संभावना और वास्तविकता – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘संभावना और वास्तविकता’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए उसका समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
संभावना और वास्तविकता – २
( possibility and actuality – 2)

Nachar 2अमूर्त संभावनाओं ( abstract possibility ) के कार्यान्वयन की संभाव्यताएं ( probabilities ) भिन्न-भिन्न होती हैं। कुछ अमूर्त संभावनाओं का कार्यान्वित होना इतनी दूर की बात है कि मानो वे असंभाव्यता ( impossibility ) की सीमा पर हों। फिर भी अमूर्त संभावना को असंभाव्यता के तदनुरूप नहीं मानना चाहिये, क्योंकि असंभाव्यता प्रकृति और समाज के नियमों का प्रतिवाद करती है, उनके ख़िलाफ़ होती है और कभी भी वास्तविकता में परिणत नहीं हो सकती।

अमूर्त और वास्तविक संभावनाओं ( real possibilities ) के बीच अंतर सारभूत ( essential ), परंतु सापेक्ष ( relative ) है। कई अमूर्त संभावनाएं वास्तविक में परिवर्तित होने की विभिन्न अवस्थाओं में होती हैं। जहां तक व्यावहारिक कार्यों का संबंध हैं, काम करनेवाले को वास्तविक संभावनाओं की ओर उन्मुख ( oriented ) होना चाहिये। यहां ध्यान रखने का मुद्दा यह है कि वास्तविक संभावनाओं की व्यवहार्यता ( feasibility ) में अंतर हो सकता है : इनमें से कुछ को अन्य के मुक़ाबले ज़्यादा आसानी से कार्यान्वित किया जा सकता है।

संभावना का वास्तविकता में संक्रमण ( transition ) अनुक्रमिक द्वंद्वात्मक निषेधों ( successive dialectical negations ) की एक प्रक्रिया है। अमूर्त, आकारिक ( formal ) संभावना मूर्त, वास्तविक संभावना में और यह संभावना वास्तविकता ( reality ) में बदल जाती है। अपनी बारी में वास्तविकता अपने विकास के दौरान नयी संभावनाओं को जन्म देती है, शुरू में अमूर्त और फिर मूर्त संभावना को, जो नयी वास्तविकता में विकसित हो सकती हैं, बशर्ते कि कुछ कारण, पूर्वावस्थाएं, आदि मौजूद हों। इसे जैविक विकास के उदाहरणों और जीन इंजीनियरी की रचनाओं में आसानी से देखा जा सकता है।

डी एन ए के अणुओं के घटक तथा जीवित अंगियों ( living organism ) की आनुवंशिकता ( heredity ) का नियंत्रण करनेवाले जीनों को विभिन्न तरीक़ों से संयुक्त ( combined ) किया जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि स्वयं प्रकृति में नयी आनुवंशिक विशेषताओं के पैदा होने, सुदृढ़ होने और फलतः नयी जातियों ( species ) की उत्पत्ति होने की संभावना हमेशा विद्यमान होती है। किंतु उस संभावना के यथार्थता में परिणत होने के वास्ते पूर्वावस्थाओं के के समुच्चय की आवश्यकता होती है, जो जैविक क्रम-विकास ( evolution ), प्राकृतिक वरण ( natural selection ) तथा अस्तित्व के लिए संघर्ष ( struggle ) के दौरान विकसित हुई हैं। नयी जातियों की उत्पत्ति के लिए आवश्यक पूरा समुच्चय हमेशा विद्यमान नहीं होता है, इसलिए प्रकृति में नयी जातियां उत्पन्न होना अक्सर मुश्किल ही होता है। जीन इंजीनियरी के उद्‍भव ( rise ) के साथ लोगों ने वंशानुगतता ( inheritance ) पर नियंत्रण करना और नयी जातियों की रचना करना तक सीख लिया है। हमारे युग में नयी जातियों की “रचना करने” की संभावना वास्तविकता में परिणत हो गयी है। नये सूक्ष्म जीवाणुओं, पौधों, पशुओं की नयी जातियों व नस्लों की रचना की जा रही है। जाति रचना की जो पद्धति लाखों वर्षों से विद्यमान थी उसका वस्तुतः निषेध ( negation ) किया जा रहा है, किंतु यह निषेध पूर्ण ( full ) नहीं है, अतः यह उन्मूलन ( abolition ) नहीं है। यह द्वंद्वात्मक निषेध है, क्योंकि यह प्रकृति के विकास के दौरान बने डी एन ए में समाविष्ट तत्वों ( incorporated elements ) के ही संयुक्तिकरण ( combination ) की क्रियाविधि पर आधारित है।

संभव तथा यथार्थ की द्वंद्वात्मकता सामाजिक विकास में विशेष स्पष्टता से व्यक्त होती है। इसमें संभव का यथार्थ में संक्रमण और उसके आधार पर नयी संभावनाओं की रचना लोगों के सचेत क्रियाकलाप ( conscious activity ) के साथ जुड़ी है।

प्रकृति में संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिए केवल वस्तुगत दशाएं ( objective condition ) ही पर्याप्त होती हैं। मसलन, कोई बीज आवश्यक तापमान और नमी वाली उपयुक्त जगह पर महज़ गिर भर जाये, तो उसमें अंकुरण ( germinate ) हो जायेगा। परंतु सामाजिक जीवन में, जहां चेतना ( consciousness ) और संकल्प ( will ) वाले लोग कार्यरत होते हैं, संभावना को भिन्न तरीक़े से वास्तविकता में परिणत किया जाता है। यहां यह प्रक्रिया स्वचालित ( automatic ) नहीं होती, बल्कि सचेत मानव क्रिया का परिणाम होती है। इसीलिए समाज में एक संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिए वस्तुगत दशाएं ही काफ़ी नहीं है, इसके लिए आत्मगत दशाओं ( subjective conditions ) की भी आवश्यकता होती है, जैसे रूपांतरणों ( transformation ) की आवश्यकता की जानकारी, उनके लिए काम करने का संकल्प, जनगण का, संबंधित वर्गों का संगठन ( organisation ), आदि।

सचेत मानवीय क्रियाकलाप पर, संभावना के वास्तविकता में परिवर्तन की यह निर्भरता, विरोधी प्रवृत्तियों और शक्तियों ( opposite tendencies and forces ) के अस्तित्व के कारण विभिन्न संभावनाओं की एकसाथ उत्पत्ति को देखते हुए और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इनमें से कौनसी संभावनाएं कार्यान्वित होंगी, यह अधिकांशतः उन शक्तियों के क्रियाकलाप पर, उनके बीच संघर्ष के परिणाम ( outcome ) पर निर्भर होता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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संभावना और वास्तविकता – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अनिवार्यता और संयोग’ के प्रवर्गों पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम ‘संभावना और वास्तविकता’ प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
संभावना और वास्तविकता – १
( possibility and actuality – 1)

main-qimg-15080eaa6d9ffcd547a8be1d536028dcवस्तुगत जगत ( objective world ) में विद्यमान विभिन्न चीज़ें और प्रक्रियाएं प्राकृतिक आवश्यकताओं की वज़ह से तब उत्पन्न होती हैं, जब उनकी उत्पत्ति ( emergence ) के पूर्वाधार ( prerequisites ), कारण ( causes) और दशाएं ( conditions ) बन चुकी होती हैं। समुचित समय बाद विकास उस स्थल पर पहुंचता है, जहां अभी तक नयी वस्तु या प्रक्रिया उत्पन्न नहीं हुई है, परंतु उसकी उत्पत्ति की दशाएं बन चुकी हैं, क्योंकि वे पूर्ववर्ती विकास से परिपक्व हुई थीं।

इस तरह, पुरातन ( old ) के द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negation ) से जो नयी ( new ) घटनाएं या प्रक्रियाएं उत्पन्न होती हैं, वे रिक्तता ( vacuum ) से नहीं उपजती। उनकी पूर्वावस्थाएं, आधार तथा दशाएं पूर्ववर्ती घटनाओं और प्रक्रियाओं में बनती तथा विद्यमान रहती हैं। किसी नयी चीज़ की उत्पत्ति के बुनियादी पूर्वाधारों, कारणों तथा दशाओं का अस्तित्व, यानि पूर्वावस्थाओं तथा दशाओं की वह समग्रता ( aggregate ) जिस ने अभी नयी घटना को जन्म नहीं दिया है, को आम तौर पर “संभावना” ( possibility ) संकल्पना से व्यक्त किया जाता है। स्वयं प्रक्रिया, जो पहले से ही विद्यमान है, उत्पन्न हो रही है, क्रियाशील है और विकसित हो रही है, उसे संकल्पना “वास्तविकता” ( actuality ) यायथार्थता” ( reality ) से व्यक्त किया जाता है। संभावना और वास्तविकता दो घनिष्ठता से संबंधित संकल्पनाएं ( concepts ) हैं, जो एक दूसरे की परस्पर संपूरक ( supplement ) होती हैं, विकास की किसी भी प्रक्रिया की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को चित्रित करती हैं और इसीलिए द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के प्रवर्गों का एक युग्म समझी जाती हैं।

वास्तविकता की संकल्पना को व्यापक अर्थ ( broad sense ) में भी इस्तेमाल किया जाता है और संकीर्ण अर्थ ( narrow sense ) में भी। व्यापक अर्थ में इसका तात्पर्य उस सब से होता है, जो वस्तुगत जगत में विद्यमान है. और संकीर्ण अर्थ में इसका तात्पर्य एक निष्पन्न ( accomplished ), साकार संभावना ( realized possibility ) होता है। संभावना, वास्तविकता के विकास से उत्पन्न होती है और वास्तविकता संभावना से तैयार होती है। अतः उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं किया जाना चाहिये।

व्यवहार में वास्तविकता से संभावना का विलगाव ( detachment ), अवास्तविक  संभावनाओं के बारे में अमूर्त संलाप ( abstract discourse ) पर पहुंचा देता है, क्योंकि सच्ची संभावना हमेशा वास्तविकता से जुड़ी होती है और उसी से पैदा होती है। दूसरी तरफ़, संभावना से वास्तविकता का विलगाव नये के अहसास को कुंद ( blunt ) बना देता है और परिप्रेक्ष्य ( perspective ) को निगाहों से ओझल कर देता है।

इसके साथ ही, संभावना और वास्तविकता को एक दूसरी के तदनुरूप ( identified ) भी नहीं मानना चाहिये, क्योंकि वे एक टेढ़ी-मेढ़ी और बहुधा कठिन प्रक्रिया द्वारा एक दूसरी से अलग-अलग होती हैं और इसी प्रक्रिया में दौरान संभावना, वास्तविकता में परिवर्तित होती है। मिसाल के लिए, सामाजिक जीवन में संभावना को वास्तविकता में बदलने के लिए गहन प्रयत्नों की जरूरत होती है और यह बदलाव विभिन्न सामाजिक शक्तियों के संघर्ष ( struggle ) से संबंधित होता है। व्यवहार में संभावना और वास्तविकता को तदनुरूप समझ लेने से आत्मतुष्टि ( complacency ) की भावना पैदा हो जाती है और बदलाव के मक़सद से होनेवाले कार्यकलापों में ढ़िलाई ही पैदा होती है।

अमूर्त और वास्तविक संभावनाओं के बीच अंतर करना जरूरी है। संभावना तभी वास्तविक होती है, जब उसके कार्यान्वयन के सारे पूर्वाधार बन गये हों। किसी भी संभावना के वास्तविकता में परिणत होने के लिए परिवर्तन की इस प्रक्रिया को वास्तविकता के कुछ वस्तुगत नियमों के अनुरूप होना चाहिए और उसके लिए आवश्यक सारी पूर्वावस्थाएं उपस्थित होनी चाहिए। यदि ये पूर्वावस्थाएं अपर्याप्त हों या उनका अभाव हो, तो संभावना अमूर्त ( abstract ) और आकारिक ( formal ) होती है। आवश्यक पूर्वाधारों के बनने पर ही यह अमूर्त या आकारिक संभावना, ठोस ( concrete ) या वास्तविक संभावना ( real possibility ) में परिणत हो जाती है।

अधिकांश पौधे विशाल संख्या में बीज पैदा करते हैं लेकिन इस बात की मात्र अमूर्त और आकारिक संभावना होती है कि प्रदत्त पौधे के सारे बीज उगेंगे और उनसे पौधे उपजेंगे तथा अपनी बारी में नये बीज पैदा करेंगे। यह संभावना पुनरुत्पादन ( reproduction ) के जैविक नियमों के पूर्ण अनुरूप है, किंतु इसके वास्तविकता में परिणत हो सकने के लिए आवश्यक पूर्वावस्थाओं का अस्तित्व नहीं होता। हो सकता है कि बीजों को अनुकूल ज़मीन न मिले, उन्हें परिंदे या कीड़े खा जायें, वे शाकपातनाशी ( weed-killers ) पदार्थों से नष्ट हो जायें, आदि। यदि सारी आवश्यक पूर्वावस्थाएं सभी बीजों को उपलब्ध हो जायें तो चंद वर्षों में एक ही पौधे के वंशज सारी पृथ्वी पर छा जायें।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम