अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियों पर हमने एक चर्चा शुरू की थी जिसे विस्तार से समझने के लिए इस बार इसे और आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि इनकी सीमाएं लांघ कर जीव किस तरह अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाएं

उल्लेखनीय है कि कतिपय सहजवृत्तियां एक जाति के सभी प्राणियों में समान होने पर भी, अपने को उनमें से हरेक में कुछ अलग ढ़ंग से प्रकट करती है। सहजवृत्तियों के साकारीकरण में ऐसी सापेक्ष असमानता की बदौलत ही जाति अपने परिवेश में सहसा परिवर्तन होने की सूरत में जीवित रह पाती हैं। युवा प्राणियों की सहजवृत्तिमूलक क्रियाओं का प्रेक्षण दिखाता है कि ये क्रियाएं बिना किसी पूर्व-प्रशिक्षण के और मानक ढ़ंग से की जाती हैं। किंतु उनमें थोड़ा-सा कुशलता का अभाव भी होता है। उनके व्यष्टिक विकास की प्रक्रिया में उनकी क्रियाओं की प्रभावोत्पादकता बढती जाती है और इस तरह उनका जीवनानुभव उनके व्यवहार के अंतर्जात प्रोग्राम की पूर्ति में सहायक बनता है।

प्रकृतिविज्ञानियों ने पाया है कि कीट अपने जीवनकाल में बहुत सारे अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं। ये संबंध विभिन्न ग्राहियों के कार्य का परिणाम हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, वे गति-संकेतों पर आधारित शारीरिक क्रियाओं की स्मृति अथवा वस्तुओं के रंग या आकार की चाक्षुष स्मृति से व्युत्पन्न हो सकते हैं।

मिसाल के लिए, यदि हम मधुमक्खियों के छत्ते को उसकी जगह से दो मीटर दूर हटा दें , तो फूलों का रस और पराग लेकर घर लौट रही मधुमक्खियां उस जगह हवा में एकत्र होंगी, जहां छत्ता पहले स्थित था। कई मिनट तक वे काल्पनिक द्वार के गिर्द मंडराएंगी और इसके बाद ही छत्ते की ओर मुड़ेंगी। इसका मतलब यह है कि दिक् में मधुमक्खियां मुख्यतः गति-संकेतों से निदेशित होती हैं और दृष्टि का उपयोग केवल असफलता की सूरत में करती हैं। वे आसानी से अनुकूलित संवेदनशीलता विकसित कर लेती हैं, जिससे उन्हें फूलों की आकृतियों में, विभिन्न वस्तुओं के चमकने की मात्राओं में अंतर करने में मदद मिलती है।

प्रेक्षणों ने दिखाया है कि कीटों के सबसे अच्छे अनुकूलित संबंध उन उत्तेजकों के सिलसिले में बनते हैं, जो सामान्यतः व्यवहार के सहजवृत्ति-जन्य प्रोग्रामों को प्रवर्तित करते हैं।

प्रयोगों में पाया गया कि मधुमक्खियों को जटिल डिज़ायनों की बजाए त्रिभुजों और चतुर्भुजों के बीच भेद करना सिखाना कहीं अधिक कठिन है। अप्रत्याशित से लगने वाले ये परिणाम वास्तव में जटिल ज्यामितीय आकृतियों के जैव महत्व के परिचायक हैं, क्योंकि मधुमक्खियां जिन फूलों से मधु एकत्र करती हैं, वे उनकी आकृति से साम्य रखती हैं।

अतः गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्रवाले जीव उन वस्तुओं के मामले में अस्थायी संबंध बड़ी आसानी से विकसित कर लेते हैं, जिनके गुण जैविक दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत होते हैं : आश्रित संबंध केवल सहजवृत्तिमूलक व्यवहार प्रोग्रामों के दायरे में ही बनाए जाते हैं

