सपनों के बहाने कुछ प्रवृतियों पर बातचीत

हे मानवश्रेष्ठों,

फिलहाल भारी-भरकम स्थगित। चलिए कुछ हल्का-फुल्का कुछ किया जाए, पर इसका क्या किया जा सकता है कि यहां से भी आप काफ़ी गंभीर इशारे पा सकते हैं। अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में जद्दोज़हद पैदा कर सकते हैं, और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं।

बहुत पहले सपनों के मनोविज्ञान पर दो आलेख प्रस्तुत किये थे, ‘आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान’ और ‘कुछ सपने आखिर सच होते क्यों प्रतीत होते हैं’। प्रसंग पुराना है पर आप जानते ही हैं बात कभी पुरानी नहीं होती। विचार हमेशा पहली बार मुख़ातिब हो रहे और आत्मसात नहीं कर पाये मानवश्रेष्ठों के लिए नया ही रहता है। तो फिलहाल मुद्दा यह है कि उसी आलेख के बाद एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, उन्हीं संदर्भों में एक संवाद स्थापित हुआ था। यहां उसे व्यक्तिगत संदर्भों के बिना सार्वजनिक किया जाना इसलिए जरूरी लग रहा है कि कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर और मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण किया जा सके। यह बताना शायद ठीक रहे कि उनकी पूर्वानुमति इस हेतु प्राप्त कर ली ही गई थी।
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उनका प्रश्न/संवाद कुछ इस प्रकार था:

सपने इस तरह का सच क्यों बता जाते हैं ?
नमस्ते जी ,आपके ब्लाग पर …आप लिखते ही हैं कि मेल पर भी आपसे चर्चा की जा सकती है ..मैंने आपके ब्लाग पर दोनों लेख भी पढ़े हैं …कमेंट्स पढ़े है …कुछ समझ में आया कुछ नहीं ..पर मेरा अनुभव यह है कि जब जब बुरा सपना देखा है वह सच हुआ है …

( इसके बाद उन मानवश्रेष्ठ ने अपने कुछ सपनों का जिक्र किया, जिनके सच हो जाने के कारण वे अचंभित और प्रश्नाकुल थे। वे व्यक्तिगतता का आधार रखते थे, अतएव उन्हें यहां प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है )

क्या यह सच होता है ..? मैंने इसको कभी सीरियस क्यों नही लिया ? नही जानता ..पर क्या सच में कोई मुझे संकेत कर जाता है इन बुरे सपनों से ..हम अकसर इन्हे नज़रंदाज़ क्यों कर देते हैं ? बहुत से सवाल है दिल में .और अब भी कोई सपना बुरा आए तो डर जाता हूँ ..अब यह मानता हूँ कि  कोई शक्ति हमारे अन्दर की ही हमे सूचना जरुर देती है पर शायद    हम उस को पहचान नही पाते ….पर यह सपने आते हैं .इस मेल में सिर्फ अपने आने वाले सपनो का जिक्र किया है ..आगे भी कुछ प्रश्न है जो अगली मेल में जारी रहेंगे….
शुक्रिया

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इस प्रश्न पर समय द्वारा किये गए इशारों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यक्तिगत संदर्भ हटा दिये गये हैं, अतएव कहीं-कहीं लय टूटती सी नज़र आ सकती है। आप भी देखिए, कि आप यहां से क्या पा सकते हैं। सपनों के मनोविज्ञान संबंधी दिलचस्पी हो ( जिसका कि जिक्र यहां स्पष्ट नहीं है) के लिए आप शुरूआत में दिये गये आलेख-लिंक पर जा सकते हैं।
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आदरणीय,
आप इस पर बेहद गंभीर हैं, और अपनी गुत्थियों पर असमंजस में।
यह इस लंबे खत से पता चलता है। समय अभी तय नहीं कर पा रहा है, कि वह किस हद तक आपसे संवादरत हो सकता है, और कितना अनौपचारिक। चलिए कुछ कोशिश तो की ही जा सकती है।

सपनों की उलझनों ने समय को भी काफ़ी परेशान किया था, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से आप अपने बचपन में और अभी भी इनसे बावस्ता हैं। ज़िंदगी से जुडे और भी कई पहलू थे जिनपर प्रचलित दृष्टिकोण समय को नाकाफ़ी लगता था जाहिर है समय ने काफ़ी जिज्ञासाएं की है और दर्शन और विज्ञान का एक सर्वकालिक छात्र है,  बहुतेरे विषयों पर दुनिया भर के अनेक लेखकों की सैकड़ों पुस्तकों से समय का गुजरना हुआ है जिनमें मनोविज्ञान विषय भी शामिल रहा है। यह अपने मुंह मियां-मिट्ठू बनना इसलिए हो रहा है ताकि समय आपको यह बता सके कि समय का दृष्टिकोण वहां और यहां भी पूरी गंभीरता लिए हुए है, ताकि आपको यह लग सके कि चलताऊ ढंग से यूं ही कुछ भी नहीं लिख दिया गया है, ताकि आपसे भी यह उम्मीद कर सकूं कि आप समझें कि गुत्थियों को सुलझाने के लिए सतही प्रयास हमेशा नाकाफ़ी होते हैं

साथ ही इसलिए भी कि, वस्तुगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों वाली पुस्तकों में भी ऐसी गुत्थियों पर कोई सीधी-सीधी बात नहीं होती, या यूं कह लीजिए कि जरूरी नहीं कि आपकी समस्या उसी समरूपता में वहां उपलब्ध हो। वहां इनके ऊपर, मनोजगत के व्यापारों पर पूरा सटीक विश्लेषण उपलब्ध है परंतु इनकी रौशनाई में अपनी उलझनों से प्राप्त इशारों से खु़द ही जूझना पडता है। अब मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान ने मानसिक प्रक्रियाओं की कार्यप्रणालियों की काफ़ी सुसंगत समझ विकसित कर ली है जिसके जरिए अधिकतर गुत्थियों को सुलझाया जा सकता है। वहां भी एक समझ है, एक दृष्टिकोण है, एक पद्धति है और कुछ इशारे हैं जिनके आधार पर मनुष्य अपने एकांतिक विशेष मानसिक व्यापारों को समझने की कोशिश कर सकता है। जाहिर है पर यह कोशिश तो स्वयं को ही करनी होगी, क्योंकि हमारी पसंद का पका-पकाया हलुवा कहीं भी उपलब्ध नहीं है।

अब होता यह है कि यह एक लंबा रास्ता है, पहले तो एक असली वैज्ञानिक वस्तुगत दृष्टिकोण पैदा करना वह भी अपने भाववादी संस्कारों से लडाई के साथ, फिर उसके हिसाब से दुनिया की हर चीज़ से पुनः माथापच्ची करना और उस पर टांग खीचता परिवेश। और समय भी तो चाहिए ही। साधारणतया मानसिक प्रवृति हमेशा एक लघुप्रतिरोध की राह खोजना चाहती है, ताकि तात्कालिक रूप से, शीघ्रता से एक आत्मसंतुष्टि मिले, दिमागी़ तनाव कम हो और दैनन्दिनी क्रियाकलापों में आसानी से जुट जाया जा सके। इसलिए अधिकतर हम बिना किसी गंभीर अध्ययन के अपनी सीमित समझ के मुताबिक अटकलबाज़ी करते हैं, और तुरत किसी कामचलाऊ निष्कर्ष पर पहुंच कर दिमाग़ को अपनी दूसरी, सापेक्षतः जरूरी, इच्छित सरगोशियों में लगा देते हैं।

यही कारण है कि ईश्वर, भाग्य, नियति, अलौकिकता, अध्यात्म आदि-आदि के तुरंत तसल्ली देने वाले क्रिया-व्यापार समाज में हमेशा जोरों पर रहते हैं। यहां हर गुत्थी के सरल, स्थापित से, पूर्व तैयार, एक साधारण सी तार्किकता की श्रृंखला में व्यवस्थित से हल हमेशा तैयार हैं। इसके साथ ही ये हमारे संस्कारों में होते हैं, पूर्वपरिचित होते हैं, अधिकतर परिवेश की सहमति भी साथ होती है अतएव इनके साथ तादात्मय बैठा लेना हमारे लिए ज्यादा सहज होता है

ऐसा ही आपके साथ हो रहा है। सांयोगिक संवृत्तियां आपको इस तरह सोचने पर विवश कर रहीं है, और साथ ही आपकी जिज्ञासु समझ थोडा-बहुत संदेह भी पैदा कर रही है। आप अंतर्द्वंद में हैं।

पहले एक बात बताता हूं। हमारी दादी जी इस तरह से ही सपनों के सच वाले मामले में और टैलीपैथी जैसे मामलों में गांव में और परिवेश में बहुत लोकप्रिय थीं। वे अक्सर कुछ पुराने संकेतों के जरिए भविष्यवाणियां भी करके चौंकाया करती थी। जैसे आज कोई आयेगा, आज वहां मत जाओ, आज यूं होगा, आदि-आदि। घर में ही साक्षात उदाहरण मौजूद था, इसीलिए हमारे लिए यह अंतर्द्वंद काफ़ी भारी था। उनके आप जैसे ही कई किस्से हम सुना करते थे। दादा जी एक किस्सा तो इतना सटीक सुनाया करते थे कि आश्चर्य से मन मसोस कर रह जाता था, जैसे कि तब होता है कि हम जानते हैं कि जादू दिखाने वाला कोई ट्रिक लगाकर भ्रम पैदा कर रहा है और फिर भी हम उस ट्रिक का अंदाज़ा नहीं लगा पाते और यह सोचते रह जाते हैं कि आखिर यह संभव कैसे हो पाया होगा

यह जबरदस्त चुनौती होती है और यहीं, हमारे दृष्टिकोण, हमें दो अलग राहों पर ले जाने की संभावनाएं रखते हैं। यदि हम किसी भी तरह की अलौकिकता में, चमत्कारों में, जरा सा भी यकी़न रखते हैं तो हम इस जादू को भी उन्हीं से जोडकर शांति पा सकते हैं, इसे भी उसी अलौकिकता का एक उदाहरण मानकर श्रृद्धानवत हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि हम जगत की वस्तुगतता के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं तो हम यह यक़ीन तो रखते हैं कि यह भी किसी भ्रमात्मक ट्रिक का ही मामला है पर हमारे पास इसका कोई जबाब नहीं होता और एक संदेह, एक उलझन लेकर वहां से उठते हैं। पहला रास्ता सुरक्षित रास्ता है, जिस पर और भी बहुतेरे राही होते हैं, वहीं दूसरा रास्ता हमें और भी अकेला कर देता है तथा एक अनवरत बैचैनी छोड जाता है

पहले तो हमें यह सब रहस्यमयी लगता था, धीरे-धीरे इन भविष्यवाणियों के पीछे के प्राचीन संकेतों की भाषा हम भी समझने लगे और फिर सच होने के अवसरों और आवृतियों को जांचने लगे। तब जाकर इनकी सांयोगिकताओं के प्रतिशत हमें समझ में आने लगे। परंतु हमारी माताजी उनमें अभी भी एक अलौकिक शक्ति का आभास पाती हैं और उन पर कोई तर्क काम नहीं करते। आस्थाएं, तर्क से संतुष्ट नहीं होती।

तो आदरणीय, यह आप पर है कि इन सांयोगिकताओं में किसी नियति की संभावनाएं टटोलते हैं और इनके पीछे किसी अलौकिक शक्ति के भावी इशारे ढूढ़ते हैं या फिर सपनों की वैज्ञानिक वस्तुगतता को समझ कर इनके सच के रूप में घट जाने को एक संयोग के रूप में देखते हैं। यह आप ही भली भांति जानते हैं कि इन सांयोगिकताओं के कितने रूप आपके सामने सच के हिस्से में आये, कितनों का आपने नोटिस लिया, और जो सच नहीं होते उनका नोटिस आप लेते हैं या नहीं।

समय ने अपने लेख में कई बातों को काफ़ी विस्तार से समझाने की कोशिश की थी। टिप्पणियों के जबाब में की गयी टिप्पणियों में और भी कई इशारे किये थे। कुछ फ़र्जी सपनों का जिक्र भी किया था जो कि हमेशा सच होने ही होते हैं।

यह आपने लिखा ही है कि कुछ सपने तो हूबहू घटते देखें हैं आपने, और कुछ हूबहू नहीं थे। दोनों ही मामलों में सारी व्याख्याएं घटनाएं घट जाने के बाद की हैं और उनके आपसी अंतर्संबंध भी आपने बाद में ही खोजे हैं। इसके अलावा यह भी ध्यान देने की बात है, इन सब सपनों को आप उम्र और समझ के इस दौर में पुनः नये सिरे से व्याख्यायित कर रहे हैं, ऐसे में हमारे पूर्वाग्रह अनुकूल परिस्थितियां ही चुनते हैं, कई नई अनुकूल बातें भी गढ़ ली जाती हैं। इस पर भी सोचा जाना चाहिए कि यह अधिकतर हमारे बुरे सपनों के साथ ही क्यों होता है?

हमारी चिंताएं वास्तविक परिस्थितियों के कारण ही उपजती है। जैसे की बच्चा जब झूले पर बैठा हो तो हमें उसके डूब कर मर जाने की चिंता सता ही नहीं सकती, हमें इस वक्त उसके गिर जाने की चिंता ही हो सकती हैं। यानि कि हर घटना के साथ हमारी स्मृति में उससे संबंधित चिंताओं के भावों की स्मृति भी बनती है और बाद में उस घटना का स्मरण उन चिंताओं से भी हमें पुनः रूबरू कराता है। यही सपनों में भी होता है, छवियों के साथ जुडी हुई चिंताएं भी हमें सालती हैं और यदि हमारी प्रवृति इन पर पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पाले हुए होती है तो चिंतन में भी और सपनों में भी हम उसी के अनुसार मानसिक प्रक्रियाएं करते हैं।

काफ़ी कुछ इशारे किए हैं समय ने।

आप यदि गंभीर है सत्य के अन्वेषण हेतु तो आपको अपने मन की गहराइयों को टटोलना चाहिए, अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं की वास्तविक पृष्ठभूमि को समझने की कोशिश करनी चाहिए, इसी से आपकों अपनी मानसिक प्रक्रियाओं और सपनों के रहस्यों की परतें खोलने में मदद मिल सकती है। जहां आपकी समझ, गुत्थियों के विश्लेषण और यथार्थ तथा वस्तुगत हल प्राप्त करने में अपनी सीमाएं महसूस करे, तो इसे उस विषय संबंधी अधिकृत तथा सिद्ध स्रोतों से और अधिक अध्ययन-मनन करने का इशारा समझना चाहिए। जब तक आप संतुष्ट नहीं महसूस करते, उस पर अपनी अंतिम मान्यताओं और निष्कर्षों को स्थगित रखना चाहिए।

यदि आप अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं के साथ संतुष्ट है, और अलौकिक शक्तियों के इशारों पर वास्तव में यक़ीन करते हैं तो फिर काहे इस समझ-वमझ के पचडे में पडते हैं? इसका आनंद लीजिए और ऐसे लोग जाहिर है कम ही होते हैं तो इसका जिक्र करके अपने अंदर भी अलौकिक शक्ति होने का भ्रम पालिए, लोगों के बीच चमत्कारी समझे जाने का मज़ा लीजिए और खुद भी अलौकिक होने के अहसास का गर्व महसूसिए। मिल रहा है, तो ज़िंदगी का मज़ा लूटिए।

यदि समय से कुछ और मदद चाहिए तो संवाद बनाए रखें। समय हमेशा हाज़िर है।
कुछ अनुचित और कठोर कह दिया गया हो तो मुआफ़ी की गुंजाईश बनाए रखें। मुझे मेरी सीमाएं बता दें।

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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

कुछ सपने आखिर सच होते क्यों प्रतीत होते हैं?

हे मानव श्रेष्ठों,

पिछली चर्चा ‘आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान’ पर एक जिज्ञासा थी कि हमें कुछ ऐसे भी सपने आते हैं, जो कभी-कभी सच हो जाते हैं, इनका क्या कारण है। इस पर आगे की चर्चा को समय, यहां सभी के लिए फिर से प्रस्तुत कर रहा है।

समय का उद्देश्य आपकी स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का रहता है। एक नज़रिया देने का, जिसे भी यदि चिंतन-मनन का हिस्सा बनाया जाए तो आपकी मेधा अपने सवालों के खुद जबाब ढूंढने की प्रक्रिया में जुट जाएगी।
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समय उक्त जिज्ञासा के संदर्भ में कुछ इशारों को दोहरा देता है।
पिछले आलेख से दोबारा गुजरें, और इन हिस्सों पर ध्यान दें:

‘ऐसी ही कई और व्याख्याएं की जा सकती हैं, और आसपास ऐसा होते हुए अक्सर देखा जा सकता है। संसार बहुत बडा है, इन बहुत छोटे अंतराल की छवियों की चिलकन यानि सपनों के सापेक्ष मनुष्य की ज़िंदगी काफ़ी बडी है, और ऐसे में इक्का-दुक्का संयोगो का मिलना, जिसमें कि वास्तविक रूप में सपनों की घटनाओं का दोहराव प्रत्यक्ष किए जाने के दावे किए जा सकते हैं, कोई ज्यादा अनोखी बात नहीं है। वैसे मनुष्य खुद अपने अंदर टटोले तो इसका जबाव मिल सकता है, कि ऐसी भ्रामक और डरावनी परिस्थितियों में छला हुआ उसका मन कितनी तरह की बातें खुद गढ़ता है, कहानिया बनाता है, और ऐसे दावे करने की कोशिश करता है।’

‘तो इस तरह से हम समझ सकते हैं कि सपनों में इस तरह ही उच्छृंगल रूप से छवियां चिलकती रहती हैं, कभी उनमें कोई तरतीब निकल आती है, कभी वे बिल्कुल बेतरतीब होते हैं। मस्तिष्क में पहले से दर्ज़ चीज़ों का ही मामला है यह, इनमें कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जा सकती जिससे किसी ना किसी रूप में मनुष्य पहले से बाबस्ता ना रहा हो। हां, उनकी बेतरतीबी से, या छवियों, ध्वनियों, भाव-बोधों की आपस में अदला-बदली से अनोखेपन या नवीनता का भ्रामक अहसास हो सकता है।’
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दरअसल सपनों में ऐसा कुछ हम देख ही नहीं सकते, जो की वस्तुगत नहीं हो यानि वास्तविक रूप से अस्तित्ववान नहीं हो। यानि कि सच नहीं हो। अमूर्त कल्पनाओं को भी आप इसी में रख सकते हैं, एक बार हो जाने के बाद वह भी वस्तुगत ही हैं।
जो सच है वह सपने में है, अतः जो सपने में है वह सच ही है।
पर उस बेतरतीबी में नहीं जिस रूप में यह सपने में है। अलग-अलग टुकडों में हम देखेंगे तो इसे महसूस कर सकते हैं।

समय जानता है, उक्त जिज्ञासा का मतलब यह नहीं था, परंतु यहीं से होकर असली मतलब तक पहुंचा जाना चाहिए।

उक्त जिज्ञासा का मतलब था कि इसी बेतरतीबी से आए सपनों को भावी ज़िंदगी में लगभग वैसा ही सच हो उठना।

यह अक्सर हमारी तात्कालिक चिंताओं के क्षोभको से उत्पन्न सपनों के साथ ही ज्यादा होता है। इन तात्कालिक समस्याओं या चिंताओ या गहन इच्छाओं पर मनुष्य का चेतन मस्तिष्क मननरत होता ही है, और संभावित या इच्छित हलों की कल्पनाओं में होता है।

जाहिरा तौर पर अवचेतन मानसिक क्रियाकलापों में भी यही क्षोभक काम कर रहे होते हैं, और सपनों में भी यही कार्य-व्यापार संपन्न होता है। यही संभावित या इच्छित हलों की कल्पनाएं वहां भी आकार लेती हैं।

मनुष्य किसी अनुकूल हल या आनंद देने वाली किसी वास्तविकता में हो सकने वाली परिस्थिति की कल्पना को चुन लेता है।

अब इसकी संभावनाएं तो है ही ये सपनों के हल या इच्छाएं सच में आकार लेलें, क्योंकि मनुष्य सच की परिस्थितियों के हिसाब से ही इनकों बुन रहा था।

मनु्ष्य ऐसी ही चीज़ों में, इस सच हो जाने वाली परिघटना का नोटिस लेता है।

वह सपनों में उडता है, उसके सिर पर सींग आजाते हैं, खून का रंग हरा हो जाता है, वह स्वर्गीय गांधी जी के साथ खाना खा रहा है, साक्षात भगवान या देवी सामने खडे होते हैं…ऐसे अवास्तविक बेतरतीबियों को सच होते वह देख ही नही सकता, इसीलिए इनका नोटिस भी नहीं लेता कि यह सच हो रही हैं या नहीं।

मनुष्य परंपरा से मिली अपनी आस्था या मान्यताओं के अनुकूल पड़ने वाली संवृतियों का ही नोटिस लेता है और अपनी मान्यताओं को और पुख़्ता करता जाता है। परंतु सत्य का संधान संदेहों के जरिए ही संभव हो सकता है।

अगर संदेह पैदा हुआ हो तो आगे विचार के लिए शायद इससे आपकी कुछ मदद हो सके?
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चर्चा में एक और बात सामने आई थी:

‘बौद्ध एवं जैन कथाओं में बुद्ध एव तीर्थंकरों के जन्म से पूर्व उनकी गर्भवती माताओं द्वारा देखे गए ” विशिष्ट-स्वप्न ” और विद्वानों द्वारा उनकी सटीक विवेचनाओं का बड़ा रोचक विवरण उपलब्ध है उस समय में सिंगमन्ड फ्रायड जैसों का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं था ; हाँ स्वप्नों का उनका अपना मनो -विज्ञानं उस कल में भी था , उनकी अपनी विवेचनाएँ थी,उनकी अपनी परिभाषाएं थी जो आज भी यदि उन्हें युगानुसार सही परिपेक्ष्य में सही ढंग से अधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया जाये तो वे सटीक हैं।’
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बहुत बेहतर बात उठाई गई थी।
समय इस पर भी वही बात दोहराना चाहता है कि परंपरा से मिली मान्यताओं पर संदेह किया ही जाना चाहिए तभी सही समझ विकसित की जा सकती है।

इस पर भी पहली जिज्ञासा पर पेश किए गए नज़रिये से विचार किया जाना चाहिए।

कथाएं, कथाएं ही होती हैं। वहां पर कल्पनाशीलता की बहुत गुंजाइशें होती हैं। एक निर्विवाद सत्य पहले ही सामने आ चुका है, बुद्ध या महावीर के रूप में। अब कथा कहते वक्त माताओं के विशिष्ट-स्वप्नों की अतिश्योक्ति पूर्ण चर्चा कथा में की जा सकती है। सच होना पहले ही सामने है, यहां तो उसके हिसाब से कथा में सपनों की सिर्फ़ अनुकूल व्याख्याएं ही करनी है। हर गर्भवती माता अपने गर्भस्थ शिशु के भावी जीवन के बारे में अच्छे सपने ही बुनती है। महानता और सफलता के युगानुसार परिप्रेक्ष्यों के अंतर्गत ही अपने शिशु के लिए महत्त्वाकांक्षाओं के संभावित सोपान चुनती है। इस पर तुर्रा यह और कि उक्त कथाओं की माताएं तो संपन्न और संभ्रांत कुल की और थी, जाहिर है दिग्विजय की आकांक्षाएं ही वहां पेश होनी थी। अतएव ऐसे में माताओं को वास्तव में भी तथाकथित वही सपने भी आए हों तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नज़र नहीं आती।
वैसे यह बात भी अपनी जगह है ही कि अक्सर मनुष्य बाद में होने वाली परिघटनाओं पर ऐसे ही प्रतिक्रिया देता है कि उसे तो यह पहले ही मालूम था, उसने तो यह पहले ही कह दिया था, उसे सपनों में बिल्कुल ऐसी ही बात नज़र आई थी…आदि-आदि। कुछ समझदार मनुष्य इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि अच्छा तो मेरे सपने का यह मतलब था, उफ़ तो सपनों में इसका इशारा पहले ही मिल गया था, पर यह अज्ञानी उसे पहचान ही नहीं पाया।

सफलताओं की इकतरफ़ा ज़मीन पर ऐसी ही कई विजयगाथाएं लिखी गयी हैं।

हर युग की अपनी समस्याएं होती हैं, उस युग के अनुसार ही ज्ञान और समझ के स्तर हुआ करते हैं, उन्हीं के हिसाब से उनके हल की संभावनाएं टटोली जाती हैं। अगर हम किसी और समय की चीज़ों की व्याख्या करते हैं तो उस समय की तत्कालीन परिस्थितियों और ज्ञान के स्तर को नहीं भूलना चाहिए। बुद्ध अपने समय की देन होते हैं, फ़्रायड अपने समय की। समय आगे बढता है, मनुष्य के ज्ञान और समझ का स्तर बढता है और वह बुद्धों और फ़्रायडों का अतिक्रमण कर नये-नये परिस्थितिजन्य मानवश्रेष्ठ बनाता जाता है।

इसलिए यह कहा जाना कि, ‘.. उनकी अपनी विवेचनाएँ थी,उनकी अपनी परिभाषाएं थी जो आज भी यदि उन्हें युगानुसार सही परिपेक्ष्य में सही ढंग से अधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया जाये तो वे सटीक हैं।’, ज्यादा उचित दृष्टिकोण नहीं है।

बजाए इसके समुचित दृष्टिकोण यह होगा कि, ‘… उनकी अपनी विवेचनाएँ थी, उनकी अपनी परिभाषाएं थी, आज भी यदि उन्हें, युगानुसार सही परिपेक्ष्य में, सही ढंग से, आधुनिक सन्दर्भों के सापेक्ष समालोचित किया जाये तो वे हमें सटीक राह दिखाने की क्षमता रखती हैं।’
इनके जरिए मनुष्य, ज्ञान और समझ के क्रमिक विकास को महसूस कर सकता है।
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समय इस सार्थक चर्चा के लिए, शामिल मानवश्रेष्ठों का शुक्रिया अदा करता है। उनकी कृपापूर्ण भागीदारी के बिना यह अवसर संभव ही नहीं था।

तो हे मानवश्रेष्ठों,
दिमाग़ में मची हलचलों को, जिज्ञासाओं को जाहिर कीजिए।

समय हमेशा हाज़िर है।

आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान

हे मानव श्रेष्ठों,
कई दिन हुए, हुआ यह कि एक मानवश्रेष्ठ की जिज्ञासा पर समय सपनों की दुनिया की यात्रा पर निकल गया था। चलिए देखते हैं कि समय अपने पिटारे में वहां से क्याक्या ले कर आया है।
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सपने शुरू से ही यानि जब मनुष्य नाम का प्राणी कार ले रहा था, मानवजाति के लिए रहस्यमयी अवस्था रही है। वह सपनों को अपनी जागृत ज़िंदगी से अलग नहीं कर पाता था, और जाहिर है इसीलिए इनमें एक वस्तुगत सत्य का आभास महसूस करता था। जागृत अवस्था की वास्तविकता का अनुभव धीरेधीरे उसकी चेतना में सुषुप्त अवस्था में देखे गये सपनों की काल्पनिकता की समझ विकसित करता रहा।

शुरूआती चेतना में सपनों की यह रहस्यमयता अनेक रूपों में परावर्तित होती है। धर्म और दर्शन में भी सपनों के जरिए कई सार्विक समस्याओं के संभावित हलों के तर्क ढूढ़ें गये हैं। आदर्शवादी दर्शन में तो सपनों के मिथ्या अनुभवों के तर्कों के जरिए, संपूर्ण जगत की वस्तुगतता और संज्ञान को मिथ्या घोषित कर दिया गया।

जैसा कि समय पहले चर्चा कर चुका है, मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर पर मानवजाति के इतिहास को दोहराता है, अतएव इस मामले में भी उसकी समझ उसी तरह के अपरिपक्व रास्ते से गुजरती है, विकसित होती है और यदि आगे की संभावनाएं नहीं हो तो यहीं रूक भी जाती है। साधारणतया उपलब्ध आसपास का परिवेश इस बारे में उसे इस समझ के आगे नहीं ले जा पाता कि सपने जैसे एक अलग ही जगत का अलौकिक अनुभव हैं, ये आपको अपने भूत और भविष्य का पूर्वाभास देते हैं, इनमें देखी गयी हर अटपटी चीज़ और परिस्थितियां आपको भावी जीवन के बारे में कुछ इशारे करती है जिन्हें समझना किसी विशेषज्ञ के ही बस की बात है। इसीलिए समान्यतया मनुष्य अपने सपनों के मतलब जानने को, ख़्वाबों की ताबीर पा जाने को बैचेन रहता है, सुखांत सपनों को भावी खुशियों से जोडता है और अटपटे एवं दुखांत एवं डरावने सपनों को अपशकुनों के रूप में देखता है।

जो मनुष्य थोडा बहुत तार्किकता को अपने जीवन में स्थान देते हैं वे तार्किक परिवेशगत उपलब्ध ज्ञान के अनुसार इन्हें अपनी स्मृति से जोडते है और इन्हें इस रूप में देखते हैं कि जो आपके मन में चल रहा होता है या सोते वक्त जो मनुष्य सोच रहा होता है वही सपने में आता है, परंतु जब सपने इनसे इतर भी आते हैं तो वे भी सपनों को एक रहस्यात्मक अबूझ पहेली के रूप में देखने को विवश हो जाते हैं।
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तो फिर सपने क्या होते है? ये क्यूं आते हैं? इन्हें कैसे विश्लेषित किया जा सकता है?
ये प्रश्न उठते हैं।

चलिए, समय की मानवजाति के अद्यतन ज्ञान के आधार पर जो समझ विकसित हुई है, उसके अनुसार इन पर थोडाबहुत प्रकाश डालते हैं। हो सकता है यह आपके दिमाग़ में आगे की यात्रा की खलबली मचा पाए। पहले थोडा संज्ञान और चिंतन पर बात हो जाए।
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मनुष्य अपनी इन्द्रियों के द्वारा विश्व का संज्ञान करता है। अलगअलग इन्द्रियां प्रेक्षित वस्तु का अलगअलग तरीके से संवेदन करती है और मस्तिष्क तक उन सूचनाओं को पहुंचाती है, जो कि वस्तु के विभिन्न गुणधर्मों को परावर्तित करती हैं। ये समेकित रूप में उस वस्तुविशेष का एक लाक्षणिक बिंब तैयार करती है जो हमारी स्मृति का हिस्सा बन जाता है। स्मृति के जरिए हम बाद में भी यानि कि वस्तु की अनुपस्थिति में भी, उस बिंब का स्मरण कर सकते हैं, उसे अपने चिंतन का हिस्सा बना सकते हैं। स्मरण की यानि की प्रदत्त क्षण में निश्चित बिंब को अपनी चेतना या चिंतन का मूल विषयी बनाने की यह प्रक्रिया क्षोभकों ( उत्तेजित करने वाले कारकों ) पर निर्भर करती है। ये क्षोभक चिंतन के आंतरिक परिणाम भी हो सकते हैं और बाह्य कारकों के भी। चिंतन के दौरान पैदा हुई नयी जरूरत आंतरिक कारण होती है, और ऐन्द्रिक संवेदनों के जरिए बाह्य विश्व से आए क्षोभक हमारे मस्तिष्क को उत्तेजित कर स्मृति से कुछ निश्चित बिंबों को हमारी चेतना के दायरे में ले आते हैं।

जैसे कि जब, मान लीजिए मनुष्य को भूख महसूस होती है तो उसका चिंतन खाने की वस्तुओं और उनकी उपलब्धता पर होने लगता है, उसकी चेतना स्मृति से खाने संबंधी पूर्वसंचित बिंबों और संवेदनों को टटोलने लगती है। ऐसे में हो सकता है कि चेतना पहले एक गंध के पूर्वसंचित संवेदन पर पहुंचे, और उसके स्मरण से पैदा हुए क्षोभ के कारण उस गंध से संबंधित अन्य संवेदन और बिंब भी अचानक चेतना में उभर आएं। जैसे की पकेमीठे आम की गंध के संवेदन के स्मरण से पैदा हुआ क्षोभ एक साथ मनुष्य की चेतना में आम का बिंब, आम का स्वाद, उसके आकार का स्पर्श संवेदन, फिर जो भी पहले मिल जाए या जो स्मृति में ज्यादा प्रखर हो, आम का ठेला, बेचने वाला, जगह, बातचीत या घर का वह दृश्य जब आम खाए गये हों एक साथ मनुष्य की चेतना में उभर आते हैं। यह आंतरिक क्षोभकों की बात है, और यही सब बाह्य रूप से भी हो सकता है। अचानक कमरे में बैठे आप तक सिर्फ़ एक आम जैसी गंध पहुंचती है और आपकी चेतना में उपरोक्त प्रक्रिया लगभग ऐसे ही शुरू हो सकती है।

इससे चिंतन और स्मृति के आंतरिक संबंधों और क्षोभकों पर कुछ बात साफ़ होती है।

अब थोडा नींद को देख लें।
नींद में मस्तिष्क अपना चेतन कार्य स्थगित कर देता है। इसका मतलब है कि ऐन्द्रिक सूचनाओं का संसाधन और उन पर प्रतिक्रियाएं शनैशनै बंद हो जाती हैं। बाह्य विश्व से इन्द्रियां सूचना तो प्राप्त करती हैं, परंतु मस्तिष्क अनुक्रिया नहीं करता। नींद का गहरा और हल्का होना इसी बात पर आंका जाता है कि सूचनाओं की कितनी तीव्रता पर प्रतिक्रिया प्राप्त होती है।

नींद में चेतन क्रियाकलाप तो स्थगित हो जाते हैं परंतु अवचेतन मस्तिष्क के मानसिक व्यापार जारी रहते हैं। अधिक गहरी नींद में इन अचेतन मानसिक क्रियाकलापों का चेतना पर कोई बोध दर्ज नहीं होता, परंतु कम गहरी या कच्ची नींद में चेतन मस्तिष्क इनके कुछ हिस्सों को स्मृति पटल पर धुंधली सी याद के रूप में दर्ज़ कर लेता है। जागने पर स्मृति पर दर्ज़ इन बेतरतीब सी यादों का बोध मनुष्य को होता है, और इन्हीं को सपने कहा जाता है।
उक्त विवेचन से अब यह समझा जा सकता है गहरी और निश्चिंत नींद सोने वाले स्थिर प्रवृति वाले मनुष्यों को सपने ज़्यादा नहीं आते हैं, परंतु कच्ची और बेचैन नींद सोने वाले अस्थिर प्रवृति वाले मनुष्य सपनों से ज़्यादा दोचार होते रहते हैं। जाहिर है यह बेचैनी किसी परिस्थितिजनित चिंता से उभरती है, और कई तरह के डरों और असुरक्षाओं के रूप में मस्तिष्क में खलबली मचाए रखती है, इसीलिए इनके सपने भी तदअनुरूप ही डरावने और बेचैनी बढा़ने वाले ही होते हैं।

इस तरह से अब थोडा साफ़ होता है कि सपने अवचेतन मस्तिष्क की अंतर्क्रियाओं से संबंधित होते हैं, ये तभी संभव हो पाते हैं जब किसी वज़ह से चेतन मस्तिष्क इन अवचेतन व्यापारों से उत्पन्न आंतरिक क्षोभकों के कारण इनमें हस्तक्षेप करने लगता है और इन पर अपनी प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है, जबरन इन पर चिंतन शुरू कर देता है और फिर इन सभी क्रियाकलापों को स्मृति पटल पर दर्ज़ कर लेता है।
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उपरोक्त को विस्तृत रूप में समझने की कोशिश की जा सकती है।

एक सपना लेते हैं। मानसिक प्रक्रिया से गुजरते हैं।
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थोडी कम गहरी नींद में अवचेतन मस्तिष्क की अंतर्क्रियाएं जारी हैं। स्मृति पर दर्ज़ विभिन्न सूचनाओं पर आकस्मिक रूप से इधरउधर जाया जा रहा है, इन्हें जांचा जा रहा है, इनकी प्रोसेसिंग की जा रही है। आकस्मिक रूप से एक सूचना पर पहुंचा जाता है, यह एक रेलयात्रा का धुंधला सा दृश्य है और कुछ लोग साथ हैं। अवचेतन में जिज्ञासाएं नहीं होती, यह चेतन अनुक्रिया है। इस रेलयात्रा का यह दृश्य किन्हीं अनुकूलित वज़हों से ( रेलयात्रा से सम्बंधित उसके पूर्व के अनुभवों के जरिए) एक गहरी सांवेदनिक अनुक्रिया पैदा करता है जो कि चेतन मस्तिष्क के लिए एक आंतरिक क्षोभक की तरह कार्य करती है और चेतन मस्तिष्क अपनी सुषुप्तावस्था में भी इस क्षोभक के प्रति प्रतिक्रिया करने लगता है। वह जिज्ञासा करता है साथ में कौन है? दो चहरे तुरंत पहचान लिए जाते हैं, उनके बिंब अधिक साफ़ हैं। एक और धुंधली सी आकृति है, यह कौन है? उसे पहचानने की कोशिश शुरू होती है।

पहचानने की प्रक्रिया का मतलब है प्रदत्त छवि को, पूर्व में दर्ज़ चवियों से तुलना करके उन्हें एकाकार करके, एक निश्चित पहचान देना। तुरंत मस्तिष्क स्मृति के छवि भंडार तक भागता है। आकस्मिक रूप से पहली छवि उस मनुष्य के दादा जी की है, अब दादाजी की यह छवि आंतरिक क्षोभक बन जाती है। दादाजी से संबंधित छवियां टटोली जाती हैं, गांव के दृश्य उभरने लगते हैं, एक दृश्य स्थिर होता है, दादा जी खाट पर बैठे किसी से बात कर रहे हैं, उस किसी की पीठ है दृश्य में। दादा जी देखकर कुछ कहते हैं, क्या कहाक्या कहा..मस्तिष्क भागता है स्मृति के ध्वनि भंडार मेंपहला वाक्य मिलता है दृश्य से मिलता जुलता साबेटा अभी क्यूं आये हो, अगली बार आना….पर यह बैठा कौन है? दादा जी किससे बाते कर रहे हैं….फिर चहरे की तलाशमस्तिष्क भाग रहा है….एक चहरा मिलाये कौन है….कॉलेज का दोस्त अमित..पर ये यहां कैसे….कॉलेज तो….मस्तिष्क भाग रहा हैछवियां टटोल रहा है….कॉलेज के दृश्य उभर रहे हैं….एक दृश्य टिकता है….क्लास चल रही है, कोई पढा़ रहा हैकौन है ये?…मस्तिष्क फिर भागता है….अभी थोडी देर पहले ही दादा जी की छवि से गुजरे थेस्मृति में नई सूचना हैमस्तिष्क तुरंत उसे ही पकड लेता है….दादा जीपर दादा जी कॉलेज में कैसे? वो भी पढाते हुए?…दादा जीमस्तिष्क फिर यात्रा करने लगता हैछवियां भाग रही हैं….दादा जी तोएक दृश्य उभरता हैदादा जी को अंतिम यात्रा के लिए तैयार किया जा रहा हैगमगीन माहौलभावनाएं के बोध उभरते हैंलाश का चहरा नहीं दिख रहाकौन है?…लाश हैडर है….मस्तिष्क भागमभाग में हैडरज्यादा तीखे डर..छवियांएक छवि उभरती है….अरे यह तो उसका बच्चा है….यह कैसे….डर और भावनाएं घनीभूत हो उठती हैसांस फूल जाती हैबेचैनी बढने लगती हैनींद टूट जाती है….आंखें खुल जाती हैं….उफ़….

सब ठीकठाक हैमतलब कि सपना देख रहा था….सपने की ताज़ा दर्ज़ सूचनाओं का स्मरण करता हैसामान्य होता है, और फिर सो जाता है। बेचैनी तगडी है तो काफ़ी देर तक नींद दोबारा नहीं आती।
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सुबह जाग कर यह मनुष्य श्रेष्ठ, अपने सपने को शब्द देगा, उसे सुनाएगा। भूमिका बांधेगा कि रात एक अजीब सा और भयानक सपना देखा है उसने। वह शायद पत्नी को ऐसा कुछ सुनाए:

अपन सभी ट्रैन में जा रहे थे, तुम थी, बच्चा था। देखता हूं की वहां दादा जी भी बैठे हैं। बताओ आज तो मृत्यु के बाद पहली बार दिखे हैं दादा जी। फिर पता नहीं कैसे, मैं गांव पहुंच जाता हूं। दादा जी किसी से बाते कर रहे थे, मुझे देख कर कहा कि बेटा अभी क्यों आए हो बाद में आना। वो जो साथ में था, वह मेरे कॉलेज का दोस्त अमित था। अचानक फिर, मैं कॉलेज में पहुंच जाता हूं, वहां क्लास चल रही थी और पता है अपने दादाजी पढा़ रहे थे। मैं तो चौंक गया कि दादा जी यहां कैसे, पर फिर पता नहीं क्या होता है, मुझे दिखता है कि किसी की अर्थी सजाई जा रही है, सभी रो रहे हैं, मैं भी रो रहा हूं। फिर मैं अचानक लाश का चहरा देखता हूं तो पता है वो कौन था, अपना बच्चा और मैं तो, मैं तो सन्न रह जाता हूं। फिर घबराहट में मेरी नींद खुल जाती है, देखता हूं कि सब ठीकठाक है, तब थोडा चैन आता है। पर यार फिर भी उसके बाद रात भर नींद नहीं आई, बेचैनी में ही करवटें बदलता रहा। बार बार अपने बच्चे का चहरा सामने आता रहा। उफ़, कितना भयानक और अजीब सपना था, है ना। पता नहीं ऐसा सपना क्यों आया।

अब इसमें कई हास्यास्पद इशारे ढूंढ़े जा सकते हैं।
इस मनुष्य की मृत्यु की संभावनाएं थी, परंतु दादा जी की आत्मा ने इसका निपटारा कर दिया और उसे पुनः जीवन दे दिया। क्योंकि दादा जी ने कहा था, “बेटा अभी क्यूं आये हो, अगली बार आना
इस मनुष्य के बच्चे की उम्र काफ़ी लंबी है, क्योंकि शास्त्रों? में लिखा हुआ है, सपने में जिसकी मृत्यु देख ली जाती है, उसकी आयु और लंबी हो जाती है।
इस मनुष्य के दोस्त अमित की मृत्यु की पूरी संभावनाएं है, क्योंकि वह स्वर्गीय दादा जी के साथ पहले से बैठा बातें कर रहा था।

ऐसी ही कई और व्याख्याएं की जा सकती हैं, और आसपास ऐसा होते हुए अक्सर देखा जा सकता है। संसार बहुत बडा है, इन बहुत छोटे अंतराल की छवियों की चिलकन यानि सपनों के सापेक्ष मनुष्य की ज़िंदगी काफ़ी बडी है, और ऐसे में इक्कादुक्का संयोगो का मिलना, जिसमें कि वास्तविक रूप में सपनों की घटनाओं का दोहराव प्रत्यक्ष किए जाने के दावे किए जा सकते हैं, कोई ज्यादा अनोखी बात नहीं है। वैसे मनुष्य खुद अपने अंदर टटोले तो इसका जबाव मिल सकता है, कि ऐसी भ्रामक और डरावनी परिस्थितियों में छला हुआ उसका मन कितनी तरह की बातें खुद गढ़ता है, कहानिया बनाता है, और ऐसे दावे करने की कोशिश करता है।
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तो इस तरह से हम समझ सकते हैं कि सपनों में इस तरह ही उच्छृंगल रूप से छवियां चिलकती रहती हैं, कभी उनमें कोई तरतीब निकल आती है, कभी वे बिल्कुल बेतरतीब होते हैं। मस्तिष्क में पहले से दर्ज़ चीज़ों का ही मामला है यह, इनमें कोई ऐसी चीज़ नहीं देखी जा सकती जिससे किसी ना किसी रूप में मनुष्य पहले से बाबस्ता ना रहा हो। हां, उनकी बेतरतीबी से, या छवियों, ध्वनियों, भावबोधों की आपस में अदलाबदली से अनोखेपन या नवीनता का भ्रामक अहसास हो सकता है।
जाहिर है इनसे किसी भावी नियती के इशारे पाए जाने की संभावना टटोलना बचकानापन है, परिपक्वता की कमी है। हां, इनसे किसी मनुष्य के अंतस का, उसकी चिंताओं का आभास पाया जा सकता है, वह भी सावधानीपूर्वक किए गए विश्लेषण के जरिए ही, क्योंकि इनकी आकस्मिक बेतरतीबी से इनकी तरफ़ इशारे करती तरतीबी सूचनाएं ढूंढ़ निकालना एक बेहद गंभीर और जिम्मेदारी भरा कार्य है। यहां भ्रम में फसने की पूरी संभावनाएं हैं।
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तो यह है सपनों का मनोविज्ञान। ऊपर दी गयी सपने की प्रक्रिया पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि लगभग ऐसा ही हमारा सोचने और चिंतन करने का तरीका होता है। अगर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है, तो मनुष्य ऐसे ही बेतरतीब रूप से इधरउधर छलांगे लगाते हुए ही सोचता रहता है। सपने इससे ज्यादा अलग नहीं है।

तो मानव श्रेष्ठों,
कल्पनाशक्ति की उडान की पूरी संभावनाएं मनुष्य के सामने हमेशा ही होती हैं। वह अपनी समझ और ज्ञान के हिसाब से सपनों का भी, कुछ भी मतलब निकालने को, मनचाही व्याख्याएं करने को, स्वतंत्र होता है। आप भी कर सकते हैं।
परंतु आप यदि उपरोक्त व्याख्या से गंभीरता से गुजरे हैं, और आपको यहां कुछ नया मिला है तो निश्चय ही इस बार आप अपने सपनों को एक अलग ही नज़रिए से देखेंगे और अपनी इस अवचेतन मानसिक अंतर्क्रियाओं के उत्सों को समझने की कोशिशें करेंगे।

कोई जिज्ञासाएं हैं तो यहां टिप्पणी कर सकते हैं, समय को मेल कर सकते हैं।

समय आपकी सेवा में हाज़िर है।

समय