स्वतंत्रता और आवश्यकता – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत स्वतंत्रता और आवश्यकता पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


स्वतंत्रता और आवश्यकता – २
( Freedom and Necessity – 1 )

प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom) सिर्फ़ कुछ ऐतिहासिक दशाओं में और ठीक तब प्राप्त की जा सकती है, जब सारा समाज स्वतंत्र (free) हो। ये दशाएं क्या हैं?

प्रतिरोधी विरचनाओं (antagonistic formations) में दो महती अनिवार्य शक्तियां, दो प्रकार की बाह्य आवश्यकताएं (external necessity) मनुष्य पर हावी होती हैं। वह (१) प्राकृतिक आवश्यकता पर और (२) सामाजिक आवश्यकता पर निर्भर होता है। सामाजिक आवश्यकता, शोषण की ऐतिहासिक प्रतिबंधिता (conditionality) में प्रकट होती है। शोषित स्वतंत्र नहीं हो सकते, क्योंकि उनके पास अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भौतिक और आत्मिक अवसर नहीं होते हैं। किंतु शोषक भौतिक संपदा तथा राजनीतिक शक्ति का उपयोग करते हुए कुछ हद तक स्वतंत्र होते हैं, किंतु यह स्वतंत्रता भी बहुत सीमित होती है, मुख्यतः निजी संपत्ति (private property) के संदर्भ में। स्वतंत्र होने के लिए ऐतिहासिक आवश्यकता को जानना, सही निर्णय लेना और उसे कार्यान्वित करना ज़रूरी है। परंतु ऐतिहासिक आवश्यकता अंततोगत्वा निजी स्वामित्व के उन्मूलन (abolition) की ओर ले जाती है और फलतः प्रभुत्वशाली वर्गों (dominant classes) के हितों से टकराती है, जो उस पर निर्भर हैं। इसकी वजह से वे भी इस आवश्यकता को पूरी तरह से नहीं जान सकते और इसके विरुद्ध फ़ैसले लेने तथा कार्रवाइयां करने के लिए बाध्य होते हैं और इसीलिए सचमुच स्वतंत्र होने में असमर्थ होते हैं। इस तरह, पूंजीवादी समाज सहित सभी शोषक समाजों में वास्तविक स्वतंत्रता (real freedom) असंभव है। मेहनतकश, शोषण और व्यक्ति के चौतरफ़ा विकास की भौतिक तथा आत्मिक दशाओं के अभाव से मुक्त नहीं हैं। शोषक भी उन राजनीतिक और क़ानूनी प्रतिबंधों से मुक्त नहीं है जिन्हें उन्होंने ख़ुद बनाया है और जिनकी उन्हें अपनी निजी संपत्ति की रक्षा करने तथा अपने स्वामित्व के अधिकार को दृढ़ बनाने के लिए ज़रूरत है।

इसलिए स्वतंत्रता एक ऐतिहासिक घटना (historical phenomenon) है। अकेले ज्ञान, चिंतन तथा अतिकल्पना (fantasy) में स्वतंत्र रहना असंभव है। यह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है। यह आत्मनिष्ठ (subjective) स्वतंत्रता है, यानी वास्तविक स्वतंत्रता की अमूर्त संभावना (abstract possibility) है। वास्तविक स्वतंत्रता केवल तभी संभव है जब उसके लिए समुचित वस्तुगत (objective) पूर्वावस्थाएं विद्यमान हों। ये पूर्वावस्थाएं, एक साम्यवाद आधारित समाज में संक्रमण (transition) के साथ बनती हैं। समाजवाद के निर्माण की सारी अवधि, समाज के प्रत्येक सदस्य और फलतः सारे समाज के लिए स्वतंत्रता की सतत संवृद्धि (steady growth) की प्रक्रिया है। इसीलिए ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ में ऐलान किया गया था: “प्रत्येक की स्वतंत्र प्रगति, सभी की स्वतंत्र प्रगति की शर्त होगी।”

प्रत्येक के लिए तथा संपूर्ण समाज के लिए, स्वतंत्रता की उपलब्धि यह अपेक्षा करती है कि निम्नांकित महत्वपूर्ण शर्तों को और सर्वोपरि एक शक्तिशाली भौतिक-तकनीकी आधार की शर्त को पूरा किया जाये। यह तभी संभव है जब वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की उपलब्धियों को, निजी मुनाफ़ों के लिए नहीं वरन् संपूर्ण समाज के फ़ायदों के साथ संयुक्त किया जाये। उत्पादक शक्तियों (productive forces) के विकास को उस स्तर तक ऊंचा उठाया जाना चाहिए, जो भारी, थकाऊ काम से और प्रकृति पर निर्भरता से मनुष्य की अधिकतम स्वतंत्रता को सुनिश्चित बनाये। इससे पूर्ण चहुंमुखी शिक्षा पाने और हर किसी की क्षमताओं के फलने-फूलने के लिए पूर्वावस्थाओं की रचना होगी और अपनी बारी में उससे प्रत्येक व्यक्ति की भौतिक व आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के अवसरों में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी। साथ ही सारे सामाजिक जीवन के और अधिक रूपांतरणों (transformations) तथा आगे सुधारों के लिए अनपेक्षित (unforeseen) संभावनाओं के द्वार खुल जायेंगे।

जनता की चेतना का विकास, सामाजिक (सार्वजनिक) हितों व व्यक्तिगत हितों के बीच समुचित संबंध की गहरी समझ और तर्कबुद्धिसम्मत (rational) कामनाओं और ज़रूरतों का बनना, आत्मानुशासन (self-discipline), पारस्परिक सम्मान तथा नैतिक मानकों, क़ानूनों व न्याय व्यवस्था का सख़्ती से अनुपालन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस शर्त के बिना स्वतंत्रता सामान्यतः अलभ्य (unattainable) है। स्वतंत्रता केवल तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति अपनी कार्रवाइयों और इरादों पर बाहरी बलप्रयोग के बिना नियंत्रण रखने में समर्थ हो ताकि अन्य लोगों की स्वतंत्रता बाधित ना हो। जब तक कर्तव्यनिष्ठा (conscientiousness) का यह स्तर उपलब्ध नहीं होता, तब तक सामाजिक संबंधों के नियमन (regulation) का कार्य स्वयं नागरिकों द्वारा ही नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक संगठनों तथा संस्थानों द्वारा भी होता रहेगा। जनता की कर्तव्यनिष्ठा में बढ़ती के साथ, ये कार्य अधिकाधिक रूप से स्वयं समाज के सदस्यों द्वारा स्वेच्छा से किए जाने लगेंगे। यही कारण है कि संपूर्ण समाज तथा प्रत्येक व्यक्ति द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने की एक महत्वपूर्ण पूर्वशर्त कर्तव्यनिष्ठा का चौतरफ़ा विकास है। जहां तक इन शर्तों को केवल साम्यवादी समाज में संक्रमण की अवधि के दौरान ही उपलब्ध किए जा सकने का संबंध है, मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन का उस अवधि को ‘आवश्यकता के राज्य से स्वतंत्रता के राज्य में संक्रमण की अवधि’ समझना हर तरह से सकारण है।

अतः ऐतिहासिक भौतिकवाद (historical materialism) स्वतंत्रता को जिस अर्थ में समझता है, उस अर्थ में स्वतंत्रता की प्राप्ति मनुष्य जाति का ऐतिहासिक ध्येय है, क्योंकि केवल स्वतंत्र समाज में रहने वाला स्वतंत्र व्यक्ति ही स्वयं अपनी तथा अन्य लोगों की भलाई के वास्ते अपनी सारी रचनात्मक शक्तियों को वास्तव में तथा अमल में प्रदर्शित कर सकता है। जब इन रचनात्मक शक्तियों की ज़रूरत युद्ध करने और स्वार्थपूर्ण लक्ष्यों की प्राप्ति के नहीं, बल्कि व्यक्ति की क्षमताओं के असीमित विकास तथा मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए होगी, तभी स्वतंत्रता के राज्य की स्थापना होगी। परंतु यह राज्य, ऐतिहासिक आवश्यकता के न होते हुए नहीं, वरन उसके द्वारा, प्रतिरोधी सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के विकास द्वारा पैदा हुए स्वतंत्रता तथा आवश्यकता के बीच अंतर्विरोध को दूर करके उत्पन्न होगा।

इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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स्वतंत्रता और आवश्यकता – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत किया था, इस बार हम स्वतंत्रता और आवश्यकता पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


स्वतंत्रता और आवश्यकता – १

( Freedom and Necessity – 1 )

स्वतंत्रता (freedom) क्या है और क्या मनुष्य स्वतंत्र (free) हो सकता है? – यह दर्शन का एक शाश्वत प्रश्न है। यह दर्शन के एक बुनियादी सवाल की, यानी बाह्य जगत के साथ मनुष्य के संबंध के सवाल की एक अभिव्यक्ति है।

स्वतंत्रता की दार्शनिक संकल्पना (philosophical concept) को, स्वतंत्रता की संकीर्ण धारणा (philistine notion) से नहीं उलझाना चाहिए। संकीर्ण-मना (philistine) लोगों के लिए स्वतंत्रता का मतलब अपनी इच्छानुसार मनमाने ढंग से काम करना, अपनी किसी भी इच्छा को पूरा करना है। क्या ऐसी स्वतंत्रता संभव है? मान लीजिये कि कोई व्यक्ति एक तपते रेगिस्तान के बीच तुरंत शीतल जल-धारा में नहाने की कामना करता है। उसकी इस कामना का पूरा होना असंभव है क्योंकि उस व्यक्ति ने वस्तुगत आवश्यकता (objective necessity) तथा वास्तविक दशाओं (real conditions) को ध्यान में नहीं रखा है। मान लीजिये कि कोई अन्य व्यक्ति परिंदों की तरह उड़ना चाहता है। पर वह अपनी बांहों को पंखों की तरह कितना ही क्यों ना फड़फड़ाये, वह गुरुत्व बल पर क़ाबू नहीं पा सकता है। यहां भी वस्तुगत आवश्यकता उसकी कामना के ख़िलाफ़ आ टकराती है। लेकिन क्या इसका यह मतलब है कि मनुष्य हमेशा आवश्यकता का गुलाम है, कि वह उसे पराभूत नहीं कर सकता और अपनी कामनाओं के अनुरूप काम नहीं कर सकता?

प्राचीन यूनानी दार्शनिकों का ख़्याल था कि स्वतंत्रता केवल देवताओं के लिए अनुमत (allowed) है। मनुष्य उनके हाथों का खिलौना है। वह अपने भावावेगों (passions) तथा बाहरी आवश्यकता का ग़ुलाम है। यह दृष्टिकोण, सामाजिक विकास के उस स्तर को परावर्तित (reflect) करता था, जब प्राकृतिक शक्तियों के साथ तथा वर्ग शोषण (class exploitation) के ख़िलाफ़ संघर्ष में मनुष्य दुर्बल और निस्सहाय था। ईसाई धर्माधिकारियों तथा दार्शनिकों का विचार था कि मनुष्य स्वतंत्र हो सकता है, किंतु वे स्वतंत्रता का बहुत सीमित अर्थ लगाते थे। उनकी दृष्टि से यह दो रास्तों में से एक के चयन की संभावना में निहित है – मनुष्य या तो ईश्वर को प्रिय कर्म करे और पुरस्कारस्वरूप स्वर्ग को जाये या शैतान को प्रिय काम करे और दंडस्वरूप नरक हो जाये। लगभग ऐसी ही धारणाएं कमोबेश हर धार्मिक दृष्टिकोण में अभिव्यक्त हुयीं।

१७वीं सदी के हॉलेंड के भौतिकवादी चिंतक बारूख़ स्पिनोज़ा का विचार था कि प्रकृति में आवश्यकता का बोलबाला है। तर्कबुद्धि (reason) संपन्न मनुष्य इस आवश्यकता को जानने में समर्थ रहा, अतः स्वतंत्र हो गया। स्पिनोज़ा के अनुसार, स्वतंत्रता आवश्यकता को जानना है। क्या सचमुच ऐसा है? क्या वस्तुगत आवश्यकता पर नियंत्रण कायम करने के लिए, उस पर निर्भर न रहने और स्वतंत्र होने के लिए उसे जानना काफ़ी है?

एक तपते हुए रेगिस्तान में नहाने के लिए उपयुक्त तालाब के प्रकट होने के लिए इच्छाओं का कोई महत्व नहीं है। इसके लिए चंद सिंचाई परियोजनाओं को कार्यान्वित करना, नहरें और सिंचाई के तालाब बनाना, पानी के स्रोत को खोजना और नमी को संरक्षित तथा वितरित करना सीखना ज़रूरी है। और इसके लिए क्रमानुसार प्रकृति के नियमों को जानना, सही निर्माण योजना को छांटना और सुआधारित फ़ैसले लेना आवश्यक है। लेकिन केवल फ़ैसले और योजनाएं भी काफ़ी नहीं है। ढेर सारा काम करना और चयनित योजना को वास्तविकता बनाना आवश्यक है; मनुष्य केवल तभी झुलसानेवाली गर्मी से छुटकारा पायेगा और अपनी इच्छा को पूरा कर सकेगा।

उड़ने के लिए केवल कामना करना काफ़ी नहीं है। विश्व में विविध आवश्यकताएं तथा वस्तुगत नियमितताएं (objective laws) संक्रियाशील (operational) हैं। गुरुत्व के नियम के अलावा गतिमान पिंडों के प्रति वायु के प्रतिरोध के नियम भी हैं। हम अपने आप को इनमें से किसी भी नियम से या इन आवश्यकताओं में से किसी भी आवश्यकता से छुटकारा नहीं दिला सकते हैं। लेकिन जब हम वस्तुगत आवश्यकता को जान पाते हैं, तो हम दूसरे पर भरोसा करते हुए उनमें से एक की संक्रिया पर क़ाबू पा सकते हैं। विमानों के डिज़ाइनर ऐसा ही करते हैं, वे गुरुत्व के बल पर क़ाबू पाने के लिए वायु के प्रतिरोध बल का उपयोग करते हैं। लेकिन महज़ आवश्यकता का ज्ञान काफ़ी नहीं है। ज्ञान पर भरोसा करते हुए सही निर्णय लेना, सबसे सही डिज़ाइन तथा निर्मिति का चयन करना और विमान काव्यवहारतः निर्माण करना महत्वपूर्ण है। केवल तभी हम मुक्त रूप से हवा में उड़ सकते है।

इस तरह, स्वतंत्रता की ऐतिहासिक भौतिकवादी संकल्पना (historical materialistic conception) सिर्फ आवश्यकता की जानकारी तक सीमित नहीं की जा सकती है; यह इसे लोगों के व्यावहारिक क्रियाकलाप से जोड़ती है। स्वतंत्र होने का मतलब है वस्तुगत आवश्यकता का संज्ञान (cognition) प्राप्त करना और उस ज्ञान पर भरोसा करते हुए सही लक्ष्य तय करना, प्रमाणित (substantiated) फ़ैसले छांटना और लेना तथा उन्हें व्यवहार में लाना। इसीलिए इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि स्वतंत्रता, वस्तुगत आवश्यकता से काल्पनिक स्वाधीनता (imaginary independence) में नहीं, बल्कि यह जानने में है कि सके ज्ञान सहित निर्णय कैसे लिये जायें।

इस अर्थ में, मनुष्य केवल सामाजिक सत्व (social being) के रूप में ही स्वतंत्र हो सकता है। समाज के बाहर स्वतंत्र होना असंभव है। एक पूर्णतः अलग-थलग रहने वाला व्यक्ति वस्तुगत आवश्यकता को जानने में समर्थ होते हुए भी सबसे अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण फ़ैसले को शायद ही कार्यान्वित कर सकता है। जो पूंजीवादी चिंतक यह समझते थे कि मनुष्य को सबसे पहले समाज के प्रति दायित्वों से मुक्त किया जाना चाहिए, उनका खंडन करते हुए लेनिन ने लिखा: “कोई समाज में रहकर समाज से स्वतंत्र नहीं हो सकता है।” फलतः प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ़ कुछ ऐतिहासिक दशाओं में और ठीक तब प्राप्त की जा सकती है, जब सारा समाज स्वतंत्र हो। ये दशाएं क्या हैं?



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय अविराम