हम अपने समय की आवश्यकता की उपज हैं

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


हम अपने समय की आवश्यकता की उपज हैं

tumblr_lyyf6zXKjo1qlq2hjo1_1280सुखदेव को भूख हड़ताल के दौरान एक पत्र में भगतसिंह कहते हैं:…….

“क्या आपका आशय यह है कि यदि हम इस क्षेत्र में न उतरे होते, तो कोई क्रांतिकारी कार्य कदापि नहीं हुआ होता? यदि ऐसा है तो आप भूल कर रहे हैं। यद्यपि यह ठीक है कि हम भी वातावरण को बदलने में बड़ी सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं, तथापि हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपज हैं।

मैं तो यह भी कहूंगा कि साम्यवाद का जन्मदाता मार्क्स, वास्तव में इस विचार को जन्म देनेवाला नहीं था। असल में यूरोप की औद्योगिक क्रांति ने ही एक विशेष प्रकार के विचारों वाले व्यक्ति उत्पन्न किए थे। उनमें मार्क्स भी एक था। हाँ, अपने स्थान पर मार्क्स भी निस्सन्देह कुछ सीमा तक समय के चक्र को एक विशेष प्रकार की गति देने में आवश्यक सहायक सिद्ध हुआ है।”

इस पर थोड़ा सा कहना है। हो सकता है कि यह आप पसन्द न करें और इसे मेरी कमी या दुर्बलता करार दें।

इस तर्क के आधार पर यह भी तो कहा जा सकता है कि भारत के लोगों को मशीनों की आवश्यकता उस तरह नहीं थी कि यहाँ आविष्कार हो पाते। जब समय-भौगोलिक-सामाजिक परिस्थितियाँ आदि बड़े और प्रमुख कारण हैं, तो ऐसा अगर कोई कहे कि भारत के लोगों को दूर जाकर खाने की आवश्यकता नहीं थी, सो यहाँ गाड़ी-जहाज आदि नहीं बने। यहाँ युद्धों में यह खयाल किसी को नहीं आता था कि बहुत विनाशकारी हथियार आदि बनते। आदि आदि। 

यह बहस नहीं, एक बिन्दु मात्र है।

पहली बात तो यह कि आप अपनी बात रखते समय यह क्यों चिंता करते हैं कि आपकी बात को आपकी कमी या दुर्बलता समझा या कहा जा सकता है। इसका दूसरा मतलब यह निकलता है कि आप अपने को इतने ऊंचाई पर महसूस करते हैं कि ऐसा समझा या कहा जाना आपके अहम् को बहुत नागवार गुजरता है। इसलिए बात के साथ यह पुछल्ला आपको पूर्वसुरक्षा की अवस्था में ले आता है जिसमें आप बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं।

बात यह है कि यदि वाकई हमको कोई भी बात ऐसी कमतर लगती है कि जिसपर हमें कमजोर या दुर्बल समझा जा सकता है, यानि बात वास्तव में कमजोर ही लग रही है, तो व्यक्ति उसे रखना ही पसंद नहीं करेगा, उसे कहना स्थगित रखेगा जब तक कि वह अपने स्तर के हिसाब से उसपर पूर्णतया सुनिश्चित नहीं हो लेगा।

यानि फिर भी किसी बचाव की पूर्वपीठिका या औपाचारिक भूमिका के साथ बात रखी जाती है तो इसका मतलब यह हुआ कि वह अपनी बात से पूर्णतया मुतमइन है, सुनिश्चित है, उसे रखा जाना जरूरी समझता है, सिर्फ़ व्यक्तिगत लिहाज या सम्मान के कारण यह औपचारिक तरीक़ा अपनाना उसे श्रेष्ठ लगता है ताकि व्यक्तिगत नाराज़गी पैदा ना हो सकें।

यह बात इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझने के लिए कही गई है। साथ ही इसलिए भी हम अभी शुरुआती सीखने की अवस्थाओं में हैं, चीज़ों को समझना सीख रहे हैं, इसलिए अपने अहम् को तदअनुसार ही निचले स्तर पर रखने की कोशिश करनी चाहिए। यदि हम वाकई में सीखना चाहते हैं तो यह पद्धति ठीक रहती है। हमको यह लगने लगता है कि किसी भी बात से हमें जो समझ आ रहा है वही अंतिम सत्य है। आपके अंदर कभी-कभी इस महान चेतना के दर्शन हो जाते हैं और आप अलौकिक ब्रह्मचेतना के आभामंड़ल से प्रदीप्तमान हो उठते हैं। 🙂

अब दूसरी बात, भगत सिंह वाली बात पर। किसी सिद्धांत की मूल प्रस्थापनाएं और उसकी वस्तुगत ठोस प्रस्तुति अलग चीज़ होती है, और किसी व्यक्ति द्वारा उसे जैसा भी समझा गया है के आधार पर प्रस्तुत की गई तर्क और व्याख्याएं अलग चीज़ होती हैं। इसलिए यह हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी की वैयक्तिक प्रस्तुति में आत्मपरकता का अंश हो सकता है, उसकी उस सिद्धांत के बारे में समझ और व्याख्याओं में कोई बारीक त्रुटि भी हो सकती है। अतएव यदि कोई संदेह पैदा सा होता लग रहा है, या कोई कमी सी महसूस हो रही है तो उन सिद्धांत संबंधी मूल प्रस्तुतियों को देखा या संदर्भित करना चाहिए।

इस बात का यहां मतलब नहीं है क्योंकि वे एक सही प्रस्थापना को ही रख रहे हैं। यह तो एक सामान्य सूत्र है जिसे हमेशा अपने ध्यान में रखना चाहिए।

भगतसिंह ने अपने अध्ययन के फलस्वरूप विकसित हुई चेतना के आधार पर सुखदेव को एक वाज़िब बात ही कही थी। और आपने भी उस तर्क श्रृंखला के आधार पर चीज़ों को समझने की दिशा में लगभग सही निष्कर्ष निकाले हैं।

मानवजाति द्वारा विकसित सभी कुछ, उसके विचार, उसकी संस्कृति उसकी वस्तुगत परिस्थितियों और आवश्यकताओं की उपज होती है। दुनिया के किसी भी हिस्से के इतिहास को इसी के आधार पर ही भली-भांति व्याख्यायित किया जा सकता है। परिस्थितियों के आधार पर पैदा हुई आवश्यकताओं के मद्देनज़र ही व्यक्तियों और विचारों के विकास को समझा जा सकता है।

यदि आप भारत में पैदा हुई संस्कृति और विचारों को समझना चाहते है तो निश्चित ही आपको सही दिशा मिल गई है। ये यहां की विपुल प्राकृतिक थाति का ही परिणाम है कि यहां ज़िंदा रहने के लिए, जैविकता के लिए प्रकृति से अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा, इसलिए यहां जीवन के लिए कृत्रिम साधनों का विकास कम हुआ, फलस्वरूप तकनीक और विज्ञान के पैदा होने की संभावनाएं कम थी, और खाली समय में काल्पनिक-आध्यात्मिक चिंतन की अधिक। यहां की उदारवादिता का उत्स भी इसी आधार में ढूंढ़ा जा सकता है कि थोडी बहुत हलचल सी के बाद यहां तुरंत दूसरों को भी जगह दे दी जाती थी, आत्मसात कर लिया जाता था। आप सही सोच रहे हैं, आदि-आदि। आगे कुछ समस्या हो तो बताएं।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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परिस्थितियां ही व्यक्ति का निर्माण करती हैं

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


परिस्थितियां ही व्यक्ति का निर्माण करती हैं

micsis3एक जिज्ञासा है: ‘जब हम यह मानते हैं कि वस्तुएँ, भौतिक-भौगोलिक-सामाजिक-पारिवारिक आदि वातावरण हमारी सोच बनाते हैं तब हममें जो कमी है, वह तो उन परिस्थितियों की देन है। फिर व्यक्ति दोषी कैसे हुआ?…इस तरह हम स्वयं को जिम्मेदार कैसे मानें?’ यहाँ निवेदन होगा कि इसे यह न समझा जाय कि हम ऐसे तर्कों से या खोजने वाली बातों से खुद को निर्दोष मानना या साबित करना चाहते हैं।…यह सवाल हम सालों से सोचते रहे हैं, अपने को लेकर ही नहीं बहुतों को लेकर।

सही है, कौन कहता है कि कोई भी माने अपने को जिम्मेदार। व्यक्ति परिवेश की उपज है, तो जैसा भी व्यक्ति है, उसके लिए परिवेश ही जिम्मेदार है। मतलब, यदि हमें बेहतर व्यक्ति चाहिए तो एक बेहतर परिवेश की रचना करनी ही होगी।

जिम्मेदारी यहीं से शुरू होती है। जिन्हें यह नहीं पता उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। पर अब जो यह जान गये हैं कि परिवेश को बदले बिना, एक बेहतर परिवेश की रचना किए बगैर दुनिया को बेहतर नहीं बनाया जा सकता, जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। इसी तरह जो अपने व्यवहार, विचारों के उत्स और उनकी गैरवाज़िबता को जान गये हैं, वे अब इसे सही करना, इनसे लड़ने की और इन्हें बदलने की कोशिश नहीं करते, तो यह उनकी गैरजिम्मेदारी ही होगी। यदि थोड़ी सी भी परिस्थितियां उनके साथ हैं, तो उन्हें यह करना ही चाहिए। वे अब परिवेश बगैरा की बात करते हैं तो ये उनकी चालाकी ही समझी जाएगी।

आपकी यह बात कुछ समझ नहीं आई कि वास्तव में आपकी जिज्ञासा क्या है? थोड़ा और खोलिए, थोड़ा और निश्चित कीजिए। फिर से लिखिए।

इसका अर्थ था कि किसी अपराधी को, किसी भी व्यक्ति को हम दोषी कैसे मानें? जब हम यह मानते हैं व्यक्ति स्वयं की नहीं परिवेश की उपज है। जैसे हम कहते हैं कि वह अलगाववादी, पूँजीवादी है। उसे हम कैसे दोष दें जब किसी के निर्माण उसका कोई हाथ ही नहीं। जैसे आपने कहा था धर्म के मामले में व्यक्ति को नहीं स्थितियों को दोषी मानना चाहिए। या फिर जैसे हमारे अन्दर अहंकार है, तो हमारा दोष क्या है? वह तो मैंने नहीं पैदा किया। यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।

पहले जो लिखा था उसी को आगे बढ़ाते हैं। पारिवेशिक परिस्थितियां ही व्यक्ति का निर्माण करती हैं। जब हम यह समझ रहे होते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि हम उसके व्यक्तित्व के चारित्रिक गुणों के उत्स को समझने का प्रयत्न कर रहे होते हैं ताकि उसकी वस्तुस्थिति को समझा और समझाया जा सके। दूसरा हम उसकी प्रवृत्तियों को सामाजिक कसौटियों पर कसकर यह तय कर रहे होते हैं कि ये ग़लत हैं या सही हैं। यह इसलिए भी कि हम व्यक्तिगत रूप से दोष तय करके और उसे तदअनुसार सज़ा देकर मात्र ही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं होलें। यह इस वर्तमान व्यवस्था का काम करने का तरीका है। पर वे परिस्थितियां जो इस तरह की प्रवृत्तियां पैदा करती हैं वे अनछुई ही पड़ी रहती है और इस तरह के ही अन्य व्यक्ति पैदा करती रहती हैं। यदि समस्या को मूल से ही समाप्त करना है तो इस मूल यानि वैसी परिस्थितियों को ही ख़त्म करना होगा। यदि किसी की कोई प्रवृत्तियां आक्रामक स्तर पर समाज के लिए खतरनाक हो उठती है और वह सुधार की गुंजाइश से बाहर हो गया है तो उसको विभिन्न तरीकों से प्रतिबंधित भी करना होगा ही। यह व्यक्तिगत से ज़्यादा व्यवस्थागत मामला अधिक है।

व्यक्तिगत तौर पर इसे समझना इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हम व्यक्तिगत तौर पर अपने व्यवहार को समुचित रूप से व्यवस्थित कर सकें। व्यक्तिगत रूप से दोषारोपण, नफ़रत, द्वेष आदि से मुक्त रहकर अपनी सक्रियता में अधिक विनम्रता, अधिक परिपक्वता और जिम्मेदारी से पेश आना ला सकें और सामने वाले में बदलाव की प्रक्रिया में अपना सकारात्मक योगदान करने के लिए प्रस्तुत हो सकें।

हमें लग रहा है कि आप इस मामले को अपने इस सवाल से ज़्यादा संदर्भित करना चाह रहे हैं कि हमारे अंदर अहंकार है, तो हमारा दोष क्या है, वह हमने तो पैदा नहीं किया? व्यक्तिगत चीज़ों से निपटना थोड़ा सा भिन्न हो उठता है।

कोई व्यक्ति अधिकतर अपनी प्रवृत्तियों की नकारात्मक पहचान से परिचित नहीं होता। यह दूसरे लोग ही आंक रहे होते हैं कि वह स्वार्थी है, अहंकारी है, कंजूस है, क्रोधी है आदि-आदि। हो सकता है लोगों के द्वारा उसका यह आकलन उस तक भी पहुंचता हो। अब चूंकि यह प्रवृत्तियां उसकी परिस्थितियों की उपज़ होती हैं, इसका मतलब यह भी तो है कि उन परिस्थितियों में ये उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक भी होती हैं, फलतः व्यक्ति उन्हें सही और बेहद जरूरी मान रहा होता है, इसीलिए उनसे चिपका रहता है, उनके पक्ष में सैद्धांतिक तर्क भी गढ़ रहा होता है।

जैसे कि यह कहना भी कि परिस्थितियों के कारण ही वह ऐसा है, इसमें उसका दोष क्या है? एक ऐसे ही तर्क की तरह है। यदि वह जान गया है कि उसकी परिस्थितिवश पैदा हो गई कुछ प्रवृत्तियां एक बेहतर व्यक्तित्व और सामाजिक कसौटियों के सापेक्ष सही नहीं है, तो उनको बनाए रखने की हर कोशिश ग़लत ही कही जाएंगी यदि उसकी तात्कालिक परिस्थितियों में वह ऐसा कर भी सकता हो। अपने लंबे अनुकूलन से लड़ना मुश्किल भी होता है और कष्टदायक भी। यथास्थिति के अनुसार ढ़लना और उसे बनाए रखना, यथास्थिति को परिवर्तित कर अपने अनुकूल बनाने की प्रक्रिया से हमेशा आसान होता है। अतः जो व्यक्तिगत तौर पर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते हैं, अपने व्यक्तित्व को अधिक बेहतर बनाना चाहते हैं, उनको तो यह कठिन चुनौतियां स्वीकार करनी ही होंगी। व्यक्तिगत स्तर पर भी और सामाजिक व्यवहार के स्तर पर भी।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय