टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ ख़ुराक – ४

हे मानवश्रेष्ठों,
इस बार, पिछली कुछ बार की तरह ही समय  की कुछ टिप्पणियां पेश की जा रही हैं।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। आपके दिमाग़ को इनसे कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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पुराण, इतिहास और विज्ञान: क्या है सत्य?…प्रविष्टि पर ‘कल्किआन हिंदी’ पर एक टिप्पणी:
एक बहुत ही अच्छा आलेख जो कि कई मुद्दों को एक साथ छूता है और समझ को आंदोलित करता है।
गुप्त जी की इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि कल्पना हमेशा सत्य और सही होती है, तथा विज्ञान मिथक या गल्प कथाएं हमेशा वास्तविकता का यथार्थ परावर्तन करती हैं।

कल्पनाएं वास्तविकता की ज़मीन से ही पैदा होती हैं, उनका आधार वर्तमान ज्ञान और अनुभवों की श्रृंखलाओं से ही व्युत्पन्न होता है, परंतु वे जाहिरा तौर पर यथार्थ नहीं होती। वास्तविकताओ का आरोपण, अव्यवहारिक परिस्थितियों पर किया जाकर ऊलजलूल कल्पनाएं की जा सकती हैं, की जाती रही हैं। जाहिर है, इन्हें यथार्थाधारित संभावित परिणामों की कल्पनाओं से अलग किया जाना आवश्यक होता है।

ऐसे ही विज्ञान गल्प कथाओं में भी देखा जा सकता है। वहां ऐसी कई कल्पनाओं का चित्रण मौजूद है, जिनमें कई का यथार्थ में उतर आना अभी शेष है, और कई कतई संभव ही नहीं हो सकती।

ऐसा ही हमारे अमूल्य प्राचीन धरोहरों के साथ भी है। वैदिक और पौराणिक साहित्य, जैसा कि गुप्त जी ने कहा कि अपने समय की ही उपज हैं और उनसे तात्कालिक समाज की दशादिशा के ऐतिहासिक संदर्भ उदघाटित हो सकते हैं, होते हैं। इन पर काल संबंधी समस्या इसलिए पैदा होती हैं कि यह श्रुति परंपरा से गुजर कर आगे बढ़े हैं, और लगातार रचे जाने की प्रक्रिया से गुजरे हैं तथा बहुत बाद में जाकर कहीं लिपिबद्ध हो पाए हैं।

इनसे वास्तविकता का निरूपण बेहद सावधानी भरा कार्य होना चाहिए, क्योंकि इनके जरिए हम इतिहास रच रहे होते हैं, जिसके आधार पर कि वर्तमान का समुचित यथार्थ विश्लेषण संभव हो सकता है ताकि बेहतर भविष्य की नींव रखी जा सके।

कई ऐतिहासिक अध्ययन की धाराएं यह महती कार्य कर रही हैं।

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श्रीमद्‍भगवतगीता के साथ मेरे अनुभव…प्रविष्टि पर ‘अनवरत’ पर एक टिप्पणी:
‘गीता ने ऐसे बहुतेरे लोगों को आकृष्ट किया है जिनकी मनोवृत्ति एक-दूसरे से तथा अर्जुन से बिल्कुल भिन्न थी। गीता को भगवदवचन समझा जाता है और इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न अभिरुचि वालों ने ऐसे निराले ढ़ंग से की है कि लगता है, मूल वस्तु ही कुछ ऐसी है जो आंतरिक भेदों को मिटाने के बजाए, ज़्यादा शंकाएं औए खंड़ित व्यक्तित्व पैदा करती है।
वह नीति-दर्शन निश्चय ही अत्यंत संदिग्ध होता है जिसकी व्याख्या विभिन्न समाजों में विकसित हुए दिमागों ने इतने विभिन्न रूपों में की हो। उसकी मौलिक मान्यता क्या रह जाती है, अगर उसका अर्थ इतना लचीला है? फिर भी, यह पुस्तक ( गीता )कई मायनों में उपयोगी तो है ही।’

ये एक भारतीय मानवश्रेष्ठ के शुभवचन हैं। जो गीता की वस्तुगतता पर कई महत्वपूर्ण इशारे करते हैं। गीता एक ऐसा धर्मग्रंथ है जिससे मान्य ब्राह्मण कर्मकांडों का तिरस्कार किये बिना, किसी भी तरह की सामाजिक कार्रवाई के लिए प्रेरणा और औचित्य प्राप्त किया जा सकता है, यही कारण है जो इसकी प्रतिष्ठा को सर्वव्यापक बनाता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय, सभी तरह की विरोधी विचारधाराओं वाले कई महापुरूष इस एक ही किताब से यही प्रेरणा और औचित्य प्राप्त कर रहे थे।

इसमें तत्कालीन उपस्थित सभी तरह की दर्शन विचारधाराओं का संश्लेषण है, इसलिए यह विरोधाभासों से भरी हुई है। गीता की अपनी जो विलक्षण त्रुटी है, अर्थात असंगति में संगति की प्रतीति कराने का कौशल, वही उसकी उपयोगिता का हेतु भी है।

इसलिए अपनी आस्था का विषयी बनाकर, गीता से अपने किसी भी तरह के कर्म का औचित्य प्राप्त करने की अवसरवादिता सिद्ध करने का जरिया बनाने की बजाए, इसके समुचित विश्लेषण की गहराइयों मे उतरकर चीज़ों को जैसी वह हैं, समझने का जरिया बनाने की राह प्रशस्त करनी चाहिए। इसके नये भाष्य और व्याख्याओं की जरूरत है, ना कि इसके प्रचलित धार्मिक अवसरवादी आख्यानों की प्रस्तुति भर।

आपने इस आलेख में इस पर कुछ इशारे किए हैं। यदि आप वाकई में यदि गीता पर कुछ प्रस्तुत करने का मन बनाते हैं जैसी की यहां अपेक्षाएं की जा रही हैं, तो यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि आप उपरोक्त जरूरतों की पूर्ति का भरसक प्रयत्न करेंगे।

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नास्तिकता मेरी नज़र से…प्रविष्टि पर ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर एक टिप्पणी:
एक संतुलित और सारगर्भित आलेख।

नास्तिकता पर बहस को यह एक गंभीर दिशा दे ही रहा है, पर यह वह राह भी दिखा रहा है कि किस तरह का परिवेश बचपन को दिया जाना चाहिए।

संगीता जी से यह पूछने की हिमाकत कर रहा हूं, कि वे अंधविश्वासों में यकीन क्यों नहीं करती? इस प्रश्न से ईमानदार माथापच्ची शायद उन्हें अपनी चेतना के परिष्कार का कुछ अवसर उपलब्ध करवा सके।

मनुष्य का ज्ञान और समझ जितना विकसित होती जाती है, उसी स्तर के अनुरूप वह कम स्तर की चीज़ों का तार्किक विश्लेषण करने की हिमाकत करने लगता है, और परंपराओं से प्राप्त मान्यताओं को तौलने लगता है।

जाहिर है उनका अभी तक का ज्ञान और समझ जिस तरह से कई चीज़ों से उन्हें मुक्त कर पाया है। अगर उनका संधान यहीं नहीं रुकता तो वे और भी कई चीज़ों से मुक्त होने की असीम संभावनाएं रखती हैं। अपने अनुकूलन से संघर्ष वाकई एक मुश्किल कार्य है। इस हेतु उन्हें शुभकामनाएं।

संदेह से उत्पन्न नास्तिकता को सैद्धांतिकता का एक आधार चाहिए होता है, अगर वह नहीं मिलता तो पुराना अनुकूलन फिर से हावी हो सकता है। शायद वे समझना चाहें।

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अगर धर्म एक अच्छे इंसान होने का…प्रविष्टि पर ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर एक टिप्पणी:
लिखे तो सटीक मित्र, पर इतना आक्रामक होने की जरूरत नहीं लगती। समझदारी को विनम्रता लानी ही चाहिए, या यूं कहें कि यह लाती ही है। भाषा-प्रयोग में सावधानी बरतना हमें सीखना ही चाहिए।

आखिर यह पारिस्थितिक संयोग ही है कि हम अपने चुनावहीन परिवेश की पैदाईश हैं और समझ तथा ज्ञान के तदअनुकूल स्तर से ही आगे की राह निकालने की जुंबिशों में रहते हैं। इसलिए सापेक्षतः पीछे लग रहे अपने मानव-बांधवों के प्रति हमारे मन में उनकी लाख उठापटकों के बावज़ूद सहानुभूति का भाव रखना ही श्रेष्ठ है, ना कि मखौल बनाने का।

आपने बहुत बढ़िया बात उठाई है। अगर इस पूरे प्रपंच को बारीकी से देखा-समझा जाए तो यह आसानी से पकड़ा जा सकता है कि मनुष्य के अच्छे और बेहतर होने की संभावनाएं सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म से मुक्त होने से ही प्रशस्त हो सकती हैं। जहां उसके हर क्रियाकलाप की जिम्मेदारी ख़ुद लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, कोई पापमुक्ति नहीं होती, कोई वैकल्पिक प्रायश्चित नहीं होता। जाहिरा तौर पर यह स्थिति नई जिम्मेदारियां लेकर आती है, और हमें इसके लिए स्वयं की समझ को निरंतर परिष्कृत करते रहना चाहिए।

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कृत्रिम जीवन कोशिका की प्रयोगशाला में…प्रविष्टि पर ‘कल्किआन हिंदी’ पर तीन टिप्पणियां:
पहली:
आदरणीय श्याम गुप्त जी,
लगता है सबसे पहले हमें अपने भारतीय प्राच्य ज्ञान और वैदिक साहित्य का पेटेंट कराना चाहिए। हमारे यहां यह सब पहले से ही वर्णित है और पाश्चात्य शक्तियां जो आज सिर्फ़ संयोग या किसी दैवीय कृपा से विश्व की सिरमौर बनी हुई हैं, फालतू ही इनका श्रेय अपने नाम कर रही हैं।

क्या खूब बात कही है आपने, यह सिर्फ़ ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक भाग है। पता नहीं क्यों हमारा ईश्वर, उनके ईश्वर के आगे कमजोर पड़ जाता है। सही है, हमें अपने ईश्वर की सहायता के लिए आगे आना ही चाहिए।

हमें अपनी नैतिकता को सर्वोपरी रखना ही चाहिए और सदुपयोग-दुरूपयोगों पर ही अपनी उर्जा खपानी चाहिए। खोज-वोज जैसे बेकार के काम तो कुछ अवैदिक मूर्ख कर ही रहे हैं।

दूसरी:
आदरणीय,
मानवजाति की ऐतिहासिक-वैज्ञानिक समझ यह सिखाती है कि इतिहास के एक काल-विशेष के दौरान, तत्कालीन स्तर का ज्ञान, समझ और चिंतन ही ‘वर्णित’ हो सकता है, और वही ‘वर्णित’ ज्ञान ‘क्रियात्मक’ हो सकता है जो ज़िंदगी की ठोस वास्तविकता से निगमित होता है तथा इसी ठोस वास्तविकता को और बेहतर बनाने का वास्तविक माद्दा रखता है।

मनुष्यजाति इसी ठोस प्राच्य ज्ञान के क्रमिक विकास के फलस्वरूप ही आज की अवस्थाओं को प्राप्त हुई है। वास्तविक ज्ञान सिर्फ़ ज्ञान होता है और उसकी वास्तविकता ही उसे सार्वभौमिक बनाती है, एक वैश्विक सामान्य सहमति तक पहुंचाती है। इसे अपना-पराया, पूर्वी-पाश्चात्य के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। इन सीमाओं में सिर्फ़ काल्पनिकताओं, व्याख्याओं, आस्थाओं आदि को ही रखा जाना श्रेयष्कर हो सकता है।

वास्तविकता तो यह है कि हमारे इसी प्राच्य ज्ञान की भाववादी धारा ने हमारे यहां कल्पनाओं की उड़ान का वह एकतरफ़ा घटाघोप सुस्थापित किया कि तार्किकता, वास्तविकता, वैज्ञानिकता और स्वतंत्र सोच-समझ को समाज ने हमेशा के लिए स्थगित कर दिया। और कमोवेश यही स्थिति अभी तक जारी है। इसी कारण यहां वैज्ञानिक मेधाओं की पैदाईश और विकास के अवसर उपलब्ध ही नहीं है। हमारी और आपकी ऐसी लाखों सदइच्छाओं के बावज़ूद सच यही है। इन परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन ही नई राहें खोल सकता है।

रुका हुआ पानी ही सड़ता है, बहती धाराएं अपना रास्ता खोज ही लेती है। समाज अपने क्रमविकास के दौरान बेहतर को संजोता, उसे और बेहतर करता तथा बेकार को त्याजता चलता है। यही ऐतिहासिक सच्चाई है, हम जैसे भी चाहे इसे देखने और व्याख्यायित करने के लिए स्वतंत्र होते ही हैं।

आपने संवाद के लायक समझ मान बढ़ाया। शुक्रगुजार हूं।

तीसरी:
आदरणीय,

आपने समय की इस पंक्ति, ‘मनुष्यजाति इसी ठोस प्राच्य ज्ञान के क्रमिक विकास के फलस्वरूप ही आज की अवस्थाओं को प्राप्त हुई है।’, का विस्तार किया, उसे समझाया। शुक्रगुजार हूं।

क्रमिक विकास के प्रति आपकी स्वीकरोक्ति से यह साफ़ होता है कि आप अच्छी तरह से समझते हैं, कि इस क्रम-विकास के बहुत ज़्यादा निचले पायदान वाला ज्ञान, ऊपर वाले पायदान से बेहतर और श्रेष्ठ नहीं हो सकता। आगे के ज्ञान का आधार तो खैर वह होता ही है।

मतलब आप यही कहना चाहते हैं, और जो आपकी बुद्धिमता का परिचायक है, कि प्राच्यज्ञान की ए बी सी ड़ी से अपने आपको गुजारते हुए, ज्ञान के क्रमिक विकास का अध्ययन करते हुए, मनुष्य को अद्युनातन ज्ञान की उंचाईयों को छूना चाहिए। यहां कोई मतभेद नहीं है, आप वाज़िब फरमा रहे हैं।

समस्या तो अतीत को, पुरातन को, प्राच्य को श्रेष्ठतम मानते और बताते हुए, उसी की ओर लौटने की प्रवृत्तियों की वज़ह से है। अगर अतीत में सबकुछ सर्वश्रेष्ठ संपन्न हो चुका, तो फिर कल्पनाओं में उड़ने की, नया रचने की आवश्यकता ही कहां रह जाती हैं। बात यही समझने की है।

हम कितना भी कह लें, कितना भी रोकना चाह लें, प्रगति हमेशा आगे की ओर ही होती है। फिर वही बात की हमारी लाख कोशिशों और सदइच्छाओं के बावज़ूद मनुष्य समाज उनको अपनाता रहेगा जो उसके विकास के मुफ़ीद रहेगा, उन्हें छोड़ता जाएगा जो उसकी प्रगति में बाधक बनेगा।

इतिहास का विकास क्रम अपने को दोहराता है, सही कहा आपने। परंतु यह फिर उसी अवस्था को जैसे का तैसा नहीं दोहराता है, उससे श्रेष्ठता के साथ यह दोहराव होता है। इसलिए यह चक्रीय गति में नहीं वरन, ऊपर की ओर जाती सर्पिलाकार वर्तुल गति में होता है, जैसे कि आप एक स्प्रिंग को खड़ा रख दें। जहां क्षैतिज धरातल पर विकास क्रम अपने को दोहराता प्रतीत होता है, दरअसल उर्ध्व धरातल पर वह उससे ऊपर की स्थिति में होता है।

वास्तविकता का यथार्थ और वस्तुगत ज्ञान बहते हुए पानी की तरह होता है, जिसे सभ्यताएं अपने साथ लिये चलती हैं। वहीं वास्तविकता का काल्पनिक और भ्रामक निरूपण, रुके हुए पानी की तरह होता है जो चेतनाओं में कहीं परंपराओं की वज़ह से अवस्थित रह जाए परंतु व्यवहारिक ज़िंदगी उसे छोड़ नई राह पकड़ लेती है। उस उक्ति का शायद यह मतलब होना चाहिए था।

आपने ज्ञान बढ़ाया, शुक्रगुजार हूं।

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मनुष्य के श्रम से विलगाव के….प्रविष्टि पर ‘अनवरत’ पर एक टिप्पणी:
मनुष्य द्वारा जीवन के पुनरुत्पादन और सुविधाओं हेतु आवश्यक उत्पादन करना उसकी नियति है। जाहिर है, उत्पादन होगा तो वह किसी ना किसी रूप में श्रम-प्रक्रियाओं से जुड़ा ही रहेगा। समस्या अभी के परिप्रेक्ष्य में है, और इसे इसी संदर्भ में बेहतर समझा भी जा सकता है। श्रम से विलगाव के जैविक परिणाम सामने ही हैं, और इसके सामाजिक परिणाम भी।

अभी सामाजिक आवश्यकताओं से निरपेक्ष व्यक्तिगतताएं, श्रमविहिन हो जाना ही अपना चरम लक्ष्य मानती है। इसीलिए यह श्रम से विलगाव की अवधारणा उत्पन्न होती है, परंतु यह वस्तुगत नहीं है। अधिकतर मनुष्य किसी ना किसी रूप में उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े हो्ते हैं और किसी ना किसी प्रकार का श्रम कर रहे होते हैं। समाज के ऊपरी पायदान पर बौद्धिक श्रम की बढोतरी और शारीरिक श्रम की कमी होती जाती है। परंतु श्रम से विलगाव मनुष्य के हित में हो ही नहीं सकता।

इसी वज़ह से यह आसानी से देखा जा सकता है, शारीरिक श्रम से विलगित व्यक्ति विभिन्न रोगों का शिकार होते जाते हैं, मनुष्य जीवन के आनंद से भी विलग होते जाते हैं। जैसा कि आपने इशारा किया है। यही वास्तविक परिस्थितियां, वहां अपनी बारी में उन्हें सचेत करती हैं, और यह भी हम देख ही सकते है कि फिर वहां शारीरिक श्रम की वैकल्पिक विधियां खोजी जाती है, किसी ना किसी तरह से शरीर से श्रम करवाने की परिस्थितियां पैदा की जाती हैं। चूंकि यह श्रम व्यक्तिगत रूप से शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, लगभग निरुद्देशीय सा होता है अतः इसमें नीरसता खत्म करने के लिए इसके साथ कई तरह की अवधारणाएं जोड़ी जाती हैं, ताकि इसे आंनंद से भारा जा सके तथा इसे एक सोद्देश्यता प्रदान की जा सके। यानि एक कृत्रिम जीवन शैली का समानान्तर विकास हो रहा है।

मनुष्यजाति का तकनीकि विकास उसके जीवन से भारी, नीरस, कठोर और सापेक्षतः गंदी श्रम-प्रक्रियाओं को खत्म करता है, इसमें उत्तरोत्तर प्रगति शनैः शनैः उत्पादन श्रम-प्रक्रियाओं को और हल्का और कम करेगी ही। जाहिरा तौर पर अभी की खास वर्गों की ही जागीर समझी जानी वाली तथाकथित श्रम-विहीनता और व्यापक होगी और जनसामान्य की ज़िंदगी मे प्रवेश करेंगी। सभी मनुष्यों के पास पर्याप्त समय और सुविधा होंगी कि वे अपनी श्रम की आवश्यकताओं को उनकी ही तरह सृजनात्मक कर सकें, खेलों के जरिए, विभिन्न कलाओं के जरिए, व्यक्तित्वविकास की प्रक्रिया से इन्हें जोड़ सकें,  श्रम करने के लिए ही आनंद के साथ श्रम कर सकें। यानि यह कृत्रिम ना रहकर, सहज और स्वतस्फूर्त ढ़ंग से जीवन को और आनंददायक बनाएगी।

श्रम ने मनुष्य को पैदा किया है, जाहिर है मनुष्य श्रम से विलगित नहीं हो सकता। वह लाख कोशिशें कर ले, श्रम से विलगाव की परिस्थितियां उसे पुनः किसी ना किसी रूप में श्रम की ओर लौटा ही लाएंगी, और यह उसकी इच्छाओं से स्वतंत्र ही होगा।

इस पर अलग से शोध उपलब्ध हो, यह तो नहीं कहा जा सकता। परंतु मानवजाति के अनुभवों और ज्ञान के महान भंड़ार में निश्चित तौर पर इसके निष्कर्ष निकाले जाने लायक इशारे मौजूद हैं। आप अक्सर चेतनाओं में उथल-पुथल करने के अवसर निकालते रहते हैं, अच्छा लगता है।

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इस बार इतना ही।
आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है। अलग से मेल पर भी जिज्ञासाएं की ही जा सकती हैं।

शुक्रिया।

समय

टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक – ३

हे मानवश्रेष्ठों,
समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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विजयादशमी पर विशेष – रामसेतु… प्रविष्टि पर ‘बुराभला’ पर टिप्पणी:

आपकी या श्रृद्धालुओं की आस्था पर जाहिरा तौर पर सवाल खडे़ नहीं किये जा सकते, आखिर यह व्यक्तिगत मामला है और सभी स्वतंत्र हैं कि वे ज्ञान और समझ के किस स्तर पर रहना पसंद करते हैं, उन्हें कहां सुभीता लगता है।

परंतु यहां आप इसे तार्किक औए वैज्ञानिक रूप के साथ रख रहे हैं और आस्था के लिए तार्किक ज़मीन तैयार कर रहे हैं, इसलिए यह नाचीज़ यह टिप्पणी करने की हिमाकत कर रहा है, आशा है मुआफ़ करेंगे और अन्यथा नहीं लेंगे।

अगर आप वाकई वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास और मानवजाति के क्रमविकास को समझना चाहते हैं तो आपकों वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिखे इतिहास और ऐतिहासिक समझ से गुजरना पड़ेगा। ना कि तथ्यों और निष्कर्षों का मनचाहा मानसिक जाल बुनकर अपने को तुष्ट करने का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। और निश्चिंत रहें, उसके बाद भी हमारे पास गर्व करने के लिए काफ़ी सामग्री होगी साथ ही ढ़ेर सारे सबक भी होंगे जिनसे भविष्य को संवारने का उचित रास्ता निकाल सकने की असीम संभावनाएं भी मौजूद रह सकें।

और वैज्ञानिक तरीके से संपुष्ट इतिहास की समझ कहती है, कि हमारे महान ग्रंथ वेदों का समय ही ईसा पूर्व १५००, यानि कि आज से ३५०० वर्ष प्राचीन हैं, और इनका संकलन और लिपिबद्धिकरण तो और बहुत बाद की चीज़ हैं।

हड़प्पा सभ्यता के नगरों के निर्माण का समय २७०० ईसा पूर्व, यानि आज से लगभग ४७०० वर्ष पूर्व का निश्चित हुआ है। जाहिर है सिंधु घाटी की यह सभ्यता वेदों की आर्य सभ्यता से भी प्राचीन है। इसकी खोज ने, जो कि आज से लगभग ८०-९० वर्ष पूर्व ही हुई है, आर्यों के यहीं के होने या बाहर से आने वाले विवाद को भी खत्म कर दिया, और यह निश्चित हो गया कि आर्य ईरान की तरफ़ से आए थे और उनसे पहले यहां सापेक्षतः उनसे बहुत विकसित सभ्यता मौजूद थी।

हमारे इतिहास को जब वैदिक नज़रिए से देखा जाता है, तो काल के उस हिस्से का अध्ययन पूर्ववैदिक और उत्तरवैदिक काल के रूप में किया जाता है। वेदों के समय की सभ्यता का स्तर वेदों से ही मिल सकता है, जिससे साफ़ संकेत मिलते हैं आर्य उस वक्त खानाबदोश अवस्थाओं के पशुपालक अवस्थाओं से गुजर रहे थे। उनके वेद कालीन देवता भी अलग थे, जिनमें इन्द्र सबसे प्रमुख थे, और आपकी जानकारी के लिए यह भी काफ़ी महत्वपूर्ण होगा कि वेदकालीन देवताओं में उत्तरवैदिक देवतागणों जैसे कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के लिए कोई जिक्र नहीं है। हमारे इन महान देवी-देवताओं का बखान हम बाद के महान ग्रंथों उपनिषदों और पुराणों में पाते हैं जो कि निश्चित ही वेदों के बाद के हैं।

अब चूंकि रामायण में इन भी देवी-देवताओं का चरित्र-चित्रण काफ़ी विस्तार से हुआ है, तो जाहिरा तौर पर यह निष्कर्ष निकलना लाजिमी है कि वाल्मिकी रामायण का समय वेदों और पुराणों के बाद का ही है। यह दोहराना अब महत्व नहीं रखता कि वेदों का समय आज से ३५०० वर्ष पूर्व का है, अतः रामायण का काल भी इनके बाद ही ठहराया जा सकता है।

जाहिर है कि इसके समय को ७००० वर्ष पूर्व ले जाना आस्था का विषय तो हो सकता है, परंतु तर्क और वैज्ञानिकता का नहीं।

अतएव आस्था है तो उसे आस्था ही रहने दिया जाए। आस्था को तर्कों और वैज्ञानिकता के दृष्टिकोणों से तौलेंगे तो हो सकता है कि आस्था पर चोट पहुंचने की परिस्थितियां पैदा हों। जो कि जाहिर है हमारा और आपका उद्देश्य या इच्छित कतई नहीं है।

राम हमारे और हमारे जनमानस की आस्था के नायक हैं, उन्हें आस्था की, श्रृद्धा की विषयवस्तु ही रहने दें, उन्हें तर्क और वैज्ञानिकता से तौलना इस आस्था औए श्रृद्धा के खिलाफ़ ही जाएगा।…..

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क्या पुनर्जन्म संभंव है? एक बेबाक….प्रविष्टि पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

लोकप्रिय मामलों में ऐसा होता ही है। आखिर अधिकतर लोग अपने सामान्य सूचनापरक ज्ञान के ही आधार पर ही, उपलब्ध हो पाए ज्ञान के आधार पर ही जीवन के भवसागर में उतरे हुए हैं।

बाकी सब तो है जैसा ही है।
आपकी लिखी एक बात ने चौंकाया। ‘आत्मा की खोज अभी जारी है।’
क्या खूब!

समस्या यहीं से तो शुरू होती है, और वहीं आप संशय छोड़ देते हैं।

अगर आत्मा की खोज अभी जारी है, यानि कि आत्मा के बारे में अभी कुछ खास नहीं कहा जा सकता। आत्मा की उपस्थिति के विचार का ही विस्तार हैं ये सभी मामले, जो आपस में गुंथे हुए हैं।

आत्मा का विचार सबसे प्राचीन है, आदिमकालीन। इसी से हर भौतिक वस्तुओं में आत्मा, देवत्वरोपण, ईश्वर, परमआत्मा आदि-आदि की संकल्पनाएं पैदा हुईं। पुनर्जन्म की अवधारणा का अविष्कार तो इनके सापेक्ष काफ़ी आधुनिक है। हमारे यहां वेदों के समय तक यह पैदा नहीं हुई थी।

अगर आप ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ इसे देखेंगे तब पता पड़ेगा कि इस अवधारणा की उत्पत्ति, लगभग राज्यों और उनके शोषण की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई।

यदि आत्मा है, तो ईश्वर है, चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति है, भूत-प्रेत हैं, जादू-चमत्कार हैं, पुनर्जन्म है, सारी भूल-भुलैयाएं हैं।

इसलिए आत्मा के प्रश्न से जूझना सबसे प्राथमिक है। आप आत्मा के अस्तित्व के सवाल को स्थगित रखकर या अभी संदेह में रखकर, बाकी की बातों के लिए तर्कों के जरिए पुरजोर लड़ाई नहीं लड़ सकते।

विज्ञान की उत्पत्ति के समय ही सर्वप्रथम उसकी उर्जा इन्हीं सब के अस्तित्व को टटोलने में ज्यादा खर्च हुई थी, इसे ऐसे भी कह सकते है पदार्थ और चेतना के संबंधों को समझने के इन प्रयासों से ही विज्ञान की उत्पत्ति हुई थी।

असल विज्ञान जितनी उर्जा खर्च कर सकता था, कर ली गई, और अब उसके पास इन फ़ालतू की चीज़ों के लिए समय नहीं है। अब केवल सूडोसाईंस की कुछ धाराएं ही इस सब पर अभी भी साधनों और उर्जा का अपव्यय करने में लगी हुई हैं, और यह यथास्थिति बनाए रखने की, आम जनमानस को उलझाए रखने की कवायदें वर्तमान व्यवस्था के हितों के अनुकूल हैं, अतः वह इन्हें प्रश्रय और प्रचार उपलब्ध कराता रहता है।

सारी स्थिति विज्ञान और अद्यतन दर्शन के सामने बिल्कुल साफ़ है, यह बात अलग है कि वह आपकी कितनी पहुंच में हैं।…..
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स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियां और कुछ विचार…प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

ग्रामीण इलाकों और शहरों में भी ग्रामीण परिवेशगत मानसिकताओं में इन परिघटनाओं का व्यापक असर है।

आपने इसे यहां उठाकर सही दृष्टि और सरोकारों के साथ विश्लेषित करने का समुचित प्रयास किया है। आप इसमें दो चीज़े औए जोड़ सकती हैं।

एक तो इन परिघटनाओं के पीछे के कुछ काम संबंधी आधार जो कि अक्सर अनछुए रह जाते हैं, या इस तरीके से इन्हें देखना और विश्लेषित करना काम संबंधी वर्जनाओं और अनैतिकताओं के घटाघोपों के चलते जानबूझकर छोड़ दिया जाता है।

दूसरा, जिसका कि आपने सिर्फ़ इशारा किया है पर उसे पुरजोर तरीके से उठाया जाना चाहिए ही, अक्सर ऐसे मामलों का पूरी चेतना और होशोहवास के साथ सृजित किया जाना। यह पूरी तरह से जानबूझकर किया जाता है और इसके पीछे के कारणों को आपने यहां रखा ही है।

कई मामलों में साहित्यिक सी भाषा में यह कहा जा सकता है कि इस तरह की परिघटनाएं पुरूष सत्ता के प्रति उन्हीं के बनाए हथियारों के साथ, हाशिए की स्त्रियों का यह एक विद्रोह है जो इस तरह उन्हें एक छद्म ही सही पर अपनी इच्छित परिस्थितियों के निर्माण का एक अल्पकालिक और कभी-कभी तो दीर्घकालिक भी, अवसर देता है।

पराशक्तियों के मामले में भी सही इशारे किए हैं आपने। जो दावा करता है, संदिग्ध तो वह ऐसे ही हो जाता है, क्योंकि उसे दावा करने की जरूरत पड़ी। यानि कि वह यह दावा करके इसके जरिए कुछ पाना चाहता है।

बहुत कम बार ही ये रोगी-सोगी होते हैं। बाकि जिन्हें दिलचस्पी है वे ऐसे अधिकतर मामलों के पीछे की झूंठ-सिद्धी की कई कहानियां ढूंढ़ सकते हैं।…..
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इसी प्रविष्टि पर आदरणीय वत्स जी की टिप्पणी पर एक प्रतिटिप्पणी:

आधुनिक ज्ञान पुरातन का ही विस्तार होता है, क्रमिक विकास की प्रक्रिया में होता है। नये अनुभव और प्रमाण, पुरानी कई चीज़ों को गलत साबित करते हैं और कई पुरानी चीज़ों की कमियों को रेखांकित कर उसे और सटीक बनाते हैं।

उपवास और यज्ञादि की भी ऐसी ही चीरफ़ाड़ की गई और परंपराओं से जुड़े इन क्रियाकलापों में कुछ तार्किकता ढ़ूंढ़ने की कोशिश की गई कि आखिर इनमें क्या कुछ ऐसा है जिससे मानवजाति फ़ायदा उठा सकती है। यह वत्स जी का इछ्छित है।

समझदारी का तकाज़ा वत्स जी के इच्छित को तो शामिल करता ही है, साथ ही इसे और आगे लेजाकर जो व्यर्थ शाबित हुआ है उससे मुक्ति पाने की मांग भी रखता है।

समस्या यही पैदा होती है।

स्त्रियां किसी विशेष दिन व्रत-उपवास रखती हैं, अगर वे अपने आपको थोड़ा पढे-लिखों में शुमार भी करवाना चाहती हैं तो पूछने पर वे ऐसे ही वत्स जी की तरह जवाब देंगी कि देखो इस बहाने थोड़ा ड़ाईटिंग बगैरा हो जाती है जी।

अगर उनसे कहा जाए कि यह तो ठीक है, चलिए ऐसा कीजिए आप उस विशेष दिन को छोड़ दीजिए, और किसी दिन यह विज्ञान-सिद्ध फ़ायदे उठा लीजिए।

तब असलियत सामने आती है कि इनका यह विज्ञान-सिद्ध रूप नहीं वरन पारंपरिक धार्मिक विश्वास असल मूल में हैं। और इसीलिए यह होता है कि विज्ञान-सिद्धि जाती है भाड़ में और ढ़ोंग बन कर रह जाती है।

अक्सर लोग व्रत-उपवास में सामान्य दिनों से अधिक कैलौरी का सेवन करते हुए देखे जाते हैं, उन्होंने अपने मतलब के हिसाब से कई तोड़ निकाल लिए हैं। असल मंतव्य धार्मिक छद्म के जरिए मिलने वाली उसी मनोवैज्ञानिक, मानसिक तसल्ली का ही है जिसका जिक्र लवली कुमारी कर रही हैं।

किसी अंश की वैज्ञानिकता से, किसी भी पूरे पाखंड़ को जायज नहीं ठहराया जा सकता। वत्स जी तो शायद ही सहमत हों, पर और मानवश्रेष्ठ इस पर विचार कर सकते हैं।

वत्स जी की विधि का ही प्रयोग करके यह भी तो कहा जा सकता है कि कब तक वे सदियों पूर्व की मानसिकता और परिस्थितियों के अनुसार कही और लिखी बातों की भूलभुलैया मे भटके रहकर उसे ही परम ज्ञान की घुट्टी के रूप में परोसते रहेंगे और मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान से नज़रें चुराते रहेंगे।…..
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तो चलें समय के उस फ़लक पर…प्रविष्टि पर ‘ज्योतिष दर्शन’ पर टिप्पणी:

…जब बात प्राकॄतिक परिधटनाओं के संदर्भ में कही जा रही हो जैसा कि आईंस्टीन और बकौल निशांत मिश्र, स्टीफन हॉकिंग के निहितार्थ हैं, बात एकदम वाज़िब है।

विज्ञान के अनुसार प्राकृतिक परिघटनाओं की नियमसंगतता को सिद्धांत के रूप में तभी निरूपित माना जा सकता है, जब यह नियमसंगीतियों के जरिए वस्तुगतता के संदर्भ में निश्चित भविष्यवाणी करने में समर्थ सिद्ध होता है।

समस्या यह है कि व्यवस्थागत असुरक्षाओं के चलते, अपने व्यक्तिगत भविष्य को जानने की उत्कंठा में मनुष्य इन वैज्ञानिक प्रास्थापनाओं में प्रयुक्त हुए मिलते-जुलते अभीष्ट शब्दों को देखकर, उनका सही निहितार्थ समझे बगैर इनका मनमाफ़िक, अपने मंतव्यों के निहितार्थ उपयोग करने लगता है और समाज में विद्यमान भ्रमों की संपुष्टि के जरिए अपने अस्तित्व की प्रतिष्ठा और दोहन की जुंबिशों में जुट जाता है।

वैज्ञानिक ज्ञान के जरिए अब तक समझ आई प्राकृतिक परिघटनाओं और दर्शन की ऐतिहासिक भौतिकवादी अवधारणाओं के जरिए सामाजिक परिघटनाओं की भाविष्यवाणियां की जा सकती हैं, और की भी जाती हैं।

प्राकृतिक परिघटनाओं के सापेक्ष सामाजिक परिघटनाओं के मामले में सटीक भविष्यवाणियां थोड़ी मुश्किल होती हैं, क्योंकि यहां वस्तुगत यथार्थता के साथ, एक और तत्व जुड़ जाता है वह है चेतनागत यथार्थता। इनकी अन्योन्यक्रियाएं निरंतर नये-नये प्रभाव और निर्भरता पैदा करती रहती हैं, और वस्तुगत यथार्थ को निरंतर परिवर्तित करती रहती हैं।

तो प्राकृतिक परिघटनाओं के मामले में नियमसंगतता को समझने के बाद उनकी नियमों के अंतर्गत तयशुदा नियति से ऐसे भ्रामिक वक्तव्य निकाले जा सकते हैं जिनसे सत्य का आभास भी होता है और जो भ्रमों को और बढा़कर काल्पनिक कपोल कल्पनाओं के नये नये द्वार खोल सकता हो, जैसे यह कथन या निष्कर्ष जो कि यहां निकाला गया है कि सब कुछ पूर्व नियत है और हर चीज़ का एक निश्चित भविष्य है।

फिर यह संभावना पैदा हो सकती है कि इसे साधारणतयः मनुष्य अपने जीवन और समाज से जोड़कर देखने लगता है, और ऐसी ही चिंतन और निष्कर्षों की और उद्यत होता है जिसे कि आपने बाद में विवेचित किया है।

और आपकी समझ भी इस घलमपेल को समझ पा रही है, इसीलिए आपके सामने यह अनुत्तरित प्रश्नों और कल्पनाओं को छोड जाती है।…..
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वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और…प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

आपने सही कहा है कि व्यक्ति अपनी सामाजिक अन्योन्यक्रियाओं के जरिए अपने एक मानसिक जगत का निर्माण करता है। अपेक्षाओं की पूर्ति की भौतिक संभावनाएं, व्यवहारिक रूप में, इन मानसिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति को संचालित और नियंत्रित करती रहती हैं।

असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल, अपेक्षित आदर्श परिस्थितियों और क्रूर वास्तविकताओं के मध्य एक द्वंद बनाए रखता है। इनसे विचलन और अपरिपक्वता, मानसिक अस्थिरता पैदा करती है और ऊल-जलूल व्यवहार में अपनी अभिव्यक्ति पाती है।

समस्या यह भी है कि आजकल मानसिक चिकित्सा के नाम पर भी व्यापारिक और सतही मानसिकता हावी है। इस ओर गंभीर प्रयासों का अभाव है। मनोवैज्ञान और शारीरिक चिकित्सा को आपस में गड्ड-मड्ड कर दिया गया है और मानसिक रोगी के मनोवैज्ञानिक अध्ययन और कौंसिलिंग का अभाव नज़र आता है। रोगी और मनोचिकित्सक दोनों के पास समय और मनोव्यवहार की गहराई टटोलने की समझ का अभाव है, और परिणति तात्कालिक ईलाज़ यानि मष्तिष्क को सुन्न कर मानसिक क्रिया व्यवहार को स्थगित करने की प्रवृति के रूप में सामने आ रही है।

ये दवाइयां उन्हें इसकी लत ड़ालती है और रोगी, संबंधियों और मनोचिकित्सक, सभी को अपने मुफ़ीद लगती हैं। असली मनोवैज्ञानिक सवाल पृष्ठ्भूमि में ही रह जाते हैं।…..
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नारीयां क्यो बनाती हैं यौन संबंध? एक….प्रविष्टि पर ‘साईब्लॉग’ पर टिप्पणी:

आपने एक रोचक विषय उठाया है, कम से कम पुरूषों के लिए तो है ही।

पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता इसे ऐसे ही रूप में लेने को अभिशप्त है, जैसा कि विवेक और जाकिर भाई की टिप्पणियों से जाहिर होता है। भले ही यह आपका मंतव्य रहा हो या नहीं।

इसलिए समझदारी का तकाज़ा कहता है कि प्रस्तुति और विश्लेषण का तरीका ऐसा होना चाहिए कि यह सिर्फ़ प्रचलित मानसिकताओं की सनसनीखेज़ तुष्टि का जरिया भर बन कर ना रह जाएं बल्कि एक सहिष्णु यथार्थ समझ की सही दिशा की राह प्रशस्त करता हो।

शरद कोकास एक गंभीर इशारा जरूर कर रहे हैं पर वहां भी यौन संबंधों का हथियारगत इस्तेमाल अवश्य ही मिलेगा।पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के अधिकार सीमित हैं। स्त्री पुरूष के लिए संपत्ति है और इसके अनुरूप ही भोग्या सामग्री। उसके लिए यौन संबंध यौन तुष्टि के साथ-साथ अपनी सत्ता के प्रस्फुटिकरण और प्रदर्शन का साधन भी हैं। इसीलिए वह यौन संबंधों के लिए अवसरवादी है और अपनी सत्ता और स्त्री की निर्भरता के चलते अवसरों की संभावनाएं भी खूब रखता है।

इस सारे जंजाल में स्त्री व्यक्तित्व की आधिकारिक उपस्थिति कहीं भी अभिव्यक्त नहीं होती। इसीलिए वह वह बराबरी के, प्रेम के, भावनात्मक संबंधों के अवसरों के लिए हमेशा प्रतीक्षारत रहती है।

स्त्री के व्यक्तित्व का यही खालीपन, लंपट पुरूषों के लिए और अधिक अवसर उपलब्ध कराता है। और फिर धोखा, छल, मोहभंग जैसी अवस्थाओं की परिणति अस्तित्व में आती हैं।

स्त्री केवल यौन तुष्टि के उपकरण के रूप में अपनी पुरजोर उपस्थिति दर्ज़ कर पाती है। पुरूष जब कभी भावुकता में भी होता है तो इसकी परिणति यौन संबंध तक खींच ले ही जाता है।

कुलमिलाकर लाबलुब्बेआब यह कि सामान्यतया स्त्री के लिए पुरूष की यह यौन जरूरत और उसकी पूर्ति के लिए स्त्री की भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता उसके लिए एक हथियार की तरह उभरने की संभावना पैदा करती है जिसका कि इस्तेमाल तात्कालिक रूप से अपना मनोइच्छित प्राप्त करने में किया जा सकता है।

इसी की अभिव्यक्ति, जैसा कि इस आलेख में जिक्र है, भौतिक वस्तुओ, उसके क्रियाकलापों में सहायता और भावनात्मक संतुष्टि को यौन संबंधों के जरिए प्राप्त करने के रूप में होती है।

जहां बराबरी के से संबंधों की उपस्थिति होती है, वहां फिर भी इनके पृष्ठभूमि में होने की संभावनाएं हो सकती हैं।

मनुष्य की यौन संबंधों की सहज और प्राकृतिक जरूरत इसी व्यवस्थागत रूप के चलते विकृतियों के लिए अभिशप्त है।…..
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आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है।

शुक्रिया।

समय
समय के साये में – आपके दिमाग़ से रूबरू आपकी ज़िंदगी का आईना

टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक-२

हे मानवश्रेष्ठों,
समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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प्रणय संबंध, विज्ञान और कुछ विचार..पोस्ट पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मतलब किसी एक पक्ष के साथ जड़ता से बंधना नहीं होता, वरन वस्तुगतता का सापेक्ष, तार्किक और तथ्यात्मक विश्लेषण करने की योग्यता पैदा कर सकने वाले नज़रिए से होता है।

किसी भी दृष्टिकोण या सिद्धांत का असली परीक्षण, व्यवहार के जरिए ही हो सकता है। यही इसकी कसौटी होती है कि वह प्रकृति और जीवन की वास्तविक परिघटनाओं को कितनी सटीकता और accuracy के साथ समझाने की सामर्थ्य रखता है। उसका सामान्यीकरण किया जा सकता है या नहीं? प्राप्त निष्कर्षों और नियमसंगीतियों से उसके जरिए भावी परिघटनाओं या संबंद्ध अन्य प्रक्रियाओं को नियत किया जा सकता है या नहीं?
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और यह बात आपके प्रथम मत ‘मैं अपना मत स्पस्ट कर दूँ मेरे अनुसार १०० प्रतिशत प्रेम की भावना दिमाग में पनपती है’ से जाहिर नहीं होती।
वरन यह जाहिर होती है इसके सापेक्ष बालिका वधु वाले प्रसंग को रखने और यह प्रश्न उठाने में कि,‘क्यों उसने फिर कहीं और प्रेम तलास नही किया,क्यों वह उसकी याद में तडपता रहा..?’।

यह बात थोड़ी अंतर्विरोधी लग सकती है।

पर यह बात इसलिए कही गयी है कि यदि वाकई में मस्तिष्क का केमिकल लोचा वाला सिद्धांत इस प्रेम की रूहानी? भावनात्मक, तथ्यात्मक वस्तुगतता को अगर समझाने में समर्थ नहीं लग रहा है तो इसका मतलब सिद्धांत में ही कहीं लोचा है। कहीं ना कहीं उसमें लूपहोल्स हैं और वह पूरी तरह से एक सही सिद्धांत होने की काबिलियत रखने से अभी दूर है।

तो एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वही है जो इन अंतर्विरोधों को भी परखे, इन पर संदेह करे, और सापेक्षता में भी चीज़ों को देखे। यही आप ने किया भी है। आपको सलाम।

जाहिर है, उपरोक्त बात को कह देने के बाद, यह कहना अब प्रांसंगिक नहीं रह गया है कि समय के यहां संदर्भित आलेख से जो यह निष्कर्ष आपने निकाला है कि,‘हमारे मित्रों का मानना है की रूहानी प्रेम एक मायाजाल से ज्यादा कुछ नही है’,पूरी तरह वस्तुगत नहीं है, एकांगी है।

समय को मौका मिलेगा तो यह कोशिश होगी कि इसी संदर्भ में भावनाओं की भौतिकता, वस्तुगतता और सक्रिय आवेगों के आपसी अंतर्संबंधों पर मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान को अपने ब्लॉग पर समेकित कर सके।

समय, यहां कुछ इशारे भर कर रहा है।

मनुष्य द्वारा अनुभव की गयी भावनाएं (अनुभूतियां), प्रेम की भावना जिनका कि एक अंग मात्र है, मनुष्य के वे आंतरिक, मानसिक रवैये हैं, वह एक मानसिक अवस्था है, जिन्हें वह अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं में और अपने सक्रियता की लक्ष्य वस्तुओं के प्रति विभिन्न रूपों में महसूस करता है।

इनके पैदा होने का निश्चय ही अपना भौतिक आधार होता है, और जाहिरा तौर पर यह केमिकल/भौतिक लोचों की प्रक्रियाओं से गुजर कर ही महसूसने जैसी अवस्था पाती हैं।
परंतु महसूसने के पश्चात अब यह नितांत भौतिक चीज़ नहीं रह जाती, यह मनुष्य के वैचारिक जगत से अंतर्क्रिया के दौरान उसका ही एक हिस्सा हो जाती हैं, उसी वैचारिक जगत का जो कि ख़ुद उसकी भौतिक परिस्थितियों से निगमित है।

वैचारिक जगत के पूर्वाधारों के अनुसार ही ये भावनाएं मनुष्य के संवेगों और सक्रियताओं को निश्चित करती हैं, यानि उसके व्यवहार को निश्चित करती हैं, जैसा कि आपके एडगर एलन पो का वह व्यवहार आपकी चिंता का विषय है।

भौतिक और वैचारिक जगत जीवन का अलग-अलग हिस्सा नहीं है, वह दोनों एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं।
……..
ज्ञान का मामला ही ऐसा है। चीज़ों को अधिभूतवादी नज़रिए से अलग-अलग विश्लेषित करने से उलझनें पैदा होती है, और द्वंदात्मक तरीके से विश्लेषित संक्षेप में नहीं किया जा सकता।’
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यह इश्क कमीना-क्या सचमुच?…पोस्ट पर ‘साईब्लाग’ पर टिप्पणी:

आलेख की सूचनाओं को मानवश्रेष्ठ अरुणप्रकाश की टिप्पणी से अंतर्संबंधित करके भी देखे जाने की आवश्यकता है।
मानवव्यवहार को मात्र कुछ रसायनों तक सीमित कर देने से, इन्हें वैज्ञानिक रूप से, प्रगतिशील मूल्यों के रूप में स्थापित कर देने से, जाहिरा तौर पर इन रसायनों से संबंधित एक गैरजरूरी बाज़ार खड़ा किया जा सकता है और मुनाफ़ो का ढ़ेर लगाया जा सकता है।

दूसरा ऐसा स्थापित करने से मानवीय व्यवहार की सामाजिक अंतर्निर्भरता के बज़ाए व्यक्तिवादी आत्मकेन्द्रिता को आधार मिलता है, क्योंकि यह भ्रम स्थापित किया जाता है कि इन्हें कुछ रसायनों के जरिए पैदा और नियंत्रित किया जा सकता है।
जाहिरा तौर पर ऐसे आत्मकेन्द्रित व्यक्तिवादी सोच के मनुष्य आज की व्यवस्था के इच्छित हैं जो मनुष्य की सोच और दृष्टिकोणों तक को गुलाम मानसिकता में बदल डालने की कोशिशों में हैं।

जैसा कि आपने अपने एक आलेख में पहले कहा था कि विज्ञान धर्म के बिना अंधा होता है, और समय की इल्तिज़ा थी कि यहां धर्म के स्थान पर दर्शन शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इच्छित अर्थ इसी में समाहित हैं। उसी परिप्रेक्ष्य में यह है कि वैज्ञानिक सूचनाओं को, ऐतिहासिक और क्रम-विकास के संदर्भों में परखे बिना सही समझ विकसित नहीं की जा सकती, या कि इन्हें सही समाजिक सोद्देश्यता प्रदान नहीं की जा सकती।

आपने आलेख में इसी दृष्टि को उठाया भी है।

इन हारमोनों के खेल को हम लगभग पूरी जैवीय प्रकृति में (फिलहाल मानव को छोड दें) अस्तित्वमान देखते हैं और इन्हीं की वज़ह से उत्प्रेरित सहजवृत्तियों से सक्रिय कई जीवों को समयआधारित प्रजनन संबंधों की प्रक्रिया में संलग्न देखते हैं। जाहिर है इसी वज़ह से यह विचार और शोध की आवश्यकताएं पैदा हुईं कि इन्हीं के परिप्रेक्ष्य में मनुष्यों के व्यवहार को भी समझा जाना चाहिए।

मनुष्य भी इसी जैव प्रकृति का अंग है तो नियमसंगति यहां भी मिलनी चाहिए, और इसी के अवशेषों को जाहिर है उक्त खोजों के अंतर्गत संपन्न कर लिया गया लगता है।

मानव प्रकृति की सहजवृत्तियों के खिलाफ़ अपने सोद्देश्य क्रियाकलापों के जरिए हुए क्रमविकास के कारण ही अस्तित्व में आ पाया है। मनुष्य अपनी इस चेतना के जरिए ही यानि सचेतन क्रियाकलापों के जरिए ही, अन्य जैवीय प्रकृति की सहजवृत्तियों से अपने आपको अलग करता है। (आपने इन सहजवृत्तियों के लिए अपने प्रश्न में सहजबोध शब्द काम में लिया है, ये दोनों पर्यायवाची नहीं हैं)

जाहिर है अब मनुष्य कई सहजवृत्तियों के हारमोनों संबंधी उत्प्रेरकता की आदतों से आगे निकल आया है और कई नई तरह की सचेत क्रियाकलापों के लिए अनुकूलित हो गया है।

इस आलेख में उल्लिखित हारमोन और अंडविसर्जन संबंधित व्यवहार को इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जांचा जाना चाहिए।

यह आसानी से जाना जा सकता है, अपने स्वयं के व्यवहार से महसूस किया जा सकता है कि मनुष्य में अब इस गंध संबंधी सहजवृत्ति का कोई सामान्य अस्तित्व नहीं रह गया है। मनुष्य के यहां यौन संबंधों की सिर्फ़ प्रजनन आवश्यकता का लोप हो गया है और यह कई तरह के आनंदों और गहरे आत्मिक संबंधों के आधार के रूप में अस्तित्व में आ गया है। अब शारीरिक और मानसिक जरूरतों के अतिरिक्त भी कई ऐसे उत्प्रेरक हैं जो मनुष्य में यौन संबंधों की प्रेरणा पैदा कर सकते हैं।

अंड़विसर्जन के वक्त स्त्रियों में आ रहे हार्मोनिक बदलावों की वज़ह से उत्प्रेरित यौन आकांक्षाओं के कारण से हुए व्यवहार परिवर्तन से ही कोई पुरूष शायद यह अहसास पा सकता है कि अंड़विसर्जन हो रहा होगा। गंध संबंधी कोई अनुभव सामान्यतयाः नहीं महसूस किया जाता, इसे अपने खु़द के अनुभवों की कसौटी पर भी परखा जा सकता है।

पसीने में गंध को भी ऐसे ही देखा जा सकता है। इससे भी कई फ़िल्मी और साहित्यिक प्रंसंगों के कारण विश्वास मिलता हो, तथ्य यही है कि वर्जनाओं से युक्त कुछ कैशोर्य व्यवहारों में इसका कुछ अस्तित्व भले ही मिल जाए, सामान्यतयाः व्यस्क जोडो में इस पसीने की गंध से वितृष्णा ही देखी जा सकती है, और सामान्यतयाः जहां तक संभव होता है सचेत यौन संबंधों हेतु शयनकक्ष में स्नान करके जाना ही श्रेयस्कर समझा जाता है।’
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धर्म और विज्ञान…पोस्ट पर ‘साईब्लाग’ पर टिप्पणी:

शब्दों का आशय वही होता है जो प्रदत्त समय में उसके प्रचलित अर्थ में ध्वनित होता है।

धर्म के मूल में आस्थाएं और परंपराएं होती है।
वहां संदेह और तर्क के लिए सामान्यतयाः कोई जगह नहीं होती।

तर्कबुद्धि के जरिए जब विश्व और मनुष्य के साथ उसके संबंधों की तार्किक व्याख्याएं की जाने लगी तो उसे एक नये शब्द फ़िलासाफ़ी से पुकारा जाने लगा।

इस शब्द का ही हमारा पारंपरिक पर्याय दर्शन है।

संदेहों ने विज्ञान तक पहुंचाया, और तर्कों ने दर्शन तक। दोनों एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं।

दर्शन के तार्किक निष्कर्षों ने विज्ञान के लिए ऊर्वर भूमि प्रदान की, वहीं विज्ञान की खोजों और नियमसंगीतियों ने दर्शन को एक सार्विक रूपता प्रदान की।

आप के लेख और अन्योनास्ति की टिप्पणी में जो आकांक्षा ‘धर्म’ शब्द से इच्छित है, वह आपको इस ‘दर्शन’ शब्द में ही मिल सकती है।’
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ज्योतिष: पौराणिक संदर्भों से निकली….पोस्ट पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

यहां यह जो सत्संग चर्चा चल रही है, उस पर इस नाचीज़ को कुछ नहीं कहना है।
आस्था को तर्कों के जरिए दिमाग़ से नहीं निकाला जा सकता, बिल्कुल उसी तरह जैसे ड़र को तर्कों के सहारे नहीं जीता जा सकता।
वैसे इस बात को देखने में मज़ा आता है, कि आस्थावान मनुष्य जो कि तर्क को किनारे रखता है, इसके बचाव में सबसे ज़्यादा तर्क-कुतर्क करता है। जिस पर विश्वास नहीं उसी पद्धति का सहारा। खैर जी।
ज्ञान और समझ हमारे सारे बचकानेपन को शनै-शनै खत्म करती जाती हैं।

इस पोस्ट पर समय का भी प्रतिवाद है, और गहरा है। कृपया इसे भी दर्ज़ कर लें।

आप वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए यहां जिस पद्धति को काम में ले रहे हैं, मुआफ़ कीजिएगा समय को लगता है यह कतई भी वैज्ञानिक नहीं है।
दर्शन की भाषा में कहें तो यह चीज़ों को समझने का अधिभूतवादी तरीका (metaphysical method)है, वैज्ञानिक द्वंदवादी तरीका नहीं है।
आप अपने विरोधी विचार को उन्हीं की ज़्यादा प्रचलित पद्धति के जरिए मात देने की खाम्ख़्वाह कोशिश कर रहे हैं।
विवाद इसी वजह से होता है। जब इसी कार्य को प्रतिगामी शक्तियां करती हैं तो गलत है, तो सही चीज़ों को ही सही, सामने लाने के लिए प्रगतिशील शक्तियां भी इसी गलत चीज़ का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। जाहिर है उनके तर्कजाल में उलझने की पृष्ठभूमि तो पहले से ही तैयार है।

इस तरह से पुरातन ग्रंथों से, जो कि अपने ऐतिहासिक काल की समझ की उत्पत्ति होते हैं, उदाहरण ढ़ूंढ़ कर लाने और उसे वर्तमान में प्रतिष्ठित करने का यह पुनीत कार्य ही तो आज की प्रतिगामी शक्तियां कर रही है। तो फिर इस पोस्ट के जरिए उलटबासी में ही सही, क्या यही कार्य यहां नहीं हो रहा है, क्या उन्हीं की पद्धति नहीं अपनाई जा रही है।

पुरातन ग्रंथों की कई वैज्ञानिक द्वंदवादी व्याख्याएं मानवजाति द्वारा पूर्व में ही की जा चुकी हैं, आपका समूह उनसे गुजरेगा तो सही मायनों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया जा सकेगा।

इस हेतु भारतभूमि पर भी काफ़ी मानवश्रेष्ठ यह कार्य संपन्न कर चुके हैं। आप अमृत डांगे, देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, दामोदर धर्मानंद कोसांबी आदि विद्वानों और इतिहासकारों की पुस्तकें पढ़ सकते हैं। आपके समूह को दर्शन से भी गुजरना चाहिए। द्वंदवादी ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण से भी माथापच्ची करनी चाहिए।

आपने जो उद्धरण दिये हैं, क्या उनमें यह नहीं देखा जाना चाहिए था कि आखिर धर्म और ज्योतिष की नाभीनालबद्धता के बाबजूद इन धर्मग्रंथों में ज्योतिष पर यह दृष्टिकोण क्यों अपनाया गया है? क्या इसमें आपकों कोई पेच नज़र नहीं आया?
आप जल्दबाज़ी में थे, अपने अनुकूल लगती सी इस नई प्राप्त बात को सामने लाने के लिए।

धर्मग्रंथों में अपने विरोधी विचारों के ख़िलाफ़ निर्देश जारी किये जाते हैं, नाकि अपने अनुकूल साबित होने वाली चीज़ों को नकारा जाता है।

यही तथ्य क्या काफ़ी नहीं था, कि शक होना चाहिए था कि जाहिरातौर पर यहां उस वक्त भी प्रचलित फ़लित ज्योतिष के बारे में तो यह बातें कही ही नहीं जा सकती थी। आखिर कौनसा दृष्टिकोण अपने पैरों पर खु़द कुल्हाडी मारेगा।

हालांकि समय अभी इनकी गहराई में नहीं गया है, परंतु उपरोक्त बात तो कही ही जा सकती है।

भाववादी या आदर्शवादी या प्रत्ययवादी धर्मग्रंथों में उस वक्त में प्रचलित भौतिकवादी, यथार्थवादी दृष्टिकोणों पर फ़तवे जारी किए जाते थे। ज्ञान और समझ विकसित करने वाले हर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कुचलने की कोशिश की जाती थी। सांख्यों, चार्वाकों आदि के खिलाफ़ यही किया गया था।

अगर यह सही है, तो जाहिर है कि ग्रहों और नक्षत्रों का ज्ञान रखने वालों या इनपर शोध करने वालों या इन्हें पढ़ने-पढा़ने वाले जिन लोगों की चर्चा की जा रही है, वे उन धर्मग्रंथकारों के लिए खटकने वाले ही रहे होंगे।

जाहिर है फिर वे फलित ज्योतिष के जरिए मनुष्य के भाग्य की भविष्यवाणियां करने वाले तो नहीं ही रहे होंगे। हां वे लोग वे हो सकते हैं, जो कि ग्रहों और नक्षत्रों की स्थितियों और गतियों का प्रेक्षण करने और इनका विज्ञान विकसित करने की कोशिश कर रहे थे, और जाहिरा तौर पर ग्रंथिक प्रस्थापनाओं को चुनौती दे रहे होंगे।

यहां यह भी हो सकता है कि ये उक्तियां भौतिकवादी दार्शनिक परंपरा के ग्रंथों और उनके उद्धरणों से ली गयी हो। सीधे वहीं से, या किसी कारण भाववादी ग्रंथों में भी स्थान पा गई हों। अगर यह भौतिकवादी परंपराओं की हैं, तो जाहिर है इनका भाववादियों के फलित ज्योतिष के ख़िलाफ़ होना ही है। हालांकि इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि ये मनुस्मृति में भी स्थान पा गई हैं।

क्या यह सब सोचा और देखा समझा गया था?

मुआफ़ी की दरकार है।
परंतु गंभीर समीक्षा और सही पद्धति का अभाव लगा इसलिए इतना कुछ लिख गया।’

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स्वाइन फ़्लू संबंधी पहेली….पोस्ट पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

सावधानी तो ठीक लगती है।
पर अन्य परिप्रेक्ष्यों की भी जाँच कर ही लेनी चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि जागरुकता के भ्रम में हम ड़र फैला रहे हों।

समय भी मुनाफ़े की अभेद्य दीवारों के पीछे झाँकने में अपने आप को अक्षम पाता है।

परंतु फिर भी ऐसी सूचनाएं/अफ़वाहें भी है, जिन्हें भी जितना हो सके जाँच कर चेतावनियों के साथ रख दिया जाए, तो थोड़ा ठीक रहे।

पहली: यह वायरस अमेरिका की उन्नत लैबों में परीक्षणों की एक श्रृंखला के अंतर्गत पैदा किया गया था, या हुआ था। यह बाहर कैसे?

दूसरी: स्वाईन फ़्लू की दवाईयां और जांच किट दे सकने वाली शायद तीन ही कंपनियां थी, और वे भी इस वायरस के फैलने से पहले, मंदी के दौर की तंगी से दिवालिया होने की कगार पर थी।
अब उनके मुनाफ़े की गणना के कयास तो लगाए ही जा सकते हैं।

तीसरी: थोडे़ दिनों बाद ही संयुक्त राष्ट्र ने घोषणा कर दी थी कि जल्द ही पूरे विश्व में इसका टीका उपलब्ध करा दिया जाएगा।
मज़े हो गये, विश्व मीडिया और हमने एक सार्विक ड़र का माहौल तैयार कर ही रखा है, बस टीका आने की देर है।
हम डरे हुए, सहमे हुए लोग मनमाने दामों पर इस टीके को लगवाने के लिए लाईनों में लगे होंगे, और अमेरिका और मल्टीनेशनल्स को शुक्रिया अदा कर रहे होंगे।
दवाइयां तो सिर्फ़ बीमार खाते हैं, पर टीका तो पूरे विश्व में किस पैमाने की खपत रखेगा, आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ ही दिनों पहले हेपीटाइटिस बी का टीका भारत के अधिकतर मध्यम और उच्च वर्ग के भारी दामों में ठोक दिया गया था, बिना ये बताए कि सामान्यतयाः इससे प्रभावित होने की सम्भावनाएं यहां कितनी हैं।

और बता भी दो तो क्या है। ड़र है ज़िंदगी का, और यदि पैसे निकाले जा सकते हों जेब से तो जोखिम क्यों उठाया जाए।

यह भी अफ़वाह है कि पूरे वैश्विक स्तर पर जो मंदी छाई हुई है, इसके जनक उन्नत देशों का यह एक घिनौना षड़यंत्र है जो उन्हें मंदी से उबारने की गारंटी देने की क्षमता रखता है।’

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समय अपनी श्रृंखला को अगली बार जारी रखेगा ही।

समय

टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक

हे मानव श्रेष्ठों,
समय बडा़ व्यस्त है।

फिलहाल समय द्वारा की गई टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक दीजिए।
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“कविताएं और कवि भी” पर की गई टिप्पणी के अंश:

…..आपकी यह बात ही कि “ऋत की विराट परिकल्पना पतित होकर ईश्वर की सर्व सुलभ समझ में प्रतिष्ठित हुई और उसके आगे सम्पूर्ण समर्पण ही एक मात्र राह दिखाई गई। जन के लिए यह आवश्यक था लेकिन इससे हानि यह हुई कि संशय और प्रश्न नेपथ्य में चले गए। इसके कारण धीरे धीरे एक असहिष्णु मानस विकसित हुआ।” सभी कुछ कह देती है।

यह प्रक्रिया पूरे विश्व में लगभग एक ही तरह से विकसित हुई, और जाहिर है इसके पीछे आत्मगत या मनोगत कारणों के बजाए शुद्ध भौतिक कारणों का अस्तित्व रहा है।
आप यदि इसे व्यापकता दें तो आपकी यह अवधारणा सभी आदर्शवादी विचारधाराओं को, इस्लाम को भी अपने में समेट लेने की क़ूवत रखती है। अलग से कुछ कहने की प्रासंगिकता समय को महसूस नहीं हुई, इसलिए ही यह गरीब संशय में आ गया।

भारतीय चिंतन परंपरा में भी दोनों धाराएं यानि संशय और विश्वास, समानान्तर रूप से चले हैं ना कि एक ही विकसित होती परंपरा में। जाहिर है कि इस विरोधी विचार्धाराओं में असहिष्णुता ही हो सकती थी, और इतिहास साक्षी है कि संशय की परंपरा का परिस्थितियों के अनुकूलन के कारण बलपूर्वक दमन कर दिया गया। बृहस्पतियों, न्याय-वैशैषिकों, चार्वाकों, सुश्रुतों, योगियों, बुद्धों, धर्मकीर्तियों आदि-आदि को समूल नष्ट कर दिया गया, उनकी संशयवादी विचारधारा को या तो खत्म कर दिया गया या आदर्शवादी मुलम्में में प्रक्षिप्त।

भक्तिकाल तो बहुत बाद की चीज़ है। परंतु आपका इस पर यह कहना सही है कि इसी के बाद आम मानस में ईश्वर के आगे संपूर्ण समर्पण या ईश्वर की वर्तमान अवधारणा का बोलबाला हुआ।

खैर, समय की चिंताएं ऐसे ही व्यापक परिप्रेक्ष्यों के संदर्भ में थी, और जाहिर है आपकी जुंबिश में भी ये ही शुमार हैं।

आप इस पर खुद भी संशय में है, परंतु नग्न सत्यों और ज्वलंत समस्याओं के नाम पर बौद्धिक प्रगतिशीलता को तो दाव पर लगाना या स्थगित कर देना सही कदम नहीं हो सकता ना।

आप ही के शब्दों में आज संशय और ऋत की पुनर्प्रतिष्ठा की आवश्यकता है, जो बस मानव मेधा की सतत प्रगतिशील और विकसित होने की प्रवृत्ति को मान दे और उसका पोषण करे। ना कि इनके खिलाफ़ संघर्ष में खुद बर्बर खिलाफती, तालिबानी,प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी तरीके अपनाने को विवश हो जाए।…..

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“कोलाहल” पर की टिप्पणी का अंश:

……समय का उद्देश्य चिंतन की दिशाओं पर कुछ अलग इशारे करने का था,….

……समय ने कहा था,‘पुरस्कार होंगे तो तिकड़म तो होगी ही । पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार पुरस्कार के चक्कर में पड़ गए’।

पहली बात शायद ज्यादा साफ़ है। जब पुरस्कार होंगे, उनके जरिए धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होने के अवसर होंगे, और मानव-श्रेष्ठों के मन में धन और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की महत्त्वाकांक्षाएं होंगी, तो फिर पुरस्कारों को पाने के लिए मानव-श्रेष्ठ हर संभव कोशिश भी करेंगे। तिकडमें भी होंगी, बहुत कुछ होगा और होता भी है, सभी जानते ही हैं। पहले वाक्य से समय का मतलब यही था।

दूसरा वाक्य यदि इस तरह लिखा गया होता जैसा कि इसे होना चाहिए था, और जैसा कि समय का आशय था, “पुरस्कारों की चर्चा करते-करते आप भी आखिरकार एक और पुरस्कार की स्थापना की चर्चा के चक्कर में पड़ गए.” तो शायद ज्यादा ठीक होता।

समय यही कहना चाहता था कि जब आप पुरस्कारों के पीछे की तिकडमों को समझते हैं, तो फिर लेख के अंत में एक और पुरस्कार स्थापित करने की चर्चा क्यूं कर करने लगे। क्योंकि समय को लगता है, इसका भी वही हश्र होने की अधिक संभावनाएं है और इसके पीछे की सोच को समय ने पहले वाक्य में रख ही दिया था।

आपने इसके बाद के वाक्य की चर्चा नहीं की, और वही समय की समझ के अनुसार ज्यादा महत्वपूर्ण था। समय आपके और पाठकों के चिंतन में इस दिशा को भी शामिल करवाना चाह रहा था, और इसीलिए इसका जिक्र पुनः कर रहा है।

समय ने कहा था:
“लेखन के उद्देश्यों पर ही दोबारा विचार करना होगा।”

यहां समय अपना आशय स्पष्ट कर देना चाहता है।

लेखकों को यह भी विचार दोबारा से करना होगा (जो अब तक नहीं कर पाएं है, या इस पर कुछ और विचार रखते हैं) कि आखिरकार लेखन का उद्देश्य क्या है, लेखन के वास्तविक सरोकार क्या हैं? बहुत से मानव-श्रेष्ठ लेखकों ने इस पर अपने विचारों को लिख छोडा है, उनसे गुजरना चाहिए।

क्या लेखन का उद्देश्य स्वान्तसुखाय है? क्या यह केवल व्यक्तिगत मनोविलास का माध्यम है, और आत्मसंतुष्टि इसका लक्ष्य? क्या सिर्फ़ यह अहम की तुष्टी, व्यक्तिगत महत्तवाकांक्षाओं की पूर्ति, सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का जरिया भर है?

या लेखन के उद्देश्यों को इनका अतिक्रमण नहीं करना चाहिए? क्या इसे सामाजिक सरोकारों से नहीं जुडना चाहिए? क्या सामाजिक चेतना की बेहतरी की चिंताएं इसमें शामिल नहीं होनी चाहिएं? क्या तार्किक और वैज्ञानिक सोच को आम करने की जिम्मेदारी इसमें शामिल नहीं होनी चाहिए? क्या अपनी बेहतरी के लिए चिंतित और संघर्षरत आमजन का पक्षपोषण इसमें नहीं झलकना चाहिए? क्या लेखन की दिशा को एक ऐसे आदर्श समाज की स्थापना, जिसमें समता और भाईचारा हो, जिसमें किसी भी मनुष्य का किसी भी तरह का शोषण संभव ना हो, जिसमें सभी की खुशहाली हो, हेतु प्रेरणास्रोत नहीं होना चाहिए?

और क्या लेखन के मूल में यही वास्तविक चिंताएं नहीं होनी चाहिएं?

और अगर ये चिंताए वाकई में लेखक के लेखन के मूल में हैं, तो जाहिर है, पुरस्कारों-सम्मानों का कोई विशेष मतलब नहीं रह जाता। फिर लेखक, अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए अपने इन्हीं आदर्शों और उनकी प्राप्ति को ही अपनी कसौटी बनाता है।

बस, समय का उद्देश्य यही कहना था।…..

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“अनवरत” पर एक प्रतिटिप्पणी :

……..मानवजाति के अभी तक के ज्ञान के अनुसार इसको ऐसे कहा जाना कि विचार मस्तिष्क का आधार पाते है, पूरा सच नहीं है। इसके कारण विचारों की एक स्वतंत्र वस्तुगतता का बोध होता है जो कि मस्तिष्क पर अवलंबित है।
इसको ऐसे कहा जाना चाहिए कि वस्तुतः विचार मस्तिष्क का प्रकार्य है, उसके क्रियाकलापों का उत्पाद है। और इसके लिए आधार सामग्री उसे ऐन्द्रिक संवेदनों के जरिए मिलती है।

जाहिर है विचार अचानक आसमान से नहीं टपकते, वे किसी भी मनुष्य की प्रकृति और समाज के साथ के अंतर्संबंधों एवं अंतर्क्रियाओं के स्तर और विकास की प्रक्रियाओं में पैदा होते हैं, आकार लेते हैं।

इसीलिए आपका यह कहना सही है कि वस्तुगत जगत के बोध का स्तर विचारों का विकास करता है, उन्हें परिवर्तित या परिवर्धित करता है।

नये विचार भी इसी प्रक्रिया से जन्म लेते हैं, वे भी किसी आधारहीन कल्पना से अचानक पैदा नहीं होते। हर नयी समस्या वैचारिक जगत में अवरोध पैदा करती है और मनुष्य अपने पूर्व के संज्ञानों के आधार पर उन्हें विश्लेषित कर उनके हल की संभावनाओं की परिकल्पनाएं करता है, जाहिर है नये विचार करता है।

रथ की संकल्पना या विचार का जन्म, पहिए की वस्तुगतता के बिना नहीं हो सकता। पक्षियों की उडानों के वस्तुगतता के बगैर वायुयान के विचार की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। बिना सोलिड स्टेट इलेक्ट्रोनिक्स के विकास के कंप्यूटर का नया विचार पैदा नहीं हो सकता था।

नये विचार, विचारों की एक सतत विकास की प्रक्रिया से ही व्युत्पन्न होते हैं, जिनके की पीछे वस्तुगत जगत के बोध और संज्ञान की अंतर्क्रियाएं होती हैं।

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तो हे मानवश्रेष्ठों,
बौद्धिक प्रगतिशीलता, लेखन के सरोकार और विचार पर आपको इनमें से कुछ बौद्धिक मसाला जरूर मिला होगा, जो कि शायद आपके विचारों को उद्वेलित कर पाए।

समय को तो मानवजाति द्वारा समेटा गया यह ज्ञान बहुत उद्वेलित करता है।

सामान्य तौर पर समय फिर हाज़िर होगा।

समय