श्रम – सक्रियता का प्रमुख रूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत श्रम पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


श्रम
( श्रम पर एक प्रविष्टि ‘चेतना के आधार के रूप में श्रम’ पहले भी थी, उससे गुजरना भी समीचीन रहेगा। )

श्रम का शास्त्रीय मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन। श्रम एक ऐसी सक्रियता है, जिसका उद्देश्य निश्चित समाजिकतः उपयोगी ( अथवा समाज द्वारा उपयुक्त ) उत्पादों को पैदा करना है, जो भौतिक और आत्मिक, दोनों तरह के हो सकते हैं। श्रम मनुष्य की सक्रियता का प्रमुख और बुनियादी रूप है। श्रम के बिना मानवजाति का अस्तित्व कभी का ख़त्म हो गया होता। इसलिए श्रम को लोगों के जैविक जातिगत व्यवहार का एक विशिष्ट रूप कहा जा सकता है, जो उनकी उत्तरजीविता, अन्य जैविक जातियों पर विजय और प्रकृति की शक्तियों व संसाधनों का विवेकसंगत उपयोग सुनिश्चित करता है।

श्रम-सक्रियता के लक्ष्य वे वस्तुएं हो सकती हैं, जिन्हें लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है और जो ऐसी उपभोज्य वस्तुओं, मसलन रोटी, मशीनों, फ़र्नीचर, उपकरणों, कपड़ों, कारों, आदि के उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। श्रम का उद्देश्य ऊर्जा ( ताप, प्रकाश, विद्युत, गति आदि ) और सूचना-साधनों ( पुस्तकों, चित्रों, फ़िल्मों, आदि ) का उत्पादन भी है। उसके परिणाम वैचारिक उत्पाद ( वैज्ञानिक अविष्कार, कलाकृतियां, विचार, आदि ) और लोगों के व्यवहार तथा श्रम के संगठन की ओर लक्षित क्रियाएं ( प्रबंधन, नियंत्रण, संरक्षण, शिक्षा, आदि ) भी हो सकते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि श्रम के उत्पाद व्यक्ति द्वारा अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि के लिए ही इस्तेमाल किये जाएं। मुख्य यह है कि उत्पाद समग्रतः समाज की आवश्यकता हो। इसलिए मनुष्य की व्यष्टिक सक्रियता के लक्ष्य उसकी अपनी ही आवश्यकताओं से निर्धारित नहीं होते। व्यक्ति के लिए उन्हें समाज तय करता है और इसलिए व्यक्ति की सक्रियता बहुत कुछ एक निश्चित सार्वजनिक दायित्व की पूर्ति जैसी बन जाती है। मनुष्य की सक्रियता बुनियादी तौर पर सामाजिक सक्रियता है और इसे समाज की आवश्यकताएं प्रेरित, निदेशित तथा नियमित करती हैं।

श्रम के सामाजिक स्वरूप का एक महत्त्वपूर्ण पहलू और भी है। आज के समाज में श्रम के विभाजन के कारण व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएं स्वयं नहीं पैदा करता, न वह कभी किसी वस्तु के उत्पादन की शुरू से लेकर आख़िर तक सारी प्रक्रिया में भाग ही लेता है। इस कारण व्यक्ति को अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक सब कुछ समाज से अपने श्रम के एवज़ में पाना होता है। वैसे भी व्यक्ति की आवश्यकताओं की तुष्टि समाज द्वारा, न कि उसके अपने श्रम द्वारा, की जाती है। तुष्टि के इस विशिष्ट तरीक़े का स्रोत समाज में प्रचलित उत्पादन-संबंधों की पद्धति है। इसलिए समाज में किसी भी चीज़ का उत्पादन साथ ही, लोगों के बीच श्रम की प्रक्रिया में और उसके उत्पादों के वितरण, विनिमय तथा उपभोग के दौरान निश्चित संबंधों का निर्माण भी है।

मनुष्य द्वारा श्रम-सक्रियता के दौरान की जानेवाली क्रियाएं उसकी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं द्वारा नहीं, बल्कि उत्पादन के लक्ष्य द्वारा और इस लक्ष्य को पाने के दौरान अन्य लोगों से बने संबंधों के द्वारा निर्धारित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का निष्पादन तथा नियमन कर पाने के लिए मनुष्य को सूचना का संसाधन करने की उच्चतर प्रक्रियाओं, विशेषतः कल्पना और चिंतन का उपयोग करना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि मानव मन की इन असामान्य योग्यताओं के स्रोत का स्पष्टीकरण करने के लिए ‘आत्मा’ के किन्हीं विशेष गुणधर्मों का आविष्कार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इन योग्यताओं का स्रोत और कोई नहीं, बल्कि मनुष्य की सक्रियता की नियमसंगतियां ही हैं। दूसरे शब्दों में, वे श्रम करने वाले सामाजिक प्राणी के रूप में मानव के अस्तित्व की ही उपज हैं।

मानवजाति के इतिहास में सामूहिक श्रम-सक्रियता ने मनुष्य से अपनी उच्चतम मानसिक क्षमताओं के उपयोग की मांग करते हुए साथ ही उन क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यक पूर्वापेक्षाएं तथा परिस्थितियां भी पैदा की हैं।

उदाहरण के लिए, आदिम शिकारी यूथ में हांका करनेवाले के व्यवहार को लें। उसकी क्रियाएं अपने आप में शिकार को पकड़ने की ओर लक्षित नहीं होती थीं। इतना ही नहीं, यदि वह अकेला होता , तो परिणाम उल्टा ही निकलता, शिकार आसानी से बच निकलता और वह भूखा ही रह जाता। उसकी सारी सक्रियता सार्थक तभी बनती है, जब वह अन्य शिकारियों की सक्रियता के साथ संपन्न की जाती है। इस लक्ष्य को पाने के लिए हांका करनेवाले को शिकारियों की क्रियाओं को भी ध्यान में रखना पड़ता था, यानि हिरण का पीछा करने के साथ-साथ उसे शिकारियों की ओर खदेड़ना भी पड़ता था।

इस तरह उसके लक्ष्य ने अपना जैविक अर्थ खो दिया और सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लिया। वह अब आंतरिक सहजवृत्तिमूलक अनुभवों के रूप में नहीं, बल्कि बाह्य वस्तुओं पर क्रियाओं के अवबोधन के जरिए अपने को प्रकट करता था। इस तरह मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप ने ही वस्तुओं और वस्तुसापेक्ष क्रियाओं के बिंबों को मनुष्य को सक्रियता के लिए उकसानेवाली जैव आवश्यकताओं के अनुभव से पृथक किया।

श्रम की जो मुख्य विशेषता उसे प्राकृतिक उत्पादों के साधारण हस्तगतकरण से भिन्न बनाती है, वह औजारों का निर्माण तथा प्रयोग, यानि कुछ वस्तुओं के ज़रिए अन्य वस्तुओं पर काम करना है। इस तरह श्रम एक दूसरे के संबंध में वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों को प्रकट करता है। हर प्रकार की श्रम-सक्रियता वस्तुओं के जैव महत्त्व की बजाए इन यथार्थ गुणधर्मों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, हड्डी का बल्लम-सिरा बनाने के लिए हड्डियों की आपेक्षिक कठोरता को ध्यान में रखना पड़ता है, न कि उनके खाद्य गुण को। हड्डी की वस्तुओं के निर्माण के लिए आवश्यक क्रियाएं हड्डियों के इन यथार्थ गुणधर्मों से निदेशित होती हैं, न कि उनके स्वाद अथवा पौष्टिकता से।

इस प्रकार वस्तुओं के नये अर्थ और उनके प्रति नये रवैये, मनुष्य की व्यावहारिक सक्रियता और सामाजिक श्रम से पैदा हुए हैं। सामूहिक सक्रियता वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों में भेद करती है, उसकी बदौलत लोग आपस में जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उन्हें वाक् नामक विशेष संप्रेषणात्मक क्रियाओं में ठोस रूप देते हैं। सामूहिक सक्रियता के माध्यम से ही व्यक्ति अपने को और अन्य व्यक्तियों को सक्रियता में भाग लेने वाले के रूप में जान सकता है। इसके अलावा, यह भी सामूहिक सक्रियता ही है कि जो मनुष्य को अपने सामने निश्चित प्रात्ययिक लक्ष्य रखना और सामाजिक अनुभव को अपनी क्रियाओं में मार्गदर्शन के लिए इस्तेमाल करना सिखाती है।

यथार्थ के प्रति यह रवैया ही चेतना का आधार है। वही मनुष्य को वस्तुओं के संबंध में सक्रियता का कर्ता और लोगों के संबंध में व्यक्ति बनाती है। यह रवैया ही मनुष्य को परिवेशी विश्व के दास से उसके स्वामी में परिणत करता है, उसे इस विश्व का रूपांतरण करने तथा दूरस्थ लक्ष्यों की ओर बढ़ने में समर्थ बनाता है और उसकी क्रियाओं को सचेतन, सुनियोजित सक्रियता में तथा पृथ्वी पर उसके अनुकूलनमूलक अस्तित्व को अर्थपूर्ण तथा उदात्त लक्ष्योंवाले सक्रिय जीवन में रूपांतरित करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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अधिगम और अध्ययन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


अधिगम और अध्ययन

बच्चे के व्यवहार तथा सक्रियता पर विचार करते समय हमारा एक बुनियादी महत्त्व के तथ्य से साक्षात्कार होता है। कुछेक अनुकूलित प्रतिवर्तों के अलावा व्यवहार तथा सक्रियता के उन सभी रूपों का बच्चे में शुरू में अभाव होता है, जिनका वह बाद के चरणों में प्रदर्शन करता है। व्यावहारिक और संप्रेषणात्मक व्यवहार, अभिविन्यासात्मक तथा अन्वेषणात्मक सक्रियता, पकड़ने तथा उलटने-पलटने की गतियां, रेंगना, चलना, बोलना, खेलना और सामाजिक अन्योन्यक्रिया अपने को बच्चे के जन्म के कुछ समय के बाद ही प्रकट कर देते हैं और विकास करने लगते हैं। इतना ही नहीं, हर प्रकार के व्यवहार और हर प्रकार की सक्रियता के प्रकट होने का लगभग निश्चित समय, विकास की निश्चित गतियां और परिणामात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों से गुजरने के निश्चित चरण होते हैं। वे सभी बच्चे के विकास के परिचायक होते हैं, जो निश्चित जन्मजात कारकों तथा आनुवंशिक प्रोग्रामों से, शरीर की उच्चतर तंत्रिका सक्रियता के क्रियातंत्रों के निर्माण तथा विविधीकरण से अभिन्नतः जुड़ा हुआ है।

किंतु व्यवहार का इनमें से कोई भी रूप, सक्रियता का कोई भी भेद स्वतः और परिवेशी परिस्थितियों से स्वतंत्र रूप से प्रकट नहीं होता है। वे सभी बच्चे के व्यावहारिक तथा सामाजिक अनुभव के आधार पर और अन्य लोगों तथा विभिन्न वस्तुओं से उसकी अन्योन्यक्रिया के परिणाम के तौर पर पैदा तथा विकसित होते हैं। मानव बनने की प्रक्रिया में बच्चा जो कुछ भी अर्जित करता है, वह अधिगम का, अर्थात अनुभव के आत्मसात्करण का परिणाम होता है।

मानव व्यवहार जैविक नहीं, अपितु सामाजिक अनुभव से निर्धारित होता है। सामाजिक अनुभव को जैविकतः अंतरित नहीं किया जा सकता। वह शरीर के गुणों पर नहीं, अपितु व्यक्ति जिस समाज में रहता है, उस समाज की विशेषताओं पर निर्भर होता है। शरीर के जो गुण सामाजिक अनुभव और व्यवहार तथा सक्रियता के मानवीय रूपों के व्यावहारिक आत्मसात्करण के लिए आवश्यक हैं, केवल वे ही अंतर्जात गुणों के रूप में जैविकतः अंतरित किये जा सकते हैं। जैव पूर्वनिर्धारण से बच्चे के व्यवहार की यह स्वतंत्रता पशु की तुलना में मनुष्य को अत्यंत लाभकर स्थिति में रख देती है। इस लाभ के कारण ही मानव व्यवहार के रूपों तथा सक्रियता की प्रणालियों के उदविकास का निर्धारण मानव शरीर के जैव विकास ने नहीं, अपितु समाज के ऐतिहासिक विकास ने किया है।

अतः अधिगम विकास का एक प्रमुख कारक है, जिसकी मदद से बच्चे में व्यवहार तथा वास्तविकता के परावर्तन के मानवीय रूपों का निर्माण होता है।

फिर भी बच्चे के व्यवहार तथा सक्रियता के अब तक चर्चित सभी रूपों में यह अंतिम परिणाम, सामाजिक अनुभव का आत्मसात्करण स्वयं सक्रियता के उद्देश्यों से मेल नहीं खाता है। शिशु चीज़ों को इसलिए नहीं उलटता-पलटता कि उसे कुछ सीखना है। जब वह पहले डग भरता है या पहले शब्द बोलने की कोशिश करता है, तो इसके पीछे चलना और बोलना सीखने की इच्छा नहीं होती। उसकी क्रियाएं अन्वेषणात्मक क्रियाशीलता की उसकी तात्कालिक आवश्यकता की तुष्टि की ओर, वस्तुओं को पाने, आसपास के लोगों को प्रभावित करने, आदि की ओर लक्षित होती हैं। बच्चे द्वारा क्रियाओं और जानकारियों का आत्मसात्करण लक्ष्य नहीं, बल्कि किन्हीं आवश्यकताओं की तुष्टि का साधन होता है।

एक समय आता है कि जब बच्चा कोई नई सक्रियता आरंभ करता है। तात्कालिक लक्ष्य कुछ निश्चित जानकारियां, कुछ निश्चित क्रियाओं अथवा व्यवहार-संरूपों को आत्मसात् करना होता है। नई सामग्री के आत्मसात्करण अथवा शिक्षण की ओर लक्षित यह विशिष्ट सक्रियता अध्ययन कहलाती है। इसमें निम्न चीज़ें शामिल हैं : क) कुछ ख़ास प्रकार की प्रात्ययिक और व्यावहारिक सक्रियता के सफल संगठन के लिए विश्व के महत्त्वपूर्ण गुणधर्मों की जो जानकारी आवश्यक है, उस जानकारी का आत्मसात्करण ( इस प्रक्रिया के उत्पाद को ज्ञान कहते हैं ) ; ख) ऐसी प्रणालियों तथा संक्रियाओं में दक्षता प्राप्त करना, जिनसे सक्रियता की ये सभी क़िस्में बनती हैं ( इस प्रक्रिया का उत्पाद आदतें हैं ) ; ग)  किसी निश्चित कार्यभार की परिस्थितियों और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप प्रणालियों व संक्रियाओं के सही चयन व परिवीक्षण के लिए आत्मसात्कृत सूचना के उपयोग की प्रणालियों को सीखना ( इस प्रक्रिया का उत्पाद कौशल होते हैं )।

इस प्रकार अध्ययन एक ऐसी सोद्देश्य सक्रियता है, जिसमें व्यक्ति की क्रियाएं उनके सचेतन लक्ष्य के रूप में निश्चित ज्ञान, आदतों और कौशलों के आभ्यंतरीकरण की ओर निर्दिष्ट होती है

ऊपर जो कहा गया है, उससे स्पष्ट है कि अध्ययन एक अनन्यतः मानवीय सक्रियता है। जानवर केवल सीख सकते हैं। मनुष्य भी अध्ययन करने में तभी समर्थ बनता है, जब उसमें अपनी क्रियाओं का नियमन करने की योग्यता आ जाती है और इस योग्यता को एक सचेत प्रात्ययिक लक्ष्य माना जाता है। बच्चे में यह योग्यता केवल छठे या सातवें वर्ष में ही और सक्रियता के पूर्ववर्ती रूपों – खेल, बोलना, व्यावहारिक आचरण, आदि – के आधार पर पैदा हो सकती है। सक्रियता के एक रूप के नाते अध्ययन की पहली पूर्वापेक्षा बच्चे में निश्चित जानकारियों के आत्मसात्करण और निश्चित आदतों व कौशलों के अर्जन के लिए सचेतन अभिप्रेरकों का विकास करना है।

बच्चे के विकास पर सामाजिक प्रभाव के सक्रिय वाहकों की भूमिका वयस्क अदा करते हैं। वे स्वीकृत सामाजिक संरूपों के दायरे में उसके व्यवहार तथा सक्रियता का संगठन करते हैं। बच्चे की सक्रियता व व्यवहार का मानवजाति के सामाजिक अनुभव के आत्मसात्करण की ओर सक्रिय अभिमुखन शिक्षण कहलाता है। बच्चे के व्यक्तित्व के विकास पर उसके प्रभाव की दृष्टि से इस प्रक्रिया को चरित्र-निर्माण कहते हैं। शिक्षण और चरित्र-निर्माण के मुख्य साधन निदर्शन और व्याख्या, प्रोत्साहन और दंड, कार्य-निर्धारण तथा अपेक्षाएं करना, जांच और सुधार हैं। इन उपकरणों की मदद से वयस्क बच्चे की संज्ञान-मूलक तथा व्यावहारिक सक्रियता का नियंत्रण करते हैं और उसकी क्रियाओं को प्रेरित व निदेशित करते हैं, उन पर नज़र रखते हैं तथा उन्हें सुधारते हैं।

शिक्षण की विधियों, साधनों, उद्देश्यों, प्रदत्त जानकारी के स्वरूप और जो आदतें व कौशल सिखाए जा रहे हैं, उनसे संबंधित सभी बहुविध प्रश्न शिक्षाशास्त्र के दायरे में आते हैं, जो शिक्षण के सिद्धांत और व्यवहार से संबंध रखनेवाला एक विशेष विज्ञान है।

सक्रियता के एक रूप के नाते अध्ययन, मनुष्य को सामाजिक व्यवहार के विभिन्न क्षेत्रों में उसके काम आनेवाले ज्ञान, आदतों और कौशलों से सज्जित ही नहीं करता। वह अपनी मानसिक प्रक्रियाओं का नियंत्रण करने और अपनी क्रियाओं, संक्रियाओं, आदतों तथा अनुभव का अपने समक्ष उपस्थित कार्यभारों से अनुरूप चयन, संगठन व निदेशन करने की उसकी योग्यता का विकास भी करता है। दूसरे शब्दों में, अध्ययन मनुष्य को श्रम के लिए तैयार करता है।


इस बार इतना ही। अगली बार सक्रियता के एक और मुख्य प्ररूप श्रम पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत सक्रियता के निर्माण पर चर्चा की थी इस बार हम इसी के अंतर्गत खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका

अपने जीवन के पहले वर्ष में ही बच्चा सक्रियता के सरलतम रूपों को सीखने की पूर्वापेक्षाएं विकसित कर लेता है। ऐसी पहली पूर्वापेक्षा खेल है।

ज्ञात है कि उछलकूद, दौड़-भाग, झूठमूठ की लड़ाई, आदि के रूप में खेल जीव-जंतुओं के बच्चों की भी विशेषताएं है। कुछ जीव चीज़ों से खेलना पसंद करते हैं, जैसे बिल्ली का बच्चा गेंद या गोले से और कुत्ते का बच्चा चीथड़े से। खेल के दौरान नन्हें जीवों के व्यवहार को मुख्य रूप से उनके शरीर की सक्रियता की आवश्यकता की पूर्ति और संचित उर्जा के उन्मोचन की अभिव्यक्ति माना जा सकता है। इसकी पुष्टि इससे होती है कि उनकी क्रीड़ात्मक व्यवहार की प्रवृत्ति भूख, अल्पपोषण तथा उच्च परिवेशी तापमान की अवस्था में, शरीर का तापमान बढ़ा या मस्तिष्क की सक्रियता को मंद कर देनेवाले रासायनिक द्रव्यों के प्रभाव की अवस्था में अवरुद्ध हो जाती है। यदि पशु को कुछ समय तक के लिए उसके खेल के साथी से वंचित कर दिया जाए, तो बाद में उसकी उत्तेजनशीलता और क्रीड़ात्मक क्रियाशीलता एकाएक बहुत अधिक बढ़ जाएगी, जो इसका प्रमाण है कि वह अपनी संचित उर्जा को उन्मोचित करना चाहता है। मनोविज्ञान में इस परिघटना को ‘खेल की भूख’ कहा जाता है।

खेल की प्रेरणा इसलिए पैदा होती है कि क्रीड़ा-सक्रियता और शरीर के उर्जा-विनिमय के बीच संबंध है। किंतु व्यवहार के वे रूप कहां से आते हैं, जिनके दायरे में क्रीड़ा-सक्रियता साकार बनती है? प्रेक्षण दिखाते हैं कि इनमें से कुछ रूप जीवों की जन्मजात, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं ही होते हैं। इसकी एक मिसाल बिल्ली के बच्चे का शिकार से संबंधित व्यवहार है। दूसरे रूप अनुकरण का परिणाम होते हैं, जैसे शिशु चिंपांज़ी द्वारा अपनी जाति के बड़े जीवों की अथवा लोगों की क्रियाओं को दोहराया जाना। कुछेक रूप जानवर द्वारा परिवेशी विश्व के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान स्वयं विकसित किये जाते हैं। इस प्रकार छोटे जानवरों द्वारा की जानेवाली क्रियाओं के स्रोत वे ही होते हैं, जो व्यस्क जानवरों की क्रियाओं के होते हैं, यानि विशिष्ट सहजवृत्तियां, अनुकरण और सीखना। इसलिए छोटों की क्रियाओं का बड़े जानवरों के विशिष्ट व्यवहार के समान होना अनिवार्य ही है। किंतु जहां व्यस्क पशुओं की क्रियाओं का उद्देश्य आहार, शत्रुओं से रक्षा, परिवेश में अभिविन्यास, ख़तरे से बचना, आदि यथार्थ जैविक आवश्यकताओं की तुष्टि होता है, वहीं इसके विपरीत अवयस्क पशुओं की क्रियाओं में ऐसी यथार्थ जैविक आवश्यकताओं का तत्व नहीं होता और वे मात्र कुछ करने के लिए ही की जाती हैं। क्रीड़ामूलक व्यवहार का मुख्य विभेदक लक्षण यही है। क्रीड़ामूलक व्यवहार का लक्ष्य स्वयं सक्रियता है, न कि इसके द्वारा प्राप्त व्यवहारिक परिणाम

अनुसंधानों ने दिखाया है कि मानव बच्चे के लिए भी खेल अपनी क्रियाशीलता को साकार बनाने का एक रूप, जीवनीय सक्रियता का एक रूप है। इस नाते यह कार्यमूलक आनंद से जुड़ा हुआ है। क्रियाशीलता की आवश्यकता इसे प्रेरित करती है और इसके स्रोत अनुकरण तथा अनुभव होते हैं। फिर भी बच्चे की क्रीड़ामूलक क्रियाएं शुरू से ही वस्तुओं को इस्तेमाल करने के मानवसुलभ तरीक़ों और मानव व्यवहार के उन रूपों के आधार पर विकसित होती है, जिन्हें बड़ों से संपर्क के दौरान तथा उनके मार्गदर्शन में सीखा जाता है। यह बच्चों के खेल की वह बुनियादी विशेषता है, जो इसके रूपों, स्रोतों, क्रियातंत्रों, कार्यों और परिणामों को जीव-जंतुओं के खेलों से भिन्न बनाती है।

अपनी व्यवहारिक सक्रियता के दौरान बच्चे का उपकरण का काम करनेवाली वस्तुओं के अलावा अन्य प्रकार की वस्तुओं – खिलौनों – से भी साक्षात्कार होता है। उनके इस्तेमाल का मनुष्य का तरीक़ा खेल, यानि उनके ज़रिए किन्हीं अन्य, वास्तविक वस्तुओं तथा क्रियाओं का चित्रण है। बच्चे खिलौने के इस्तेमाल का यह तरीक़ा बड़ों से सीखते हैं, जो उन्हें दिखाते हैं कि गुड़िया को पानी कैसे पिलाना चाहिए, कैसे उसे सुलाना चाहिए, कैसे घुमाना चाहिए, खिलौने के भालू को कैसे खिलाना चाहिए, खिलौने की कार को कैसे चलाना चाहिए, वग़ैरह।

फिर भी खिलौने के बारे में यह रवैया कि वह एक ‘वास्तविक’ वस्तु का एवज़ी है, बच्चे में तभी पैदा होता है, जब उसके खेल में एक नया तत्व शामिल हो जाता है। और यह नया तत्व है शब्द

छोटा बच्चा ( १-२ वर्ष की आयु का बच्चा ), मिसाल के लिए, झुलाने, खाना खिलाने, आदि की क्रियाओं को गुड़िया से किसी डंडी पर अंतरित नहीं कर सकता। वह संबद्ध वस्तु के बिना किसी क्रिया का अनुरूपण या इस क्रिया का एक वस्तु से दूसरी वस्तु में अंतरण नहीं कर सकता। ऐसी संक्रियाएं तभी संभव बनती हैं, जब बच्चा बोलना सीख जाता है। लकड़ी के किसी टुकड़े से गुड़िया जैसा बर्ताव करने के लिए बच्चे को गुड़िया को कोई नाम देना होगा। खिलाने की क्रिया को गुड़िया से खिलौने के घोड़े पर अंतरित करने के लिए बड़ों को उसे कहना होगा – घोड़े को खाना खिलाओ, वग़ैरह। बाद में शब्द, बच्चे को बड़ों की ‘वास्तविक’ वस्तुओं पर क्रियाओं को, जिन्हें वह देख सकता है, खिलौने पर स्वतंत्र रूप से अंतरित करने में समर्थ बना देता है। व्यवहारिक क्रियाओं के ज़रिए शब्द का अर्थ जानकर या बड़ों की क्रियाओं को देखकर बच्चा इन क्रियाओं को शब्द के साथ-साथ खेलने की चीज़ों पर अंतरित करता है। यहां खेल यह हो जाता है कि वस्तु के अर्थ को निर्धारित करने वाली क्रियाऒ को स्वयं वस्तु से अलग लिया जाता है और फिर उन्हें दूसरी वस्तु – खिलौने – पर अंतरित किया जाता है। खेल के माध्यम से बच्चा शब्द के अर्थ को वस्तु के बाह्य रूप से अलग करना सीखता है और इस अर्थ को वस्तु पर क्रिया से, मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप में इस वस्तु के प्रकार्यों से जोड़ता है।

यह प्रक्रिया जितनी ही आगे बढ़ती है, उतने ही ज़्यादा शब्द वस्तुओं से अपने प्रत्यक्ष संबंधों से मुक्त हो जाते हैं। शब्द का अर्थ पहले बाह्य क्रिया से और फिर उस क्रिया के प्रत्यय से अधिकाधिक एकाकार हो जाता है। वस्तुओं से वास्तविक क्रियाओं का काम शाब्दिक क्रियाओं से चला लेने की संभावना पैदा हो जाती है। ४-५ वर्ष की अवस्था में पहुंचने पर खेल में खिलौने के साथ वास्तविक क्रियाएं घट जाती हैं और उनका स्थान शाब्दिक क्रियाएं ले लेती हैं। गुड़िया को खाना खिलाने की प्रक्रिया को सविस्तार संपन्न करने की बजाए छोटी बच्ची चम्मच को केवल एक बार गुड़िया के मुंह से छुआकर कह सकती है – अब मैं इसे खाना खिला रही हूं…इसने खाना खा लिया है, वग़ैरह।

तीसरे वर्ष के मध्य तक बच्चा अपनी क्रियाओं की दूसरों की क्रियाओं से तुलना करने और सक्रियता तथा इच्छाओं के वाहक के रूप में अपने आपको शेष विश्व व लोगों से अलग करने लग जाता है। वस्तुओं के संबंध में क्रियाएं, वस्तुओं के संबंध में लोगों के प्रकार्यों के रूप में सामने आने लगती हैं। बच्चा भूमिकामूलक खेलों के दौर में प्रवेश करता है। भूमिकामूलक खेल में बच्चा अपने द्वारा देखे गये बड़ों के सामाजिक प्रकार्यों और व्यक्ति के रूप में बड़ों के व्यवहार की पुनर्प्रस्तुति करता है। यदि दो वर्ष की बच्ची गुड़िया को खाना खिलाते हुए खिलाने का खेल खेलती है, तो चार वर्ष की बच्ची गुड़िया को खाना खिलाते हुए उसकी मां की भूमिका भी अदा करती है, जैसे मां अपनी बच्ची को खाना खिला रही है। जैसे-जैसे बच्चे का सामाजिक अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे घरेलू विषयों पर आधारित खेलों ( ‘मां’, ‘शिक्षिका’, ‘स्कूल’, ‘चिड़ियाघर’ ) में पहले तकनीक और ओद्योगिक विषयों पर आधारित खेल ( ‘बस ड्राईवर’, ‘विमान चालक’, ‘कार’, ‘फैक्ट्री’, आदि ) और फिर सामाजिक-राजनैतिक विषयों पर आधारित खेल ( ‘लड़ाई’, ‘युद्ध’, ‘चोर-सिपाही’, आदि ) जुड़ते जाते हैं। खेल की अंतर्वस्तु, वस्तुसापेक्ष क्रियाओं की पुनर्प्रस्तुति से अधिकाधिक लोगों के परस्पर-संबंधों के चित्रण में बदलती जाती है।

वास्तव में यह वह अवस्था है कि जब बच्चा शब्दों और परिवेशी परिघटनाओं के अर्थों का व्यावहारिक आत्मसात्करण शुरू करता है। इस प्रक्रिया में व्यस्कों के प्रकार्यों तथा रवैयों के सामाजिक अर्थों से परिचय, जिस रूप में कि वे अपने को बच्चे द्वारा देखे गये उनके व्यवहार में प्रकट करते हैं, उस रूप में परिचय शामिल है। आजकल तो रेड़ियो, टेलीविजन और फ़िल्मों की वज़ह से ऐसे प्रेक्षणों का दायरा बहुत ही व्यापक हो गया है।

डॉक्टर की भूमिका करते हुए बच्चा ‘डॉक्टर जैसे’ बर्ताव करता है। छोटे बच्चे किसी भी वस्तु को स्टेथस्कोप के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, गुड़िया को बिस्तर पर लिटाते हैं और गंभीरता से सिर हिलाते हुए कह सकते हैं कि इसे तो इंजेक्शन लगाना होगा, वगै़रह। बच्चे की क्रियाएं डॉक्टर के प्रकार्यों की उसकी समझ से निदेशित होती हैं, न कि वह दत्त क्षण में जिन वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहा है, उन वस्तुओं के गुणधर्मों से। दूसरे शब्दों में, बच्चा अपने में अपनी क्रियाओं को ओढ़ी गई सामाजिक भूमिका तथा यथोचित आचरण की अपनी समझ के मुताबिक़ नियंत्रित करने की क्षमता पैदा करता है। भूमिकामूलक खेलों की विकसित अवस्था में पहुंचने पर बच्चा दूसरे बच्चों के साथ अन्योन्यक्रिया करने लगता है। भूमिकाएं बांटते और एक दूसरे से ओढ़ी गई भूमिकाओं ( मां-बेटी, डॉक्टर-रोगी, आदि ) के अनुरूप बर्ताव करते हुए बच्चे सामाजिक व्यवहार सीखते हैं और अपनी क्रियाओं का समूह की आवश्यकताओं के अनुसार समन्वय करने की शिक्षा पाते हैं।

अगले चरण, नियमों के अनुसार खेल, में ये प्रवृत्तियां और भी सुस्पष्ट बन जाती हैं और क्रियाएं अमूर्त अपेक्षाओं अथवा नियमों द्वारा नियंत्रित होने लगती हैं। दूसरे लोग, यानि खेल में भाग लेने वाले इन नियमों के वाहक के रूप में सामने आने लगते हैं। सामाजिक दृष्टि से सार्थक परिणाम ( खेल में जीतना ) सक्रियता का लक्ष्य बनने लगता है। इस बिंदु पर आकर खेल वास्तव में ख़त्म हो जाता है। सामाजिक मानदंडों के अनुसार, खेल ( उपयोगी उत्पाद का अभाव ) रहते हुए भी यह सक्रियता मनोवैज्ञानिक संरचना के अनुसार श्रम ( जिसमें लक्ष्य स्वयं सक्रियता नहीं, अपितु उसका उत्पाद है) और अधिगम ( जिसमें लक्ष्य खेल को सीखना है ) से मिलती-जुलती बन जाती है

इस प्रकार खेल, बच्चे में वस्तुओं तथा परिघटनाओं के भाषाई व्यवहार द्वारा स्थिरीकृत अर्थों का आभ्यंतरीकरण करने तथा इन अर्थों से व्यवहार में काम लेने की क्षमता विकसित करता है। वह उसे अपनी क्रियाओं को संक्रियाएं मानने की ओर अभिमुख करता है, उसे ऐसी संक्रियाएं आत्मनियमन ( नियमों ) के आधार पर करना सिखाता है और उसकी आत्मचेतना को अपने वस्तुसापेक्ष क्रियाओं का कर्ता होने की चेतना से अपने एक सामाजिक भूमिका का वाहक, अर्थात् मानव-संबंधों का कर्ता होने की चेतना तक विस्तारित करता है।


इस बार इतना ही। अगली बार अधिगम और अध्ययन पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बच्चों की आरंभिक क्रियाशीलता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में कौशल और उसके निर्माण की प्रक्रिया पर चर्चा की थी इस बार हम मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत सक्रियता के निर्माण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनका विकास

सचेतन क्रियाशीलता के रूप में मनुष्य की सक्रियता का निर्माण और विकास उसकी चेतना के निर्माण और विकास के समानांतर होता है। वह चेतना के निर्माण तथा विकास के लिए आधार और उसकी सारवस्तु के स्रोत का काम भी करती है।

सक्रियता का निर्माण

बच्चों की आरंभिक क्रियाशीलता
 

व्यक्ति की सक्रियता अन्य व्यक्तियों के साथ उसके संबंधों की पद्धति से अभिन्न रूप से जुड़ी होती है। अन्य लोगों की सहायता और सहभागिता उसके अनिवार्य अंग हैं और इस कारण वह संयुक्त सक्रियता का रूप ग्रहण कर लेती है। उसके परिणाम परिवेशी विश्व पर और अन्य लोगों पर के जीवन पर एक निश्चित प्रभाव डालते हैं। इस कारण सक्रियता हमेशा अन्य चीज़ों के प्रति ही नहीं, अन्य लोगों के प्रति भी उसके रवैये की परिचायक होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, सक्रियता मनुष्य के व्यक्तित्व को उघाड़ती भी है और ढ़ालती भी है

संयुक्त सुसंगठित समूह की सोद्देश्य, सामाजिक रूप से उपयोगी सक्रियता में भाग लेने से व्यक्ति में सामूहिक भावना, आत्मानुशासन और अपने हितों को समाज के हितों से जोड़ने की योग्यता का संवर्धन होता है। वस्तुगत शिक्षा मनोविज्ञान में सक्रियता को व्यक्तित्व के निर्माण का एक प्रमुख कारक मानते हुए उसकी संकल्पना को अपने शैक्षिक कार्य के सिद्धांत तथा व्यवहार का आधार बनाया जाता है। इन सिद्धांतों के अनुसार बच्चों की सक्रियता क्रियाकलापों का गठन इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि वे महत्त्वपूर्ण मानव गुणों ( संकल्प, अनुशासन, ईमानदारी, उत्तरदायित्व भावना, लक्ष्यनिष्ठा, आदि ) के विकास में सहायक सभी तरह की गतिविधियों में भाग ले सकें।

किन्हीं खास परिस्थितियों में किन्हीं खास कार्यों को करने की आवश्यकता ऐसी आदतों को जन्म देती है कि जो व्यक्तित्व के गुण बन जाती हैं। विभिन्न प्रकार की सक्रियता में मनुष्य का भाग लेना आंतरिक विकास की एक दीर्घ तथा जटिल प्रक्रिया का परिणाम होता है। बच्चे की क्रियाशीलता अभिभावकों, अध्यापकों और प्रशिक्षकों के दीर्घ प्रयास के फलस्वरूप ही, सचेतन सोद्देश्य सक्रियता का रूप ग्रहण करती है।

आरंभ में यह क्रियाशीलता अपने को आवेगी व्यवहार में प्रकट करती है। नवजात शिशु की प्रतिक्रियाएं केवल कुछ सहज अनुक्रियाओं तक ही सीमित रहती हैं, जिनका स्वरूप प्रतिरक्षात्मक ( तेज़ उजाले या ऊंची आवाज़ के प्रभाव से आंख की पुतली का सिकुड़ना, दर्द होने पर रोना तथा हाथ-पैर पटकना ), आहारान्वेषणात्मक ( चूसने का प्रतिवर्त ), लैबिरिंथी ( हिचकोले दिये जाने पर शांत हो जाना ) और कुछ बाद में अभिविन्यास तथा अन्वेषण से संबंधित ( उत्तेजक की ओर सिर घुमाना, चलती हुई वस्तु पर आंखें टिकाये रखना, आदि ) होता है।

ग्यारहवें-बारहवें दिन से शिशु के पहले अनुकूलित प्रतिवर्त बनने शुरू हो जाते हैं। वे अन्वेषणात्मक व्यवहार ( वस्तुओं को पकड़ना, जांचना, उलटना-पलटना ) के विकास का आधार बनते हैं, जिसकी शुरूआत बच्चे के जीवन के पहले वर्ष में ही हो जाती है और जो उसे बाह्य वस्तुओं के गुणों के बारे में जानकारी संचित करने और गतियों का संतुलन करना सीखने में मदद करता है। दूसरे वर्ष से बच्चा सिखाने के प्रभाव से और अनुकरण की अपनी सहजवृत्ति के भरोसे व्यवहारिक व्यवहार विकसित करना शुरू करता है और विभिन्न वस्तुओं को इस्तेमाल करने और सामाजिक व्यवहार में उनका अर्थ खोजने के मानवीय तरीक़े सीखता है ( जैसे बिस्तर पर सोना, स्टूल पर बैठना, गेंद से खेलना, पेंसिल से आकृतियां बनाना)।

क्रियाशीलता के इन रूपों की एकता से बच्चा संप्रेषणात्मक व्यवहार विकसित करता है, जो उसकी आवश्यकताओं और इच्छाओं की तुष्टि का मुख्य ज़रिया है, और समाज द्वारा की जानेवाली अपेक्षाओं की जानकारी पाता है तथा अपने लिए सूचना के विभिन्न स्रोतों के द्वार खोलता है।

आरंभ में यह व्यवहार भाषापूर्व रूपों में साकार बनता है ( अस्पष्ट आवाज़ें, चीखें, अंगसंचालन द्वारा संकेत )। सातवें या आठवें महिने से बच्चा पहले निष्क्रिय तौर पर और फिर सक्रिय रूप से मानव-संप्रेषण, अन्योन्यक्रिया तथा सूचना-विनिमय के मुख्य साधन – भाषाई व्यवहार – को सीखना शुरू कर देता है। बोलना सीखने से बिंबों को वस्तुओं तथा क्रियाओं से अलग करने और विभिन्न अर्थों को व्यवहार-नियंत्रण के उपकरणों के नाते अलग, सुनिर्धारित तथा उपयोग करने के लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार होता है।


इस बार इतना ही। अगली बार खेल और सक्रियता में उनकी भूमिका पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

कौशल और उसकी निर्माण-प्रक्रिया

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में आदतों की अन्योन्यक्रियाओं के सिद्धांतों को समझने की कोशिश की थी इस बार हम कौशल और उसके निर्माण की प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कौशल और उसकी निर्माण-प्रक्रिया

नई परिस्थितियों में अथवा नई वस्तुओं के संबंध में किया जाने वाला हर क़िस्म का व्यवहार संक्रियाओं के अंतरण पर आधारित होता है। अपनी बारी में संक्रियाओं का अंतरण उन परिस्थितियों अथवा वस्तुओं के गुणधर्मों के साम्य पर आधारित होता है, जो व्यक्ति की सक्रियता के लक्ष्यों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

व्यक्ति को इस साम्य का ज्ञान हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। सक्रियता जितनी ही पेचीदी होगी, लक्ष्य जितने ही दूरवर्ती होंगे और उनके लिए वस्तुओं का जितना ही अधिक रूपांतरण आवश्यक होगा, उतनी ही व्यापक सफल अंतरण कर पाने के लिए जरूरी मध्यवर्ती बौद्धिक सक्रियता होगी। फिर भी हर हालत में हम ऐसे अंतरण को कौशल की संज्ञा दे सकते हैं। कौशल को, उपलब्ध ज्ञान तथा आदतों का निर्धारित लक्ष्य के अनुसार क्रिया-प्रणालियों के चयन तथा प्रयोग के लिए इस्तेमाल करने की योग्यता कह सकते हैं

कौशल के लिए बाह्यीकरण, यानि ज्ञान का शारीरिक क्रियाओं में रूपांतरण आवश्यक है। इसका आरंभ-बिंदु प्रत्ययात्मक स्तर पर, यानि चेतना में सूचना का संसाधन होता है और परिणाम व्यवहारिक कार्यों में इस प्रत्ययात्मक सक्रियता के परिणामों का नियमन करना। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को किसी ज्यामितीय पिंड़ का आयतन निकालना है। इसके लिए उसे पहले यह तय करना होगा कि दत्त पिंड ज्यामितीय पिंडों की किस श्रेणी में आता है। इसके बाद उसे ऐसे पिंडों के आयतन का परिकलन करने की प्रणालियां याद करनी होंगी, मालूम करना होगा कि कौन-कौन से माप लेने हैं, फिर ये माप लेने होंगे और अंत में आवश्यक परिकलन करने होंगे। इस तरह हम देख सकते हैं कि ज्ञान को कौशल में परिवर्तित करने के लिए कई सारी आदतों व संक्रियाओं की आवश्यकता होती है।

इस प्रकार कौशल का अर्थ व्यक्ति द्वारा अपने ज्ञान तथा आदतों के द्वारा सक्रियता के सोद्देश्य नियमन के लिए आवश्यक मानसिक और व्यवहारिक क्रियाओं के जटिल तंत्र में सिद्धहस्त होना है। इस तंत्र में कार्यभार से संबद्ध जानकारी का चयन, कार्यभार के लिए आवश्यक गुणधर्मों को पहचानना, इस आधार पर रूपांतरणों की एक ऐसी श्रृंखला का निर्धारण करना कि जो दत्त कार्यभार की पूर्ति की ओर ले जाती हैं, प्राप्त परिणामों का निर्धारित लक्ष्य से मिलान करने उनपर नियंत्रण रखना और इस आधार पर उपरोक्त सारी प्रक्रियाओं में सुधार करना शामिल हैं।

कौशल-निर्माण की प्रक्रिया का अर्थ ज्ञान में उपलब्ध और वस्तु से प्राप्त सूचना के संसाधन से संबद्ध सभी संक्रियाओं में भी और इस सूचना के अभिज्ञान तथा क्रियाओं से इसके सहसंबंध से जुड़ी हुई संक्रियाओं में भी प्रवीणता हासिल करना है।

उल्लेखनीय है कि कौशल-निर्माण की प्रक्रिया विभिन्न तरीक़ों से साकार बन सकती है, जिन्हें हम दो मुख्य वर्गों में विभाजित कर सकते हैं। पहले में सीखनेवाले को पहले से ही आवश्यक ज्ञान होता है। उसके सामने रखे गये कार्यभार उससे इस ज्ञान के विवेकसंगत उपयोग का तक़ाज़ा करते हैं और वह स्वयं प्रयत्न-त्रुटि प्रणाली से उचित संदर्भ-बिंदुओं, उपलब्ध जानकारी के संसाधन की प्रणालियों तथा सक्रियता की प्रणालियों का पता लगाकर स्वयं उन कार्यभारों के समाधान खोजता है। सबसे कम कारगर होने पर भी यह तरीक़ा ही आज सबसे अधिक प्रचलित है।

दूसरे वर्ग में वे तरीक़े आते हैं, जिनमें प्रशिक्षक विद्यार्थी को उपलब्ध ज्ञान का कारगर उपयोग करने के लिए प्रेरित करके उसकी मानसिक सक्रियता का नियमन करता है। इस मामले में शिक्षक उसे अर्थपूर्ण संकेतों तथा संक्रियाओं के चयन के लिए आवश्यक संदर्भ-बिंदुओं की जानकारी देता है और निर्धारित समस्याओं के समाधान के लिए उपलब्ध जानकारी के संसाधन तथा उपयोग में उसकी सक्रियता का संगठन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान में अब इस उपागम पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

आदतों की अन्योन्यक्रिया

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में अभ्यास और आदतों पर चर्चा की थी इस बार हम आदतों की अन्योन्यक्रियाओं के सिद्धांतों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आदतों की अन्योन्यक्रिया

हर आदत पहले से विद्यमान आदतों की पद्धति के अंतर्गत बनती और कार्य करती है। उनमें से कुछ नई आदत को जड़ें जमाने तथा सक्रिय बनने में मदद करती हैं, तो कुछ उसे पनपने नहीं देतीं और कुछ बदलाव लाने का प्रयत्न करती हैं। मनोविज्ञान में इस परिघटना को आदतों की अन्योन्यक्रिया कहा जाता है। इस अन्योन्यक्रिया का स्वरूप क्या है? कोई भी क्रिया उसके उद्देश्य, विषय और परिस्थितियों से निर्धारित होती है, किंतु वह साकार, गतिशील निष्पादन, संवेदी नियंत्रण और केंन्द्रीय नियमन की प्रणालियों की एक पद्धति के रूप में होती है। क्रिया की सफलता, यानि आदत की कारगरता इसपर निर्भर होती है कि ये प्रणालियां लक्ष्य, विषयों और परिस्थितियों के किस हद तक अनुरूप हैं।

कोई नया कार्यभार पैदा होने पर मनुष्य पहले उसे उन विधियों से हल करने की कोशिश करता है, जिनमें उसे दक्षता प्राप्त है, और यह आदत-निर्माण की प्रक्रिया की एक आम विशेषता है। नये लक्ष्य से निदेशित होते हुए वह उसकी प्राप्ति के लिए वे प्रणालियां इस्तेमाल करता है, जिनसे उसने पहले कभी वैसे ही कार्यभार हल किये थे। अतः सक्रियता की ज्ञात प्रणालियों के अंतरण में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति कार्यभारों का उनके समाधान की दृष्टि से कैसे मूल्यांकन करता है। वास्तव में आदत-निर्माण की प्रक्रिया चरम स्थितियों का प्रतिनिधित्व करने वाली दो दिशाओं में से कोई एक दिशा ग्रहण करती है।

स्थिति एक : व्यक्ति द्वारा दो क्रियाओं के लक्ष्यों, अथवा विषयों, अथवा परिस्थितियों को एक जैसा माना जाता है, जबकि क्रियाओं के बीच वास्तव में उनके निष्पादन की प्रणाली, अथवा नियंत्रण प्रक्रियाओं, अथवा केंद्रीय नियमन की प्रणालियों के अनुसार भेद होता है। यह स्थिति प्रणालियों की अल्प-कारगरता के रूप में पैदा होती है। चूंकि इस अपूर्णता का उजागर होना, उसके परिणामों से छुटकारा पाना और नयी कारगर प्रणालियां खोजना होता है, तो स्पष्टतः समय ज़्यादा लगता है और बार-बार प्रयत्न करने पड़ते हैं। आदत का निर्माण कठिनतर और धीमा हो जाता है। मनोविज्ञान में इस परिघटना को आदतों का नकारात्मक अंतरण अथवा आदतों का व्यतिकरण कहते हैं।

स्थिति दो : कार्यभारों के लक्ष्य, विषय और परिस्थितियां बाहरी तौर पर भिन्न हैं, किंतु उनकी पूर्ति के लिए आवश्यक क्रियाएं निष्पादन, नियंत्रण और केंद्रीय नियमन की प्रणालियों की दृष्टि से एक जैसी हैं। उदाहरण के लिए, लोहा काटने की आरी से काम करना सीख रहे प्रशिक्षार्थी के लिए रेती से काम करने की अच्छी आदतें प्रायः बड़ी सहायक होती हैं। इसका कारण यह है कि क्रियाओं के विषयों और लक्ष्यों में भेद के बावजूद उनके निष्पादन और संवेदी नियंत्रण की प्रणालियां मिलती-जुलती होती हैं। दोनों ही स्थितियों में काम के दौरान औजार को क्षैतिज अवस्थाओं में रखने के लिए दो हाथों के बीच बल का वितरण और बाद की गतियां एक जैसी ही हैं। इस स्थिति में क्रियाएं शुरू से ही सही होती हैं, जिससे आवश्यक आदतों का निर्माण आसान हो जाता है। इसे सकारात्मक अंतरण अथवा आदतों का प्रेरण कहा जाता है।

नयी आदतों के निर्माण पर अनुभव और पुरानी आदतों का प्रभाव क्रियाओं तथा उनके विषयों के स्वरूप पर ही नहीं, इन क्रियाओं तथा विषयों के प्रति व्यक्ति के रवैये पर भी निर्भर होता है। अधिगम और पुनरधिगम की प्रक्रिया में बाधक नकारात्मक अंतरण का प्रतिकूल प्रभाव काफ़ी घट सकता है, बशर्ते कि छात्र को उनके बुनियादी अंतरों के बारे में बता दिया जाए। दूसरी ओर, आदत के अंतरण का सकारात्मक प्रभाव कहीं अधिक बढ़ सकता है और अधिगम का काल घट सकता है, बशर्ते कि शिक्षक छात्रों के सामने देखने में भिन्न लगनेवाले कार्यभारों की बुनियादी समानता विशेष रूप से दिखा दे।

नये विषयों की ओर पुनरभिविन्यास और इसके साथ क्रिया का जिन परिस्थितियों में वह बनी है, उनसे संबंध-विच्छेद अथवा पृथक्करण एक ऐसी महत्त्वपूर्ण घटना है, जिसके दूरगामी परिणाम निकलते हैं। कई मामलों में ऐसे अंतरण की बदौलत ही व्यक्ति बिना प्रयत्नों और त्रुटियों के नये प्रकार के कार्यभार संपन्न कर लेता है, यानि व्यवहार के एक मौलिकतः नये प्ररूप – बौद्धिक व्यवहार – का मार्ग प्रशस्त कर देता है। अपने मूल परिवेश से कटी हुई ऐसी ‘पुनरारोपित’ क्रिया के महत्त्व के कारण ही उसे ‘संक्रिया’ के विशेष नाम से पुकारा जाता है।

क्रिया का संक्रिया में रूपांतरण केवल एक निश्चित मानसिक सक्रियता – समानता का अवबोधन, सामान्यीकरण, आदि – के आधार पर हो सकता है। ऐसे रूपांतरणों की संभावना के दायरे में क्रिया के केंद्रीय नियमन से संबद्ध प्रक्रियाएं, अर्थात मानसिक क्रियाओं का संक्रियाओं में रूपांतरण भी आ जाता है।

केंद्रीय नियमन की संरचनाओं में साम्य के कारण, एक जैसी व्याकरण पद्धतियों और शब्दावलियों वाली भाषाओं को सीखना परस्पर असमान भाषाओं को सीखने की तुलना में कम कठिन होता है। अंतरण का यह प्ररूप ही सीखी हुई परिकलन को अत्यंत संख्याओं पर लागू करने, विभिन्न समस्याओं के समाधानार्थ साझे सूत्रों का उपयोग करने, आदि की संभावना देता है। सूचनाओं के आत्मसात्करण तथा संसाधन के दौरान मनुष्य द्वारा तार्किक निर्मितियों के स्वतःअनुप्रयोग के मूल में यह अंतरण का सिद्धांत ही होता है।

यह संयोग नहीं है कि आदत के अंतरण के प्रश्न को शिक्षा मनोविज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न माना जाता है। आदतमूलक क्रियाओं का नये कार्यभारों की ओर सही और सफल पुनरभिविन्यास करके व्यक्ति थोड़े ही समय के भीतर और कम से कम गलतियां करके नये प्रकार की सक्रियताओं में दक्षता प्राप्त कर लेता है। आदतमूलक क्रियाओं के प्रयोग द्वारा प्राप्य लक्ष्य जितनें ही विविध होंगे, उतना ही व्यापक उन कार्यभारों का दायरा होगा, जिन्हें मनुष्य अपनी आदतों के बल पर पूरा कर सकता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो अर्जित सचेतन स्वचलताओं का अंतरण जितना व्यापक और जितना परिशुद्ध होगा, उसके अध्ययनों के परिणाम उतने ही फलप्रद और उसकी सक्रियता में उतने ही ज़्यादा सहायक सिद्ध होंगे


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

अभ्यास और आदत

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने  क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में आदतों पर चर्चा शुरू की थी इस बार हम इसे और आगे बढ़ाते हुए अभ्यास और आदतों पर कुछ और विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सक्रियता का आभ्यंतरीकरण और अभ्यास

क्रिया की प्रणालियों में परिवर्तन कैसे आते हैं और उनका मनोवैज्ञानिक रचनातंत्र क्या है?

मुख्य रूप से यह एक ऐसा रचनातंत्र है, जिसमें अनुसंधान और वरण के तत्व सम्मिलित हैं। जब कोई मनुष्य किसी क्रिया में दक्षता पाने के प्रयत्न करता है और उसके परिणामों को जांचता है, तो वह शनैः शनैः सबसे कार्यसाधक गतियां, सबसे उपयुक्त संदर्भ-बिंदु और नियमन-प्रणालियां चुनता है तथा अपने को उनका आदी बनाता है और जो अनुपयुक्त है, उन्हें ठुकराता है। किन्हीं क्रियाओ अथवा सक्रियता के रूप की ऐसी बारंबार आवृत्ति, जिसका उद्देश्य उनमें दक्षता पाना है और जो समझ पर आधारित हैं तथा सचेतन नियंत्रण व सुधार जिसके अनिवार्य अंग हैं, अभ्यास कहलाती है

अभ्यास के दौरान मनुष्य की क्रियाओं के स्वरूप में परिवर्तन इन क्रियाओं के निष्पादन के दौरान उसकी मानसिक सक्रियता के परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करता है। सचेतन नियंत्रण और सुधार के साथ हर नये प्रयत्न से से क्रियाओं की प्रणालियां और उद्देश्य ही याद नहीं हो जाते, वरन् उसमें कार्यभार को देखने का ढ़ंग, उसकी पूर्ति के तरीक़ों और क्रिया के नियमन में परिवर्तन भी शामिल रहता है।

मिसाल के तौर पर, कई सारे एक ही तरह के पुरजों पर निशान बनाने की बारंबार की जानेवाली क्रिया के दौरान प्रशिक्षार्थी की सक्रियता में आनेवाले पारिवर्तनों पर ग़ौर करें। पहले पुर्जे में प्रशिक्षार्थी को एक ऐसी क्रिया करनी है जो उसके लिए नई है। अभी तक उसने देखा और समझा ही है कि इस क्रिया को कैसे किया जाना चाहिए। अब उसे क्रिया को स्वतंत्र रूप से करने के लिए अपने शिक्षक के मौखिक निर्देशों और प्रदर्शन के दौरान बने चाक्षुष बिंबों को स्वतःगतिशीलता, यानि अपनी गतियों के नियमन की भाषा मे अनूदित करना है। क्रिया के मानसिक चित्र और चाक्षुष बिंब के साथ, गतियों के विनियमन के लिए पेशिय संवेदन भी आ जुड़ता है। इस चरण में क्रिया के सामान्य प्रत्यय, और उसके वास्तविक निष्पादन के बीच की खाई ख़त्म होती है। इस आधार पर प्रशिक्षार्थी संक्रिया का एक प्रेरक-संवेदी बिंब और उसकी वस्तुसापेक्ष-बौद्धिक धारणा, यानि क्रिया का मानसिक मॉडल बनाता है, जो उसके निष्पादन का नियमन तथा नियंत्रण करता है।

दूसरे पुर्जे के दौरान उसे अधिकांश कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ता। गुणता और रफ़्तार, दोनों दृष्टियों से उसके कार्य में छलांगनुमा सुधार होता है। तीसरे-चौथे पुरजे पर काम करते हुए कार्य-प्रक्रिया में परिवर्तन पहले जितने बड़े नहीं होते और मुख्यतया अनावश्यक गतियों से छुटकारा पाने, ग़लत गतियों को सुधारने, परस्परसंबद्ध गतियों को एक अविकल श्रृंखला में संयोजित करने और प्रणालियों का अधिकाधिक मानकीकरण करने तक सीमित रहते हैं। इस एकीकरण के फलस्वरूप गतियां अधिक स्वचालित, चेतना के नियंत्रण से मुक्त और सोपाधिक प्रतिवर्तों से मिलती-जुलती बन जाती हैं।

बाद के पुरजों में, मुख्य नियंत्रण और नियमन-संरूपों का स्वचलन मन को जैसे कि क्षुद्र संरक्षण से छुटकारा दिलाता है और उसे क्रिया की परिस्थितियों का अधिक व्यापक ध्यान रखने में समर्थ बनाता है। प्रशिक्षार्थी अपनी क्रियाओं की रफ़्तार को नियंत्रित करनाम उन्हें बदलते कार्यभार, बई स्थितियों और नये पुरजों के अनुरूप ढ़ालना सीखता है।

सचेतन रूप से स्वचालित क्रिया के रूप में आदत

किसी भी क्रिया को करने की आदत तभी बनती है, जब उस क्रिया को बार-बार दोहराया जाए। इस प्रकट तथ्य के आधार पर कुछ मनोविज्ञानियों और विशेषतः व्यवहारवादियों ने पशुओं और  मनुष्यों की आदत-निर्माण की प्रक्रियाओं में समानता दिखाने की कोशिशें की हैं। किंतु मनोवैज्ञानिक क्रियातंत्रों की समानता के सामने आदत-निर्माण की प्रक्रियाओं के बुनियादी अंतरों को महत्त्वहीन नहीं समझना चाहिए। जीव-जंतुओं के विपरीत मनुष्य द्वारा किसी क्रिया का किया जाना हमेशा किसी न किसी रूप में मन द्वारा नियंत्रित होता है। इस कारण जीव-जंतुओं से संबद्ध प्रक्रियाओं का स्वरूप मनुष्य की तुलना में बिल्कुल ही भिन्न होता है। मनुष्य के व्यवहारिक प्रयोग निश्चित गतियों के पुनरुत्पादन के सचेतन प्रयत्न होते हैं। परिणामों का सत्यापन, परिस्थितियों का मूल्यांकन और क्रियाओं का सुधार भी न्यूनाधिक हद तक चेतना पर आधारित होते हैं। यह अनुसंधान के प्रयत्नों के स्रोत को ही पुनर्गठित कर देता है। उदाहरण के लिए, अनुकरण का स्थान शनैः शनैः आत्मसात् की जा रही मॉडल क्रियाओं का सचेतन सोद्देश्य प्रेक्षण ले लेता है। किंतु इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि मनुष्य द्वारा प्रणालियों के चयन तथा नियमन की प्रक्रिया इन प्रणालियों के प्रयोजन की उसकी समझ पर और उनकी अंतर्वस्तु की उसकी धारणा पर अधिकाधिक निर्भर करती हैं।

आदत-निर्माण की प्रक्रिया में मुख्य कारक वाचिक सक्रियता ( मनुष्य द्वारा प्रेक्षणीय तथा निष्पादनीय क्रियाओं का शाब्दिक पुनरुत्पादन ) और प्रत्ययात्मक सक्रियता ( किये जानेवाले कार्य के बिंब का मन में पुनरुत्पादन ) हैं। मनुष्य में आदत-निर्माण के क्रियातंत्र की ये बुनियादी विशेषताएं ही आदत-निर्माण की प्रक्रिया के नियमों का आधार हैं।

आदत का अर्थ सचेतन रूप से स्वचालित क्रिया अथवा कोई स्वचालित क्रिया करने की प्रणाली समझा जाता है। आदत का उद्देश्य मन को किसी क्रिया के निष्पादन की प्रक्रिया पर नियंत्रण के कार्य से मुक्ति दिलाना और क्रिया के लक्ष्यों तथा जिन परिस्थितियों में वह की जाती है, उन पर ही ध्यान देने को विवश करना है। व्यक्ति की आदत का निर्माण कभी भी एक स्वतंत्र, अलग-थलग प्रक्रिया नहीं होता है। मनुष्य का सारा संचित अनुभव उसे प्रभावित करता है और उसमें व्याप्त भी रहता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

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