व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग” पर चर्चा शुरू करते हुए ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) – २
the individual, particular and general ( universal ) – 2

main-qimg-15080eaa6d9ffcd547a8be1d536028dcव्यष्टिक और सार्विक अंतर्संबंधित हैं। प्रत्येक व्यष्टिक ( किसी न किसी तरह ) सार्विक है। प्रत्येक सार्विक व्यष्टिक ( उसका एक टुकड़ा, या एक पहलू, अथवा उसका सार ) है। व्यष्टिक केवल उस संपर्क में अस्तित्व रखता है, जो सार्विक की ओर जाता हैसार्विक केवल व्यष्टिक में और व्यष्टिक के द्वारा अस्तित्व में आता है। सामान्य था व्यष्टिक के साथ उसके अंतर्संबंध की यह द्वंद्वात्मक-भौतिकवादी समझ वास्तविकता के सही ज्ञान के वास्ते बहुत महत्त्वपूर्ण है। सामान्य, वस्तुओं के सार ( essence ) से बद्धमूल होता है और उनकी आंतरिक एकता की एक अभिव्यक्ति होता है। यही कारण है कि वस्तुओं तथा घटनाओं के सार को तथा उनके विकास के नियमों को समझने का तरीक़ा सामान्य को समझना है। और सामान्य को केवल व्यष्टिक के द्वारा ही समझा जा सकता है।

स्वयं यथार्थता में सार्विक, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन ( dialectical connection ) होता है। सार्विक और विशेष, व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सार्विक विद्यमान होता है। यह उसूल ( principle ) प्रकृति, समाज तथा चिंतन में अनुप्रयोज्य ( applicable ) है। प्रत्येक पौधा तथा जंतु सामान्य जैविक नियमों के अंतर्गत होता है और साथ ही ऐसे विशिष्ट नियमों से भी संनियमित ( governed ) होता है, जो केवल उसकी प्रजातियों ( species ) के लिए ही लाक्षणिक होते हैं। इसके साथ ही साथ सार्विक और विशिष्ट, व्यष्टिक के बगैर तथा उससे पृथक ( separate ) रूप में विद्यमान नहीं होते हैं। समाज के सार्विक प्रतिमान ( general patterns ) पृथक श्रम समूहों के क्रियाकलाप में तथा उन समूहों की रचना करनेवाले व्यक्तियों के क्रियाकलाप में व्यक्त होते हैं।

एक मनुष्य, शुरू में, अपने संवेद अंगों से व्यष्टिक का, अलग-अलग घटनाओं का और उनके विविध अनुगुणों का बोध प्राप्त करता है, फिर उसका चिंतन इन अवबोधनों का विश्लेषण ( analysis ) करता है, आवश्यक को अनावश्यक से, सामान्य को व्यष्टिक से पृथक करता है। उसके बाद चिंतन, घटनाओं के एक समुच्चय के सामान्य और आवश्यक लक्षणों के संश्लेषण ( synthesis ) और सम्मेल के द्वारा इन घटनाओं के बारे में एक धारणा ( notion, concept ) बनाता है, जो घटनाओं के समुच्चय के सामान्य और साथ ही आवश्यक लक्षणों को व्यक्त करती है। कुलमिलाकर, संज्ञान की प्रक्रिया व्यष्टिक से शुरू होती है, विशिष्ट से गुजरती हुई सामान्य व सार्विक पर पहुंचती है

व्यष्टिक और सामान्य के प्रवर्ग ( categories ), नूतन ( new ) की उत्पत्ति की प्रक्रिया को समझने मे भी सहायक है। मुद्दा यह है कि नूतन प्रकृति और समाज में अक्सर तुरंत उत्पन्न नहीं होता है। शुरू में यह व्यष्टिक के रूप में पैदा होता है, फिर दृढ़ व साकार होकर विशिष्ट बन जाता है और अंततः सामान्य और सार्विक तक बन जाता है। सारे नये उपक्रम और आंदोलन इसी तरह उपजते हैं, इसी तरह से क्रांतिकारी चेतना उत्पन्न व सुदृढ़ होती है।

इस तरह से हम अब यह आसानी से समझ सकते हैं कि यदि हम ‘व्यष्टिक’ की विशषताओं की अवहेलना ( neglect ) करते है और बदलती हुई दशाओं और परिस्थितियों की परवाह किये बग़ैर ‘सामान्य’ के उपयोग पर बल देते हैं, तो हम नयी परिस्थितियों के समुचित विश्लेषण के बिना सामान्य फ़ार्मूलों को महज़ दोहराते रह जाएंगे और इस तरह जीवन तथा समाज के साथ अपने संपर्कों से हाथ धो बैठ सकते हैं। सामान्य की भूमिका से इन्कार तथा विशिष्ट और व्यष्टिक पर अनुचित ज़ोर देने से भी ऐसी ही गंभीर ग़लतियां हो सकती हैं। इसलिए व्यष्टिकता और सामान्यता के द्वंद्व को समुचित रूप से हल करके ही हम जीवन और समाज में सफल हस्तक्षेपों ( interventions ) के वाहक हो सकते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग” पर चर्चा शुरू करते हुए ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात किया था, इस बार हम ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) – १
the individual, particular and general ( universal ) – 1

210-009यह जानने के लिए अपने चारो तरफ़ की वस्तुओं पर एक नज़र डालना ही काफ़ी है कि वे सब, किसी न किसी तरह, एक दूसरे से भिन्न ( differ ) हैं। वस्तुओं और घटनाओं की गुणात्मक विविधता ( qualitative diversity ) पर विचार करते हुए हम जानते हैं कि वे एक दूसरे से भिन्न होती हैं। दुनिया में दो पूर्णतः अनुरूप वस्तुएं नहीं होती। यहां तक कि बिलियर्ड की दो समरूप ( identical ) गेंदे भी जब सूक्ष्मता से तोली जाती हैं तो उनके बीच एक ग्राम के हज़ारवें अंश का अंतर होता है। हालांकि क्वांटम यांत्रिकी इस बात की पुष्टि करती है कि एकसमान नाम के प्राथमिक कण एक दूसरे से अविभेद्य ( indistinguishable ) होते हैं, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी प्रदत्त क्षण ( given moment ) पर वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर हो सकते हैं और भिन्न परमाणुओं की रचना कर सकते हैं। यही नहीं, पृथ्वी के अरबों मनुष्यों में भी दो ऐसे आदमी नहीं होते, जिनकी उंगलियों की छाप एक-सी हो। बेशक, सर्वोपरि बात यह है कि वस्तु, लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं।

संक्षेप में हमारे गिर्द सारी घटनाओं और प्रक्रियाओं में अनूठे लक्षण ( features ) और गुण-विशेष ( attribute ) होते हैं, जो कमोबेश हद तक उनमें अंतर्निहित ( inherent ) होते हैं, यानि उनमें व्यष्टिकता ( individuality ) होती है। एक वस्तु को दूसरी वस्तुओं से भिन्न बनानेवाले इन्हीं अलग-अलग लक्षणों का साकल्य “व्यष्टिक” ( individual ) कहलाता है। ऐसे लक्षणों के आधार पर ही, उदाहरण के लिए, हज़ारों लोगों के बीच से अपने परिचित को अलग पहचाना जा सकता है, वस्तुओं के अंबार में से भी अपनी इच्छित वस्तु अलग पहचानी जा सकती है।

लेकिन विभिन्न वस्तुएं विशिष्ट और भिन्न ही नहीं, बल्कि कई मामलों में एक दूसरी के समान भी होती हैं। ऐसी कोई वस्तुएं नहीं हैं, जिनमें कुछ न कुछ आपसी समानता न हो। जिस हालत में विभिन्न वस्तुओं के बीच कुछ भी समानता नहीं दिखाई देती, उस हालत में भी किंचित गहरी जांच करने पर उनमें कुछ मूल अनुगुणों ( properties ) तथा गुणों ( qualities ) की समानता अवश्य दिखाई देगी। मसलन, सारे लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं, लेकिन उन सभी में कुछ ऐसे लक्षण होते हैं, जो उन सबको मनुष्य बनाते हैं। हरेक मनुष्य इस पृथ्वी पर अनेक मनुष्यों के साथ रहता है और हजारों विविध संयोजनों तथा समानताओं से उनके साथ अंतर्संबंधित ( interrelated ) होता है। एक मनुष्य की शारीरिक बनावट तथा शारीरिक क्रियाएं अन्य मनुष्यों के समान होती हैं। अन्य लोगों की तरह वह भी महसूस कर सकता है, सोच, बोल व काम कर सकता है। वह एक निश्चित नस्ल और जाति का होता है और उसमें तदनुरूप विशेषताएं होती हैं। वह एक निश्चित वर्ग ( class ) या सामाजिक श्रेणी का भी होता है और उनके विशिष्ट लक्षणों को परावर्तित ( reflect ) करता है, आदि-आदि।

इस तरह व्यष्टिक घटनाओं में ऐसे गुण-विशेष ( attribute ) और अनुगुण होते हैं जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) ही नहीं करते, बल्कि उन्हें एक दूसरे के समान ( similar ) भी बनाते हैं। इस आधार पर हम उन्हें विभिन्न समूहों ( groups ) में रख सकते हैं और समूह के सामूहिक लक्षण निश्चित कर सकते हैं। घटनाओं और प्रक्रियाओं के कुछ समुच्चयों में अंतर्निहित वस्तुगत विशेषताओं ( objective traits ) तथा अनुगुणों को प्रवर्ग ‘विशेष’ या “विशिष्ट” ( particular ) से परावर्तित किया जाता है

वस्तुओं के समुच्चय के समान, अनुरूपी, पुनरावर्ती ( recurring ) लक्षण सामान्य के रूप में व्यक्त होते हैं। घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के पृथक समूहों में अंतर्निहित अनुगुणों और गुण-विशेषों के साथ ही वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) में प्रदत्त क़िस्म की सारी घटनाओं तथा प्रक्रियाओं की लाक्षणिक विशेषताएं, अनुगुण और संबंध भी होते हैं। उन्हें “सामान्य” या “सार्विक” ( general or common ) प्रवर्ग से परावर्तित किया जाता है। जैसा कि उपरोक्त उदाहरण से जाहिर है, वस्तुओं के सर्वनिष्ठ अनुगुण या पहलू हमेशा पहली ही निगाह में स्पष्ट नहीं होते। वे उनके समान उद्‍गम ( origin ), एक ही विकास-नियमों, आदि में बद्धमूल ( rooted ) हो सकते हैं।

इसके साथ ही सामान्यता की कोटि ( degree ) में भी अंतर हो सकता है। मसलन, पेड़ होने का अनुगुण, आम का या खजूर का पेड़ होने के अनुगुण के मुक़ाबले अधिक सामान्य है। लेकिन एक वनस्पति होने की ख़ासियत के मामले में वह कम सामान्य है। अधिक सामान्य अनुगुण की तुलना में कम सामान्य, विशिष्ट के रूप में व्यक्त होता है। इस मामले में पेड़ एक विशिष्ट वनस्पति है। जो अनुगुण और लक्षण सारे गोचर ( visible ) विषयों में, बिना अपवाद, अंतर्निहित होते हैं उन्हें सबसे ज़्यादा सामान्य या सार्विक ( universal ) कहा जाता है। द्वंद्ववाद ( dialectics ) वस्तुओं और घटनाओं के विकास के इन्हीं सार्विक लक्षणों का अध्ययन करता है और वे उसके नियमों व प्रवर्गों में परावर्तित होते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय