‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत साम्यवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता
(the category `socio-economic formation’ and historical reality)

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं तथा उनकी उत्पत्ति, विकास और अनुक्रमण (succession) तथा सामाजिक क्रांतियों (revolution) के द्वारा प्रतिस्थापन (replacement) के सिद्धांत पर ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों द्वारा बहुधा कई आक्षेप किये जाते हैं। वे दावा करते हैं कि विश्व में ऐसी कई सामाजिक और राजकीय प्रणालियां रही हैं, जिन्हें एक के बाद एक अनुक्रमण करती हुई विरचनाओं की प्रणाली में नहीं रखा जा सकता है। उनकी दृष्टि से, ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत, विविधतापूर्ण और जटिल ऐतिहासिक वास्तविकता का सरलीकरण कर देता है, और उससे मेल नहीं खाता। वे कहते हैं कि सारे समाज, देश, राष्ट्र, विरचना के विकास की प्रत्येक अवस्था से अनुक्रमिक ढंग से नहीं गुजरते और इसीलिए उनकी राय में इसका मतलब यह है कि अनुक्रमिक परिवर्तन का नियम ऐतिहासिक आवश्यकता को परावर्तित (reflect) नहीं करता और इसका अधिक से अधिक चंद विकसित देशों के लिए ही सीमित महत्व है।

इस तरह की आपत्तियां सार्विक/सामान्य (general), विशेष (particular) तथा व्यष्टिक (individual) के बीच द्वंद्वात्मक संयोजन (dialectical connection) की पूर्णतः ग़लत समझ पर आधारित होती हैं। यथार्थता में सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन होता है। सार्विक/सामान्य और विशेष व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सार्विक विद्यमान होता है। इसके साथ ही साथ सार्विक और विशेष, व्यष्टिक के बग़ैर तथा उससे पृथक रूप में विद्यमान नहीं होते हैं। इस संयोजन की स्पष्ट समझ यह आसानी से व्याख्यायित कर सकती है कि विशेष नियमों से संचालित होने वाली विशिष्ट परिस्थितियां भी अंततः कुछ सार्विक/सामान्य नियमों के अंतर्गत ही परवान चढ़ा करती हैं। और इसी तरह हर सार्विक/सामान्य परिघटना अपने भीतर अपनी विशेष लाक्षणिक विशिष्टता भी समेटे होती है। परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण सभी तरह की विशिष्टताओं और उनमें अंतर्निहित सामान्यताओं का सटीक स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर सकता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद किसी भी हालत में यह नहीं समझता है कि सारे देशों और राष्ट्रों को विरचनाओं के परिवर्तन तथा उत्पत्ति की सारी अनुक्रमिक अवस्थाओं से गुज़रना ही होता है। ऐसा कथन केवल मताग्रहियों के माफ़िक़ (suitable) है और मार्क्सवादी द्वंद्ववाद के लिए असंगत (incompatible) है। ऐतिहासिक भौतिकवाद यही दावा करता है कि व्यापक फ़लक पर विश्व इतिहास, यानी मनुष्यजाति का विकास एक अनुक्रमिक नियम-संचालित परिवर्तन या आदिम सामुदायिक, दास-प्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी-कम्युनिस्ट विरचनाओं के सिलसिलेवार प्रतिस्थापन के ज़रिये होता है। जब अधिक विकसित जनगण और राष्ट्र अपने सामाजिक क्रियाकलाप में एक विरचना को मूर्त बना चुके होते हैं और अगली, उच्चतर अवस्था में संक्रमण (transition) कर चुकते हैं, तो अपने विकास में पिछड़े हुए जनगण, अधिक विकसित राज्यों के प्रभाव और सहायता से कुछ अवस्थाओं को ‘लांघकर’ पार कर सकते हैं और विकसित राज्यों के स्तर के अनुरूप होने की प्रक्रियाओं में हो सकते हैं।

इस प्रक्रिया की क्रियाविधि (mechanism) क्या है ? बात यह है कि विभिन्न जनगण और राष्ट्र तथा उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराएं, बंद व अलग-थलग प्रणालियां (isolated systems) नहीं है। वे अधिक विकसित देशों सहित अन्य सभी के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी, सांस्कृतिक तथा अन्य संबंधों के द्वारा जुड़ी हैं। इसकी वजह से वे अधिक विकसित देशों के अनुभव और उनकी तकनीकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों को उपयोग में लाने में समर्थ हो जाते हैं तथा समुचित सहायता से स्वयं अपने ऐतिहासिक विकास की रफ़्तार को तेज़ करने में कामयाब हो जाते हैं। इस तरह के कई उदाहरण विश्व इतिहास में मौज़ूद हैं। विकास का ऐसा रास्ता उन अपविकसित (underdeveloped) देशों के लिए भी संभव हुआ है, जो कुछ समय पहले ही उपनिवेशी उत्पीड़न तथा शोषण से मुक्त हुए हैं। इस तरह सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं का सिद्धांत इन देशों के मार्ग में बाधक पिछड़ेपन तथा कठिनाइयों पर क़ाबू पाने के लिए एक सैद्धांतिक आधार का काम करता है।

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं की उत्पत्ति, विकास, कार्यकारिता तथा परिवर्तन की सामान्य नियमितताओं पर विचार कर चुकने के बाद अब हम सामाजिक चेतना (social consciousness) के मुख्य कार्यों तथा रूपों का अध्ययन कर सकते हैं। यह अगली बार से।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

Advertisements

सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है ?

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत ‘व्यष्टिक, विशेष तथा सार्विक’ पर चर्चा की थी, इस बार हम समझने का प्रयास करेंगे कि सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है ?
( what is a socio-economic formation? )

जब हम अतीत, वर्तमान तथा भविष्य में मनुष्य की नियति, समाज में उसकी अवस्थिति (position) और परिवेशीय जगत के प्रति उसके रुख़ (attitude) पर विचार करते हैं, तो हमें ऐतिहासिक घटनाओं तथा मानवीय कारनामों, लोगों की पूरी जातियों तथा राज्यों के उत्थान, विकास तथा पतन की असीम विविधता से सामना पड़ता है। क्या इन सबके पीछे प्रकृति के जैसे कुछ सामान्य नियमों (general laws) को खोजा जा सकता है? ऐतिहासिक भौतिकवाद के सामाजिक दर्शन के उद्‍भव (rise) से पहले ऐसे नियमों को खोजने के सारे प्रयास विफल रहे।

ऐतिहासिक संवृत्तियों (events) तथा लोगों के कारनामों (deeds) की बाहरी विविधता तथा द्रुत (rapid) परिवर्तन के अंतर्गत किसी सार्विक (common) को, किसी ऐसी चीज़ को खोजने के लिए समाज की समझ में एक सच्चे क्रांतिकारी परिवर्तन की ज़रूरत थी, जो इन्हीं संवृत्तियों तथा क्रियाकलाप के रूपों को, परस्पर संबंधित तथा स्वयं उनकी संभावना को ही स्पष्ट कर सके। ऐसे सार्विक, सामान्य (general) को ही ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ कहा गया।

सामाजिक-आर्थिक विरचना वस्तुगत (objective), स्थायी सामाजिक संबंधों, प्रक्रियाओं, संस्थानों तथा सामाजिक समूहों और सामाजिक चेतना के उन सारे रूपों व प्रकारों का समुच्चय (aggregate) है, जो एक निश्चित ऐतिहासिक युग में प्रचलित उत्पादन पद्धति (mode of production) के आधार पर उत्पन्न तथा विकसित होते हैं

फलतः एक सामाजिक-आर्थिक विरचना अत्यंत जटिल प्रणाली है। प्रत्येक ऐतिहासिक युग में एक नहीं, अनेक उत्पादन पद्धतियां हो सकती हैं; मसलन, पूंजीवाद समाज में, प्रभुत्व प्राप्त पूंजीवादी उत्पादन के साथ ही टटपुंजियां (petty) पण्य उत्पादन (commodity production), पितृसत्तात्मक (patriarchal), यानी भरण-पोषण की उत्पादन व्यवस्था और सामंती (feudal) उत्पादन के अवशेष भी विद्यमान हो सकते हैं। इन गौण (subsidiary) या अप्रभावी (non-dominant) उत्पादन पद्धतियों को आम तौर पर क्षेत्रक (sectors) कहा जाता है। एक विरचना से दूसरी में संक्रमण (transition) की अवधि में ये विशेष विविधतापूर्ण होते हैं। किंतु क्षेत्रक स्वयं उत्पादन की प्रभावी पद्धति के अधीनस्थ (subordinate) होते हैं तथा उस पर निर्भर करते हैं। इसलिए प्रदत्त (given) विरचना के आधार (base) तथा उसकी अधिरचना (superstructure) को रूप प्रदान करनेवाले सारे सामाजिक संबंधों, प्रक्रियाओं, संस्थानों तथा चेतना के रूपों को यही प्रभावी पद्धति निर्धारित करती है।

समाज एक अविभक्त सामाजिक प्रणाली (system) या अंगी (organism) है, जो कई अंतर्संबंधित उपप्रणालियों (subsystems) से बना है। ये उपप्रणालियां एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं ; मिसाल के लिए, उनमें वर्ग (class), राजनीतिक पार्टियां, राज्य, धार्मिक संगठन, परिवार, आदि शामिल हैं, किंतु वे सब अंततः उत्पादन पद्धति पर निर्भर हैं। एक विरचना की रचना करनेवाली विभिन्न उपप्रणालियों का उत्पादन पद्धति के साथ संयोजन (link) किंचित जटिल होता है और विविध संबंधों तथा निर्भरताओं के ज़रिये मूर्त होता है।

‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ एक प्रवर्ग (category) है, जो सर्वाधिक समान व सामान्य, वस्तुगत और आवश्यक विशेषताओं और अनुगुणों (properties) को परावर्तित (reflect) करता है, जो प्रभावी उत्पादन पद्धति से निर्धारित होते हैं, किंतु विभिन्न देशों में ख़ास तौर से व्यक्त होते हैं। ये विशेषताएं राष्ट्रीय और ऐतिहासिक अवस्थाओं पर, और इस पर निर्भर करती हैं कि प्रदत्त विरचना कब और किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुई

सामाजिक-अर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत ने ऐतिहासिक प्रत्ययवाद (idealism) की सारी क़िस्मों पर क़रारी चोट की। इसलिए पूंजीवादी विचारकों, खासकर जर्मन सामाजशास्त्री माक्स बेबेर (१८६४-१९२०) के अनुयायियों ने इसका खंड़न करने के प्रयत्न में उसे ‘आदर्श प्रकार’ का यानी समाज का ऐसा काल्पनिक मॉडल बताया जिसका वस्तुगत ऐतिहासिक यथार्थता (reality) में कोई अस्तित्व नहीं है। प्रत्ययवादियों को जवाब देते हुए लेनिन ने लिखा था कि ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ की संकल्पना (concept) ने “सामाजिक घटनाओं के वर्णन ( और आदर्श दृष्टि से उनके मूल्यांकन ) से उनके विशुद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण की ओर अग्रसर होना संभव बनाया, उदाहरण के तौर पर कहा जाए तो ऐसा विश्लेषण जो एक पूंजीवादी देश को दूसरे से विभेदित (distinguish) करता है और उसकी जांच करता है जो उन सबमें समान (common) है।”

एक ही विरचना, मसलन, पूंजीवादी या समाजवादी विरचना, अपने को भिन्न-भिन्न मुल्कों में भिन्न-भिन्न ढंग से प्रकट कर सकती है, किंतु समान लक्षणों (common features) और स्थायी (stable), आवश्यक संयोजनों (necessary connections) के अस्तित्व से, सारे देशों तथा राष्ट्रों के लिए एक या दूसरी विरचना की कार्यशीलता (functioning) के नियमों और एक विरचना से दूसरी में संक्रमण के नियमों को निरूपित करना संभव हो जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम