मानसिक और शारीरिक श्रम

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


मानसिक और शारीरिक श्रम

propaganda_karlengland_0212_2मानसिक और शारीरिक श्रम क्या हैं ?  दोनों में क्या अन्तर है ?  दोनों में महत्व किसका अधिक है। सुझाएँ।

श्रम का मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन। श्रम का उद्देश्य निश्चित समाजिकतः उपयोगी उत्पादों को पैदा करना है। जाहिर है, इसके लिए उसे अपने पूर्व के अनुभवों के आधार पर पहलें मानसिक प्रक्रिया संपन्न करनी पड़ती है, आवश्यकता क्या है, उसकी तुष्टि के लिए क्या करना होगा, किस तरह करना होगा, एक निश्चित योजना और क्रियाओं, गतियों का एक सुनिश्चित ढ़ांचा दिमाग़ में तैयार किया जाता है तत्पश्चात उसी के अनुरूप मनुष्य प्रकृति पर कुछ निश्चित साधनों के द्वारा कुछ निश्चित शारीरिक क्रियाएं संपन्न करता है।

यानि किसी भी उत्पाद को तैयार करने में, उत्पादन में मानसिक तथा शारीरिक क्रियाएं अंतर्गुथित होती हैं। पहले की उत्पादन प्रक्रियाओं में उन दोनों प्रक्रियाओं की सभी क्रियाएं एक ही मनुष्य द्वारा संपन्न की जाती थी, परंतु आज की विकसित उत्पादन प्रक्रियाओं में, जबकि उत्पादन का समाजीकरण होता जा रहा है, किसी भी उत्पाद की संपूर्ण प्रक्रियाओं का विलगीकरण हो जाता है, और यह प्रक्रिया कई टुकड़ो में बंट जाती है। मानसिक प्रक्रियाएं, शारीरिक प्रक्रियाएं अलग होती है, और इनके भी कई टुकड़े हो जाते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि उत्पादन प्रक्रियाओं में मानसिक तथा शारीरिक श्रम अलग होते जाते हैं। ये भी और हिस्सों में बंट कर अलग-अलग व्यक्तियों के श्रम योगदान में परिवर्तित हो जाते हैं।

इस तरह आजकल मानसिक और शारीरिक श्रम काफ़ी दूर हो गये हैं, कई बार तो लगता भी नहीं कि ये किसी एक ही उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े हैं। अब यह समझा जा सकता है कि इनमें क्या अंतर है। ये सामाजिकतः उपयोगी उत्पादन प्रक्रियाओं के दो भिन्न पहलुओं को परावर्तित करते हैं। एक में मानसिकतः प्रधान और दूसरी में शारीरिकतः प्रधान सार्थक क्रियाएं संपन्न की जाती हैं।

अगर हमने यह समझ लिया है कि ये आपस में अंतर्गुथित हैं, तो महत्त्व का सवाल ही बाकी नहीं रह जाता। परंतु समाज में प्रचलित मानसिकताओं और दृष्टिकोणों के अनुसार इनको विभिन्न सामाजिक संरचनाओं में अलग-अलग महत्त्व दिया जाता है। जहां शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखा जाता है वहां मानसिक श्रम को जाहिरा तौर पर ऊंचा दर्ज़ा प्राप्त होता जाता है। समाज के साधनसंपन्न लोग उत्पादन प्रक्रियाओं के मानसिकतः पहलू पर अपना आधिपत्य और एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश करते हैं, ताकि बाकियों को हेय शारीरिक श्रम में लगाए रखा जा सके और वे उससे बचे रह सकें। पढलिखकर ऊंचे ओहदों और कार्यों को लपकने के लिए चल रही गलाकाट प्रतिस्पर्धा में इसका प्रतिबिंबन आसानी से देखा जा सकता है, यह व्यवस्था उन्हें लूट के अधिक हिस्से का , लाभ का बनाए रखकर इसमें मदद करती है।

