चेतना के आधार के रूप में श्रम

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजक रेखा को, उनके मानस के तात्विक अंतरों को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम, मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम की महत्वपूर्णता और उपयोगिता पर विचार करेंगे।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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चेतना के आधार के रूप में श्रम

पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के मानस में भेदों को समझने की कोशिश की थी। परंतु, इसका क्या कारण है कि जानवरों में चिंतन के केवल प्रारंभिक रूप होते हैं और वे ना तो समस्याओं को हल कर सकते हैं. ना उन कार्यों को कर सकते हैं, जिन्हें मनुष्य कर सकता है, करता है? दरअसल काम के कारण मनुष्य का चिंतन और चेतना जानवरों के मानसिक क्रियाकलाप से गुणात्मक रूप से भिन्न है। किंतु क्या यह सुनिश्चित है कि जानवर काम नहीं कर सकते?

एक विशेष प्रकार का उकाब अपनी चोंच में एक गोल पत्थर उठाए, शुतुरमुर्ग के अंडे के ऊपर उड़ता है, और उसे गिराकर अंड़े को तोड लेता है, जिसे वह अपनी चोंच से तोड़ने में असमर्थ था। चिंपाजी ऊंचाई में लटके हुए केलों को तोडने के लिए एक छड़ी या ड़ड़े का तत्परता से इस्तेमाल कर लेते हैं। उद्यमी मधुमक्खियों तथा चींटियों के बारे में अनेक कथाएं गढ़ी गयी हैं। परंतु इस सब के बावज़ूद, जानवर काम ( यानि श्रम ) नहीं करते। वे जीवित रहने, भोजन पाने, अपने प्राकृतिक अंगों ( दांतों, पंजों, चोंचों, आदि ) से घोंसले औए बिल बनाने के लिए आवश्यक प्राकृतिक सामग्री को ही काम में लाते हैं।

मनुष्य के काम का विशिष्ट लक्षण यह है कि वह अपने और प्रकृति के बीच औज़ारों को ले आता है। मनुष्य औज़ारों के जरिए प्रकृति से प्राप्त सामग्री का अनुकूल इस्तेमाल ही नहीं करता, बल्कि उसमें फेरबदल भी करता है और उसे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक विशेष रूप प्रदान करता है। श्रम की प्रक्रिया में वह प्रकृति का मानवीकरण करता है और अक्सर ऐसी वस्तुओं की भी रचना करता है, जिनका प्रकृति में कोई अस्तित्व नहीं होता।

प्रकृति के साथ जानवरों का संबंध अपरोक्ष ( direct ) होता है। जानवर स्वयं प्रकृति के अंग हैं। किंतु मनुष्य और प्रकृति के बीच उत्पादन के औज़ार हैं ( उपकरण, औज़ार, जटिल यांत्रिक विधियां और मशीनें )। इसलिए प्रकृति और मनुष्य के बीच का रिश्ता परोक्ष और व्यवहित ( indirect & mediated ) है, यानि उसे औज़ारों के द्वारा कार्यरूप दिया जाता है। इस तरह से मनुष्य अपने को प्रकृति से विलग कर लेता है और स्वयं को उसके मुकाबले में खड़ा कर लेता है। लेकिन क्या उकाब और चिंपाजी के उपरोक्त उदाहरण इसका खंड़न नहीं करते?

काम करने या श्रम की जिस प्रक्रिया से हमारे दूर के पूर्वज मनुष्यों में परिवर्तित हुए वह ठीक इसी काम के लिए विशेष औज़ारों को बनाने और ढ़ालने के साथ संबंधित थी, ना कि प्रकृति में आसानी से उपलब्ध वस्तुओं के उपयोग से। उकाब ने अपने पत्थर को बनाया-संवारा नहीं। चिंपाजी अपने ड़ंड़े को रंदे या छैनी से नहीं संवारता है। किंतु हमारे पुरानतम पूर्वजों तक ने पत्थर के आदिम औज़ार बनाए, वे एक पत्थर की मदद से दूसरे को संवारते थे। यही कारण है कि जानवरों के कोई भी क्रियाकलाप, जिनमें वे कभी-कभी प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करते हैं, मनुष्य के काम से गुणात्मक भिन्न होते हैं।

श्रम आसपास की वस्तुओं को रूपांतरित तथा उनमें फेर-बदल करना ही संभव नहीं बनाता, बल्कि स्वयं मनुष्य के रूपांतरण तथा विकास की और ले जाता है

परिवेशी परिस्थितियों के घातक परिवर्तन ने मनुष्य के पूर्वजों के लिए अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि बड़ी कठिन बना दी थी, जलवायु के बिगड़ते जाने के कारण आहार प्रचुर मात्रा में नहीं मिल पाता था। उनके सामने दो ही विकल्प थे, या तो एक जाति के तौर पर विलुप्त हो जाएं या फिर अपने व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन लाकर परिस्थितियों को अपने लिए बेहतर और अनुकूलित करें। आवश्यकता ने प्राज्ञ मानव के वानरसदृश पूर्वजों को सामूहिक श्रमपूर्व सक्रियता का सहारा लेने को विवश किया।

यूथ के भीतर मनुष्य के पुरखों का सहजवृत्तिमूलक संपर्क शनैः शनैः श्रम सक्रियता पर आधारित सहजीवन में विकसित हुआ। एक ही समुदाय के सदस्यों के आपसी संबंधों में यह परिवर्तन, यानि संयुक्त सक्रियता, सहजीवन और उत्पादों के विनिमय की शुरूआत, यूथ से समाज में संक्रमण का आधार और साधन बनीं। इस प्रकार श्रम की उत्पत्ति और समाज के निर्माण ने मनुष्य के वानराभ पूर्वजों का मानवीकरण किया

श्रम ने मानव चेतना के विकास को भी प्रेरित किया। कुछ निश्चित संक्रियाओं को सैंकड़ों हज़ारों वर्षों की अवधि में अरबों बार दोहराकर मनुष्य ने अपने अंगों विशेष रूप से हाथों, को परिष्कृत बनाया और इन्हीं अंगों की सक्रियता के कारण मस्तिष्क के विकास की अन्योन्यक्रिया भी शुरू हुई। श्रम-सक्रियता में मनुष्य का ध्यान बनाए जा रहे औज़ार पर, या औज़ारों द्वारा किये जा रहे प्रकृति में बदलाव पर, यानि अपनी सक्रियता पर संकेन्द्रित होता है। सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के मद्देनज़र यह जरूरी हो जाता है कि व्यक्ति अपनी सक्रियता कों आलोचनात्मक दृष्टि से देखे। इस तरह मनुष्य की सक्रियता, चेतना पर आधारित सक्रियता बन जाती है, फलतः चेतना के विकास का पूर्वाधार बनती है

अपनी सक्रियता से, श्रम से परिवेश को प्रभावित करते और बदलते हुए मनुष्य ने साथ ही अपनी प्रकृति को भी बदला। श्रम के प्रभाव से हाथ के नये प्रकार्य पैदा हुए, जिससे उसमें और भी परिष्कृतता आती गई, मस्तिष्क के साथ सटीक समन्वय से उसमें और भी दक्षता बढ़ती गई। हाथ न केवल पकड़ने का साधन, बल्कि स्वयं प्रकृति को, वस्तुपरक यथार्थ को जानने का उपकरण भी बन रहा था। श्रम के प्रभाव से सक्रिय हाथ शनैः शनैः सक्रिय स्पर्श से संबंधित एक विशेषिकृत अंग में परिवर्तित हो गया और स्पर्श, विश्व के संज्ञान का केवल मनुष्य द्वारा प्रयुक्त तरीका है। इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य का हाथ श्रम करने वाला अंग ही नहीं, श्रम का उत्पाद भी है

हाथ का विकास सारे शरीर के विकास के साथ हुआ। हाथ के कार्यों के विशेषीकरण से हमारे रोमिल पुरखों को खड़े होकर चलने की आदत ड़ालने में मदद मिली। काम करते हुए हाथों पर निरंतर आंखों का नियंत्रण रहता है, जो दृष्टि का अंग है। जाहिरा तौर पर दृष्टि और स्पर्श के बीच कई तादात्मयता पैदा हुई। और यह सब मस्तिष्क के जरिए हो रहा था। नये तंत्रिका केंद्रों के निर्माण के फलस्वरूप मस्तिष्क का आयतन ही नहीं बढ़ा, उसकी संरचना भी जटिलतर होती गई। मस्तिष्क के जो भाग हाथों की क्रिया का नियंत्रण करते हैं, वे ही मनुष्य की वाणी तथा भाषा का, जो मनुष्य की मानसिक क्रियाकलाप का केंद्र हैं, भी नियमन करते हैं।

अपनी बारी में, मस्तिष्क के विकास से, काम की प्रविधियों ( techniques ), औज़ार बनाने के तरीकों, सामूहिक अंतर्क्रिया की आदतों तथा परिवेशीय जगत के बारे में सूचनाओं का संचय करना और उन्हें आने वाली पीढ़ीयों को हस्तांतरित करना संभव हुआ। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य ने जिन विविध वस्तुओं में फेर-बदल तथा रूपांतरण किये, उनके अनुगुणों को जानने तथा उनका अध्ययन करने में मदद मिली। यह ऐसी चीज़ है, जो जानवरों की पहुंच से बाहर है।

इस प्रकार, श्रम की प्रक्रिया मानसिक क्रियाकलाप के उच्चतम रूप यानि चिंतन और चेतना का आधार बनी। अपने को प्रकृति से विलग करके मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी विरोधी स्थिति से ही अवगत नहीं हुआ, बल्कि यह भी जान गया कि वह चेतना युक्त विशेष प्राणी है और इसी कारण से अन्य जीवित प्राणियों से भिन्न है।

चेतना की उत्पत्ति का अर्थ था वास्तविकता के परावर्तन के एक उच्चतर रूप में संक्रमण। यह संक्रमण प्रकृति के प्रति अपने को निष्क्रियता से अनुकूलित करने के बजाए वास्तविकता को अपने अनुकूल बनाना और अपने लक्ष्यों के अनुरूप वास्तविकता में परिवर्तन करना तथा ऐसी वस्तुओं की रचना करना सीखने में निहित था, जो प्रकृति में नहीं होती। अपनी पीढ़ी का अनुभव अगली पीढ़ी को सिखाने, सहजातियों को श्रम-प्रणालियों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने और उनके बीच कार्यों का बंटवारा करने की आवश्यकता ने संप्रेषण की आवश्यकता पैदा की। सहजवृत्तियों की भाषा इसके लिए स्पष्टतः अपर्याप्त थी।

अतः श्रम के साथ और श्रम की प्रक्रिया में मानवीय भाषा भी उत्पन्न हुई, जो संप्रेषण का उच्चतर रूप है।
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अगली बार हम चेतना के विकास के एक और साधन के रूप में भाषा पर चर्चा करेंगे।
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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय