संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रशिक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण में प्रतिपुष्टि के महत्त्व तथा संप्रेषण-प्रक्षिक्षण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संप्रेषण में प्रतिपुष्टि
( feedback in communication )

संप्रेषण मात्र सूचना का सामान्य अंतरण ही नहीं है, उसके सफल होने के लिए उसमें प्रतिपुष्टि ( feedback ) यानि व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के साथ संप्रेषणात्मक अन्योन्यक्रिया ( communicative interaction ) के परिणामों से संबंधित जानकारी पाना भी शामिल होना चाहिए

जब कोई आदमी किसी अन्य आदमी को कोई जानकारी देता है, कुछ करने को कहता है, अनुरोध करता है या प्रश्न पूछता है, तो उसे अपनी इन क्रियाओं की कारगरता के बारे में निरंतर सूचनाएं मिलती रहती हैं। परावर्तन के बिना संप्रेषण एक अधूरी क्रिया है। इस जवाबी सूचना से निदेशित ( directed ) होकर आदमी अपने व्यवहार में परिवर्तन, अपनी क्रियाओं की पद्धति का पुनर्गठन ( restructuring ) और शाब्दिक संप्रेषण के साधनों में सुधार करता रहता है, ताकि उसे सही-सही समझा जाए और वांछित ( desired ) परिणाम प्राप्त हो सकें। आत्मपरक ( subjective ) दृष्टि से संप्रेषक को इस प्रतिपुष्टि की जानकारी होना जरूरी नहीं है, किंतु अनजाने में वह हमेशा उसका सहारा लेता है।

संप्रेषणकर्ता प्रतिपुष्टि की भूमिका में किसी कारणवश विघ्न ( disturbance ) पड़ने पर ही उग्रता अनुभव करता है। दूरभाष के जरिए, श्रोता की जानी-पहचानी अनुक्रिया के अभाव में सामान्य बातचीत तक में कठिनाई होती है, हिचक पैदा होती है, बोलने का सामान्य लहज़ा बदल जाता है, वग़ैरह। यदि वक़्ता अपने सहभागी को देख नहीं सकता, तो वह अपने को बंधा हुआ-सा महसूस करता है और अपनी आंगिक क्रियाएं भूल जाता है। सामने वाले यानि संभाषी के व्यवहार के, संप्रेषण के साथ-साथ किये जा रहे प्रत्यक्षण के दौरान प्राप्त संकेत मनुष्य को अपनी आगे की क्रियाएं सुधारने और जो बातें वह कहने वाला है, उनमें आवश्यक परिवर्तन करने की संभावना देते हैं।

संप्रेषण के दौरान संभाषी अथवा श्रोता को देखना या जानना परस्पर समझ की एक महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है। यदि शिक्षक इस बारे में प्राप्त प्रतिपुष्टि-सूचना पर ध्यान नहीं देता है कि उसे छात्रों द्वारा किस हद तक समझा जा रहा है, तो अन्योन्यक्रिया असंभव हो जाएगी और शैक्षिक संप्रेषण टूट जाएगा। यही कारण है कि संप्रेषण के एकालापात्मक ( monologue ) रूप संवादात्मक ( dialogue ) रूपों की तुलना में अधिक कठिन होते हैं। अनुभवी शिक्षक कक्षा में बैठे दर्जनों छात्रों की मुख-मुद्राओं, इशारों से बोलने के ढ़ंग, आदि का अर्थ तुरंत समझ जाता है, उनकी मानसिक अवस्था, भयों, आशाओं, दुख तथा इरादों को भांप जाता है, अपने व्यवहार को उनके अंतर्जगत की अपनी समझ के मुताबिक़ बदलता है और उनपर प्रभाव डालने की सर्वाधिक उपयुक्त विधियां चुनता है। इस तरह अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की प्रक्रियाओं में प्रतिपुष्टि सूचनात्मक तथा स्वनियात्मक भूमिकाएं ( informative and self-appointed roles ) अदा करती हैं।

संप्रेषण की प्रक्रिया में इसका ध्यान रखा जाना चाहिए कि आदमी के बाह्य रूप के कुछ घटक ( चहरा, हाथ, कंधे ), उसकी भंगिमाएं, अंगविक्षेप और लहज़ा भी सूचना के वाहक होते हैं। प्रतिपुष्टि के संकेतों की दृष्टि से संभाषी अथवा श्रोता का चहरा विशेष सूचनात्मक महत्त्व रखता है। अनुभवी वक़्ता सामने वाले के चहरे को देखकर बता सकता है कि वह उसे ध्यान से सुन रहा है ( ‘भावशून्य आंखें’ ), उसकी बातों का विश्वास कर रहा है अथवा नहीं कर रहा है ( ‘संदेहसूचक भाव’ )। वास्तव में दूसरा पक्ष संप्रेषक को समझ रहा है या नहीं, इसका सबसे अच्छा अनुमान इस पक्ष से मिलनेवाले तरह-तरह के संकेतों और मुख्यतः उसकी क्रियाओं से लगाया जा सकता है। शिक्षक के डांटते समय छात्र उसकी बातें ध्यान से सुनता हुआ लग सकता है, किंतु असल में वह बड़ी व्यग्रता से डांट ख़त्म होने और अपने साथियों के साथ खेलने जा पाने की प्रतीक्षा कर रहा हो सकता है।

संप्रेषण का प्रशिक्षण
( training of communication )

फलप्रद संप्रेषण की योग्यताएं या तो स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) ढ़ंग से विकसित होती हैं या फिर वे प्रशिक्षण का उपोत्पाद ( by-product ) होती हैं ( शुरुआती कक्षा के छात्र को ‘पूरा उत्तर’ देना, बड़े द्वारा संबोधित किये जाने पर उसे खड़ा होकर सुनना, आदि सिखाया जाता है )। बड़ी कक्षाओं के छात्र संप्रेषण के मानकों की जानकारी शिष्टाचार विषयक पुस्तकें पढ़कर पाते हैं। फिर भी संप्रेषण-कौशल का विकास एक विशेष कार्य है और उसके लिए विशेष प्रशिक्षण, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक ( social-psychological ) या संप्रेषण प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। शिक्षक के लिए इस प्रशिक्षण का बहुत महत्त्व है।

सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण के दो उद्देश्य होते हैं, एक, संप्रेषण के नियमों और विशेषतः शैक्षिक संप्रेषण के नियमों का अध्ययन और दो, शैक्षिक संप्रेषण की तकनीक सीखना, यानि अपने में व्यावसायिक शैक्षिक संप्रेषण की आदतें और कौशल विकसित करना।

इसलिए मनोविज्ञान-विशेषज्ञ सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की समस्या के सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक पहलुओं में भेद करते हैं। व्यावहारिक पहलू के अंतर्गत वे अभ्यास आते हैं, जिनका उद्देश्य शिक्षक को छात्रों से संप्रेषण की आदतें व कौशल विकसित करने में मदद देता है। इन आदतों व कौशलों में निम्न शामिल हैं, पाठ के सभी चरणों में सुसंगत ढ़ंग से काम करने की योग्यता ( जिसे मुख्यतः व्यावहारिक पाठों के दौरान विकसित किया जाता है ), पाठ के दौरान पेशियों को तनावरहित बनाने की योग्यता, ऐच्छिक ध्यान को बांटने की योग्यता और प्रेक्षण योग्यता। वाक् कला के वे अभ्यास विशेषतः महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, जिनका उद्देश्य मौखिक वाक् के मानकों को सुधारना होता है और जो प्रतिपुष्टिकारी श्रव्य टेपों ( audio tapes ) के उपयोग पर आधारित होते हैं। वीडियो रिकार्डिंग की तकनीक से हाव-भाव तथा अंगविक्षेपों का परिष्कार ( refinement ) करने में मदद मिलती है। हर कोई जानता है कि कि टेप पर अपनी आवाज़ सुनकर या पर्दे पर अपने को देखकर, जो कि किसी अन्य व्यक्ति को सुनने या देखने के समान है, मनुष्य अपने बोलने के ढ़ंग, हाव-भाव, अंग-संचालन, आदि की कमियां दूर कर सकता है।

यह प्रक्षिक्षण व्यावसायिक खेलों के रूप में भी आयोजित किया जा सकता है, जिनमें अधिक यथार्थपरक परिस्थितियों का प्रतिरूपण किया जाता है। ऐसे खेलों में सभी नये कौशलों के विकास का उद्देश्य भागीदारों के भावी कार्य को आसान बनाना होता है। संप्रेषण का अभ्यास मनोवैज्ञानिक प्रभाव की कारगरता बढ़ाने का एक साधन है। वह व्यक्ति की संप्रेषण तथा सामूहिक सक्रियता में कारगर भाग लेने की क्षमता और वैयक्तिक गुणों में वृद्धि करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्र

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण पर विचार किया था, इस बार हम परस्पर समझ को विकसित करने के लिए एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्र

संप्रेषण में कम से कम दो पक्ष होते हैं और इस प्रक्रिया में मनुष्य का प्रत्यक्ष सामना दूसरे लोगों के केवल बाह्य रूप, व्यवहार और संप्रेषण के साधन के तौर पर प्रयुक्त क्रियाओं से होता है। परस्पर समझ विकसित करने के लिए, उनमें से प्रत्येक दूसरे के बारे में, उसके अंतर्जगत के बारे में उसके बाह्य व्यवहार के आधार पर ही कोई धारणा कैसे बना सकता है? इसे जानने के लिए हमें अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण के तीन मुख्य क्रियातंत्रों, तादात्म्यीकरण, परावर्तन और रूढ़ीकरण को समझना होगा।

तादात्म्यीकरण सचेतन अथवा अचेतन ढ़ंग से अपने को दूसरे व्यक्ति का समरूप मानकर उस व्यक्ति को समझने की प्रणाली है। अन्योन्यक्रिया की प्रक्रिया में पैदा होनेवाली विभिन्न परिस्थितियों में लोग दूसरों की आंतरिक अवस्था, इरादों, विचारों, अभिप्रेरकों, भावनाओं आदि का अपने को उनकी स्थिति में रखकर अनुमान लगाते हैं। प्रवेश परीक्षा के लिए परीक्षा केंद्र के बाहर घबड़ाये हुए छात्रों को व्यग्रतापूर्वक पुस्तक के पन्ने पलटता देखकर, उस कॉलेज का कोई भी विद्यार्थी उस दिन की याद करके उनकी मानसिक अवस्था का अंदाज़ लगा लेता है, जब वह ख़ुद इसी तरह घबड़ाया हुआ परीक्षा केंद्र के बाहर खड़ा परीक्षा शुरू होने का इंतज़ार कर रहा था।

किंतु संप्रेषक के लिए दूसरे पक्ष को बाहरी आदमी जैसे निरपेक्ष तटस्थ भाव से समझना ही जरूरी नहीं है, बल्कि उसके लिए यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है कि स्वयं उसे, दूसरे पक्ष द्वारा कैसे देखा और समझा जाएगा। संप्रेषक की, दूसरे पक्ष के मन में बनी, अपने बिंब की चेतना को परावर्तन कहा जाता है। परावर्तन दूसरे व्यक्ति को जानने-समझने की प्रक्रिया का अंग है। दूसरे व्यक्ति को समझने का मतलब, प्रत्यक्षण के कर्ता के नाते अपने बारे में उस व्यक्ति के रवैये को जानना भी है। अतः एक व्यक्ति को जानने-समझने की तुलना आमने-सामने रखे गये दो दर्पणों में लड़नेवाली छाया से की जा सकती है। दूसरे आदमी को अपने मन में परावर्तित करते हुए आदमी उसके अवबोध के दर्पण में स्वयं को भी परावर्तित करता है। संप्रेषण की प्रक्रियाओं में तादात्म्यीकरण और परावर्तन परस्पर अविभाज्य होते हैं।

यदि मनुष्य को संप्रेषण में सहभागियों के बारे में सदा पूरी और विज्ञानसम्मत जानकारी होती, तो वह उनके साथ अपनी अन्योन्यक्रिया की कार्यनीति को बिल्कुल सटीकता के साथ ठीक तय कर लेता। किंतु दैनंदिन जीवन में उसे ऐसी कोई सही जानकारी नहीं होती, जिससे वह दूसरों की क्रियाओं का कारण ख़ुद उन्हें ही समझने को विवश होता है। दूसरे व्यक्ति पर किन्हीं निश्चित भावनाओं, इरादों, विचारों और व्यवहार के अभिप्रेरकों का आरोपण करके, उन्हें उस दूसरे व्यक्ति की क्रियाओं का कारण बताने को कारणात्मक आरोपण या कारणात्मक व्याख्या कहा जाता है। कारणात्मक आरोपण सामान्यतः अचेतन रूप से किया जाता है, या तो दूसरे से अपना तादात्म्यीकरण करके, यानि उसमें वे ही भावनाएं और अभिप्रेरक आरोपित करके जो व्यक्ति के अनुसार वैसी ही परिस्थिति में ख़ुद उसमें होते, या फिर दूसरों को ऐसे लोगों की कोटि में शामिल करके, जिनके संबंध में उसके मन में पहले से ही कुछ रूढ़ धारणाएं बनी हुई हैं।

रूढ़ीकरण, व्यवहार के रूपों और उनकी कारणात्मक व्याख्याओं का ( कभी-कभी बिना किसी गंभीर कारण के भी ) उनको पहले से ज्ञात अथवा ज्ञात लगनेवाली, यानि सामाजिक रूढ़ धारणाओं से मेल खानेवाली परिघटनाओं की कोटि का मानकर वर्गीकरण करना है। इस लिहाज़ से रूढ़ धारणा मनुष्य का एक स्थिर, अपरिवर्तनीय बिंब है, जिसे ठप्पे जैसा इस्तेमाल किया जाता है। रूढ़ीकरण, अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण के कर्ता द्वारा अपने निजी अनुभवों, पुस्तकों, फ़िल्मों, टीवी, आदि से प्राप्त जानकारी और दिमाग़ में टिकी रह गई मित्रों तथा परिचितों की रायों के सामान्यीकरण का परिणाम है। इस तरह से प्राप्त जानकारियां न केवल संदिग्ध, बल्कि सीधे-सीधे मिथ्या भी हो सकती हैं। किंतु अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की रूढ़ धारणाओं को प्रायः सुपरीक्षित मानकों के रूप में लिया जाता है, जो मानो दूसरे लोगों को समझने की कुंजी प्रदान करते हैं।

एक सर्वे से प्राप्त जानकारियों ने दिखाया कि व्यक्ति के बाह्य रूप तथा उसके चरित्र की विशेषताओं के प्रत्यक्ष सहसंबंध के बारे में पूरी तरह ग़लत रूढ़ धारणाएं व्यापकतः प्रचलित हैं। सर्वे में पूछे गये ७२ व्यक्तियों में से ९ की धारणा थी कि चौकोर ठोड़ीवाले दृढ़ संकल्पयुक्त लोग होते हैं, १७ ने बताया कि चौड़ा माथा दिमाग़दार होने का लक्षण है, ३ का विश्वास था कि कड़े बाल आदमी के अक्खड़पन के परिचायक होते हैं, ५ की राय थी कि छोटा क़द दबंग, दमदार और सत्ता के भूखे व्यक्तित्व को दिखाता है, ५ का सोचना था कि सुंदर शक्लवाले लोग बेवक़ूफ़ या आत्मप्रेमी होते हैं और २ आदमी इस मत के थे कि जिसके पतले होंठ होते हैं, वह अवश्य ही घुन्ना और ढ़ोंगी क़िस्म का होगा।

अब यह कहने की जरूरत नहीं रह जाती है कि इन सब रूढ़ धारणाओं का, अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की प्रक्रिया को प्रभावित करना, संप्रेषण में भाग लेनेवाले अन्य लोगों के बिंब को बिगाड़ना और सामान्य संप्रेषण में बाधक होना अनिवार्य ही है। अश्वेत लोगों के व्यवहार की इस नस्लवादी व्याख्या की जड़ में कि वे अतिकामुक, चालाक, मनमौजी, आदि होते हैं, कारणात्मक आरोपण के क्रियातंत्र के तौर पर रूढ़ीकरण ही मौजूद है। इस तरह से, यहां रूढ़ीकरण पूर्वाग्रह का रूप ले लेता है।

कारणात्मक आरोपण का स्वरूप बहुत-सी परिस्थितियों पर निर्भर होता है और मनोविज्ञानी उन्हें अच्छी तरह जानते हैं। उदाहरण के लिए, किसी अनजान व्यक्ति के बारे में हमारी धारणा या राय काफ़ी हद तक उसके बारे में आरंभ में मिली जानकारी के आधार पर बनती है।

एक प्रयोग में एक ही व्यक्ति का चित्र छात्रों के दो समूहों को दिखाया गया। एक समूह में प्रयोगकर्ता ने कहा कि वह वैज्ञानिक है और दूसरे समूह में कहा गया कि वह अपराधी है। छात्रों को उसकी शक्ल के आधार पर उसके चरित्र का अनुमान लगाना था। पहले समूह ने उसमें परिश्रमी, दयालु, सहानुभूतिपूर्ण तथा समझदार व्यक्ति के लक्षण देखे और दूसरे समूह ने एक निष्ठुर, इरादे के पक्के और चालाक आदमी के लक्षण। चित्र की एक ही तफ़सील, आंखों, ने पहले समूह को दयालु तथा समझदार जैसे विशेषणों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया और दूसरे समूह को निष्ठुर और चालाक जैसे विशेषणों के प्रयोग के लिए।

स्पष्ट है कि प्राथमिक जानकारी ने प्रत्यक्षण की प्रक्रिया को बहुत अधिक इकतरफ़ा झुकाव दे दिया था, जिससे छात्र व्यक्ति की आकृति के बारे में अपनी राय को वैज्ञानिक या अपराधी विषयक रूढ़ धारणाओं के अनुरूप बना बैठे। इसी तरह शैक्षिक संप्रेषण में रूढ धारणाएं शिक्षक को छात्रों के पक्ष या विपक्ष में झुकाते हुए उसके आत्मपरकतावाद को जन्म देती हैं। खेद है कि शिक्षक की आत्मपरकता बहुत बार छात्र के बाह्य रूप के बारे में उसकी राय से जुड़ी होती है।

पूर्वाग्रह और आत्मपरकता, दोनों प्रायः प्राथमिक जानकारी की उपज होते हैं। एक प्रयोग किया गया, जिसका उद्देश्य यह मालूम करना था कि पूर्वाग्रहपूर्ण मत के निर्माण में प्राथमिक सूचना की क्या भूमिका होती है।

जैसा कि मालूम है, बहुत सारी पश्चिमी शिक्षा संस्थाओं में छात्रों के बौद्धिक स्तर को बुद्धि-लब्धि ( आईक्यू ) से नापा जाता है। बुद्धि-लब्धि मालूम करने के लिए मानसिक आयु को वास्तविक आयु से विभाजित और फिर फल को १०० से गुणा किया जाता है। इस विशेष मामले में कॉलेज में नये भरती हुए छात्रों के दो समूहों को उनकी बुद्धि-लब्धि ( आईक्यू ) के लिए जांचा गया, ताकि बाद में उन्हें अलग-अलग वर्गों में रखा जा सके। जांचों के परिणाम छात्रों को तो नहीं बताये गये, मगर प्राध्यापकों को अवश्य बताया गया कि अमुक छात्र का आईक्यू नीचा है और अमुक छात्र का बहुत ऊंचा। असल में प्राध्यापकों को जान-बूझकर ग़लत जानकारी दी गई थी।
कुछ समय बाद प्रयोगकर्ताओं ने उन छात्रों की प्रगति की जांच की। पाया गया कि तथाकथित ऊंचे आईक्यूवाले छात्रों की प्रगति सामान्यतः संतोषजनक थी और प्राध्यापक उनसे खुश थे। जहां तक ताकथित नीचे आईक्यूवाले छात्रों का सवाल था, उनकी हालात बदतर थी और जैसे-तैसे खींचे जा रहे थे। कुछेक अपवादों को छोड़कर सामान्यतः हर वर्ग में स्थिति यही थी।
परिणाम क्या बताते हैं? प्राध्यापकों को चूंकि ‘मालूम’ था कि उनके सामने प्रतिभाशाली छात्र है, इसलिए उन्होंने उसकी प्रतिभाओं के प्रस्फुटन में हर तरह से सहयोग दिया,, जबकि दूसरी ओर कथित रूप से प्रतिभाहीनों पर उन्होंने अपना समय गंवाना उचित नहीं समझा और उन्हें साफ़-साफ़ हिक़ारत की नज़रों से देखा, जिसका उनपर और उनकी सामान्य प्रगति पर प्रभाव पड़ना अनिवार्य ही था।
प्राध्यापकों को दी गयी प्राथमिक जानकारी ने छात्रों के प्रति उनके रवैये को पूर्वाग्रहपूर्ण बना दिया और उसे सही ठहराने के लिए उन्होंने कोई कसर बाक़ी नहीं रहने दी।

स्वाभाविकतः प्रश्न उठता है कि क्या पढ़ाई में बच्चे की खराब प्रगति का कारण कभी-कभी शिक्षक का पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया ही तो नहीं होता? यह रवैया, जो कभी-कभी छात्र के साफ़-सुथरा न रहने या शरारती होने का परिणाम भी हो सकता है, सर्वतोमुखी आत्मपरकता में और उसे उचित ठहराने की कोशिशों में बदल सकता है।

जिसके बारे में अनुकूल रवैया होता है, उनमें सकारात्मक गुण देखा जाना और जिनके बारे में प्रतिकूल रवैया होता है, उनमें नकारात्मक गुण देखा जाना कारणात्मक आरोपण की ठेठ मिसालें हैं। किसी व्यक्ति द्वारा प्रत्यक्षण कर्ता पर डाली गई सामान्य अच्छी छाप, कर्ता को उस व्यक्ति की उन विशेषताओं का भी सकारात्मक मूल्यांकन करने को प्रेरित करती हैं, जिनसे कर्ता का अभी तक कोई सामना नहीं हुआ है। इसके प्रतिकूल छाप नकारात्मक मूल्यांकन को जन्म देती है। इस निर्भरता को मनोविज्ञान में परिवेश प्रभाव कहा जाता है। परिवेश प्रभाव सामान्यतः तब पैदा होता, जब प्रत्यक्षण के कर्ता को प्रत्यक्षीकृत व्यक्ति के बारे में अत्यल्प जानकारी ही होती है। इस तरह कुछ शिक्षकों में अपने प्रिय छात्रों को बढ़ावा देने की शैक्षिक दृष्टि से अनुचित प्रवृत्ति अनिवार्यतः छात्रों की प्रगति का आत्मपरकतावादी मूल्यांकन करने और उनकी वैयक्तिक विशेषताओं के बारे में पूर्वाग्रहपूर्ण राय बनाने की ओर ले जाती है।

संयुक्त सामाजिकतः उपयोगी सक्रियता के दौरान ही परिवेश प्रभाव के नकारात्मक परिणाम ख़त्म किये जा सकते हैं। यह सक्रियता अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्ष के स्वरूप को बदल देती है और कारणात्मक आरोपण के लिए अच्छी बुनियाद पेश करती है। काम के माध्यम से बनने वाले अंतर्वैयक्तिक संबंधों और सामाजिकतः महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों पर आधारित कार्यकारी समूहों में ही लोग एक दूसरे को ठीक से समझ सकते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकरावों पर चर्चा की थी, इस बार हम मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मित्रों के बीच संप्रेषण

मित्रता अंतर्वैयक्तिक संबंधों का एक विशिष्ट रूप है, जिसके लक्षण हैं स्थायी वैयक्तिक चयनात्मक संबंध ( permanent selective individual relationship ) तथा अन्योन्यक्रिया, इनमें भाग लेनेवालों के बीच परस्पर लगाव ( attachment ), संप्रेषण की प्रक्रिया से अत्यधिक संतोष और एक दूसरे से अपनी जैसी ही भावनाएं तथा पसंदें रखने की अपेक्षा। मित्रता के विकास के लिए इसके अलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है, जो परस्पर समझ, एक दूसरे के संबंध में स्पष्टवादिता तथा खुलेपन, सक्रिय परस्पर सहायता, एक दूसरे के मामलों में दिलचस्पी, ईमानदारी तथा निःस्वार्थभाव पर जोर देते हैं। मित्रता के नियमों के गंभीर उल्लंघन से या तो संबंध ख़्त्म हो जाएंगे, या मित्रता एक सतही संबंध बनकर रह जाएगी, या फिर हो सकता है कि वह शत्रुता का रूप ले लेगी।

किशोरों के लिए मित्रता और मित्रों के बीच संप्रेषण की समस्या विशेष महत्त्व रखती है। इसकी पुष्टि शिक्षकों के असंख्य प्रेक्षणों, किशोरों की डायरियों और वे मित्रता तथा प्रेम विषयक बहसों में जो रुची लेते हैं, उससे होती है। फिर भी अक्सर उनकी मित्र की खोज का अंत प्रायः मोहभंग में होता है, क्योंकि किशोरों के संबंधों के वास्तविक स्वरूप और मित्रता के नियमों के ऊंचे मानदंडों ( criteria ) के बीच खाई है। इस खाई का पता लगने से जो निराशाएं पैदा होती हैं, वे कभी-कभी किशोरों के बीच झगड़ों का कारण बन जाती हैं।

किशोरावस्था में हर कोई मित्र की आवश्यकता अनुभव करता है। मित्रों के बीच संप्रेषण के मानकों के बारे में किशोर की कमोबेश तौर पर स्पष्ट धारणा होती है, फिर भी किशोरों की सबसे बड़ी विशेषता दो व्यक्तियों के बीच की मित्रता नहीं, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, बल्कि साथीपन है, जो समवयस्कों के साथ व्यापकतर संप्रेषण पर ज़ोर देता है। साथीपन के संबंधों की बदौलत किशोर संप्रेषण की ऐसी प्रक्रिया में भाग लेता है, जिसमें वह अपने महत्त्वपूर्ण गुणों तथा योग्यताओं के ज़रिए अपने व्यक्तित्व का अपने समवयस्कों में विस्तार कर सकता है। किसी से उसे पुस्तकों के बारे में चर्चा करने में आनंद आता है, किसी से टेबल-टेनिस खेलने में और किसी से भावी पेशों के बारे में बातें करने में।

इस किशोरसुलभ साथीपन को साधारण सौहार्द के संबंधों से गड्डमड्ड नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि मित्रों, साथियों के बीच संप्रेषण का कर्ता अपने व्यक्तित्व के अपने लिए महत्त्वपूर्ण गुणों के ज़रिए किसी ‘साझे ध्येय’ में, समवयस्कों की सक्रियता में सहभागी बनना चाहता है,  जो उसके लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान है। किशोरों की मित्रता मित्रों के बीच संप्रेषण के विकास की एक अवस्था ही है। उसका वास्तविक महत्त्व अपने को, सामाजिक प्रौढ़ताप्राप्त वयस्कों में ही, प्रकट कर सकता है।

परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण

संप्रेषण का अन्योन्यक्रिया और सूचना के अलावा एक प्रत्यक्षपरक पहलू भी है, जो अपने को संप्रेषण में भाग लेनेवालों के, एक दूसरे को जानने-समझने की प्रक्रिया में प्रकट करता है। संप्रेषण तभी संभव है, जब अन्योन्यक्रिया की प्रक्रिया में शामिल होनेवाला व्यक्ति, परस्पर समझ ( mutual understanding ) के स्तर को आंकने और अपने सहभागी का मूल्यांकन ( evaluation ) कर पाने की स्थिति में होसंप्रेषण में भाग लेने वाले दूसरे पक्ष के अंतर्जगत को अपनी चेतना में पुनर्सृजित ( re-creation ) करने, उसकी भावनाओं, व्यवहार के अभिप्रेरकों ( motives ) तथा महत्त्वपूर्ण चीज़ों के प्रति रवैये ( attitudes ) को समझने का प्रयत्न करते हैं।

फिर भी दूसरे व्यक्ति के अंतर्जगत को पुनर्सृजित करने का यह कार्य आसान नहीं है। मनुष्य का प्रत्यक्ष सामना दूसरे लोगों के केवल बाह्य रूप, व्यवहार और संप्रेषण के साधन के तौर पर प्रयुक्त क्रियाओं से होता है। उसे लोगों को उपलब्ध जानकारी के आधार पर समझने और उनकी योग्यताओं, विचारों, इरादों, आदि के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को जानना, समझना तथा आंकना ही संप्रेषण का प्रत्यक्षपरक पहलू है। दूसरे लोगों को जानकर व्यक्ति उनकी संयुक्त सक्रियता की संभावनाओं का अधिक सही मूल्यांकन कर पाता है। उनके संयुक्त प्रयासों की सफलता उनके अंतर्जगत की उसकी समझ के सही होने पर निर्भर रहती है।

( अगली बार हम संप्रेषण के इसी परस्पर समझ के प्रत्यक्षपरक पहलू के अंतर्गत एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों पर विचार करेंगे। )



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाओं पर विचार किया था, इस बार हम मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकरावों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव
( psychological contacts and interpersonal conflicts)

संपर्क के लिए संप्रेषण की प्रक्रिया का उभयपक्षी होना आवश्यक है। वह तभी बनाये रखा और बढ़ाया जा सकता है, जब सभी पक्ष एक दूसरे का आदर और विश्वास करते हैं। यदि शिक्षक अपेक्षाशील तथा सिद्धांतनिष्ठ होने के साथ-साथ अपने छात्रों का विश्वास भी करता है और उन्हें आदर भी देता है, तो वह निश्चित रह सकता है उसके द्वारा अत्यंत सरसरी तौर पर कही गई बातें भी किशोर द्वारा अनसुनी नहीं की जाएंगी, जबकि किशोर यदि महसूस करता है कि शिक्षक उसके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं करता, तो उसके कितने भी अकाट्य और विश्वासोत्पादक तर्कों को भी वह सुनने के लिए तैयार नहीं होगा।

शिक्षक और छात्रों के संबंध न्यूनाधिक हद तक स्कूल के सामान्य वातावरण पर, बच्चे के मनोविज्ञान के बारे में शिक्षक की समझ पर और उसकी अध्यापकीय तथा मनोवैज्ञानिक व्यवहारकुशलता पर निर्भर होते हैं। जो शिक्षक कड़ाई बरतना भी जानते हैं और छात्र की गरिमा का आदर भी करते हैं, वे स्कूल में अनुकूल मनोवैज्ञानिक वातावरण पैदा करते हैं। छात्रों से संप्रेषण की प्रक्रिया में उनके प्रति आदर दिखाकर वे किशोरों में आत्मसम्मान ( self-esteem ) की भावना को प्रोत्साहित करते हैं, जो आगे के संपर्कों के लिए आधार बनती है। स्कूली बच्चों ( विशेषतः किशोरों ) के आत्मसम्मान पर भरोसा करना उनपर हितकर ( salutary ) शैक्षिक प्रभाव डालने का अचूक तरीका है।

किशोर में वयस्कों जैसी स्थिर आत्म-मूल्यांकन ( self-assessment ) की योग्यता नहीं होती। इस वज़ह से वह अपने कार्यों के मूल्यांकन के लिए उन व्यक्तियों का सहारा लेता है, जिनकी वह बड़ी कद्र करता है, जैसे माता-पिता, शिक्षक, आदि। इन बाहरी मूल्यांकनों में अंतर हो सकता है, इसलिए वह वांछित ( desired ) संप्रेषण के लिए विश्वसनीय आधार के तौर पर अपना आत्मसम्मान बनाए रखने का प्रयत्न करता है, यानि अपनी ऐसी छवि ( image ) बनाता है, जो उसकी नज़रों में उन्हें स्वीकार्य होगी। अनुभवी शिक्षक जानते हैं कि किशोरों से घनिष्ठ मनोवैज्ञानिक संपर्क स्थापित करने और बनाए रखने के लिए उनके आत्मसम्मान पर भरोसा करना कितना आवश्यक है।

इसकी एक ठोस मिसाल देखिए। सुनील पढ़ाई में कमजोर था और शेष कक्षा से पिछड़ गया था। उसने औरों के बराबर पहुंचने की आशा खो दी थी, और खराब नंबरों, सहपाथियों के मज़ाक, शिक्षकों की भर्त्सना और मां-बाप की डांट का उसपर कोई असर नहीं होता था। उसके कक्षाध्यापक ने, जो भौतिकी पढ़ाता था, इस स्थिति को सुधारने के लिए सुनील को अलग से भी पढ़ाना शुरु किया। वांछित मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करने के लिए वह उसे कक्षा के बाद नहीं, बल्कि उसे शेष कक्षा से आगे-आगे रखने के लिए पाठ से पहले ही नयी सामग्री समझा देता था। फिर जब कक्षा में शेष बच्चे नये सवालों से जूझ रहे होते थे और सबसे तेज़ लड़के भी हार-सी मान जाते थे, वह सुनील को आगे बुलाता और वह बिना किसी कठिनाई के उन सवालों को हल कर दिखाता। कक्षा का सुनील के प्रति रुख़ बदल गया और उसने भी तुरंत इसे महसूस कर लिया। कुछ समय बाद शिक्षक ने उसे कक्षा की ही एक कमजोर लड़की की मदद करने का जिम्मा सौंपा। लड़के को गर्व अनुभव हुआ कि शिक्षक ने उस पर भरोसा किया है, और वह उत्साहपूर्वक इस दायित्व को पूरा करने में जुट गया। लड़की के सामने अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए वह नई सामग्री को मन लगाकर और अपनी ही पहल पर पढ़ता और साथ ही पुरानी सामग्री को भी दोहरा लेता, जिसमें कभी वह पिछड़ा हुआ था। अपना आत्मसम्मान वापस पा लेने से अब ढ़ाई के बारे में उसका रवैया बदल गया था। शनैः शनैः सभी विषयों में वह बड़ी अच्छी प्रगति दिखाने लगा। जो चीज़ उसने आखिरकार पा ली थी, उसे, यानि अपने सहपाठियों से मिलनेवाले सम्मान और इससे जुड़े आत्मसम्मान को वह अब गंवाना नहीं चाहता था।

आत्मसम्मान एक अचूक, किंतु नाज़ुक उपकरण ( critical tool ) है। अगर वयस्क लोग किशोर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं, चाहे यह लापरवाही या अज्ञानतावश किया गया हो या जानबूझकर, तो वे बुरे प्रभावों का सामना करने की उसकी क्षमता को नष्ट करते तथा उसे अच्छी मिसालों के प्रति उदासीन बनाते हैं। बच्चा कितना भी गया-गुज़रा क्यों ना हो, जब तक उसमें आत्मसम्मान की भावना है, समाज के लिए वह असुधार्य ( incorrigible ) नहीं है, क्योंकि उसे अन्य लोगों और जिस समाज में वह रहता है, उसका आदर करना अभी भी सिखाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में , उसके भविष्य के बारे में हम आशावादी रह सकते हैं। इसके विपरीत, यदि मनोवैज्ञानिक संपर्क टूट गया है, तो बिल्कुल संभव है कि अंतर्वैयक्तिक टकराव पैदा हो जाएं।

संप्रेषण की प्रक्रिया का सदा निर्बाध ( seamless ) होना अनिवार्य नहीं है और इसलिए यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि उसमें कोई आंतरिक विरोध नहीं पैदा होंगे। कुछ स्थितियों में संप्रेषण की प्रक्रिया में भाग लेनेवाले पक्षों के परस्पर-विद्वेषसूचक रवैये होते हैं, जिनमें दूसरे पक्ष के मूल्यों, कार्यभारों तथा लक्ष्यों ( targets ) के लिए कोई स्थान नहीं होता, और वह अंतर्वैयक्तिक टकरावों का कारण बन जाता है। इन टकरावों का सामाजिक महत्त्व अलग-अलग हो सकता है और अंतर्वैयक्तिक संबंधों के आधार का काम करनेवाले मूल्यों ( values ) पर निर्भर करता है।

अंतर्वैयक्तिक टकरावों के कारणों तथा प्रयोजनों ( purposes ) पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। संयुक्त सक्रियता के दौरान अंतर्वैयक्तिक टकराव दो प्रकार के निर्धारकों के कार्य के फलस्वरूप पैदा हो सकते हैं : वस्तुसापेक्ष व्यावसायिक मतभेद ( object-relative professional differences ) और व्यक्तिगत व्यावहारिक हितों की असमानता ( inequality of personal practical interests )।

यदि किसी सुनियोजित सामाजिकतः उपयोगी संयुक्त सक्रियता में भाग लेनेवाले लोगों की अन्योन्यक्रिया में वस्तुसापेक्ष व्यावसायिक मतभेदों की प्रधानता है, तो इससे पैदा होनेवाला टकराव विरले ही अंतर्वैयक्तिक संबंधों ( interpersonal relations ) के टूटने, संवेगात्मक तनाव ( emotional stress ) बढ़ने तथा शत्रुता में वृद्धि ( increasing hostility ) होने का कारण बनता है। विरोधी मतों पर खुली बहस के बाद किया गया निर्णय टकराव को ख़त्म कर देता है और साझा लक्ष्य ( common goal ) पाने में मदद करता है। इसके विपरीत व्यक्तिगत व्यावहारिक हितों की असमानताएं प्रायः विद्वेष ( rancor ) और कभी-कभी तो खुली शत्रुता का रूप ले लेती है। साझा ध्येय ना होने के कारण अपने संकीर्ण स्वार्थ ( self-interest ) की पूर्ति में लगे लोग प्रतिद्वंद्वी ( opponent ) बन जाते हैं, यानि अपने को एक ऐसी स्थिति में पाते हैं, जिसमें एक पक्ष की सफलता का मतलब दूसरे पक्ष के लिए हानि होता है। यह अपरिहार्यतः अंतर्वैयक्तिक संबंधों को बिगाड़ता है।

टकराव की स्थितियां संप्रेषण में अर्थविषयक बाधाओं के कारण भी उत्पन्न होती हैं, जो संप्रेषण में भागीदार पक्षों के बीच अन्योन्यक्रिया नहीं होने देतीं। अर्थविषयक बाधा का मतलब है पक्षों द्वारा मांगों, प्रार्थनाओं अथवा आदेशों की अलग-अलग ढ़ंग से व्याख्या किया जाना, जिससे परस्पर समझ और अन्योन्यक्रिया में रुकावट पैदा होती है। उदाहरण के लिए, वयस्कों और बच्चों के संबंधों में अर्थविषयक बाधा इस कारण पैदा हो सकती है कि बच्चा वयस्कों की मांगों के अर्थ को सही-सही समझते हुए भी इन मांगों को नहीं मानता है, क्योंकि वे उसके अनुभव, मत तथा दृष्टिकोण से मेल नहीं खातीं। इनको तभी दूर किया जा सकता है, जब वयस्क बच्चों के मानस, उसके हितों तथा विश्वासों, आयुगत विशेषताओं तथा विगत अनुभवों को जानते व ध्यान में रखते हैं और उसकी संभावनाओं तथा कठिनाइयों का लिहाज़ रखते हुए कार्य करते हैं।

बच्चों और बड़ों के बीच परस्पर समझ पैदा करने के लिए सबसे पहले यह आवश्यक है कि बच्चों को, बड़ों की भाषा तथा बड़ों को, बच्चों की भाषा इस्तेमाल करना सिखाया जाए। यहां तात्पर्य वाक्-प्रवृत्तियों, शब्द-भंड़ार, उच्चारण या वर्तनी से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि सामान्यतः स्वीकृत अर्थों की पद्धति के अलावा शब्द मानव चेतना की अन्य सभी परिघटनाओं ( phenomena ) की भांति ही एक विशेष भाग, एक विशेष व्यक्तिगत अर्थ भी रखते हैं, जो अलग-अलग व्यक्तियों के मामले में अलग-अलग होता है। व्यक्तिगत भाव उससे निर्धारित होता है, जो व्यक्ति की सक्रियता के लक्ष्यों को उसके अभिप्रेरकों ( motives ) से जोड़ता है, यानि व्यक्ति की आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करता है।

एक ही शब्द, क्रिया या स्थिति के अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग भाव हो सकते हैं। शिक्षक द्वारा छात्र को पिलाई गई डांट ( ‘ तुम आज आधी छुट्टी में मोहन से फिर लड़े!’ ) का शिक्षक और छात्र के लिए एक ही अर्थ होता है और दोनों यह जानते हैं कि यह सब किस बारे में है। फिर भी इस बात का व्यक्तिगत भाव अलग-अलग हो सकता है, शिक्षक के लिए स्कूल में बच्चों का लड़ना अनुशासन का उल्लंघन है, जबकि छात्र के लिए यह अपने से शक्तिशाली छात्र मोहन को अपना मज़ाक उड़ाने से रोकने की एक और कोशिश हो सकता है।

वयस्कों को यह मुख्य लक्ष्य कि बच्चे को वयस्कों की भाषा को उसके व्यक्तिगत भावों की सारी पद्धति के साथ सीखना चाहिए, को ध्यान में रखते हुए बच्चे के व्यक्तिगत भावों की पद्धति को समझने का प्रयत्न भी करना चाहिए। यदि वह बच्चे के साथ अपना तादात्मय स्थापित कर लेता है, तो उसका कार्य बड़ा आसान हो जाएगा। शैक्षिक संप्रेषण में अंतर्वैयक्तिक टकराव प्रायः अध्यापक की स्कूली बच्चे के अंतर्वैयक्तिक भावों की पद्धति को समझने की अक्षमता अथवा अनिच्छा के कारण ही पैदा होते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाएं
( roles-expectations in communication-processes )

अन्योन्यक्रियाओं में सामाजिक नियत्रंण संप्रेषण में भाग लेनेवालों की भूमिकाओं के अनुसार किया जाता है। भूमिका ( role ) से मनोविज्ञानियों का आशय व्यक्ति से उसकी सामाजिक हैसियत ( पद, लिंग, आयु, परिवार में स्थिति, आदि ) के अनुसार अपेक्षित व्यवहार के मानक रूप में स्वीकृत मॉडल से होता है। व्यक्ति शिक्षक अथवा छात्र, चिकित्सक अथवा रोगी, वयस्क अथवा बच्चे, अफ़सर अथवा मातहत, माता अथवा दादी, पुरुष अथवा स्त्री, मेहमान अथवा मेज़बान, किसी की भी भूमिका अदा कर सकता है। हर भूमिका को कुछ निश्चित अपेक्षाएं और इर्द-गिर्द के लोगों की विभिन्न आशाएं पूरी करनी होती हैं।

सामान्यतः एक ही व्यक्ति अलग-अलग संप्रेषणात्मक परिस्थितियों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति कारख़ाने में प्रबंधक, डॉक्टर के लिए रोगी ( यदि वह बीमार है ), घर में मां का आज्ञाकारी बेटा, मेहमानों के लिए अच्छा मेज़बान, आदि सभी कुछ हो सकता है। भूमिकाओं की अनेकता बहुत बार उनके बीच टकराव, भूमिकाओ का टकराव, पैदा कर देती है। उदाहरण के लिए, शिक्षाशास्त्री के रूप में शिक्षक अपने पुत्र की कमियों को देखता है और इससे कड़ाई से पेश आने की आवश्यकता महसूस करता है, किंतु पिता के नाते वह कभी-कभी उसके नख़रे बर्दाश्त कर जाता है और इस तरह उसके चरित्र के नकारात्मक पहलुओं को बढ़ावा देता है। कक्षा से अनुपस्थित रहनेवाले मां-बाप से मिलने जाने पर शिक्षक को मेहमान के नाते अपने मेज़बानों को उनके बच्चे के व्यवहार से संबंधित अप्रिय लगनेवाली बातें नहीं बतानी चाहिए, मगर शिक्षक के नाते ऐसा करना उसका कर्तव्य है।

विभिन्न भूमिकाएं अदा करनेवाले लोगों की अन्योन्यक्रिया का नियमन ( regulation ) भूमिका-अपेक्षाओं से होता है। व्यक्ति की वास्तविक इच्छाएं कुछ भी क्यों ना हो, उसके परिवेश के लोग उससे एक निश्चित ढ़ंग के व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। समाज भूमिका-निर्वाह के ढ़ंग का नियंत्रण तथा मूल्यांकन करता है और मानक ( standards ) से किसी भी प्रकार के गंभीर विचलन ( deviation ) को निंदनीय ठहराता है।

उदाहरण के लिए, सामान्यतः माना जाता है कि माता-पिता को अपने बच्चे के प्रति दयालु, स्नेहपूर्ण तथा नरम होना चाहिए। ऐसा रवैया ( attitude ) भूमिका-अपेक्षा के अनुरूप है और समाज उसे मान्य ठहराता तथा बढ़ावा देता है। किंतु मां-बाप द्वारा बच्चे को अतिशय प्यार दिये जाने और उसकी सभी ग़लतियां माफ़ किये जाने की कठोर भर्त्सना की जाती है। समाज की दृष्टि में मां-बाप द्वारा बच्चे के प्रति अत्यधिक कड़ाई बरता जाना, उन्हें लाड़-प्यार न दिया जाना वैसे ही निंदनीय है, जैसे अतिशय लाड़ करना। इन दो ध्रुवों के बीच वे बहुत सारे रवैये आते हैं, जिन्हें समाज ने माता-पिता की भूमिका का अंग बनाया और मान्य ठहराया है। यही बात परिवार के अन्य बड़ी पीढ़ी के सदस्यों पर भी लागू होती है।
जहां तक बच्चे का संबंध है, तो उसकी भूमिका की अपेक्षाएं हर कोई जानता है, हर कोई उसे विनम्र तथा मेहनती, बड़ों का आदर करनेवाला और पढ़ाई में मन लगानेवाला, आदि देखना चाहता है। घर में भी और बाहर भी बड़े लोग बच्चे को यह बताने का अवसर कभी नहीं चूकते कि वह उनकी आशाओं के अनुकूल निकल रहा है या नहीं।

संप्रेषण की प्रक्रिया सफल तभी हो सकती है, जब उसमें भाग लेनेवाले पक्षों का व्यवहार उनकी पारस्परिक ( mutual ) अपेक्षाओं को पूरा करता है। संप्रेषण की प्रक्रिया में शामिल होने पर हर व्यक्ति न्यूनाधिक सही ढ़ंग से तय कर लेता है उसके शब्दों तथा कार्यों के संबंध में प्रक्रिया के दूसरे भागीदारों की क्या अपेक्षाएं होंगी। दूसरों की अपेक्षाओं का सही पूर्वानुमान और उनके अनुरूप व्यवहार करने की व्यक्ति की क्षमता तथा योग्यता को व्यवहारकुशलता कहा जाता है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं कि व्यवहारकुशल आदमी को हमेशा और सभी परिस्थितियों में इन अपेक्षाओं को उचित ठहराने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति पैदा होती है कि आदमी के सिद्धांत और विश्वास, उससे की जा रही अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते, तो वह व्यवहारकुशलता को ताक में रखकर दृढ़ता का प्रदर्शन कर सकता है। गैलीलियो के इन प्रसिद्ध शब्दों को कि “फिर भी वह घूमती है” बेशक उससे अपने ‘पृथ्वी के सूर्य के चारो ओर घूमने वाले’ मत का पूर्ण तथा बिलाशर्त त्याग की अपेक्षा करनेवालों के संबंध में व्यवहारकुशलता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसे सिद्धांतनिष्ठा, वैज्ञानिक ईमानदारी और नागरिक साहस की अनुपम मिसाल ही कहा जा सकता है।

फिर भी दैनंदिन जीवन में दूसरे लोगों की अपेक्षाओं का ग़लत अर्थ लगाने या उनकी अवहेलना करने को व्यवहारकुशलता की कमी ही माना जाएगा। इससे संप्रेषण की प्रक्रिया में लोगों की अपेक्षाओं पर तुषारपात होता है, संप्रेषण में भाग लेनेवाले व्यक्तियों की अन्योन्यक्रिया में बाधा पड़ती है और कभी-कभी द्वंद की स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं। व्यवहारकुशलता की कमी अपेक्षाकृत अहानिकर भी हो सकती हैं, जैसे, उदाहरण के लिए, तब, जब कोई आदमी इस औपचारिक-से प्रश्न के उत्तर में कि ‘आप कैसे हैं?’ अपने और अपने नाते-रिश्तेदारों की सेहत के बारे में और नवीन, किंतु मामूली घटनाओं के बारे में विस्तार से बताने लगता है। किंतु अधिकांशतः व्यवहारकुशलता के नियमों के उल्लंघन के, विशेषतः शैक्षिक संप्रेषण में, गंभीर परिणाम निकलते हैं। इसकी एक मिसाल देखिए।

एक शिक्षक ने सस्वर पाठ की कला सीखने के इच्छुक छात्रों की मंडली बनाई, सप्ताहांत की सांस्कृतिक बाल-सभा में इसकी प्रस्तुतियां सराही जा रही थीं। किंतु एक दिन की अप्रिय घटना ने मंडली के ताने-बाने को हिला दिया। शिक्षक ने अभ्यास के लिए एक नीतिकथा सुझाई, किंतु ज्यों ही उसने उसे पढ़कर सुनाना शुरु किया, एक छात्र ने उठकर कोई और नीतिकथा चुनने को कहा। जब शिक्षक ने कारण जानना चाहा, तो छात्र ने धीमे स्वर में जवाब दिया कि वह कारण नहीं बता सकता। शिक्षक ने उसके अनुरोध को मामूली सनक समझकर उससे बैठ जाने को कह दिया। किंतु जब नीतिकथा का पाठ करते हुए शिक्षक इन अंतिम पंक्तियों तक पहुंचा कि ‘ अंत में भाग्य उसका यह निकला, पति जो मिला वह था लंगड़ा,’ तो वह समझ गया कि अनर्थ हुआ है। मंडली में बोझिल ख़ामोशी छाई हुई थी, लड़कों के चेहरों पर आक्रोश का भाव था और एक लड़की की आंखों में आंसू छलक आए थे। शिक्षक को तब याद हो आया कि मंडली में एक ऐसा लड़का था, जो कोई दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में अपनी एक टांग गंवा बैठा था और उस ड़बडबायी आंखोंवाली लड़की के प्रति वह भावनात्मक लगाव रखता था।

यह सदा याद रखना चाहिए कि व्यक्तियों के किसी भी समूह में सभी ज़िंदा इंसान होते हैं और उनमें से हर एक की भावनाओं का समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए। समूह में परस्पर मनोवैज्ञानिक संपर्क की जरा-सी कमी के भी, चाहे वह थोड़े से समय के लिए ही क्यों ना हो, गंभीर व अप्रत्याशित परिणाम निकल सकते हैं। परस्पर समझ के इस तरह बार-बार क्षीण होने से उनके बीच एक दुर्गम खाई पैदा हो जाती है, और सामूहिक लक्ष्यों की शांतिपूर्ण प्राप्ति कठिन हो सकती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण पर विचार किया था, इस बार हम वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान
( development of speech, communication and social patterns )

मनुष्य की आवश्यकताओं की तुष्टि अन्य लोगों से संपर्क बनाकर तथा उनके साथ मिलकर कार्य करने से ही हो सकती है। यह बुनियादी शर्त व्यक्ति के लिए यह जरूरत पैदा करती है कि वह अपने साथियों को वह चीज़ बताये, जो उनके लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण है और अर्थ रखती है।

बच्चे में उच्चारित वाक् के प्रथमांकुर पहले वर्ष के अंत में प्रकट होते हैं। वह कुछ सहजता से बोली जा सकने वाली ध्वनियों का उच्चारण करने लगता हैं, बड़े इन ध्वनियों को निश्चित व्यक्तियो तथा वस्तुओं से जोड़ते हैं और इस तरह बच्चे के मस्तिष्क में इनमें से हर ध्वनि की उसके प्रत्यक्ष परिवेश के किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु से संबद्धता जड़े जमा लेती हैं। आगे चलकर इनमें से हर ध्वनि बच्चे के लिए एक शब्द का रूप ले लेती है, जिसे वह वयस्कों से अपनी अन्योन्यक्रिया के गठन ( formation ) के लिए इस्तेमाल करता है। शब्द उसकी आवश्यकताओं की तुष्टि का जरिया, संप्रेषण का साधन बन जाते हैं। बाद में बच्चे का शब्द भंडार बड़ी तेज़ी से बढ़ता है, और वह दूसरे वर्ष के अंत तक व्याकरणिक रूपों के सही प्रयोग की क्षमता भी दिखाने लगता है, उसके वाक्य धीरे-धीरे लंबे और जटिलतर बनते जाते हैं।

वाक् का विकास और अशाब्दिक संप्रेषण के साधनों जैसे कि भाव-भंगिमाएं ( expression-gestures ), लहजा ( tone ) आदि का विकास साथ-साथ होता है। इस काल में बच्चा संभाषी के भावों को पढ़ना, उनके लहजे में छिपे अनुमोदन ( approval ) अथवा निंदा को पहचानना, अंग-संचालनों के अर्थ को समझना सीखते हुए संप्रेषण की प्रक्रिया में प्रतिपुष्टि ( feedback ) के संबंध विकसित करता है। इस सबसे उसे अपनी क्रियाओं में सुधार करने तथा लोगों के साथ परस्पर समझ बढ़ाने में मदद मिलती है।

भाषा के प्रति, जो संप्रेषण का साधन है और वाक् के प्रति, जो संप्रेषण की प्रक्रिया है, बच्चे का सचेतन ( conscious ) रवैया ( attitude ) स्कूल में बनता है। पहले पढ़ना और लिखना सीखने के पाठों में और फिर भाषा तथा साहित्य के पाठों में। इस तरह भाषा, छात्रों के सामने संकेतों की एक ऐसी जटिल पद्धति के रूप में प्रकट होती है, जिसके अपने सामाजिकतः निर्धारित नियम हैं और जिसके इन नियमों के आत्मसात्करण से वे न केवल सही पढ़, लिख व बोल सकेंगे, बल्कि मानवजाति द्वारा उनसे पहले सृजित ( created ) समस्त आत्मिक संपदा का उपयोग भी कर सकेंगे।

संप्रेषण करते हुए, यानि किसी से कुछ पूछते, अनुरोध करते, आदेश देते, समझाते या बताते हुए मनुष्य अपरिहार्यतः अपने सामने दूसरे मनुष्य को प्रभावित करने, उससे वांछित उत्तर पाने, उसे अपने कार्य की पूर्ति के लिए प्रेरित करने और जो बात उसकी समझ में नहीं आई है, उसे समझाने का उद्देश्य रखता है। संप्रेषण के उद्देश्य लोगों की संयुक्त सक्रियता की आवश्यकता को प्रतिबिंबित ( reflected ) करते हैं। बेशक इसका मतलब यह नहीं कि लोग निरर्थक बातें, निरुद्देश्य संप्रेषण, संप्रेषण की ख़ातिर संप्रेषण बनाए रखने के लिए संप्रेषण के साधनों का व्यर्थ उपयोग नहीं करते।

यदि संप्रेषण निरुद्देश्य नहीं है, तो इसका दूसरे लोगों के व्यवहार और सक्रियता के परिवर्तन के रूप में अनिवार्यतः कुछ परिणाम निकलता है या निकलना चाहिए। यहां संप्रेषण अंतर्वैयक्तिक अन्योन्यक्रिया ( interpersonal interaction ) का, यानि व्यक्तियों के संयुक्त कार्यकलाप की प्रक्रिया में पैदा होनेवाले संबंधों तथा परस्पर प्रभावों की समष्टि का रूप ग्रहण करता है। अंतर्वैयक्तिक अन्योन्यक्रिया एक दूसरे के कार्यों के बारे में व्यक्तियों की प्रतिक्रियाओं की श्रृंखला है: एक व्यक्ति के द्वारा अपनी क्रिया से दूसरे के व्यवहार को बदलना, दूसरे की प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है, जो अपनी बारी में फिर से पहले वाले के व्यवहार को प्रभावित करती है।

संयुक्त सक्रियता और संप्रेषण सामाजिक प्रतिमानों (social patterns ), यानि व्यक्तियों की अन्योन्यक्रिया तथा परस्पर संबंधों के लिए समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार के मानकों ( standards ) पर आधारित सामाजिक नियंत्रण की परिस्थितियों में संपन्न होते हैं।

यह आशा की जाती है कि समाज ने अनिवार्य प्रतिमानों की एक विशिष्ट पद्धति के रूप में व्यवहार के जो मानक विकसित तथा स्वीकृत किये हैं, उनका हर व्यक्ति पालन करेगा। इन मानकों का उल्लंघन सामाजिक निग्रह ( prohibition, repression ) की यथोचित युक्तियों ( निंदा, दंड ) को सक्रिय बना देता है और इस तरह विपथगामी के व्यवहार को सुधारने का प्रयत्न किया जाता है। व्यवहार के मानकों के अस्तित्व तथा मान्यता का प्रमाण यह है कि शेष सबके व्यवहार से भिन्न व्यवहार करनेवाले के संबंध में आसपास के लोग एक जैसी प्रतिक्रिया दिखाते हैं। सामाजिक प्रतिमानों का दायरा बहुत व्यापक होता है और उसके अंतर्गत श्रम-अनुशासन, सैन्य कर्तव्य तथा देशभक्ति की अपेक्षाएं पूरी करनेवाले व्यवहार के मॉडलों से लेकर शिष्टाचार के नियमों तक, सब कुछ आ जाता है। अपने कार्यस्थल पर ईमानदारी से काम और पहली कक्षा के छात्र द्वारा इस नियम का पालन कि शिक्षक के कक्षा में प्रवेश करने पर उसे खड़ा हो जाना चाहिए, सामाजिक प्रतिमानों के अनुसार व्यवहार की मिसालें हैं।

सामाजिक प्रतिमानों का आदर लोगों को अपने व्यवहार के लिए उत्तरदायी ( responsible ) बनाता है और अपने कार्यों का मूल्यांकन करते हुए, कि वे अपेक्षाओं के अनुरूप हैं या नहीं, उनका नियंत्रण करने की संभावना देता है। प्रतिमानों से निर्देशित होकर व्यक्ति अपने व्यवहार के रूपों का मानकों से मिलान करता है, समाज द्वारा मान्य रूपों को चुनता तथा अमान्य रूपों को ठुकराता है और अन्य लोगों से अपने संबंधों का नियमन ( regulation ) करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण और भाषा पर विचार किया था, इस बार हम शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


शाब्दिक संप्रेषण : वाक्

वाक् ( speech ) शाब्दिक ( verbal ) संप्रेषण, अर्थात भाषा ( language ) की सहायता से संप्रेषण की प्रक्रिया ( process ) है। शाब्दिक संप्रेषण के माध्यम के नाते शब्दों को सामाजिक अनुभव द्वारा निश्चित अर्थ दिये हुए होते हैं। शब्दों को ज़ोर से बोला, मन में दोहराया, कागज़ या किसी और चीज़ पर लिखा जा सकता है। जैसा कि मूक-बधिरों के मामले में होता है, उनका स्थान निश्चित अर्थों से युक्त विशेष इशारे भी ले सकते हैं। वाक् लिखित ( written )  और मौखिक ( oral ), दो प्रकार की होती है और अपनी बारी में मौखिक वाक् को संवादात्मक ( dialogue ) तथा एकालापात्मक ( monologue ) में बांटा जाता है।

मौखिक वाक् का सरलतम रूप संवाद ( dialog ) या बातचीत है, जिसमें दो या अधिक व्यक्ति किन्हीं प्रश्नों पर संयुक्त रूप से परिचर्चा करते हैं। संवादात्मक वाक् में संभाषियों के कथनों, किन्हीं शब्दों अथवा शब्द-समूहों की पुनरावृत्तियों, प्रश्नों, स्पष्टीकरण, केवल संभाषियों द्वारा समझे गये इशारों, विभिन्न सहायक शब्दों, विस्मयादिबोधकों को शामिल किया जाता है। इस वाक् की विशेषताएं काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर होती हैं कि संभाषी एक दूसरे को कितना समझते हैं और उनके बीच कैसे संबंध हैं। अधिकांशतः कोई अध्यापक अपने घर में जिस ढंग से बातचीत करता है, वह कक्षा में उसके बोलने के ढंग से बहुत भिन्न होता है। बातचीत का संवेगात्मक स्तर भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है। संभ्रम, आश्चर्य, आह्लाद, भय अथवा क्रोध की अवस्था में आदमी का ना केवल लहज़ा बदल सकता है, बल्कि वह भिन्न क़िस्म के शब्द तथा मुहावरे भी इस्तेमाल करता है।

मौखिक वाक् का दूसरा भेद एकालाप ( monolog ) है, जिसमें एक ही व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों को संबोधित करते हुए बोलता है। यह भाषण, कहानी, रिपोर्ट या ऐसी ही कोई अन्य चीज़ हो सकती है। एकालापात्मक वाक् की संरचना अधिक जटिल होती है और उसमें अधिक विस्तार से विषय का प्रतिपादन, संगति बनाए रखने और व्याकरण तथा तर्क के नियमों का ज़्यादा कड़ाई से पालन करने की अपेक्षा की जाती है। इसके उन्नत रूप व्यक्तित्वविकास के अपेक्षाकृत बाद के चरण में प्रकट होते हैं। ऐसे वयस्क प्रायः मिल जाते हैं, जो आपस में बातचीत तो बड़ी सहजता से कर लेते हैं, किंतु भाषण करने, रिपोर्ट पेश करने आदि में हकलाने लगते हैं। यह आम तौर पर शिक्षक और अभिभावकों के द्वारा उनकी एकालापात्मक वाक् के विकास पर पर्याप्त ध्यान न दिये जाने का परिणाम होती है।

मानवजाति के इतिहास में लिखित वाक् बहुत बाद में जाकर प्रकट हुई। उसकी उत्पत्ति समय और स्थान द्वारा विभाजित लोगों के बीच संप्रेषण की आवश्यकता के कारण हुई। उसने चित्राक्षरों से, यानि एक पूरे विचार अथवा प्रत्यय को व्यक्त करने वाले चित्रों या चित्रलेखों से आधुनिक वर्णमाला तक का, जो थोड़े-से वर्णों या अक्षरों की मदद से हज़ारों शब्द लिखना संभव बना देती है, लंबा रास्ता तय किया है।

लेखन मानवजाति द्वारा संचित अनुभव को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरित करने का सर्वाधिक विश्वसनीय तरीक़ा सिद्ध हुआ है, क्योंकि मौखिक वाक् द्वारा इस अनुभव के अंतरण में विकृति ( distortion ) तथा बदलाव का और यहां तक कि पूर्ण विलोपन का भी ख़तरा छिपा हुआ है। लिखने और पढ़ने से, मनुष्य के बौद्धिक क्षितिज के विस्तार में, उनके द्वारा नये ज्ञान के अर्जन ( acquisition ) तथा संप्रेषण में बड़ी मदद मिलती है। लिखित वाक् सटीक शब्दों का प्रयोग करने, तर्क तथा व्याकरण के नियमों को ध्यान में रखने, विषय की गहराई में जाने और विचारों में संगति बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है। प्रायः कोई चीज़ लिख लेने से उसे समझ लेना और याद रखना आसान हो जाता है।

अशाब्दिक संप्रेषण

लोगों के बीच संप्रेषण की तुलना तार-संचार से नहीं की जा सकती, जिसमें सिर्फ़ शाब्दिक संदेशों का विनिमय ( exchange ) मात्र होता है। मानव संप्रेषण में अनिवार्यतः उसमें भाग लेने वाले की भावनाएं समाविष्ट रहती हैं। वे एक निश्चित ढ़ंग से संदेशों की विषयवस्तु तथा संप्रेषण के भागीदारों से जुडी होती हैं और शाब्दिक संदेश का अंग बनकर सूचना के विनिमय के एक विशिष्ट पहलू का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसे अशाब्दिक ( nonverbal ) संप्रेषण कहा जा सकता है। अशाब्दिक संप्रेषण के साधन हैं इशारे, भंगिमाएं, लहजा, विराम, मुद्राएं, हास्य, आंसू, इत्यादि, जो शाब्दिक संप्रेषण के माध्यम शब्दों की अनुपूर्ति और कभी-कभी उनका स्थान भी ले लेनेवाली संकेत पद्धति का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, अपने मित्र के साथ घटी दुखद घटना के बारे में जानकर आदमी उससे अपनी सहानुभूति शब्दों के साथ-साथ अशाब्दिक संप्रेषण के संकेतों से भी प्रकट करता है, जैसे चहरे पर विषाद का भाव, नीची आवाज़, गाल हथेली पर टिकाना तथा सिर हिलाना, कंधे पर हाथ रखकर दबाना या थपथपाना, गहरी सांसे लेना, वग़ैरह।

संवेगों की एक विशिष्ट भाषा के तौर पर अशाब्दिक संप्रेषण के साधन भी शब्दों की भाषा के जैसे ही, सामाजिक विकास के उत्पाद होते हैं और अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए बुल्गारियाई आदमी सिर नीचे झटकाकर अपनी असहमति व्यक्त करता है, जबकि भारतीय आदमी के लिए यह सहमति और पुष्टि का संकेत होता है। विभिन्न आयु वर्गों के लोग अशाब्दिक संप्रेषण के विभिन्न तरीक़े इस्तेमाल करते हैं। मसलन, छोटे बच्चे बड़ों से कुछ करवाने या उन्हें अपनी इच्छाएं बताने के लिए रुलाई का सहारा लेते हैं। शाब्दिक संप्रेषण का प्रभाव काफ़ी हद तक संभाषियों की संस्थिति पर भी निर्भर होता है, जैसे कि मुंह जरा-सा पीछे मोड़ कर कुछ कहना प्रापक के प्रति, संप्रेषक के उदासीनता अथवा अवज्ञाभरे ( disobedience ) रवैये का परिचायक होता है।

अशाब्दिक संप्रेषण के साधनों और शाब्दिक संदेशों के उद्देश्यों तथा अंतर्वस्तु ( content ) की परस्पर-अनुरूपता ( congruence ), संप्रेषण की संस्कृति का एक तत्व है। यह परस्पर-अनुरूपता काफ़ी महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि एक ही शब्द, अलग-अलग लहजों के साथ, अलग-अलग अर्थ संप्रेषित कर सकता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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