इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं

( Subjective features of volition )

मनुष्य की सक्रियता के सचेतन संगठन तथा नियमन ( regulation ) के रूप में इच्छाशक्ति आंतरिक कठिनाइयों को लांघने की ओर लक्षित होती है और मुख्य रूप से आत्म-नियंत्रण ( self control ) के रूप में अपने को प्रकट करती है। सर्वविदित है कि आत्म-नियंत्रण की क्षमता सभी लोगों में एक जैसी नहीं होती। इच्छाशक्ति की बहुत ही विविध व्यक्तिपरक विशिष्टताएं मिलती हैं। फिर तीव्रता की दृष्टि से भी, प्रचंड और दुर्बल के बीच इसकी बहुविध अभिव्यक्तियां पाई जाती हैं। प्रचंड इच्छाशक्तिवाला मनुष्य अपने लक्ष्य के मार्ग में आनेवाली कैसी भी कठिनाइयों को लांघ सकता है और दृढ़निश्चय, साहस और सहनशक्ति जैसे संकल्पमूलक गुण प्रकट करता है। इसके विपरीत दुर्बल इच्छाशक्तिवाला आदमी कठिनाइयों से कतराता है, साहस, दृढ़ता तथा संयम का अभाव दिखाता है और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित उच्चतर अभिप्रेरकों की ख़ातिर क्षणिक इच्छाओं, आकांक्षाओं को दबाने में असमर्थ सिद्ध होता है।

दुर्बल इच्छाशक्ति की अभिव्यक्तियां भी उतनी ही विविध हैं, जितने विविध दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए लाक्षणिक गुण हैं। इच्छाशक्ति की दुर्बलता की चरम अभिव्यक्तियां, जैसे संकल्प-अक्षमता और गति-अक्षमता, सामान्य मानस की सीमा के बाहर है।

संकल्प-अक्षमता सक्रियता के उत्प्रेरण के अभाव और निर्णय लेने या कार्य करने की अयोग्यता को कहते हैं, जिनका कारण मस्तिष्क के विकार हैं। संकल्प-अक्षमता का रोगी चिकित्सक के निर्देशों के पालन की आवश्यकता स्पष्टतः अनुभव करने पर भी अपने को उनके पालन के लिए तैयार नहीं कर पाता। गति-अक्षमता प्रमस्तिष्क के प्रेरक क्षेत्र ( ललाट खंडों ) में विकृतियों के कारण सोद्देश्य क्रियाएं करने की अयोग्यता को कहते हैं। यह अपने को निर्धारित कार्यक्रम के बाहर स्थित गतियों तथा क्रियाओं के ऐच्छिक विनिमयन ( voluntary regulation ) के क्षीण बनने में प्रकट करता है। गति-अक्षमता संकल्पात्मक क्रियाओं के निष्पादन ( execution ) को असंभव बना देती है।

संकल्प-अक्षमता और गति-अक्षमता अपेक्षाकृत विरल विकृतियां हैं और मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचे होने का संकेत देती हैं। शिक्षकों का अपने कार्य के दौरान दुर्बल इच्छाशक्ति की जिस परिघटना से प्रायः साक्षात्कार होता है, सामान्यतः उसका कारण कोई विकृति नहीं, अपितु ग़लत शिक्षा और पालन होते हैं। यह कमी व्यक्तित्व-निर्माण की व्यूह रचना के दायरे में संगठित शिक्षा प्रयासों से दूर की जा सकती है। दुर्बल इच्छाशक्ति की सबसे ठेठ अभिव्यक्ति आलस्य ( laziness ), अर्थात कठिनाइयों से बचने और संकल्पात्मक प्रयासों से कतराने की प्रवृत्ति है। ध्यान देने योग्य बात है कि बहुत-से लोग सामान्यतः अपनी कमियां स्वीकार करने को सहमत न होने पर भी आलस्य को अपनी सभी दिक़्क़तों की जड़ मान लेने पर तुरंत राज़ी हो जाते हैं। “आपने ठीक कहा, मैं आलसी हूं” – मित्रों द्वारा आलोचना किए जाने पर कोई भी आदमी यह कह सकता है और मुस्कुराते हुए अपनी छोटी-मोटी ग़लतियां सहर्ष स्वीकार कर लेता है। इस सहजता से की हुई स्वीकारोक्ति के पीछे वास्तव में मनुष्य की अपने बारे में ऊंची राय छिपी होती है। वह जैसे यह कहती है कि इस आदमी में बहुत से गुण छिपे हैं, जो अगर यह आलसी न होता, तो वे अपने को अवश्य ही प्रकट कर देते।

किंतु स्वीकारोक्ति में छिपा यह भाव सर्वथा भ्रांतिजनक है। निष्कर्मण्यता मनुष्य की अशक्तता तथा ढीले-ढालेपन को, उसकी अपने को जीवन के अनुकूल ढाल पाने की असमर्थता तथा साझे ध्येय के प्रति उदासीनता को इंगित करती है। आलसी मनुष्य की विशेषता नियंत्रण का बाह्य स्थान-निर्धारण है और इसलिए वह ग़ैर-ज़िम्मेदार होता है। आलस्य और दुर्बलता की अन्य अभिव्यक्तियां – कायरता, अनिश्चय, संयम का अभाव, आदि – व्यक्तित्व के गंभीर दोष हैं, जिन्हें दूर करने के लिए बड़े शैक्षिक प्रयासों और मुख्य रूप से कड़ी आत्म-शिक्षा ( self-education ) की आवश्यकता होती है।

इच्छाशक्ति के सकारात्मक गुण, उसकी दृढ़ता की अभिव्यक्तियां सफल सक्रियता की महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) हैं और उनसे मनुष्य के व्यक्तित्व की अच्छी तस्वीर बनती है। इन गुणों में निर्भीकता, कर्मठता, दृढ़निश्चय, आत्मनिर्भरता, आत्म-नियंत्रण, आदि शामिल किए जाते हैं। दृढ़निश्चय ( determination ) एक संकल्पमूलक गुण है, जो दिखाता है कि दत्त मनुष्य स्वतंत्र महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकता है और उन्हें क्रियान्वित कर सकता है। दृढ़ चरित्रवाले मनुष्य में अभिप्रेरकों का द्वंद लंबी प्रक्रिया नहीं बनता और शीघ्र ही किसी निर्णय के लिए जाने और क्रियान्वित किए जाने के साथ समाप्त हो जाता है। यह निर्णय सदा सामयिक ( कभी-कभी तत्क्षण भी ) और खूब सोचा-विचारा होता है। जल्दबाज़ी में लिया हुआ निर्णय प्रायः मनुष्य की आंतरिक तनाव से मुक्ति पाने और अभिप्रेरकों के द्वंद को खत्म करने की इच्छा का सूचक होता है, ना कि चरित्र की दृढ़ता का। दूसरी ओर, निर्णय लेने तथा उसे अमली रूप देने को लगातार टालना निश्चय ही कमज़ोर इच्छाशक्ति का प्रमाण है।

इच्छा की स्वतंत्रता के लिए, एक ओर, दूसरों की सलाहों तथा रायों को सुनना और, दूसरी ओर, उनके बारे में संयत रवैया ( moderate attitude ) अपनाना आवश्यक है। दृढ़निश्चय और स्वावलंबन ( independence ) संकल्पात्मक कार्यों में नियंत्रण के आंतरिक स्थान-निर्धारण के परिचायक होते हैं। स्वतंत्र इच्छा, एक ओर, जिद्दीपन ( waywardness ) तथा नकारवाद ( denial ) की विरोधी है और, दूसरी ओर, सहजप्रभाव्यता ( impressionable ) तथा अनुकारिता ( imitability ) की प्रतिध्रुवस्थ। सहजप्रभाव्य मनुष्य की अपनी कोई राय नहीं होती और उसका व्यवहार परिस्थितियों तथा दूसरे लोगों के प्रभाव पर निर्भर होता है, जबकि जिद्दीपन मनुष्य को तर्कबुद्धि के विरुद्ध कार्य करने और अन्य लोगों की सलाह पर कोई ध्यान न देने को प्रेरित करता है। अंतर्वैयक्तिक संबंधों में आत्म-निर्भरता अथवा इच्छा-स्वातंत्र्य व्यक्तित्व की एक विशेषता के नाते अपने को सामूहिकतावादी आत्म-निर्णय में अधिकतम व्यक्त करते हैं।

इच्छाशक्ति को “दृढ़ता-दुर्बलता” के मापदंड से ही नहीं आंका जा सकता। इच्छा का नैतिक पहलू, उसकी समाजोन्मुखता तथा परिपक्वता भी, अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरे शब्दों में, संकल्पात्मक कार्यों का नैतिक मूल्यांकन मनुष्य के अभिप्रेरकों की सामाजिक महत्व पर निर्भर होता है


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

नियतत्ववाद और "इच्छा-स्वातंत्र्य"

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझा था, इस बार हम इसी को आगे बढ़ाते हुए नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य” पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


नियतत्ववाद और “इच्छा-स्वातंत्र्य”
( determinism and freedom of will )

प्रत्ययवादीया भाववादी ( idealistic ) दर्शन तथा मनोविज्ञान में इच्छा को एक अलौकिक, समाज-निरपेक्ष,यानि अनियत शक्ति बताया जाता है, जो मानो मनुष्य की कोई कार्य आरंभ वसंपन्न करने की क्षमता का स्रोत है। इस संकल्पना में सारी मानसिक सक्रियताको इच्छाशक्ति का कार्य और स्वयं इच्छाशक्ति को क्रियाशीलता का अचेतन परमस्रोत समझा जाता है। इसी तरह कुछ मशहूर भाववादी मनोविज्ञानियों ने भी किसी भीक्रिया में सर्वोच्च भूमिका पूर्णतः स्वतंत्र इच्छागत निर्णय की मानी थी।यह तो कुछ ऐसा कहने के समान है कि मनुष्य अपने से कहता है, ‘ऐसा हो !’, औरजो उसने चाहा था, हो जाता है। दूसरे शब्दों में , जैसे कि इस रहस्यमय परमतत्व के अलावा और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।

वास्तव में मनुष्य के कार्य तथा व्यवहार यथार्थ की उपज( yield of reality ) होते हैं। अभिप्रेरकों को और संकल्पात्मक क्रियाओं को भी, वे बाह्य प्रभावजन्म देते हैं, जिन्होंने पहले की सक्रियताओं और परिवेश से अन्योन्यक्रिया( mutual action ) के दौरान मनुष्य के मस्तिष्क पर अपनी छाप छोड़ी थी। किंतु संकल्पात्मकक्रियाओं के नियतत्व ( कारणसापेक्षता ) का यह अर्थ नहीं है कि मनुष्य काएक निश्चित तरीक़े से ही काम करना पूर्वनियत है, कि उसे चुनने की कोईस्वतंत्रता नहीं है और वह अपने कार्यों के अवश्यंभावी स्वरूप का हवालादेकर स्वयं उत्तरदायित्व ( responsibility ) से बच सकता है।

मनुष्य कोई भी संकल्पात्मकक्रिया एक व्यक्ति के तौर पर करता है और इसलिए चह उसके परिणामों के लिएउत्तरदायी भी होता है। मनुष्य का संकल्पमूलक व्यवहार, उसकी क्रियाशीलता कीसामाजिक संबंधों की एक निश्चित संबंधों की एक निश्चित पद्धति पर निर्भर एकउच्चतर अवस्था है, जिसकी विशेषता मनुष्य की ज्ञान के आधार पर निर्णय लेनेकी योग्यता है। मनुष्य की क्रियाशीलता और विशेषतः उसकी इच्छाशक्ति कर्मका रूप ले लेती है, जो सक्रियता का एक सामाजिकतः सार्थक परिणाम है, ऐसापरिणाम कि जिसके लिए मनुष्य तब भी उत्तरदायी होता है, जब वह उसके आरंभिकइरादों की सीमा से बाहर निकल जाता है।

दूसरे व्यक्ति को उसकीसमस्याओं के हल में मदद देकर मनुष्य प्रशंसनीय काम करता है। वह दूसरेमनुष्य के जीवन में अपनी भूमिका से अनभिज्ञ ( unaware ) हो सकता है, फिर भी उसे उदात्तकार्य के हितकर परिणामों के लिए श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इसी तरह यदिकोई आदमी किसी अन्य को बिला वज़ह हानि पहुंचाता है, उसकी आवश्यकताओं कीतुष्टि में बाधा डालता है, तो वह बुरा काम करता है और इसके लिए वह उस सूरतमें उत्तरदायी होता है, अगर वह इसके परिणामों का पूर्वानुमान कर सकता थाया अगर ऐसा पूर्वानुमान कर लेना उसका कर्तव्य था। जब मनुष्य किसी कर्मद्वारा अन्य लोगों के जीवन, व्यवहार तथा चेतना में परिवर्तन लाता है, तोऐसा वह नेक अथवा बुरी इच्छा के वाहक के तौर पर करता है और इसलिए प्रशंसाअथवा निंदा का पात्र बनता है।

लोग अपने कामों  के लिए किसेउत्तरदायी ( responsible ) ठहराते हैं ( मनोविज्ञान में इसे ‘नियंत्रण का स्थान-निर्धारण’,‘कन्ट्रोल लोकेलाइज़ेशन’ कहा जाता है ), इसके अनुसार उन्हें दो कोटियों मेंबांटा जा सकता है। अपने व्यवहार को बाह्य कारणों ( भाग्य, परिस्थितियों,संयोग, आदि ) का परिणाम माननेवालों को ‘बाह्य स्थान-निर्धारण’ शीर्ष केअंतर्गत रखा जाता है। जो प्राप्त परिणामों को अपने प्रयासों या योग्यता काफल समझते हैं, वे ‘नियंत्रण का आंतरिक स्थान-निर्धारण’ शीर्ष के अंतर्गतआते हैं।

पहली कोटि में आनेवाले बच्चे अपने कम अंक पाने के लिएअपनी लापरवाही के सिवाय और किसी भी चीज़ को जिम्मेदार ठहरा देते हैं ( सवालठीक नहीं लिखा गया था, किसी ने ग़लत हल बताया, मेहमानों ने पढ़ने नहीं दिया,पुस्तक में इस बारे में नहीं था, वग़ैरह )। अनुसंधानों ने दिखाया है कि ऐसीबाह्य स्थान-निर्धारण की प्रवृत्ति का कारण चरित्र के उत्तरदायित्वहीनता ( irresponsibility ),अपनी योग्यताओं में विश्वास का अभाव, दुश्चिंता, इरादों का क्रियान्वयनस्थगित करने की आदत, आदि लक्षण होते हैं।

इसके विपरीत जो मनुष्यसामान्यतः अपने कार्यों के लिए अपने को उत्तरदायी ठहराता है और उनकी सफलताया असफलता का स्रोत अपने चरित्र, अपनी योग्यताओं अथवा उनके अभाव में देखताहै, उसके बारे में उचित ही कहा जा सकता है कि उसमें नियंत्रण के आंतरिकस्थान-निर्धारण की क्षमता है। नियंत्रण का आंतरिक स्थान-निर्धारण करनेवालाछात्र यदि कम अंक पाता है, तो बहुत करके वह इसका कारण अपनी ओर से विषय मेंरुचि का अभाव, भुलक्कड़पन, ध्यान कहीं और होना बताएगा। यह स्थापित किया जाचुका है कि इस तरह के मनुष्यों में गहन उत्तरदायित्व-बोध, बड़ी लगन,आत्म-परीक्षा की प्रवृत्ति, मिलनसारी और स्वतंत्रता होती है।

संकल्पात्मककार्यों के नियंत्रण का आंतरिक या बाह्य स्थान-निर्धारण, जिसके सकारात्मकऔर नकारात्मक, दोनों ही तरह के सामाजिक परिणाम निकलते हैं, शिक्षा तथापालन की प्रक्रिया में विकास करनेवाली स्थिर चरित्रगत विशेषता है


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

इच्छाशक्ति ( volition, will power )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से की थी, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


इच्छाशक्ति ( volition, will power )
व्यक्ति की क्रियाशीलता का एक रूप

इच्छाशक्ति,मनुष्य द्वारा अपनी सक्रियता और व्यवहार का सचेतन संगठन व स्वतःनियमन है,ताकि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति में सामने आनेवाली कठिनाइयों को लांघाजा सकेइच्छाशक्तिमनुष्य की क्रियाशीलता का एक विशिष्ट रूप और स्वेच्छा से निर्धारितलक्ष्यों द्वारा निदेशित उसके व्यवहार के संगठन का एक प्रकार है।इच्छाशक्ति की उत्पत्ति श्रम के दौरान होती है, जब मनुष्य प्रकृति केनियमों का ज्ञान प्राप्त करता है और इस तरह उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसारबदलता है।

इच्छाशक्ति दो परस्परसंबद्ध कार्य करती है : अभिप्रेरणात्मक ( motivational ) और प्रावरोधात्मक ( prohibitory )।

अभिप्रेरणात्मक कार्य का मूल मनुष्य की क्रियाशीलता में है। प्रतिक्रियाशीलता ( reactivity ) केविपरीत, जब मनुष्य की क्रिया पूर्ववर्ती स्थिति पर निर्भर होती है ( बुलाएजाने पर मुड़कर देखना, अपनी ओर फेंकी गई गेंद को वापस फेंकना, बेहूदी बातपर नाराज़ होना, वगै़रह ), क्रियाशीलताक्रिया को जन्म मनुष्य की आंतरिक अवस्थाओं के विशिष्ट स्वरूप के कारण देतीहै, जो अपने को क्रिया के निष्पादन ( execution ) के क्षण में प्रकट करती है ( उदाहरण केलिए, आवश्यक सूचना पाने के लिए मनुष्य अपने साथी को बुलाता है, या अच्छीमनःस्थिति में न होने के कारण बेहूदगी से बात करता है, वगै़रह )।

क्षेत्र व्यवहारके विपरीत, जिसकी विशेषता अनैच्छिकता है, क्रियाशीलता में संकल्प का तत्वहोता है, यानि वह किसी सचेतन लक्ष्य की ओर निर्दिष्ट ( directed ) होती है। क्रियाशीलताका वर्तमान स्थिति द्वारा, इसकी मांगों को पूरा करने और निर्धारित सीमाओंके भीतर काम करने की इच्छा द्वारा उत्प्रेरित होना आवश्यक नहीं है। इसकास्वरूप स्थिति-निरपेक्ष होताहै, यानि वह आरंभिक लक्ष्यों की सीमाओं को लांघती है और उसमें मनुष्य कीदत्त स्थिति की अपेक्षाओं के सार से ऊपर उठने तथा आरंभिक लक्ष्यों से ऊंचेलक्ष्य रखने की योग्यता ( उदाहरणार्थ, ‘जोखिम के लिए जोखिम उठाना’,सृजनात्मक उत्साह, आदि ) महत्त्व रखती है।

मनुष्य की सामाजिकक्रियाशीलता की एक अभिव्यक्ति उसका सामान्य कर्तव्य-बोध से ऊपर उठकर ऐसेकार्यकलाप में प्रवृत्त होना है, जो उसके अपने लिए आवश्यक नहीं है ( यदिउसे वह नहीं करता है, तो कोई इसके लिए उसपर उंगली नहीं उठाएगा ), मगर जोसामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप है।

संकल्पात्मक प्रक्रियाओं ( volitive processes ) की एक औरविशेषता है, जो इच्छाशक्ति के अभिप्रेरणात्मक कार्य के रूप में सामने आतीहै। यदि मनुष्य के लिए कोई ऐसा कार्य करना तत्काल ज़रूरी नहीं है, जिसकीवस्तुपरक आवश्यकता ( objective need ) को वह समझता है, तो इच्छाशक्ति कुछ अतिरिक्त अभिप्रेरण ( motive )पैदा कर देती है, जो उस कार्य के अर्थ को बदल देते हैं और मनुष्य को उसकेपरिणामों का पूर्वानुमान लगाने को प्रेरित करके उसे और अधिक महत्त्वपूर्णबना डालते हैं। उदाहरण के लिए, एक स्कूल की बालीबाल की टीम का कप्तान यदिथका हुआ है, तो अपनी बची-खुची ताक़त जुटाकर अभ्यास के लिए शहर के दूसरे छोरपर स्थित जिम में जाने में वह कठिनाई महसूस कर सकता है। फिर भी जब वहसोचता है कि उसकी टीम की की सफलता और उसके स्कूल की प्रतिष्ठा उसकी कप्तानके रूप में तैयारी पर निर्भर है, तो वह अपनी सारी इच्छाशक्ति जुटा लेता हैऔर कठिन कार्य के लिए एक अतिरिक्त अभिप्रेरक पैदा कर डालता है।

इच्छाशक्ति का प्रावरोधात्मक कार्यअभिप्रेरणात्मक कार्य से एकता बनाए रखते हुए अपने को क्रियाशीलता कीअवांछित अभिव्यक्तियों को रोकने में प्रकट करता है। मनुष्य सामान्यतः अपनेअभिप्रेरकों और कार्यों पर अंकुश लगा लेता है, जो उसके विश्व-दृष्टिकोण,विचारों और विश्वासों से मेल नहीं खाते। अवरोध के बिना व्यवहार का नियमनअसंभव होता। ‘प्रावरोधात्मक आदतों’ का विकास परिपक्व और सुरुचीपूर्णव्यक्तित्व के निर्माण के लिए एक आवश्यक शर्त है। शिक्षकों को बच्चों मेंअपनी अति-चंचलता, बातूनीपन और शोर-शराबे को नियंत्रित करने की क्षमताविकसित करनी चाहिए। यह नियंत्रण बच्चे के शरीर के लिए उपयोगी है, सुरुचिका सूचक है और सामूहिक जीवन की अपेक्षाओं के अनुकूल है।

मनुष्य कीकार्य करने की प्रेरणा बुनियादी आवश्यकताओं ( भोजन, वस्त्र तथा आवास ) सेलेकर नैतिक, सौंदर्यात्मक तथा बौद्धिक आवश्यकताओं तक विभिन्न अभिप्रेरकों के सोपानतंत्रका प्रतिनिधित्व करती है। इच्छाशक्ति का प्रयोग करके मनुष्य अपने निम्नतरअभिप्रेरकों पर, जिनमें कुछ जीवनावश्यक अभिप्रेरक भी हैं, अंकुश लगाता हैऔर उच्चतर अभिप्रेरकों को बढ़ावा देता है। अभिप्रेरणात्मक और प्रावरोधात्मक कार्यों की एकता की बदौलत इच्छाशक्ति मनुष्य को लक्ष्य-प्राप्ति में आड़े आनेवाली कठिनाइयों पर विजय पाने में समर्थ बनाती है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में प्रेम की भावना पर विचार किया था, इस बार हम इच्छाशक्ति की संकल्पना को समझने की शुरुआत ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाओं पर चर्चा से करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं
( voluntary and volitive actions )

मनुष्य की सक्रियता किन्हीं निश्चित लक्ष्य की पूर्ति की ओर लक्षित,परस्परसंबद्ध क्रमानुवर्ती क्रियाओं की पद्धति है। क्रियाओं का उद्देश्यएक निश्चित परिणाम प्राप्त करना है, जो संबंधित सक्रियता का अभीष्ट लक्ष्यहोता है या ऐसा प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, जब हम कोई वृक्ष लगातेहैं, अर्थात उसके लिए एक निश्चित गहराई का गड्ढ़ा खोदते है, उसमें खादडालते हैं, बीच में डंडा गाड़ते हैं, फिर गड्ढ़े में पौधा रोपकर उसकी जड़ोंपर अच्छी तरह मिट्टी जमाकर उसे डंडे के सहारे खड़ा करते हैं वग़ैरह, तो हमअपने लक्ष्य को पाने के लिए एक निश्चित योजना के अनुसार काम करते हैं। कामके दौरान यह योजना विचारों तथा परिकल्पनों ( बिंबों ) के एक क्रम के रूप में सामने आती है और अलग-अलग बल, वेग, विस्तार, समन्वय और सुतथ्यतावाली गतियों के माध्यम से साकार, क्रियान्वित होती है।

निश्चितगतियां, जो मिलकर क्रिया या कार्य कहलाती हैं, और सामान्य योजना से संबद्धचिंतन की संक्रियाएं संपन्न करते हुए मनुष्य, अपना ध्यान श्रम की वस्तुतथा प्रक्रिया में प्रयुक्त उपकरणों पर संकेन्द्रित करता है। इसके साथ हीविभिन्न क्रियाएं करते हुए वह निश्चित भावनाएंभी अनुभव करता है, जैसे बाधाएं एवं कठिनाइयां सामने आने पर चिढ़ना,आवश्यकताओं की तुष्टि पर खुश होना, श्रम के लिए उत्साह, थकान, श्रम मेंआनंद पाना, इत्यादि।

सीधे क्षोभकों द्वारा निर्धारित अनैच्छिक क्रिया ( involuntary action, reflex ) के विपरीत संकल्पात्मक क्रिया ( volitive action ) समुचित साधनों ( संकेतों, मानक मूल्यों, आदि ) की मददसे, यानि किसी माध्यम के ज़रिए संपन्न की जाती हैं। इस तरह शल्यचिकित्सकपहले अपने मन में भावी आपरेशन का बिंब बनाता है और इसके बाद ही वास्तविकआपरेशन करने लगता है।

संकल्पात्मक क्रिया स्वतःनियमन( self regulation ) की मदद से की जाती है। इसकी संरचना में निम्न चीज़ेंशामिल रहती हैं : कर्ता का लक्ष्य, इस लक्ष्य को पाने के लिए की जानेवालीक्रियाओं व संक्रियाओं का कार्यक्रम, क्रियाओं की सफलता के मापदंड कानिर्धारण और उनकी वास्तविक परिणामों से तुलना, और अंत में, इस बारे मेंनिर्णय कि क्रिया को पूर्ण माना जाए या समुचित सुधार के बाद आगे जारी रखाजाए। अतः किसी भी ऐच्छिक क्रिया के स्वतःनियमन के लिए उसकी आयोजना (planning ) व निष्पादन ( execution ) पर संकल्पात्मक नियंत्रणआवश्यक होता है। व्यक्तिवृत में नियमन व नियंत्रण का कार्य आरंभ मेंवयस्कों द्वारा बच्चे के साथ संयुक्त सक्रियता एवं संप्रेषण के दौरानसंपन्न किया जाता है। बाद में सक्रियता के प्रचलित मानकों तथा संरूपों केआभ्यंतरीकरण के फलस्वरूप बच्चा अपनी क्रियाओं का स्वयं नियंत्रण करनासीखता है।

ऐच्छिक क्रियामें मनुष्य पहले यह मालूम करता है कि उसकी क्रिया के भावी परिणाम का बिंबउसकी सक्रियता के प्रयोजन ( purpose ) से, यानि जो लक्ष्य उसने स्वयं तयकिया है, उससे संगत ( compatible ) है या नहीं। इसके बाद उसकी क्रिया वैयक्तिक महत्त्व ( personal importance ) ग्रहण कर लेती है और उसकी सक्रियता के लक्ष्यके रूप में सामने आती है। सक्रियता की संरचना में ऐच्छिक क्रियाएं उसकाउच्चतर स्तर होती हैं और उनकी विशेषता होती है सचेतन लक्ष्य और उनकीप्राप्ति के लिए साधनों का सचेतन चयन। छात्र द्वारा निबंध की रूपरेखा केबारे में सोचना, सामग्री की मन में पुनरावृति, आदि ऐच्छिक क्रियाएं बिनाकिसी बाह्य चिह्नों के संपन्न की जा सकती हैं।

संकल्पात्मक क्रियाएं एक विशेष प्रकार की ऐच्छिक सक्रियता है। ऐच्छिक क्रिया के सभी लक्षणों से युक्त संकल्पात्मक क्रिया की एक मुख्य शर्त कठिनाइयों को लांघनाहै। दूसरे शब्दों में, ऐच्छिक क्रिया को हम संकल्पात्मक क्रिया तभी कहसकते हैं, जब इसकी निष्पत्ति  ( achievement ) के लिए विशेष प्रयास कियाजाता है।

संकल्पात्मक क्रियाएं कम या अधिक जटिल ( complex ) होसकती हैं। उदाहरण के लिए, नदी या तरणताल में ऊंचाई से कूदने का प्रयत्नकरनेवाले को पहले अपने तत्संबंधी भय पर विजय पानी पड़ती है। इन्हें सरल संकल्पात्मक क्रियाएं कहा जाता हैं। जटिलसंकल्पात्मक क्रियाओं में कई सारी सरल क्रियाएं शामिल होती हैं। उदाहरण केलिए, कोई कठिन धंधा सीखने का निर्णय करनेवाले नौजवान को अपना लक्ष्य पानेके लिए कई सारी अंदरूनी और बाहरी बाधाएं व कठिनाइयां लांघनी होती हैं।अपनी बारी में जटिल क्रियाएं मनुष्य की सचेतन रूप से निर्धारित निकटवर्तीतथा सुदूर लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर लक्षित संकल्पात्मक सक्रियता मेंसम्मिलित होती हैं।

ऐसी सक्रियता मनुष्य की संकल्पात्मक विशेषताओं को, उसकी इच्छाशक्ति ( volition, will power ) को प्रकट करती है।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

प्रेम की भावना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में आवेश पर विचार किया था, इस बार हम प्रेम की भावना पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रेम की भावना

बहुत-सीऐसी स्थायी भावनाएं ( आवेश में बदलनेवाली और न बदलनेवाली स्थायी भावनाएं )होती हैं कि जिनके दायरे में मनुष्य के सभी विचार और इच्छाएं आ जाती हैंऔर जिन्हें उसके संवेगात्मक क्षेत्र की अनन्य विशेषताएं कहा जा सकता है।उनमें एक प्रमुख भावना, विशेषतः युवावस्था में, प्रेम की भावना है, जिसे एक स्थायी संवेग माना जा सकता है। अपने व्यापक अर्थ में, यानि एक सामान्य संकल्पना ( general concept ) के अर्थ में प्रेम एक अत्यंत प्रबल सकारात्मक संवेग है, जो अपने लक्ष्य ( वस्तु अथवा व्यक्ति ) को अन्य सभी लक्ष्यों से अलग कर लेता है और उसे मनुष्य की जीवनीय आवश्यकताओं एवं हितों के केंद्र में रखता है। मातृभूमि, संगीत, मां, बच्चों आदि से प्रेम इस कोटि में आता है।

संकीर्ण अर्थ में, यानि एक विशिष्ट संकल्पना ( specific concept ) के अर्थ में प्रेम मनुष्य की एक प्रगाढ़ ( dense ) तथा अपेक्षाकृत स्थिर भावना है, जो शरीरक्रिया की दृष्टि से यौन आवश्यकताओं ( sexual needs ) की उपज होती है और अपनी महत्त्वपूर्ण वैयक्तिक ( individual ) विशेषता द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में इस ढंग से अधिकतम स्थान पा लेने की इच्छा में व्यक्त होती है कि उस व्यक्ति में भी वैसी ही प्रगाढ़ तथा स्थिर जवाबी भावनारखने की आवश्यकता पैदा हो जाए। प्रेम की अनुभूति अत्यंत निजी अनुभूति हैऔर उसके साथ स्थिति के मुताबिक़ पैदा होने और बदलने वाले स्नेह तथाहर्षोन्माद जैसे संवेग, उत्साह अथवा अवसाद की मनोदशा और कभी-कभी उल्लासअथवा दुख जैसे भाव पाए जाते हैं। मनुष्य की यौन आवश्यकता, जो अपने अंतिम विश्लेषण में वंश की वृद्धि सुनिश्चित करती है, और प्रेम, जो मनुष्य को वैयक्तिकरण ( personalization ) के लिए, यानि अपने लिए महत्त्वपूर्ण दूसरे व्यक्ति ( प्रेम के पात्र ) में जारी रहने तथा भावात्मकतः प्रतिनिधीत होने के लिए इष्टतम अवसर प्रदान करनेवाली सर्वोच्च भावना है – इन दोनों का विलयन ( merger ), परावर्तन में उनके एक दूसरे से पृथक्करण ( separation ) को लगभग असंभव बना डालता है।

इस तरह प्रेम की भावना का द्वैध ( duplex ) स्वरूप होता है। किंतु अनेक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक संप्रदायों ने उसके शारीरिक ( physical ) और ‘आत्मिक’ ( spiritual ) पहलुओं में से किसी एक पहलू को ही सब कुछ सिद्ध करने का प्रयत्न किया। प्रेम को या तो केवल कामवृत्ति का पर्यायमान लिया गया ( जो समकालीन मनोविज्ञान की बहुसंख्य धाराओं के लिए ही नहीं,अपितु आधुनिक बाजारवादी संस्कृति के लिए भी लाक्षणिक है ), या फिर उसकेशारीरिक पहलू को नकारकर अथवा महत्त्वहीन बताकर उसे मात्र एक ‘आत्मिक’ भावनाका दर्जा दे दिया गया ( इसकी अभिव्यक्ति ईसाई धर्म द्वारा ‘प्लेटोनिक’प्रेम को उचित ठहराने और शारीरिक प्रेम को निकृष्ट, गंदा तथा पापमय कर्मसिद्ध करने में देखी जा सकती है )। सत्य यह है कि शारीरिक आवश्यकताएं निश्चय ही पुरुष तथा स्त्री के बीच प्रेम की भावना के पैदा होने तथा बने रहने की एक पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है, किंतु अपनी अंतरंग ( intimate ) मानसिक विशेषताओं की दृष्टि से प्रेम एक समाजसापेक्ष भावना हैं क्योंकि मनुष्य के व्यक्तित्व में शारीरिक तत्व दब जाता है, बदल जाता है और सामाजिक रूप ग्रहण कर लेता है।

किशोर-प्रेम अपने विशिष्ट स्वरूपके कारण विशेष महत्त्व रखता है।  निस्संदेह, वयस्कों ( adults ) के प्रेमकी भांति ही किशोर वय ( teenager ) में किया जानेवाला प्रेम भी शरीरक्रियाकी, यौन आवश्यकता की उपज होता है। फिर भी आरंभिक यौवनावस्था तथा ख़ासकरकिशोरावस्था का प्रेम, वयस्क प्रेम से बहुत भिन्न होता है। आमतौर पर किशोर इसके मूल में निहित आवश्यकताओं के बीच स्पष्ट भेद नहीं करपाते और यह भी पूरी तरह नही जानते कि उन्हें तुष्ट कैसे किया जाता है।कभी-कभी वयस्क लोग ( शिक्षक, माता-पिता, परिचित लोग, आदि ) प्रेमी-युगल केसंबंधों को देखकर अनजाने ही उनमें अपने निजी यौन अनुभव आरोपित (superimposed ) कर बैठते हैं ; प्रेमी-युगल प्रायः महसूस कर लेता है किबड़े लोग उसके संबंधों को ग़लत दृष्टिकोण से देख रहे हैं और इसलिए पूछताछकिए जाने पर किशोर अविश्वास, अवमानना तथा धृष्टतापूर्वक उत्तर देता है औरनैतिक भर्त्सना से बचने की कोशिश करता है। यद्यपि इस आयु में प्रेम वस्तुपरक ( objective ) रूप से कामेच्छा पर आधारित होता है, प्रेमियों के व्यवहार का स्वरूप प्रायः कामेच्छा की बात को नकारता है।कतिपय अदूरदर्शी शिक्षक किशोरों के प्रेम को अनुचित, निंदनीय और‘प्रतिबंधित’ ठहराकर आपस में प्रेम करनेवाले किशोर लोगों को अपने को शेषसमूह से अलग-थलग कर लेने और अपने अंतरंग संबंधों के दायरे में और भीज़्यादा सिमट जाने को बाध्य कर देते हैं।

मनोविज्ञान में एकसमेकित पद्धति के नाते प्रेम की आंतरिक संरचना का अध्ययन करने और इसकेविभिन्न घटकों का व्यक्ति की विभिन्न विशेषताओं से संबंध जानने केबहुसंख्य प्रयत्न किए गए हैं। इस क्षेत्र में एक सबसे महत्त्वपूर्णउपलब्धि मनुष्य की प्रेम करने की योग्यता और स्वयं अपने प्रति उसके रवैयेके बीच मौजूद संबंध को जानना था। यह और बहुत-सी अन्य खोजें और विवाह तथापरिवार में प्रेम की बुनियादी भूमिका मनश्चिकित्सा, शिक्षा औरमनोवैज्ञानिक सहायता की व्यवस्था में प्रेम संबंधी समस्याओं के महत्त्व कोबढ़ा देती हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

भावना के रूप में आवेश

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में संकीर्ण अर्थ में भावनाओं पर विचार किया था, इस बार हम आवेश पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


आवेश
( Intense emotion )

आवेशमनुष्य की एक विशेष प्रकार की स्थायी भावनाएं हैं। लोगों का जिससे वास्तापड़ता है या जो उनके जीवन में घटता है, उसके प्रति उनका रवैया ( attitude )सामान्यतः एक स्थायी रूप ग्रहण कर लेता है और उनकी सक्रियता की एक स्थायीप्रेरक-शक्ति ( persuasive ) बन जाता है। यह शक्ति मनुष्य के उसकी रुचि कीवस्तुओं से संबद्ध प्रत्यक्षों ( perception ), परिकल्पनों और विचारों कीविशेषताओं और उसके द्वारा क्रमानुवर्ती संवेगों, भावों तथा मनोदशाओं कोअनुभव करने के ढंग को निर्धारित करती है। वह कुछ क्रियाओं के लिए उत्प्रेरक और दत्त मनुष्य की गहन भावनाओं से मेल न खानेवाली क्रियाओं के लिए प्रबल अवरोधक बनती है। इस तरह भावना मनुष्य के चिंतन तथा सक्रियता से एकाकार हो जाती है। आवेश को मनुष्य के विचारों और कार्यों की दिशा का निर्धारण करने वाली स्थिर, प्रबल और सर्वतोमुखी भावना कहा जा सकता है

आवेशमनुष्य को अपने सभी विचार अपनी भावनाओं की वस्तु पर संकेंद्रित ( focus )करने, इन भावनाओं के मूल में निहित आवश्यकताओं की पूर्ति की विस्तार सेकल्पना करने और उसके मार्ग में खड़ी वास्तविक अथवा संभावित बाधाओं वकठिनाइयों के बारे में सोचने को विवश करता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीयस्वाधीनता के लिए लड़नेवाले देशभक्त के मामले में उसकी गहनतम आवश्यकताओं औरस्वप्नों से जुड़ी हुई मातृभूमि से प्रेम की भावना एक ऐसी अदम्य शक्ति मेंपरिवर्तित हो जाती है कि जो उसे विजय प्राप्ति के निमित्त जान की बाज़ी भीलगा देने को मजबूर कर देती है।

जो चीज़ें मुख्य आवेश से संबद्धनहीं हैं, वे गौण होकर पृष्ठभूमि में चली जाती हैं, वे मनुष्य को उत्तेजितनहीं करती और कभी-कभी तो भुला ही दी जाती हैं। इसके विपरीत जो चीज़ेंमनु्ष्य के आवेश से संबंध रखती हैं, वे उसकी कल्पना को आलोड़ित करती हैं, उसका ध्यान खींचती है, उसके मन पर छायी रहती है और स्मृति में अंकित हो जाती हैं। अतुष्ट आवेश सामान्यतः प्रबल संवेगों और भावावेशों ( क्रोध, क्षोभ, हताशा, नाराजगी, आदि ) को जन्म देता है।

कभी-कभी मातृभूमि-प्रेम अथवा सत्य की खोज और जनसेवा के एक साधन के नाते अविष्कारकर्म तथा विज्ञान से प्रेम जैसी उदात्त तथा उच्च भावना भी आवेश में परिणत हो सकती है। ऐसे मामलों में आवेश मनुष्य को शोधपूर्ण कार्यों के लिए उत्प्रेरित करेगा, अथक प्रयास करते रहने के लिए वर्षों तक उसका संबल बना रहेगा और वैज्ञानिक खोजों तथा सृजनात्मक उपलब्धियों के स्रोतमें परिणत हो जाएगा। आवेश ऐसी नैतिकतः निंदनीय भावनाओं से भी पैदा हो सकताहै, जिनकी जड़ें मनुष्य के विकास की परिस्थितियों या उसकी वैयक्तिकविशेषताओं में हैं। ऐसे आवेशों को हम निकृष्ट आवेश कहते हैं ( उदाहरणार्थ, नशे की लत ) और जो आदमी उसके वशीभूत होकर अपने को गिरने देता है, उसकी हम निंदा करते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

संकीर्ण अर्थ में भावनाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्तित्व के संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्रों को समझने की कड़ी के रूप में मुख्य संवेगात्मक अवस्थाएं और उनकी विशेषताओं पर विचार किया था, इस बार हम संकीर्ण अर्थ में भावनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भावनाएं और व्यक्तित्व

मनुष्यकी संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं और उसके व्यवहार और सक्रियता के संकल्पमूलकनियमन की अनुषंगी भावनाएं व्यक्तित्व की एक सबसे सजीव अभिव्यक्ति है। उनकी उत्पत्ति संज्ञान और सक्रियता की वस्तुओं के प्रति मनुष्य के स्थायी रवैयों ( permanent or stable attitudes ) से होती है।किसी मनुष्य का वर्णन करने का अर्थ सर्वप्रथम यह बताना है कि उसे क्यापसंद और क्या नापसंद है, वह किससे घृणा या ईर्ष्या करता है, किस बात पर वहगर्व या शर्म महसूस करता है, किस बात से उसे ख़ुशी मिलती है, वग़ैरह। मनुष्यकी स्थायी भावनाओं के विषय, इन भावनाओं की प्रगाढ़ता, स्वरूप तथा संवेगों,भावों, आदि के रूप में अभिव्यक्ति की प्रायिकता ( probability ) उसके भावना-जगत और उसके व्यक्तित्वका परिचय देते हैं। इस कारण संवेगात्मक प्रक्रियाओं का गहराई में विश्लेषणअल्पकालिक अवस्थाओं पर नहीं, अपितु मनुष्य के व्यक्तित्व की विशेषतासूचकस्थायी भावनाओं पर केंद्रित होना चाहिए।

संकीर्ण अर्थ में भावनाएं
( Emotions in narrow sense )

संवेगों,भावों, मनोदशाओं और खिंचावों के विपरीत, जिनका स्थिति-सापेक्ष स्वरूप (situation-relative format ) होता है और जो किसी निश्चित क्षण यापरिस्थितियों में किसी वस्तु ( अथवा व्यक्ति ) के प्रति मनुष्य के रवैयेको प्रतिबिंबिंत करते हैं, अपनेसंकीर्ण अर्थ में भावनाएं मनुष्य की स्थिर आवश्यकताओं की वस्तु के प्रतिमनुष्य के रवैये को प्रतिबिंबिंत करती हैं, यानि उसके व्यक्तित्व के रुझान ( personality trends ) को दिखाती हैं।उनकी स्थिरता को घंटों या दिनों में नहीं, अपितु महीनों और वर्षों मेंव्यक्त किया जाता है। भावनाएं सदा यथार्थ ( reality ) से जुड़ी होती हैं।उन्हें तथ्य, घटनाएं, लोग, परिस्थितियां जन्म देते हैं, जिनके प्रतिमनुष्य स्थिर रूप से सकारात्मक अथवा नकारात्मक रवैया रखता है। स्थिरअभिप्रेरक तभी मनुष्य को सदा के लिए सक्रिय बना सकते हैं, यानि उसे अविरामसक्रियता के लिए उत्तेजित कर सकते हैं, जब वे उसकी स्थायी भावनाओं का विषयबनते हैं।

स्वयं मनुष्य के लिए भावनाएं, उसकी आवश्यकताओं के अस्तित्वके स्वयं उसके लिए आत्मपरक ( subjective ) रूपों के तौर पर पैदा होती हैं।वास्तव में कोई भी प्रेक्षक ( अर्थात् जांचकर्ता मनोविज्ञानी ) मनुष्य केकार्यों के पीछे छिपे अभिप्रेरकों ( motives ) को प्रकट कर सकता है औरकारणात्मक अरोपण की प्रणाली के ज़रिए उनकी व्याख्या कर सकता है। किंतुस्वयं मनुष्य अपने व्यवहार तथा सक्रियता के अभिप्रेरकों को भावनाओं के रूप में अनुभव करता है।इसका मतलब है कि अभिप्रेरक, कर्ता के सामने ऐसी भावनाओं की शक्ल में आतेहैं, जो उसे बताते हैं कि कोई वस्तु उसकी आवश्यकताओं की तुष्टि के लिएकैसे और किस हद तक जरूरी है। मनुष्य के व्यक्तित्व के रुझान को तयकरनेवाले अभिप्रेरक जितने ही स्थिर होंगे, उसे अपनी सक्रियता या व्यवहारमें सहायक या बाधक हर चीज़ उतनी ही अपने भावजगत से संबद्ध लगेगी, और उसकेरवैये ऐसी भावनाओं का रूप लेंगे, जो उसकी आवश्यकताओं की तुष्टि कीप्रक्रिया की सफलता या विफलता की परिचायक हैं।

संवेगात्मक अनुभव केसामान्यीकरण ( generalization ) के फलस्वरूप पैदा हुई भावनाएं व्यक्ति केसंवेगात्मक क्षेत्र में प्रमुख बन जाती हैं और स्थितिसापेक्ष संवेगों,मनोदशाओं तथा भावों की गतिकी ( dynamics ) तथा अंतर्वस्तु ( content ) कोनिर्धारित करने लगती हैं।

भावना, स्थितिसापेक्ष संवेगों की गतिकी तथा अंतर्वस्तु को निर्धारित करती हैं,इसे एक मिसाल देकर स्पष्ट करें। प्रियजन के प्रति प्रेम की भावना, अपने कोस्थिति के अनुसार अलग-अलग ढंग से व्यक्त करती है : जब वही प्रिय व्यक्तिसफलता पाता है, प्रेम हर्ष का रूप लेता है, और जब नहीं पाता, तो दुख केरूप में प्रकट होता है, यदि प्रिय व्यक्ति का व्यवहार आशा के अनुरूपनिकलता है, तो प्रेम उसपर गर्व का रूप लेता है और यदि आशा के प्रतिकूलपाया जाता है, तो प्रेम रोष के रूप में प्रकट होता है। भावना जितनी हीप्रबल होगी, उसपर क्षणिक संवेगों का प्रभाव उतना ही कम पड़ेगा।

मांअपनी बेटी से उसकी किसी हरकत के कारण नाराज़ हो सकती है, फिर भी कुछ समयबाद बेटी के प्रति प्रेम की भावना का पलड़ा भारी हो जाएगा, उसकी हरकत भुलादी जाएगी और उसे क्षमा कर दिया जाएगा। यह भावना का प्रबल और साथ ही दुर्बल पहलू है।भावना में स्पष्ट परिवर्तन लाने के लिए नकारात्मक संवेगों के संचय केवास्ते बहुत अधिक हरकतों की जरूरत होती है। इसके विपरीत एक मनुष्य कादूसरे मनुष्य के प्रति अपेक्षाकृत अनिश्चित संवेगात्मक रवैये को पूर्णतःसकारात्मक या नकारात्मक भावना में बदलने के लिए दूसरे मनुष्य द्वारा पहलेमनुष्य में केवल एक प्रबल सकारात्मक या नकारात्मक संवेग जगाना ही पर्याप्तहै। प्रायः किसी छात्र के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया ऐसे ही पैदा होताहै और इस ख़तरे से शिक्षक को सदा सतर्क रहना चाहिए।


इस बार इतना ही।

जाहिरहै, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओंके द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकताहै।

शुक्रिया।

समय

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