व्यवहार के सहजवृत्तिमूलक रूप आर्थोपोडा में ही नहीं , सभी उच्चतर कशेरुकियों ( मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों तथा स्तनपायियों ) में पाये जाते हैं। मछलियों की कतिपय जातियां अपनी संतान को बचाने की बड़ी ही जटिल सहजवृत्ति का प्रदर्शन करती हैं।

उदाहरण के लिए, नर स्टिकलबैक जलाशय के तल में एक गड्ढ़ा बनाता है, उसमें नीचे शैवाल बिछाता है, पानी में उगने वाले ज़्यादा बड़े पौधों की पत्तियों से उसकी दीवारें तथा छत बनाता है और अपने शरीर की श्लेष्मा से उन्हें चिपकाता है। इसके बाद वह मादा को अंडे देने के लिए उसमें धकेलता है और तब तक गुफा की रक्षा करता है, जब तक अंडों से पोने नहीं निकल आते।

संतान को पालने, जनने, खिलाने, बचाने, आदि से संबंधित बड़ी जटिल सहजवृत्तियां अधिकांश कशेरुकियों में पाई जा सकती है। पक्षियों और स्तनपायियों में नीड़-निर्माण और शिशुओं की देखभाल की सहजवृत्ति बहुत ही कार्यसाधक प्रतीत होती है। किंतु यह कार्यसाधकता पूर्णतः बाह्य कारकों पर निर्भर होती है तथा बड़ी सतही है। सहजवृत्ति-जन्य क्रियाओं की एक पूरी श्रृंखला को जन्म देने वाली निश्चित परिस्थितियों में किंचित् परिवर्तन आने पर सारा विशद कार्यक्रम गड़बड़ा जाता है। पक्षी अपने शावकों को छोड़ सकते हैं और स्तनपायी अपने बच्चों को दांतों से काटकर मार सकते हैं।

जीवजंतुओं के सहजवृत्ति-जन्य प्रतिरक्षात्मक व्यवहार में भी अत्यधिक जड़ता देखी जाती है। इसकी अनगिनत मिसाले हैं। उनमें से एक यह है।

उत्तरी अमरीका में काली खालवाला एक छोटा जीव पाया जाता है, जिस पर अन्य जीव हमला करने की हिम्मत नहीं करते। वे उसकी काली पीठ पर बनी सफ़ेद धारी के कारण उसे दूर से ही पहचान जाते हैं। इस जीव को स्कंक कहते हैं। उसके शरीर में एक ऐसी ग्रंथि होती है, जिससे बहुत ही बदबूदार द्रव निकलता है। ज्यों ही उसे कोई ख़तरा महसूस होता है, वह शत्रु की ओर पीठ कर देता है, फिर पूंछ उठाता है और बदबूदार द्रव का ऐसा गुबार छोड़ता है कि बड़े से बड़ा हिंस्र जानवर भी घंटों तक होश में नहीं आ पाता।

इस जीव को एक अलग ही जलवायु का आदी बनाने का फ़ैसला किया गया। पहले उसके बच्चों को बाड़ों में रखा गया और लोगों द्वारा उनकी देखभाल किये जाने के लिए उनकी उक्त ग्रंथियां निकाल दी गईं। फिर उन्हें वन में छोड़ दिया गया। मगर जब कुत्ते उनपर हमला करने लगे, तो उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि पीछा करने वालों की ओर पीठ कर दी और इस तरह आसानी से उनका शिकार बन गये। बाद में उनकी देखभाल करने के अन्य तरीक़े खोजे गये और उनकी ग्रंथियां निकालना बंद कर दिया गया।

सहज प्रतिक्रियाएं, सामान्य उद्दीपनों की अनुक्रियास्वरूप पैदा होती हैं, जो व्यवहार के जन्मजात संरूपों को सक्रिय बनाते हैं। इस संबंध में जीव-जंतुओं के व्यवहार के सहज रूपों का अध्ययन करने वाले कुछ जीव-पारिस्थितिकीविदों की खोजें काफ़ी दिलचस्प हैं। वे दिखाती हैं कि सहज क्रियाएं सर्वथा निश्चित संकेतों का परिणाम होती हैं

उदाहरणार्थ, मेंढ़क ज्यों ही अपने सामने किसी कीट को हरकत करते देखता है, त्यों ही वह उस पर झपट पड़ता है। यह एक तेज़ी से चलते क्षोभक से संबंधित प्रतिक्रिया है, यदि हम पतले धागे पर कागज़ का टुकड़ा बांधकर मेंढ़क के आगे हिलायें, तो मेंढ़क निश्चय ही उसकी ओर लपकेगा। स्तनपायियों में भी सहजक्रियाएं किसी एक क्षोभक के उत्तर में शुरू होती हैं और विभिन्न जातियों के जीवों की विभिन्न उद्दीपनों के संबंध में वही प्रतिक्रिया हो सकती है।

मिसाल के लिए, मालूम है कि बच्चा कुत्ते का हो या भेड़ का, वह पैदा होते ही मां के स्तन खोजने लगता है और ज्यों ही वह मिल जाता है, त्यों ही ताक़त लगाकर उसे चूसने लग जाता है। पाया गया है कि इन क्रियाओं के प्रोग्रामों पर अमल विभिन्न संकेतों के फलस्वरूप शुरू होता है। पिल्ला केवल गरम रोयों पर ही प्रतिक्रिया दिखाता है। यदि हम कुतिया की जगह पर गरम पानी की बोतल रख दें, तो पिल्ला कोई खोजमूलक प्रतिक्रियाएं पैदा नहीं करेगा। किंतु यदि एक गरम खाल का टुकड़ा रख दिया जाए, तो वह तुरंत मां का स्तन खोजने लग जाएगा।

मेमना सिर के ऊपरी भाग के ढ़के जाने पर प्रतिक्रिया करता है। जब उसके मुंह में दूध पिलाने की बोतल लगाई गई, तो उसने चूसने की कोई क्रिया नहीं की, किंतु जब साथ ही उसके सिर के ऊपरी भाग को ढ़का गया, तो वह बोतल को तुरंत चूसने लगा।

अतः सहज क्रियाएं बड़ी संख्या में विविध क्षोभकों का परावर्तन नहीं होती, वे सिर्फ़ निश्चित संकेतों का परिणाम होती हैं। कहा जा सकता है कि वे कशेरुकियों की परावर्तन क्षमता को सीमित कर देती हैं। कशेरुकियों में एक नलिकाकार तंत्रिका-तंत्र ( मेरूरज्जु और प्रमस्तिष्क सहित ) विकसित होता है, जो उनकी परिवेशीय परिवर्तनों के अनुरूप प्रतिक्रिया करने की योग्यता को और बढ़ा देता है। गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले जीवों की तुलना में कशेरुकियों में ग्राहियों का विभेदीकरण ( विशिष्टीकरण ) कहीं ज़्यादा होता है। उदविकास की प्रक्रिया द्वारा पेश की गई संभावनाओं को मात्र सहज व्यवहार द्वारा ही यथार्थ में परिणत नहीं किया जा सकता। इस हेतु परावर्तन कई नये आयाम विकसित करता है।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम इन नये आयामों के रूप में अवयवियों द्वारा उपार्जित व्यवहारों के उदाहरणों पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां क्षोभनशीलता पर हम एक संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया गया था। इस बार व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियां

( पिछली बार हमने क्षोभनशीलता पर चर्चा करते हुए गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले जीवों में बाह्य क्षोभकों पर प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न सक्रियता को समझने की कोशिश की थी। यही उनका व्यवहार सुनिश्चित करती है। इस बार हम जीवों के व्यवहार के इन्हीं संरूपों को, उनके उत्सों को समझने की कोशिश करेंगे। यहां प्रचलित दृष्टिकोणों से अलग से लगते कुछ इशारे मिल सकते हैं, जो अपना एक वैज्ञानिक आधार रखते हैं। इसलिए थोड़ी सी एकाग्रता और गंभीरता की दरकार है )

कृमियों का व्यवहार सीलेंटरेटा की अपेक्षा अधिक जटिल होता है। उनके व्यवहार की मुख्य विशेषता सक्रिय खोज है।

उदाहरण के लिए, केंचुए पहले गिरे हुए पत्तों को उनके नुकीले सिरों से पकड़ते हैं और इसके बाद ही उन्हें अपने छिद्रों में खींचते हैं। अनेक अनुसंधानों ने दिखाया है कि कृमियों का “सोद्देश्य” व्यवहार पत्ते के सिरे पर मौजूद रासायनिक पदार्थ की प्रतिक्रिया है, न कि पत्ते के आकार की प्रतिक्रिया। कृमियों में हमें जातीय स्मृति की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है, जो अपने को सहज अननुकूलित प्रतिवर्तों में प्रकट करती है। उदाहरण के लिए, कतिपय एनेलिडा प्रजातियों की मादाएं अपने बच्चों की देखभाल की आनुवंशिक क्षमता प्रदर्शित करती हैं। वे अपनी वासयोग्य नलिका के भीतर अंडे देने के बाद अपने को ज़ोर से इधर-उधर हिलाने लगती हैं और इस तरह भ्रूणों के सांस लेने के लिए नलिका में ताज़ा पानी पहुंचाती हैं।
किंतु यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अननुकूलित प्रतिवर्त सर्वथा सुनिश्चित परिवेशीय परिस्थितियों में ही पैदा होते हैं। दूसरी ओर, परिवेश निरंतर बदलता रहता है और इसलिए जातीयतः निर्धारित आनुवंशिक प्रतिक्रियाओं के अमली रूप लेने में बाधा पड़ सकती है। गुच्छिकामय तंत्रिका-तंत्रों वाले जीवों की परावर्तन-योग्यताएं अननुकूलित प्रतिवर्तों तक ही सीमित नहीं है। अपने जीवनकाल में वे बाह्य प्रभावों से संबंधित अनुक्रिया के नये रूप विकसित करते हैं, जो सहज प्रतिक्रियाओं से अधिक लचीले होते हैं। ये अनुकूलित प्रतिवर्त हैं।

यद्यपि सीलेंटरेटा भी अस्थायी संबंध ( अनुकूलित प्रतिवर्त ) विकसित कर सकते हैं.फिर भी कृमियों के अनुकूलित प्रतिवर्त स्पष्टतः उच्चतर श्रेणी के हैं, क्योंकि वे एक निश्चित सुनम्यता का प्रदर्शन करते हैं ( इसके बावज़ूद कि उन्हें भी अपने पैदा होने के लिए बड़ी संख्या में तरह-तरह के क्षोभकों की जरूरत होती है )।

एक प्रयोग किया गया, जिसमें कृमियों को अपने छिद्र तक पहुंचने के लिए लैटिन के T अक्षर के आकार की भूलभुलैया से बाहर निकलने का रास्ता खोजना था। जब निकास दायें सिरे पर होता था और कृमियों को बायीं ओर से बिजली का झटका दिया जाता था, तो वे १२०-१८० प्रयोगों के बाद दायीं ओर मुड़ना सीख जाते थे। बाद में जब बिजली के तारों को दूसरे सिरे पर स्थानांतरित किया गया और निकास को बायें सिरे पर रखा गया, तो कृमियों ने अपनी अनुक्रिया को तदअनुसार बदल लिया। मगर यह उल्लेखनीय है कि पुनर्शिक्षण-काल आरंभ में आदत बनने में लगे काल से दो-तीन गुना छोटा था।

कृमियों में जन्मजात व्यवहार-संरूपों ( भावी सहजवृत्तियों के पूर्वगामियों ) के प्रथम चिह्न भी मिलते हैं और साथ ही परावर्तन का एक अधिक नमनीय रूप, अनुकूलित प्रतिवर्त भी।  गुच्छिकामय तंत्रिका-तंत्र की ज़्यादा पेचीदी संरचना परवर्तन की ओर अधिक गुंजाइश पेश करती है।

आर्थोपोडा और खास तौर से कीटों की एक विशेषता उनमें सहजवृत्तियों की मौजूदगी है। सहजवृत्तियां, जीव की परिवेश की परिस्थितियों से संबंधित प्रतिक्रियाओं का एक जटिल जन्मजात रूप है। कुछ निश्चित क्षोभकों के प्रति प्रतिक्रियाओं का उनका एक श्रृंखलित स्वरूप होता है और उन्हीं की वज़ह से ही जीव एक के बाद एक अनुकूलनात्मक क्रियाएं करता जाता है

उदाहरण के लिए, मकड़ियों की कुछ जातियों की मादाएं अपने अंडों के लिए जाली के कृमिकोष बनाती हैं। मादा इस कॄमिकोष को संभालकर रखती है और प्रायः उसकी जगह बदलती रहती है। ज्यों ही नन्हीं मकड़ियां परकट होती हैं, मादा उनसे नज़र नहीं हटाती। मगर जैसे-जैसे समय गुजरता है और बच्चे बड़े होते हैं, उनकी मां उनकी ओर से उदासीन होती जाती है और अंत में जब वे आत्मनिर्भर बन जाते हैं, वह उन्हें छोड़ देती है।

मधुमक्खियों में उनके सामूहिक व्यवहार-संरूपों से संबंधित बड़ी ही पेचीदी सहजवृत्तियां पायी जाती हैं।

जैसा कि मालूम है, मधुमक्खियों के हर छत्ते में एक रानी मधुमक्खी, बीसियों नर मधुमक्खियां और कई सौ बांझ कामगार मधुमक्खियां ( अविकसित जननेंद्रियोंवाली मादाएं ) होती हैं। सबसे जटिल कामगर मधुमक्खियों का व्यवहार होता है। अपने विकास के दौरान ऐसी हर मधुमक्खी अपने प्रकार्य बदलती रहती है। शुरू में वह लार्वा को खिलाया करती है, छत्ते की सफ़ाई करती है, बाद में उसका काम छत्ते की रक्षा करना, खाना लाना और कोशिकाएं बनाना हो जाता है।
बिलकारी बर्र की सहजवृत्तियां भी उसके द्वारा किये जानेवाले कार्यों की एक जटिल श्रृंखला है। ज़मीन में बिल बनाकर वह हर बार जब भी उसे खाने की तलाश में जाना होता है, बिल के मुंह पर मिट्टी का लौदा लगा देती है। जब वह लौटती है, तो पहले शिकार ( खाने ) को द्वार पर रखती है, लौंदे को हटाती है, बिल की जांच करती है और इसके बाद ही शिकार को भीतर ले जाती है।

अनजान आदमी को आर्थोपोडा का ऐसा स्पष्टतः कार्यसाधक व्यवहार आश्चर्य में ड़ाल सकता है, किंतु इसमें किसी भी तरह का कोई सचेतन प्रयास नहीं है। वास्तव में ये निश्चित बाह्य उत्तेजकों की स्वचालित प्रतिक्रियाएं ही हैं, जो दत्त जाति के सभी जीवों द्वारा एक ही ढ़ंग से की जाती हैं। सहज व्यवहार परिस्थितियां बदलने पर भी नहीं बदलता, किंतु तब वह कार्यसाधक नहीं रह जाता, और इसके लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी का बदलना या छूट जाना ही काफ़ी है। ऐसी कई परिस्थितियों के प्रेक्षण तथा अध्ययन किये गये हैं, जो सहजवृत्तियों को बेमानी बना देती हैं।

उदाहरणार्थ, बहुत बार परजीवियों द्वारा कृमिकोष के भीतर के अंडों को खा लिये जाने के बावज़ूद, मादा मकड़ी उस खोखले कृमिकोष की फिर भी रक्षा करती है और अपने साथ ले जाती है। ऐसा भी होता है कि मादा मकड़ी कृमिकोष बनाती है, अंडे देने की क्रियाएं करती हैं, किंतु असल में अंडे देती नहीं। इस असफ़लता के बावज़ूद वह आगे की सभी क्रियाएं करती है, यानि खाली कृमिकोष को बंद करती है और अपने साथ ले जाने लगती है।
मधुमक्खियों की प्रतिक्रियाओं की कार्यसाधकता भी काफ़ी सापेक्ष है। यदि छत्ते के पिछले हिस्से को काट दिया जाए, जिसमें शहद संचित किया जाता है, तो मधुमक्खी फिर भी उसमें शहद की एक निश्चित मात्रा रखकर अगले हिस्से को मोम से बंद कर देगी, जबकि पिछले हिस्से से शहद बाहर बहता रहेगा।
एक बर्र के रूढ़ अलाभकर व्यवहार का एक दिलचस्प प्रेक्षण है। जब वह एक मृतप्राय टिड्डे को पकड़कर लाई और सभी बर्रों की तरह पहले अपने बिल की जांच करने गई, तो अध्येता ने बिल के मुंह के पास रखे टिड्डे को कुछ दूर हटा दिया। बाहर आने पर बर्र ने टिड्डे को खोजा, खींचकर बिल के मुंह के पास ले आई और फिर से बिल के अंदर जांच करने गई। अध्येता ने चालीस बार टिड्डे को हटाया और हर बार बर्र फिर से उसे खोजकर बिल के मुंह के पास ले गई और फिर उसे खींचकर अंदर ले जाने से पहले बिल की जांच करने के लिए भीतर गई। अध्येता को ही बर्र की इस सहजवृत्ति से हार मान लेनी पड़ी।

ये मिसालें सहजवृत्ति की सीमाएं दिखाती हैं। सहजवृत्ति-जन्य क्रियाएं कुछ निश्चित परिस्थितियों से ही जुड़ी होती हैं। सहज व्यवहार के क्रियातंत्र को बाह्य परिस्थितियों द्वारा प्रवृत्त किया जाता है, जो प्रतिवर्ती अनुक्रिया को पैदा करती है। यह अपनी बारी में अगली और वह उससे अगली अनुक्रिया को जन्म देती है। इस प्रकार प्रतिवर्तों की सारी श्रृंखला एक आनुवंशिक प्रोग्राम बन जाती है। जैसे ही परिवेशीय परिस्थितियों के मानक रूप में परिवर्तन आता है, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं अपनी कार्यसाधकता खो बैठती हैं। इस तरह जीवधारियों में सहजवृत्ति पर आधारित व्यवहार-संरूप अपरिवर्तित परि्स्थितियों में ही कार्यसाधक होते हैं।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम सहजवृत्तियों पर ही बात को और आगे बढ़ाएंगे, और देखेंगे कि इनकी सीमाएं लांघ कर जीव किस तरह अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने जीवन के क्रमविकास और तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति से संबंधित अवधारणाओं पर नज़र ड़ाली थी। इस बार हम यथार्थता के सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन में अंतर को समझने की कोशिश करेंगे। चेतना की उत्पत्ति के मद्देनज़र इनसे गुजरना एक पूर्वाधार का काम करेगा।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन

क्या तंत्रिकातंत्र और मस्तिष्क की उत्पत्ति का यह मतलब है कि उच्चतर जानवरों में चिंतन क्षमता तथा तर्कबुद्धि होती है और वे सचेत व्यवहार कर सकते हैं?

सरलतम एककोशिकीय अंगियों में यथार्थता ( reality ) का परावर्तन (Reflection, a reflex action, an action in return) अत्यंत आदिम रूप में होता है। यदि एक एककोशिकीय अंगी, अमीबा युक्त एक पात्र में अम्ल के सांद्रण ( concentration ) को बढ़ा दिया जाए, तो अमीबा उस तरफ़ को चला जाएगा, जहां अम्ल का सांद्रण कम है। यदि वह संयोगवश भोजन से टकरा जाता है, तो उसे अपने शरीर के किसी भी भाग से गड़प जाता है। इस तरह अमीबा अपने व्यवहार और गति के लिए कोई निश्चित दिशा और लक्ष्य तय नहीं करता।

उत्तेजनशीलता ( Excitability ) के आधार पर यथार्थता के प्रति मात्र निष्क्रिय अनुकूलन ही संभव हो सकता है। निष्क्रिय अनुकूलन का अर्थ है कि एक जीवित अंगी अपने अस्तित्व के लिए केवल पर्यावरण मे उपलब्ध अनुकूल दशाओं को ही चुनता है, किंतु उनकी रचना करना तो दूर, उन्हें खोजता तक नहीं है। पौधों सहित सभी बहुकोशिकीय अंगियों में भी उत्तेजनशीलता होती है। खिड़की पर रखा जिरेनियम का पौधा प्रकाशित पक्ष से अप्रकाशित पक्ष को हार्मोनों की गति के जरिए अपनी पत्तियों को उस दिशा की ओर मोड़ लेता है, जहां से उसकी जीवन क्रिया के लिए आवश्यक अधिक सौर प्रकाश उस पर पड़ता है। यह भी एक तरह का चयनात्मक ( Selective ), फिर भी निष्क्रिय अनुकूलन है, क्योंकि जिरेनियम न तो प्रकाश की खोज में जाता है और न ही प्रकाश की कमी होने पर उसकी रचना करता है।

जब तंत्रिकातंत्र अधिक जटिल हो गया और मस्तिष्क की उत्पत्ति हो गई, तो धीरे-धीरे निष्क्रिय से सक्रिय अनुकूलन में संक्रमण होने लगा। उच्चतर जानवरों में ( पक्षियों और ख़ास तौर से स्तनपायियों में ) सक्रिय अनुकूलन अपने निवास के लिए अनुकूल दशाओं की खोज से संबंधित होता है और व्यवहार के जटिल रूपों के विकास की ओर ले जाता है।

उच्चतम स्तनपायियों में व्यवहार के और भी अधिक जटिल रूप पाये जाते हैं। मसलन, कई शिकारी जानवर अपने क्षेत्र की हदबंदी कर देते हैं और दूसरों को उसके अंदर शिकार नहीं करने देते। एक अनुसंधानकर्ता ने अपने प्रेक्षण के दौरान देखा कि एक भूखी मादा भेडिया एक जंगली हंस का ध्यान आकृष्ट करने तथा झील के तट पर पानी से कुछ दूर उसे अपनी तरफ़ खींचने के लिए घास में उलट-पलट कर, तथा अगल-बगल करवटें लेकर नाचते हुए एक ‘शौकिया नृत्य प्रदर्शन’ कर रही है, उसने हंस को पानी से बाहर काफ़ी दूर तक अपनी ओर आकृष्ट किया और जब उनके बीच की दूरी काफ़ी कम हो गयी, तो अपने शिकार पर झपट्टा मार दिया।

हम जानते हैं कि चींटियां और मधुमक्खियां अत्यंत जटिल संरचनाएं बनाती है, बीवर नामक जीव छतदार बिल और बिल तक जाने के लिए पानी के नीचे से रास्ता ही नहीं बनाते, बल्कि असली बांध भी बनाते हैं, इससे भी बड़ी बात यह है कि वे पानी के बाह्य प्रवाह के लिए तथा तलैया में स्तर के अनुसार नियंत्रण रखने के लिए एक निकास द्वार भी छोड़ देते हैं। इन सब बातों से जानवरों के कथित तर्कबुद्धिपूर्ण, सचेत व्यवहारक की बात कहने का आधार मिलता है, पर वास्तव में यह परावर्तन के अत्यंत विकसित रूपों के आधार पर, पर्यावरण के प्रति उच्चतर जानवरों के सक्रिय अनुकूलन मात्र का मामला हो सकता है।

उच्चतर जानवरों में सक्रिय अनुकूलन, अपने निवास के लिए अपने परिवेशी पर्यावरण का सक्रिय उपयोग, अधिक अनुकूल दशाओं की खोज तथा अपनी जीवन क्रिया के लिए, चाहे सीमित पैमाने पर ही क्यों ना हो, पर्यावरण को अपने अनुसार अनुकूलित करने में निहित होता है। किंतु उनके क्रियाकलापों में कोई योजना नहीं होती और वे बाह्य वास्तविकता को आमूलतः रूपांतरित नहीं करते।

जानवरों के व्यवहार के अनेक रूप, क्रमविकास के लाखों वर्षों के दौरान विकसित होते हैं और आनुवंशिकता द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचारित होते हैं। व्यवहार के इन अंतर्जात ( inborn, inbred ) रूपों को सहजवृत्ति कहते हैं और वे अत्यंत जटिल हो सकती हैं। किंतु जीवन की दशाओं में तीव्र परिवर्तन होने पर ये जानवर, अपनी ही सहजवृत्तियों के ‘बंदी’ हो जाते हैं और अपने को नयी स्थितियों के अनुकूल बनाकर उन्हें बदलने में अक्षम होते हैं। इसके अलावा वे उन दशाओं को निर्णायक ढ़ंग से बदलने तथा उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित करने की स्थिति में नहीं होते।

इस बात को स्पष्ट करने के लिए हम अत्यंत संगठित कीटों के जीवन से एक उदाहरण लेते हैं। चीड़ के पेड़ों पर रहने तथा जुलूस की शक्ल में चलनेवाले पतंगों की शुंडियां भोजन की तलाश में एक सघन कालम बनाकर आगे बढ़ती हैं। प्रत्येक शुंडी अपने आगेवाले को अपने रोयों से छूते हुए उसके पीछे-पीछे चलती है। शुंडियां महीन जालों का स्रावण करती हैं, जो पीछे से आनेवाली शुंडियों के लिए मार्गदर्शक तागे का काम देता है। सबसे आगेवाली शुंडी सारी भूखी सेना को चीड़ के शीर्षों की तरफ़, नये ‘चरागाहों’ की तरफ़, ले जाती है।

प्रसिद्ध फ़्रांसीसी प्रकृतिविद जान फ़ाब्रे ने अगुआई करने वाली शुंडी के सिर को कालम के अंत की शुंडी की ‘पूंछ’ की तरफ़ लगा दिया। वह फ़ौरन मार्गदर्शक तागे से चिपक गई और, इस तरह, ‘सेनापति’ शुंडी मामूली ‘सिपाही’ में तब्दील हो गई, तथा उस सबसे पीछे वाली शुंडी के पीछे-पीछे चलने लगी, जिससे वह जुडी हुई थी। इस तरह कालम का सिरा और दुम परस्पर जुड गये और शुंडियों ने एक ही स्थान पर एक मर्तबान के गिर्द अंतहीन चक्कर काटने शुरू कर दिये। सहजवृत्ति उन्हें इस मूर्खतापूर्ण स्थिति से छुटकारा दिलाने में असमर्थ सिद्ध हुई। भोजन पास ही रख दिया गया लेकिन किसी भी शुंडी ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। एक घंटा बीता, दूसरा बीता, दिन गुजर गये और शुंडियां, मंत्रमुग्ध जैसी चक्कर पर चक्कर लगाती रहीं। वे पूरे एक सप्ताह तक चक्कर लगाती रहीं, इसके बाद कालम टूट गया, शुंडियां इतनी कमजोर हो गयीं कि अब वे जरा भी आगे नहीं बढ सकीं।

स्पष्ट है कि शुरूआत में जो सवाल पेश किया गया था, उसका सिर्फ़ नकारात्मक उत्तर ही दिया जा सकता है। अर्थात तंत्रिकातंत्र और मस्तिष्क की उपस्थिति मात्र से ही, चिंतन क्षमता और तर्कबुद्धियुक्त सचेत व्यवहार पैदा हो पाना संभव नहीं हो जाता।
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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय