प्रमाणित कर दिया गया कि तरंगे दृष्ट प्रकाश की ही नहीं, बल्कि विद्युतीय, चुंबकीय तथा कई अन्य प्रक्रियाओं की भी लाक्षणिकता है। इस तरह दृश्य प्रकाश तथा अदृश्य रेडियो तरंगों, एक्स किरणों, बिजली, चुंबकत्व, ताप का विकिरण व अवशोषण, सामान्यतः ऊर्जा तथा प्रकाशीय प्रभाव के बारे में जानकारी के अधिकाधिक बढ़ने के कारण इस प्रकार थे : पहला, उनकी अंतर्निहित अंतर्विरोधी प्रकृति ( inherent contradictory nature ) की छानबीन तथा व्याख्या ( investigation and explanation ), और, दूसरा, खंडित व अविच्छिन्न ( discrete and continuous ) का, क्वांटा तथा तरंगों का, यानि विरिधियों का एक ही एकत्व के रूप में अध्ययन। इसी तरह की स्थिति नाभिकीय भौतिकी में, इलेक्ट्रोनों तथा अन्य प्राथमिक कणों के अध्ययन में भी उत्पन्न हुई। यह साबित हो गया कि उनकी प्रकृति भी व्याघाती ( contradictory ) है, यानि वे एक ही समय में खंडित भी हैं और तरंग-सम भी ; फलतः क्वांटम और तरंग यांत्रिकी का उद‍भव हुआ और फिर वे इस तथ्य के बावजूद एकीकृत ( unified ) हो गयीं कि एक कण तथा एक तरंग के रूप में इलेक्ट्रोन की संकल्पनाएं मूलतः बेमेल प्रतीत होती हैं।

अतः यदि कोई वस्तु या घटना व्याघाती ( अंतर्विरोधी ) है, तो वह हमारे चिंतन में भी उसी रूप में परावर्तित होनी चाहिए। जीवन भी अंतर्विरोधी है और यथार्थता ( reality ) को समझने के लिए खुले दिमाग़ का होना जरूरी है। जीवन की द्वंद्वात्मकता हमारे चिंतन की, संकल्पनाओं ( concepts ) की द्वंद्वात्मकता में परावर्तित होनी ही चाहिए।

dialectic_giottoकिंतु कुछ दार्शनिकों ने एक दूसरे से असंगत ( inconsistent ) विचारों और सिद्धांतों का मनमाना संकलन ( compilation ) तैयार करके दिमाग़ के खुलेपन का ग़लत अर्थ निकाला। ऐसे दार्शनिकों को संकलनवादी ( eclectics ) कहा गया। संकलनवाद विभिन्न विचार-पद्धतियों के लाक्षणिक विचारों का एक सिद्धांतविहीन और असंगत मेल होता है ; यह इस तथ्य के लिए उल्लेखनीय है कि इसमें उन्हें मिलाने की कोशिश की जाती है, जिन्हें मिलाया नहीं जा सकता है और यह उन वास्तविक संबंध-सूत्रों को देखने में असमर्थ होता है, जो किसी वस्तु को एक एकत्व में परिणत कर देता है।

यदि हम पहले यह कहें कि “भूतद्रव्य ( matter, पदार्थ ) मन को जन्म देता है” और फिर साथ ही यह दावा करें कि “मन स्व-अस्तित्वमान, प्रकृति से स्वतंत्र है” और इसपर भी जोर दें कि यह दो प्रस्थापनाएं परस्पर संगत हैं, तो हमें संकलनवादी कहा जायेगा। इस मामले में संकलनवाद ऐसे मूलतः भिन्न दृष्टिकोणों के यांत्रिक मेल के रूप में प्रकट होता है, जो उसके पूर्वानुमानुसार बराबर मूल्य के हैं, यानि भौतिकवाद ( materialism ) और प्रत्ययवाद ( idealism )। कई आधुनिक विचारक द्वंद्ववाद ( dialectics ) को संकलनवाद से प्रतिस्थापित करने की चेष्टा करते हैं। यह बात मिसाल के लिए, ‘अभिसरण’ के सिद्धांत में स्पष्टतः देखी जा सकती है। इसके अनुसार पूंजीवादी और समाजवादी प्रणालियों को एक दूसरी में संलीन ( coalesce ) किया जा सकता है। कुछ राजनीतिज्ञ राजनीति में भी संकलनवाद का उपयोग करने की कोशिश करते हैं और केवल सिद्धांत में ही नहीं करते। यथास्थितिवादी विचारक और राजनीतिज्ञ विज्ञापनों, प्रचार, सामूहिक संपर्क साधनों – रेडियो, प्रेस, टेलीविज़न, सिनेमा – के द्वारा संकलवाद का लाभ उठाते हैं और कुछ निश्चित धारणाओं के स्थान पर, उनके लक्ष्यों के अनुरूप कुछ अन्य धारणाओं को धूर्ततापूर्वक प्रतिस्थापित करने की, विरोधी धारणाओं के घालमेल करने की कोशिश करते हैं।

जब अधिभूतवादी ( metaphysical ) ढंग से सोचनेवाला व्यक्ति अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन, राजनीतिक संघर्ष में और उद्योग या विज्ञान में अंतर्विरोधों से टकराता है, तो वह उन्हें अपने से परे करने, उनसे बचके निकलने, उनकी तीक्ष्णता को घटाने, आदि का प्रयत्न करता है। प्रत्येक नयी घटना और ख़ासकर अनपेक्षित ( unexpected ) घटनाओं के लिए वह केवल बाहरी कारणों की खोज करता है। इस सबसे, बाह्य जगत में होनेवाले परिवर्तनों के वास्तविक कारणों की समझ में ही रुकावट नहीं पड़ती, बल्कि उसके वैयक्तिक जीवन में भी और मानवजाति के भले के लिए उसके सचेत ( conscious ), सोद्देश्य रूपातंरण ( purposive transformation ) में सक्रिय सहभागिता ( active participation ) भी बाधित ( obstructed ) हो जाती है।

इसके विपरीत जो व्यक्ति द्वंद्वात्मक ( dialectic ) ढंग से सोचता है, वह इन अंतर्विरोधों से जूझता है, उन के आपसी संबंधों को समझने की कोशिश करता है, घटनाओं के कारण के रूप में इनकी एकता और संघर्षों के स्वरूप को समझने की कोशिश करता है। इसलिए वह प्रकृति, समाज तथा चिंतन में वस्तुगत ( objective ) अंतर्विरोधों की उपस्थिति की बात को समझता ही नहीं, बल्कि उनको जानने, उनका अध्ययन करने, आंतरिक को बाह्य से, बुनियादी को गौण से, प्रतिरोधी को अप्रतिरोधी से पृथक करने, उनके बीच संपर्क व निर्भरता का पता लगाने और इन अंतर्विरोधों को पराभूत ( defeated ) करने, उन्हें सुलझाने के साधनों, रूपों तथा तरीकों को खोजने के प्रयत्न भी करता है।

बेशक, विकास ( development ) की वस्तुगत प्रक्रियाओं को हमेशा और हर जगह प्रभावित नहीं किया जा सकता है। लेकिन जहां प्रकृति और समाज के जीवन की घटनाओं को मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप के अंतर्गत लाया जा सकता है, वहां यह कर पाने की योग्यता, प्राकृतिक तथा इतिहास के क्रम पर मनुष्य की तर्कबुद्धिसम्मत कार्रवाई के लिए विराट अवसर प्रदान करती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

तीन महान खोजें

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हम ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत अधिभूतवाद पर चर्चा की थी, इस बार हम विज्ञान की दुनिया की तीन महान खोजों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


तीन महान खोजें
( three great discoveries )

lhfaithemail3-5विज्ञान के विकास के साथ ही विश्व के अधिभूतवादी दृष्टिकोण की कमजोरियां स्पष्ट होती गईं। ऐसा सबसे पहले ब्रह्मांडिकी ( cosmology ) में हुआ। जर्मनी के प्राकृतिक वैज्ञानिक और दार्शनिक कांट  तथा फ्रांसीसी खगोलविद व गणितज्ञ पियेर लाप्लास  ने सौरमंडल की उत्पत्ति पर मिलती-जुलती प्राक्कल्पनाएं ( hypothesis ) पेश कीं। इसके अनुसार सौरमंडल धूलि सरीखे भूतद्रव्य ( matter ) से स्वाभाविक रूप से विरचित हुआ। उनका सिद्धांत आकाशीय पिंडो के बारे में अधिभूतवादी संकल्पना पर पहला आघात ( shock ) था।

परिवर्तन तथा क्रमविकास से संबंधित द्वंदवादी विचार, स्वयं विज्ञान के ही गर्भ में उपज रहे थे। खास तौर पर १९वीं सदी के मध्य से, विज्ञान में यह विचार भली भांति प्रतिष्ठित हो गया कि क्रमविकास के सिद्धांत का ही सहारा लेकर परिवर्तनशील विश्व की विविधता का स्पष्टीकरण देना संभव है। विश्व के द्वंद्वात्मक स्वरूप के निरूपण ( demonstration ) में १९वीं सदी में संपन्न तीन महान खोजों का विराट महत्त्व है। ये हैं जीवित अंगियों की कोशिकीय संरचना ( cellular structure of living organism ) , ऊर्जा की अविनाशिता तथा रूपांतरण का नियम ( law of conservation and conversion of energy ) और क्रमविकास का सिद्धांत ( theory of evolution )। इन खोजों ने विश्व की वस्तुओं और घटनाओं के सार्विक अंतर्संबंधों को उद्‍घाटित करने में सहायता की और यह दर्शाया कि विकास सरल से जटिल और निम्न से उच्चतर की ओर होता है। इससे पहले वैज्ञानिक और अधिभूतवादी दार्शनिक यह मानते थे कि पदार्थ के विभिन्न रूप – कैलोरीय, चुंबकीय, यांत्रिक और विद्युतीय – एक दूसरे से स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान हैं। किंतु अब उनका आंतरिक संबंध ( internal relation ) प्रमाणित हो गया था।

१९वीं सदी के तीसोत्तरी दशक में जर्मन जैविकीविद ( biologist ) थियोडोर श्वान और वनस्पति वैज्ञानिक ( botanist ) मैथियाज़ श्‍लैदेन  ने जीवित अंगियों के विकास का अध्ययन करते समय कोशिका ( cell ) की खोज की, जो सारे पेड़-पौधों और प्राणियों की संरचना का आधार है। इस खोज का अकूत दार्शनिक महत्त्व ( vast philosophical significance ) था, क्योंकि इसने समस्त जीव-धारियों की एकता तथा पारस्परिक नातेदारी ( mutual kinship ) को प्रमाणित कर दिया।

अंग्रेज भौतिकीविद जेम्स जूल  और रूसी भौतिकीविद एमिल लेंट्‍ज़  द्वारा अन्वेषित ऊर्जा की अविनाशिता और रूपांतरण का नियम बतलाता है कि अकारण न कोई वस्तु प्रकट होती है, न ग़ायब होती है। सदियों पहले इसी प्रकार का विचार कई प्राचीन दार्शनिकों ने भी व्यक्त किया था किंतु यह उनका एक अनुमान मात्र था, उन्होंने भी कहा था कि शून्य से किसी की उत्पत्ति नहीं होती। यह सूक्ति वैज्ञानिक दृष्टि से तभी प्रमाणित हुई जब जूल और लेंट्‍ज़ ने ऊर्जा के सारे प्रकारों के बीच अंतर्संबंध को प्रमाणित कर दिया कि ऊर्जा अविनाशी और असर्जनीय है और उसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित भर किया जा सकता है यथा यांत्रिक से ताप ऊर्जा में और ताप ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा में, आदि।

evolutionअंग्रेज प्रकृति वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन  द्वारा निरूपित क्रमविकास के सिद्धांत ने वनस्पति जगत तथा प्राणी जगत के बीच अंतर्संबंध को ज़ाहिर किया। डार्विन ने तथ्यात्मक ( factual ) सामग्री के विशाल भंडार के आधार पर यह साबित किया कि पौधों से लेकर मनुष्य तक सारी प्रकृति एक अनवरत प्रवाह और क्रमिक विकास की स्थिति में है। क्रमविकास का विचार ज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया। २०वीं सदी में भौतिकी तथा खगोलविद्या में ब्रह्मांड की उत्पत्ति और विकास संबंधी सिद्धांतों का आविर्भाव ( emersion ) हुआ। भूविज्ञान ( geology ) और भूगोल ( geography ) ने इस विचार की पुष्टि की कि पृथ्वी, उसका आभ्यंतर और सतह लगातार बदल रही है। भूविज्ञान ने पदार्थों के विकास का अध्ययन शुरू कर दिया। इतिहास ( history ) में यह विचार पेश किया जाने लगा कि प्रगति निम्नतर से उच्चतर अवस्थाओं की ओर गति है। मनोविज्ञान ( psychology ) ने बताया कि मनुष्य की मानसिकता भी बदलती है। इस प्रकार, सार्विक क्रमविकास का सिद्धांत विज्ञान और दर्शन में सर्वव्याप्त हो गया और विश्व की अपरिवर्तनीयता के दृष्टिकोण का पूर्णतः खंडन हो गया।

यह विचार भी सत्य सिद्ध हो रहा है कि सारी यथार्थता ( reality ) अंतर्संबंधित है। जलवायु में परिवर्तन से वनस्पति और प्राणी जगत में परिवर्तन हो जाते हैं। सूर्य में उठनेवाले चुंबकीय तूफ़ान रेडियो संचार को ही नहीं गड़बड़ाते हैं, बल्कि मौसम पर भी असर डालते हैं, जबकि वायुमंडलीय दबाब मनुष्यों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। वस्तुओं और घटनाओं के सार्विक संबंधों के बारे में वैज्ञानिक जगत के साथ-साथ साहित्यिक जगत में भी काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है। प्रकृति की केवल एक कड़ी का विनाश या दुर्बलीकरण प्रकृति के ही नहीं, बल्कि समाज के आगे के विकास पर भी असर डालता है। पश्चिमी जर्मनी के एक दार्शनिक रॉबर्ट श्तैगरवाल्ड  वस्तुओं और घटनाओं के बीच सार्विक संबंध के एक उदाहरण के रूप में एक अत्यंत कारगर कीटनाशी पदार्थ डी. डी. टी. की खोज की चर्चा करते हैं। इसके अनुप्रयोग से कीड़ों का उन्मूलन ( abolition ) करना सहज हो गया, किंतु इसने पक्षियों का भोजन भी नष्ट कर दिया, फलतः बसंत ख़ामोश हो गया। डी. डी. टी. से पक्षी और मधुमक्खियां मर गईं तो पहले से कम फूलों का परागण हुआ, फल और फ़सल घट गई। वर्षाजल से डी. डी. टी. सतह के पानी में प्रविष्ट हो गया, फिर नदियों और सागरों में और अंततः हमारे भोजन में। यह लोगों की मांसपेशियों में संचित हो गया। चूंकि डी. डी. टी. को जीवित शरीर से हटाना असंभव है, इसलिए वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि डी. डी. टी. के उपयोग को ख़त्म कर दिया जाए। किंतु घटनाओं के बीच सार्विक संबंध हमेशा जाहिर नहीं होता है, कभी-कभी तो हम उसे देख ही नहीं सकते।

विश्व केवल परिवर्तनशील और गतिमान ही नहीं ह, यह एक अविभक्त साकल्य ( a indivisibly whole ) है और इसमें हर चीज़ अभिन्न ( integral ) रूप से जुड़ी है। विज्ञान ने प्राचीन दार्शनिकों के द्वारा लगाए गए इस अनुमान को सही साबित कर दिया कि कोई भी वस्तु शून्य से सर्जित ( create ) नहीं होती और कोई भी चिह्न छोड़े बग़ैर लुप्त नहीं होती। परमाणु प्राथमिक कणों से बनते हैं, फिर उनसे अणुओं की रचना होती है। बड़े आकाशीय पिंड भी एक दूसरे से जुड़े हैं ; पौधे और प्राणी जातियां, वर्गों और कुलों की रचना करते हैं ; सूर्य पृथ्वी से, हमारी आकाशगंगा अन्य से जुड़ी है, आदि। अतः विश्व का अध्ययन करते समय हमें उसे उसके अंतर्संबंधों, एकता और परिवर्तनों के सहित देखना चाहिए।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – ४

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास पर आगे चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – ४
( a brief history on the concept of dialectics – 4 )
अधिभूतवाद

200px-The_Disquieting_Musesअधिभूतवाद’ ( Metaphysics ) का शाब्दिक अर्थ ‘भौतिकी के बाद’ है और यह शब्द कृत्रिम रूप से व्युत्पन्न है। सिकंदरिया के एक पुस्तकालयाध्यक्ष अंद्रोनिकस  ने, जिन्होंने अरस्तू की पांडुलिपियों का अध्ययन किया था, उन्हें एक क्रम में रखते समय तथाकथित ‘प्रथम दर्शन’ या ‘दार्शनिक प्रज्ञान’ से संबंधित ग्रंथों को प्रकृति संबंधी अरस्तू की रचना ‘भौतिकी’ के बाद रखा। उस काल से सारी दार्शनिक कृतियां अधिभूतवादी कहलाने लगीं। यह शायद इसलिए भी लोकप्रिय हो उठा कि इस शब्द से ऐसा भ्रम पैदा होता है कि यह दर्शन, भौतिकी की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बाद का है, यानि कि यह प्रतीत होता है कि अधिक वैज्ञानिक और तार्किक सा है। कालांतर में इस शब्द का अर्थ बदल गया। मसलन, हेगेल  ने अधिभूतवाद को गति के बारे में ऐसा दृष्टिकोण बताया, जो द्वंद्ववाद के विपरीत है।

अधिभूतवाद चीज़ों और परिघटनाओं ( phenomena ) को उनकी एकता और अंतर्संबंधों के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखता बल्कि उस समग्र, सामान्य संबंध के बाहर प्रत्येक घटना को दूसरे से अलग-थलग ढंग से, असम्बद्ध ( incoherent, relationless ) करके देखता है, और उनका अध्ययन पारस्परिक संबंधों व अंतर्क्रियाओं ( interactions ) से अलग करके करता है। परिणामस्वरूप उन्हें गतिमान नहीं बल्कि स्थिर, जड़ीभूत, और अपरिवर्तनीय मानता है। अधिभूतवादी दृष्टिकोण, परिवर्तन तथा गति का अध्ययन करते समय, परिघटनाओं के वास्तविक अंतर्संबंधों तथा विकास को दिखा पाने में असमर्थ होता है, और इसीलिए प्रकृति, समाज तथा मनुष्य के चिंतन में मूलतः नई घटनाओं तथा प्रक्रियों के उद्‍भव की संभावनाओं को स्वीकार नहीं करता।

अधिभूतवादी विचार-पद्धति में गति, उसके स्रोत ( source ) तथा उसमें अंतर्निहित अंतर्विरोधों ( inherent contradictions ) को वस्तुओं में अनिवार्य नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें अंतिम परिणाम समझा जाता है। चूंकि अधिभूतवादी के लिए वस्तुएं, उनके मानसिक परावर्तन, विचार अलग-अलग होते हैं और उन पर एक-एक करके पृथक विचार करना होता है, अतः उसके लिए वे ऐसे विषय होते हैं, जो हमेशा एक से रहते हैं और जिनका रूप सदा के लिए निर्धारित तथा निश्चित हो गया है। इस दृष्टि से विश्व में परिवर्तन नहीं सिर्फ़ पुनरावर्तन होता है, सब कुछ देर-सवेर पुनरावर्तित होता है, हर चीज़ ऐसे गतिमान होती है, मानो एक वृत्त में घूम रही हो और गति तथा परिवर्तन के स्रोत वस्तुओं और घटनाओं के अंदर नहीं, बल्कि किसी बाहरी प्रणोदन ( external propulsion ) में, उन शक्तियों में निहित होते हैं जो विचाराधीन घटना के संदर्भ में बाहरी होती है। यह बाह्य जगत में आमूल गुणात्मक रूपांतरणों ( radical qualitative conversions ) और क्रांतिकारी परिवर्तनों ( revolutionary changes ) को मान्यता नहीं देता और विकास को ऐसे पेश करता है मानो वह सुचारू क्रमविकास ( smooth evolution ) और महत्त्वहीन परिमाणात्मक परिवर्तन ( insignificant quantitative changes ) हो।

20081022_italy_de_chiricoइस तरह द्वंद्ववाद और अधिभूतवाद विकास के परस्पर दो विरोधी दृष्टिकोण ( approach ) हैं, विश्व के ज्ञान की व्याख्या करने की दो भिन्न-भिन्न विधियां ( methods ) हैं। चिंतन की विकास प्रक्रिया में हम देखते हैं कि जहां द्वंद्ववाद गति को मान्यता देता है, वहीं अतीत काल में अधिभूतवाद ने भौतिक घटनाओं और उनके अंतर्संबंधों के एक आवश्यक अनुगुण के रूप में गति से स्वयं को पृथक कर लिया था, हालांकि आधुनिक अधिभूतवाद गति से इन्कार तो नहीं करता है, पर उसे सरलीकृत तरीक़े से लेता है। द्वंद्ववाद विकास की व्याख्या विरोधियों की अंतर्क्रिया, उनकी एकता और संघर्ष के रूप में करता है, वास्तव में यह भीतरी विकास के, यानि स्वविकास के समकक्ष है। इसके विपरीत, अधिभूतवाद विकास को सरल स्थानांतरणों, बढ़ती या घटतियों, या चक्रिक गतियों में परिणत कर देता है और स्वविकास को ठुकरा देता है।

विश्व तथा उसके संज्ञान ( cognition ) के अधिभूतवादी दृष्टिकोण ने उस अवस्था में एक उचित भूमिका निभाई, जब वह विज्ञान की तरक़्क़ी और ज्ञान की प्रगति से जुड़ा हुआ था। इस पद्धति ने अलग-अलग वस्तुओं तथा घटनाओं के बारे में तथ्यों के संचय तथा संग्रह में और तुलना, प्रेक्षण, आदि के द्वारा उनके अनुगुणों की खोज में मदद की। इससे कई विज्ञानों : गणित, भौतिकी, जैविकी, रसायन, आदि में खोजों को प्रेरणा मिली, आवश्यक तथ्य मिले।

फ्रांसीसी जैविकीविद तथा चिंतक जे० लामार्क  ने तथ्यात्मक सामग्री के विशाल संग्रह के आधार पर प्राणियों के क्रम-विकास के बारे में एक सिद्धांत की रचना की। इसमें क्रमविकास को सरल से जटिल की ओर गति के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसे आंतरिक तथा बाह्य कारकों के प्रभावांतर्गत अंगी के सुधार का परिणाम माना गया है। परंतु चिंतन के अधिभूतवादी दृष्टिकोण के प्रभावी होने के कारण ऐसी स्थिति ही बन सकती थी, जिसमें वस्तुओं तथा घटनाओं के साथ उनके रिश्ते के साथ नहीं, बल्कि उनके अकेलेपन में देखा गया था ; वैज्ञानिकों का ध्यान उनके परिवर्तन और विकास से विकर्षित ( detract ) हो गया। यह दृष्टिकोण १९वीं सदी तह प्रभावी रहा और कई वैज्ञानिक विश्व की अपरिवर्तनीयता तथा उसके बुनियादी नियमों पर विश्वास करते थे, जिन्हें यांत्रिकी के नियमों में परिणत कर दिया गया था। इसके अनुसार ब्रह्मांड में कोई नई चीज़ पैदा नहीं हो सकती। इस तरह से अधिभूतवाद, जो इतिहासतः सीमित ज्ञानार्जन विधि है, धीरे-धीरे विज्ञान के क्रम-विकास में बाधा डालने लगा।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय

द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हम ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास पर आगे चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – ३
( a brief history on the concept of dialectics – 3 )

largeद्वंदवाद के इतिहास की चर्चा करते समय हम हेगेल  की, द्वंद्ववाद के सांमजस्यपूर्ण सिद्धांत के रचयिता की अवहेलना नहीं कर सकते हैं। हेगेल की मान्यता थी कि विश्व विरोधी शक्तियों की अंतर्क्रिया ( interaction ) के फलस्वरूप विकसित होता है, लेकिन उन्होंने इस विकास को किसी एक निरपेक्ष प्रत्यय ( absolute idea ) के, ‘विश्वात्मा’ या ‘विश्व बुद्धि’ से जोड़ दिया। उनके द्वंद्वात्मक मत में विश्व सिर के बल खड़ा प्रतीत होता है, वे प्रकृति तथा मानव इतिहास में विकासमान सभी कुछ को अंततः किसी ‘विश्व बुद्धि’ पर आरोपित कर देते हैं, फलतः उनका द्वंद्ववाद प्रत्ययवादी ( idealistic ) हो जाता है। हेगेल ने वास्तविक विश्व की द्वंद्वात्मकता का अनुमान प्रत्ययों के जगत में ( चिंतन में ) लगाया। उन्होंने कहा कि विश्व इतिहास ‘विश्वात्मा’ का क्रमविकास है। हर चीज़, प्रत्येक वस्तु तथा घटना में अंतर्निहित अंतर्विरोधों ( inherent contradictions ) के कारण विकसित होती है, इसलिए हर चीज़ का अपना ही इतिहास होता है। हेगेल के दर्शन में विद्यमान सही तर्कबुद्धिमूलक ( reasoning intelligence rooted ) सार, विकास के बारे में उनका सिद्धांत है, जिसमें विकास के प्रेरक बल को वे वस्तुओं और घटनाओं में निहित विरोधियों की अंतर्क्रिया पर आरोपित करते हैं। भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialistic dialectics ) इस सार को ग्रहण करता है, और इसे प्रत्ययवादी घटाघोप से मुक्त कर इसे और आगे विकसित करता है।

लोगों को अपने क्रियाकलापों के दौरान विश्व में होने वाली घटनाओं के बीच विद्यमान कड़ियों की बहुत समय से जानकारी रही है। चीजों के परस्पर संबंधों के बारे में, कारणों की श्रृंखला, आदि के बारे में इन विचारों को पहले-पहल अभिव्यक्ति मिलने के बाद कई सहस्त्राब्दियां बीत गईं। पृथक-पृथक घटनाओं के सह-अस्तित्व ( co-existence ) के अवबोध से प्रांरभ होकर, इन विचारों की व्याख्या तथा विकास विभिन्न संकल्पनाओं ( concepts ) की रचना तथा वस्तुओं व घटनाओं की सार्विक अंतर्निर्भरता ( universal interdependence ) के बारे में एक विचार तक पहुंचा। देमोक्रितस  ने अंतर्संबंध ( interrelation ) के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूप, कार्य-कारण संबंध के विचार का सैद्धांतिक दलीलों में उपयोग करके मानवजाति के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की। उन्होंने कहा कि हर चीज़ के पीछे उसका अपना कारण ( reason ) होता है, कि बिना कारण के कुछ नहीं हो सकता। देमोक्रितस के अनुसार कार्य-कारण संबंध एक प्राकृतिक आवश्यकता है, इसलिए कारणाभाव प्रदत्त घटना के असली कारणों के बारे में अज्ञान की आत्मगत ( subjective ) अभिव्यक्ति है।

प्राकृतिक घटनाओं की अंतर्निर्भरता के एकमात्र रूप की हैसियत से कार्य-कारण संबंध दर्शन और प्राकृतिक विज्ञान, दोनों में ही सुस्थापित हो गया है। निर्भरता के अन्य रूपों का, खासकर संयोग ( coincidence ), संभावना तथा प्रसंभावना ( possibility and probability ) का, मूल्यांकन मानसिक संवेदों ( mental senses ) के रूप में, आत्मगत धारणाओं ( notions ) के रूप में किया जाता था। मिसाल के लिए, फ्रांसिस बेकन  ने लिखा, “सच्चा ज्ञान वही है, जिसे कारणों से निगमित किया जाता है।”

THE METAPHYSICS OF CLOTH.WWAR१७वीं – १९वीं सदियों की यांत्रिक भौतिकी में कार्य-कारण संबंध की व्याख्या एक अपरिवर्तनीय ( irreversible ), प्रत्यक्ष तथा कठोर आवश्यकता के रूप में की गई थी। मिसाल के लिए, एक गेंद जिस रफ़्तार से बिलियर्ड की मेज़ पर चलती है, उसका निर्धारण गेंद पर पड़े आघात ( stroke ) तथा उसके द्रव्यमान ( mass ) से होता है। आघात के बल तथा गेंद के द्रव्यमान की गणना जितनी सूक्ष्मता से की जाएगी, उतनी ही सटीकता से गतिमान गेंद की रफ़्तार तथा प्रत्येक विशिष्ट क्षण पर उसकी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकेगा।

इस दृष्टिकोण से सारा वस्तुगत विश्व अंतर्संबंधों की एक श्रृंखला द्वारा मज़बूती से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। हम ब्रह्मांड के सारे पिंडों के द्रव्यमान तथा वेग का बिल्कुल सही मूल्य निर्धारित करके भविष्य के किसी भी क्षण में उनकी स्थिति का निर्धारण कर सकते हैं। इससे ऐसा भी प्रतीत होता है कि विश्व में सब कुछ पूर्वनिर्धारित ( predetermined, predestined ) है। लेकिन ऐसा प्रतीत होना ही नियतिवादी दृष्टिकोण ( determinist approach ) है, यानि भाग्य या प्रारब्ध ( destiny ) पर विश्वास है।

कार्य-कारण संबंध को सामान्य ( सार्विक ) कड़ी का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूप माननेवाली, संगत भौतिकवादी व्याख्या उसकी वस्तुगत प्रकृति ( objective nature ) को उद्‍घाटित कर देती है। भौतिकवादी द्वंद्ववादी दृष्टिकोण संपूर्ण विश्व को, गतिमान और बदलती हुई वस्तुओं को एक समग्र संबंध ( a composite bonding ) के रूप में देखता है। इस सार्विक विश्व संबंधों के ढांचे के बाहर न तो किसी अलग-थलग घटना को समझा जा सकता है, न प्रक्रिया को और न ही गति को। इसीलिए, द्वंद्ववाद प्रत्येक विषय या वस्तु की वैज्ञानिक और वस्तुगत जांच को, उसके अधिकाधिक नये पक्षों, रिश्तों और संपर्क-सूत्रों को प्रकाश में लाने की एक असीम प्रक्रिया के रूप में देखता है। आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान, ब्रह्मांड में होनेवाली घटनाओं के व्यापक परिसर – आकाशगंगाओं के उद्‍भव से लेकर प्राथमिक कणों में जारी सूक्ष्मतम प्रक्रियाओं तक – अंतर्संबंधों की नियमसंगतियों की एक ठोस अभिव्यक्ति देता है। हमें गति के सारे प्रकारों – यांत्रिक स्थान परिवर्तनों, विभिन्न भौतिक, रासायनिक व जैविक प्रक्रियाओं और सामाजिक परिघटनाओं ( phenomena ) – में सार्विक अंतर्संबंध दिखाई देता है।

बेशक, द्वंद्ववाद के इतिहास में ऐसे दृष्टिकोण भी सामने आए थे, जो गति में परिवर्तनों की भूमिका को अतिरंजित ( exaggerated ) करते और उसे निरपेक्ष बनाते थे। मसलन, प्राचीन यूनानी दार्शनिक और हेराक्लितस के शिष्य क्रातीलस  ने कहा कि एक ही नदी में दो बार प्रवेश करना असंभव है, क्योंकि जब हम उसमें प्रविष्ट होते हैं तो हम और नदी, दोनों ही बदल रहे होते हैं। इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि ज्ञान अलभ्य ( unachievable ) है, हम किसी भी वस्तु के बारे में कुछ नहीं कह सकते, क्योंकि हम जिसके बारे में कह रहे होंगे अब वह अस्तित्व में ही नहीं है, बदल गई है। इस दृष्टिकोण में जिसे कई बार सापेक्षवाद कहा जाता है, गत्यात्मकता, परिवर्तनीयता और गति की भूमिका को अतिरंजित कर दिया जाता है और यह माना जाता है कि यदि हर चीज़ गतिमान है, तो वस्तुओं के बारे में कोई भी निश्चयात्मक बात नहीं की जा सकती है। यह दृष्टिकोण द्वंद्ववाद को उसके प्रतिपक्ष – अधिभूतवाद – में परिवर्तित कर देता है, जिस पर हम आगे विचार करने जा रहे हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – २

( a brief history on the concept of dialectics – 2 )

Painting_31विश्व में हर चीज़ परिवर्तित, गतिमान और विकसित हो रही है, इस तथ्य को कई प्राचीन दार्शनिक पहले ही जान चुके थे। इस संदर्भ में यूनानी भौतिकवादी हेराक्लितस  ने, जिन्हें एक महान द्वंद्ववादी माना जाता है, अत्यंत स्पष्ट विचार प्रस्तुत किए। उनका कहना था कि विश्व एक असीम आदिकारण तथा चिरंतन अग्नि की वज़ह से लगातार परिवर्तन की स्थिति में है। प्रत्येक वस्तु गतिमान है, प्रकृति चिरंतन गति से भरी है। हेराक्लितस के द्वंद्ववाद में विश्व विरोधी तत्वों की अंतर्क्रिया के, उनकी एकता और संघर्ष के रूप में प्रकट होता है। सत्य का ज्ञान विरोधियों के पारस्परिक परिवर्तन की, उनके संघर्ष की समझ से उत्पन्न होता है। इस तरह हेराक्लितस का द्वंद्ववाद एक भिन्न आशय ग्रहण कर चुका था, जो कि विश्व की एक प्रकार की व्याख्या, उसकी गति का, क्रमविकास का अनुचिंतन है।

पूर्व के महान चिंतकों इब्न रूश्द  और इब्न सिना  ( अविसेना ) के दृष्टिकोण भी इसी प्रकार के थे। इब्न रुश्द यह मानते थे कि गति चिरंतन और अविनाशी है। उत्पत्ति, परिवर्तन तथा विनाश सभी भूतद्रव्य ( matter ) में संभावना के रूप में निहित हैं, क्योंकि विनाश पुनरुत्पत्ति की ही श्रेणी की एक क्रिया है। प्रत्येक गर्भस्थ सत्व में उसका अपना पतन एक संभावना के रूप में निहित होता है। अविसेना, जिन्हें उनके समकालीन ‘दर्शन का राजा’ कहते थे, भी यह समझते थे कि गति भूतद्रव्य में निहित एक क्षमता के रूप में होती है और रूपांतरण की उसकी योग्यता के समकक्ष होती है। प्राचीन चीनी दार्शनिक ज़ाङ्‍ त्ज़ाङ्‍  ने गति में उस भौतिक शक्ति त्सी को आरोपित किया, जो चक्रों में कंपित होती है और बारी-बारी से विखंडित होकर महाशून्य में लौटती है और फिर सांद्रित ( concentrate ) होकर सारे दृश्य जगत को साकार बनाती है।

भारत में सर्वाधिक प्राचीन भौतिकवादी दार्शनिक प्रवृत्ति लोकायत ( या चार्वाकों की विचार-पद्धति ) है, जिसकी स्थापना बृहस्पति  ने की माना जाता है। इसके अनुयायियों का विश्वास था कि विश्व भौतिक है और पांच प्राथमिक भूतों – अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश – से निर्मित है। सारे जीवित प्राणी भी इन्हीं भूतों से निर्मित होते हैं और मृत्यु पर इन्हीं में विखंडित हो जाते हैं। उन्होंने अनश्वर आत्मा, ईश्वर तथा परलोक की धार्मिक धारणाओं की आलोचना की और यह साबित करने का प्रयत्न किया कि शरीर की मृत्यु के बाद चेतना ( consciousness ) भी नष्ट हो जाती है। इसी वज़ह से उन्होंने पुनर्जन्म की मान्यता को भी ठुकरा दिया। चार्वाकों का भौतिकवाद उनके अनीश्वरवाद के साथ घनिष्ठता से जुडा हुआ था और उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुए यह स्थापित करने की कोशिश की भौतिक जगत किसी भी दैवी अनुकम्पा से स्वतंत्र ( independent ) है और अंतर्निहित ( inherent ) कार्य-कारणता के संबंधों के अनुसार विकसित होता है।

प्राचीन भारतीय उपनिषदों में भी कई जगह इस तरह के विचार व्यक्त किए गए है कि भौतिक प्रक्रियाएं परिवर्तनीय और अस्थिर हैं। कई अन्य विचार-पद्धतियों में भी भौतिकवादी ( materialistic ) रुझान अभिव्यक्त हुए हैं। कपिल  द्वारा संस्थापित सांख्य दार्शनिक मत में विश्व को भौतिक तत्वों की संख्या से स्पष्ट किया गया है। इसके प्रतिनिधि विश्व को एक सार्विक प्राथमिक पदार्थ ( प्रकृति ) से शनैः शनैः विकसित भौतिक जगत मानते थे। इस प्राचीन मत की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह स्थापना थी कि गति, देश और काल भूतद्रव्य के गुण हैं तथा उससे अविभाज्य हैं। बाद में प्रत्ययवाद ( idealism ) के विरुद्ध संघर्ष में यह पद्धति पीछे हट गई और समझौते के बतौर उसने भूतद्रव्य से पृथक आत्मा ( पुरुष ) के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया।

न्याय और वैशेषिक  दर्शन की विचार-पद्धति ने इन प्रत्ययों का विकास किया कि विश्व जल, वायु, अग्नि और पृथ्वी के आकाश, देश तथा काल में विद्यमान गुणात्मकतः विविध कणों ( अणुओं ) से बना है। उनके लिए ‘अणु’ शाश्वत, अनादि और अविनाशी थे, जबकि उनसे निर्मित वस्तुएं परिवर्तनशील, अस्थिर थीं। मीमांसा संप्रदाय के कुमारिल  तथा प्रभाकर  ने इस मत की स्थापना की कि इस विश्व में ‘उत्पत्ति तथा विनाश की प्रक्रियाएं सतत ( continuous ) चलती रहती हैं। भारतीय दर्शन के अंतर्गत बौद्ध दर्शन में द्वंद्वात्मक चिंतन के प्रथम बीज पाए जाते हैं। ‘प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत’, अर्थात यह सिद्धांत कि प्रत्येक वस्तु अपनी उत्पत्ति के लिए किसी दूसरी वस्तु पर निर्भर है, तथा ‘अनित्यतावाद तथा अनात्मवाद’, अर्थात यह सिद्धांत कि प्रत्येक वस्तु अनित्य है तथा यह सिद्धांत कि स्थायी आत्मा जैसी कोई वस्तु नहीं, में यह देखा जा सकता है।

इस तरह हम देखते हैं कि यूनान, मध्यपूर्व, भारत और चीन के कई प्राचीन दार्शनिकों ने गति के असीम परिवर्तन तथा विश्व के क्रमविकास को मान्यता दी थी।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है। शुक्रिया।

समय

द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां विषय-प्रवेश हेतु एक संक्षिप्त भूमिका प्रस्तुत की गई थी, इस बार हम ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास – १
( a brief history on the concept of dialectics – 1 )

Our-changing-world1हमारे आस-पास विद्यमान विश्व अविराम बदल रहा है, गतिमान और विकसित हो रहा है। यह बात हमारे दैनिक जीवन से, विज्ञान के जरिए, मानवीय क्रियाकलापों और राजनीतिक संघर्षों से प्रदर्शित होती है। इनमें से कुछ परिवर्तनों की तरफ़ हमारा ध्यान नहीं जाता, जबकि कुछ अन्य जनता के लिए, राज्यों, मनुष्यजाति तथा समग्र प्रकृति के लिए बहुत महत्त्व के होते हैं। असीम ब्रह्मांड अनवरत गतिमान है, ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं, तारे जन्मते हैं और बुझ जाते हैं। हमारा भूमंडल – यह पृथ्वी – भी परिवर्तित हो रहा है : द्वीपों और पर्वतों का उद्‍भव होता है, ज्वालामुखी फटते हैं, भूकंप आते हैं, सागर के तटों और नदियों के किनारों की रूपरेखाएं बदलती हैं और जीव-जंतु व वनस्पतियां भी रूपांतरित हो रही हैं। अपने क्रम-विकास ( evolution ) की लंबी राह में मनुष्य और समाज में, आदिम समूहों ( primitive groups ) से लेकर वर्तमान राजनीतिक व्यवस्थाओं तक, उल्लेखनीय परिवर्तन हो गए हैं।  दुनिया के नक़्शे में भी परिवर्तन हो रहे हैं : जिन देशों पर पहले स्पेनी, फ़्रांसीसी, ब्रिटिश और पुर्तगाली उपनिवेशवादियों का शासन था, वे स्वतंत्र हो कर स्वाधीन राज्य बन गए हैं।

इस दुनिया में जीवित बचे रहने, उसके अनुकूल बन सकने और अपने लक्ष्यों तथा आवश्यकताओं के अनुरूप इसे बदलनें के लिए मनुष्य को इसकी विविधता का अर्थ जानना और समझाना होता है। ऐसी समस्याओं पर प्राचीन काल के लोग भी दिलचस्पी रखते थे, जैसे विश्व क्या है और इसमें किस प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं? क्या विभिन्न वस्तुओं के बीच कोई संयोजन सूत्र है? विश्व गतिमान क्यों हैं और गति का मूल क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए, कई सभ्यताओं के पुरोहितों ने ग्रहों की गति के प्रेक्षण तथा सौर व चंद्र ग्रहणों का वर्णन करने के लिए अनेक वर्ष बिताए। लोग प्रेक्षण और वर्णन ( observation and description ) से चलकर विश्व के गहनतर ज्ञान ( deep knowledge ) की ओर बढ़े – उन्होंने उसका स्पष्टीकरण ( clarification ) देने का प्रयत्न किया। प्राचीन चिंतकों ने महसूस किया कि विश्व में होनेवाली गति की भूमिका को ध्यान में लाए बिना उसे समझना असंभव है। फलतः इस प्रश्न कि ‘क्या गति का अस्तित्व ( existence ) है?’ में एक प्रश्न और आ जुड़ा कि ‘इस गति का कारण ( reason ) क्या है?’ और यह एक और अधिक तथा अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न पेश करने के समकक्ष था। जैसा कि दर्शन में बहुधा होता है, उसकी अनुक्रिया में विभिन्न मत तथा उत्तर सामने आए। इसके फलस्वरूप विश्व को समझने के उपागम की दो विरोधी विधियां बन गईं – द्वंद्ववाद और अधिभूतवाद।

द्वंद्ववाद क्या है

शुरू-शुरू में ‘द्वंदवाद’ ( dialectics ) का तात्पर्य विभिन्न मतों के टकराव के द्वारा सत्य तक पहुंचने के लक्ष्य से वार्तालाप करने की कला से होता था। अफ़लातून  ने द्वंदवादी का वर्णन एक ऐसे व्यक्ति के रूप में किया है, जो प्रश्न पूछना और उत्तर देना जानता है, जो किसी वस्तु या घटना के बारे में हर संभव आपत्तियां उठाने के बाद ही उस वस्तु या घटना की परिभाषा सुझाता है। ऐसे एक महान द्वंदवादी सुकरात  थे, जिन्होंने ऐसी ही जांच-पड़ताल संबंधी वार्तालापों के द्वारा सत्य की खोज में अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया था। ऐसे वार्तालापों के दौरान सुकरात प्रश्न पूछते, उत्तरों का खंड़न करते और अपने विरोधियों के दृष्टिकोणों में अंतर्विरोधों ( contradictions ) का उद्‍घाटन करते थे। वार्तालाप करने, विरोधी मतों की तुलना करके सत्य का पता लगाने, विश्लेषण करने और उनका खंड़न करने की यह विधि द्वंदवाद कहलाती थी। कालांतर में यह कुछ भिन्न अर्थ का द्योतक बन गया।

शुरू में ‘सोफ़िस्ट’ ( वितंडावादी ) का अर्थ ‘प्रज्ञा-वान’ या ‘उस्ताद’ था। जो प्रज्ञानी और वाक्कुशल प्रशिक्षक मामूली वेतन पर विवाद की कला सिखाते थे, उन्हें सोफ़िस्ट कहा जाता था। ये लोग, जो दुनिया के पहले वेतनभोगी अध्यापक थे, अपने शिष्यों को ‘सोचना, बोलना और कर्म करना’ सिखाते थे। किंतु उनका मुख्य उद्देश्य वार्तालाप के समय दूसरे पक्ष पर किसी भी तरीक़े से हावी होना होता था, जिसमें हर प्रकार के छल और धोखाधड़ी भी अनुज्ञेय ( permissible ) थी। वितंडावादियों का विश्वास था कि एक निश्चित लक्ष्य को पाने के लिए कोई भी साधन इस्तेमाल किया जा सकता है। एक वितंडावादी जीतना चाहता है, किसी भी क़ीमत पर अपने को सही सिद्ध करना चाहता है। इस तरह के कई दार्शनिकों ने अनेकों कूटतर्क सोच निकाले थे, जिनके जरिए वे अजीबोगरीब युक्तियां और निष्कर्ष पेश किया करते थे। वितंडावादी के कूटतर्क वास्तविकता ( reality ) को विरूपित ( deform ) करते हैं, यह द्वंदवाद का विरोधी होता है, हालांकि यह बाहरी तौर पर उसका एक रूप ग्रहण करने का प्रयत्न करता है।

एक वितंडावादी से भिन्न द्वंद्ववादी के वार्तालाप का लक्ष्य, तर्कणा की दार्शनिक कला की सहायता से सत्य तक पहुंचना होता है। बताया जाता है कि प्रसिद्ध द्वंद्वात्मक चिंतक सुकरात  ने कहा था : “मैं केवल यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता किंतु मैं ज्ञानोपार्जन का प्रयास कर रहा हूं।”


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

द्वंद्ववाद

हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां द्वंद्ववाद पर एक श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश हेतु एक संक्षिप्त भूमिका प्रस्तुत की जा रही है, अगली बार ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा शुरू करेंगे और इस तरह से श्रृंखला चल निकलेगी।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद – भूमिका
( Dialectics – a preface )

dialectic_giottoमानवजाति के सर्वोत्तम चिंतक ब्रह्मांड़ को समझने, प्राकृतिक व सामाजिक प्रक्रियाओं तथा घटनाओं के नियामकों का पता लगाने के लिए शताब्दियों से प्रयत्न करते रहे। विश्व की वैज्ञानिक समझ तक पहुंचने का रास्ता लंबा और टेढ़ा-मेढ़ा था। अज्ञान के ख़िलाफ़, संज्ञान-विरोध के ख़िलाफ़, युगों-पुराने धार्मिक मतों तथा प्रत्ययवादी ( भाववादी idealistic ) दृष्टिकोणों के ख़िलाफ़ कटु संघर्ष करते हुए, मानवजाति वास्तविक ज्ञान के कणों को चुनते हुए, अपने परिवेशी विश्व, यानि प्रकृति, समाज तथा संज्ञान ( cognition ) के सच्चे वैज्ञानिक स्पष्टीकरण के निकटतर पहुंचती गई, मनुष्य के आंतरिक सार और विश्व में उसकी स्थिति की यथार्थ ( real ) और वस्तुगत ( objective ) समझ के निकटतर पहुंचती गई। आज मानवजाति के पास, संज्ञान के एक शक्तिशाली साधन के रूप में द्वंदात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद ( dialectical and historical materialism ) का दर्शन है। यह सिर्फ़ विश्व को समझने की एक कुंजी के रूप में ही नहीं, विश्व के और विशेषतः समाज के रूपांतरण की, बदलने की एक पद्धति के रूप में भी मानवजाति के हाथ में एक महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक उपकरण है।

दर्शन और उसके बुनियादी प्रश्नों पर हम यहां पहले ही विचार कर चुके हैं। भूतद्रव्य ( matter सरलतः पदार्थ ) और चेतना ( consciousness ) के बीच, भौतिक और प्रत्ययिक ( सरलतः वैचारिक ) के बीच के अंतर्संबंधों के सार का प्रश्न, दर्शन का बुनियादी प्रश्न है। इसके दो पक्ष या पहलू हैं, पहला विश्व के स्वरूप, उसके सारतत्व के बारे में है कि प्राथमिक क्या है – भूतद्रव्य या चेतना, कि क्या भूतद्रव्य चेतना को जन्म देता है अथवा चेतना भूतद्रव्य को। दूसरा, इस बारे में प्रश्न है कि यह विश्व संज्ञेय ( cognizable ) है या नहीं, यानि मानव मस्तिष्क अपने आस-पास के जगत को समझ सकता तथा उसके विकास के नियमों को जान सकता है अथवा नहीं। हम यहीं पर अपने पूर्व की ‘दर्शन’ वाली श्रृंखला में, इन प्रश्नों पर विस्तार से विवेचना कर चुके हैं। इन प्रश्नों के अपने उत्तरों के हिसाब से ही दर्शन की दुनिया दो खेमों में बंटी है, प्रत्ययवादी ( भाववादी, अध्यात्मवादी idealistic ) तथा भौतिकवादी ( materialistic )। भौतिकवाद प्रकृति का, आस-पास के जगत का सही और वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देता है, लेकिन प्रत्ययवाद मिथ्या और अवैज्ञानिक।

प्रत्ययवादी दार्शनिक चेतना को प्राथमिक मानते हैं, उनके विचारों के अनुसार चेतना भूतद्रव्य से स्वाधीनतः अलग अस्तित्वमान है और वही भौतिक जगत की ‘रचना करती है’ तथा उस पर नियंत्रण रखती है, साथ ही इसकी मुख्य धाराओं के अनुसार विश्व मूलतः संज्ञेय नहीं है, या सीमित रूप से संज्ञेय है, यानि कि विश्व और इसके विकास के नियमों को जाना-समझा नहीं जा सकता, अतएव इसके बजाए वे स्वयं अपने विचारों व अनुभूतियों के तथा किसी अस्तित्वहीन अलौकिक ‘विश्वात्मा या परमात्मा’ के, किसी रहस्यमय ‘परम प्रत्यय’ आदि के संज्ञान की ओर उन्मुख होने की ओर जोर देते हैं।

भौतिकवादियों के अनुसार भूतद्रव्य शाश्वत और प्राथमिक है, चेतना इसी के ऐतिहासिक विकास का उत्पाद है, यह मनुष्य के उद्‍भव के साथ प्रकट और विकसित होती है। भूतद्रव्य चेतना से स्वतंत्र रूप से विद्यमान है, वहीं चेतना भूतद्रव्य से विलग कहीं विद्यमान नहीं हो सकती, वह भूतद्रव्य पर निर्भर है। भौतिकवाद के अनुसार विश्व संज्ञेय है, मानव मस्तिष्क परिवेशी जगत की वस्तुओं, प्रक्रियाओं तथा घटनाओं के मूलतत्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है, समझ सकता है, नियमों का संज्ञान हासिल करके इसका रूपांतरण कर सकता है, इसे बदल सकता है। विश्व के व्यावहारिक रूपांतरण में मानवजाति की उपलब्धियां सर्वोत्तम ढंग से यह दर्शाती हैं कि वह विश्व का सही ज्ञान हासिल कर रहा है और उस ज्ञान का उपयोग कर रहा है।

3 brillanti 2pasupati_15440दर्शन के मूल प्रश्न के साथ ही दार्शनिकों, वैज्ञानिकों ने एक और प्रश्न का भी उत्तर देने की हमेशा कोशिश की है। यह प्रश्न है कि विश्व को क्या हो रहा है? क्या यह सर्वदा ऐसा ही रहा है, जैसा कि आज है, या किसी प्रकार से यह प्रकट होता, बदलता, पुनर्नवीकृत तथा विकसित होता रहता है? इतिहास में इस प्रश्न के जितने भी उत्तर दिए गए हैं, वे दो विरोधी समूहों में शामिल हैं : द्वंद्वात्मक ( dialectic ) और अधिभूतवादी ( metaphysical ), इनकी दो तदनुरूप पद्धतियां द्वंद्ववाद ( dialectics ) तथा अधिभूतवाद ( metaphysics ) कहलाती हैं।

अधिभूतवाद की वकालत करनेवाले मानते हैं कि प्रथमतः, विश्व मूलतः अपरिवर्तनीय है, कि प्रकृति कभी बदलती नहीं ; और, द्वितीयतः, वस्तुओं तथा घटनाओं का एक दूसरे से संबंध नहीं होता, कि उनका अलग-अलग अस्तित्व है। वे परिवर्तन और विकास को महज़ उसकी घटती-बढ़ती मानते हैं, जो पहले से विद्यमान है। उनके लिए विकास का उद्‍गम या तो विभिन्न वस्तुओं के बाहरी टकराव में निहित है, या अलौकिक, दैवीय शक्तियों में।

विश्व के स्पष्टीकरण में द्वंद्ववाद के पक्षधर यह मानकर चलते हैं कि, पहला, सारी वस्तुएं, प्रक्रियाएं तथा घटनाएं एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं, कि वे परस्पर क्रिया करती हैं तथा एक दूसरे को दशानुकूलित करती हैं और दूसरा, कि वे अविरल गतिमान व विकासमान हैं। वे विकास को मात्रात्मक ( quantitative ) परिवर्तनों के संचयन तथा गुणात्मक ( qualitative ) परिवर्तनों में उनके रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में, कुछ वस्तुओं तथा घटनाओं के अन्य में रूपातंरण की शक्ल में देखते हैं, पुरातन व मरणासन्न के विनाश तथा नूतन के उद्‍भव व दृढ़ीकरण के रूप में देखते हैं। द्वंद्ववादियों के अनुसार विकास का स्रोत आंतरिक अंतर्विरोध ( contradictions ) हैं, प्रत्येक विषय तथा घटना में अंतर्निहित ( inherent ) विरोधी पक्षों या प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष है। द्वंद्ववाद यह कहता है कि प्रकृति और समाज के विकास का कारण या स्रोत बाहर से लाया नहीं जाता, बल्कि उन्हीं के अंदर निहित होता है।

द्वंद्ववाद विश्व को ठीक वैसा ही देखता है, जैसा कि वह वस्तुतः ( literally ) है। विकास की प्रक्रियाओं, उनके कारणों और रूपों का स्पष्टीकरण देते तथा नूतन की अवश्यंभावी विजय को दर्शाते हुए द्वंद्ववाद समाज के अंदर प्रगतिशील विकास ( progressive development ) के लिए निरंतर चलने वाले संघर्ष में प्रगतिशील शक्तियों की सेवा करता है। इसके विपरीत अधिभूतवाद विकास की प्रगतिशील प्रकृति और नूतन की अवश्यंभावी विजय को मान्यता नहीं देता और इस प्रकार प्रगति के ख़िलाफ़ संघर्ष में रूढ़िवादी तथा प्रतिगामी ( orthodox and regressive ) शक्तियों का हितसाधन करता है।

दैनिक जीवन, विज्ञान, तथा सामाजिक व्यवहार द्वंद्ववाद की सचाई की तथा उसे संज्ञान की वैज्ञानिक पद्धति व व्यवहार के रूप में इस्तेमाल करने की आवश्यकता की पुष्टि करते हैं। द्वंद्ववाद की जीवंतता आज के सामाजिक विकास के द्वारा सर्वोत्तम ढंग से प्रदर्शित होती है। राष्ट्रीय स्वाधीनताओं की प्राप्ति, राष्ट्रीय विकास के नियत कार्यों की पूर्ति, भौतिक व आत्मिक जीवन में गहन परिवर्तन, अनेक जनगणों का युगों पुराने पिछड़ेपन से निकलकर स्वाधीन तथा प्रगतिशील विकास के आधुनिक रूपों की ओर क़दम बढ़ाना – ये सभी इसके सुस्पष्ट उदाहरण हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय