व्यवहार के मानकों का आदर्शवाद

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


व्यवहार के मानकों का आदर्शवाद

guernicaहम इस पर पहले ही बात कर चुके है लेकिन आपके विचार इसपर सुनना चाहते हैं कि क्या जिस आदमी के समझ में यह बात आती है कि ये कम्पनियाँ आर्थिक गुलाम बना रही हैं, उसे क्या करना चाहिए? क्या उसे इनके उत्पाद खरीदने चाहिए? हालाँकि हम यह समझते हैं कि हमें दोनों के खिलाफ रहना है। आखिर इस दुविधा में वह आदमी क्या करे?

ये व्यक्तिगत डूज़ एंड डोन्ट्स की बाते हैं। कोई बड़ी दुविधा भी नहीं। यदि वह ऐसा करना चाहता है, करे, इसमें क्या दिक्कत हो सकती है, नहीं कर सकता है, तो ना करे, जीवनीय जरूरतों और इन्हें बेहतर बनाने के संघर्षों के सापेक्ष ये कोई मुख्य सवाल भी नहीं है। करना भी चाहे, तो यह वहां ही और उन मामलों में ही संभव है जहां हमारे पास विकल्प मौजूद हों, और बात सिर्फ़ एक चुनने की हो।

दुविधा की बात इसलिए समझ आती है कि यदि हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करते हैं, उनके षड़यंत्रों को समझने और समझाने की कोशिश करते हैं तो फिर यदि हम उनके उत्पादों को खरीदते हैं तो ये हमारे लिए आत्मिक तौर पर अंतर्विरोध पैदा करता है, खासकर हमने यदि इस बात को अपने लिए अधिक ही महत्त्वपूर्ण बना लिया है, और हमारे लिए कंपनियों के विरोध से अधिक उत्पादों को खरीदना या नहीं खरीदना ही अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है ( श्रम और उत्पादों पर हम पिछली बार बात कर ही चुके हैं, काम करने वाली बात के दौरान )। ऐसे में सामान्यतः, जहां तक हो सके, इसे महत्त्वपूर्ण सवाल बनाने से बचने की कोशिश करनी चाहिए। थोड़ा-बहुत तकलीफ़ भी उठा ली जाए, जब तक बहुत ही जरूरी ना हो गया हो, ना खरीदें। अब और क्या किया जा सकता है।

विदेशी कंपनियॊं के उत्पाद हम खरीदें नहीं, वे साम्राज्यवादी हैं, देशी कंपनियां भी शोषण करती हैं, उनका भी नहीं खरीदेंगे। हम अपने लिए स्वयं सब कुछ पैदा कर नहीं सकते। देखते हैं फिर जीने का क्या रास्ता निकलता है। कोई बात नहीं क्या फर्क पड़ता है, हमारी बात रहनी चाहिए, इसके लिए हमें जंगलों में रहना पड़े, कंद-मूल खाना पड़े, कंपनियों से लड़ाई की बातों से दूर, अपने जीवन को बचाने के लिए होने वाले संघर्षों में जुटे रहना पडे। 🙂

एक दुविधा और है कि क्या शोषित वर्ग के पक्ष में सोचनेवाले को कार या महँगी चीजें खरीदनी चाहिए? हमारी समझ में तो नहीं। हमें न्यूनतम सुविधा का उपभोग करना चाहिए। आपको पहले भी इस बारे में अपनी बात मैंने कही है। लेकिन जब एक मित्र यह सवाल गंभीरता से उठा रहे हो, तब उनको क्या कहें? जैसे हमें 10-20 जोड़े कपड़े नहीं रखने चाहिए आदि…यह सब मैं सोचता हूँ।

यह भी पढ़ा, और वह आपकी भेजी बातचीत भी। यत्र-तत्र भी आपके कथन पढ़ने को मिलते रहते हैं। यह हम पहले भी कह चुके हैं कि ये व्यक्तिगत जीवन से जुड़े हुए, व्यक्तिगत ईमानदारी और सैद्धांतिकता से जुडे सवाल हैं, एक व्यक्ति के रूप में जितना भी हो सकता है हमें अपना जीवन सादगी और आवश्यक सुविधाओं तथा साधनों के साथ ही जीना चाहिए। इसमें कोई दोराय नहीं है।

