संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ों पर चर्चा की थी, इस बार हम संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन
( sensory cognition or living perception )

Rutecki_Sensory lens_Fig 3संज्ञान ( cognition ) शुरू से लेकर आखिर तक एक द्वंद्वात्मक प्रक्रिया ( dialectical process ) है। वह प्रत्यक्ष जीवंत अवबोधन ( living perception ) से लेकर अमूर्त चिंतन ( abstract thought ) और फिर व्यवहार ( practice ) तक की गति है। सत्य के संज्ञान का, वस्तुगत वास्तविकता ( objective reality ) के संज्ञान का द्वंद्वात्मक पथ ऐसा ही है – जीवित अवबोधन से अमूर्त चिंतन तक और यहां से व्यवहार तक। फलतः संज्ञान के दो स्तर हैं : पहला, संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन और दूसरा, तर्कमूलक ( rational ) संज्ञान या अमूर्त चिंतन। संज्ञान का आधार व्यवहार ही होता है। इन दो में से प्रत्येक स्तर पर संज्ञान अपने ही ठोस रूप ( concrete forms ) ग्रहण करता है। संवेदनात्मक संज्ञान के तीन रूप हैं : संवेदन ( sensation ), अवबोधन ( perception ) और प्रतिनिधान ( representation )।

संवेदन और उनकी भूमिका पर हम पिछली बार काफ़ी चर्चा कर चुके हैं। हम भूतद्रव्य ( matter ) के या गति ( motion ) के रूपों के बारे में संवेदनों के सिवा और किसी के द्वारा कुछ नहीं जान सकते हैं, संवेदन हमारे संवेदी अंगों ( sense organs ) पर गतिमान भूतद्रव्य की क्रिया से उत्पन्न होते हैं। वे वस्तुगत वास्तविकता के आत्मगत बिंब ( subjective image ) होते हैं। ये आत्मगत बिंब वस्तुओं की वस्तुगत प्रकृति के अनुरूप ( corresponding ) होता है। संवेदन यथार्थता का सही परावर्तन ( reflection ) होते हैं और हमें बाह्य जगत की चीज़ों के बारे में सही प्रांरंभिक सूचना ( elementary information ) देते हैं।

अवबोधन या प्रत्यक्ष ( perception ), संवेदनात्मक संज्ञान का अधिक जटिल ( complex ) रूप है। ( अवबोधन या प्रत्यक्ष को और बेहतरी से समझने के लिए कुछ पोस्टें यहां  देखी जा सकती हैं। ) वे संवेदी अंगों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालनेवाली वस्तुओं को उनकी समग्रता ( entirety ) में परावर्तित करते हैं। नियमतः, हमारे संवेदन एक दूसरे से अलग-थलग ( isolated ) नहीं होते, बल्कि एक निश्चित सम्मेल ( combination ) की रचना करते हैं। कोई भी वस्तु अपने उन विभिन्न अनुगुणों ( properties ) से, जो स्वयं वस्तु के अंदर घनिष्ठ एकता ( close unity ) की स्थिति में होते हैं, भिन्न-भिन्न संवेदी अंगों पर क्रिया करती है। जब ये सारे संवेदन उस वस्तु के एक ही बिंब में घुल-मिल जाते हैं, तो वस्तु का प्रत्यक्ष या अवबोधन होने लगता है।

संवेदनों के विपरीत, जो बाह्य वस्तुओं के अलग-अलग गुणधर्मों को परावर्तित करते हैं, प्रत्यक्ष या अवबोधन ( perception ) वस्तु को समग्रतः और उसके गुणधर्मों की एकता के रूप में चेतना ( consciousness ) में परावर्तित करता है, और एक समेकित बिंब ( integrated image ) प्रस्तुत करता है। निस्संदेह यह समेकित बिंब, विविध संवेदनों के रूप में प्राप्त वस्तुओं की विशेषताओं और गुणधर्मों के हमारे ज्ञान के सामान्यीकरण से पैदा होता है। प्रत्यक्ष/अवबोधन की वस्तुपरकता ( objectivity ), वास्तविकता की क्रिया में, यानी बाह्य जगत से प्राप्त जानकारी को इस बाह्य जगत से संबद्ध ( relate ) करने में व्यक्त होती है। प्रत्यक्ष/अवबोधन की बाह्य वस्तुओं से संबद्धता, सहज गुण नहीं है। मनुष्य क्रियाओं की एक निश्चित पद्धति (method ) के ज़रिये, जिसमें स्पर्श और गति मुख्य भूमिका अदा करते हैं, विश्व के वस्तुपरक रूप का अवबोधन करता है।

मनुष्य अपनी स्मृति ( विस्तार के लिए ‘यहां’ देखें ) में पूर्ववर्ती अवबोधनों/प्रत्यक्षों को सुरक्षित रख सकता है और वस्तुओं की अनुपस्थिति में भी उनके बिंबों को पुनर्प्रस्तुत ( reproduce ) कर सकता है। किसी वस्तु के ऐसे पुनर्प्रस्तुत बिंब को, जो उस क्षण-विशेष पर संवेदी अंगों पर क्रिया नहीं करता, प्रतिनिधान ( representation ) कहते हैं

प्रतिनिधान सामान्यीकरण ( generalisation ) को संभव बनाते हैं, क्योंकि स्मृति ( memory ) में धारण किये हुए वस्तुओं के बिंब, मनुष्य को तुलनाएं ( comparisons ) करने, साम्य ( equality ) दर्शाने और ऐसा अपकर्षण/अमूर्तकरण ( abstraction ) करने में समर्थ बनाते हैं, जिससे वस्तुओं की लाक्षणिक विशेषताएं प्रकाश में आती हैं। इस प्रकार, जहां प्रत्यक्ष/अवबोधन वस्तुओं को उनके सारे ठोस अनुगुणों व विवरणों में परावर्तित करते हैं, वहां प्रतिनिधान उनके सर्वनिष्ठ, सामान्य लक्षणों को प्रकट करते हैं, इससे उन वस्तुओं के सार ( essence ) को समझने में मदद मिलती है। जब हमारे पास किसी वस्तु का प्रतिनिधान होता है, तो हम उसके सार और विशेषताओं को शीघ्र समझ लेते हैं।

संवेदन, अवबोधन और प्रतिनिधान, यानी संवेदनात्मक संज्ञान के रूप, वास्तविकता के बिंब हैं। वस्तुगत रूप से अस्तित्वमान वस्तुओं के साथ बिंबों की तदनुरूपता ( correspondence ) व्यवहार में परखी जाती है। लेकिन मनुष्य संवेदनात्मक संज्ञान की अवस्था तक ही नहीं रुकता। वह इससे आगे, वस्तुओं के सार्विक ( universal ), आवश्यक ( necessary ) और सारभूत अनुगुणों तथा संबंधों को, उनके नियमाधीन संपर्कों ( law-governed connections ) को जो कि संवेदनात्मक अवबोधन के लिए अलभ्य ( inaccessible ) होते हैं, अच्छी तरह जानने के लिए आगे बढ़ता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम