टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ ख़ुराक – ४

हे मानवश्रेष्ठों,
इस बार, पिछली कुछ बार की तरह ही समय  की कुछ टिप्पणियां पेश की जा रही हैं।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। आपके दिमाग़ को इनसे कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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पुराण, इतिहास और विज्ञान: क्या है सत्य?…प्रविष्टि पर ‘कल्किआन हिंदी’ पर एक टिप्पणी:
एक बहुत ही अच्छा आलेख जो कि कई मुद्दों को एक साथ छूता है और समझ को आंदोलित करता है।
गुप्त जी की इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि कल्पना हमेशा सत्य और सही होती है, तथा विज्ञान मिथक या गल्प कथाएं हमेशा वास्तविकता का यथार्थ परावर्तन करती हैं।

कल्पनाएं वास्तविकता की ज़मीन से ही पैदा होती हैं, उनका आधार वर्तमान ज्ञान और अनुभवों की श्रृंखलाओं से ही व्युत्पन्न होता है, परंतु वे जाहिरा तौर पर यथार्थ नहीं होती। वास्तविकताओ का आरोपण, अव्यवहारिक परिस्थितियों पर किया जाकर ऊलजलूल कल्पनाएं की जा सकती हैं, की जाती रही हैं। जाहिर है, इन्हें यथार्थाधारित संभावित परिणामों की कल्पनाओं से अलग किया जाना आवश्यक होता है।

ऐसे ही विज्ञान गल्प कथाओं में भी देखा जा सकता है। वहां ऐसी कई कल्पनाओं का चित्रण मौजूद है, जिनमें कई का यथार्थ में उतर आना अभी शेष है, और कई कतई संभव ही नहीं हो सकती।

ऐसा ही हमारे अमूल्य प्राचीन धरोहरों के साथ भी है। वैदिक और पौराणिक साहित्य, जैसा कि गुप्त जी ने कहा कि अपने समय की ही उपज हैं और उनसे तात्कालिक समाज की दशादिशा के ऐतिहासिक संदर्भ उदघाटित हो सकते हैं, होते हैं। इन पर काल संबंधी समस्या इसलिए पैदा होती हैं कि यह श्रुति परंपरा से गुजर कर आगे बढ़े हैं, और लगातार रचे जाने की प्रक्रिया से गुजरे हैं तथा बहुत बाद में जाकर कहीं लिपिबद्ध हो पाए हैं।

इनसे वास्तविकता का निरूपण बेहद सावधानी भरा कार्य होना चाहिए, क्योंकि इनके जरिए हम इतिहास रच रहे होते हैं, जिसके आधार पर कि वर्तमान का समुचित यथार्थ विश्लेषण संभव हो सकता है ताकि बेहतर भविष्य की नींव रखी जा सके।

कई ऐतिहासिक अध्ययन की धाराएं यह महती कार्य कर रही हैं।

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श्रीमद्‍भगवतगीता के साथ मेरे अनुभव…प्रविष्टि पर ‘अनवरत’ पर एक टिप्पणी:
‘गीता ने ऐसे बहुतेरे लोगों को आकृष्ट किया है जिनकी मनोवृत्ति एक-दूसरे से तथा अर्जुन से बिल्कुल भिन्न थी। गीता को भगवदवचन समझा जाता है और इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न अभिरुचि वालों ने ऐसे निराले ढ़ंग से की है कि लगता है, मूल वस्तु ही कुछ ऐसी है जो आंतरिक भेदों को मिटाने के बजाए, ज़्यादा शंकाएं औए खंड़ित व्यक्तित्व पैदा करती है।
वह नीति-दर्शन निश्चय ही अत्यंत संदिग्ध होता है जिसकी व्याख्या विभिन्न समाजों में विकसित हुए दिमागों ने इतने विभिन्न रूपों में की हो। उसकी मौलिक मान्यता क्या रह जाती है, अगर उसका अर्थ इतना लचीला है? फिर भी, यह पुस्तक ( गीता )कई मायनों में उपयोगी तो है ही।’

ये एक भारतीय मानवश्रेष्ठ के शुभवचन हैं। जो गीता की वस्तुगतता पर कई महत्वपूर्ण इशारे करते हैं। गीता एक ऐसा धर्मग्रंथ है जिससे मान्य ब्राह्मण कर्मकांडों का तिरस्कार किये बिना, किसी भी तरह की सामाजिक कार्रवाई के लिए प्रेरणा और औचित्य प्राप्त किया जा सकता है, यही कारण है जो इसकी प्रतिष्ठा को सर्वव्यापक बनाता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय, सभी तरह की विरोधी विचारधाराओं वाले कई महापुरूष इस एक ही किताब से यही प्रेरणा और औचित्य प्राप्त कर रहे थे।

इसमें तत्कालीन उपस्थित सभी तरह की दर्शन विचारधाराओं का संश्लेषण है, इसलिए यह विरोधाभासों से भरी हुई है। गीता की अपनी जो विलक्षण त्रुटी है, अर्थात असंगति में संगति की प्रतीति कराने का कौशल, वही उसकी उपयोगिता का हेतु भी है।

इसलिए अपनी आस्था का विषयी बनाकर, गीता से अपने किसी भी तरह के कर्म का औचित्य प्राप्त करने की अवसरवादिता सिद्ध करने का जरिया बनाने की बजाए, इसके समुचित विश्लेषण की गहराइयों मे उतरकर चीज़ों को जैसी वह हैं, समझने का जरिया बनाने की राह प्रशस्त करनी चाहिए। इसके नये भाष्य और व्याख्याओं की जरूरत है, ना कि इसके प्रचलित धार्मिक अवसरवादी आख्यानों की प्रस्तुति भर।

आपने इस आलेख में इस पर कुछ इशारे किए हैं। यदि आप वाकई में यदि गीता पर कुछ प्रस्तुत करने का मन बनाते हैं जैसी की यहां अपेक्षाएं की जा रही हैं, तो यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि आप उपरोक्त जरूरतों की पूर्ति का भरसक प्रयत्न करेंगे।

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नास्तिकता मेरी नज़र से…प्रविष्टि पर ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर एक टिप्पणी:
एक संतुलित और सारगर्भित आलेख।

नास्तिकता पर बहस को यह एक गंभीर दिशा दे ही रहा है, पर यह वह राह भी दिखा रहा है कि किस तरह का परिवेश बचपन को दिया जाना चाहिए।

संगीता जी से यह पूछने की हिमाकत कर रहा हूं, कि वे अंधविश्वासों में यकीन क्यों नहीं करती? इस प्रश्न से ईमानदार माथापच्ची शायद उन्हें अपनी चेतना के परिष्कार का कुछ अवसर उपलब्ध करवा सके।

मनुष्य का ज्ञान और समझ जितना विकसित होती जाती है, उसी स्तर के अनुरूप वह कम स्तर की चीज़ों का तार्किक विश्लेषण करने की हिमाकत करने लगता है, और परंपराओं से प्राप्त मान्यताओं को तौलने लगता है।

जाहिर है उनका अभी तक का ज्ञान और समझ जिस तरह से कई चीज़ों से उन्हें मुक्त कर पाया है। अगर उनका संधान यहीं नहीं रुकता तो वे और भी कई चीज़ों से मुक्त होने की असीम संभावनाएं रखती हैं। अपने अनुकूलन से संघर्ष वाकई एक मुश्किल कार्य है। इस हेतु उन्हें शुभकामनाएं।

संदेह से उत्पन्न नास्तिकता को सैद्धांतिकता का एक आधार चाहिए होता है, अगर वह नहीं मिलता तो पुराना अनुकूलन फिर से हावी हो सकता है। शायद वे समझना चाहें।

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अगर धर्म एक अच्छे इंसान होने का…प्रविष्टि पर ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर एक टिप्पणी:
लिखे तो सटीक मित्र, पर इतना आक्रामक होने की जरूरत नहीं लगती। समझदारी को विनम्रता लानी ही चाहिए, या यूं कहें कि यह लाती ही है। भाषा-प्रयोग में सावधानी बरतना हमें सीखना ही चाहिए।

आखिर यह पारिस्थितिक संयोग ही है कि हम अपने चुनावहीन परिवेश की पैदाईश हैं और समझ तथा ज्ञान के तदअनुकूल स्तर से ही आगे की राह निकालने की जुंबिशों में रहते हैं। इसलिए सापेक्षतः पीछे लग रहे अपने मानव-बांधवों के प्रति हमारे मन में उनकी लाख उठापटकों के बावज़ूद सहानुभूति का भाव रखना ही श्रेष्ठ है, ना कि मखौल बनाने का।

आपने बहुत बढ़िया बात उठाई है। अगर इस पूरे प्रपंच को बारीकी से देखा-समझा जाए तो यह आसानी से पकड़ा जा सकता है कि मनुष्य के अच्छे और बेहतर होने की संभावनाएं सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म से मुक्त होने से ही प्रशस्त हो सकती हैं। जहां उसके हर क्रियाकलाप की जिम्मेदारी ख़ुद लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, कोई पापमुक्ति नहीं होती, कोई वैकल्पिक प्रायश्चित नहीं होता। जाहिरा तौर पर यह स्थिति नई जिम्मेदारियां लेकर आती है, और हमें इसके लिए स्वयं की समझ को निरंतर परिष्कृत करते रहना चाहिए।

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कृत्रिम जीवन कोशिका की प्रयोगशाला में…प्रविष्टि पर ‘कल्किआन हिंदी’ पर तीन टिप्पणियां:
पहली:
आदरणीय श्याम गुप्त जी,
लगता है सबसे पहले हमें अपने भारतीय प्राच्य ज्ञान और वैदिक साहित्य का पेटेंट कराना चाहिए। हमारे यहां यह सब पहले से ही वर्णित है और पाश्चात्य शक्तियां जो आज सिर्फ़ संयोग या किसी दैवीय कृपा से विश्व की सिरमौर बनी हुई हैं, फालतू ही इनका श्रेय अपने नाम कर रही हैं।

क्या खूब बात कही है आपने, यह सिर्फ़ ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक भाग है। पता नहीं क्यों हमारा ईश्वर, उनके ईश्वर के आगे कमजोर पड़ जाता है। सही है, हमें अपने ईश्वर की सहायता के लिए आगे आना ही चाहिए।

हमें अपनी नैतिकता को सर्वोपरी रखना ही चाहिए और सदुपयोग-दुरूपयोगों पर ही अपनी उर्जा खपानी चाहिए। खोज-वोज जैसे बेकार के काम तो कुछ अवैदिक मूर्ख कर ही रहे हैं।

दूसरी:
आदरणीय,
मानवजाति की ऐतिहासिक-वैज्ञानिक समझ यह सिखाती है कि इतिहास के एक काल-विशेष के दौरान, तत्कालीन स्तर का ज्ञान, समझ और चिंतन ही ‘वर्णित’ हो सकता है, और वही ‘वर्णित’ ज्ञान ‘क्रियात्मक’ हो सकता है जो ज़िंदगी की ठोस वास्तविकता से निगमित होता है तथा इसी ठोस वास्तविकता को और बेहतर बनाने का वास्तविक माद्दा रखता है।

मनुष्यजाति इसी ठोस प्राच्य ज्ञान के क्रमिक विकास के फलस्वरूप ही आज की अवस्थाओं को प्राप्त हुई है। वास्तविक ज्ञान सिर्फ़ ज्ञान होता है और उसकी वास्तविकता ही उसे सार्वभौमिक बनाती है, एक वैश्विक सामान्य सहमति तक पहुंचाती है। इसे अपना-पराया, पूर्वी-पाश्चात्य के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। इन सीमाओं में सिर्फ़ काल्पनिकताओं, व्याख्याओं, आस्थाओं आदि को ही रखा जाना श्रेयष्कर हो सकता है।

वास्तविकता तो यह है कि हमारे इसी प्राच्य ज्ञान की भाववादी धारा ने हमारे यहां कल्पनाओं की उड़ान का वह एकतरफ़ा घटाघोप सुस्थापित किया कि तार्किकता, वास्तविकता, वैज्ञानिकता और स्वतंत्र सोच-समझ को समाज ने हमेशा के लिए स्थगित कर दिया। और कमोवेश यही स्थिति अभी तक जारी है। इसी कारण यहां वैज्ञानिक मेधाओं की पैदाईश और विकास के अवसर उपलब्ध ही नहीं है। हमारी और आपकी ऐसी लाखों सदइच्छाओं के बावज़ूद सच यही है। इन परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन ही नई राहें खोल सकता है।

रुका हुआ पानी ही सड़ता है, बहती धाराएं अपना रास्ता खोज ही लेती है। समाज अपने क्रमविकास के दौरान बेहतर को संजोता, उसे और बेहतर करता तथा बेकार को त्याजता चलता है। यही ऐतिहासिक सच्चाई है, हम जैसे भी चाहे इसे देखने और व्याख्यायित करने के लिए स्वतंत्र होते ही हैं।

आपने संवाद के लायक समझ मान बढ़ाया। शुक्रगुजार हूं।

तीसरी:
आदरणीय,

आपने समय की इस पंक्ति, ‘मनुष्यजाति इसी ठोस प्राच्य ज्ञान के क्रमिक विकास के फलस्वरूप ही आज की अवस्थाओं को प्राप्त हुई है।’, का विस्तार किया, उसे समझाया। शुक्रगुजार हूं।

क्रमिक विकास के प्रति आपकी स्वीकरोक्ति से यह साफ़ होता है कि आप अच्छी तरह से समझते हैं, कि इस क्रम-विकास के बहुत ज़्यादा निचले पायदान वाला ज्ञान, ऊपर वाले पायदान से बेहतर और श्रेष्ठ नहीं हो सकता। आगे के ज्ञान का आधार तो खैर वह होता ही है।

मतलब आप यही कहना चाहते हैं, और जो आपकी बुद्धिमता का परिचायक है, कि प्राच्यज्ञान की ए बी सी ड़ी से अपने आपको गुजारते हुए, ज्ञान के क्रमिक विकास का अध्ययन करते हुए, मनुष्य को अद्युनातन ज्ञान की उंचाईयों को छूना चाहिए। यहां कोई मतभेद नहीं है, आप वाज़िब फरमा रहे हैं।

समस्या तो अतीत को, पुरातन को, प्राच्य को श्रेष्ठतम मानते और बताते हुए, उसी की ओर लौटने की प्रवृत्तियों की वज़ह से है। अगर अतीत में सबकुछ सर्वश्रेष्ठ संपन्न हो चुका, तो फिर कल्पनाओं में उड़ने की, नया रचने की आवश्यकता ही कहां रह जाती हैं। बात यही समझने की है।

हम कितना भी कह लें, कितना भी रोकना चाह लें, प्रगति हमेशा आगे की ओर ही होती है। फिर वही बात की हमारी लाख कोशिशों और सदइच्छाओं के बावज़ूद मनुष्य समाज उनको अपनाता रहेगा जो उसके विकास के मुफ़ीद रहेगा, उन्हें छोड़ता जाएगा जो उसकी प्रगति में बाधक बनेगा।

इतिहास का विकास क्रम अपने को दोहराता है, सही कहा आपने। परंतु यह फिर उसी अवस्था को जैसे का तैसा नहीं दोहराता है, उससे श्रेष्ठता के साथ यह दोहराव होता है। इसलिए यह चक्रीय गति में नहीं वरन, ऊपर की ओर जाती सर्पिलाकार वर्तुल गति में होता है, जैसे कि आप एक स्प्रिंग को खड़ा रख दें। जहां क्षैतिज धरातल पर विकास क्रम अपने को दोहराता प्रतीत होता है, दरअसल उर्ध्व धरातल पर वह उससे ऊपर की स्थिति में होता है।

वास्तविकता का यथार्थ और वस्तुगत ज्ञान बहते हुए पानी की तरह होता है, जिसे सभ्यताएं अपने साथ लिये चलती हैं। वहीं वास्तविकता का काल्पनिक और भ्रामक निरूपण, रुके हुए पानी की तरह होता है जो चेतनाओं में कहीं परंपराओं की वज़ह से अवस्थित रह जाए परंतु व्यवहारिक ज़िंदगी उसे छोड़ नई राह पकड़ लेती है। उस उक्ति का शायद यह मतलब होना चाहिए था।

आपने ज्ञान बढ़ाया, शुक्रगुजार हूं।

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मनुष्य के श्रम से विलगाव के….प्रविष्टि पर ‘अनवरत’ पर एक टिप्पणी:
मनुष्य द्वारा जीवन के पुनरुत्पादन और सुविधाओं हेतु आवश्यक उत्पादन करना उसकी नियति है। जाहिर है, उत्पादन होगा तो वह किसी ना किसी रूप में श्रम-प्रक्रियाओं से जुड़ा ही रहेगा। समस्या अभी के परिप्रेक्ष्य में है, और इसे इसी संदर्भ में बेहतर समझा भी जा सकता है। श्रम से विलगाव के जैविक परिणाम सामने ही हैं, और इसके सामाजिक परिणाम भी।

अभी सामाजिक आवश्यकताओं से निरपेक्ष व्यक्तिगतताएं, श्रमविहिन हो जाना ही अपना चरम लक्ष्य मानती है। इसीलिए यह श्रम से विलगाव की अवधारणा उत्पन्न होती है, परंतु यह वस्तुगत नहीं है। अधिकतर मनुष्य किसी ना किसी रूप में उत्पादन प्रक्रिया से जुड़े हो्ते हैं और किसी ना किसी प्रकार का श्रम कर रहे होते हैं। समाज के ऊपरी पायदान पर बौद्धिक श्रम की बढोतरी और शारीरिक श्रम की कमी होती जाती है। परंतु श्रम से विलगाव मनुष्य के हित में हो ही नहीं सकता।

इसी वज़ह से यह आसानी से देखा जा सकता है, शारीरिक श्रम से विलगित व्यक्ति विभिन्न रोगों का शिकार होते जाते हैं, मनुष्य जीवन के आनंद से भी विलग होते जाते हैं। जैसा कि आपने इशारा किया है। यही वास्तविक परिस्थितियां, वहां अपनी बारी में उन्हें सचेत करती हैं, और यह भी हम देख ही सकते है कि फिर वहां शारीरिक श्रम की वैकल्पिक विधियां खोजी जाती है, किसी ना किसी तरह से शरीर से श्रम करवाने की परिस्थितियां पैदा की जाती हैं। चूंकि यह श्रम व्यक्तिगत रूप से शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए, लगभग निरुद्देशीय सा होता है अतः इसमें नीरसता खत्म करने के लिए इसके साथ कई तरह की अवधारणाएं जोड़ी जाती हैं, ताकि इसे आंनंद से भारा जा सके तथा इसे एक सोद्देश्यता प्रदान की जा सके। यानि एक कृत्रिम जीवन शैली का समानान्तर विकास हो रहा है।

मनुष्यजाति का तकनीकि विकास उसके जीवन से भारी, नीरस, कठोर और सापेक्षतः गंदी श्रम-प्रक्रियाओं को खत्म करता है, इसमें उत्तरोत्तर प्रगति शनैः शनैः उत्पादन श्रम-प्रक्रियाओं को और हल्का और कम करेगी ही। जाहिरा तौर पर अभी की खास वर्गों की ही जागीर समझी जानी वाली तथाकथित श्रम-विहीनता और व्यापक होगी और जनसामान्य की ज़िंदगी मे प्रवेश करेंगी। सभी मनुष्यों के पास पर्याप्त समय और सुविधा होंगी कि वे अपनी श्रम की आवश्यकताओं को उनकी ही तरह सृजनात्मक कर सकें, खेलों के जरिए, विभिन्न कलाओं के जरिए, व्यक्तित्वविकास की प्रक्रिया से इन्हें जोड़ सकें,  श्रम करने के लिए ही आनंद के साथ श्रम कर सकें। यानि यह कृत्रिम ना रहकर, सहज और स्वतस्फूर्त ढ़ंग से जीवन को और आनंददायक बनाएगी।

श्रम ने मनुष्य को पैदा किया है, जाहिर है मनुष्य श्रम से विलगित नहीं हो सकता। वह लाख कोशिशें कर ले, श्रम से विलगाव की परिस्थितियां उसे पुनः किसी ना किसी रूप में श्रम की ओर लौटा ही लाएंगी, और यह उसकी इच्छाओं से स्वतंत्र ही होगा।

इस पर अलग से शोध उपलब्ध हो, यह तो नहीं कहा जा सकता। परंतु मानवजाति के अनुभवों और ज्ञान के महान भंड़ार में निश्चित तौर पर इसके निष्कर्ष निकाले जाने लायक इशारे मौजूद हैं। आप अक्सर चेतनाओं में उथल-पुथल करने के अवसर निकालते रहते हैं, अच्छा लगता है।

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इस बार इतना ही।
आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है। अलग से मेल पर भी जिज्ञासाएं की ही जा सकती हैं।

शुक्रिया।

समय

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कर्म और कर्मफल – परंपरा से इतर

हे मानवश्रेष्ठों,

इस बार भी, एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, कर्म और कर्मफल के संदर्भों में एक संवाद स्थापित हुआ था, उसे दिया जा रहा है। यहां से आप कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में जद्दोज़हद पैदा कर सकते हैं, और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर और मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण करने का उद्देश्य सामने है ही। यह बताना शायद ठीक रहे कि उनकी पूर्वानुमति इस हेतु प्राप्त कर ली ही गई थी।
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उनका प्रश्न/संवाद कुछ इस प्रकार था:

नमस्ते जी
आपका ब्लॉग पढा आज ..कुछ समझ आया और कुछ नहीं ..कारण आज कल मूड कुछ ठीक नहीं है ..आपसे एक प्रश्न है कि आप कर्म की क्या परिभाषा देते हैं ? और जो भी कर्म हम करते हैं उसका हम पर हमारे आस पास यानी हमारे साथ रहने वालों पर क्या प्रभाव पड़ता है ? और यदि आपके साथ रहने वाला कोई बुरे कर्म करता है किसी को दुःख देता है तो उसकी सजा सिर्फ उसको मिलती है या उसके साथ रहने वाले बाकी सदस्यों को भी ? यदि यह सही है तो इसका अंत कहाँ है ..? ऐसे बहुत से प्रश्न हैं ..मुझे आशा है कि आपसे मुझे इनका जवाब जरुर मिलेगा आसान भाषा में 🙂
धन्यवाद

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इस प्रश्न पर समय द्वारा किये गए इशारों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यक्तिगत संदर्भ हटा दिये गये हैं, थोड़ा संपादन भी किया गया है। आप भी देखिए, कि आप यहां से क्या पा सकते हैं।
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आदरणीय,

आजकल आपका मूड़ ठीक नहीं है। पता नहीं क्यूं मुझे ऐसा लगता है आप अक्सर इस अवस्था में आते रहते हैं। अपने आप से लड़ते हैं, नये सिरे से परिस्थितियों का विश्लेषण करते हैं, नये सिरे से अपने आपको तैयार करते हैं, संघर्ष करते हैं, और सब कुछ झटक कर फिर से अपने कामों में जुट जाते हैं। फिर कोई ऐसी बात होती है, संबंधों के बीच, मान्यताओं के बीच, मूल्यों की व्यवहारिकता के बीच कि यह सब फिर से शुरु होता है, फिर से खत्म होता है। चक्र चलता रहता है।

यह सब समय की बकवास भी हो सकती है, और इसके अस्वीकरण का अधिकार आपके पास सुरक्षित है ही। आखिर यह सब, समय आपकी कुंड़ली या हाथ की रेखाएं देखकर तो बता नहीं रहा कि सच मानने की विवशता हो।

चलिए थोड़ा सा आपके प्रश्न पर बात करते हैं:

दरअसल, आपके पास ‘कर्म’ नामक संकल्पना के पारंपरिक आशय हैं और हमारी धार्मिक परंपराओं से प्राप्त इसके गूढ़ार्थ हैं। थोड़ी क्लिष्ट भाषा है, पर जानबूझ कर इसका प्रयोग किया है, हो सकता है इस शब्दावली से आपको, आज ही पढ़ी मेरी पोस्ट संकल्पनाएं और प्रवर्ग का कुछ हिस्सा याद आजाए और आप उस पोस्ट और उक्त वाक्य के बीच के अंतर्संबंधों ( co-relation ) को देख सकें।

‘कर्म’ शब्द के आसान रूप ‘काम’ से हम भलीभांति परिचित होते हैं, बचपन से ही हम अच्छी तरह जानते हैं कि ज़िंदगी जीने के लिए मनुष्य को काम करना ही पडता है, काम कर कर ही वह वाकई में मनुष्य बनता है, कामों में दक्षता प्राप्त करता है, बिना काम किए कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता, काम अच्छा होता है तो मनुष्य को ख़ुद भी सुक़ून मिलता है शाबासी मिलती है, काम खराब होता है तो ख़ुद भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता, ग्लानि में रहता है और जाहिरा तौर पर लताड़ और प्रताड़ना मिलती है, अपने काम के जरिए ही मनुष्य अपनी पहचान बनाता है, इसी पहचान के जरिए अपने संबंधों को विकसित करता है, अच्छे काम हमें और हमारे से संबंधित परिवेश को खुश रखते हैं, सुकून देते हैं, वहीं बुरे कार्य हमें और हमारे संबंधों को ग्लानि में भरते हैं, अशांति का कारण बनते हैं। यह काम की वह समझ है जो जीवन हमें खुद समझा देता है।

समस्या तब पैदा होती है जब हम इसी काम की क्लिष्ट संकल्पना ‘कर्म’ से परिचित होते हैं, खासकर हमारे धर्मग्रंथों और उनकी बताई गई व्याख्याओं के जरिए जो कि सहज रूप से हमें हमारे आस-पास उपलब्ध होते हैं। जैसे कि आप कर्म की गीता आधारित अवधारणाओं के बीच उलझे हुए हैं। गीता कहती है कि कर्म मनुष्य का धर्म है उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना कर्म करते जाना चाहिए, बिना इसके परिणामों और फल की चिंता किए बगैर। मनुष्य के हाथ में सिर्फ़ कर्म है और बाकी चीज़ें विधाता के हाथ में हैं। जब उसके हाथ में कर्मों के परिणाम है ही नहीं, इसीलिए जाहिरा तौर मनुष्य को इनकी चिंता नहीं करनी चाहिए। बाकि का सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए, वह ही तय करेगा कि इन कर्मों का क्या परिणाम या फल देना है किसको देना है। आगे गीता यहां तक कहती है कि यहां असल में कुछ नहीं हो रहा, सब कुछ वही कर रहा है, सब कुछ पहले से नियत है और मनुष्य तो निमित्त मात्र है।

ज़िंदगी द्वारा दी गई व्यवहारिक समझ और धार्मिक सैद्धांतिक आदर्शों के बीच का यही विरोधाभास, थोड़ा पढ़े-लिखे समझदार से लोगों को थोड़ा बहुत परेशान करता रहता हैं। अधिकतर लोग तो ज़िंदगी की तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार कर्म करते रहते हैं, मूल्य और सिद्धांत उन्हें फ़ालतू की आदर्श की बाते लगती हैं जो संतों के ही वश की होती हैं और उनके लिए सिर्फ़ बात करने या दूसरों को उपदेश देने की चीज़ मात्र होती हैं। मंदिर या शमशान जैसी जगहों के लिए ही मनुष्य दार्शनिकता और धार्मिकता का सा लबादा ओढ़े रखता है। अपनी सामान्य ज़िंदगी वह इन मूल्यों और आदर्शों से दूर, प्रचलित व्यवहारिक ढ़ग से ही जीता है। वह अपनी समझ में इनके अलग-अलग खाने बना लेता है, जिनके बीच कोई संवाद, कोई अंतर्संबंध बनाना ना वह आवश्यक समझता है ना ही संभव और फिर इसी ढोंग और दोगलेपन के साथ अपनी ज़िंदगी गुजारता चला जाता है।

हमें इस पर सोचना चाहिए कि जब मनुष्य निमित्त मात्र है, उसके हाथ में कुछ है ही नहीं, जब सब कुछ पहले से नियत है, जब कर्म और परिणाम उसके वश से परे है तो  जाहिर है नैतिक-अनैतिक, गलत-सही, प्रभाव और परिणामों की चिंता आदि का भला मतलब भी क्या रह जाता है? आपको इस बारे में कभी और, विस्तार से बताना शायद संभव हो पाए कि गीता और उसके द्वारा प्रवर्तित नये धार्मिक सिद्धांतो की ऐतिहासिक और वास्तविक पृष्ठभूमि का सच क्या है? यह किन सामाजिक जरूरतों के चलते विकसित और पल्लवित हुए?

वापस लौटते हैं।

आप अपने इस बाद के अनुकूलित धार्मिक व्यामोह से निकलिए और कर्म की ज़िंदगी द्वारा सिखाई परिभाषा पर ध्यान दीजिए। अपने व्यक्तिगत और दूसरों के सार्विक अनुभवों पर गौर कीजिए। देखें कि असल जीवन हमें इस बारे में क्या सिखा रहा है, क्योंकि यह समस्याएं हमारे वास्तविक जीवन में पैदा होती हैं अतएव इनसे निपटने के तरीके भी वास्तविकताओं को समझने से ही निकलेंगे। तभी आप अपने इन प्रश्नों से सही मायनों में जूझ पाएंगे, और कोई इच्छित परिणाम देने वाली राह चुन पाएंगे। आपकी मेधा को अभिप्रेत करने के लिए समय यहां कुछ इशारे कर रहा है। ये कोई निश्चित प्रकार के सिद्धांत नहीं है, सिर्फ़ आपकी समझ को शुरूआती आवेग प्रदान करना ही यहां इनका प्राथमिक उद्देश्य है। यह ऐच्छिक तात्कालिक वर्गीकरण है।

प्रत्येक जीव सबसे पहले अपनी जिजीविषा हेतु आवश्यक क्रियाकलापों हेतु प्रवृत्त होता है। उसकी सारी क्रियाविधियां इसी हेतु प्रेरित होती हैं, दूसरे से अंतर्संबंधित गतिविधियां उतना ही आकार ले पाती हैं जितना कि उसकी व्यक्तिगत जिजीविषा हेतु सहायक होती हैं। ये किसी भी जीव के लिए प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण ‘कर्म’ होता हैं। मनुष्य भी एक जीव होने के नाते प्राथमिक रूप से, अवचेतन निर्देशों के जरिए इन्हीं कर्मों के लिए प्राकृतिक स्वाभाविक प्रवृत्ति रखता है। और इसको ध्यान में रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

परंतु मनुष्य एक चेतना संपन्न, सामाजिक प्राणी है। अपनी सीमित क्षमताओं के कारण वह प्रकृति से सामूहिक रूप से, सामाजिक रूप से ही संघर्ष करना सीखकर आज की अवस्थाओं तक पहुंचा है। उसकी ऐतिहासिक समझ यह अच्छी तरह से जानती है कि सामाजिकता के बगैर उसका अस्तित्व संभव ही नहीं है। वह अकेला पहले तो ‘कर्म’ करने लायक ही नहीं हो सकता, दूसरा उसके जीवनयापन के लिए लिए जाने सारे कर्म आपस में एक दूसरे मनुष्यों के साथ बहुत ही गहराई से अंतर्गुंथित हैं।

जीवनयापन हेतु आवश्यक सामग्री और संसाधनों का उत्पादन और निर्माण उसके अकेले के कर्म के जरिए संभव ही नहीं हैं। इस तरह वह अपने हिस्से के कर्म, और उसके परिणामों के जरिए पारिवारिक और सामाजिक संबंधों का तान-बाना बुनता है। एक समाज में सभी इसी ‘कर्म’ के बंटवारे के जरिए आपस में जुडे रहते हैं, चाहे वे इसे समझ पाते हो या नहीं, एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, एक दूसरे के संबंधों को प्रेरित और विकसित करते हैं। इसी की वज़ह से एक दूसरे के बीच नकारात्मकता भी पैदा होती है, संबंध टूटते, नये संबंध बनते हैं। यह कर्म का सामाजिक पक्ष है, और द्वितीयक रूप है।

जीवनयापन हेतु जरूरी क्रियाकलापों से बचे समय में मनुष्य को आनंद भी चाहिए होता है, अपने सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान की आवश्यकता भी महसूस होती है। वह अपने अस्तित्व के जरिए सामाजिक श्रेष्ठता पाने की, व्यक्तिगत तौर पर अपने होने को महसूस करने और सामाजिक रूप से अपने जीवन की आवश्यकता साबित कर पाने की आकांक्षाओं से भी ओत-प्रोत होता है। अपने आपको सामाजिक उपयोगिता का आवश्यक अंग बनाने की, सामाजिक श्रेष्ठता पाने की, व्यक्तिगत अहं की तुष्टि की इन जुंबिशों  के चलते किए जाने वाले कर्मों को तृतीयक सामाजिक-सांस्कृतिक रूप की श्रेणी मॆं रखा जा सकता है

वह जैविक जरूरतों के आधार पर बने प्राथमिक और द्वितीयक कर्म संबंधों के अनुसार स्थापित व्यक्तिगत संबंधों में भावनात्मक आधार भी ढूंढ़ता है, भावनात्मक और व्यक्तिगत अपेक्षाएं पालता है, और इनके सुचारू व्यवस्थापन के लिए जिजीविषा से इतर कई तरह के क्रियाकलाप करने की प्रेरणा पाता है। इन्हें कर्म का चतुर्थ और सामाजिकता से ओत-प्रोत व्यक्तिक भावनात्मक रूप कहा जा सकता है

जाहिर है अब अलग से यह कहने की आवश्यकता नहीं रह गई है कि हम कर्मों के जरिए ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। अपने कर्म और उस कर्म के पीछे के वास्तविक कारण के अनुसार ही हमारे साथ रहने वालों को प्रभावित करते हैं। साथ रहने वाले सब, जब आपस में अंतर्संबंधित हैं, तो एक दूसरे के कर्मों से सभी आपस में एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। जब तक ये कर्म एक दूसरे के व्यक्तिगत हितों से नहीं टकराते हैं, सामूहिक हितों से जुड़े रहते हैं, तब तक कोई समस्या नहीं महसूस नहीं होती। परंतु जब साथ रहने वालों के कुछ कर्म आपसी हितों और मान्यताओं से टकराने लगते हैं, जब ये सुपरिभाषित और सामूहिकता के साथ व्यवस्थित रूप से प्रचालित नहीं होते हैं, तो ये आपसी कड़वाहटों का, मनमुटावों का कारण बनते हैं और जीवन में, व्यक्तिगत चेतनाओं में अशांति का कारण बनते हैं

जब एक साथ रहने वाला समूह आपस में इस तरह से अंतर्गुंथित है तो उनके कर्मों का असर भी व्यक्तिगत नहीं रह जाता, उसके परिणाम सभी को तद्‍अनुरूप प्रभावित करते हैं, अब इसे कभी सज़ा के तौर पर भी लिया जा सकता है और कभी इनाम के तौर पर भी। कुछ के तात्कालिक असर भी दिख जाते हैं, और कुछ के असर बहुत देर के बाद सामने आते हैं। समय का इस तरह से यहां कंप्यूटर पर बैठ कर टाईप करते रहना समय के परिवार के सामूहिक हितों के अनुरूप नहीं है, यह समय का तृतीयक रूप का कर्म है। जाहिरा तौर पर यह परिवार में टकराव का विषय बन सकता है। अब यह समय की समझ और प्रयासों पर निर्भर है कि समय किस तरह अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक जरूरतों के बीच सामंजस्य बिठाता है और इसे व्यक्तिगत अहं और श्रेष्ठताओं का विषय नहीं बनने देता है। यह आप आसानी से समझ सकते हैं।

यही अंत हो सकता है। चीज़ों को उनकी वास्तविकताओं के अनुसार समझना, वास्तविक और व्यवहारिक रूप से आपस में सामंजस्य बैठाना, पहले ख़ुद अपने आप से पारदर्शी होना, फिर अपने व्यक्तित्व को दूसरों के सामने पारदर्शी बनाना, अपने आप से और दूसरों के साथ ईमानदारी से पेश आना। अपनी व्यक्तिगतता को सामूहिक हितों के सापेक्ष सीमित करना, सामूहिक हितों में ही अपनी व्यक्तिगतता की अभिव्यक्ति को पैबस्त करना सीखना। और इस सबको प्रभावी रूप से कर पाने के लिए, अपनी ज्ञान और समझ को निरंतर बढ़ाने और परिष्कृत करने के लिए, मानवजाति के वास्तविक, यथार्थ और वैज्ञानिक अद्यतन ज्ञान का अध्ययन और व्यवहारीकरण

शायद यही अंत होना चाहिए। अगर हो सके।
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उन मानवश्रेष्ठ का संपादित जवाब:

सादर नमस्ते समय जी ..मैं नहीं जानता आपका नाम क्या है ? पर मेरे लिए आप समय ही हो जो मेरे प्रश्नों के उत्तर देते हैं और मेरे अन्दर चलने वाले द्वंद को एक दिशा दिखाते हैं ..आप के हाथ में मेरी कोई कुंडली नहीं.. कोई हाथ की  रेखा नहीं है ..पर आपने जो इस पोस्ट के आरम्भ में कहा वह एक दम से सच है ….( . )….कर्म समझने की परिभाषा यहीं से शुरू हुई सही मायने में …गीता तो पढ़ी मैंने कई बार पर आज आपके बताये अर्थ से लगता है उसको समझने में कहीं चुक गया …गीता हर बार नए अर्थ देती है ..यह तो लगता था पर फिर भी सामान्य इंसान हूँ न ….जब झूठ साथ वाला बोल रहा हो या वह ज़िन्दगी वह जी रहा हो तो उसका असर बाकी सदस्यों पर पड़ना लाजमी है यह आज आपकी पोस्ट से जाना ..( . ).. आपने जो मुझे मेल किया है वह मेरे जैसे कई लोगो के लिए एक अच्छा मार्गदर्शक साबित हो सकता है ..मेरा अनुरोध हैं आपसे कि आप इसको पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर पोस्ट करें ..( . )…आगे भी आपका स्नेह मुझे यूँ ही मिलता रहेगा तहे दिल से धन्यवाद

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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

सपनों के बहाने कुछ प्रवृतियों पर बातचीत

हे मानवश्रेष्ठों,

फिलहाल भारी-भरकम स्थगित। चलिए कुछ हल्का-फुल्का कुछ किया जाए, पर इसका क्या किया जा सकता है कि यहां से भी आप काफ़ी गंभीर इशारे पा सकते हैं। अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में जद्दोज़हद पैदा कर सकते हैं, और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं।

बहुत पहले सपनों के मनोविज्ञान पर दो आलेख प्रस्तुत किये थे, ‘आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान’ और ‘कुछ सपने आखिर सच होते क्यों प्रतीत होते हैं’। प्रसंग पुराना है पर आप जानते ही हैं बात कभी पुरानी नहीं होती। विचार हमेशा पहली बार मुख़ातिब हो रहे और आत्मसात नहीं कर पाये मानवश्रेष्ठों के लिए नया ही रहता है। तो फिलहाल मुद्दा यह है कि उसी आलेख के बाद एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, उन्हीं संदर्भों में एक संवाद स्थापित हुआ था। यहां उसे व्यक्तिगत संदर्भों के बिना सार्वजनिक किया जाना इसलिए जरूरी लग रहा है कि कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर और मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण किया जा सके। यह बताना शायद ठीक रहे कि उनकी पूर्वानुमति इस हेतु प्राप्त कर ली ही गई थी।
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उनका प्रश्न/संवाद कुछ इस प्रकार था:

सपने इस तरह का सच क्यों बता जाते हैं ?
नमस्ते जी ,आपके ब्लाग पर …आप लिखते ही हैं कि मेल पर भी आपसे चर्चा की जा सकती है ..मैंने आपके ब्लाग पर दोनों लेख भी पढ़े हैं …कमेंट्स पढ़े है …कुछ समझ में आया कुछ नहीं ..पर मेरा अनुभव यह है कि जब जब बुरा सपना देखा है वह सच हुआ है …

( इसके बाद उन मानवश्रेष्ठ ने अपने कुछ सपनों का जिक्र किया, जिनके सच हो जाने के कारण वे अचंभित और प्रश्नाकुल थे। वे व्यक्तिगतता का आधार रखते थे, अतएव उन्हें यहां प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है )

क्या यह सच होता है ..? मैंने इसको कभी सीरियस क्यों नही लिया ? नही जानता ..पर क्या सच में कोई मुझे संकेत कर जाता है इन बुरे सपनों से ..हम अकसर इन्हे नज़रंदाज़ क्यों कर देते हैं ? बहुत से सवाल है दिल में .और अब भी कोई सपना बुरा आए तो डर जाता हूँ ..अब यह मानता हूँ कि  कोई शक्ति हमारे अन्दर की ही हमे सूचना जरुर देती है पर शायद    हम उस को पहचान नही पाते ….पर यह सपने आते हैं .इस मेल में सिर्फ अपने आने वाले सपनो का जिक्र किया है ..आगे भी कुछ प्रश्न है जो अगली मेल में जारी रहेंगे….
शुक्रिया

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इस प्रश्न पर समय द्वारा किये गए इशारों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यक्तिगत संदर्भ हटा दिये गये हैं, अतएव कहीं-कहीं लय टूटती सी नज़र आ सकती है। आप भी देखिए, कि आप यहां से क्या पा सकते हैं। सपनों के मनोविज्ञान संबंधी दिलचस्पी हो ( जिसका कि जिक्र यहां स्पष्ट नहीं है) के लिए आप शुरूआत में दिये गये आलेख-लिंक पर जा सकते हैं।
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आदरणीय,
आप इस पर बेहद गंभीर हैं, और अपनी गुत्थियों पर असमंजस में।
यह इस लंबे खत से पता चलता है। समय अभी तय नहीं कर पा रहा है, कि वह किस हद तक आपसे संवादरत हो सकता है, और कितना अनौपचारिक। चलिए कुछ कोशिश तो की ही जा सकती है।

सपनों की उलझनों ने समय को भी काफ़ी परेशान किया था, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से आप अपने बचपन में और अभी भी इनसे बावस्ता हैं। ज़िंदगी से जुडे और भी कई पहलू थे जिनपर प्रचलित दृष्टिकोण समय को नाकाफ़ी लगता था जाहिर है समय ने काफ़ी जिज्ञासाएं की है और दर्शन और विज्ञान का एक सर्वकालिक छात्र है,  बहुतेरे विषयों पर दुनिया भर के अनेक लेखकों की सैकड़ों पुस्तकों से समय का गुजरना हुआ है जिनमें मनोविज्ञान विषय भी शामिल रहा है। यह अपने मुंह मियां-मिट्ठू बनना इसलिए हो रहा है ताकि समय आपको यह बता सके कि समय का दृष्टिकोण वहां और यहां भी पूरी गंभीरता लिए हुए है, ताकि आपको यह लग सके कि चलताऊ ढंग से यूं ही कुछ भी नहीं लिख दिया गया है, ताकि आपसे भी यह उम्मीद कर सकूं कि आप समझें कि गुत्थियों को सुलझाने के लिए सतही प्रयास हमेशा नाकाफ़ी होते हैं

साथ ही इसलिए भी कि, वस्तुगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों वाली पुस्तकों में भी ऐसी गुत्थियों पर कोई सीधी-सीधी बात नहीं होती, या यूं कह लीजिए कि जरूरी नहीं कि आपकी समस्या उसी समरूपता में वहां उपलब्ध हो। वहां इनके ऊपर, मनोजगत के व्यापारों पर पूरा सटीक विश्लेषण उपलब्ध है परंतु इनकी रौशनाई में अपनी उलझनों से प्राप्त इशारों से खु़द ही जूझना पडता है। अब मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान ने मानसिक प्रक्रियाओं की कार्यप्रणालियों की काफ़ी सुसंगत समझ विकसित कर ली है जिसके जरिए अधिकतर गुत्थियों को सुलझाया जा सकता है। वहां भी एक समझ है, एक दृष्टिकोण है, एक पद्धति है और कुछ इशारे हैं जिनके आधार पर मनुष्य अपने एकांतिक विशेष मानसिक व्यापारों को समझने की कोशिश कर सकता है। जाहिर है पर यह कोशिश तो स्वयं को ही करनी होगी, क्योंकि हमारी पसंद का पका-पकाया हलुवा कहीं भी उपलब्ध नहीं है।

अब होता यह है कि यह एक लंबा रास्ता है, पहले तो एक असली वैज्ञानिक वस्तुगत दृष्टिकोण पैदा करना वह भी अपने भाववादी संस्कारों से लडाई के साथ, फिर उसके हिसाब से दुनिया की हर चीज़ से पुनः माथापच्ची करना और उस पर टांग खीचता परिवेश। और समय भी तो चाहिए ही। साधारणतया मानसिक प्रवृति हमेशा एक लघुप्रतिरोध की राह खोजना चाहती है, ताकि तात्कालिक रूप से, शीघ्रता से एक आत्मसंतुष्टि मिले, दिमागी़ तनाव कम हो और दैनन्दिनी क्रियाकलापों में आसानी से जुट जाया जा सके। इसलिए अधिकतर हम बिना किसी गंभीर अध्ययन के अपनी सीमित समझ के मुताबिक अटकलबाज़ी करते हैं, और तुरत किसी कामचलाऊ निष्कर्ष पर पहुंच कर दिमाग़ को अपनी दूसरी, सापेक्षतः जरूरी, इच्छित सरगोशियों में लगा देते हैं।

यही कारण है कि ईश्वर, भाग्य, नियति, अलौकिकता, अध्यात्म आदि-आदि के तुरंत तसल्ली देने वाले क्रिया-व्यापार समाज में हमेशा जोरों पर रहते हैं। यहां हर गुत्थी के सरल, स्थापित से, पूर्व तैयार, एक साधारण सी तार्किकता की श्रृंखला में व्यवस्थित से हल हमेशा तैयार हैं। इसके साथ ही ये हमारे संस्कारों में होते हैं, पूर्वपरिचित होते हैं, अधिकतर परिवेश की सहमति भी साथ होती है अतएव इनके साथ तादात्मय बैठा लेना हमारे लिए ज्यादा सहज होता है

ऐसा ही आपके साथ हो रहा है। सांयोगिक संवृत्तियां आपको इस तरह सोचने पर विवश कर रहीं है, और साथ ही आपकी जिज्ञासु समझ थोडा-बहुत संदेह भी पैदा कर रही है। आप अंतर्द्वंद में हैं।

पहले एक बात बताता हूं। हमारी दादी जी इस तरह से ही सपनों के सच वाले मामले में और टैलीपैथी जैसे मामलों में गांव में और परिवेश में बहुत लोकप्रिय थीं। वे अक्सर कुछ पुराने संकेतों के जरिए भविष्यवाणियां भी करके चौंकाया करती थी। जैसे आज कोई आयेगा, आज वहां मत जाओ, आज यूं होगा, आदि-आदि। घर में ही साक्षात उदाहरण मौजूद था, इसीलिए हमारे लिए यह अंतर्द्वंद काफ़ी भारी था। उनके आप जैसे ही कई किस्से हम सुना करते थे। दादा जी एक किस्सा तो इतना सटीक सुनाया करते थे कि आश्चर्य से मन मसोस कर रह जाता था, जैसे कि तब होता है कि हम जानते हैं कि जादू दिखाने वाला कोई ट्रिक लगाकर भ्रम पैदा कर रहा है और फिर भी हम उस ट्रिक का अंदाज़ा नहीं लगा पाते और यह सोचते रह जाते हैं कि आखिर यह संभव कैसे हो पाया होगा

यह जबरदस्त चुनौती होती है और यहीं, हमारे दृष्टिकोण, हमें दो अलग राहों पर ले जाने की संभावनाएं रखते हैं। यदि हम किसी भी तरह की अलौकिकता में, चमत्कारों में, जरा सा भी यकी़न रखते हैं तो हम इस जादू को भी उन्हीं से जोडकर शांति पा सकते हैं, इसे भी उसी अलौकिकता का एक उदाहरण मानकर श्रृद्धानवत हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि हम जगत की वस्तुगतता के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं तो हम यह यक़ीन तो रखते हैं कि यह भी किसी भ्रमात्मक ट्रिक का ही मामला है पर हमारे पास इसका कोई जबाब नहीं होता और एक संदेह, एक उलझन लेकर वहां से उठते हैं। पहला रास्ता सुरक्षित रास्ता है, जिस पर और भी बहुतेरे राही होते हैं, वहीं दूसरा रास्ता हमें और भी अकेला कर देता है तथा एक अनवरत बैचैनी छोड जाता है

पहले तो हमें यह सब रहस्यमयी लगता था, धीरे-धीरे इन भविष्यवाणियों के पीछे के प्राचीन संकेतों की भाषा हम भी समझने लगे और फिर सच होने के अवसरों और आवृतियों को जांचने लगे। तब जाकर इनकी सांयोगिकताओं के प्रतिशत हमें समझ में आने लगे। परंतु हमारी माताजी उनमें अभी भी एक अलौकिक शक्ति का आभास पाती हैं और उन पर कोई तर्क काम नहीं करते। आस्थाएं, तर्क से संतुष्ट नहीं होती।

तो आदरणीय, यह आप पर है कि इन सांयोगिकताओं में किसी नियति की संभावनाएं टटोलते हैं और इनके पीछे किसी अलौकिक शक्ति के भावी इशारे ढूढ़ते हैं या फिर सपनों की वैज्ञानिक वस्तुगतता को समझ कर इनके सच के रूप में घट जाने को एक संयोग के रूप में देखते हैं। यह आप ही भली भांति जानते हैं कि इन सांयोगिकताओं के कितने रूप आपके सामने सच के हिस्से में आये, कितनों का आपने नोटिस लिया, और जो सच नहीं होते उनका नोटिस आप लेते हैं या नहीं।

समय ने अपने लेख में कई बातों को काफ़ी विस्तार से समझाने की कोशिश की थी। टिप्पणियों के जबाब में की गयी टिप्पणियों में और भी कई इशारे किये थे। कुछ फ़र्जी सपनों का जिक्र भी किया था जो कि हमेशा सच होने ही होते हैं।

यह आपने लिखा ही है कि कुछ सपने तो हूबहू घटते देखें हैं आपने, और कुछ हूबहू नहीं थे। दोनों ही मामलों में सारी व्याख्याएं घटनाएं घट जाने के बाद की हैं और उनके आपसी अंतर्संबंध भी आपने बाद में ही खोजे हैं। इसके अलावा यह भी ध्यान देने की बात है, इन सब सपनों को आप उम्र और समझ के इस दौर में पुनः नये सिरे से व्याख्यायित कर रहे हैं, ऐसे में हमारे पूर्वाग्रह अनुकूल परिस्थितियां ही चुनते हैं, कई नई अनुकूल बातें भी गढ़ ली जाती हैं। इस पर भी सोचा जाना चाहिए कि यह अधिकतर हमारे बुरे सपनों के साथ ही क्यों होता है?

हमारी चिंताएं वास्तविक परिस्थितियों के कारण ही उपजती है। जैसे की बच्चा जब झूले पर बैठा हो तो हमें उसके डूब कर मर जाने की चिंता सता ही नहीं सकती, हमें इस वक्त उसके गिर जाने की चिंता ही हो सकती हैं। यानि कि हर घटना के साथ हमारी स्मृति में उससे संबंधित चिंताओं के भावों की स्मृति भी बनती है और बाद में उस घटना का स्मरण उन चिंताओं से भी हमें पुनः रूबरू कराता है। यही सपनों में भी होता है, छवियों के साथ जुडी हुई चिंताएं भी हमें सालती हैं और यदि हमारी प्रवृति इन पर पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पाले हुए होती है तो चिंतन में भी और सपनों में भी हम उसी के अनुसार मानसिक प्रक्रियाएं करते हैं।

काफ़ी कुछ इशारे किए हैं समय ने।

आप यदि गंभीर है सत्य के अन्वेषण हेतु तो आपको अपने मन की गहराइयों को टटोलना चाहिए, अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं की वास्तविक पृष्ठभूमि को समझने की कोशिश करनी चाहिए, इसी से आपकों अपनी मानसिक प्रक्रियाओं और सपनों के रहस्यों की परतें खोलने में मदद मिल सकती है। जहां आपकी समझ, गुत्थियों के विश्लेषण और यथार्थ तथा वस्तुगत हल प्राप्त करने में अपनी सीमाएं महसूस करे, तो इसे उस विषय संबंधी अधिकृत तथा सिद्ध स्रोतों से और अधिक अध्ययन-मनन करने का इशारा समझना चाहिए। जब तक आप संतुष्ट नहीं महसूस करते, उस पर अपनी अंतिम मान्यताओं और निष्कर्षों को स्थगित रखना चाहिए।

यदि आप अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं के साथ संतुष्ट है, और अलौकिक शक्तियों के इशारों पर वास्तव में यक़ीन करते हैं तो फिर काहे इस समझ-वमझ के पचडे में पडते हैं? इसका आनंद लीजिए और ऐसे लोग जाहिर है कम ही होते हैं तो इसका जिक्र करके अपने अंदर भी अलौकिक शक्ति होने का भ्रम पालिए, लोगों के बीच चमत्कारी समझे जाने का मज़ा लीजिए और खुद भी अलौकिक होने के अहसास का गर्व महसूसिए। मिल रहा है, तो ज़िंदगी का मज़ा लूटिए।

यदि समय से कुछ और मदद चाहिए तो संवाद बनाए रखें। समय हमेशा हाज़िर है।
कुछ अनुचित और कठोर कह दिया गया हो तो मुआफ़ी की गुंजाईश बनाए रखें। मुझे मेरी सीमाएं बता दें।

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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

अजैव जगत में परावर्तन

हे मानवश्रेष्ठों,
पिछली बार हमने पदार्थ के मूलभूत गुण के रूप में, परावर्तन ( Reflection, a reflex action, an action in return ) की चर्चा शुरू की थी।
इसी को आगे बढ़ाने और समझने के लिए आज हम अजैव जगत में परावर्तन के कुछ रूपों की चर्चा करेंगे।
समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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हमने जाना था कि, परावर्तन हर भौतिक वस्तु ( परावर्तन के विषयी ) का अपने साथ अंतर्क्रियाशील अन्य भौतिक वस्तुओं ( विषयों ) के प्रभाव के प्रति अनुक्रिया करने का एक विशेष गुण है।

परावर्तन का सरलतम रूप अजैव जगत में पाया जाता है, जो भूतद्रव्य ( Matter ) की गति के यांत्रिक, रासायनिक, भौतिक तथा कुछ अन्य रूपों में अपने आपको अभिव्यक्त करता है।

अजैव जगत में परावर्तन के इन रूपों की विशेषता को समझने के लिए हम चंद उदाहरणों पर ग़ौर करते हैं:

१. हम बिलियर्ड के बल्ले से गेंद पर चोट करते हैं। गेंद एक निश्चित दिशा में और एक निश्चित दूरी तक ऐसी रफ़्तार से लुढ़कती है, जो गेंद पर किये गए आघात बल पर निर्भर होती है।

२. दो प्राथमिक भौतिक कण, ऋण आवेश युक्त इलैक्ट्रॉन तथा धन आवेश युक्त पोज़ीट्रॉन निश्चित दशाओं में एक दूसरे से टकराते हैं और नष्ट हो जाते हैं, यानि दो फ़ोटोनों में अर्थात प्रकाश के क्वांटमों में तबदील हो जाते हैं।

३. जब क्षरण से अरक्षित लोहे की किसी वस्तु पर पानी गिर जाता है, तो ऑक्सीकरण की क्रिया से उस वस्तु में जंग लग जाता है।

४. कठोरतम चट्टानों से निर्मित पहाड़ भी धूप, पानी और रेत के कणों, वायु तथा कंकरों के प्रभाव से शनैः शनैः टूटता है, उसमें दरारें पड़ जाती हैं और वह घिस-पिटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में और अंततः बालू में परिणत हो जाता है।

इन उदाहरणों में हम भूतद्रव्य की गति के विविध रूपों ( यांत्रिक, भौतिक, रासायनिक और तथाकथित भूवैज्ञानिक जो कि वास्तव में इन्हीं तीनों का सम्मेल है ) को देखते हैं।

पहले उदाहरण में में गेंद का सरल विस्थापन होता है। इस परावर्तन का विषयी ( गेंद ) स्वयं परिवर्तित नहीं होता। अन्य तीन उदाहरणों में बाह्य क्रिया का विषयी ( एक प्राथमिक कण, लोहे की वस्तु, पहाड़ ) वस्तुगत कारकों के प्रभाव के प्रति एक निश्चित ढ़ंग से अनुक्रिया हे नहीं करता, बल्कि उनके असर से विखंड़ित होकर किसी अन्य वस्तु में परिवर्तित हो जाता है ( एक फ़ोटोन, जंग, बालू में )।

इन सारे मामलों में परावर्तन का विषयी, बाह्य प्रभाव के प्रति एक निश्चित ढ़ंग से अनुक्रिया करता है। उनके साथ होने वाले परिवर्तन, बाह्य प्रभाव के स्वभाव के अनुरूप होते हैं।

यदि लोहे की वस्तु को बिलियर्ड़ के बल्ले से ठोकर मारी गई होती, तो उस पर जंग नहीं लगती और हाथी दांत की गेंद को पानी में भिगोया गया होता, तो वह अपने स्थान से विस्थापित न होती। परावर्तन का विषयी बाहरी प्रभाव के प्रति कैसी अनुक्रिया करता है, यह केवल विषय के स्वभाव पर ही नहीं, बल्कि विषयी के अपने अनुगुणों पर, उसकी भौतिक, यांत्रिक और रासायनिक विशेषताओं पर भी निर्भर करता है।

अजैव जगत में परावर्तन के उपरोक्त सभी उदाहरण, विविध विज्ञानों के दृष्टिकोण से, पदार्थ की गति के भिन्न रूपों से की अभिव्यक्ति से संबंधित हैं। दर्शन के दृष्टिकोण से ये उदाहरण एक विशेषता से एकीकृत हैं, अर्थात यह कि विषयी, विषय के प्रभाव के प्रति एक खास ढ़ंग से अनुक्रिया करता है, यानि परावर्तन की प्रक्रिया में भाग लेता है।

इस तरह, यह या तो स्थान परिवर्तित करता है ( उदाहरण-१ ), या किसी अन्य वस्तु में परिवर्तित होते हुए गहन गुणात्मक परिवर्तन से होकर गुजरता है ( मूल कण प्रकाश के क्वांटमों में, लोहा जंग में, पहाड़ बालू-मिट्टी में )। परावर्तन के दौरान विषयी का विनाश या गुणात्मक रूपांतरण अजैव जगत में परावर्तन की लाक्षणिक विशेषता है।
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आज इतना ही।
अगली बार जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों के जटिलीकरण पर एक नज़र ड़ालेंगे, और थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

पदार्थ का मूलभूत गुण – परावर्तन

हे मानवश्रेष्ठों,
समय फिर हाज़िर है।
चेतना की उत्पत्ति पर चल रही श्रृंखला पर फिर लौटते हैं, और इस बार पदार्थ के मूलभूत गुण और उसके सिद्धांत को समझने की कोशिश करते हैं।

आज की चर्चा का यही विषय है। समय यहां अद्यतन ज्ञान को सिर्फ़ समेकित कर रहा है।
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मानव-मन या चेतना (Consciousness) की उत्पत्ति उन प्रश्नों में से है, जिन्होंने प्रकृति के नियमों का अध्ययन करने वालों को सबसे अधिक उलझन में ड़ाला है। १८ वीं शताब्दी में दार्शनिकों ने इस प्रश्न पर पुरजोर बहस की थी कि क्या भूतद्रव्य (Matter) के बिना चेतना का अस्तित्व संभव है और अगर नहीं है, तो वह आयी कहां से?

भौतिकवादी वैज्ञानिकों का मत है कि मन या चेतना की उत्पत्ति पदार्थ के विकास की दीर्घ प्रक्रिया के फलस्वरूप संपन्न हुई। पदार्थ की प्रकृति की जांच करते हुए उन्होंने उसकी गति के विभिन्न रूपों पर ध्यान केन्द्रित किया, क्योंकि गति ही पदार्थ के अस्तित्व का रूप है। पूर्णतः गतिशून्य और परिवर्तन रहित पदार्थ नाम की कोई चीज़ नहीं है। ब्रह्मांड़ में सारा पदार्थ, सारी जीव और जड़ प्रकृति सतत गति, परिवर्तन और विकास की अवस्था में है।

प्रत्ययवादियों (Idealistic) के उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए फ़्रांसीसी भौतिकवादी देनी दिदेरो ने अनुमान लगाया कि भूतद्रव्य के अपने आधार में ही एक विशेष अनुगुण है, जो मूलतः संवेदनों से मिलता जुलता है। इसी से संवेदन की क्षमता तथा बाद में चिंतन का जन्म हुआ। इस अनुमान के समर्थन में उन्होंने अंड़े और चूज़े का उदाहरण दिया कि अंड़े में संवेदन और विश्व के प्रत्यक्षण की क्षमता नहीं होती, जबकि उससे उत्पन्न होनेवाले चूज़े में होती है। फलतः उन्होंने तर्कणा की कि संवेदन की क्षमता अजैव भूतद्रव्य से उत्पन्न हुई।

चूंकि १८ वीं शताब्दी के विज्ञान को हमारे युग के विज्ञान के सापेक्ष जीवन और चेतना की उत्पत्ति के बारे में बहुत कम जानकारी थी इसलिए दिदेरो चेतना और भूतद्रव्य के संबंध के बारे में एक पूर्ण, प्रमाणित दार्शनिक सिद्धांत की रचना नहीं कर पाए।

बहुत बाद में जब मानवजाति का यह वस्तुगत ज्ञान और विकसित होता गया तो एक ऐसे ही सिद्धांत का विकास हुआ जिसे परावर्तन का सिद्धांत कहते हैं।

इस सिद्धांत के अनुसार, अपने जड़, अजैव रूपों से लेकर, पदार्थ के उद्‍विकास के सर्वोच्च तथा जटिलतम उत्पाद – मानव मस्तिष्क तक, सारे पदार्थ का एक सामान्य गुण है परावर्तन। परावर्तन (Reflection, a reflex action, an action in return) भूतद्रव्य (Matter) का एक सार्विक, मूलभूत, अविभाज्य (Integral) तथा वस्तुगत अनुगुण है। यह हर भौतिक वस्तु का अपने साथ अंतर्क्रियाशील अन्य भौतिक वस्तुओं के प्रभाव के प्रति अनुक्रिया करने का एक विशेष गुण है। यानि कि यह भौतिक वस्तुओं द्वारा बाह्य प्रभावों की प्रतिक्रिया है।

परावर्तन के रूप, भूतद्रव्य के रूपों पर निर्भर होते हैं, यह अपने को बाह्य प्रभावों के उत्तर में, इन प्रभावों की प्रकृति के अनुसार क्रिया करने में व्यक्त करता है। जड़ प्रकृति में गति, पिंड़ों अथवा द्रव्यों की यांत्रिक, भौतिक अथवा रासायनिक अन्योन्यक्रिया के रूप ले सकती है। भौतिक विश्व के दीर्घकालिक क्रमविकास तथा पदार्थ की गति के रूपों की बढ़ती जटिलता के दौरान जैव पदार्थ का आविर्भाव गति के रूपों में गुणात्मक परिवर्तन ले आता है। जीवधारियों में परावर्तन के जैव रूप पाये जाते हैं। जैव पदार्थ के उदविकास के दौरान, परावर्तन का यह अनुगुण अंततः मानव चेतना तथा चिंतन में विकसित हो गया। अतः यह कहा जा सकता है कि चेतना परावर्तन का उच्चतम रूप है

विश्व के भौतिक स्वभाव तथा उसके वस्तुगत द्वंदात्मक विकास के दृष्टिकोण और मत, परावर्तन के इस सिद्धांत के साथ घनिष्टता और अविभाज्य रूप से जुड़ा है। प्रत्ययवादी और अधिभूतवादी इस संयोजन को समझने में अक्षम हैं और इसी कारण से वे चेतना की उत्पत्ति के प्रश्न का ऐसा सही उत्तर नहीं दे सकते, जो विज्ञान से मेल खाता हो और प्रकृति और समाज की वस्तुगत समझ विकसित करने में सक्षम हो।

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आज इतना ही।
अगली बार अजैव और जैव जगत में परावर्तन के रूपों पर एक नज़र ड़ालेंगे, और उन्हें थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

टिप्पणियों के अंशों से दिमाग़ को कुछ खुराक – ३

हे मानवश्रेष्ठों,
समय यहां श्रृंखला के बीच में कुछ टिप्पणियों को देने की गुस्ताख़ी कर रहा है।
समय का उद्देश्य इन्हें यहां दस्तावेज़ीकृत करना है, और साथ ही उन मानवश्रेष्ठों तक इन्हें पंहुचाना है जो इनसे महरूम रहे हैं। उम्मीद है आपके दिमाग़ को कुछ खुराक मिलने की संभावनाएं तो हैं ही।
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विजयादशमी पर विशेष – रामसेतु… प्रविष्टि पर ‘बुराभला’ पर टिप्पणी:

आपकी या श्रृद्धालुओं की आस्था पर जाहिरा तौर पर सवाल खडे़ नहीं किये जा सकते, आखिर यह व्यक्तिगत मामला है और सभी स्वतंत्र हैं कि वे ज्ञान और समझ के किस स्तर पर रहना पसंद करते हैं, उन्हें कहां सुभीता लगता है।

परंतु यहां आप इसे तार्किक औए वैज्ञानिक रूप के साथ रख रहे हैं और आस्था के लिए तार्किक ज़मीन तैयार कर रहे हैं, इसलिए यह नाचीज़ यह टिप्पणी करने की हिमाकत कर रहा है, आशा है मुआफ़ करेंगे और अन्यथा नहीं लेंगे।

अगर आप वाकई वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास और मानवजाति के क्रमविकास को समझना चाहते हैं तो आपकों वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिखे इतिहास और ऐतिहासिक समझ से गुजरना पड़ेगा। ना कि तथ्यों और निष्कर्षों का मनचाहा मानसिक जाल बुनकर अपने को तुष्ट करने का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। और निश्चिंत रहें, उसके बाद भी हमारे पास गर्व करने के लिए काफ़ी सामग्री होगी साथ ही ढ़ेर सारे सबक भी होंगे जिनसे भविष्य को संवारने का उचित रास्ता निकाल सकने की असीम संभावनाएं भी मौजूद रह सकें।

और वैज्ञानिक तरीके से संपुष्ट इतिहास की समझ कहती है, कि हमारे महान ग्रंथ वेदों का समय ही ईसा पूर्व १५००, यानि कि आज से ३५०० वर्ष प्राचीन हैं, और इनका संकलन और लिपिबद्धिकरण तो और बहुत बाद की चीज़ हैं।

हड़प्पा सभ्यता के नगरों के निर्माण का समय २७०० ईसा पूर्व, यानि आज से लगभग ४७०० वर्ष पूर्व का निश्चित हुआ है। जाहिर है सिंधु घाटी की यह सभ्यता वेदों की आर्य सभ्यता से भी प्राचीन है। इसकी खोज ने, जो कि आज से लगभग ८०-९० वर्ष पूर्व ही हुई है, आर्यों के यहीं के होने या बाहर से आने वाले विवाद को भी खत्म कर दिया, और यह निश्चित हो गया कि आर्य ईरान की तरफ़ से आए थे और उनसे पहले यहां सापेक्षतः उनसे बहुत विकसित सभ्यता मौजूद थी।

हमारे इतिहास को जब वैदिक नज़रिए से देखा जाता है, तो काल के उस हिस्से का अध्ययन पूर्ववैदिक और उत्तरवैदिक काल के रूप में किया जाता है। वेदों के समय की सभ्यता का स्तर वेदों से ही मिल सकता है, जिससे साफ़ संकेत मिलते हैं आर्य उस वक्त खानाबदोश अवस्थाओं के पशुपालक अवस्थाओं से गुजर रहे थे। उनके वेद कालीन देवता भी अलग थे, जिनमें इन्द्र सबसे प्रमुख थे, और आपकी जानकारी के लिए यह भी काफ़ी महत्वपूर्ण होगा कि वेदकालीन देवताओं में उत्तरवैदिक देवतागणों जैसे कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के लिए कोई जिक्र नहीं है। हमारे इन महान देवी-देवताओं का बखान हम बाद के महान ग्रंथों उपनिषदों और पुराणों में पाते हैं जो कि निश्चित ही वेदों के बाद के हैं।

अब चूंकि रामायण में इन भी देवी-देवताओं का चरित्र-चित्रण काफ़ी विस्तार से हुआ है, तो जाहिरा तौर पर यह निष्कर्ष निकलना लाजिमी है कि वाल्मिकी रामायण का समय वेदों और पुराणों के बाद का ही है। यह दोहराना अब महत्व नहीं रखता कि वेदों का समय आज से ३५०० वर्ष पूर्व का है, अतः रामायण का काल भी इनके बाद ही ठहराया जा सकता है।

जाहिर है कि इसके समय को ७००० वर्ष पूर्व ले जाना आस्था का विषय तो हो सकता है, परंतु तर्क और वैज्ञानिकता का नहीं।

अतएव आस्था है तो उसे आस्था ही रहने दिया जाए। आस्था को तर्कों और वैज्ञानिकता के दृष्टिकोणों से तौलेंगे तो हो सकता है कि आस्था पर चोट पहुंचने की परिस्थितियां पैदा हों। जो कि जाहिर है हमारा और आपका उद्देश्य या इच्छित कतई नहीं है।

राम हमारे और हमारे जनमानस की आस्था के नायक हैं, उन्हें आस्था की, श्रृद्धा की विषयवस्तु ही रहने दें, उन्हें तर्क और वैज्ञानिकता से तौलना इस आस्था औए श्रृद्धा के खिलाफ़ ही जाएगा।…..

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क्या पुनर्जन्म संभंव है? एक बेबाक….प्रविष्टि पर ‘तस्लीम’ पर टिप्पणी:

लोकप्रिय मामलों में ऐसा होता ही है। आखिर अधिकतर लोग अपने सामान्य सूचनापरक ज्ञान के ही आधार पर ही, उपलब्ध हो पाए ज्ञान के आधार पर ही जीवन के भवसागर में उतरे हुए हैं।

बाकी सब तो है जैसा ही है।
आपकी लिखी एक बात ने चौंकाया। ‘आत्मा की खोज अभी जारी है।’
क्या खूब!

समस्या यहीं से तो शुरू होती है, और वहीं आप संशय छोड़ देते हैं।

अगर आत्मा की खोज अभी जारी है, यानि कि आत्मा के बारे में अभी कुछ खास नहीं कहा जा सकता। आत्मा की उपस्थिति के विचार का ही विस्तार हैं ये सभी मामले, जो आपस में गुंथे हुए हैं।

आत्मा का विचार सबसे प्राचीन है, आदिमकालीन। इसी से हर भौतिक वस्तुओं में आत्मा, देवत्वरोपण, ईश्वर, परमआत्मा आदि-आदि की संकल्पनाएं पैदा हुईं। पुनर्जन्म की अवधारणा का अविष्कार तो इनके सापेक्ष काफ़ी आधुनिक है। हमारे यहां वेदों के समय तक यह पैदा नहीं हुई थी।

अगर आप ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ इसे देखेंगे तब पता पड़ेगा कि इस अवधारणा की उत्पत्ति, लगभग राज्यों और उनके शोषण की उत्पत्ति के साथ-साथ हुई।

यदि आत्मा है, तो ईश्वर है, चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति है, भूत-प्रेत हैं, जादू-चमत्कार हैं, पुनर्जन्म है, सारी भूल-भुलैयाएं हैं।

इसलिए आत्मा के प्रश्न से जूझना सबसे प्राथमिक है। आप आत्मा के अस्तित्व के सवाल को स्थगित रखकर या अभी संदेह में रखकर, बाकी की बातों के लिए तर्कों के जरिए पुरजोर लड़ाई नहीं लड़ सकते।

विज्ञान की उत्पत्ति के समय ही सर्वप्रथम उसकी उर्जा इन्हीं सब के अस्तित्व को टटोलने में ज्यादा खर्च हुई थी, इसे ऐसे भी कह सकते है पदार्थ और चेतना के संबंधों को समझने के इन प्रयासों से ही विज्ञान की उत्पत्ति हुई थी।

असल विज्ञान जितनी उर्जा खर्च कर सकता था, कर ली गई, और अब उसके पास इन फ़ालतू की चीज़ों के लिए समय नहीं है। अब केवल सूडोसाईंस की कुछ धाराएं ही इस सब पर अभी भी साधनों और उर्जा का अपव्यय करने में लगी हुई हैं, और यह यथास्थिति बनाए रखने की, आम जनमानस को उलझाए रखने की कवायदें वर्तमान व्यवस्था के हितों के अनुकूल हैं, अतः वह इन्हें प्रश्रय और प्रचार उपलब्ध कराता रहता है।

सारी स्थिति विज्ञान और अद्यतन दर्शन के सामने बिल्कुल साफ़ है, यह बात अलग है कि वह आपकी कितनी पहुंच में हैं।…..
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स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियां और कुछ विचार…प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

ग्रामीण इलाकों और शहरों में भी ग्रामीण परिवेशगत मानसिकताओं में इन परिघटनाओं का व्यापक असर है।

आपने इसे यहां उठाकर सही दृष्टि और सरोकारों के साथ विश्लेषित करने का समुचित प्रयास किया है। आप इसमें दो चीज़े औए जोड़ सकती हैं।

एक तो इन परिघटनाओं के पीछे के कुछ काम संबंधी आधार जो कि अक्सर अनछुए रह जाते हैं, या इस तरीके से इन्हें देखना और विश्लेषित करना काम संबंधी वर्जनाओं और अनैतिकताओं के घटाघोपों के चलते जानबूझकर छोड़ दिया जाता है।

दूसरा, जिसका कि आपने सिर्फ़ इशारा किया है पर उसे पुरजोर तरीके से उठाया जाना चाहिए ही, अक्सर ऐसे मामलों का पूरी चेतना और होशोहवास के साथ सृजित किया जाना। यह पूरी तरह से जानबूझकर किया जाता है और इसके पीछे के कारणों को आपने यहां रखा ही है।

कई मामलों में साहित्यिक सी भाषा में यह कहा जा सकता है कि इस तरह की परिघटनाएं पुरूष सत्ता के प्रति उन्हीं के बनाए हथियारों के साथ, हाशिए की स्त्रियों का यह एक विद्रोह है जो इस तरह उन्हें एक छद्म ही सही पर अपनी इच्छित परिस्थितियों के निर्माण का एक अल्पकालिक और कभी-कभी तो दीर्घकालिक भी, अवसर देता है।

पराशक्तियों के मामले में भी सही इशारे किए हैं आपने। जो दावा करता है, संदिग्ध तो वह ऐसे ही हो जाता है, क्योंकि उसे दावा करने की जरूरत पड़ी। यानि कि वह यह दावा करके इसके जरिए कुछ पाना चाहता है।

बहुत कम बार ही ये रोगी-सोगी होते हैं। बाकि जिन्हें दिलचस्पी है वे ऐसे अधिकतर मामलों के पीछे की झूंठ-सिद्धी की कई कहानियां ढूंढ़ सकते हैं।…..
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इसी प्रविष्टि पर आदरणीय वत्स जी की टिप्पणी पर एक प्रतिटिप्पणी:

आधुनिक ज्ञान पुरातन का ही विस्तार होता है, क्रमिक विकास की प्रक्रिया में होता है। नये अनुभव और प्रमाण, पुरानी कई चीज़ों को गलत साबित करते हैं और कई पुरानी चीज़ों की कमियों को रेखांकित कर उसे और सटीक बनाते हैं।

उपवास और यज्ञादि की भी ऐसी ही चीरफ़ाड़ की गई और परंपराओं से जुड़े इन क्रियाकलापों में कुछ तार्किकता ढ़ूंढ़ने की कोशिश की गई कि आखिर इनमें क्या कुछ ऐसा है जिससे मानवजाति फ़ायदा उठा सकती है। यह वत्स जी का इछ्छित है।

समझदारी का तकाज़ा वत्स जी के इच्छित को तो शामिल करता ही है, साथ ही इसे और आगे लेजाकर जो व्यर्थ शाबित हुआ है उससे मुक्ति पाने की मांग भी रखता है।

समस्या यही पैदा होती है।

स्त्रियां किसी विशेष दिन व्रत-उपवास रखती हैं, अगर वे अपने आपको थोड़ा पढे-लिखों में शुमार भी करवाना चाहती हैं तो पूछने पर वे ऐसे ही वत्स जी की तरह जवाब देंगी कि देखो इस बहाने थोड़ा ड़ाईटिंग बगैरा हो जाती है जी।

अगर उनसे कहा जाए कि यह तो ठीक है, चलिए ऐसा कीजिए आप उस विशेष दिन को छोड़ दीजिए, और किसी दिन यह विज्ञान-सिद्ध फ़ायदे उठा लीजिए।

तब असलियत सामने आती है कि इनका यह विज्ञान-सिद्ध रूप नहीं वरन पारंपरिक धार्मिक विश्वास असल मूल में हैं। और इसीलिए यह होता है कि विज्ञान-सिद्धि जाती है भाड़ में और ढ़ोंग बन कर रह जाती है।

अक्सर लोग व्रत-उपवास में सामान्य दिनों से अधिक कैलौरी का सेवन करते हुए देखे जाते हैं, उन्होंने अपने मतलब के हिसाब से कई तोड़ निकाल लिए हैं। असल मंतव्य धार्मिक छद्म के जरिए मिलने वाली उसी मनोवैज्ञानिक, मानसिक तसल्ली का ही है जिसका जिक्र लवली कुमारी कर रही हैं।

किसी अंश की वैज्ञानिकता से, किसी भी पूरे पाखंड़ को जायज नहीं ठहराया जा सकता। वत्स जी तो शायद ही सहमत हों, पर और मानवश्रेष्ठ इस पर विचार कर सकते हैं।

वत्स जी की विधि का ही प्रयोग करके यह भी तो कहा जा सकता है कि कब तक वे सदियों पूर्व की मानसिकता और परिस्थितियों के अनुसार कही और लिखी बातों की भूलभुलैया मे भटके रहकर उसे ही परम ज्ञान की घुट्टी के रूप में परोसते रहेंगे और मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान से नज़रें चुराते रहेंगे।…..
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तो चलें समय के उस फ़लक पर…प्रविष्टि पर ‘ज्योतिष दर्शन’ पर टिप्पणी:

…जब बात प्राकॄतिक परिधटनाओं के संदर्भ में कही जा रही हो जैसा कि आईंस्टीन और बकौल निशांत मिश्र, स्टीफन हॉकिंग के निहितार्थ हैं, बात एकदम वाज़िब है।

विज्ञान के अनुसार प्राकृतिक परिघटनाओं की नियमसंगतता को सिद्धांत के रूप में तभी निरूपित माना जा सकता है, जब यह नियमसंगीतियों के जरिए वस्तुगतता के संदर्भ में निश्चित भविष्यवाणी करने में समर्थ सिद्ध होता है।

समस्या यह है कि व्यवस्थागत असुरक्षाओं के चलते, अपने व्यक्तिगत भविष्य को जानने की उत्कंठा में मनुष्य इन वैज्ञानिक प्रास्थापनाओं में प्रयुक्त हुए मिलते-जुलते अभीष्ट शब्दों को देखकर, उनका सही निहितार्थ समझे बगैर इनका मनमाफ़िक, अपने मंतव्यों के निहितार्थ उपयोग करने लगता है और समाज में विद्यमान भ्रमों की संपुष्टि के जरिए अपने अस्तित्व की प्रतिष्ठा और दोहन की जुंबिशों में जुट जाता है।

वैज्ञानिक ज्ञान के जरिए अब तक समझ आई प्राकृतिक परिघटनाओं और दर्शन की ऐतिहासिक भौतिकवादी अवधारणाओं के जरिए सामाजिक परिघटनाओं की भाविष्यवाणियां की जा सकती हैं, और की भी जाती हैं।

प्राकृतिक परिघटनाओं के सापेक्ष सामाजिक परिघटनाओं के मामले में सटीक भविष्यवाणियां थोड़ी मुश्किल होती हैं, क्योंकि यहां वस्तुगत यथार्थता के साथ, एक और तत्व जुड़ जाता है वह है चेतनागत यथार्थता। इनकी अन्योन्यक्रियाएं निरंतर नये-नये प्रभाव और निर्भरता पैदा करती रहती हैं, और वस्तुगत यथार्थ को निरंतर परिवर्तित करती रहती हैं।

तो प्राकृतिक परिघटनाओं के मामले में नियमसंगतता को समझने के बाद उनकी नियमों के अंतर्गत तयशुदा नियति से ऐसे भ्रामिक वक्तव्य निकाले जा सकते हैं जिनसे सत्य का आभास भी होता है और जो भ्रमों को और बढा़कर काल्पनिक कपोल कल्पनाओं के नये नये द्वार खोल सकता हो, जैसे यह कथन या निष्कर्ष जो कि यहां निकाला गया है कि सब कुछ पूर्व नियत है और हर चीज़ का एक निश्चित भविष्य है।

फिर यह संभावना पैदा हो सकती है कि इसे साधारणतयः मनुष्य अपने जीवन और समाज से जोड़कर देखने लगता है, और ऐसी ही चिंतन और निष्कर्षों की और उद्यत होता है जिसे कि आपने बाद में विवेचित किया है।

और आपकी समझ भी इस घलमपेल को समझ पा रही है, इसीलिए आपके सामने यह अनुत्तरित प्रश्नों और कल्पनाओं को छोड जाती है।…..
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वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और…प्रविष्टि पर ‘संचिका’ पर टिप्पणी:

आपने सही कहा है कि व्यक्ति अपनी सामाजिक अन्योन्यक्रियाओं के जरिए अपने एक मानसिक जगत का निर्माण करता है। अपेक्षाओं की पूर्ति की भौतिक संभावनाएं, व्यवहारिक रूप में, इन मानसिक इच्छाओं की अभिव्यक्ति को संचालित और नियंत्रित करती रहती हैं।

असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल, अपेक्षित आदर्श परिस्थितियों और क्रूर वास्तविकताओं के मध्य एक द्वंद बनाए रखता है। इनसे विचलन और अपरिपक्वता, मानसिक अस्थिरता पैदा करती है और ऊल-जलूल व्यवहार में अपनी अभिव्यक्ति पाती है।

समस्या यह भी है कि आजकल मानसिक चिकित्सा के नाम पर भी व्यापारिक और सतही मानसिकता हावी है। इस ओर गंभीर प्रयासों का अभाव है। मनोवैज्ञान और शारीरिक चिकित्सा को आपस में गड्ड-मड्ड कर दिया गया है और मानसिक रोगी के मनोवैज्ञानिक अध्ययन और कौंसिलिंग का अभाव नज़र आता है। रोगी और मनोचिकित्सक दोनों के पास समय और मनोव्यवहार की गहराई टटोलने की समझ का अभाव है, और परिणति तात्कालिक ईलाज़ यानि मष्तिष्क को सुन्न कर मानसिक क्रिया व्यवहार को स्थगित करने की प्रवृति के रूप में सामने आ रही है।

ये दवाइयां उन्हें इसकी लत ड़ालती है और रोगी, संबंधियों और मनोचिकित्सक, सभी को अपने मुफ़ीद लगती हैं। असली मनोवैज्ञानिक सवाल पृष्ठ्भूमि में ही रह जाते हैं।…..
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नारीयां क्यो बनाती हैं यौन संबंध? एक….प्रविष्टि पर ‘साईब्लॉग’ पर टिप्पणी:

आपने एक रोचक विषय उठाया है, कम से कम पुरूषों के लिए तो है ही।

पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता इसे ऐसे ही रूप में लेने को अभिशप्त है, जैसा कि विवेक और जाकिर भाई की टिप्पणियों से जाहिर होता है। भले ही यह आपका मंतव्य रहा हो या नहीं।

इसलिए समझदारी का तकाज़ा कहता है कि प्रस्तुति और विश्लेषण का तरीका ऐसा होना चाहिए कि यह सिर्फ़ प्रचलित मानसिकताओं की सनसनीखेज़ तुष्टि का जरिया भर बन कर ना रह जाएं बल्कि एक सहिष्णु यथार्थ समझ की सही दिशा की राह प्रशस्त करता हो।

शरद कोकास एक गंभीर इशारा जरूर कर रहे हैं पर वहां भी यौन संबंधों का हथियारगत इस्तेमाल अवश्य ही मिलेगा।पुरूष प्रधान समाज में स्त्री के अधिकार सीमित हैं। स्त्री पुरूष के लिए संपत्ति है और इसके अनुरूप ही भोग्या सामग्री। उसके लिए यौन संबंध यौन तुष्टि के साथ-साथ अपनी सत्ता के प्रस्फुटिकरण और प्रदर्शन का साधन भी हैं। इसीलिए वह यौन संबंधों के लिए अवसरवादी है और अपनी सत्ता और स्त्री की निर्भरता के चलते अवसरों की संभावनाएं भी खूब रखता है।

इस सारे जंजाल में स्त्री व्यक्तित्व की आधिकारिक उपस्थिति कहीं भी अभिव्यक्त नहीं होती। इसीलिए वह वह बराबरी के, प्रेम के, भावनात्मक संबंधों के अवसरों के लिए हमेशा प्रतीक्षारत रहती है।

स्त्री के व्यक्तित्व का यही खालीपन, लंपट पुरूषों के लिए और अधिक अवसर उपलब्ध कराता है। और फिर धोखा, छल, मोहभंग जैसी अवस्थाओं की परिणति अस्तित्व में आती हैं।

स्त्री केवल यौन तुष्टि के उपकरण के रूप में अपनी पुरजोर उपस्थिति दर्ज़ कर पाती है। पुरूष जब कभी भावुकता में भी होता है तो इसकी परिणति यौन संबंध तक खींच ले ही जाता है।

कुलमिलाकर लाबलुब्बेआब यह कि सामान्यतया स्त्री के लिए पुरूष की यह यौन जरूरत और उसकी पूर्ति के लिए स्त्री की भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता उसके लिए एक हथियार की तरह उभरने की संभावना पैदा करती है जिसका कि इस्तेमाल तात्कालिक रूप से अपना मनोइच्छित प्राप्त करने में किया जा सकता है।

इसी की अभिव्यक्ति, जैसा कि इस आलेख में जिक्र है, भौतिक वस्तुओ, उसके क्रियाकलापों में सहायता और भावनात्मक संतुष्टि को यौन संबंधों के जरिए प्राप्त करने के रूप में होती है।

जहां बराबरी के से संबंधों की उपस्थिति होती है, वहां फिर भी इनके पृष्ठभूमि में होने की संभावनाएं हो सकती हैं।

मनुष्य की यौन संबंधों की सहज और प्राकृतिक जरूरत इसी व्यवस्थागत रूप के चलते विकृतियों के लिए अभिशप्त है।…..
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आशा है कि कई विषयों पर चिंतन हेतु आपके दिमाग़ को निश्चित ही कुछ ख़ुराक तो मिली ही होगी।
आप चाहे तो किसी पर भी संवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है।

शुक्रिया।

समय
समय के साये में – आपके दिमाग़ से रूबरू आपकी ज़िंदगी का आईना