उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत करने की योजना है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है

मुझे कुछ रुखापन नहीं लगा।…..क्योंकि लेखों से दिखता है कि…..समीक्षक हैं और समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे…..एक बात चलते-चलते कि लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे? चापलूसी से, नहीं, ठीक नहीं है। यह तो राजनीति के नेताओं की तरकीब है। लोग स्वीकारते नहीं हैं क्योंकि सब का अहं प्रबल हो जाता है।

आपके नाम, पारिवारिक पृष्ठभूमि और उन मानवश्रेष्ठ के जरिए आपसे किये गए संवाद पर आपकी तात्कालिक प्रतिक्रिया जानने को मिली। आपका नाम जानने के बाद यह संभव हो गया कि अंतर्जाल के जरिए आपकी और भी कार्यवाहियों से परिचित हुआ जा सके। उनसे भी थोड़ा बहुत गुजरना हुआ। आपने कह ही दिया है इसलिए निश्चिंत रहा जा सकता है कि आप रूखेपन और प्रत्यक्षता को समझ सकते हैं, और इसे हमारी बेरूखी और ह्रदयहीनता नहीं समझेंगे। कि आप चीज़ों को समझने की प्रक्रियाओं में हैं। अतएव आपसे कुछ कठोर भी कहा जा सकता है, आप उसे अन्यथा नहीं लेंगे।

कुछ मनुष्य तुरंत प्रतिक्रियात्मक होते हैं, उतावले से। उनका दिमाग़ ऐसे अनुकूलन का अभ्यस्त होता है, जो तुरंत जवाबी प्रतिक्रिया देता है, और उसे अपनी तात्कालिकता के साथ तुरंत व्यक्त कर देता है। यह कोई ग़लत बात नहीं है, पर इससे यह परिलक्षित होता है कि उसमें धेर्य की कमी है, उसमें अच्छे श्रोता या पाठक होने की प्रवृत्ति नहीं है। वे चीज़ों के साथ अंतर्क्रिया करके उन्हें आत्मसात्कृत करने की बज़ाए उनसे सीधी लड़ाई छेड़ने को, सचेत और सतर्क हो उठते हैं।

ये ज्ञान को, चीज़ों को समझने की प्रक्रिया और पद्धति के लिए ज़्यादा अच्छे लक्षण नहीं हैं। तात्कालिक तुरंत प्रतिक्रियात्मकता, अंतर्विरोधों के साथ, उनसे सकारात्मक द्वंद और संघर्ष करके अपने को विकसित करने का ज़रिया बनाने की जगह, नकारात्मक प्रतिरोध यानि कि विरोधी से, मान्यताओं के विपरीत से जाते लगते विचारों के साथ एक सुरक्षात्मक, सतर्क व्यवहार के लिए प्रेरित करती है। और मनुष्य इस प्रक्रिया में उलझता जाता है, अपने को और रूढ़ बनाता जाता है।

हालांकि आप इसकी इन शुरुआती प्रवृत्तियों से आगे निकल चुके हैं, और बातों को समझने और सही से लगते को स्वीकारने की दिशा में काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं, पर इसे और विकसित करने की आवश्यकता है।

आपको आपकी कई उलझनों और बातों पर हम विस्तार से, हालांकि क्लिष्ट सांद्रता और कई गंभीर इशारों के साथ लिख ही चुके हैं। आपको भी उनसे उसी गंभीरता के साथ गुजरना चाहिए, गुजरते रहना चाहिए। कई सूत्र वाक्य वहां कहे गये ही थे। धेर्य के साथ समझने की कोशिश की जानी चाहिए, अपने यथार्थ को समझते और उसके साथ गुनते हुए। किन्हीं बातों पर यदि आवश्यकता महसूस करते हैं तो और भी खुलकर संवाद किया जा सकता है

थोड़ा सा प्रतिवाद, आपकी वाज़िब बात को ही आगे बढ़ाते हुए :

‘समीक्षक को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि समीक्षित किताब या आदमी क्या प्रतिक्रिया देंगे’

उद्देश्य, लक्ष्य सर्वोपरि होता है, किसी भी क्रिया के लिए। यानि प्रदत्त क्षण में, या तात्कालिक संदर्भों में, आपके लक्ष्य क्या हैं, एकाधिक लक्ष्य होने की अवस्थाओं में प्राथमिकता पर क्या है, यह हमारी कार्यवाहियों को तय करते हैं, या यह कहें कि करने चाहिएं। समीक्षा में या आलोचना में भी ऐसा ही होना चाहिए।

जब यह लक्ष्य प्राथमिकता पर है कि सार्वजनिक रूप से विचार का खंड़न या मंड़न, दत्त परिस्थितियों में ज़्यादा आवश्यक हो गया है तो आपका कहा शत-प्रतिशत सही है। अब संभावित प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखना आवश्यक नहीं है।

पर यदि लक्ष्य आलोचना के साथ-साथ, समीक्षित विचार या उससे संबंधित व्यक्ति में, नकारात्मकता को उभारे बिना, उसे अपनी प्रस्तुति पर पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत करवाना हो, यानि उसके विकास की संभावनाओं को ज़िंदा रखना हो, तो स्वाभाविकतः समीक्षा को, उसकी भाषा को, आवश्यक रूप से संयत और संवाद के लिए प्रेरित करने वाली होना चाहिए।

और यदि लक्ष्य वैयक्तिक रूप से उसकी व्यक्तिगत चेतना में, समझ में सचमुच ही सकारात्मक हस्तक्षेप करना हो तो फिर हमारी क्रियाविधियां, भाषा, संवाद का स्तर, उसके ज्ञान और समझ के स्तर के अनुरूप ही रखना होगा, वरना बीच का अंतराल हमारे लक्ष्य को असंभव बना देगा। एक बार संवाद सेतु खत्म, तो हस्तक्षेप की सभी संभावनाएं ख़त्म।

और यह भी होता है कि, हमारा लक्ष्य इनमें से कु्छ भी ना हो, हम सिर्फ़ अपने को केन्द्र में रखकर, अपने हितों और संभावनाओं के पल्लवन के लाभार्थ यह कार्य कर रहे हों, अपने आपको स्थापित करने का लक्ष्य ही सिर्फ़ हमारे दिमाग़ में हो, तो फिर हम किसी भी तरह से, तर्क-कुतर्क करने को स्वतंत्र होते हैं। आप देख ही रहे होंगे, आजकल यही ज़्यादा हो रहा है।

आपकी एक और बात ‘लोगों के दिमाग तक अपनी बात और उनको साथ में लेना सीखना होगा, लेकिन कैसे?’ पर भी उपरोक्त में ही कुछ इशारे हो गये हैं।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

आख़िर दर्शन क्या है? क्यों है?

हे मानवश्रेष्ठों,
समय ने पिछली बार चाहा था कि मानव-मन या चेतना की उत्पत्ति और विकास की प्रक्रिया को यहां थोड़ा सार रूप में प्रस्तुत किया जाए।
परंतु अब बात चल निकली है, और जाहिर है कुछ संदर्भों, दृष्टिकोणों और शब्दावली का व्यापक प्रयोग किया जाएगा, तो यह ज़्यादा बेहतर रहेगा कि बात उन्हीं से शुरू की जाए।

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चूंकि इस हेतु समय को आपके साथ दर्शन के क्षेत्र की यात्रा करनी है, अतएव यह समुचित रहेगा की दर्शन की चर्चा ही यहां सबसे पहले की जाए। तो चलिए दर्शनशास्त्र से शुरूआत करते हैं।
समय मानवजाति के अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ यहां समेकित कर रहा है।
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मनुष्य के सामने सदा से ही ये प्रश्न उपस्थित रहे हैं कि विश्व में उसका स्थान क्या है, मानव जीवन का लक्ष्य, उद्देश्य और मूल्य क्या हैं? यह दुनिया आगे कैसी होगी? क्या इस संसार से उत्पीड़न और अन्याय कभी गायब हो पाएंगे? मनुष्य की नियति में क्या बदा है, युद्धों का महाविनाश या शांतिपूर्ण जीवन? मनुष्य के वर्तमान नाभिकीय युग में ये प्रश्न, मुख्यतः मानवजाति की संभावनाओं का प्रश्न और भी तीव्रता से सामने आता है। आख़िर मनुष्य अपने समय की समस्याओं और अंतर्विरोधों से कैसे निबटें? विज्ञान और तकनीकि की उपलब्धियों को मनुष्य की बेहतरी के लिए कैसे इस्तेमाल करें? और यह मनुष्य की बेहतरी ही खु़द अपने आप में क्या है?

कोई भी सचेत सक्रिय व्यक्ति ऐसे प्रश्नों का उत्तर खोजने की कोशिश किए बिना नहीं रह सकता है। किंतु विज्ञान और तकनीक स्वयं इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते हैं, और मुख्य बात इन प्रश्नों के हर समय के लिए मान्य उत्तर खोजना और उन्हें मात्र कंठस्थ कर लेना नहीं है। इस बात में पारंगत होना कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि तेज़ी से बदलती हुई इस दुनिया में ऐसे उत्तर कैसे खोजे जाते हैं, कौनसे दृष्टिकोण और पद्धतियां इसके लिए ज़्यादा उपयुक्त रहती हैं, इन उत्तरों की सचाई को कैसे परखा जाता है और फिर उनके अनुरूप कर्म कैसे किए जाते हैं।

इसके लिए दर्शन का ज्ञान आवश्यक है।
यह ज्ञान एक विशेष शास्त्र से प्राप्त होता है, जिसे दर्शनशास्त्र कहा जाता है।
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दर्शन का उद्‍भव प्राचीन यूनान में हुआ। पाईथागौरस ने सर्वप्रथम philosophy पद का उपयोग किया था। ‍इस तरह पाश्चात्य भाषाओं में दर्शन का पर्याय ‘फ़िलॉसॉफ़ी’, दो यूनानी शब्दों- प्रेम और बुद्धिमता से मिलकर बना है, यानि इसका अर्थ है बुद्धिमता के प्रति प्रेम।

मनुष्य के आसपास की दुनिया असीम है और वह इसकी पहेलियों को हल करने का प्रयत्न धीरे-धीरे और क़दम दर क़दम चलकर ही कर सकता है। दर्शन में इस असीम का, हर विद्यमान वस्तु के स्रोतों तथा कारणों का संज्ञान प्राप्त करने के लिए अनवरत खोज में जुटने और और हर उपलब्धि पर संदेह करने के प्रयास मूर्त होते हैं। प्राचीन यूनान के महान दार्शनिक अफ़लातून ने कहा था कि दर्शन का स्रोत आश्चर्य और अचंभे में है।

प्राचीन काल में दर्शन तथा इसके उद्देश्यों के बारे में कई विविधतापूर्ण विचारों का आविर्भाव हुआ। महान यूनानी चिंतक अरस्तु का मत था कि सारे विज्ञान एक विशिष्ट लक्ष्य का अनुसरण करते हैं, केवल दर्शन ही सब विज्ञानों में स्वतंत्र है क्योंकि यह स्वयं अपने ख़ातिर अस्तित्वमान है, वहीं एक और सुप्रसिद्ध चिंतक सिसेरो ने इसकी सर्वथा उल्टी बात का दावा किया और कहा कि दर्शन जीवन का ऐसा ध्रुवतारा है जिसके बिना न तो मनुष्य का अस्तित्व हो सकता है, न स्वयं मानव जीवन का।

कुछ लोगों का विश्वास था कि दर्शन को धर्म से पृथक नहीं किया जा सकता, कि यह धार्मिक मताग्रहों की बेहतर समझ में सहायक है। जबकि कुछ अन्य की राय थी कि यह संदेहों और तर्कबुद्धि पर आधारित है, अतः धर्म से मेल नहीं खाता क्योंकि धर्म आस्था पर आधारित होता है। दर्शन के सार तथा उद्देश्य के बारे में इस तरह से ही, आधुनिक चिंतकों तक के भी कई मत-मतांतर प्रचलित हैं, जिन पर यदि मौका मिला तो समय फिर कभी दर्शन के इतिहास की चर्चा के अंतर्गत बात करना चाहेगा।

फिलहाल दर्शन की अद्यतन समझ को जिस तरह से सामान्यीकृत कर दिया गया है उसे देखिए।
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यह विश्व प्रकृति और समाज से बना है। ज्ञान की अन्य प्रणालियां, मसलन, दैनिक अनुभव पर आधारित साधारण ज्ञान, राजनैतिक, वैज्ञानिक, तकनीकि ज्ञान, आदि वास्तविकता के अलग-अलग पहलुओ को परावर्तित करती हैं और दैनिक जीवन, उद्योग तथा राजनैतिक संघर्ष में, प्रकृति के संज्ञान के दौरान और अन्य मामलों में उनकी जरूरत पड़ती हैं। साथ ही मनुष्यजाति के इतिहास के प्रत्येक युग, प्रत्येक अवधि ने ऐसे कार्य और सवाल पेश किये हैं जो जीवन की सर्वाधिक बुनियादी समस्याओं को छूते हैं और जिनके समाधान पर संपूर्ण मानवजाति की और प्रत्येक व्यक्ति की नियति निर्भर है।

जनसाधारण के बुनियादी हितों को परावर्तित करने बाली इन समस्याओं को समझना, उनसे अवगत होना और उन्हें सटीकतः निरूपित करना अत्यंत कठिन है, और इससे भी अधिक कठिन है उनको हल करने के तरीक़ों और साधनों का पता लगाना। ऐसा करने के लिए विभिन्न विज्ञानों की उपलब्धियों के अत्यंत गहन ज्ञान, मनुष्यों के बुनियादी हितों को समझने और युगों के विभेदक लक्षणों तथा विशेषताओं को सही ढंग से निरूपित करने की योग्यता की जरूरत होती है।

जाहिर है कि इसके वास्ते ज्ञान की एक विशेष प्रणाली की, एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है, जो वास्तविकता को उसके अलग-अलग पहलुओं और समस्याओं के बजाय एक साकल्य के रूप में देखने में सक्षम हो और जिसके केन्द्र में अपनी सारी आकांक्षाओं, प्रयासों, आशाओं, संदेहों तथा सवालों, अपने सारे अंतर्विरोधों, खोजों और भ्रमों सहित मनुष्य खडा़ हो।

फलतः दर्शन “अपने काल के बौद्धिक सारतत्व” के और “समसामयिक विश्व के दर्शन” की हैसियत से विश्व में मनुष्य के स्थान तथा अपने परिवेशीय जगत के प्रति उसके रुख़ के ज्ञान की एक विशेष प्रणाली है। वह मनुष्य के क्रियाकलाप के आधारों तथा उनकी नियमसंगतियों को जानने के प्रयत्न करता है।

जर्मनी के महान आधुनिक वैज्ञानिक दार्शनिक और चिंतक कार्ल मार्क्स ने दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा था:
चूंकि प्रत्येक सच्चा दर्शन अपने काल का बौद्धिक सारतत्व होता है, इसलिए वह समय अवश्यंभावि रूप से आता है जब दर्शन ना केवल आंतरिक दृष्टि से, ना केवल अपनी अंतर्वस्तु द्वारा, बल्कि अपने रूप के जरिए, बाह्य दृष्टी से भी अपने काल के वास्तविक जगत के संपर्क में आता है तथा उससे अंतर्क्रिया करता है। और तब दर्शन अन्य विशेष प्रणालियों के संदर्भ में सिर्फ़ एक विशेष प्रणाली भर नहीं रह जाता, बल्कि वह विश्व के संदर्भ में सामान्य दर्शन बन जाता है, समसामयिक विश्व का दर्शन बन जाता है।
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आज इतना ही।
अगली बार चेतना के संदर्भ मे जारी इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।
इस श्रृंखला के बाद समय भारतीय दर्शन पर भी चर्चा करने की योजना रखता है।
आप यहां से गुजरते रहें।

आलोचनात्मक और जिज्ञासात्मक संवादों का स्वागत है।

समय

अपने समय के साथ होना

हे मानव श्रेष्ठों,
पिछली बार हमनें बात की थी ज्ञान और समझ को निर्धारित करने वाले कारकों के बारे में।
चलिये क्रमिक विकास के दोहराव वाली बात का सिरा फिर से पकड़ते हैं…..

मनुष्य जिस तरह शारीरिक और मानसिक रूप से अपने इतिहास को दोहराता है, उसी तरह जिज्ञासाओं और समझ के स्तर के परिष्करण की प्रक्रियाओं में, मानव जाति के ज्ञान के क्रमिक विकास को दोहराता है। मनुष्य का हर बच्चा प्रकॄति की हर शै, हर चीज़ को वैसे ही देखता और चमत्कृत होता है जैसे कि आदिम मनुष्य होता था, हर चीज़ और उसके साथ अंतर्क्रिया उसके अंदर वैसे ही जिज्ञासा पैदा करती है जैसे कि मानव जाति को पहले करती रही है। वह अपने परिवेश की हर चीज़ के प्रति वैसे ही जिज्ञासापूर्ण प्रतिक्रिया करता है, जैसे उसके पूर्वज करते रहे थे। वह अपनी तात्कालिक समझ के हिसाब से हर चीज़ को अपने दिमाग़ में प्रतिबिंबित करता है, उसका विश्लेषण करता है। वह वैसे ही उंगलियों के सहारे गिनना सीखता है, ऊलजलूल आवाज़ों से शुरू होकर धीरे-धीरे भाषा सीखता है, लिखने का अभ्यास तो जैसे उसकी जान ही ले लेता है, वह वैसी ही आड़ी-टेड़ी आकृतियों से अपने कागज़ भरता है जैसे कि उसके आदिम पूर्वज चट्टानो पर उकेरा करते थे। वह प्रकृति की शक्तियों और नियमों को जानने और उनके सापेक्ष अपने अस्तित्व को समझने के शाश्वत कार्य में जुटा रहता है। अपने पूर्वजों की तरह ही, उसकी अविकसित समझ भी इस तथ्य को मानने में उतना ही विद्रोह करती है कि पृथ्वी सूर्य के चारों और परिक्रमण करती है, क्योंकि यहां उसकी सहज बुद्धि आडे आती है जिसका प्रेक्षण होता है कि वह तो स्थिर है और सूर्य आसमान में पूर्व से पश्चिम की यात्रा कर रहा है। आप कई ऐसे व्यक्तियों को जानते होंगे जो अपनी सारी उम्र गुजार देते हैं पर चंद्रमा की कलाओं का रहस्य उन्हें समझ नहीं आता।
अब तक की संपूर्ण विवेचना से अब हम दो सामान्य निष्कर्ष निकाल सकते हैं, पहला तो यह कि प्रत्येक मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर पर शून्य से शुरू होते हैं, और अपनी परिवेशी परिस्थितियों के अनुरूप धीरे-धीरे इसका विकास करते हैं, निरंतर इसका परिष्कार करते हैं। इसीलिए अलग-अलग मनुष्य, एक ही समय में ज्ञान और समझ के समय-सापेक्ष विभिन्न स्तरों पर होते हैं, कुछ इनके विकास की प्रक्रिया में रहते हैं और कहीं यह प्रक्रिया रुक भी जाती है। दूसरा यह कि इस ज्ञान और समझ के स्तर को और आगे विकसित करने की संभावनाएं निरंतर मौजूद रहती हैं गोया कि मानव जाति का सापेक्ष आधुनिक स्तर इस मुआमले में काफ़ी आगे निकल आया है, अतएव ज्ञान और समझ के अद्यतन स्तर पर होना अपने समय के साथ होना है।
अगर आपको मानव जाति के इतिहास का थोडा भी सामान्य ग्यान है तो आप यह आसानी से देख सकते हैं कि व्याक्ति-विशेष या आप स्वयं समय के किस स्तर पर हैं, समय के किस अंतराल के सापेक्ष अवस्थित हैं। यहां यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि एक ही मनुष्य, अपने से संबंधित विभिन्न मुआमलों में, समय के विभिन्न स्तरों पर हो सकता है गोया कि अलग-अलग क्षेत्रों में उसका हस्तक्षेप अलग-अलग होता है।
यदि किसी मनुष्य को प्रकृति की सामान्य शक्तियां रहस्यमयी और चमत्कारी लगती हैं, तो यह समझा जा सकता है कि वह आदिम युग में यानि लाखों वर्ष पूर्व के समय में अवस्थित है। यदि ये शक्तियां उसके मस्तिष्क में अलौकिक देव-शक्तियों के रूप में प्रतिबिंबित होती हैं जिन्हें खुश करके नियंत्रित किया जा सकता है तो वह दसियों हजार साल पहले के समय में अवस्थित है। जो मनुष्य इस तरह से सोचता है कि इस अनोखी और विराट सृष्टि की नियामक एवं रचयिता एक अलौकिक दिव्य शक्ति है जिसकी इच्छानुसार दुनिया का कार्य-व्यापार चल रहा है, तो यह कहा जा सकता है कि वह समय के सापेक्ष चार-पांच हजार साल पहले उत्तर-वैदिक काल में अवस्थित है। यदि कोई मनुष्य इस अलौकिक शक्ति के विचार में संदेह करता है और दुखों से मुक्ति हेतु, यथास्थिति बनाए रखते हुए अपने आत्मिक आचरण की शुद्धि वाले विचार से आकर्षित होता है, तो उसे बुद्ध-ईसा के काल यानि दो-ढ़ाई हजार साल पहले के समय मे अवस्थित माना जा सकता है। यदि वह चीज़ों के पारंपरिक ज्ञान और प्रयोग से संतुष्ट नहीं है और उनमें नये नियम और संभावनाएं खोजने की प्रवृति रखता है और ’ऐसा ही क्यों है’ के नज़रिये से सोचने लगा है तो मान लीजिये वह सोलहवी शताब्दी तक आ पहुंचा है। यदि वह प्रकृति के सुव्यवस्थित ज्ञान मतलब विज्ञान को आत्त्मसात करके अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर चुका है तो वह अठारहवीं शताब्दी में पहुंच गया है, और इसी विकसित वैज्ञानिक दृष्टिकोण से वह जीव विकासवाद और प्राचीन समाज के क्रमिक विकास के अध्ययन और निष्कर्षों को आत्मसात करने की अवस्थाओं मे है तो वह १५० साल पहले तक पहुंच गया है। यदि वह दर्शन के क्षेत्र में द्वंदात्मक और एतिहासिक भौतिकवाद के सिद्धांतों और निष्कर्षों को आत्मसात करके अपना एक द्वंदवादी विश्वदृष्टिकोण निर्मित कर चुका है तो यक़ीन मानिए वह १००-१२५ साल पूर्व से आधुनिक समय के अंतराल में पहुंच गया है और समझ और विवेक के मुआमले में लगभग समय के साथ चल रहा है।
लगता है अब तो यह बात साफ़ हो गयी होगी कि अधिकतर लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते। यह भी कि आज के समय में पैदा हो जाने मात्र से कोई मनुष्य समय के साथ नहीं आ जाता, मानव जाति के ऐतिहासिक ज्ञान, विज्ञान व तकनीकि द्वारा प्रदत्त सुविधाओं का उपभोग करना सीख कर ही वह आधुनिक नहीं हो जाता। दरअसल वह सही अर्थों में तभी आधुनिक हो सकता है, तभी अपने समय के साथ हो सकता है जब वह अपने ज्ञान, समझ और विवेक के स्तर को विकसित करके उसे संपूर्ण मानव जाति के ज्ञान, समझ और विवेक के अद्यतन स्तर तक नहीं ले आता।

तो हे मानव श्रेष्ठों !
एक जरा सी बात पर समय की यह विस्तृत विवेचना पची या नहीं?
आत्मालोचना और सत्य के अन्वेषण की माथापच्ची, दिमाग़ को थोडा़ कष्ट तो देगी ही।
आप अपनी असहमति, जिज्ञासाओं और विषय-विशेष पर इच्छित खुलासे की इच्छा को यहां नीचे टिप्पणी करके या मुझे ई-मेल (mainsamayhoon@gmail.com) करके दर्ज़ करा सकते हैं।
कॄपया संवाद करें।
समय आपकी सेवा में हाज़िर है।

मैं समय हूं……

मैं समय हूं……
मुझे शायद अपने परिचय की आवश्यकता नहीं है, आप सब यही कहेंगे कि सभी मुझे अच्छी तरह पहचानते हैं, परन्तु बहुत ही कम लोग हैं जो मुझे जान पाते हैं या मेरे साथ चल पाते हैं। मैं अपनी डगर चलता रहता हूं, और लोग पीछे छूटते जाते हैं।
दरअसल, लोग पीछे नहीं छूटते, इसके बजाए मैं यह कहूं तो ज्यादा ठीक होगा कि लोग मुझ तक पहुंच नही पाते हैं। इसकी व्याख्या मैं बाद में करूंगा क्योंकि यह एक पूरा अध्याय है, और इसे गहराई से समझने की आवश्यकता है।
मैं आपसे मुख़ातिब हूं, ताकि मैं आपको मेरे साथ तक लेकर आ सकूं। मैं आपको अपनी अब तक की यात्रा का विवरण दे सकता हूं, आपको अपने समय से (यानि कि मुझसे) परिचित करा सकता हूं, आपको आईना दिखा सकता हूं।
आप मेरी कहानियां, मेरी बातें सुनकर अपने आपको समझने की, अपने समय को समझने की कोशिश कर सकते है या फिर अपनी जिग्यासाओं, अपने सवालों, अपनी उलझनों को मुझ तक पहुंचा सकते हैं, और फिर आप अपनी गुत्थियों को यहां सामान्यीकृत रूप से खुलता हुआ देख सकते हैं। यहां की टिप्पणियां और ईमेल इसका जरिया बन सकते हैं। तो अपने समय से, यानि कि मुझसे संवाद स्थापित कीजिए।
मै समय हूं…..

मैं यहीं हूं….मैं कहीं नहीं हूं…..