ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में ऐच्छिक स्मरण पर विचार शुरु किया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक स्मरण – २
( voluntary memorization )

जब सामग्री बहुत होती है, जिससे उसे बार-बार दोहराना जरूरी हो जाता है, तो उसे तीन तरीक़ों से याद किया जा सकता है : आंशिकतः ( आंशिक प्रणाली ), पूर्णतः ( अविभाज्य प्रणाली ), और आंशिकतः व पूर्णतः ( संयुक्त प्रणाली )। सबसे अधिक युक्तिसंगत अंतिम प्रणाली है और सबसे कम युक्तिसंगत प्रथम प्रणाली। आंशिक प्रणाली में अलग-अलग भागों को एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से और समष्टि को ध्यान में रखे बिना याद किया जाता है। इसमें धारण-अवधि बहुत कम हो जाती है। इससे अधिक उत्पादक अविभाज्य प्रणाली है, जो कर्ता के सामने सामग्री की सामान्य अंतर्वस्तु प्रस्तुत करती है और इस तरह से अलग-अलग भागों को उनके अन्योन्यसंबंध को ध्यान में रखते हुए समझने तथा स्मरण करने की संभावना देती है।

किंतु जटिलता की दृष्टि से विभिन्न भागों में अंतर हो सकता है। यह पाया गया है कि यदि सामग्री बहुत अधिक है, तो आरंभिक और अंतिम भागों की तुलना में बीच के भाग को याद कर पाना सामान्यतः ज़्यादा कठिन होता है। ऐसे मामलों में सर्वाधिक कारगर संयुक्त प्रणाली सिद्ध होती है, जिसमें पहले सामग्री को उसकी समग्रता में समझा और साथ ही अलग-अलग भागों में बांटा जाता है, फिर इन भागों, विशेषतः सबसे कठिन भागों को एक-एक करके याद किया जाता है और अंत में सारी सामग्री को एक साथ दोहराया जाता है। स्मरण की यह प्रणाली स्मृतिक क्रिया की संरचना के अधिकतम अनुरूप है, जिसमें निम्न संक्रियाएं शामिल है : सामग्री के स्वरूप की सामान्य समझ, अलग-अलग समूहों का निर्धारण और पहले अंतरासमूह और फिर अंतर्समूह संबंधों की स्थापना

सामग्री को पुनर्प्रस्तुत करने की योग्यता उसके अनिवार्यतः लंबे समय तक याद रहने की परिचायक नहीं होती। अतः शिक्षक को हमेशा सामग्री की कई-कई बार आवृति ( repetition ) करवानी चाहिए, ताकि वह छात्र को अच्छी तरह याद हो जाए। किंतु यह भी याद रखा जाना चाहिए कि दोहराना तभी फलप्रद हो सकता है, जब वह सोद्देश्य, सार्थक और सक्रिय हो। अन्यथा वह रटकर याद कर लेने की ओर ले जाएगा। इसलिए पुनरावृत्ति की सर्वोत्तम प्रणाली यह है कि आत्मसात्कृत सामग्री को छात्र की सक्रियता में शामिल कर दिया जाए।

प्रयोगात्मक शिक्षण के अनुभवों ने दिखाया है कि यदि पाठ्यक्रम-सामग्री को कार्यभारों की एक सुविचारित पद्धति में व्यवस्थित कर दिया जाए, जिसमें हर चरण पूर्ववर्ती चरण पर आधारित होता है, तो सारी महत्त्वपूर्ण सामग्री अपने को छात्र की सक्रियता में अनिवार्यतः दोहराएगी, जिसमें छात्र का उससे हर स्तर पर और अलग-अलग संदर्भों में बार-बार सामना होगा। ऐसी परिस्थितियों में छात्र आवश्यक जानकारी को याद किये बिना भी, यानि अनैच्छिक रूप से आत्मसात् कर लेते हैं। नयी जानकारी में विलयित ( merged ) होकर पहले का आत्मसात्कृत ज्ञान न केवल दोहराया और अद्यतन ( updated ) बनाया जाता है, बल्कि एक नये परिप्रेक्ष्य ( perspective ) में रखे जाकर तथा एक और आयाम ( dimension ) ग्रहण करके गुणात्मकतः ( qualitatively ) बदल जाता है

ज्ञान के आत्मसात्करण में ऐच्छिक और अनैच्छिक स्मरण

शिक्षण में ऐच्छिक ही नहीं, अनैच्छिक स्मरण पर भी जोर दिया जाना चाहिए। तुलनात्मक अध्ययनों से छात्रों द्वारा नये ज्ञान के आत्मसात्करण में उनका स्थान व भूमिका प्रकट हुए हैं और वे परिस्थितियां मालूम की गयी हैं, जिनमें वे सबसे अधिक कारगर सिद्ध होते हैं।

वस्तुओं के वर्गीकरण की प्रक्रिया में, यानि सक्रिय मानसिक क्रिया के दौरान उन वस्तुओं के अनैच्छिक स्मरण ने, सामग्री के केवल प्रत्यक्ष पर आधारित ऐच्छिक स्मरण की तुलना में बेहतर परिणाम दिये। इसी प्रकार जब विद्यार्थी एक अपेक्षाकृत कठिन टेक्स्ट की योजना बना रहे थे, ताकि उसकी अंतर्वस्तु को समझ लिया जाए, तो उन्होंने केवल साधारण पठन पर आधारित ऐच्छिक स्मरण की तुलना में बेहतर परिणाम दिखाए। अतः जब अनैच्छिक स्मरण सामग्री के संसाधन की सार्थक तथा सक्रिय प्रणाली पर आधारित होता है, तो वह ऐच्छिक स्मरण की तुलना में ज़्यादा कारगर और उत्पादक पाया जाता है, यदि यह ऐच्छिक स्मरण भी ऐसी ही प्रणालियों पर आधारित न रहा हो।

जब एक ही जैसी सामग्री-संसाधन प्रणालियां प्रयोग में लाई जाती हैं ( जैसे, उदाहरण के लिए, सामग्री का वर्गीकरण ) तब आरंभ में अनैच्छिक स्मरण ( आरंभिक स्कूली अवस्था में ) अधिक उत्पादक होता है, किंतु बाद में शनैः शनैः अपनी उत्कृष्टता खो देता है और वयस्कों के मामले में तो ऐच्छिक स्मरण ही अधिक फलदायी होता है। अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मरण की प्रभाविता में इन परिवर्तनों का कारण, संज्ञानात्मक और स्मृतिक क्रियाओं के बीच उनके निर्माण की प्रक्रिया में बननेवाले जटिल संबंध होते हैं। स्मृतिक क्रिया, संज्ञानात्मक क्रिया के आधार पर बनकर उसके पीछे रहती है। वर्गीकरण एक संज्ञानात्मक प्रक्रिया के तौर पर जब विकास के पर्याप्त ऊंचे स्तर पर पहुंचता है, तो स्मरण में सहायक बन सकता है। वास्तव में सामग्री का वर्गीकरण करना सीखने के बाद ही मनुष्य इस मानसिक क्रिया को स्वैच्छिक स्मरण की एक प्रणाली के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

अनैच्छिक स्मरण अधिकतम फलदायी तब होता है, जब छात्र कोई संज्ञानात्मक ( cognitive ) कार्य संपन्न करते हैं, यानि जब सामग्री के विशद ह्रदयंगमन की आवश्यकता होती है। इसका कारण यह है कि ह्रदयंगमन की प्रक्रिया और स्मरणात्मक कार्यभार ( assignment ) को साथ-साथ संपन्न करना कठिन या सर्वथा असंभव है। इसके विपरीत ऐच्छिक स्मरण सर्वाधिक परिणामदायी तब होता है, जब सामग्री के ह्रदयंगमन की तुलना में पूरी तरह स्मरणात्मक कार्यभार की पूर्ती को प्राथमिकता दी जाती है। अतः नयी सामग्री का अध्ययन करते समय अनैच्छिक स्मरण पर ज़ोर देना चाहिए और स्मरणात्मक कार्यभार को उसके स्थायीकरण के चरण में ही निर्धारित कर देना चाहिए। इस प्रकार छात्रों की स्मृति-प्रक्रियाओं पर शिक्षक के नियंत्रण की कारगरता काफ़ी हद तक संज्ञानात्मक और स्मरणात्मक कार्यभारों के निर्धारण ( determination ) तथा विभेदन ( discrimination ) पर निर्भर होता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में अनैच्छिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम ऐच्छिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक स्मरण – १
( voluntary memorization )

ऐच्छिक स्मरण ( voluntary memorization ) किसी वस्तु को स्मृति में अंकित कर लेने की ओर लक्षित विशेष स्मृतिक क्रियाओं का उत्पाद है। इन क्रियाओं की उत्पादकता लक्ष्यों, अभिप्रेरकों और लक्ष्य-प्राप्ति के साधनों की विशिष्टता पर भी निर्भर होती है। विशेष अध्ययनों ने दिखाया है कि ऐच्छिक स्मरण की एक मुख्य पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) सामग्री को सही-सही, पूर्णतः और समुचित क्रम में याद कर लेने के कार्यभार ( assignment ) का स्पष्ट निर्धारण है। विभिन्न स्मरणात्मक लक्ष्य, स्मरण की प्रक्रिया के स्वरूप तथा उचित प्रणालियों के चयन को प्रभावित करते है और इसीलिए प्राप्त परिणामों को भी प्रभावित करते हैं।

एक प्रयोग में छात्रों से दो कहानियां याद कर लेने को कहा गया। उन्हें बताया गया कि पहली कहानी अगले दिन पूछी जाएगी और दूसरी लंबे समय तक याद रखनी होगी। वास्तव में दोनों कहानियां चार सप्ताह बाद पूछी गईं। पाया गया कि दूसरी कहानी, पहली कहानी की अपेक्षा बेहतर याद रही। विदित है कि केवल परीक्षा पास करने के लिए याद की गई सामग्री, दॄढ़ और दीर्घकालिक धारण के लक्ष्य के अभाव में बहुत जल्दी ही भूल जाती है।

इस तरह स्मरणात्मक कार्यभार की भूमिका को, याद करने के इरादे तक ही सीमित नहीं किया जा सकता। विभिन्न स्मरणात्मक कार्यभार सामग्री, उसकी अंतर्वस्तु, संरचना, भाषागत रूप, आदि के प्रति विभिन्न रवैये पैदा करते हैं और इस तरह से स्मरण की यथानुरूप प्रणालियां तय कर देते हैं।

स्मरण के अभिप्रेरक ( motivational ), ऐच्छिक स्मरण की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। छात्र ह्रदयगंम और याद कर ली गई सामग्री को बहुत जल्दी भूल भी सकते हैं, यदि वह उनके लिए दीर्घकालिक महत्त्व की नहीं है। जिन लोगों में कर्तव्य और उत्तरदायित्व की भावना कम होती है, वे अवश्य याद रखी जानेवाली चीज़ों में से प्रायः बहुत कुछ को भूल जाते हैं।

फलप्रद ऐच्छिक स्मरण की सबसे मुख्य शर्त, युक्तिसंगत ( rationalize ) स्मरण तकनीकों ( memorization techniques ) का समुचित प्रयोग है। ज्ञान तथ्यों, संकल्पनाओं और निर्णयों की एक निश्चित पद्धति है। उन्हें याद करने के लिए यह आवश्यक है कि हम कुछ शब्दार्थ इकाइयों को अलग कर लें, उनके बीच संबंध कायम करें और चिंतन की कमोबेश विकसित प्रक्रियाओं से जुड़ी तार्किक प्रणालियां इस्तेमाल करें। समझ तार्किक, सचेत स्मरण की आवश्यक शर्त है। सामग्री को यदि समझ लिया गया है, तो वह अधिक सहजता से याद हो जाती है और स्मृति में अधिक देर तक सुरक्षित रहती है, क्योंकि वह पहले से आत्मसात्कृत ज्ञान से, मनुष्य के विगत अनुभव से सार्थक रूप से जुड़ गई होती है। इसके विपरीत अस्पष्ट या न समझी गई सामग्री सदा एक ऐसी चीज़ होती है कि जो मनुष्य की चेतना की अंतर्वस्तु से अलग है और उसके विगत अनुभव से कोई ठोस संबंध नहीं रखती। सामग्री यदि समझ में नहीं आती, तो मनुष्य आम तौर पर उसमें विशेष रुचि नहीं दिखाता

तार्किक स्मरण की एक मुख्य प्रणाली याद की जानेवाली सामग्री की योजना बनाना है। इसमें तीन चरण होते हैं : सामग्री को घटकों ( ingredients ) में बांटना ; उन्हें उपयुक्त शीर्षों ( headings ) के अंतर्गत वर्गीकृत करना अथवा किसी दिये हुए भाग को सारी अंतर्वस्तु से आसानी से संबद्ध कुछ आधारभूत मुद्दों के गिर्द व्यवस्थित करना ; और आधारभूत मुद्दों को साहचर्यों की एक अविभाज्य श्रृंखला में जोड़ना। अलग-अलग विचारों और प्रस्थापनाओं का शब्दार्थमूलक घटकों में समेकन, सामग्री की कुल मात्रा में कमी किये बिना, याद की जानेवाली इकाइयों की संख्या घटा देता है। सामग्री को याद करना इसलिए भी आसान हो जाता है कि योजना सामग्री को एक सुव्यवस्थित और सुविभाजित रूप दे देती है और इस तरह वह पढ़ने के चरण में ही समझ में आ जाने योग्य बन जाती है।

सामग्री के स्मरण के लिए, समझने में मदद करनेवाली योजना के विपरीत निर्मित योजना सभी छोटे मुद्दों को अलग-अलग कर देती है और शीर्ष ( headings ) केवल उसे दिखाते या याद दिलाते हैं जिसे पुनर्प्रस्तुत किया जाना है ( जिसकी वज़ह से वे प्रायः आंशिक या अधूरे होते हैं )।

तार्किक स्मरण के लिए तुलना ( comparison ) और विशेषतः वस्तुओं के बीच अंतरों ( differences ) पर दिये जाने वाले बल बहुत महत्त्व रखते हैं। वस्तुओं के बीच जितने ही स्पष्ट अंतर होंगे, स्मृति में वे उतनी ही जल्दी तथा दृढ़तापूर्वक अंकित हो जाएंगी। इस कारण शुरूआत सदा स्पष्ट अंतरोंवाली वस्तुओं की तुलना से करनी चाहिए और इसके बाद ही कम स्पष्ट ब्योरों पर आना चाहिए। इसी तरह, जब सामग्री का तार्किक संसाधन ( logical processing ) व्यापक बिंबमूलक संबंधों ( image-oriented relations ) के आधार पर किया जाता है, स्मरण अधिक सार्थक तथा दीर्घकालिक बन जाता है। अतः जहां भी संभव हो, स्मरण की जानेवाली सामग्री को समुचित बिंबों से संबद्ध किया जाना चाहिए।

स्मरण का एक मुख्य तरीक़ा सामग्री की पुनर्प्रस्तुति और अपने को सुनाना है। किंतु यह प्रणाली, सामग्री को ह्रदयंगम करने के बाद ही अपनानी चाहिए, ख़ास तौर पर यदि सामग्री दुर्बोध है। सामग्री को अपने शब्दों में दोहराने से उसे बेहतर समझने में मदद मिलती है। यदि सामग्री को ठीक से नहीं समझा गया है, तो यह उसे दोहराने में अटपटी, ‘परायी’ भाषा के इस्तेमाल में प्रकट हो जाता है। दूसरी ओर, यदि उसे समझ लिया गया है, तो उसे आसानी से ‘अपनी’ भाषा में ढ़ाल लिया जाता है। इस तरह से बोलकर सुनाकर हम अपनी कमजोरियां सामने लाते हैं और अपने पर नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं। यह पुनर्प्रस्तुति, प्रत्यास्मरण की योग्यता ही है जो हमें अपने ज्ञान के बारे में आवश्यक आत्म-विश्वास प्रदान करती है


अगली बार भी ऐच्छिक स्मरण पर ही चर्चा जारी रहेगी।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

अनैच्छिक स्मरण ( involuntary memorization )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण पर विचार किया था, इस बार हम अनैच्छिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अनैच्छिक स्मरण
( involuntary memorization )

सक्रियता, जिसमें की स्मरण की प्रक्रियाएं भी शामिल हैं, के लक्ष्यों के अनुसार हम स्मरण के दो मुख्य रूपों में भेद कर सकते हैं : अनैच्छिक स्मरण और ऐच्छिक स्मरण

अनैच्छिक स्मरण ( involuntary memorization ) संज्ञानात्मक ( cognitive ) और व्यावहारिक क्रियाओं का उत्पाद और उनके निष्पादन ( execution ) की पूर्वापेक्षा ( prerequisites )  है। चूंकि स्वयं स्मरण हमारा लक्ष्य नहीं होता, इसलिए हमें लगता है कि वह एक स्वतःस्फूर्त क्रिया है। किंतु वास्तव में यह हमारी सक्रियता की विशिष्टताओं द्वारा निर्धारित एक अत्यंत व्यवस्थित प्रक्रिया है। अनुसंधान दिखाते हैं कि अनैच्छिक स्मरण की परिणामदायिता काफ़ी हद तक कर्ता की सक्रियता के लिए सामग्री के महत्त्व पर निर्भर होती है। यदि सामग्री, कर्ता की सक्रियता के लक्ष्य का अभिन्न हिस्सा है, तो वह मस्तिष्क ( स्मृति ) में उस स्थिति की तुलना में कि जब वह इस लक्ष्य की प्राप्ति की परिस्थितियों या प्रणालियों से जुड़ी होती है, कहीं आसानी से अंकित हो जाती है

एक प्रयोग-श्रृंखला में दूसरी कक्षा के बच्चों और कॉलेज के छात्रों को पांच साधारण सवाल करने को दिये गये। बाद में अप्रत्याशित रूप से दोनों समूहों से सवालों की शर्तों और उनमें जो संख्याएं दी हुई थीं, उनका प्रत्यास्मरण करने को कहा गया। पाया गया कि दूसरी कक्षा के बच्चों को कॉलेज के छात्रों से तिगुनी ज़्यादा संख्याएं याद रह सकीं। इसका सीधा-सीधा कारण यह था कि वे अभी यंत्रवत जोड़-घटाव करना नहीं जानते थे और सवाल हल करना उनके लिए एक सार्थक सोद्देश्य क्रिया थी।

दूसरी कक्षा के बच्चों के विपरीत, जिनके लिए संख्याओं के साथ संक्रियाएं करना उनका लक्ष्य था, कॉलेज के छात्रों ने उसे प्रणाली में शामिल किया, यानि महत्त्व की दृष्टि से उसे गौण माना।

मनुष्य की सक्रियता में विभिन्न भूमिकाएं अदा करनेवाली सामग्री उसके लिए विभिन्न महत्त्व रखती है और इसलिए उसके प्रति उसके रवैये भी अलग-अलग होते हैं तथा उसका प्रबलन ( reinforcement ) भी वह अलग-अलग ढ़ंग से करता है। मुख्य लक्ष्य की अंतर्वस्तु अधिक सक्रिय रवैये का तकाज़ा करती है और सक्रियता के प्राप्त कर लिए गए लक्ष्य के रूप में अधिक प्रबलन पाती है। स्वभाविकतः वह मनुष्य की स्मृति में अधिक आसानी से घुस जाती है और लक्ष्य-प्राप्ति की परिस्थितियों से संबंधित सामग्री की तुलना में अधिक मज़बूती से वहां जमी रहती है।

यह भी दिखाया गया है कि लक्ष्यसापेक्ष सामग्री में स्थापित होनेवाले संबंध जितने ही सारगर्भित होंगे, वह उतने ही बेहतर ढंग से याद होगी और ज़्यादा देर तक स्मृति में बनी रहेगी

छात्रों को ह्र्दयंगम करने के लिए दिये गए टेक्स्टों के अनैच्छिक स्मरण से संबंधित अनुसंधानों ने दिखाया है कि मध्यम कठिनाई का टेक्स्ट, बहुत आसान टेक्स्ट की तुलना में जल्दी याद हो जाता है। जहां तक कठिन टेक्स्ट का सवाल है, तो वह भी आसानी से स्मरण हो जाता है, यदि उसके विश्लेषण की अधिक सक्रिय प्रणालियां इस्तेमाल की जाएं।

इस तरह जिस सामग्री के लिए सक्रिय बौद्धिक प्रयास ( active mental efforts ) की आवश्यकता होती है, उस सामग्री का अनैच्छिक स्मरण अधिक आसान होता है

सर्वविदित है कि हम अनजाने में वही चीज़ें अच्छी तरह और पूरी तरह, कभी-कभी तो जीवनभर के लिए, अपनी स्मृति में अंकित करते हैं, जो हमारे लिए अतिशय महत्त्व रखती हैं और हमारी रुचि तथा संवेग जगाती हैं। हम अपने कार्य की अंतर्वस्तु में जितनी ही गहरी रुचि लेंगे, अनैच्छिक स्मरण उतना ही अधिक कारगर होगा। यदि छात्र को पाठ रोचक लगता है, तो वह उसकी अंतर्वस्तु आसानी से याद कर लेगा। ऐसा तब नहीं होता, जब छात्र शिष्टतावश शिक्षक को सुनता है। प्रशिक्षण के दौरान अनैच्छिक स्मरण की शर्तों के एक विशेशः अध्ययन ने दिखाया है कि ऐसी एक शर्त, सीखने के लिए आंतरिक संज्ञानात्मक अभिप्रेरकों का निर्माण है। वांछित लक्ष्य अध्ययन के उद्देश्यों की एक ऐसी पद्धति विकसित करके पाया जा सकता है, जिसमें हर उपलब्धि अगली उपलब्धि की प्राप्ति का एक अनिवार्य साधन होती है।


अगली बार ऐच्छिक स्मरण पर चर्चा होगी।
इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मरण पर विचार शुरू किया था, इस बार हम अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण
( short-term and long-term memorization )

अल्पकालिक स्मरण क्या है? यदि हमें कुछे बेतरतीब संख्याएं, अक्षर या शब्द लिखाए जाते हैं और फिर इसके तुरंत बाद ही उन्हें काग़ज़ पर देखे बिना दोहराने को कहा जाता है, तो हम यह शायद बिना किसी विशेष कठिनाई के कर देंगे। पर अगर यही काम हमसे कुछ समय बाद करने को कहा जाए, तो हम नहीं कर पाएंगे। यह अल्पकालिक स्मरण ( short-term memorization ) की मिसाल है। उन संख्याओं, अक्षरों या शब्दों को दीर्घकाल तक याद रखने के लिए हमें उन्हें कई बार दोहराना होगा और शायद कुछ विशेष तकनीकें भी इस्तेमाल करनी होंगी ( उदाहरण के लिए, पहले से याद सामग्री के साथ उनके बीच संबंध स्थापित करना, अक्षरों को जोड़कर शब्द बनाना, शब्दों को जोड़कर कृत्रिम वाक्य बनाना, आदि )। यह दीर्घकालिक स्मरण ( long-term memorization ) होगा।

‘अल्पकालिक स्मरण’ नाम ही दिखाता है कि यह वर्गीकरण काल पर आधारित है, फिर भी स्मृति की परिघटना को समझने के लिए, काल का यह प्राचल ( parameter ) महत्त्वपूर्ण होने पर भी, अल्पकालिक स्मरण की विशद व्याख्या के लिए पर्याप्त नहीं है। वास्तव में स्मृति की प्रक्रियाओं के विश्लेषण को स्मृति की विभिन्न कालगत परिस्थितियों में मनुष्य की सक्रियता के स्वरूप पर निर्भरता को स्पष्ट करना चाहिए। यह सिद्ध किया जा चुका है कि स्मरण का नियंत्रण ऊपर से निर्धारित, यानि स्मरण की जानेवाली सामग्री के प्रति मनुष्य की सक्रियता के स्वरूप द्वारा नियत कार्यक्रम से होता है

हाल तक अल्पकालिक स्मरण विषयक अनुसंधानों का संबंध मुख्यतः दो कारकों के रूपांतरों से था, स्मरण के लिए उपलब्ध समय ( उद्‍भासन अवधि ) और स्मरण की जानेवाली सामग्री। प्रयोगाधीन व्यक्ति की सक्रियता का लक्ष्य अपरिवर्तित रहा, क्योंकि उसके सामने सदा स्मरण का कार्यभार रखा गया। अतः स्वाभाविक ही है कि दत्त उद्‍भासन अवधि ( exposure period ) में स्मरण की मात्रा स्थिर रहती थी। नवीनतम तथ्य दिखाते हैं कि संज्ञान तथा स्मरण से संबंधित विभिन्न कार्यभार, अल्पकालिक स्मरण की उत्पादिता ( productivity ) पर विभिन्न प्रभाव ड़ालते हैं। ये तथ्य इसके साक्षी हैं कि अल्पकालिक स्मरण, उद्‍भासित सामग्री ( exposed content ) की मनुष्य के मस्तिष्क पर प्रत्यक्ष छाप मात्र नहीं है।

पाया गया है कि क्षणिक उद्‍भासन ( momentary or transient exposure ) की परिस्थितियों में केवल वे कार्यभार उत्पादक सिद्ध होते हैं, जिनकी पूर्ति के लिए रटने का सहारा लिया जाता है। दूसरी ओर, जिन कार्यभारों के लिए सामग्री के सर्वतोमुखी संसाधन ( versatile processing ) की ज़रूरत पड़ती है, वे अल्पकालिक उ‍द्‍भासन की परिस्थितियों में किये जानेवाले स्मरण की प्रभाविता घटा देते हैं। अतः अल्पकालिक स्मरण को एक ऐसी प्रक्रिया कहा जा सकता है, जो मनुष्य की सक्रियता की ऐसी कालगत सीमाओं में संपन्न होती है, जिनमें उद्‍भासित सामग्री का केवल स्वचालित संसाधन किया जा सकता है

तथाकथित संक्रियात्मक स्मरण को अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरणों के बीच का एक स्तर कहा जा सकता है। वह स्मृति की ऐसी प्रक्रिया है, जो मनुष्य की वर्तमान क्रियाओं में सहायक बनती है और दत्त क्रिया के दायरे में हर निश्चित संक्रिया का परिणाम पाने की एक पूर्वशर्त है। जांचों से पता चला है कि संक्रियात्मक स्मृति की मात्रा, यथातथ्यता ( preciseness ), अस्थिरता, आदि विशेषताएं, एक ओर, सक्रियता की अंतर्वस्तु तथा संरचना द्वारा और, दूसरी ओर, उसके विकास की मात्रा द्वारा निर्धारित होते हैं।

अतः संक्रियात्मक स्मृति की कारगरता और वह जिस सक्रियता में सहायक बनती है, उसकी सफलता काफ़ी हद तक स्मृति की संक्रियात्मक इकाइयों, यानि क्रिया के लक्ष्य की प्रप्ति के दौरान स्मृति द्वारा धारित सामग्री की मात्रा पर निर्भर करती है। संक्रियात्मक इकाइयों के विभिन्न स्तर हो सकते हैं। संक्रियात्मक स्मृति की और वह जिस सक्रियता में काम आती है, उसकी उत्पादकता बढ़ाने का तरीक़ा इष्टतम संक्रियात्मक इकाइयों का निर्माण है।

सूचना संक्रियात्मक स्मरण के स्तर पर अल्पकालिक स्मृति से दीर्घकालिक स्मृति में संक्रमण करती है। उदाहरण के लिए, कोई सुगठित पाठ पढ़ते हुए हमें अक्षरों के जुड़कर शब्द बनने से पहले उन अक्षरों के महत्त्व और शब्दों के जुड़कर वाक्य बनने से पहले उन शब्दों के अर्थों को अवश्य याद रखना चाहिए। यही क्रम आगे भी जारी रहता है। इनमें से प्रत्येक संक्रिया के पूरा कर लिये जाने के बाद संबंधित ठोस अर्थ भुला दिये जाते हैं ( उदाहरण के लिए, हम याद नहीं रखते कि पिछले पन्ने के तीसरे पैराग्राफ़ के दूसरे वाक्य का पहला शब्द क्या था )। किंतु यदि हम मध्यवर्ती संक्रियाओं में ‘संसाधित’ ( processed )  सारी सामग्री को भूल जाते हैं, तो हम एक क्रिया के बाद अगली क्रिया नहीं कर पाएंगे। हर उच्चतर स्तर पर, उत्तरोत्तर अधिक सामान्य अर्थ अंतरित किये जाते हैं, जो शब्दार्थक फ़िल्टरों की पद्धति से गुज़ारे गए विशिष्ट अर्थों को एक सूत्र में पिरोते हैं।

दीर्घकालिक स्मृति सामयिक महत्त्व की सूचना नहीं, वरन् दूरगामी महत्त्व की सूचना ग्रहण करती है, जिसकी मनुष्य के जीवनावश्यक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यकता होती है। मनुष्य की सक्रियता का सहज उत्पाद होने के कारण दीर्घकालिक स्मृति मनुष्य की क्रियाओं की सहगामी छाप ही नहीं है, बल्कि मुख्य रूप से इस छाप की एक अनिवार्य आंतरिक शर्त भी है। दूसरे शब्दों में कहें, तो किसी भी सामग्री का स्मरण पूर्ववर्ती क्रिया का उत्पाद है और इसके साथ ही अगली क्रिया के निष्पादन की शर्त भी है तथा साधन भी है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

स्मरण ( memorization )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति की प्रक्रियाओं पर विचार किया था, इस बार हम स्मरण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


स्मरण
( memorization )

स्मरण स्मृति की वह प्रक्रिया है, जिसमें नयी सामग्री को पहले के ज्ञान तथा अनुभव से जोड़कर उसका ( नयी सामग्री का ) स्थायीकरण किया जाता है। मनुष्य के अनुभव को नये ज्ञान और व्यवहार के नये रूपों से संपुष्ट बनाने की यह एक आवश्यक शर्त है। स्मरण हमेशा चयनात्मक ( selective ) होता है : हमें उसका थोड़ा-सा ही हिस्सा याद रहता है, जो हमारी ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करता है। इस चयनात्मकता का आधार क्या है?

स्मरण और क्रिया

प्रयोगों ने दिखाया है कि सामान्यतः स्मरण और विशेषतः अनैच्छिक स्मरण वस्तु के संबंध में मनुष्य की क्रियाओं के सहज उत्पाद होते हैं।

एक प्रयोग में कुछ छात्रों से विभिन्न वस्तुओं के चित्रों का वर्गीकरण करने को कहा गया। हर चित्र को एक निश्चित क्रमांक भी दिया गया था। प्रयोग के बाद छात्रों से पूछा गया कि चित्रों में उन्होंने क्या देखा था। पता चला कि उन्हें वस्तुएं तो ठीक याद रहीं, किंतु क्रमांकों को उन्होंने लगभग अनदेखा कर दिया था ( कुछ ने तो कहा कि उन्होंने क्रमांक देखे ही नहीं)। दूसरे प्रयोग में उन्हें चित्रों को उनके आकार तथा क्रमांक के अनुसार आरोही क्रम में रखना था। इस बार परिणाम बिल्कुल विपरीत रहा : क्रमांक तो याद कर लिये गये थे, जबकि वस्तुओं को लगभग पूरी तरह अनदेखा कर दिया गया था।

इस तरह मनुष्य अपनी स्मृति में केवल उसी चीज़ को अंकित करता है, जो उसकी सक्रियता से संबंध रखती है। व्यावहारिक और श्रम संबंधी क्रियाओंवाले प्रयोगों से भी यही नियमसंगति प्रकट हुई।

उपरोक्त तथ्य दिखाते हैं कि घटनाओं ( चित्रों, क्रमांकों ) की साधारण संलग्नता ( involvement ) ही मनुष्य द्वारा उन्हें याद करने के लिए जाने के लिए पर्याप्त नहीं है। सब कुछ इस बात पत निर्भर होता है कि मनुष्य दत्त सामग्री का क्या कर रहा है। स्वभाविकतः सक्रियता की बाह्य परिस्थितियां समान होने से अलग-अलग व्यक्तियों के मामले में स्मरण के परिणाम समान नहीं होंगे, क्योंकि इन परिस्थितियों और स्मरण की प्रक्रिया के बीच में हमेशा मनुष्य का विगत अनुभव और उसकी वैयक्तिकता ( individuality ) मौजूद रहते हैं। किंतु इस तरह के भेद, मनुष्य की हर क्रिया को उसकी व्यक्तिगत परिस्थितियों के संदर्भ में, यानि उसके अभिप्रेरकों, लक्ष्यों तथा उनकी प्राप्ति के तरीक़ों की विशिष्टता के संदर्भ में देखने की आवश्यकता पर ही ज़ोर देते हैं।

स्मरण की प्रक्रिया के प्राचल ( parameter ) मनुष्य की सक्रियता के अभिप्रेरकों, लक्ष्यों तथा तरीक़ों से निर्धारित होते हैं। स्मृति की सक्रियतासापेक्ष संकल्पना ( activity-related concept of memory ) का यही सारतत्व है और स्मृति संबंधी सभी अनुसंधानों में इस तथ्य को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह संकल्पना स्मरण की प्रक्रिया के सभी रूपों तथा आरंभिक स्तर, यानि अल्पकालिक स्मरण ( short-term memorization ) समेत सभी चरणों के लक्षण-वर्णन के लिए सही परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है।

अगली बार हम अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मरण पर चर्चा जारी रखेंगे।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

स्मृति की प्रक्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में लक्ष्य और धारण अवधि के अनुसार स्मृति के भेदों पर विचार किया था, इस बार हम स्मृति की प्रक्रियाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


स्मृति की प्रक्रियाएं
( memory processes )

जब हम स्मृति को किसी शीर्ष के अंतर्गत वर्गीकृत करते हैं, तो हम स्मृति के निश्चित स्थिर गुणधर्मों और पहलुओं को इसके लिए आधार बनाते हैं, चाहे सक्रियता में उनकी भूमिका सामग्री के स्थायीकरण ( स्मरण ), धारण या प्रत्यास्मरण ( पुनर्प्रस्तुति ) में से कोई भी क्यों न हो। वहीं स्मृति की प्रक्रियाओं के वर्गीकरण के लिए मनुष्य के जीवन और सक्रियता में स्मृति द्वारा संपन्न किये जानेवाले प्रकार्यों ( functions ) को कसौटी बनाया जाता है। स्मृति की प्रक्रियाएं निम्न हैं : सामग्री का स्मरण ( memorization) ( याद करना, स्मृति में अंकन अथवा स्थायीकरण करना ), पुनर्प्रस्तुति ( retrieval, recall ) ( प्रत्यास्मरण, नवीकरण ), धारण ( hold )( याद रखे रहना ) और विस्मरण ( oblivion ) ( भुला देना )। उपरोक्त प्रक्रियाएं स्पष्टतः दिखाती हैं कि स्मृति सक्रियता से घनिष्ठतः संबद्ध है और उसकी क्रियाएं स्वतंत्र क्रियाओं के रूप में संपन्न होती हैं।

स्मृति की विभिन्न प्रक्रियाओं की तुलना उनके प्रकटतः विरोधी प्रकार्यों को तुरंत स्पष्ट कर देती हैं। फिर भी इन प्रक्रियाओं को उनकी एकता में देखा जाना चाहिए। उनकी यह एकता उनके स्पष्ट बाह्य संबंध और अन्योन्यनिर्भरता ( mutual dependence ) में ही नहीं दिखाई देती ( उदाहरण के लिए, पुनर्प्रस्तुति संबंधी विशेषताएं काफ़ी हद तक सामग्री के स्मरण, धारण और विस्मरण के विशिष्ट स्वरूप से निर्धारित होती हैं ), बल्कि उसे विभिन्न प्रक्रियाओं की परस्पर-व्याप्ति ( mutually penetrant ) तथा एक प्रक्रिया के दूसरी प्रक्रिया में द्वंद्वात्मक संक्रमण ( dialectical transition ) जैसे संबंधों में भी देखा जा सकता है।

नवीकरण ( renewal ) की प्रक्रिया सामग्री का स्वचालित पठन मात्र नहीं है, अपितु सामग्री का सचेतन गठन और यहां तक कि पुनर्गठन भी है। इसलिए पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रिया में अनिवार्यतः अल्पकालिक स्मरण और धारण की प्रक्रियाएं भी शामिल रहती हैं। इतना ही नहीं, पुनर्प्रस्तुति की प्रक्रिया सदा दीर्घकालिक स्मरण के साथ चलती है। सामग्री का सारकथन वास्तव में उसकी पुनर्प्रस्तुति ही है, हालांकि यह इसके सीखने की एक प्रक्रिया भी है।

धारण और विस्मरण की प्रक्रियाओं का एक ही ढंग से विश्लेषण किया जा सकता है, बेशक हम उन्हें प्रक्रियाओं के तौर पर लें। इस तरह धारण को स्मृति में संचित सामग्री के मनुष्य की सक्रियता में भाग लेने का कार्य समझा जा सकता है। यह सहभागिता अचेतन हो सकती है, किंतु मनुष्य की हर क्रिया हमेशा उसके जीवन के अनुभव से प्रभावित होती है। इस दृष्टि से सामग्री के किसी अंश को भूलने का मतलब, उसका मनुष्य की सक्रियता से हट जाना है। दूसरे शब्दों में, विस्मरण कभी पूर्ण नहीं होता। मनोवैज्ञानिकतः इसका मतलब यही है कि मस्तिष्क में स्थित किसी सामग्री को अल्पकालिक स्मृति के क्षेत्र में अंतरित करने में कठिनाई पैदा हुई है ( या यह असंभव बन गया है )। सामान्य भाषा में हम भूलने की अवधारणा को इस विस्मृति की मात्रा के अर्थ में ही इस्तेमाल करते हैं। फिर भी एक प्रक्रिया के रूप में विस्मरण मूलतः तब शुरू होता है, जब कर्ता का ध्यान किसी अन्य वस्तु की ओर हट जाता है। वस्तु ‘क’ से कर्ता के ध्यान का हटकर वस्यु ‘ख’ पर टिकने का मतलब एक तरह से वस्तु ‘क’ को भूलना है।

हम इसलिए न सिर्फ़ उसे भूल जाते हैं जिसे पुनर्प्रस्तुत करना कठिन या असंभव है, बल्कि अपने अनुभव की उस अंतर्वस्तु ( content ) को भी विस्मृत कर डालते हैं, जो दत्त क्षण में हमारी चेतना में नहीं है या जिसका हमें अहसास नहीं है। इस तरह विस्मरण, स्मृति की प्रक्रियाओं समेत सभी मानसिक प्रक्रियाओं का एक पहलू है। किसी वस्तु पर चेतना के टिकने की प्रक्रिया के तौर पर स्मरण में भी अनिवार्यतः किसी सामग्री का अस्थायी विस्मरण शामिल रहता है। यह परस्पर-विपरीत स्मृति-प्रक्रियाओं की एकता की एक अभिव्यक्ति है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि स्मृति एक अत्यंत जटिल, किंतु समेकित ( consolidated ) तथा अविच्छिन्न प्रक्रिया है। चेतना की ऐसी कोई अवस्था नहीं है कि जिसमें स्मृति की कोई न कोई भूमिका न हो।

स्मृति की प्रक्रियाएं, मनुष्य की सक्रियता और उसकी निश्चित लक्ष्यों के प्रति अभिमुखता ( orientation ) पर निर्भर होती हैं। अलग-अलग स्मृति-प्रक्रियाओं के साधारण विश्लेषण में हम उनके जटिल द्वंद्वात्मक संबंधों को अनदेखा कर देते हैं और किसी एक प्रक्रिया को समग्रता में समझने के लिए उसके मुख्य लक्षणों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं।

हम इसी पद्धति से स्मृति की एक प्रक्रिया स्मरण की अगली बार से थोड़ा विस्तार से विवेचना करेंगे।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

लक्ष्य और धारण अवधि के अनुसार स्मृतियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में स्मृति के भेदों पर विचार शुरू किया था, इस बार हम लक्ष्य और धारण अवधि के अनुसार स्मृति के भेदों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मृति
( involuntary and voluntary memory )

पिछली बार हमने स्मृति की जिन विशेषताओं की चर्चा की, वे सक्रियता के दौरान विकसित होती हैं और स्मृति का अभिन्न अंग बन जाती हैं। पैदा हो जाने के बाद वे अपने को सक्रियता से, उसके बदलते हुए अभिप्रेरकों, लक्ष्यों तथा प्रणालियों से स्वतंत्र रूप से भी व्यक्त कर सकती हैं। किंतु स्मृति का वर्गीकरण मनुष्य की तात्कालिक सक्रियता के विशिष्ट लक्षणों को ध्यान में रखकर भी किया जा सकता है। इस तरह सक्रियता के लक्ष्य के अनुसार हम अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मृतियों में भेद करते हैं।

अनैच्छिक स्मृति में कोई चीज़ याद कर लेने अथवा स्मृति से पुनर्प्रस्तुत करने के विशेष उद्देश्य का अभाव होता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य अपने लिए कोई सामग्री याद कर लेने का लक्ष्य नियत करता है, तो हम इसे ऐच्छिक स्मृति कहते हैं। ऐच्छिक स्मृति के मामले में याद करना और पुनर्प्रस्तुत करना विशेष स्मरण-क्रियाओं ( memorizing actions ) का रूप लेते हैं।

अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मृतियां स्मृति के विकास के दो क्रमिक चरण हैं। अपने अनुभव से अनैच्छिक स्मृति के महत्त्व को हर कोई जानता है। इस स्मृति के लिए किन्हीं इरादों या प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती, फिर भी हमारे अधिकांश अनुभव का आधार वही होती है। किंतु बहुत बार मनुष्य के सामने ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसमें उसे अपनी स्मृति का नियंत्रण करना पड़ता है। ऐसे मामलों में वह मुख्यतः अपनी ऐच्छिक स्मृति का सहारा लेता है, जो उसे आवश्यक सामग्री याद कर लेने या उसे पुनर्प्रस्तुत करने की संभावना देती है।

अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृति
( short-term and long-term memory )
संक्रियात्मक स्मृति

कोई भी सामग्री स्मृति में तभी धारण की जा सकती है, जब उसका कर्ता द्वारा समुचित संसाधन ( processing ) कर लिया गया हो। ऐसे संसाधन के लिए कुछ समय की आवश्यकता होती है, जिसे छाप स्थायीकरण काल ( imprint settling time ) कहा जाता है। आत्मपरक दृष्टि से यह प्रक्रिया अभी-अभी हुई घटना की गूंज के रूप में अनुभव की जाती है, मनुष्य एक क्षण तक वह देखना, सुनना, वग़ैरह जारी रखता है, जिसे दत्त क्षण में वास्तव में नहीं देख रहा या नही सुन रहा होता है ( ‘ वह अभी भी मेरी आखों के सामने थी’. ‘ उसकी आवाज़ अभी भी मेरे कानों में गूंज रही थी’, वग़ैरह )। ये प्रक्रियाएं अस्थिर तथा क्षणिक होती हैं, फिर भी वे इतनी विशिष्ट और अनुभव-संचय के क्रियातंत्रों में उनकी भूमिका इतनी महत्त्वपूर्ण होती है कि मनोविज्ञानी उन्हें सूचना के स्मरण, धारण तथा पुनर्प्रस्तुति का एक विशेष प्रकार कहते हैं, जिसे अल्पकालिक स्मृति ( short-term memory ) नाम दिया गया है।

दीर्घकालिक स्मृति ( long-term memory ) के विपरीत, जिसक विशेषता सामग्री को अनेक बार दोहराकर तथा पुनर्प्रस्तुत करके लंबे समय तक याद रखना है, अल्पकालिक स्मृति में सामग्री को उसके केवल एक बार क्षणिक प्रत्यक्षण ( perception ) के बाद बहुत कम समय के लिए याद रखा जाता है और लगभग कुछ ही क्षण बाद उसे पुनर्प्रस्तुत करके भुला दिया जाता है। कई बार ‘अल्पकालिक स्मृति’ शब्द के स्थान पर अन्य पर्यायों का प्रयोग भी किया जाता है, जैसे ‘क्षणिक स्मृति’, ‘प्राथमिक स्मृति’, ‘प्रत्यक्ष स्मृति’, वग़ैरह।

कभी-कभी कहीं ‘संक्रियात्मक स्मृति’ पद का प्रयोग भी किया जाता है, जिसमें अल्पकालिक स्मृति के कालगत स्वरूप के बज़ाए उसके ‘कामकाजी’ स्वरूप पर जोर दिया जाता है। परंतु आजकल मनोविज्ञान में इस पद ने एक भिन्न अर्थ ग्रहण कर लिया है। उसमें इसे उन स्मरण-प्रक्रियाओं को इंगित करने के लिए प्रयोग किया जाता है, जो मनुष्य के कार्यों और संक्रियाओं के निष्पादन में प्रत्यक्षतः सहायक बनती हैं।

जब हम कोई जटिल संक्रिया करते हैं, जैसे अंकगणित का सवाल, तो हम उसे अलग टुकड़ों में और क्रमशः पूरा करते हैं। ऐसा करते हुए हम कुछः अंतर्वर्ती परिणामों को तब तक अपने मस्तिष्क में धारण किये रहते हैं, जब तक हमें पुनः उनकी जरूरत होती रहती है। जैसे-जैसे हम अंतिम परिणाम की ओर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे प्रयोग की जा चुकी अनावश्यक हो चुकी सामग्री को त्याग, यानि भुला दिया जाता है। ऐसा ही पढ़ते, नक़ल करते या किसी भी अन्य कमोबेश जटिल काम को करते हुए भी होता है। व्यक्ति द्वारा प्रयोग किये हुए सामग्री के अंश अलग-अलग हो सकते हैं ( बच्चा इसी तरह अलग-अलग अक्षरों को जोड़कर ही पढ़ना सीखता है )।

ऐसे अंशों अथवा स्मृति की संक्रियात्मक इकाइयों की मात्रा का मनुष्य द्वारा इस या उस कार्य के निष्पादन पर प्रभाव पड़ता है। इष्टतम संक्रियात्मक इकाइयों के निर्माण को महत्त्व इसी कारण दिया जाता है। संक्रियात्मक स्मृति की ऐसी अवधारणा अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृति से भिन्न है, हालांकि उनमें कई सामान्य लक्षण अवश्य पाये जाते हैं। संक्रियात्मक स्मृति अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृतियों से प्राप्त सामग्री से एक ‘कार्यसाधक मिश्रण’ बनाती है। जब तक उससे काम चलता है, तब तक उसे संक्रियात्मक स्मृति के क्षेत्र में शामिल किया जाता है।

स्मृति के वर्गीकरण के लिए प्रयुक्त कसौटियां मनुष्य की सक्रियता, जो एक एकात्मक समष्टि ( unitary totality ) है, के विभिन्न पहलुओं को प्रतिबिंबित करती हैं। ऐसी ही एकात्मता, स्मृति के इन पहलुओं से संबंधित भेदों में भी पाई जाती है। उदाहरण के लिए, किसी संकल्पना से संबंधित विचारों की स्मृति, वाचिक-तार्किक स्मृति होने के साथ-साथ ऐच्छिक या अनैच्छिक और अल्पकालिक या दीर्घकालिक स्मृति के रूप में भी वर्गीकृत की जा सकती है। ऐच्छिक और अनैच्छिक स्मृतियों के बीच भी जटिल सातत्य संबंध होते हैं। इसी तरह हम देखते हैं कि कोई भी चीज़ तब तक दीर्घकालिक स्मृति का अंग नहीं बन सकती, जब तक कि वह अल्पकालिक स्मृति से न गुज़र जाए, जो कि एक प्रवेश फ़िल्टर का काम करती है और स्मृति की सभी प्रक्रियाओं का समारंभ करवाती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

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