सामाजिक चेतना और समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामाजिक-आर्थिक विरचनाप्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखा था, इस बार हम ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना के कार्य और रूप
(functions and forms of social consciousness)
सामाजिक चेतना और समाज का विकास
(social consciousness and the development of society)

सामाजिक चेतना, केवल सामाजिक सत्व (social being) से निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि स्वयं भी समाज के जीवन पर सक्रिय प्रभाव डालती है। सामाजिक चेतना की सक्रियता भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक युगों में भिन्न-भिन्न होती है और समाज के विकास के साथ बढ़ती है। ऐसा किस कारण से होता है? बात यह है कि सामाजिक सत्व और जीवन की दशाओं में परिवर्तन सामाजिक चेतना में परिवर्तनों से भी संबद्ध होते हैं : ज्ञान का परिमाण बढ़ता है, विश्वदृष्टिकोण जटिल बनता है, विभिन्न सामाजिक समस्याओं से निबटने के लिए ज्ञान का अनुप्रयोग (applying) करने के वास्ते सूचना और कुशलताओं का विराट परिमाण संचित (accumulated) होता है और मनुष्यजाति का ऐतिहासिक अनुभव गहरा होता जाता है।

समाजवादी समाज के उद्‍भव (rise) के साथ सामाजिक चेतना की भूमिका (role) और भी बड़ी हो जाती है। समाज का नियोजित रूपांतरण (planned transformation) निष्पादित करने और उत्पादन संबंधों तथा उत्पादक शक्तियों के बीच पूर्ण अनुरूपता लाने के लिए एवं समाजवादी अधिरचना (socialistic superstructure) को निर्दोष बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की, और संपूर्ण समाजवादी समाज की चेतना के स्तर को ऊंचा उठाना ज़रूरी होता है। परंतु चेतना में परिवर्तन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। वैयक्तिक (individual) और सामाजिक चेतना किंचित स्थायित्व (stability) तथा रूढ़िवादिता (conservatism) से युक्त जटिल संरचनाएं (complex structures) हैं। उनमें बदलाव होने में कभी-कभी दशक नहीं, बल्कि सदियां लग जाती हैं।

जब आमूल क्रांतिकारी पुनर्चिंतन (radical revolutionary rethinking) तथा मौजूदा स्थिति के पुनर्मूल्यन (re-evaluation) की दरकार होती है, तो इतिहास के ऐसे तीव्र मोड़ (sharp turning points) पर चेतना के अंदर नैतिक, सामाजिक व सौंदर्यात्मक मूल्यों का परिवर्तन, विशेषतः जनमानस में, विकट अंतर्विरोधों (acute contradictions) को, रूढ़िपंथी तथा क्रांतिकारी कार्यविधियों के टकराव (clash) को जन्म देता है। लोग, पेचीदा (complicated) और उभयभावी (ambiguous) सत्व हैं। उनका व्यवहार केवल तर्कबुद्धिसम्मत (rational) लक्ष्यों तथा मानकों (standards) से ही नियंत्रित नहीं होता, बल्कि विविध प्रच्छन्न आवेगों (hidden passions), कामनाओं (desires), उपदेशों, पूर्वाग्रहों से तथा ऐसी जटिल मानसिक अवस्थाओं से भी होता है जो अंतर्विरोधी भावावेगों तथा मनोदशाओं (contradictory emotions and moods) , भय व उल्लास, उत्साह व निराशा, विश्वास व अविश्वास, हतोत्साहिता (despair) व शांतचित्तता (serenity) को पैदा करते हैं।

सामाजिक चेतना में सोद्देश्य परिवर्तन लाने के लिए, कठिन सामाजिक समस्याओं के प्रति सचेत, सक्रिय रुख़ (conscious, active attitude) को तथा उन्हें समाज के हित में हल करने की कामना को पैदा करने तथा प्रोत्साहन देने के लिए हमें सामाजिक चेतना के सार (essence) व संरचना का और सामाजिक चेतना के कार्यों व वैयक्तिक चेतना के साथ उसके संबंध का गहन दार्शनिक विश्लेषण करने की ज़रूरत है।

सामाजिक चेतना, विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में स्वयं को भिन्न-भिन्न ढंग से विकसित और व्यक्त करती है। मानव इतिहास पर नज़र डालने पर हमें धार्मिक मतों, राजनीतिक व कलात्मक क्रियाकलाप के रूपों की, क़ानूनी तथा नैतिक मानदंडों तथा मानकों की विराट विविधता (immense variety) दिखायी पड़ती है। प्रत्ययवादी/भाववादी (idealists) उनका हवाला देते हुए यह दावा करते हैं कि जनगण की सामाजिक चेतना और बौद्धिक क्रियाकलाप किन्हीं सामान्य नियमों और नियमसंगतियों (general laws and regularities) से संचालित नहीं होते और वस्तुगत अध्ययन (objective study) के अधीन नहीं रखे जा सकते। वे ज़ोर देते हैं कि सामाजिक सत्व के विकास तथा सामाजिक चेतना की अभिव्यक्तियों की विविधता के बीच कोई संबंध तथा वस्तुगत आश्रितता (objective dependence) नहीं है।

किंतु इससे संबंधित उनकी दलीलें वास्तविकता से मेल नहीं खाती और इसीलिए आलोचना के सम्मुख नहीं टिक पातीं। सामान्य/सार्विक, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की द्वंद्वात्मकता (dialectic) हमें इस मामले में भी प्रत्ययवाद/भाववाद का खंडन करने में मदद देती है। यह दर्शाती है कि सामाजिक चेतना की ठोस अभिव्यक्तियों ( concrete manifestations) की सारी विविधता के बावजूद उसके प्रमुख रूपों (forms) को पृथक किया जा सकता है और समाज के जीवन में उनकी भूमिका तथा कार्यों को समझा जा सकता है। सामाजिक चेतना के सबसे सामान्य (सार्विक) और महत्वपूर्ण रूप निम्नांकित हैं : राजनीतिक, नैतिक, क़ानूनी, कलात्मक, धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक। हम यहां दार्शनिक चेतना और वैज्ञानिक चेतना को छोड़कर बाक़ी सब पर विचार करेंगे। सामाजिक चेतना की संरचना तथा उसके कार्यों व विविध रूपों की समुचित समझ के लिए हमें वैचारिकी (ideology) तथा सामाजिक मनोविज्ञान (social psychology) के साथ उनके संबंधों को स्पष्ट करना होगा।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा की थी, इस बार हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल
(the basic principle of historical materialism )

प्रवर्ग ( category ) ‘सामाजिक अस्तित्व’ ( social being ), सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘भूतद्रव्य’ ( matter ) को सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है, ठीक उसी तरह जैसे कि ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ), अधिक सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘चेतना’ ( consciousness ) का सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, दर्शन के बुनियादी सवाल का उत्तर देते हुए आधुनिक विज्ञान के साथ पूर्ण मेल सहित इस बात की पुष्टि करता है कि भूतद्रव्य प्राथमिक तथा चेतना द्वितीयक है। इसका तात्पर्य, सबसे पहले और सर्वोपरि, यह है कि क्रमविकास में भूतद्रव्य चेतना से पहले विद्यमान था और उससे स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान हो सकता है। इसके विपरीत चेतना भूतद्रव्य से स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान नहीं रह सकती है।

परंतु यह सोचना भ्रामक होगा कि सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से पहले तथा उससे स्वतंत्र रूप में विद्यमान हो सकता है। हालांकि जो सामाजिक संबंध तथा भौतिक घटनाएं, सामाजिक अस्तित्व का अंग हैं, उनका स्वतंत्र और वस्तुगत अस्तित्व है, उनकी रचना लोगों के द्वारा उनके सोद्देश्य क्रियाकलाप के, यानी चिंतनशील अस्तित्वों के क्रियाकलाप के दौरान होती है। ऐसे मानव समाज की कल्पना करना असंभव है, जिसमें सामाजिक अस्तित्व तो रूप ग्रहण कर चुका हो किंतु सामाजिक चेतना लापता हो। ऐसे समाज का क़तई अस्तित्व नहीं हो सकता है। इस हालत में सामाजिक जीवन तक विस्तारित दर्शन के बुनियादी सवाल का भौतिकवादी उत्तर कैसा है?

हम देख चुके हैं कि जिस प्रकार समाज का आर्थिक आधार, समाज की राजनीतिक और क़ानूनी अधिरचना ( superstructure ) का आधार है, उसी प्रकार भौतिक संपदा की उत्पादन पद्धति, आत्मिक क्रियाकलाप सहित सारे मानवीय क्रियाकलाप का आधार है। क्रियाकलाप के अन्य सारे रूप तथा सारी पद्धतियां जिस उत्पादन पद्धति पर आश्रित होती हैं, वह, अंततः, समाज के जीवन में गहनतम परिवर्तनों का और एक सामाजिक प्रणाली से दूसरे में संक्रमण ( transition ) का कारण है और इस अर्थ में ठीक उसी तरह निर्णायक भूमिका अदा करती है, जिस तरह से आधार में परिवर्तन अधिरचना के परिवर्तनों को नियंत्रित करते हैं, क्योंकि आधार इस तथ्य के बावजूद उनका पहला कारण होता है कि अधिरचना स्वयं आधार पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है। आधार की निर्णायक भूमिका इसी में व्यक्त होती है।

अब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन पर किस तरह से लागू किया जा सकता है और इसका भौतिकवादी उत्तर कैसे दिया जा सकता है। समाज के संबंध में इस प्रश्न का रूप ऐसा होगा : निर्धारक ( determinant ) कौन है – सामाजिक अस्तित्व या सामाजिक चेतना ? इसके उत्तर में ऐतिहासिक भौतिकवाद, ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) के विपरीत, इस बात की पुष्टि करता है कि लोगों के अस्तित्व को उनकी चेतना निर्धारित नहीं करती किंतु, इसके विपरीत, उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है। यह प्रस्थापना ( preposition ) मनुष्यजाति के संपूर्ण ऐतिहासिक अनुभव का वैज्ञानिक सामान्यीकरण ( scientific generalisation ) है और साथ ही समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) का बुनियादी नियम है। सामाजिक अस्तित्व इस अर्थ में भौतिक तथा प्राथमिक है कि केवल वही ऐसा है, जो सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु ( content ) और रूप ( form ) को और यहां तक कि सामाजिक अस्तित्व पर उसके प्रतिपुष्टिकारी ( feedback ) प्रभाव का भी निर्धारण करता है। यही कारण है कि सामाजिक चेतना के संबंध में सामाजिक अस्तित्व की निर्धारक भूमिका से संबंधित यह प्रस्थापना ऐतिहासिक भौतिकवाद का एक बुनियादी उसूल है।

इस उसूल ( principle ) से कई नतीजे निकलते हैं : (१) सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से बाहर वस्तुगत रूप से अस्तित्वमान होता है ; (२) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है ; (३) प्राथमिक तथा भौतिक होने की वजह से सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु तथा रूप, दोनों का नियमन करता है ; (४) सामाजिक चेतना में होनेवाले सारे परिवर्तन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः सामाजिक अस्तित्व में परिवर्तन के कारण होते हैं ; (५) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व के परिवर्तन तथा विकास पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है, किंतु अंततः यह प्रभाव स्वयं सामाजिक अस्तित्व के विकास तथा कार्यात्मकता के वस्तुगत नियमों से निर्धारित होता है ; (६) सामाजिक विकास के सारे नियम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल पर आधारित हैं और उनका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण इसी से मिलता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल इस प्रस्थापना की सटीकता पर बल देता है तथा उसे अभिपुष्ट करता है कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( formations ) के सिद्धांत में अत्यंत पूर्णता से मूर्त होता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना
( social being and social consciousness )

सामाजिक अधिरचना ( social superstructure ) के मुख्य तत्वों, यानी राज्य, पार्टियों तथा सामाजिक संगठनों के क्रियाकलाप में दो पक्षों, यानी आत्मिक ( spiritual ) और भौतिक ( material ), की अंतर्क्रिया ( interaction ) होती है। इस अंतर्क्रिया का नियमन ( regulation ) करनेवाली, सर्वाधिक सामान्य नियमितता ( pattern ) को निरूपित करने के लिए, ऐतिहासिक भौतिकवाद के इन दोनों प्रवर्गों ( categories ), यानी सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझना जरूरी है।

सामाजिक अस्तित्व में, उत्पादन के संबंधों के आधार पर उत्पन्न होनेवाले वस्तुगत ( objective ) सामाजिक और व्यावहारिक संबंधों की समग्रता ( totality ) तथा उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्व ( material elements ) शामिल होते हैं।

सामाजिक चेतना में, समाज के सदस्यों के उन सारे मतों, सिद्धांतों, दृष्टिकोणों, ज्ञान तथा अनुभवों की समग्रता शामिल होती है, जो सामाजिक अस्तित्व के परावर्तन ( reflection ) के ज़रिये उत्पन्न होते हैं। सामाजिक चेतना काल विशेष में समाज विशेष में रहनेवाले लोगों के मानसों ( minds ) का योग मात्र नहीं होती है। यह वह सामान्य ( general ), या वह सर्वनिष्ठ ( common ) है, जो किसी एक प्रदत्त ऐतिहासिक युग में समाज, वर्गों तथा सामाजिक समूहों के सदस्यों की चेतना में निहित होता है।

ये प्रवर्ग, ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के लिए केंद्रीय महत्व के हैं। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों ने अनेक बार कहा है कि वह सामाजिक चेतना को सीधे-सीधे अर्थव्यवस्थाओं से व्युत्पन्न करता है तथा सामाजिक जीवन के सारे पक्षों को महज़ आर्थिक उत्पादन कार्यों तक सीमित करता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद इस तरह की एकांगी और अधिभूतवादी ( metaphysical ) व्याख्याएं प्रस्तुत नहीं करता है, वास्तव में, ये स्वयं पूंजीवादी अध्येता ही हैं, जो ऐसे आदिम ‘आर्थिक भौतिकवाद’ के दोषी हैं। मसलन, अमरीकी समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री वाल्ट रोस्टो ने बुद्धि की अवस्थाओं का सिद्धांत पेश किया, जिसमें यह दावा किया गया कि समाज का सारा विकास उद्योग के विकास द्वारा निर्धारित होता है, कि सारे सामाजिक अंतर्विरोधों ( वर्गों के बीच अंतर्विरोधों सहित ) को आर्थिक क्रियाकलाप में सुधार भर करके तथा भौतिक संपदा की प्रचुरता से सुलझाया जा सकता है। हालांकि यह दृष्टिकोण जीवन के अनुभव से असत्य साबित हो गया है, क्योंकि पूंजीवादी देशों में सर्जित विराट संपदा मेहनतकशों ( working people ) की पहुंच से बिल्कुल बाहर है। फिर भी यह सिद्धांत अब भी बहुत प्रचलन में है।

विश्व में कई देशों की परिस्थितियों के विश्लेषण हमें बताते हैं कि, कई देशों में क्रांतियों और गृहयुद्धों के बाद वहां की उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) तबाह हो गयी थीं, अधिकांश कारखाने और मिलें काम नहीं कर रही थीं, कृषि की उत्पादकता नीचे गिर गयी थी। यानी अर्थव्यवस्था संकटापन्न थी। परंतु इस सबके बावजूद उन देशों में सर्वसाधारण की चेतना क्रांतिकारी थी, वह ऐतिहासिक आशावाद ( optimism ), नयी राजनैतिक व्यवस्था की संभावना पर विश्वास और नये समाज के निर्माण की चाह से ओतप्रोत थी। साथ ही ऐसे कई देशों में, जहां कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं बेहतर स्थिति में थीं, उनकी उत्पादक शक्तियों का स्तर सापेक्षतः ऊंचा था, लेकिन उनकी सामाजिक चेतना आम निराशावादी स्वभाव की थी और सारी आत्मिक संस्कृति संकट में थी। यदि सामाजिक चेतना की अवस्था तथा अंतर्वस्तु केवल उत्पादक शक्तियों तथा अर्थव्यवस्था की हालत से ही निर्धारित होती, तो वस्तुस्थिति बिल्कुल उल्टी होनी चाहिये थी।

वर्तमान हालात में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पूंजीवादी औद्योगिक देशों में संकट की घटनाओं पर क़ाबू पाने, मुद्रास्फीति की दरों में अंशतः घटती होने, बेरोजगारी की बढ़ती बंद होने तथा किंचित आर्थिक उत्थान की उपलब्धि के बाद सार्वजनिक समझ तथा सार्वजनिक मनोदशा सार्विक, प्रशांत ( serene ) आशावाद के अनुरूप हो जाती होगी। लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी कदापि नहीं होती। गहन वैज्ञानिक-तकनीकि क्रांति और समाज में सूचना प्रणाली का द्रुत विकास, जनता के कुछ संस्तरों और व्यावसायिक समूहों के बीच काफ़ी अधिक अस्थायित्व ( instability ) और भविष्य पर अविश्वास को जन्म दे रहे हैं। उद्योगों के स्वचालन ( automation ), रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के सिलसिले में कई कर्मचारियों के सिर पर बेरोज़गारी का खतरा लगातार मंडराता रहता है। नयी तकनीकों से अतिरिक्त धंधों के निकलने का तथ्य भी इस बात की गारंटी नहीं है कि अनेक लोग काम से निकाले नहीं जायेंगे, बेरोजगार नहीं होंगे और सामाजिक संरचना में ‘फालतू’ नहीं हो जायेंगे। इसलिए देशों की ऐसी परिस्थितियों की सामाजिक चेतना में निराशावादी स्वर हावी होता जाता है।

उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि सारे सामाजिक दृष्टिकोणों, सारे मतों, आदर्शों और राजनीतिक सिद्धांतों को प्रत्यक्षतः आधार से, यानी उत्पादन संबंधों से निगमनित ( deduce ) नहीं किया जा सकता है। ये संबंध तथा उनके अनुरूप भौतिक, व्यावहारिक क्रियाकलाप, वास्तव में अन्य सारे संबंधों व क्रियाकलाप के रूपों और सामाजिक प्रक्रियाओं की बुनियाद में निहित होते हैं। किंतु इसका मतलब यह है कि सामाजिक चेतना में केवल उत्पादन संबंध तथा उत्पादन के क्रियाकलाप ही परावर्तित नहीं होते, बल्कि अन्य वस्तुगत सामाजिक संबंध, क्रियाकलाप के रूप ( और उनसे जुड़ी हुई सामाजिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं, यानी सामाजिक अस्तित्व ) भी परावर्तित होते हैं। इस तरह, प्रवर्ग ‘आधार’ और ‘अधिरचना’ यह समझने के लिए अभी भी पर्याप्त नहीं है कि सामाजिक चेतना क्या और कैसे परावर्तित करती है और लोगों के सामाजिक क्रियाकलाप को कैसे प्रभावित करती है।

प्रवर्ग ‘सामाजिक अस्तित्व’, ‘आधार’ ( basis ) से अधिक विस्तृत है, क्योंकि वह केवल उत्पादन संबंधों को ही नहीं, बल्कि उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्वों तथा अन्य सामाजिक संबंधों व संस्थानों और विविध प्रकार के क्रियाकलाप को भी अपने में समेट लेता है। इसके विपरीत प्रवर्ग ‘सामाजिक चेतना’, ‘अधिरचना’ से संकीर्णतर है क्योंकि अधिरचना में सामाजिक चेतना के अतिरिक्त राज्य, पार्टियां तथा वे अन्य संस्थान तथा संगठन भी शामिल हैं, जो सामाजिक चेतना के ‘उत्पादन’ तथा विभिन्न सिद्धांतों, विचारों तथा मतों के सर्जन में लगे हैं और उन्हें कार्यान्वित करने और जीवनीशक्ति प्रदान करने के लिए संघर्ष करते हैं। किंतु ये संस्थान और संगठन स्वयं चेतना से परे वस्तुगत रूप से विद्यमान हैं और उनके भौतिक तत्व सामाजिक चेतना द्वारा परावर्तित होते हैं। इस तरह, सामाजिक चेतना और सामाजिक अस्तित्व का रिश्ता सीधा-सादा नहीं है, यह विभिन्न सामाजिक समूहों, वर्गों तथा सामाजिक संस्थानों के क्रियाकलाप के द्वारा व्यवहित ( mediated ) है।

सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को सिर्फ़ परावर्तित ही नहीं करती, बल्कि प्रतिपुष्टिकर ( feedback ) प्रभाव भी डालती है। मसलन, पूंजीवादी अवधि की सामाजिक चेतना की प्रणाली में और दृष्टिकोणों तथा मतों के साकल्य ( aggregate ) में पूंजीवाद के आंतरिक संकट को परावर्तित करनेवाले क्रांतिकारी विचार उत्पन्न हो सकते हैं। जब ये विचार सर्वसाधारण में घर कर लेते हैं, तो वे क्रांतिकारी क्रियाकलाप में मूर्त हो सकते हैं और स्वयं अपने अस्तित्व या सत्ता को ही परिवर्तित कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप पूंजीवादी अस्तित्व या सत्ता के स्थान पर एक नया अस्तित्व या सत्ता – समाजवादी समाज – उत्पन्न हो सकता है। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को जितनी सटीकता से परावर्तित करती है, उतनी ही अधिक प्रबलता से सामाजिक अस्तित्व को प्रभावित करती है।

ऊपर कही गयी सारी बातों का समाहार करते हुए अब हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूलों ( basic principles ) को निरूपित कर सकते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता….

हे मानव श्रेष्ठों,

पिछली बार हमने प्रेम पर बात करते हुए मनुष्य की प्रकृति संबंधित सापेक्षता की चर्चा की थी, इस बार हम देखेंगे मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता के संदर्भ…

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मनुष्य और उसकी चेतना परिवेश और समाज के साथ उसके क्रियाकलाप का उत्पाद हैं। मनुष्य का विकास, समाज के साथ उसकी अंतर्क्रियाओं पर निर्भर करता है और मनुष्य समाज द्वारा पोषित अनुभवों से गुजरते हुए तद्‍अनुसार ही भाषा और व्यवहारिक ज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य के रूप में उभरता है।
समाज से विलग मनुष्य का कोई अस्तित्व संभव नहीं हो सकता और किसी अपवाद स्वरूप अस्तित्व बचा रह भी जाए तो वह मनुष्य के जाने पहचाने रूप में विकसित नहीं हो सकता।
एक ओर सामाजिक व्यवहार के कारण विकसित मनुष्य की यह समझ, विवेक और उसके सामाजिक क्रियाकलापों, विचारों और व्यवहारों को नियंत्रित और नियमित करती रहती है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति की एक पैदाइश के रूप में मनुष्य की प्राकृतिक स्वभाव की नाभिनालबद्धता उसे एक व्यक्तिगत ईकाई के रूप में, व्यक्तिगत जिजीविषा हेतु विचार और व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती रहती है। जाहिर है कि मनुष्य अपनी इस सामाजिक और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अंतर्विरोध में हमेशा घिरा रहता है।

अब जरा व्यक्तिगत आवश्यकताओं की भी पड़ताल करते हैं कि क्या वाकई ये व्यक्तिगत आवश्यकताएं हैं?
अगर इन व्यक्तिगत आवश्यकताओं की तह में जाया जाए तो मूलभूत आवश्यकता के रूप में भोजन प्राप्ति, विपरीत परिस्थितियों से बचने की स्वाभाविक प्रवृति और यौन जरूरतें ही इसकी जद में आती हैं। यौन-तुष्टी की आवश्यकता के सकारात्मक रूप भी, चूंकि इसमें एक अन्य व्यक्ति और अस्तित्व में आता है, सामाजिक परिधी के दायरे में ही आते हैं। नकारात्मक यौन कुंठाओं की पूर्ति की दुर्दम्य इच्छा को ही इस व्यक्तिगत मामले में रखा जा सकता है, जबकि इसके लिए भी उस दूसरे के अस्तित्व को बलपूर्वक बेहयाई से नकारना आवश्यक है। इसलिए केवल भोजन के कुछ रूप और बचाव की प्रवृति को ही मनुष्य की नितांत व्यक्तिगत आवश्यकताओं की श्रेणी में रखा जा सकता है, इस बात को भूलते हुए कि मनुष्य इनके व्यवहार भी समाज के अंदर रह कर ही सीखता है। बाकि सभी (और वैसे तो ये सभी भी) व्यक्तिगत आवश्यकताएं किसी ना किसी रूप में सामाजिकता से अभिन्न रूप से जुडी़ होती हैं।

अतएव यह आसानी से समझा जा सकता है कि मनुष्य की जिंदगी में व्यक्तिगत कुछ नहीं होता। वह खुद, उसकी सारी तथाकथित व्यक्तिगत आवश्यकताएं, उसकी सारी भावनाएं, विचार, क्रियाकलाप किसी ना किसी रूप में दूसरों से, फलतः समाज से जुडे़ होते हैं। उसकी व्यक्तिगतता का अस्तित्व, यदि वह यह भ्रम रखना भी चाहता है तो दूसरों के यानि की समाज के बेहयाईपूर्ण नकार से, अस्वीकार से या बलपूर्वक चतुराई से ही थोडा़ बहुत संभव हो सकता है।
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आज इतना ही…
बाकि अगली बार…जिसमें प्रेम की जांच पड़ताल की जाएगी……

समय