समलेंगिकता पर यह भी पढ़ डालिए

हे मानव श्रेष्ठों,

समलेंगिकता पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, पढा़ जा चुका है। अभी समय ब्लॉग पर है अतः यह भी कहेगा कि बहुत ब्लॉग काले किए जा चुके हैं। समय अधिकतर से गुजरा है और यह कहने में कोई संकोच नहीं रखता कि इक्का-दुक्का जगहों को छोडकर अधिकतर जगह इस पर परंपरा में मिले बने-बनाए ढांचे के अंतर्गत ही अपने दिमाग़ का घोडा़ खूब दौडाया गया है।

तो चलिए आज दृष्टि डालते हैं और पडताल करते हैं, समलेंगिकता पर की गयी महान चर्चाओं में पेश की गई कुछ प्रवृतियों की। समय की दिलचस्पी इन्हीं में है, उसका इरादा यहां समलेंगिकता पर कोई नया पुराण लिखना नहीं है।

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एक बात तो यह कही गई कि यह प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ़ है।

चलिए पहले प्रकृति की व्यवस्था की ही बात कर लेते हैं। समय को सिर्फ़ इस तर्क में दिलचस्पी है। अब यह बात बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं रह गई है कि प्रकृति का हमसाया होकर नहीं वरन मनुष्य नाम का प्राणी सिर्फ़ इसी वज़ह से अस्तित्व में आया कि वह प्रकृति के खिलाफ़ खडा हो गया। उसने प्रकृति की हर व्यवस्था को चुनौती दी और प्रकृति को अपने हिसाब से ढ़ालना सीखा।आज मनुष्य के पास प्रकृति की व्यवस्था का कुछ नहीं बचा है, वरन उसने प्रकृति को अपनी व्यवस्था में ढा़ल लिया है। प्राकृतिक वर्षा का मामला कुछ जरूर निर्भरता रखता है, पर इससे भी कई जगह वह अपनी निर्भरता समाप्त कर चुका है। यह बात दीगर है कि प्रकृति के इस अनियोजित दोहन और निरूपण के प्रभावों के पश्चात अब वह इसके भी समुचित नियोजन की ओर उन्मुख हो रहा है।

अतएव इस तर्क के जरिए समलेंगिकता को खारिज़ करना उचित नहीं जान पडता।

अब जरा यह भी देख लें कि वास्तव में प्राकृतिक व्यवस्था के निमित्त मनुष्य का सामान्यतया क्या दृष्टिकोण है। यदि दो विपरीत लिंगियों का यौन आकर्षण और तदअनुरूप क्रियाएं प्राकृतिक व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं, तो इनके लिए मनुष्य-समाज में कितनी सहजता है, यह कितनी सुलभ और सर्वमान्य हैं, यह किसी से भी छुपा नहीं है। मनुष्य का सारा धार्मिक इतिहास इन्हीं की वर्जनाओं और प्रतिबंधों से भरा पडा़ है। मनुष्य के इतिहास की अधिकतर उर्जा इन्हीं के दमन में नष्ट हुई है। क्या ब्रह्मचर्य का पालन, उपवास, शरीर को कष्ट पहुंचाना, प्रेम की खिलाफ़त, अन्याय, शोषण आदि-आदि प्राकृतिक व्यवस्था के खिलाफ़ नहीं है?

एक और नज़रिया देखें।

यदि समलेंगिकता से कुछ देर के लिए यौन क्रियाओं को अलग कर देते हैं, तो हे मानव श्रेष्ठों क्या बचता है? दो समान लिंगियों के बीच के भावनात्मक और दोस्ताना संबंध ही ना। अब बताइये, दो विपरीत लिंगियों के बीच तो मनुष्यों ने इतनी बड़ी खाई खडी कर रखी है कि समाज में सहज रूप से उपलब्ध ये भावनात्मक और दोस्ताना संबंध सिर्फ़ और सिर्फ़ समान लिंगियों के बीच ही पनपते देखें जा सकते हैं।

पुरूषों के सिर्फ़ पुरूष मित्र होते है, स्त्रियों के सिर्फ़ स्त्री मित्र। दो विपरीत लिंगियों के बीच मित्रता, भावनात्मक और दोस्ताना संबंध की बात तो अभी भी अधिकतर रूप से सूली पर चढाने के योग्य मानी जाती है, असामाजिक और अनैतिक।फिर जरा सोचिए, आज के इस असुरक्षा, अविश्वास और अनिश्चितता के माहौल में भावनात्मक, दोस्ताना, और सुरक्षित संबंधों को ढूंढ़ते ये समलेंगिक मित्र यदि साथ रहना निश्चित कर लेते हैं ( अभी यौन क्रियाएं की बात ही नहीं उठाई जा रही है), जीवन के इस संघर्ष में हमराही होने में ज्यादा निश्चिंतता पाते हैं तो क्या वाकई यह इतना असहज कार्य कर रहे हैं?

और यदि यह साथ रहना, यह भावनात्मक लगाव, शारीरिक जरूरतों की यह प्राकृतिक आवश्यकता यदि उनके बीच थोडी बहुत तात्कालिक यौन क्रियाओं की संभावनाओं के हालात भी पैदा कर देती है, तो बताइये क्या यह उनकी सामाजिक व्यवस्थागत नियती नहीं है?

यहां प्राकृतिक असंतुलन या कमियों के चलते समलिंगियों के प्रति किसी मनुष्य के सहज आकर्षण को अलग से देखे जाने की जरूरत है। जाहिर है यह भी प्राकृतिक शक्तियों के कारण ही उनकी नियति है जो कि अंततः उन्हें प्राकृतिक विपरीत लिंगी व्यवस्था के खिलाफ़ जाने की प्राकृतिक आवश्यकता बन रही है। ऐसे लोगों को समाज में किस तरह उपहास और विलगता का विषयी बनाया जाता है यह जगजाहिर सी ही बात है। ऐसे सामाजिक व्यवहार के बीच उन्हें कोई अपने जैसा मिलजाना क्या एक नैमत की तरह नहीं है, जिसके लिए वे भगवान? का शुक्रिया अदा करें, और इस सृष्टि में अपना होना भी महसूस करें।

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दूसरी ओर समलेंगिकता को जायज ठहराने के लिए इतिहास से उदाहरण खोज कर लाने और इनके जरिए इसके अस्तित्व की शाश्वतता को स्थापित और प्रमाणित करने की प्रवृति भी दिखाई दी।

बात यहां तक तो ठीक है इतिहास की, अतीत की समालोचना के जरिए मनुष्य किसी भी समस्या के उत्स को खोजने, उसके विकास की प्रक्रिया को समझने और प्राप्त समझ को भावी निदान के लिए उपयोग करने की प्रक्रिया से गुजरे परंतु वर्तमान विसंगतियों को शाश्वत बताने और परिवर्तन के धार को कुंद करने के लिए इतिहास से गडे़ मुर्दे उखाड़ लाने की प्रवृति सामाजिक रूप से खतरनाक है।

अतीत से भविष्य संवारने के सबक सीखे जाने चाहिएं, ना कि यथास्थिति बनाए रखने के लिए चालाकी भरे नुस्ख़े।अतीत की किसी संवृति का उदारहण देकर वर्तमान की किसी भी विसंगति को जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह तो वर्तमान समाज की कई नकारात्मक्ताओं के उदारहण इतिहास में खोजे जा सकते हैं और उनको कायम रखने के लिए पुरजोर बहसें की जा सकती हैं। यह प्रवृति ठीक नहीं है, हालांकि समाज में कई मनुष्यों और समूहों को ऐसे ही प्रयास करते देखा जा सकता है।

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समलेंगिकता को चार प्रकारों या अवस्थाओं में देखा जा सकता है:

१. व्यक्तिवादी, अहंवादी मानसिकता के चलते अक्सर साधन संपन्नों द्वारा यौन क्रीडा़ओं, यौन कुंठाओं की तृप्ति के लिए किए जाने वाले समलेंगिक यौन-व्यापार।

२. उपरोक्त विवेचना के आधार पर पैदा हुए समलेंगिक भावनात्मक संबंध जिनमें यौन क्रियाएं महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
३. ऐसे समलेंगिक भावनात्मक संबंध जिनमें यौन क्रियाएं भी अस्तित्व में आ जाती है और महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

४. शारीरिक हार्मोन असंतुलन और कमियों के चलते बनें समलेंगिक संबंध। ऐसे में कुछ पुरूषों में स्त्रेण प्रवृतियां और कुछ स्त्रियों में पौरुषेय प्रवृतियां देखी जा सकती हैं। यहां दो तरह के जोडे अस्तित्व में आ सकते हैं, एक तो ऐसा जोडा जहां एक सदस्य विपरीत प्रवृतियों में है जबकि दूसरा सामान्य, और दूसरा ऐसा जोडा जहां दोनों ही सदस्य विपरीत प्रवृतियों में हैं परंतु एक जैसे होने के कारण लगाव पैदा होने से एक दूसरे के साथ सामाजिक सुरक्षा और शांति पाते हैं।

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पहली अवस्था निस्संदेह एक व्यक्तिवादी विकृति है जो कि वर्तमान ढ़ांचे के अवशिष्ट की तरह है, इसका प्रतिकार किया जाना चाहिए परंतु इसका व्यवहारिक उन्मूलन इस राजनैतिक-सामाजिक ढ़ांचे में आमूलचूल परिवर्तन से ही संभव है। दूसरी व तीसरी अवस्था भी इसी सामाजिक ढ़ांचे की अनिच्छित अभिव्यक्तियां हैं। जैसा कि ऊपर विवेचित किया गया है यह प्राकृतिक सहज संबंधों के बीच एक आप्राकृतिक असहजता के बंधनों की वज़ह से हैं और इस प्राकृतिक सहजता के निरूपण में ही इनके लोप होने की संभावनाएं हैं। जब मनुष्यों के बीच हर तरह के भेद समाप्त होने की सामाजिक परिस्थितियां विकसित कर ली जाएंगी तो लिंगभेद के हिसाब से भी कुछ तय होने की संभावनाएं नहीं रहेंगी।

तब तक यह वाजिब ही है उनकी उनकी इच्छाओं का सम्मान किया जाए, उन्हें अधिकार दिया जाए कि वे इस मामले में अपने निर्णयों के लिए स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता का यह अहसास ही उनके मूल धारा में लौटने का अवसर प्रदान करेगा। वरना यहां भी कई मामलों में, प्रेम के मामलों की तरह ही मनुष्य इन अपेक्षाकृत कम महत्त्व की चीज़ों को, प्रतिबंधों की प्रतिक्रियास्वरूप ज्यादा ही तूल देता है और एक मानसिक घटाघोप में फंसकर जबरन अपनी इच्छापूर्ति करने की कोशिश करता है और फलतः कई और तरह के अंतर्विरोधों में उलझकर रह जाता है। यह एक सनक और उसकी असहजपूर्ति बनकर रह जाता है।

चौथी अवस्था महत्त्वपूर्ण है और जाहिर है मनुष्य समाज में और भी कई शारीरिक अयोग्यताओं पर सामान्यतया अपनाई जाने वाली सामाजिक व्यवस्थाओं और मान्यताओं के सापेक्ष ही इन्हें तौले जाने की जरूरत है। यह भी एक तरह की शारीरिक अयोग्यता ( physical disability ) है क्योंकि यह भी शारीरिक कमियों के चलते ही पैदा होती है। इसीलिए इस मामले को भी उसी नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है जैसे कि अपंगता, मानसिक अयोग्यताओं, लाईलाज या गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मनुष्यों या समाजिक अन्याय झेल रहे मनुष्यों के मामलों में विचार करते वक्त अपनाया जाता है।

उपरोक्त सभी तरह की समलेंगिकताओं को एक साथ नहीं समेटा जा सकता। तात्कालिक प्रतिक्रियाओं में यह भूल हो रही है कि बिना इनकी बारीकी में गये सभी को एक ही लाठी से हांका जा रहा है। इन्हें अलग-अलग ही देखा जाना चाहिए और तदअनुरूप ही इन पर समुचित नज़रिया अपनाया जाना चाहिए।

समझदारी का तो यही तकाज़ा है।

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लंबा हो ही जाता है, बक-बक में ध्यान ही नहीं रहता। खैर जी, जरूरी लगता है तो मनु्ष्य लंबे रास्तों पर चलता ही है। एक जगह एक नारा देखा था: `shortcuts may cut short your life’

यह दिमाग़ में रखा जा सकता है।
समय
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