संज्ञान में व्यवहार की भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम सत्य के ही संदर्भों में संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


संज्ञान में व्यवहार की भूमिका
( the role of practice in knowing )

images (3)यह समझने के बाद कि सत्य क्या है, अब यह पूछा जा सकता कि वस्तुगत सत्य ( objective truth ) को कैसे प्रमाणित किया जाता है, उसे कैसे परखा जाता है और उसे किससे निष्कर्षित ( drawn ) किया जाता है तथा सत्य और असत्य ज्ञान ( knowledge ) के बीच कैसे भेद किया जाता है। हालांकि हम यहां पहले ही इस पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं फिर भी एक बार पुनः संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का इस उदेश्य से भी समाहार कर लेते हैं।

मानव क्रियाकलाप का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूप व्यवहार ( practice ) है। यह हमारे परिवेशीय जगत, प्रकृति और समाज को रूपांतरित ( transform ) करने की ओर लक्षित, संवेदनात्मक भौतिक क्रिया ( sensual material activity ) है और संज्ञान की प्रक्रिया सहित सामाजिक व बौद्धिक क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों ( forms ) का आधार है। फलतः व्यवहार में केवल श्रम ( labour ) की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि समाज को रूपांतरित करने के जनगण के सारे कार्यकलाप भी शामिल हैं। हम व्यवहार को मुख्यतः इस दृष्टिकोण से तो समझते ही हैं कि यह मानव चिंतन और सामाजिक क्रियाकलाप की क्षमता के विकास तथा परिष्करण ( perfecting ) को कैसे प्रभावित करता है। व्यवहार का दूसरा पहलू ( aspect ) यह है कि संज्ञानात्मक ( cognitive ) क्रियाकलाप में व्यवहार की बुनियादी ( fundamental ) भूमिका होती है, यह व्यवहार ही है जो इस क्रियाकलाप को संभव बनाता है और सत्य ज्ञान को असत्य ज्ञान से विभेदित ( distinguish ) करता है

मनुष्य बाह्य जगत का महज़ प्रेक्षण ( observation ) या चिंतन-मनन ( contemplation ) मात्र नहीं करता, बल्कि अपनी जीवन क्रिया के, और सर्वोपरि श्रम की प्रक्रिया के दौरान उसे परिवर्तित तथा पुनर्निर्मित ( remake ) करता है। इसी प्रक्रिया में, समाज सहित भौतिक जगत के सारे अनुगुणों ( properties ) और संयोजनों ( connections ) का गहनतम ज्ञान प्राप्त होता है। अगर मनुष्य केवल चिंतन-मनन तथा निष्क्रिय प्रेक्षण तक सीमित रहता, तो यह ज्ञान मानव संज्ञान के लिए अलभ्य ( inaccessible ) होता। चूंकि मनुष्य का व्यवहार सतत गतिमान, परिवर्तनशील तथा निरंतर विकासमान है, इसलिए व्यावहारिक क्रियाकलाप में प्राप्त हमारा ज्ञान अधिक जटिल, सटीक ( exact ) और विकसित होता जाता है। फलतः व्यवहार ज्ञान का स्रोत ( source ) मात्र नहीं है, बल्कि उसके विकास और परिष्करण का आधार भी है

पिछली प्रविष्टियों में हम भली-भांति देख समझ चुके हैं कि वस्तुगत जगत के संवेदनात्मक बिंबों ( sense images ) की रचना ख़ुद ही, काफ़ी हद तक, मनुष्य के व्यावहारिक क्रियाकलाप पर और सारी संस्कृति पर निर्भर होती है। इस तरह व्यवहार, संज्ञान की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है और संवेदनात्मक ( sensory ) और अनुभवात्मक ( empirical ) ज्ञान के बनने के स्तरों पर प्रभाव डालने लगता है। संकल्पनाओं ( concepts ) और निर्णयों ( judgments ) की रचना पर तो इसका प्रभाव और भी स्पष्ट हो जाता है। हर मानसिक ( mental ) या बौद्धिक ( intellectual ) क्रिया, भौतिक वस्तुओं के साथ किये जानेवाले क्रियाकलाप यानी व्यवहार के प्रभावांतर्गत ही रूपायित ( shaped ) और विकसित होती है। जब संकल्पनाएं ( अपकर्षण abstraction ) तथा उनमें निहित कथनों ( statements ) की रचना प्रक्रिया पूरी हो जाती है और हमें यह फ़ैसला करना होता है कि कौनसे कथन सत्य हैं और कौनसा असत्य, तो हम फिर व्यवहार का सहारा लेते हैं, जो इस बार हमारे ज्ञान की सत्यता को परखने के साधन, यानी सत्य की कसौटी ( criterion of truth ) के रूप में काम करता है।

व्यवहार, क्रियाकलाप का विशिष्ट मानवीय ( human ) रूप है। जानवरों के सबसे ज़्यादा जटिल क्रियाकलाप भी व्यवहार नहीं माने जा सकते, क्योंकि व्यवहार का मूलाधार श्रम है। यही वजह है कि जानवरों को केवल सतही वस्तु-उन्मुख संयोजनों ( object-oriented connections ) की समझ ही उपलब्ध है, जबकि गहन संयोजनों, यानी वस्तुगत नियमों की समझ उन्हें उपलब्ध नहीं है। हम जानते हैं कि चींटियों का क्रियाकलाप अत्यंत जटिल होता है। ख़ास तौर पर वे अन्य कीटों ( एफ़िड़ों aphides ) की प्रतिरक्षा करती हैं और पालती भी हैं। इन कीटों को कभी-कभी ‘चींटियों की गाय’ भी कहा जाता है। वे इन्हें खिलाती-पिलाती हैं और इनके द्वारा स्रावित ( excreted ) पोषक मधु का उपयोग करती हैं। किंतु करोड़ों वर्षों की इस ‘बिरादरी’ ( community ) में, जिसे जैवसहचारिता ( biocenosis ) कहते हैं, चींटियों ने एफ़िड़ों की एक भी अधिक उत्पादक क़िस्म का विकास नहीं किया।

वहीं मनुष्यों को, जिन्होंने खेतीबाड़ी तथा पशुपालन का काम कुछ ही हज़ार साल पहले शुरू किया था, अपने सक्रिय व्यावहारिक क्रियाकलाप, प्रयत्न एवं त्रुटि ( trial and error ) की विधियों और अनेक बार पुनरावर्तित प्रयोगों ( repeated experiments ) के ज़रिये इस बात पर यक़ीन हो गया कि घरेलू जानवरों और पौधों को प्रभावित किया जा सकता है। उन्होंने फ़सलें उगाने तथा मवेशी पालने के क़ायदों की खोज ( discover ) तथा उनक निरूपण ( formulation ) किया और इस तरह से नितांत नयी नस्लों व क़िस्मों का विकास किया, जो प्राकृतिक जीवन में विद्यमान नहीं हैं। इस प्रकार, कृषि के क्षेत्र में व्यवहार से नये वस्तुगत सत्यों की खोज, उनकी पुष्टि तथा उपयोग हुआ।

ठोस पिंडों तथा तरलों ( मसलन, पानी ) की विशेषताओं को चाहे कितनी ही बार क्यों न देखा गया हो, उनके निष्क्रिय प्रेक्षण से यह कहना संभव नहीं हो सकता था कि पानी में डुबायी हुई वस्तु के भार में क्या परिवर्तन होते हैं। पानी में सोद्देश्य डुबाये हुए या संयोगवश डूबे हुए पिंडों के साथ व्यावहारिक क्रियाकलाप में कई बार वास्ता पड़ने पर काफ़ी समय बाद लोगों ने यह खोज की कि पानी में डूबी वस्तु का भार ठीक उतना ही कम हो जाता है, जितने पनी को वे विस्थापित ( displaced ) करती हैं ( आर्कमिड़ीज़ का नियम )। बाद में इस खोज को जहाज़ निर्माण के व्यवहार में भारी सफलता के साथ इस्तेमाल किया गया।

इस प्रकार, यह एक प्रस्थापना के रूप में कहा जा सकता है कि व्यवहार, प्रकृति और समाज के बारे में ज्ञान का स्रोत, ज्ञान के विकास का आधार और प्राप्त ज्ञान की सत्यता की कसौटी होता है


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

व्यवहार – संज्ञान का आधार और कसौटी – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार – संज्ञान का आधार और कसौटी – ३

( practice – basis and criterion of cognition – 3 )

800PX-1ज्ञात है कि परिवेशी विश्व की परिवर्तनशीलता और गतिशीलता विषयक कथन ( statement ) को पराकाष्ठा ( climax ) पर पहुंचानेवाले कुछ दार्शनिकों ने निष्कर्ष निकाला था कि विश्व का संज्ञान कर पाना असंभव है, क्योंकि, इन दार्शनिकों के अनुसार, हम वस्तुओं के गुणों को अभी पहचान ही रहे होंगे कि तब तक उनमें न जाने कितना परिवर्तन आ जायेगा। फिर भी व्यावहारिक कार्यकलाप ही जिसके दौरान दसियों, सैंकड़ो बार दोहरायी गयी क्रियाओं का न्यूनाधिक समान नतीजा निकलता है, विश्व के संज्ञान की संभावना के बारे में प्रत्ययवादियों/अज्ञेयवादियों ( idealistic/agnostics ) के दृष्टिकोण का सबसे कारगर खंडन करता है।

उदाहरण के लिए, सैकड़ों कृत्रिम उपग्रहों का पृथ्वी की कक्षा में पूर्वनिर्धारित प्रक्षेप-पथ पर उड़ना और कृत्रिम अंतरिक्षीय प्रयोगशालाओं का चन्द्र धरातल पर निश्चित स्थान पर उतरना और इसी क्रिया को बार-बार दोहराया जाना पूर्णतः सिद्ध कर देता है कि व्यवहार – चाहे वह उत्पादन संबंधी कार्यकलाप हो या कोई वैज्ञानिक प्रयोग – परिवेशी परिघटनाओं के स्थायी, आवृत्तिशील लक्षणों तथा गुणों का पता लगाने और उनके बारे में विश्वसनीय और सच्ची जानकारी पाने में मदद करता है।

images (3)इस तरह उपरोक्त तथ्यों से हम ये तीन निष्कर्ष निकाल सकते हैं : १) व्यवहार संज्ञान का यथार्थ आधार और साथ ही इसकी कसौटी है कि किसी परिघटना का हमारा ज्ञान कितना गहन और विश्वसनीय है ; २) व्यवहार में इतनी गतिशीलता, अनिश्चितता और परिवर्तनीयता है कि वह हमारे संज्ञान को जड़, स्थिर नहीं होने देता, वह संज्ञान के विकास का मूलभूत कारक है ; ३) व्यवहार में इतनी सुनिश्चितता है कि हम सही और ग़लत जानकारियों, भौतिकवादी तथा प्रत्ययवादी उपागमों के बीच भेद और संज्ञान के भौतिकवादी सिद्धांत की सत्यता की पुष्टि कर सकते हैं।

व्यवहार और सिद्धांत ( theory ), दोनों ही विकसित होते रहते हैं और उनके विकास में निर्णायक भूमिका, व्यवहार की होती है। सिद्धांत और व्यवहार संज्ञान के दो अविभाज्य पहलू ( indivisible aspect ) हैं। वे एक दूसरे को समृद्ध ( enriched ) बनाते हैं, जैसे कि विज्ञान और उत्पादन की एकता में देखा जा सकता है। सिद्धांत और व्यवहार को उनके एकत्व ( unity ) में देखना चाहिए, क्योंकि सिद्धांत, सामाजिक-ऐतिहासिक व्यवहार से मात्र समृद्धतर ही नहीं होता, बल्कि यह ख़ुद भी एक सबल रूपांतरणकारी शक्ति है, जो विश्व के क्रांतिकारी रूपांतरण ( revolutionary transformation ) के लिए, युगों पुराने पिछड़ेपन ( backwardness ) को मिटाने और नये जीवन का निर्माण करने के तरीक़े सुझाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

व्यवहार – संज्ञान का आधार और कसौटी – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


व्यवहार – संज्ञान का आधार और कसौटी – २
( practice – basis and criterion of cognition – 2 )

images (1)मनुष्य का कार्यकलाप ( activity ) दो प्रकार का होता है, जिनके बीच आपस में घनिष्ठ संबंध है – वस्तुपरक ( objective ) कार्यकलाप और आत्मपरक ( subjective ) कार्यकलाप। वस्तुपरक कार्यकलाप समस्त सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार को कहते हैं, क्योंकि वह उन नियमों के आधार पर संपन्न किया जाता है, जो आत्मपरक इरादों ( intentions ) या लोगों की इच्छा पर निर्भर नहीं होते। मिसाल के लिए, हथौड़े से पानी को नहीं गढ़ा जा सकता है या स्पंज के टुकड़े से कील नहीं ठोकी जा सकती है। इसी तरह निजी स्वामित्व ( private ownership ) पर आधारित समाज में वर्ग संघर्ष को भी ख़त्म नहीं किया जा सकता है। अपने उत्पादन कार्यकलाप में मनुष्य प्रकृति के साथ अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) करते हुए सबसे पहले उन वस्तुओं और औज़ारों के वस्तुगत गुणों पर आश्रित होता है, जिनसे उसे काम पड़ता है। निस्संदेह, वह सचेतन ढंग से अपने सामने कोई लक्ष्य रखता है, अपनी हरकतों और कामों के महत्त्व को जानता है, परंतु मुख्य और निर्णायक भूमिका उन परिस्थितियों और नियमों की ही होती है, जिनसे ये हरकतें और काम, इच्छा और चेतना के बावजूद, निदेशित ( directed ) होते हैं।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के प्रवर्तकों ने बल देते हुए कहा था कि लोगों का आत्मपरक ( subjective ), यानी संज्ञानकारी कार्यकलाप ( cognitive activity ) आरंभ में उनके वस्तुपरक ( objective ), वस्तुओं और औज़ारों से संबंधित व्यावहारिक कार्यकलाप से गुंथा हुआ था। विकास के काफ़ी परवर्ती चरण ( later stage ) में ही वह उससे अलग हुआ। जंगली मनुष्य और बच्चे की विचारशक्ति की तुलना करने पर हम पायेंगे कि चिन्तन के सामान्यतम रूप, प्रेक्षण की योग्यता और वस्तुओं की समानता या अंतर को पहचानने की क्षमता, वस्तुओं के प्रत्यक्ष इस्तेमाल ( direct use ) के आधार पर ही पैदा होते हैं। किंतु यह नहीं सोचना चाहिए कि व्यवहार ( practice ) का सहारा लेने मात्र से संज्ञान ( cognition ) से संबंधित जटिल समस्याएं पूरी तरह हल हो जायेंगी।

विज्ञान तथा दैनंदिन जीवन में पैदा होनेवाले बहुत ही विविध प्रश्नों का पूर्ण और अंतिम उत्तर खोजने का प्रयास संज्ञान के प्रति तत्वमीमांसीय उपागम ( approach ) की एक मूल विशेषता है। ऐसे बहुत से उत्तर हमें निर्विवाद प्रतीत हो सकते हैं और दैनंदिन, सीमित कार्यकलाप की कसौटी पर खरे भी उतर सकते हैं। किंतु जैसा कि कहा भी गया है, “मनुष्य की सामान्य बुद्धि ( common sense ), जो घर की चहारदीवारी में बहुत ही सम्माननीय साथी होती है, ज्यों ही अनुसंधान ( research ) की व्यापक दुनिया में क़दम रखने का साहस करती है, उसे बहुत ही तरह-तरह के अप्रत्याशित अनुभवों ( unexpected experiences ) से गुज़रना पड़ता है।”

हमारे संज्ञान के परिवर्तन का स्वरूप भी व्यवहार के रूपों की विशेषताओं पर निर्भर होता है। जहां ये रूप अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं और किन्हीं क्रियाओं में दशकों या सदियों तक दोहराये जाने की प्रवृत्ति पायी जाती है, वहां उनके आधार पर पैदा होनेवाला ज्ञान भी उसी तरह स्थायी और अपरिवर्तनीय सा प्रतीत होता है। मगर व्यावहारिक कार्यकलाप ( practical activity ) में गंभीर परिवर्तन आये नहीं कि लोगों के उससे संबंधित ज्ञान को बदलते भी देर न लगेगी। सच तो यह है कि व्यवहार बहुत ही बहुविध होता है, उसमें अनिश्चितता ( uncertainty ) का पुट होता है और इतने तरह-तरह के गुण, लक्षण और व्यक्तिगत विशेषताएं पायी जाती हैं कि हम लाख कोशिश करने पर भी उन सबका ज्ञान सदा के लिए हासिल नहीं कर सकते। व्यवहार की यह अनिश्चितता, परिवर्तनशीलता और गतिशीलता ही संज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। व्यवहार इतना अनिश्चित है कि वह हमारे ज्ञान को स्थिर होने या रुकने नहीं देता। तो क्या ऐसी स्थिति में वह ज्ञान की कसौटी ( criterion ) बन सकता है?


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

व्यवहार – संज्ञान का आधार और कसौटी – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


व्यवहार – संज्ञान का आधार और कसौटी – १
( practice – basis and criterion of cognition – 1 )

Pieter_bruegel_il_giovane,_estate_02दर्शन में ‘व्यवहार’ ( practice ) संप्रत्यय का विशेष अर्थ है। मनुष्य के प्रकृति और समाज का रूपांतरण ( transformation ) करने वाले सोद्देश्य ( purposive ) सामाजिक क्रियाकलाप ही व्यवहार हैं। इसमें निम्नांकित चीज़ें शामिल हैं : पहली, भौतिक उत्पादन की प्रक्रिया ; दूसरी, वर्गों की, अवाम की सामाजिक-राजनीतिक, रूपांतरणात्मक क्रियाएं और तीसरी, वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रयोग। व्यावहारिक सामाजिक क्रियाकलाप ही संज्ञान के प्रमुख, सारभूत आधार ( basis ) हैं। बाह्य जगत के साथ व्यावहारिक अंतर्क्रिया ( practical interaction ) के दौरान ही सच्चा वैज्ञानिक संज्ञान संभव है और व्यावहारिक आवश्यकताएं, जीवन की जरूरतें ही संज्ञान, विज्ञान के विकास को प्रणोदित ( propelled ) करती हैं। साथ ही, व्यवहार ही हमारे ज्ञान की सत्यता की कसौटी ( criterion ) भी है। व्यवहार विभिन्न संकल्पनाओं और सिद्धांतों को परखने ( testing ), उनकी सत्यता या मिथ्यापन को साबित करने ( proving ), ज्ञान को परिभाषित तथा प्रणालीबद्ध ( define and systematize ) करने का काम करता है।

जीवन में मनुष्य का प्रकृति, समाज या स्वयं मानव चिंतन की बहुत ही विविध परिघटनाओं ( phenomenon ) से साक्षात्कार होता है। आधुनिक समाज का ही उदाहरण लें। उसकी जटिल परिस्थितियों में ठीक दिशा ढूंढ़ने और काम करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को सामाजिक विकास के नियमों का ज्ञान हो। यह स्पष्ट है कि सामाजिक संरचनाओं ( social structures ) के कार्य और परिवर्तन, वर्ग संघर्ष ( class struggle ) के नियमों और संस्कृति के विकास के नियमों के अध्ययन में, उन श्रम औज़ारों और यंत्रों का प्रयोग नहीं किया जा सकता, जो प्रकृति की वस्तुओं के रूपांतरण एवं अध्ययन में प्रयुक्त होते हैं। तब तो यह कहा जा सकता है कि वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप सभी मामलों में संज्ञान का आधार और कसौटी नहीं बन सकता।

लेकिन हमें निष्कर्ष ( conclusion ) निकालने में इतनी उतावली दिखाने की कोई जरूरत नहीं। बात यह है कि श्रम और सारा वस्तु-औज़ार कार्यकलाप अपने आप में सामाजिक परिघटनाएं हैं। उन्हें संपन्न करने के लिए आवश्यक है कि लोग एक दूसरे के संपर्क में आयें, आत्मसंगठन के इन या उन रूपों का पालन करें, सूचनाओं का विनिमय ( exchange ) करें और संचित ( accumulated ) अनुभवों को सुरक्षित रखें, संप्रेषित ( communicate ) करें और बढ़ायें। इसलिए ‘व्यवहार’ या अधिक व्यापक संदर्भ में, ‘सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार’ को हमें उन प्रक्रियाओं और कार्यों की समष्टि ( totality ) के अर्थ में लेना होगा, जो मनुष्य के वस्तु-औज़ार कार्यकलाप के आधार पर पैदा होते हैं और इस कार्यकलाप के अस्तित्व ( existence ) तथा विकास ( development ) के लिए आवश्यक परिस्थितियां बनाते हैं।

इस दृष्टि से विरोधपूर्ण ( antagonistic ) समाज में वर्ग संघर्ष, सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार का एक महत्त्वपूर्णतम तत्व होता है, क्योंकि वह उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) तथा उत्पादन संबंधों के विकास के आधार पर पैदा होता है और उसकी प्रगति ( progress ) तथा परिणाम पर सामाजिक उत्पादन की आगे प्रगति निर्भर होती है। वर्ग संघर्ष के दौरान विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं ( political ideologies ) ही प्रतिपादित नहीं की जातीं, उसके दौरान इसकी परीक्षा भी होती है कि ये विचारधाराएं इस या उस वर्ग के हितों को किस हद तक व्यक्त करती हैं, घोषित लक्ष्य सामाजिक विकास की आवश्यकताओं के कितने अनुकूल हैं और संघर्ष के जो रूप तथा साधन प्रस्तावित किये गये हैं, वे कितने कारगर ( effective ) हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

सौन्दर्यबोध और व्यवहार

हे मानव श्रेष्ठों,

समय के पास, पहले की एक और जिज्ञासा है, देखिए..
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“पाषाण युग में गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए जाते थे, उपलब्ध संसाधनों के तालमेल से संगीत भी गाया-बजाया जाता था, ग्रामीण लोग आज भी घरों के आगे मांडने बनाते हैं, लोकगीतों की धुन आज भी आकर्षित करती है। ऐसे में इलीट वर्ग के फ़्यूजन संगीत और महंगी तस्वीरों को अपने संग्रह का हिस्सा बनाने की होड़ और प्रकृति से परे इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन को क्या ‘सौन्दर्यबोध’ कहा जा सकता है?”
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कुलमिलाकर यह जिज्ञासा सौन्दर्यबोध के निरूपण और तुलना के संदर्भ में है।
चलिए बात शुरू करते हैं…
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उपरोक्त जिज्ञासा में पूर्वोक्त तथ्य सामूहिक श्रम-जीवन के सौन्दर्यबोध की सहज और सरल अभिव्यक्तियां हैं, वहीं पश्चोक्त तथ्य सौन्दर्यबोध के विकास की व्यक्तिवादी और अहमवादी दिशा का द्योतक है। इलेक्ट्रोनिक मनोरंजन में भी दोनों तरह की प्रवृतियां मौजूद हैं।

मनुष्य अपने सामाजिक व्यवहार के दौरान, विभिन्न सौन्दर्यात्मक गुणों, मुख्य रूप से सुंदर और कुरूप का भावनात्मक मूल्यांकन करने की योग्यता विकसित करता है। यह योग्यता उसके सृजनात्मक कार्यों में प्रकट होती है और उसके आनंद की प्रेरणा स्रोत होती है। उत्तम सौन्दर्याभिरूचियों का अर्थ है वास्तविक सौन्दर्य से आनंद प्राप्त करने की योग्यता, अपने कार्य में, दैनंदिन जीवन, आचरण, कला में सौन्दर्य का सृजन करने की अपेक्षा। निकृष्ट सौन्दर्याभिरूचियां यथार्थ के प्रति मनुष्य के सौन्दर्यात्मक दृष्टिकोण को विकृत करती हैं, वास्तविक सौन्दर्य के प्रति उदासीन बनाती हैं और कभी-कभी परिणाम यहां तक पहुंचता है कि मनुष्य कुरूप वस्तुओं और प्रवृतियों से भी आनंद प्राप्त करता है।
सौन्दर्यबोध सुंदर के चयन और निरूपण से संबंधित मात्र नहीं होता, वरन् सुंदर का असुंदर से भेद और फिर असुंदर को सुंदर बनाने के सचेत क्रियाकलापों से भी संबंधित है। यह सिर्फ़ विश्व के वस्तुगत रूप का मामला ही नहीं, वरन् विचारों की सुंदरता का मामला भी है। यह सौन्दर्य के निरूपण के साथ-साथ असौन्दर्य के साथ संघर्ष और उसके खात्में की प्रक्रिया पर निर्भर है।
विचारों के मामले में शिव और अशिव यानि सुंदर और असुंदर के निर्धारण की कसौटी क्या हो, यह मनुष्य की वर्गपक्षधरता और सौन्दर्याभिरूचियों पर निर्भर करता है। परंतु यदि सामाजिक नज़रिए से देखा जाए तो मोटे तौर पर यह कसौटी निर्धारित की जा सकती है जो विचार अंतत्वोगत्वा संपूर्ण मानव समाज या अधिकतर हिस्से के हितों के अनुरूप हो तो वह शिव है, सुंदर है जबकि जो विचार व्यक्तिगत हितों और प्रभुत्व प्राप्त समूहों के हितों के अनुरूप हो वह अशिव है, असुंदर है।
अब होता यह है कि प्रभुत्व/सत्ता प्राप्त समूह, चूंकि सारे साधन उनकी पहुंच और प्रभाव में होते हैं, ऐसे विचारों और विचारधाराओं का प्रचार और पक्षपोषण करता है जो उनके हितों के अनुरूप हों या ख़िलाफ़ नहीं जाते हों। अंतत्वोगत्वा समाज में और प्रभुत्व प्राप्ति की इच्छाएं रखने वालों में इन्हीं विचारों का बोलबाला हो जाता है, और सभी क्षेत्रों की सृजनात्मकता और रचनात्मकता इसी प्रभुत्व प्राप्ति के आकांक्षा के साथ गर्भनालबद्ध हो जाती हैं।
उपरोक्त जिज्ञासा को, इसकी पश्चोक्त विकृतियों को इसी नज़रिए के साथ विश्लेषित करना चाहिए।

दरअसल किसी भी क्रिया को बेहतर तरीके से करने की प्रवृति मनुष्य के सौन्दर्यबोध पर निर्भर करती है। एक समुचित और उच्चतर सौन्दर्यबोध का विकास और निर्माण मनुष्य के द्वारा होने वाली प्रत्येक क्रिया या व्यवहार को सचेत नियंत्रित और निर्देशित करता है।
सौन्दर्यबोध यानि सुंदरता का अहसास, सौन्दर्य के आदर्श प्रतिमानों की समझ, हर वस्तु, क्रिया या विचारों का उन प्रतिमानों के साथ तुलनात्मक विश्लेषण, सुंदर और असुंदर के बीच तार्किक विभेद स्थापित कर सकने की योग्यता और साथ ही मनुष्य की संवेदनाओं का सौन्दर्य के हित और हेतु परिष्कार।
सौन्दर्यबोध मनुष्यों को हर क्रिया को बेहतर रूप से करने, आदर्श रूप में करने के लिए सचेत प्रेरित करता है, मनुष्यों के विचारों को बेहतरी की ओर अग्रसर करता है। स्वयं को और बेहतर, पर्यावरण और दुनियां को और बेहतर बनाने में मनुष्य की दिशा तय करता है।
जाहिर है एक उत्तम सौन्दर्यबोध का निर्माण और विकास, सिर्फ़ एक निश्चित क्रियाकलाप तक अपने आपको सीमित नहीं रख सकता, यह मनुष्य को जीवन के हर पहलू में अपनी श्रेष्ठता के साथ सक्रिय रहने की क्षमता प्रदान करता है।
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आज इतना ही…
अगली बार कुछ और नयी जिज्ञासाएं…….

समय