व्यापक रूप से देखा जाए तो श्रम की प्रक्रिया एक अभिन्न सी प्रक्रिया है जिसमें मानसिक और शारीरिक पहलू आपस में गहरे से अंतर्गुथित होते हैं। दरअसल इन्हें अलग-अलग रूपों में महसूस करके जो भ्रम रचा जाता है वह अपने को व्यापक सर्वहारा वर्ग से अलग और शासक वर्ग के साथ निकटता महसूस करने के लिए होता है। मानसिक श्रम करने वाले भी यदि उनके पास बुर्जुआ साधन नहीं है और वे अपने जीवनयापन के लिए अपना श्रम ( चाहे मानसिक श्रम ही ) बेचकर ही गुजारा कर सकते हैं तो वर्गीय दृष्टि से वे सर्वहारा वर्ग में ही आते हैं। परंतु वे थोड़ा अधिक फैंका हुआ हिस्सा पाते हैं, इसलिए अधिक साधन संपन्न हो जाते हैं और अपने को प्रभुत्वशाली वर्ग के पास पाते हैं, वैसा ही बन जाने या बन पाने के सपने रचते हैं, तो इसीलिए वे इस मानसिक श्रम के अलगाव का भ्रम रचते हैं जो उन्हें शारीरिक श्रम करने वालों से अलग, श्रेष्ठ होने का सुक़ून देता है। यह भ्रम व्यवस्था द्वारा फैलाया और पोषित किया जाता है, वह ऐसा मानसिक श्रम वालों को अधिक हिस्सा प्रदान करके किया करती है और उनकी प्रतिरोधी चेतना को कुंद करती है, सर्वहारा वर्ग में फूट डालती है, उनमें मानसिक परिपक्व नेतृत्व की संभावनाओं को कमजोर करती है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

श्रम – सक्रियता का प्रमुख रूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत श्रम पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


श्रम
( श्रम पर एक प्रविष्टि ‘चेतना के आधार के रूप में श्रम’ पहले भी थी, उससे गुजरना भी समीचीन रहेगा। )

श्रम का शास्त्रीय मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन। श्रम एक ऐसी सक्रियता है, जिसका उद्देश्य निश्चित समाजिकतः उपयोगी ( अथवा समाज द्वारा उपयुक्त ) उत्पादों को पैदा करना है, जो भौतिक और आत्मिक, दोनों तरह के हो सकते हैं। श्रम मनुष्य की सक्रियता का प्रमुख और बुनियादी रूप है। श्रम के बिना मानवजाति का अस्तित्व कभी का ख़त्म हो गया होता। इसलिए श्रम को लोगों के जैविक जातिगत व्यवहार का एक विशिष्ट रूप कहा जा सकता है, जो उनकी उत्तरजीविता, अन्य जैविक जातियों पर विजय और प्रकृति की शक्तियों व संसाधनों का विवेकसंगत उपयोग सुनिश्चित करता है।

श्रम-सक्रियता के लक्ष्य वे वस्तुएं हो सकती हैं, जिन्हें लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है और जो ऐसी उपभोज्य वस्तुओं, मसलन रोटी, मशीनों, फ़र्नीचर, उपकरणों, कपड़ों, कारों, आदि के उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। श्रम का उद्देश्य ऊर्जा ( ताप, प्रकाश, विद्युत, गति आदि ) और सूचना-साधनों ( पुस्तकों, चित्रों, फ़िल्मों, आदि ) का उत्पादन भी है। उसके परिणाम वैचारिक उत्पाद ( वैज्ञानिक अविष्कार, कलाकृतियां, विचार, आदि ) और लोगों के व्यवहार तथा श्रम के संगठन की ओर लक्षित क्रियाएं ( प्रबंधन, नियंत्रण, संरक्षण, शिक्षा, आदि ) भी हो सकते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि श्रम के उत्पाद व्यक्ति द्वारा अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि के लिए ही इस्तेमाल किये जाएं। मुख्य यह है कि उत्पाद समग्रतः समाज की आवश्यकता हो। इसलिए मनुष्य की व्यष्टिक सक्रियता के लक्ष्य उसकी अपनी ही आवश्यकताओं से निर्धारित नहीं होते। व्यक्ति के लिए उन्हें समाज तय करता है और इसलिए व्यक्ति की सक्रियता बहुत कुछ एक निश्चित सार्वजनिक दायित्व की पूर्ति जैसी बन जाती है। मनुष्य की सक्रियता बुनियादी तौर पर सामाजिक सक्रियता है और इसे समाज की आवश्यकताएं प्रेरित, निदेशित तथा नियमित करती हैं।

श्रम के सामाजिक स्वरूप का एक महत्त्वपूर्ण पहलू और भी है। आज के समाज में श्रम के विभाजन के कारण व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएं स्वयं नहीं पैदा करता, न वह कभी किसी वस्तु के उत्पादन की शुरू से लेकर आख़िर तक सारी प्रक्रिया में भाग ही लेता है। इस कारण व्यक्ति को अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक सब कुछ समाज से अपने श्रम के एवज़ में पाना होता है। वैसे भी व्यक्ति की आवश्यकताओं की तुष्टि समाज द्वारा, न कि उसके अपने श्रम द्वारा, की जाती है। तुष्टि के इस विशिष्ट तरीक़े का स्रोत समाज में प्रचलित उत्पादन-संबंधों की पद्धति है। इसलिए समाज में किसी भी चीज़ का उत्पादन साथ ही, लोगों के बीच श्रम की प्रक्रिया में और उसके उत्पादों के वितरण, विनिमय तथा उपभोग के दौरान निश्चित संबंधों का निर्माण भी है।

मनुष्य द्वारा श्रम-सक्रियता के दौरान की जानेवाली क्रियाएं उसकी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं द्वारा नहीं, बल्कि उत्पादन के लक्ष्य द्वारा और इस लक्ष्य को पाने के दौरान अन्य लोगों से बने संबंधों के द्वारा निर्धारित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का निष्पादन तथा नियमन कर पाने के लिए मनुष्य को सूचना का संसाधन करने की उच्चतर प्रक्रियाओं, विशेषतः कल्पना और चिंतन का उपयोग करना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि मानव मन की इन असामान्य योग्यताओं के स्रोत का स्पष्टीकरण करने के लिए ‘आत्मा’ के किन्हीं विशेष गुणधर्मों का आविष्कार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इन योग्यताओं का स्रोत और कोई नहीं, बल्कि मनुष्य की सक्रियता की नियमसंगतियां ही हैं। दूसरे शब्दों में, वे श्रम करने वाले सामाजिक प्राणी के रूप में मानव के अस्तित्व की ही उपज हैं।

मानवजाति के इतिहास में सामूहिक श्रम-सक्रियता ने मनुष्य से अपनी उच्चतम मानसिक क्षमताओं के उपयोग की मांग करते हुए साथ ही उन क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यक पूर्वापेक्षाएं तथा परिस्थितियां भी पैदा की हैं।

उदाहरण के लिए, आदिम शिकारी यूथ में हांका करनेवाले के व्यवहार को लें। उसकी क्रियाएं अपने आप में शिकार को पकड़ने की ओर लक्षित नहीं होती थीं। इतना ही नहीं, यदि वह अकेला होता , तो परिणाम उल्टा ही निकलता, शिकार आसानी से बच निकलता और वह भूखा ही रह जाता। उसकी सारी सक्रियता सार्थक तभी बनती है, जब वह अन्य शिकारियों की सक्रियता के साथ संपन्न की जाती है। इस लक्ष्य को पाने के लिए हांका करनेवाले को शिकारियों की क्रियाओं को भी ध्यान में रखना पड़ता था, यानि हिरण का पीछा करने के साथ-साथ उसे शिकारियों की ओर खदेड़ना भी पड़ता था।

इस तरह उसके लक्ष्य ने अपना जैविक अर्थ खो दिया और सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लिया। वह अब आंतरिक सहजवृत्तिमूलक अनुभवों के रूप में नहीं, बल्कि बाह्य वस्तुओं पर क्रियाओं के अवबोधन के जरिए अपने को प्रकट करता था। इस तरह मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप ने ही वस्तुओं और वस्तुसापेक्ष क्रियाओं के बिंबों को मनुष्य को सक्रियता के लिए उकसानेवाली जैव आवश्यकताओं के अनुभव से पृथक किया।

श्रम की जो मुख्य विशेषता उसे प्राकृतिक उत्पादों के साधारण हस्तगतकरण से भिन्न बनाती है, वह औजारों का निर्माण तथा प्रयोग, यानि कुछ वस्तुओं के ज़रिए अन्य वस्तुओं पर काम करना है। इस तरह श्रम एक दूसरे के संबंध में वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों को प्रकट करता है। हर प्रकार की श्रम-सक्रियता वस्तुओं के जैव महत्त्व की बजाए इन यथार्थ गुणधर्मों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, हड्डी का बल्लम-सिरा बनाने के लिए हड्डियों की आपेक्षिक कठोरता को ध्यान में रखना पड़ता है, न कि उनके खाद्य गुण को। हड्डी की वस्तुओं के निर्माण के लिए आवश्यक क्रियाएं हड्डियों के इन यथार्थ गुणधर्मों से निदेशित होती हैं, न कि उनके स्वाद अथवा पौष्टिकता से।

इस प्रकार वस्तुओं के नये अर्थ और उनके प्रति नये रवैये, मनुष्य की व्यावहारिक सक्रियता और सामाजिक श्रम से पैदा हुए हैं। सामूहिक सक्रियता वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों में भेद करती है, उसकी बदौलत लोग आपस में जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उन्हें वाक् नामक विशेष संप्रेषणात्मक क्रियाओं में ठोस रूप देते हैं। सामूहिक सक्रियता के माध्यम से ही व्यक्ति अपने को और अन्य व्यक्तियों को सक्रियता में भाग लेने वाले के रूप में जान सकता है। इसके अलावा, यह भी सामूहिक सक्रियता ही है कि जो मनुष्य को अपने सामने निश्चित प्रात्ययिक लक्ष्य रखना और सामाजिक अनुभव को अपनी क्रियाओं में मार्गदर्शन के लिए इस्तेमाल करना सिखाती है।

यथार्थ के प्रति यह रवैया ही चेतना का आधार है। वही मनुष्य को वस्तुओं के संबंध में सक्रियता का कर्ता और लोगों के संबंध में व्यक्ति बनाती है। यह रवैया ही मनुष्य को परिवेशी विश्व के दास से उसके स्वामी में परिणत करता है, उसे इस विश्व का रूपांतरण करने तथा दूरस्थ लक्ष्यों की ओर बढ़ने में समर्थ बनाता है और उसकी क्रियाओं को सचेतन, सुनियोजित सक्रियता में तथा पृथ्वी पर उसके अनुकूलनमूलक अस्तित्व को अर्थपूर्ण तथा उदात्त लक्ष्योंवाले सक्रिय जीवन में रूपांतरित करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

चेतना के आधार के रूप में श्रम

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजक रेखा को, उनके मानस के तात्विक अंतरों को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम, मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम की महत्वपूर्णता और उपयोगिता पर विचार करेंगे।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
००००००००००००००००००००००००००००००००

चेतना के आधार के रूप में श्रम

पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के मानस में भेदों को समझने की कोशिश की थी। परंतु, इसका क्या कारण है कि जानवरों में चिंतन के केवल प्रारंभिक रूप होते हैं और वे ना तो समस्याओं को हल कर सकते हैं. ना उन कार्यों को कर सकते हैं, जिन्हें मनुष्य कर सकता है, करता है? दरअसल काम के कारण मनुष्य का चिंतन और चेतना जानवरों के मानसिक क्रियाकलाप से गुणात्मक रूप से भिन्न है। किंतु क्या यह सुनिश्चित है कि जानवर काम नहीं कर सकते?

एक विशेष प्रकार का उकाब अपनी चोंच में एक गोल पत्थर उठाए, शुतुरमुर्ग के अंडे के ऊपर उड़ता है, और उसे गिराकर अंड़े को तोड लेता है, जिसे वह अपनी चोंच से तोड़ने में असमर्थ था। चिंपाजी ऊंचाई में लटके हुए केलों को तोडने के लिए एक छड़ी या ड़ड़े का तत्परता से इस्तेमाल कर लेते हैं। उद्यमी मधुमक्खियों तथा चींटियों के बारे में अनेक कथाएं गढ़ी गयी हैं। परंतु इस सब के बावज़ूद, जानवर काम ( यानि श्रम ) नहीं करते। वे जीवित रहने, भोजन पाने, अपने प्राकृतिक अंगों ( दांतों, पंजों, चोंचों, आदि ) से घोंसले औए बिल बनाने के लिए आवश्यक प्राकृतिक सामग्री को ही काम में लाते हैं।

मनुष्य के काम का विशिष्ट लक्षण यह है कि वह अपने और प्रकृति के बीच औज़ारों को ले आता है। मनुष्य औज़ारों के जरिए प्रकृति से प्राप्त सामग्री का अनुकूल इस्तेमाल ही नहीं करता, बल्कि उसमें फेरबदल भी करता है और उसे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक विशेष रूप प्रदान करता है। श्रम की प्रक्रिया में वह प्रकृति का मानवीकरण करता है और अक्सर ऐसी वस्तुओं की भी रचना करता है, जिनका प्रकृति में कोई अस्तित्व नहीं होता।

प्रकृति के साथ जानवरों का संबंध अपरोक्ष ( direct ) होता है। जानवर स्वयं प्रकृति के अंग हैं। किंतु मनुष्य और प्रकृति के बीच उत्पादन के औज़ार हैं ( उपकरण, औज़ार, जटिल यांत्रिक विधियां और मशीनें )। इसलिए प्रकृति और मनुष्य के बीच का रिश्ता परोक्ष और व्यवहित ( indirect & mediated ) है, यानि उसे औज़ारों के द्वारा कार्यरूप दिया जाता है। इस तरह से मनुष्य अपने को प्रकृति से विलग कर लेता है और स्वयं को उसके मुकाबले में खड़ा कर लेता है। लेकिन क्या उकाब और चिंपाजी के उपरोक्त उदाहरण इसका खंड़न नहीं करते?

काम करने या श्रम की जिस प्रक्रिया से हमारे दूर के पूर्वज मनुष्यों में परिवर्तित हुए वह ठीक इसी काम के लिए विशेष औज़ारों को बनाने और ढ़ालने के साथ संबंधित थी, ना कि प्रकृति में आसानी से उपलब्ध वस्तुओं के उपयोग से। उकाब ने अपने पत्थर को बनाया-संवारा नहीं। चिंपाजी अपने ड़ंड़े को रंदे या छैनी से नहीं संवारता है। किंतु हमारे पुरानतम पूर्वजों तक ने पत्थर के आदिम औज़ार बनाए, वे एक पत्थर की मदद से दूसरे को संवारते थे। यही कारण है कि जानवरों के कोई भी क्रियाकलाप, जिनमें वे कभी-कभी प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करते हैं, मनुष्य के काम से गुणात्मक भिन्न होते हैं।

श्रम आसपास की वस्तुओं को रूपांतरित तथा उनमें फेर-बदल करना ही संभव नहीं बनाता, बल्कि स्वयं मनुष्य के रूपांतरण तथा विकास की और ले जाता है

परिवेशी परिस्थितियों के घातक परिवर्तन ने मनुष्य के पूर्वजों के लिए अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि बड़ी कठिन बना दी थी, जलवायु के बिगड़ते जाने के कारण आहार प्रचुर मात्रा में नहीं मिल पाता था। उनके सामने दो ही विकल्प थे, या तो एक जाति के तौर पर विलुप्त हो जाएं या फिर अपने व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन लाकर परिस्थितियों को अपने लिए बेहतर और अनुकूलित करें। आवश्यकता ने प्राज्ञ मानव के वानरसदृश पूर्वजों को सामूहिक श्रमपूर्व सक्रियता का सहारा लेने को विवश किया।

यूथ के भीतर मनुष्य के पुरखों का सहजवृत्तिमूलक संपर्क शनैः शनैः श्रम सक्रियता पर आधारित सहजीवन में विकसित हुआ। एक ही समुदाय के सदस्यों के आपसी संबंधों में यह परिवर्तन, यानि संयुक्त सक्रियता, सहजीवन और उत्पादों के विनिमय की शुरूआत, यूथ से समाज में संक्रमण का आधार और साधन बनीं। इस प्रकार श्रम की उत्पत्ति और समाज के निर्माण ने मनुष्य के वानराभ पूर्वजों का मानवीकरण किया

श्रम ने मानव चेतना के विकास को भी प्रेरित किया। कुछ निश्चित संक्रियाओं को सैंकड़ों हज़ारों वर्षों की अवधि में अरबों बार दोहराकर मनुष्य ने अपने अंगों विशेष रूप से हाथों, को परिष्कृत बनाया और इन्हीं अंगों की सक्रियता के कारण मस्तिष्क के विकास की अन्योन्यक्रिया भी शुरू हुई। श्रम-सक्रियता में मनुष्य का ध्यान बनाए जा रहे औज़ार पर, या औज़ारों द्वारा किये जा रहे प्रकृति में बदलाव पर, यानि अपनी सक्रियता पर संकेन्द्रित होता है। सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के मद्देनज़र यह जरूरी हो जाता है कि व्यक्ति अपनी सक्रियता कों आलोचनात्मक दृष्टि से देखे। इस तरह मनुष्य की सक्रियता, चेतना पर आधारित सक्रियता बन जाती है, फलतः चेतना के विकास का पूर्वाधार बनती है

अपनी सक्रियता से, श्रम से परिवेश को प्रभावित करते और बदलते हुए मनुष्य ने साथ ही अपनी प्रकृति को भी बदला। श्रम के प्रभाव से हाथ के नये प्रकार्य पैदा हुए, जिससे उसमें और भी परिष्कृतता आती गई, मस्तिष्क के साथ सटीक समन्वय से उसमें और भी दक्षता बढ़ती गई। हाथ न केवल पकड़ने का साधन, बल्कि स्वयं प्रकृति को, वस्तुपरक यथार्थ को जानने का उपकरण भी बन रहा था। श्रम के प्रभाव से सक्रिय हाथ शनैः शनैः सक्रिय स्पर्श से संबंधित एक विशेषिकृत अंग में परिवर्तित हो गया और स्पर्श, विश्व के संज्ञान का केवल मनुष्य द्वारा प्रयुक्त तरीका है। इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य का हाथ श्रम करने वाला अंग ही नहीं, श्रम का उत्पाद भी है

हाथ का विकास सारे शरीर के विकास के साथ हुआ। हाथ के कार्यों के विशेषीकरण से हमारे रोमिल पुरखों को खड़े होकर चलने की आदत ड़ालने में मदद मिली। काम करते हुए हाथों पर निरंतर आंखों का नियंत्रण रहता है, जो दृष्टि का अंग है। जाहिरा तौर पर दृष्टि और स्पर्श के बीच कई तादात्मयता पैदा हुई। और यह सब मस्तिष्क के जरिए हो रहा था। नये तंत्रिका केंद्रों के निर्माण के फलस्वरूप मस्तिष्क का आयतन ही नहीं बढ़ा, उसकी संरचना भी जटिलतर होती गई। मस्तिष्क के जो भाग हाथों की क्रिया का नियंत्रण करते हैं, वे ही मनुष्य की वाणी तथा भाषा का, जो मनुष्य की मानसिक क्रियाकलाप का केंद्र हैं, भी नियमन करते हैं।

अपनी बारी में, मस्तिष्क के विकास से, काम की प्रविधियों ( techniques ), औज़ार बनाने के तरीकों, सामूहिक अंतर्क्रिया की आदतों तथा परिवेशीय जगत के बारे में सूचनाओं का संचय करना और उन्हें आने वाली पीढ़ीयों को हस्तांतरित करना संभव हुआ। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य ने जिन विविध वस्तुओं में फेर-बदल तथा रूपांतरण किये, उनके अनुगुणों को जानने तथा उनका अध्ययन करने में मदद मिली। यह ऐसी चीज़ है, जो जानवरों की पहुंच से बाहर है।

इस प्रकार, श्रम की प्रक्रिया मानसिक क्रियाकलाप के उच्चतम रूप यानि चिंतन और चेतना का आधार बनी। अपने को प्रकृति से विलग करके मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी विरोधी स्थिति से ही अवगत नहीं हुआ, बल्कि यह भी जान गया कि वह चेतना युक्त विशेष प्राणी है और इसी कारण से अन्य जीवित प्राणियों से भिन्न है।

चेतना की उत्पत्ति का अर्थ था वास्तविकता के परावर्तन के एक उच्चतर रूप में संक्रमण। यह संक्रमण प्रकृति के प्रति अपने को निष्क्रियता से अनुकूलित करने के बजाए वास्तविकता को अपने अनुकूल बनाना और अपने लक्ष्यों के अनुरूप वास्तविकता में परिवर्तन करना तथा ऐसी वस्तुओं की रचना करना सीखने में निहित था, जो प्रकृति में नहीं होती। अपनी पीढ़ी का अनुभव अगली पीढ़ी को सिखाने, सहजातियों को श्रम-प्रणालियों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने और उनके बीच कार्यों का बंटवारा करने की आवश्यकता ने संप्रेषण की आवश्यकता पैदा की। सहजवृत्तियों की भाषा इसके लिए स्पष्टतः अपर्याप्त थी।

अतः श्रम के साथ और श्रम की प्रक्रिया में मानवीय भाषा भी उत्पन्न हुई, जो संप्रेषण का उच्चतर रूप है।
००००००००००००००००००००००००००००

अगली बार हम चेतना के विकास के एक और साधन के रूप में भाषा पर चर्चा करेंगे।
०००००००००००००००००००००

इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

कहानी आगे बढ़ती है…..

काफ़ी अन्तराल हो गया।
दरअसल, वर्तमान इतना उथल-पुथल भरा है कि मैं चश्मदीद होने का लोभ संवरण नहीं कर पाता।
चलिए, फिर से बात शुरू करते हैं।
मैं समय, आपको किस्से-कहानियां सुनाते हुए यह बताना चाहता था कि लोग मुझ तक क्यों नहीं पहुंच पाते।

तो हे मानव श्रेष्ठों,
कहानी आगे बढ़ती है…..

मनुष्य ने अपने लाखों वर्षों के एतिहासिक क्रमिक उदविकास के दौरान अपनी आज की लचीली और उन्नत शरीर संरचना को पाया है। शरीर के विभिन्न अंगों का नयी-नयी परिस्थितियों और कार्यों के लिए संचालन, संचालन क्रियाओं का दिमाग़ के साथ समन्वयन और आपसी अनुक्रिया, इन सबका उत्पाद है अत्यंत परिष्कृत मस्तिष्क संगठन और शारीरिक संरचना। यह सब कपि-मानव और उसके हाथ द्वारा किए गए श्रम का परिणाम है। श्रम का मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन।
मनुष्य अपने संचित अनुभवों को आगे वाली पीढी़ को देता था और इस प्रकार आने वाली पीढ़ियां उनका अतिक्रमण कर, अपने अनुभवों को और समृद्ध करती जाती थी। मनुष्य का ग्यान समृद्ध होता गया, भाषा और लिपी ने इस संचित ग्यान का आने वाली पीढ़ियों तक का संचरण और आसान व सटीक बना दिया। क्रमिक विकास की यह उर्ध्वगामी प्रक्रिया निरन्तर चलती रही, मनुष्य के क्रियाकलापों और अनुभवों के परिस्थितिजन्य क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होते गये।
मनुष्य जाति बिखर रही थी, विकास की प्रक्रिया बिखर रही थी, इस ग्रह की भौगोलिक परिस्थितियां बदल रही थी। शनैःशनैः मानव जाति का यह बिखराव एक दूसरे से काफ़ी विलगित हो गया और पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विकास श्रृंखलाएं स्थापित हो गयी। परिस्थितिजन्य संघर्षों और आवश्यकताओं के अनुरूप, विकास की यह प्रक्रिया कहीं लगभग स्थिर हो गयी, कहीं धीमी, तो कहीं गुणात्मक रूप से काफ़ी तेज़ हो गयी। यह स्थिति आज भी बनी हुई है, और मनुष्य अपने नीले ग्रह के अलग-अलग स्थानों पर मानव जाति के क्रमिक विकास की अलग-अलग अवस्थाओं की समानान्तर उपस्थिति पाते हैं। कहीं कहीं तो यह बिल्कुल आदिम अवस्थाओं में हैं।
कुलमिलाकर लाबलुब्बोआब यह है कि मनुष्य को एक सुसंगठित मस्तिष्क और परिष्कृत शारीरिक संरचना, गुणसूत्रीय संरक्षण के जरिए विरासत में मिलती है, जिसमें भरपूर विकास की असीम भौतिक संभावनाएं मौजूद होती हैं। परन्तु इस परिष्कृत शारीरिक संरचना और सुसंगठित मस्तिष्क संरचना का क्रियान्वयन और नियमन उसे विरासत में नहीं मिलता, इस हेतु वह विकास की एक निश्चित प्रक्रिया से गुजरता है जहां वह परिवेशी समाज की सहायता से अपनी शारीरिक और मानसिक क्रियाकलापों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से नियमित और परिष्कृत करना सीखता है, और इसे इस तरह देखना काफ़ी रोमांचक रहेगा कि इस प्रक्रिया के दौरान, यानि पैदा होने से लेकर विकसित युवा होने तक, मनुष्य अपने जीवन में मानवजाति के पूरे इतिहास को छोटे रूप में क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।
आज इतना ही,
दिमाग़ पर ज़ोर धीरे-धीरे ही डालना चाहिये, इसी पर सोचिए, कोई असमंजस हो तो समय को बताइए।
अगली बार इस प्रसंग को पूरा करके ही दम लेंगे।