पर हम जब इनको नियमावलियों और सनकों में बांध लेते हैं, इन्हें अपने अस्तित्व और अस्मिता से जोड लेते हैं, इन्हें ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं, और फिर इन्हें सामाजिकता के साथ अंतर्संबंधित करके अपने संबंध तय करने लगते हैं, दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षाएं करने लगते हैं, अपने साथ जुड़ने की प्राथमिकताएं बनाने लगते हैं, अपने समूह की रूढि़यों और परंपराओं में आबद्ध करने लगते हैं, तो दरअसल हम एक संप्रदाय़ बन रहे होते हैं। अपने को सीमित कर रहे होते हैं। जो हमारे इन-इन कर्मकांडों को मानेगा वही हमारे साथ चल सकता है, ये ही खरीदना होगा, ये ही पहनना होगा, ये ही भाषा बोलनी होगी, आदि-आदि। अब जो मानता जाएगा वही हमारे संप्रदाय में शामिल हो पाएगा। फिर हम यह चाहेंगे सभी ऐसा ही करें, यही प्रचार हम करेंगे। दूसरे संप्रदायों से जो ऐसा नहीं करते हैं, हमारी घृणा संघर्ष भी पैदा करेगी। हम सांप्रदायिक होते जाएंगे।

हम क्या सोचते हैं, क्या मानते हैं, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण कर गुजरना है। हमें जो भी संभव हो सकता है, करते रहना चाहिए। बिना किसी अन्य से अपेक्षा पाले हुए, बिना इसका श्रेष्ठता-बोध और दंभ पाले हुए। जो करते हैं, या नहीं भी करते हैं अभी, और उसका ढोल पीटने लग जाना, सिर्फ़ उसकी बात करके ही अपनी श्रेष्ठताबोध की ग्रंथि को संतुष्ट करना और लोगों पर उसका आंतक फैलाना, शायद ठीक बात नहीं। आप करते रहिए, जो भी बेहतर कर सकते हैं, जो भी बेहतर किया जाना चाहिए, अपने व्यक्तिगत जीवन को यथासंभव ईमानदार बनाइए, वह अपने आप ही लोगों पर असर करता ही है। आपके व्यक्तित्व की यह भली छापें ही फिर आपके विचारों, मान्यताओं, सिद्धांतों को भी लोगों के बीच में आदर का पात्र बना देंगी।

यह भी सोचिए कि हमें इतनी जल्दबाज़ी क्यों हैं? इससे हमें, हमारी सोच और समझ और सक्रियता को नुकसान हो रहा है या फायदा? पता नहीं हमारी मूल लड़ाई क्या है? हमारे लक्ष्य क्या हैं? और हम फिलहाल कहां उलझ जाना चाहते हैं? इस तरह के सवालों से भी जूझ लेना चाहिए। 🙂


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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बहिष्कार और संघर्ष के अन्य विकल्प

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


बहिष्कार और संघर्ष के अन्य विकल्प

boycott-729-2और जिस आजादी की बात आप कर रहे हैं, उसे हम कैसे सही ठहरा सकते हैं? वह सब तो शोषण के हथियार हैं।….हम क्या करें? सब बेचा जा रहा है और बेचने वाले सत्ता के लोग हैं। तो हम कब तक दुख कहते-सुनते रहें। इस समस्या का कोई स्थाई समाधान तो होना ही चाहिए।

शायद आपने ‘आज़ादी’ शब्द के व्यंग्यात्मक इस्तेमाल पर ध्यान नहीं दिया कि आज़ादी के साये तले किस-किस तरह की आज़ादियां दी हुई हैं और कौन इन सबका बेज़ा इस्तेमाल कर रहे हैं। यह ठीक तो नहीं ही है, यही बात हम भी आप तक पहुंचाना चाह रहे थे। चूंकि यदि यह है, जो कि है ही तो फिर हमारी बहिष्कार की अवधारणा, व्यवहार में कितनी प्रभावी और प्रांसगिक रह जाती है, या रह जाएगी? यह एक भावनात्मक मुद्दा बनने के लिए अभिशप्त होगी, जहां यह इसके कहने या मानने वाले लोगों तक सीमित होगी या उनके लिए भी दिखावटी होगी, या जितना संभव हो पाए उतने की अवसरवादिता तक।

यानि कि संघर्ष इस बात के लिए होना चाहिए कि हे हमारे हुक्मरानों, यह नहीं चलेगा, आप हमारे देश की, हमारी संप्रभुता को गिरवी रख रहे हैं, समूचे देश को टुकडों-टुकड़ो में बेचे जा रहे हैं और यह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, ऐसी नीतियां बनाइए ताकि हमें दूसरे विकसित देशों पर, उनकी शर्तों पर निर्भर नहीं रहना पड़े या कम से कम होना पड़े, ऐसी योजनाएं लाइए कि हमारे देश की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो सके। आत्मनिर्भरता ही वास्तविक संप्रभुता की ओर पहला कदम होता है। अब इस संघर्ष के साथ, और दवाब बनाने की एक तात्कालिक रणनीति के तहत बहिष्कार बगैरा जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। कई ओर भी, पर वह इस मुख्य मुद्दे के अंतर्गत साथ देने वाले तात्कालिक उपाय होंगे जो कि इस मुख्य लड़ाई को तेज़ करने, आम करने, प्रभाव बढ़ाने की रणनीति के तहत होंगे तो शायद ये अधिक प्रभावी हो पाएं।

अब विकल्प तो दो ही हैं। या तो हम ऐसे ही चलने दें या समतामूलक समाज के लिए अपने लक्ष्य के पूर्व कम से कम आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय चोरों से दूर रहें। आर्थिक मामलों में स्वदेशी का सिद्धान्त मुझे सही लगता है

ऐसा कीजिए तीन विकल्प रख लीजिए। एक – या तो ऐसे ही चलने दें, दूसरा – ऐसी सत्ता-व्यवस्था को उखाड़ फैंकें और वैकल्पिक इच्छित व्यवस्था को लागू कर दें, तीसरा – जब तक सत्ता उखाड़ कर ना फैंकी जा पा रही है, तब तक के लिए सत्ता को उखाड़ फैकने के मुख्य दूरगामी लक्ष्यों की तरफ़ बढ़ने के लिए, तात्कालिक रणनीतियों के तहत, फौरी लक्ष्यों जैसे कि नीतियों के खिलाफ़ संघर्ष, संप्रभुता के खिलाफ़ जाने वाली नीतियों पर, निजीकरण किए जाने और राज्यसत्ता की सार्वजनिक जिम्मेदारियों को सीमित या खत्म किए जाने की नीतियों पर, मुनाफ़ाखोरी, महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, भाषा के बारे में काम में ली जा रही नीतियों के खिलाफ़, जनता की और भी कई स्थानीय या सार्विक तकलीफ़ों के खिलाफ़ छुटपुट संघर्ष छेड़े, उन्हें व्यापक बनाएं। जनचेतना को इन संघर्षों के दौरान बढ़ाएं, उसको अंतिम लक्ष्यों की चेतना से जोड़ें, और भावी लंबे और बड़े संघर्षों के लिए तैयारी करें। इस तीसरे विकल्प की रणनीतियों के तहत, आप द्वारा अभी तक कही गई सारी बातों को उनकी कमियों को दूर करके रखा जा सकता है। पर उनको मुख्य बना लेने पर, एक या दो बातों पर ही सिमट जाने पर इन संघर्षों या आंदोलनों का क्या हश्र हो सकता है यह इसी तरह के और भी कई आंदोलनों के अनुभवों में देखा जा सकता है।

बहुराष्ट्रीय और साम्राज्यवादी कम्पनियों की बातों पर हमारी बहुत हद तक सहमति अब भी है स्वदेशी वालों से। शायद कुछ इस तरह कि हमारे गाँव में दो किस्म के चोर आते है, एक दूर के हैं और दूसरे अपने गाँव-पड़ोस के हैं तो हमें पहले दूर वालों से निपटना चाहिए। गाँव वालों का स्थान उनके बाद आता है। हम चोरों-चोरी के खिलाफ़ तो हैं ही।

आपका मन अभी अपनी अनुकूलित अवधारणाओं में उलझे रहना अधिक सहज महसूस करता है। यह कोई बुरा लक्षण भी नहीं है, ऐसी स्थिरता की मानसिकता के साथ, धारणाओं और मान्यताओं को बदलने में थोड़ा अधिक श्रम तो होता है, पर नई प्राप्त स्थिति के भी इसी तरह स्थिर रहने की संभावना भी यहीं अधिक होती है। शनैः शनैः चीज़ें अपना आकार लेंगी। यह कहा जाता है, जो जल्दी गर्म होता है वह ठंड़ा भी जल्दी ही होता है।

आपने यह गांव वाला उदाहरण अच्छा दिया है। ऐसा भी किया जा सकता है, पर जोखिम यह होता है कि बाद में अपने गांववालों से निपटना अक्सर मुश्किल हो जाता है। क्योंकि गांव के चोर भी, बाहर वालों से इस लड़ाई में साथ होते हैं। चोर चोर ही होते हैं तो जाहिर है उनके पास समझ, तकनीक, धन-साधन अधिक हो सकते हैं, उनके व्यक्तिगत गुण-अवगुण इस लड़ाई की प्रक्रिया में लोकप्रिय हो सकते हैं, वे कई कारणों से गांववालों में अपना और अपने मूल्यों का प्रभाव जमा सकते हैं। इसके अलावा क्योंकि वे भी चोर हैं, और बाहर वाले भी चोर ही हैं, तो उनके मूल्यों और हितों में एक एकरसता होती है जिसके कारण वे उनसे कोई आंतरिक समझौता कर सकते हैं, लड़ाई को भी कमजोर कर सकते हैं, हो सकता है लड़ाई का रुख ही मोड़ दिया जा सकता है। चोरी को छोडकर किन्हीं और ही कम महत्त्वपूर्ण सवालों में गांववालों को उलझाया जा सकता है। हो सकता है वे गांव वालों के साथ, अपनी इस मुख्य लड़ाई को छोडकर किसी मंदिर-मस्ज़िद, जाति, पक्की कचहरी, विकास आदि के नाम पर दूसरी ही चीज़ों में उलझाकर रख दिये जाएं। और इन चीज़ों में बाहर के चोरों की आर्थिक या तकनीक की मदद के लिए भी तर्क गढ़ लिये जाएं और उनका इस विकास में अनिवार्य योगदान अपरिहार्य सा लगने लगे। हो सकता है इस लड़ाई की शुरुआत करने वाले मूलगामी व्यक्तियों को धीरे-धीरे प्रलोभनों में लाकर उन्हें भी अपने साथ ले आया जाए, और जो तैयार नहीं हों उन्हें आतंकवादी, विकास-विरोधी, नक्सली बगैरा बता कर मुख्यधारा से अलग कर दिया जाए, उन्हें नष्ट कर, मारकर, रास्ते से ही हटा दिया जाए।

आप शायद पहुंच रहे होंगे कि हमारे इशारे किस तरफ़ जा रहे हैं। बाहरी चोरों यानि अंग्रेजों से हमारे देश की लड़ाई कुछ ऐसी ही नहीं थी? और भी ऐसी ही कई लड़ाइयों और उनके हश्रों के प्रत्यक्ष उदाहरण क्या हमारे सामने नहीं हैं?

तात्कालिक तौर पर कोई भी रणनीति अपना ली जाए, यदि लड़ाई को बाहरी या आंतरिक के कम महत्त्वपूर्ण मामले में ना उलझाकर यदि गांववाले अपनी लड़ाई को सिर्फ़ चोरी और चोरों के खिलाफ़, ऐसी व्यवस्था के खिलाफ़ जो इनका होना संभव बनाए रखती हैं, के खिलाफ़ केंद्रित रखते हैं तो अधिक बेहतर ना रहेगा? चोर या चोरी के खिलाफ़, चाहे वे बाहरी हो या आंतरिक, एक साथ दोनों के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी जाना अधिक बेहतर रहने की संभावना है।

आप इससे परिचित हैं, भगतसिंह के विचार और व्यवहार जो आकार ले रहे थे, उन्हें याद करें। उन जैसे कई क्रांतिकारियों की लड़ाई इन्हीं बाहरी चोरों के खिलाफ़ शुरू हुई थी, पर वे धीरे-धीरे इस विचार तक आ पहुंचे थे कि हमारी लड़ाई सिर्फ़ अंग्रेजों के खिलाफ़ नहीं है, यह तब तक जारी रहेगी जब तक कि एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का, और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण की अवस्थाएं पूर्णतया समाप्त नहीं कर ली जातीं। वे इस विचार तक आ पहुंचे थे कि अपनी लड़ाई को इन्हीं मूलभूत चीज़ों के आधार पर लड़ना होगा, बाहरी और आंतरिक दोनों मोर्चों पर एक साथ।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

स्वदेशी और बहिष्कार का विकल्प

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


स्वदेशी और बहिष्कार का विकल्प

1leadफिलहाल की परिस्थितियों में स्वदेशी का विकल्प मुझे गलत नहीं लगता।

काश कि चीज़ें हमारे मानने या लगने के हिसाब से हो रही होतीं, पर निश्चय ही ऐसा नहीं है। दुनिया और समाज हमारे मानने-लगने से निरपेक्ष रूप से अपनी गति चला जा रहा है। विचारों को, यानि मानने या लगने को, लागू कर पाने की स्थितियां, इसकी ताकत प्राप्त हो जाने पर ही संभव हैं।

कहने का मतलब यह है कि फिलहाल हमारे स्वदेशी का विकल्प चुनने का अवसर ही कहां है, मतलब कि उसके मायने क्या हैं। हम चुन लें, मान लें पर देश के हुक्मरान और उनकी आर्थिक नीतियां जो तय कर रहे हैं, हो तो वही रहा है। उन्होंने देश की आत्मनिर्भरता का विकल्प छोड़ कर साम्राज्यवादी देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले देश और उसके संसाधनों को कर ही रखा है।

यानि कि यदि अब हमारा विकल्प चुनने का मतलब है कि हम इसके लिए आंदोलन चलाएंगे, जनता को जागरुक बना कर अपने साथ लेंगे, और व्यवस्था में परिवर्तन कर अपने मानने और जो ठीक है उसे लागू करेंगे। यानि स्वदेशी के इस विकल्प को हम अपने आंदोलन का उद्देश्य घोषित कर उसके लिए तन-धन-मन से लग जाएंगे। जब इसे अपने आंदोलनों के लिए एक उद्देश्य, एक विकल्प के रूप में ही रहना है, तो क्यों ना फिर आमूलचूल परिवर्तन को ही, एक सही और बेहतर विकल्प को ही सीधे क्यों ना लक्ष्य रखा जाए। और उसी हेतु जनचेतना का विकास कर आंदोलन खड़े किए जाएं।

खैर, यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी को भी कुछ तात्कालिक या फौरी लक्ष्य अपने सामने रखने ही होंगे, पर वे यदि दूरगामी लक्ष्यों की दिशा में ही हों तो बेहतर।

हमारे हाथ में इतना तो है ही कि हम…..बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पाद नहीं खरीदें। यानि निजी तौर पर बहिष्कार…..तो वे यहाँ करेंगे क्या?  …यह बेहतर है कि हम किसी बड़े और बेहतर विकल्प के लिए लड़ें….तब तक स्वदेशी आन्दोलन बुरा नहीं लगता….यह जानते हुए कि यह लक्ष्य नहीं है, हमें इस दिशा में कुछ कदम तो चलना चाहिए…..हमारे स्वदेशी के विकल्प चुनने का अवसर है……..हमारा थोड़ा परिश्रम या कष्ट एक दिन बहुराष्ट्रीय निगमों की तानाशाही को भगाने में सफल तो हो ही जाएंगे।….बहुराष्ट्रीय उत्पादों को खरीदना बन्द कर दें……लाखों की आमदनी कम हो जाती है।…..वैसे व्याख्याएँ कहती हैं कि स्वदेशी और देशी में अन्तर है। देशी मतलब भारतीय पूँजीपति और स्वदेशी मतलब निकटतम गरीब लोग या छोटे स्तर के उद्योग या दुकान की बनाई गई सामग्री खरीदना….जहाँ तक सम्भव है, वहाँ तक इसका पालन किया जा सकता है।

बहुत अच्छी योजना है। कितना आसान सा मामला है, और फिर भी लोग इसे समझते नहीं है, या समझना ही नहीं चाहते। बस एकबार यह शुरु हो जाए, तो कुछ ही वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियां, साम्राज्यवादी शक्तियां अपना बोरिया-बिस्तर समेटेंगी, और निकल लेंगी। फिर हमारे पास सिर्फ़ देशी पूंजीपति रह जाएंगे, उन्हें हम अहिंसा और आत्मा की शुद्धि के ज़रिए, सत्याग्रह के ज़रिए अपना ताम-झाम छोड़ने को राजी कर लेंगे, बस फिर क्या है यही राजनैतिक सत्ता के साथ किया जाएगा। सभी बड़े उद्योगों और योजनाओं को बंद कर दिया जाएगा, गांवों में एक चमार, एक लुहार, एक सुनार, एक जुलाहा, एक कुम्हार, आदि-आदि नियुक्त कर दिया जाएगा, मुद्रा बंद कर दी जाएगी, वस्तुओं का विनिमय करके वे आपस में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण करेंगे, संस्कृत माध्यम वाले आश्रम खोले जाएंगे जहां प्राचीन भारतीय मनीषा के श्लोकों का उच्चारण और पाठन किया जाएगा, उन्हें जीवन जीने की कला सिखाई जाएगी, सभी विदेशी ज्ञान और विज्ञान से उन्हें बचा कर रखा जाएगा ताकि हमारी महान संस्कृति में कोई संकरीकरण ना हो। और एक दिन विश्व-गुरू के रूप में भारत की पुनर्स्थापना हो जाएगी। मामला ख़त्म। वाकई कितना आसान है।

थोड़ा सा मज़ाक है, पर यह लगभग कुछ ऐसा ही है, हालांकि हम जानते हैं कि इनमें से कई मामलों में आप अलग राय रखते हैं, पर ये अंतर्संबंधित तो है ही और अंततः एक इसी तरह के काल्पनिक आदर्शवाद से जाकर जुड़ते हैं।

बहिष्कार, अंग्रेजों के खिलाफ़ दबाब बनाने की राजनीति के तहत उठाया गया एक मामूली कदम था, और एक ऐसे ही आदर्शवाद से प्रेरित भी। उस समय भी, गांधी जी के इतने व्यापक प्रभाव के बावज़ूद भी यह कितना कारगर था यह इतिहास में दर्ज़ है ही। वास्तविकता यह है कि मनुष्य अपने लिए एक बेहतर जीवनयापन स्थिति और साधन चुनना चाहता है, किसी आदर्श के प्रभाव में कुछ समय के लिए भले ही इसके उलट चलने को व्यक्ति तैयार हो जाए, पर वस्तुगत स्थितियां उसे अपने चुनाव और प्रयोग के सहज आवश्यकता तक ले जाती हैं।

मतलब कि, यदि उपभोग के सामान के बेहतर विकल्प मौजूद होंगे तो व्यक्ति को चुनने और खरीदने की आज़ादी है ही, वह उसे ही लेगा जो उसे मुफ़ीद ठहरेगा, कभी मितव्ययता के हिसाब से कभी गुणवत्ता के हिसाब से। यानि कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यहां आने की आज़ादी हो, सामान बेचने की आज़ादी हो, उपभोग के लिए प्रेरित करने की आज़ादी हो, हमें भी औरों से बेहतर अपना स्टेण्डर्ड बनाने और दिखाने की आज़ादी हो, और हम लोगों से अपील करके यह भी मान लें कि वे वाकई में बाहर का सामान नहीं खरीदेंगे। यह तो वैसी ही बात हुई कि हम शराब के कारखानों और दुकानों का ढेर लगाए जाएं, और लोगों की अंतरात्मा से अपील करें कि वे आत्मशुद्धि करें, शराब पीना हानिकारक है अतएव ना खरीदें और नाही पियें। अभी भी सभी तरह का सामान उपलब्ध होने के बावज़ूद लोग अपने कई हिसाबों से देशी या स्वदेशी सामान खरीदते ही हैं, वरना यहां की कंपनियां ही बंद हो गई होती। और बाहर का सामान भी खरीदा ही जा रहा है, वरना बाहर की कंपनियां यहां आ ही क्यों रही होतीं।

मुख्य बात राजसत्ता की शक्तियों की है, वे देश को बेचे डाल रहे हैं, साम्राज्यवादियों की शर्तों को स्वीकारते जा रहे हैं। देश की आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के उपायों को योजनाबद्ध करने की बज़ाए, आत्मनिर्भरता को निरंतर कम करते जा रहे हैं। ना तो योजनाबद्ध उत्पादन है, ना ही वितरण। कृषि की वज़ह से पैदा हुई आत्मनिर्भरता ने ही अभी तक भारत को जितना भी बचा हुआ है, बचाया हुआ है। और इस बात को साम्राज्यवादियां शक्तियां भी समझती है, इसलिए वे इस कृषि पर आत्मनिर्भरता को ही विभिन्न शर्तों को थोप-थोप कर ख़त्म कर देना चाहते हैं। सेज, कृषि भूमियों का अन्य वज़हों से अधिग्रहण, भूमाफ़ियाओं का शहर के आसपास के कृषि इलाकों का ख़त्म किया जाना आदि-आदि इसी की कड़िया हैं, और सत्ता अपने और अपने पूंजी-आकाओं का पेट भरने और लूटने में व्यस्त है। जनता की किसी को भी फिक्र नहीं है, ना लोकतांत्रिक सत्ता को, ना कार्पोरेट्स को, सभी अपना मुनाफ़ा और हिस्सा बटोरने में लगे हुए हैं।

यह बार-बार इसलिए कहा जाता है कि बिना राजनैतिक आंदोलनों के, राजसत्ता के नियंत्रण और इस हेतु इसे मजबूर कर देने के, बाकी सभी विकल्प, सिर्फ़ भ्रमों में अपने आपको उलझाए रखना है, अपनी तात्कालिक कुछ करने की आकांक्षा को संतुष्टि देते रहना मात्र है। जनता का वास्तविक जनतंत्र ( peoples democracy ) की अवधारणा इसलिए ऐसे समय में काफ़ी महत्त्वपूर्ण हो गई है। क्या अभी हाल के कई आंदोलनों को, उनकी तमाम सीमाओं के बावज़ूद, राजसत्ता को नियंत्रित करने या मजबूर करने की कवायद के छोटे से शुरुआती कदमों के रूप में नहीं देखा जा सकता। लोगों की ऐसी आकांक्षाओं का परावर्तन तो इसमें देखा ही जा सकता है।

“मुख्य बात राजसत्ता की शक्तियों की है, वे देश को बेचे डाल रहे हैं………अपना मुनाफ़ा और हिस्सा बटोरने में लगे हुए हैं।” इसका समाधान क्या है? यह तो है बहुत निराशाजनक।

निराशाजनक तो है, किंतु उत्पादन प्रणालियों, अर्थव्यवस्थाओं और सामाजिक समस्याओं के कोई तात्कालिक समाधान नहीं हुआ करते। ये सभी निश्चित ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज होते हैं और इन्हीं ऐतिहासिक परिस्थितियों की विकास-प्रक्रिया में ही, इन व्यवस्थाओं के अंतर्विरोधों को हल करने की जरूरतें और उस हेतु संघर्ष भी परवान चढ़ा करते हैं।

एक व्यक्ति के रूप में इन वस्तुगत परिस्थितियों और अंतर्विरोधों को समझना, और वर्ग-संघर्षों की सही अभिव्यक्तियों में अपनी प्रगतिशील भूमिका को समुचित रूप से तय करना और उनका यथासंभव निर्वाह करना ही एक वस्तुगत हस्तक्षेप हो सकता है। इस बारे में और काफ़ी कुछ पहले भी कहा ही जा चुका है। इस हेतु आगे की, और संगत समझ को आपका अध्ययन और विश्लेषण परवान चढ़ाएगा ही।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय