संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका – २
( the role of sensations in knowing – 2 )

Paranoiac_Sensations_by_Space_Babyदूसरा महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि संवेदनों ( sensations ) का स्वरूप केवल चाक्षुष उपकरण ( visual apparatus ) के, यानी आंख के संगठन पर और केवल वस्तु की विशेषताओं पर ही निर्भर नहीं होता, बल्कि उनकी अंतर्क्रिया ( interaction ) पर भी होता है, जो स्वयं भौतिक क्रियाकलाप द्वारा संपन्न होती है। इस अंतर्क्रिया के बिना वस्तु का समुचित या सटीक बिंब क़तई नहीं बनता। दृष्टि पटल ( retina ) पर एक ऊंची इमारत का बिंब चंद मिलीमीटर का होता है, जबकि हमारा मस्तिष्क इस ऊंची इमारत के दृष्टि बिंब की रचना करते समय उसे अपने आप तथा अचेतन रूप से अन्य वस्तुओं के साथ सहसंबंधित कर लेता है, और हम उसके आयामों ( dimensions ) का सही-सही अनुमान लगा लेते हैं।

मस्तिष्क की यह क्षमता अंतर्जात ( inborn ) नहीं होती। नवजात शिशु में यह क्षमता नहीं होती, यह व्यक्तिगत प्रयोगों तथा सामाजिक व्यवहार के द्वारा दीर्घकालिक अमली प्रशिक्षण ( practical training ) के दौरान विकसित होती है।

एक और उदाहरण प्रस्तुत है। अंधेरे कमरे में बैठे किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की चेतावनी दिये बिना एक उलटी-पुल्टी फ़िल्म की सहायता से जलती हुई बत्ती दिखलाई जाती है। बत्ती की लपट तथा उससे निकलनेवाला धुआं नीचे की तरफ़ जा रहे हैं, लेकिन उस व्यक्ति का मस्तिष्क, जिसमें आवश्यक सूचना पहले के अनुभवों से ही भंडारित ( stored ) होती है, फ़िल्म दिखानेवाले की ‘ग़लती’ को अपने आप ‘सही कर लेता’ है और ऊपर को उठती हुई एक आम लपटवाली सामान्य बत्ती की तस्वीर देखता है।

ऊंची मीनारों, आदि पर काम करनेवालों तथा पहली बार ऊंची जगह पर पहुंचाये गये लोगों की ज़मीनी सतह पर पड़ी वस्तुओं के आयामों का निर्धारण करने की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। जंगलों के निवासी तथा खुले मैदानों के रहनेवाले लोग देशिक दूरियों ( spatial distances ) का अनुबोध ( perceive ) भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। यह क्षमता दृष्टि अंग की बनावट पर निर्भर नहीं होती, बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार पर तथा प्रत्यक्षण ( perception ) की उस क्षमता तथा संस्कृति पर निर्भर होती है, जिसे उन्होंने शिक्षा तथा अपने जीवन के दौरान आत्मसात ( assimilated ) किया है

संज्ञान में संवेदनों की भूमिका के बारे में अब क्या कहा जा सकता है? संवेदन एक आत्मगत बिंब ( subjective image ) है, जो वस्तुगत जगत ( objective world ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। यह एक सरल दर्पण सा बिंब नहीं है, जैसा कि अनुभववादी ( empiricist ) समझते हैं, बल्कि परावर्तन की एक ऐसी अतिजटिल प्रक्रिया है, जिसमें अनेक गुणात्मक रूपांतरण ( qualitative transformations ) तथा द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negations ) शामिल होते हैं। संवेदनों से हमें परावर्तित वस्तुओं के बारे में प्रारंभिक सूचना प्राप्त होती है। किंतु यह सूचना केवल वस्तुओं की विशेषताओं तथा हमारे तंत्रिकातंत्र पर ही निर्भर नहीं होती। संवेदनों को ढालने में हमारे अनुभव, सामाजिक व्यवहार और ऐतिहासिक विकास का सामान्यीकरण करनेवाली इतिहासतः रचित हमारी सारी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका को समझने के लिए द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) की इस स्थापना ( thesis ) का बुनियादी महत्त्व है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

Advertisements

संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर विचार शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका – १
( the role of sensations in knowing – 1 )

sensations.virginसंवेदन ( sensation ) मनुष्य द्वारा विश्व के परावर्तन ( reflection ) के प्रारंभिक रूप हैं। ( इन पर मनोविज्ञान श्रृंखला में एक और पोस्ट यहां देखी जा सकती है। ) संवेदन हमारे संवेद अंगों ( sense organs ) पर बाह्य जगत की वस्तुओं के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, इस प्रभाव का फल होते हैं, वस्तुओं के अत्यंत विविधतापूर्ण अनुगुणों ( properties ) से उत्पन्न हो सकते हैं। हम किसी वस्तु के कड़ेपन की, ध्वनियों की, रंगों, आदि की संवेदानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। विभिन्न वस्तुएं और घटनाएं, हमारे संवेदी अंगों पर भिन्न-भिन्न ढंग से क्रिया कर सकती हैं।

कुछ मामलों में संवेदी अंग वस्तुओं के प्रत्यक्ष संपर्क ( direct contact ) में आते हैं और उससे, मसलन, मिठास, कडुवा व खट्टापन, लोचपन, खुरदुरे व चिकनेपन, आदि के संवेदन पैदा होते हैं। अन्य मामलों में हम दूरी से किसी वस्तु का संवेद प्राप्त करते हैं, जैसे कि वस्तु द्वारा परावर्तित या विकीर्ण ( radiate ) प्रकाश से आंखों के दृष्टि पटल पर पड़ने-वाले प्रभाव से उस वस्तु का एक दृश्य बिंब ( image ) बन जाता है। परंतु संवेदी अंगों पर किसी वस्तु का कोई भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, संवेदन उन पर प्रभाव डालनेवाले किसी बाह्य उद्दीपक ( stimulus ) का ही फल होता है

हम चाक्षुष संवेदनों ( visual sensations ) की रचना के उदाहरण से इस प्रक्रिया पर और गहराई से विचार करते हैं। सौर प्रकाश विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों ( फ़ोटानों ) का अभिवाह ( flux ) होता है, जिनमें निश्चित ऊर्जा होती है। जब सौर प्रकाश किसी वस्तु पर ( मसलन, एक सेब पर ) पड़ता है, तो उसका एक अंश उसकी सतह से परावर्तित होता है और एक अंश अवशोषित ( absorbed ) हो जाता है। सेब से परावर्तित किरणें हमारी आंखों से टकराती हैं। परावर्तित किरणों में, परावर्तित करने वाली सतह की भौतिक तथा रासायनिक संरचना के अनुसार फेर-बदल हो जाते हैं। आंख के भीतर उनमें और भी कई संपरिवर्तन ( conversion ) तथा रूपांतरण ( transformation ) होते हैं। प्रकाश की तरंगे प्रकाशिकी ( optics ) के नियमों के अनुसार नेत्र-लेंस द्वारा अपवर्तित ( refracted ) होती हैं और उस वस्तु की सैकड़ों या हज़ारों गुना तक छोटी छाप ( impression ) दृष्टिपटल पर छोड़ देती हैं। दृष्टिपटल ( retina ) की कोशिकाएं तंत्रिका-तंत्रओं ( nerve fibers ) के ज़रिये जैव-विद्युत आवेग उत्पन्न करती हैं और ये मस्तिष्क के दृष्टिकेंद्र की कोशिकाओं में विशेष रूपांतरण कर देते हैं, उसका परिणाम प्रकाश और आकृति के विविध चाक्षुष संवेदन होते हैं। ये संवेदन एक साकल्य ( a whole ) में संयुक्त हो जाते हैं, या उस चीज़ में संश्लेषित ( synthesized ) हो जाते हैं, जिसे हम वस्तु का ( मसलन, सेब का ) दृश्य बिंब कहते हैं।

दृश्य बिंब के उत्पन्न होने के तरीक़े पर विचार करने पर हम निम्नांकित निष्कर्षों पर पहुंचते हैं : दृश्य बिंब देखनेवाले के मस्तिष्क में उत्पन्न और विद्यमान होता है, फलतः यह आत्मगत ( subjective ) है। यह वस्तु की सतह से परावर्तित भौतिक प्रकाश की तरंगों के अनेकानेक रूपांतरणों तथा संपरिवर्तनों के फलस्वरूप पैदा होता है। तरंगे विशेष जैव-विद्युत आवेगों में संकेंद्रित होती हैं जो पुनः मस्तिष्क की कोशिकाओं में रंग तथा देशिक ज्यामितिक ( spatial geometrical ) संवेदनों में रूपांतरित होते हैं। उसके फलस्वरूप, मस्तिष्क में उत्पन्न बिंब वस्तु के हूबहू अनुरूप ( correspond ) होता है और उसे अन्य सारी वस्तुओं से विभेदित ( distinguish ) करने में मदद देता है। इस अर्थ में हम कहते हैं कि एक दृश्य संवेद एक वस्तुगत वस्तु का परावर्तन होता है। वे वस्तुगत जगत ( objective world ) के आत्मगत बिंब ( subjective image ) हैं और साथ ही वे बाह्य उत्तेजना की ऊर्जा का चेतना के तथ्य ( fact ) में रूपांतरण हैं

संवेदन चूंकि वस्तुगत वास्तविकता ( reality ) के आत्मगत बिंब हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि आत्मगत मानसिक प्रक्रियाओं के लिए प्रारंभिक सामग्री हमें संवेदनों के ज़रिये ही प्राप्त होती है। यानी इससे यह स्पष्ट होता है कि संवेदन हमारे संपूर्ण ज्ञान का प्रारंभिक आधार-स्रोत हैं। संवेदन आत्मगत रूप में इसलिए होते हैं कि उनकी उत्पत्ति ( emergence ) संवेदी अंगों की क्रिया के साथ जुड़ी होती है। साथ ही साथ अपनी अंतर्वस्तु ( content ) में वे वस्तुगत होते हैं, क्योंकि वे वस्तुओं के वस्तुगत अनुगुणों को परावर्तित करते हैं। मसलन, वस्तुओ के सुगंध जैसे अनुगुणो व गुणों का प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टिक ( individually ) और आत्मगत रूप से अनुभव करता है परंतु फिर भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सामान्यतः यह एक जैसे ही संवेदित होते हैं। स्पष्ट है कि यह आत्मगत बिंब वस्तुओं की वस्तुगत प्रकृति के अनुरूप होता है। मसलन, किसी खाद्य की सुगंध उसके एक वस्तुगत अनुगुण को परावर्तित करती है।

अतः संवेदन वस्तुगत रूप से विद्यमान यथार्थता का सही परावर्तन होते हैं, वे हमें बाह्य जगत की चीज़ों और घटनाओं के बारे में सही सूचना देते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रक्षिक्षण पर विचार किया था, इस बार हम संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं ( cognitive processes )

संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका
( sensation and their role in human life-activity )

हम परिवेशी विश्व की बहुविधता का, ध्वनियों तथा रंगों, गंधों तथा ताप, आकारों तथा बहुत सारी दूसरी चीज़ों का ज्ञान अपनी ज्ञानेन्द्रियों ( sense organs ) के ज़रिए पाते हैं, जो मानव शरीर को संवेदनों के रूप में बाह्य तथा आंतरिक परिवेशों की अवस्था के बारे में विपुल जानकारी प्रदान करती हैं

संवेदन ( sensation ) एक सामान्य मानसिक प्रक्रिया है, जो ग्राहियों ( receptors ) पर भौतिक क्षोभकों ( exciter ) के प्रत्यक्ष प्रभाव से शुरू होती है और वस्तुजगत् के गुणधर्मों ( properties ) तथा परिघटनाओं ( phenomena ) और शरीर की आंतरिक दशाओं को प्रतिबिंबित करती है

ज्ञानेन्द्रियां सूचना पाती, छांटती तथा संचित करती हैं और फिर मस्तिष्क को संप्रेषित करती हैं, जो उसके अंतहीन प्रवाह का निरंतर संसाधन करके यथार्थ जगत का और शरीर की दशाओं का चेतना में समुचित प्रतिबिंबन ( परावर्तन ) करता है। इस आधार पर पैदा होनेवाले तंत्रिका-आवेग शरीर के तापमान के नियमन, पाचक अंगों, प्रेरक-तंत्रों तथा अंतःस्रावी ग्रंथियों के कार्य, स्वयं ज्ञानेन्द्रियों की क्रियाप्रणाली, आदि के लिए उत्तरदायी कार्यकारी अंगों तक पहुंचते हैं। प्रति सैकंड हज़ारों संक्रियाओंवाला यह अत्यंत जटिल कार्य अनवरत रूप से जारी रहता है।

वास्तव में संवेदन परिवेश को, बाह्य विश्व ( external world ) को मनुष्य की चेतना ( consciousness ) से जोड़नेवाली एकमात्र कड़ी है। यदि संवेदन न हों तो हमें पदार्थ और गति के रूपों के बारे में कुछ नहीं मालूम हो पाएगा। ज्ञानेन्द्रियां परिवेशी जगत में मनुष्य का मार्गदर्शन करती हैं। यदि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करती, तो वह नहीं जान सकता कि उसके चारों ओर क्या हो रहा है, वह न किसी से संप्रेषण कर सकता है, न खाना खोज सकता है और न खतरे से ही बच सकता है।

मनुष्य को अपने चारों ओर की दुनिया से स्थायी संपर्क बनाए रखने की ज़रूरत होती है। व्यापक अर्थ में लिये जाने पर शरीर का परिवेश से अनुकूलन, परिवेश तथा शरीर के बीच सूचना के एक निश्चित संतुलन की अपेक्षा करता है। यदि सूचनाधिक्य या सूचनाभाव के कारण यह संतुलन भंग हो जाता है, तो शरीर के कार्य में गंभीर गड़बड़ियां आ जाती हैं।

इसकी पुष्टि अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत किये गये परिवेश से संवेदनात्मक संपर्क के परिसीमन ( limitation ) से संबंधित आयुर्वैज्ञानिक व जीववैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों से भी होती है। जब अध्ययनाधीन व्यक्ति को विशेष कक्षों में रखा गया, जो उन्हें बाह्य विश्व से पूरी तरह अलग कर देते थे ( उनमें हर समय एक उबाऊ आवाज़ ही सुनी जा सकती थी, धुंधले कांचों से केवल जरा-सा प्रकाश अंदर आता था, बाहों और टांगों पर सुरक्षात्मक सिलेंडर आवरण चढ़े होने के कारण उनसे किसी भी प्रकार का स्पर्शमूलक संवेदन पाना असंभव था ), तो वे कुछ ही घंटों में बेहद घबड़ा गये और प्रयोग रोके जाने की मांग करने लगे। आंशिक संवेदनात्मक वंचन ( उदारहणार्थ, शरीर के कुछ भागों को बाह्य प्रभावों से अलग-थलग रखने ) के प्रयोगों ने दिखाया है कि ऐसे भागों की स्पर्श, पीड़ा और ताप से संबंधित संवेदनशीलता क्षीण हो गई। जिन लोगों को लंबे समय तक एक ही रंग के प्रकाश में रखा गया, उनमें दृष्टि-विभ्रांतियां पैदा हो गईं।

ये और बहुत सारे अन्य प्रयोग दिखाते हैं कि कि मनुष्य का शरीर संवेदनों के रूप में परिवेश के संपर्क की घोर आवश्यकता अनुभव करता है। मनुष्य की जीवन-सक्रियता के लिए संवेदनों के महत्त्व का अतिमूल्यांकन शायद ही किया जा सकता है, क्योंकि विश्व तथा अपने विषय में हमारे ज्ञान का स्रोत ये ही हैं। तो संवेदनों का सारतत्व क्या है?

संवेदनों की भौतिकवादी परिभाषा बताती है कि वस्तुएं और उनके गुणधर्म मूल हैं और संवेदन ज्ञानेन्द्रियों पर पदार्थ की क्रिया ( प्रभाव ) के परिणाम। वह यह भी कहती है कि संवेदन हमें यथार्थ वास्तविकता की सही प्रतिकृति देते हैं, यानि वे विश्व को वैसा प्रतिबिंबित करते हैं, जैसा वह वास्तव में है। संवेदनों की और यथार्थ के किसी भी अन्य परावर्तन की प्रामाणिकता ( authenticity ) की कसौटी व्यवहार है, मनुष्य की सक्रियता है

ज्ञानेन्द्रियों का विशेषीकरण लंबे उदविकास का परिणाम है और स्वयं इन्द्रियां, उनकी संरचनागत विशेषताएं तथा गुणधर्म परिवेश से मनुष्य के अनुकूलन को प्रतिबिंबित करते हैं। मनुष्य की संवेदनों में सूक्ष्म भेद करने की क्षमता उसके सामाजिक व श्रमिक कार्यकलाप और उसके समस्त इतिहास व सामाजिक विकास का परिणाम हैं। ज्ञानेन्द्रियां शरीर का परिवेशी विश्व से अनुकूलन सुनिश्चित करती हैं किंतु अपना यह कार्य वे सफलतापूर्वक तभी कर सकती हैं, जब वे परिवेश के वास्तविक गुणधर्मों का सही-सही परावर्तन करें। इसलिए संवेदनों का विशिष्ट स्वरूप जानेन्द्रियों के विशिष्ट स्वरूप की उपज नहीं, बल्कि ज्ञानेन्द्रियों का विशिष्ट स्वरूप संवेदनों के विशिष्ट स्वरूप ( बाह्य विश्व के विशिष्ट गुणों ) की उपज है

संवेदन, मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डालनेवाली और मन से स्वतंत्र रूप से विद्यमान भौतिक विश्व की वस्तुओं तथा परिघटनाओं के यथार्थ गुणों को प्रतिबिंबित करते हैं।

संवेदन वस्तुपरक विश्व ( objective world ) के आत्मपरक बिंब ( subjective images ) हैं। फिर भी संवेदन शरीर पर किसी भौतिक क्षोभक की क्रिया से ही नहीं, अपितु स्वयं शरीर की सक्रियता से भी उत्पन्न होता है। इस सक्रियता को या तो केवल आंतरिक प्रक्रियाओं से व्यक्त किया जा सकता है, या फिर आंतरिक प्रक्रियाओं और बाह्य गतियों, दोनों से। पर उसे हमेशा होना चाहिए। संवेदन एक निश्चित क्षण पर ग्राही पर क्रिया करनेवाले क्षोभक की विशिष्ट उर्जा के तंत्रिका-प्रक्रियाओं की उर्जा में रूपांतरण के फलस्वरूप पैदा होता है। अतः संवेदन, चेतना में प्रतिबिंबित होने वाला बिंब या उसका घटक ही नहीं है, वह सक्रियता या उसका घटक भी है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय