विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – दूसरा भाग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियमदूसरा भाग
( पिछली बार से जारी…)

hd_bf74c0a762b463eca83a9b861f73f079यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि किस तरह के अंतर्विरोध ( contradiction ) विकास का स्रोत ( source ) हो सकते हैं। अंतर्विरोध स्वयं स्थिर नही रहते। घनीभूत, परिवर्तनहीन अंतर्विरोध, यानि जिनमें ‘घनीभूत’ परिवर्तनरहित विरोधी पक्ष ( opposite sides ) समाहित ( contained ) होते हैं, विकास के स्रोत का काम नहीं कर सकते। एक चुंबक के उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों के बीच संबंध अपरिवर्तनशील है, जिससे चुंबक के ध्रुव स्वयं किसी नये अनुगुणों ( properties ), काल में अविपर्येय ( irreversible ) और दिशागत विकास को जन्म नहीं देते। परिवर्तनशील, गत्यात्मक ( mobile ) अंतर्विरोधों की बात बिल्कुल अलग है। जैसे कि पहले जीवित अंगियों के उपचयन और अपचयन का उदाहरण दिया गया था। जीवित अंगियों में स्वांगीकरण ( assimilation ) तथा विस्वांगीकरण ( dissimilation ) के बीच अंतर्विरोध लगातार उत्पन्न होते हैं, वर्द्धित होते हैं तथा उनका समाधान होता रहता है। इन विरोधी प्रक्रियाओं के बीच संतुलन गड़बड़ाता रहता है, और अंतर्विरोधों के समाधान के रूप में अविपर्येय परिवर्तन ( irreversible changes ) होते हैं, अंगी का विकास होता है।

चिंतन ( thought ) के विकास में भी ऐसी ही प्रक्रिया देखी जाती है। प्रत्येक वस्तु या परिघटना में असीम अनुगुण, पहलू ( aspects ) आदि होते हैं। उन सबको पूरी तरह से और बिल्कुल सही-सही जानना असंभव है। जब हम किसी वस्तु या परिघटना ( phenomenon ) पर सोच-विचार करते हैं, तो हम पहले एक पहलू का अध्ययन करते हैं, उसका संज्ञान प्राप्त करते हैं और फिर दूसरे का। जो संकल्पनाएं ( concepts ) और विचार इन पहलुओं को परावर्तित ( reflect ), अभिव्यक्त करते हैं, वे हमेशा एक दूसरे के अनुरूप ( correspond ) नहीं होते। इससे वस्तु या परिघटना के बारे में हमारे ज्ञान में कुछ निश्चित अंतर्विरोध उत्पन्न हो जाते हैं। जितना ही ये अंतर्विरोध संचित ( accumulate ) होते जाते हैं, उनका समाधान करने की, उन्हें एकीकृत करने की, एक ही एकल में समेकित करने की जरूरत पैदा होती और बढ़ती जाती है, और अध्ययनशील वस्तु या परिघटना का हमारा ज्ञान उतना ही गहन होता जाता है। इस तरह संज्ञान की प्रक्रिया के अंतर्विरोधों के समाधान के जरिए हम समग्र वस्तु या परिघटना के तथा उसके अलग-अलग पहलुओं व अनुगुणों के बीच नियम-संचालित कडियों के बारे में मूलतः नया ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसी में चिंतन का विकास व्यक्त होता है। इस तरह, विभिन्न संकल्पनाओं और विचारों का टकराव ( clashes ) और उनके बीच विसंगतियों ( discrepancies ) तथा अंतर्विरोधों का समाधान हमारे ज्ञान के विकास का सत्य स्रोत प्रमाणित होता है।

सामाजिक जीवन में भी हम देखते हैं कि उत्पादन व उपभोग जैसे विरोधी पक्षों की पारस्परिक क्रिया के परिणामस्वरूप इन दोनों में और फिर सारे समाज में परिवर्तन होते हैं। समाज की उपभोग की जरूरतें उत्पादन को प्रभावित करती हैं और उसमें परिवर्तन लाती हैं। इन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उत्पादन तदनुरूप दिशा में विकसित होता है। मिसाल के लिए, उपनिवेशी पराधीनता की अवधि में उत्पादन को मुख्यतः साम्राज्यवादी देशों की आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में लगाया जाता था, परंतु राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्राप्ति सारे उत्पादन को राष्ट्रीय विकास की आवश्यकता-पूर्ति की ओर लगाना जरूरी बना देती हैं। आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रयत्न में उत्पादन को बेहतर बनाया जाता है तथा और भी अधिक विकसित किया जाता है और आवश्यकताएं भी तदनुसार परिवर्तित व विकसित होती हैं। बदली हुई आवश्यकताएं उत्पादन के लिए नये कार्य प्रस्तुत कर देती हैं और उसकी अनुक्रिया में उत्पादन में फिर परिवर्तन होते हैं और यह सिलसिला जारी रहता है।

समाज के सारे इतिहास पर विचार करने तथा उसके प्रेरक बलों की बात सोचने पर हम देखते हैं कि युद्धों व क्रांतियों, सांस्कृतिक व आर्थिक संबंधों, औद्योगिक मंदियों व उत्कर्षों के विविधतापूर्ण अंतर्गुथन में विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक समूहों, वर्गों तथा राज्यों का टकराव तथा अनवरत संघर्ष लगातार व्यक्त होता रहता है, जो कभी उभार पर होता है और कभी उतार पर। इस संघर्ष के फलस्वरूप नये सामाजिक और राजनीतिक संबंध बनते हैं, पुराने राज्य विखंडित तथा नये गठित होते हैं और नयी सामाजिक-आर्थिक विरचनाएं ( formations ) जन्म लेती हैं, विकसित होती तथा फलती-फूलती हैं। इसीलिए यह जोर दिया जाता है कि विभिन्न सामाजिक शक्तियों, विशेषतः वर्गों का संघर्ष ( struggle of classes ) इतिहास का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रेरक बल और उसके विकास का वास्तविक स्रोत है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि, विरोधियों के बीच अंतर्क्रिया परिवर्तन और नयी गुणात्मक अवस्था में संक्रमण ( transition ) की ओर ले जाती हैं। इससे यह प्रकट होता है कि अंतर्विरोध ही वस्तुओं और घटनाओं की गति और विकास का स्रोत हैं। दूसरे शब्दों में, विरोधियों का संघर्ष और उनके बीच विद्यमान अंतर्विरोधों की उत्पत्ति, वृद्धि और खास तौर पर उनका समाधान ही किसी भी विकास का, चाहे वह कहीं भी और किसी भी रूप में क्यों न हो, वास्तविक स्रोत है। यहां भी यह ध्यान में रखा जाना महत्त्वपूर्ण है कि विरोधियों का संघर्ष एक दूसरे से भिन्न तथा एक दूसरे की विरोधी किन्हीं भी घटनाओं की नहीं, बल्कि सिर्फ़ ऐसी घटनाओं की अंतर्क्रिया, टकराव, उनके समाधान तथा अंतर्वेधन ( interpenetration ) को अभिव्यक्त करता है जो आवश्यक, आंतरिक, नियम-संचालित संबंधों से परस्पर जुड़ी होती हैं।

इस प्रकार, वस्तुओं और घटनाओं की विशेषता ऐसे विरोधी पहलू हैं, जो परस्पर एकत्व की अवस्था में होते हैं। इसके साथ ही वे महज़ सह-अस्तित्व में ही नहीं होते, बल्कि अनवरत अंतर्विरोध और पारस्परिक संघर्ष की स्थिति में होते हैं। विरोधियों का यही संघर्ष वास्तविकता की आंतरिक विषय-वस्तु, उसके विकास का स्रोत है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – पहला भाग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूलो के अंतर्गत विकास के उसूल को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम द्वंद्ववाद के नियमों पर चर्चा शुर करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद के नियम

भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialistic dialectics ) सार्विक संपर्कों और विकास की शिक्षा है और ये इसके नियमों ( laws ) में अत्यंत पूर्णता से अभिव्यक्त होता है।  ‘नियम’ वस्तुओं और घटनाओं का एक वस्तुगत, सार्विक, आवश्यक और सारभूत संपर्क है, जिसकी विशेषता स्थायित्व ( permanency ) और पुनरावृत्ति ( repetition ) है। नियम ऐसा अनिवार्य और आवृत्तिशील संबंध है, जो तब तक निरंतर बना रहता है, जब तक इस नियम से नियंत्रित परिघटनाओं ( phenomenon ) का अस्तित्व रहता है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद विशिष्ट विज्ञानों की उपलब्धियों तथा उनके द्वारा अविष्कृत नियमों का, जो वास्तविकता के किन्हीं खास क्षेत्रों तथा पहलुओं पर ही लागू होते हैं, सामान्यीकरण ( generalization ) करके सर्वाधिक सार्विक नियमों ( most universal laws ) को प्रकाश में लाता है। दर्शन द्वारा अध्ययन किये जानेवाले नियम वास्तविक जगत ( real world ) की सारी वस्तुओं और घटनाओं पर लागू होते हैं।

१. विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम पहला भाग
( law of unity and struggle of opposites )

e_motion_1__18x24_ac_nwविकास के कारण, स्रोत ( source ) से संबंधित प्रश्न का वैज्ञानिक उत्तर द्वंद्ववादी दर्शन ने दिया, जो विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम में व्यक्त हुआ है। यह नियम द्वंद्ववाद का सार, मूलाधार है। यह विकास के आंतरिक कारण को उद्‍घाटित करता है, और दर्शाता है कि उसका स्रोत प्रक्रियाओं तथा घटनाओं के अंतर्विरोधी ( contradictory ) स्वभाव में तथा उनमें अंतर्भूत विरोधियों की अंतर्क्रिया ( interaction ) और संघर्ष ( struggle, conflict ) में निहित है।

इस नियम को समझने के लिए सबसे पहले ‘विरोधियों’ ( opposites ) तथा ‘अंतर्विरोधों‘ ( contradictions ) के अर्थ को स्पष्ट करना जरूरी है। ‘विरोधी’ किसी वस्तु या घटना के अंदरूनी पहलू, प्रवृत्तियां या शक्तियां हैं, जो एक दूसरी को अपवर्जित ( excluded ) करती हैं और साथ ही साथ एक दूसरी के लिए पूर्व-मान्य ( pre-accepted ) भी होती हैं। किसी भी प्रणाली में इन विरोधियों के बीच, परस्पर विरोधी अंशों, अनुगुणों, उपप्रणालियों, आदि के बीच परस्पर संबंध भी पाए जाते हैं। विरोधियों के बीच का यही अंतर्संबंध ( interrelation ) एक ‘अंतर्विरोध‘ होता है।

अजैव प्रकृति में विरोधियों का एक उदाहरण चुंबक है। इसका मुख्य विशिष्ट लक्षण उसके विरोधी ध्रुवों ( poles ) जैसे परस्पर अपवर्जक, परंतु साथ ही घनिष्ठता से अंतर्संबंधित पहलुओं की उपस्थिति है। उत्तरी ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव से पृथक करने का कैसा भी प्रयत्न क्यों न किया जाये, वे अलग नहीं हो सकते। दो, चार या अधिक हिस्सों में काट दिये जाने पर भी चुंबक में उसके वही दो ध्रुव विद्यमान रहेंगे।

जीवित अंगियों के अस्तित्व और विकास की भी विशेषता विरोधियों का वज़ूद है। मसलन, उपचयन और अपचयन प्रक्रियाएं परस्पर विरोधी हैं। ( उपचयन शरीर के भीतर सरल पदार्थों से जटिल पदार्थों की रचना है और अपचयन ऐसे जटिल पदार्थों का विखंडन है। इस विखंडन के दौरान जीवन-क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा विसर्जित होती है। इस तरह उपचयन और अपचयन मिलकर शरीर के अंदर पदार्थों के उपापचयी विनिमय ( metabolic exchange ) की रचना करते हैं। ) इनमें से एक के भी ख़त्म हो जाने पर अंगी का मरना अवश्यंभावी हो जाता है। आनुवंशिकता ( heredity ) तथा अनुकूलनशीलता ( adaptability ) भी विरोधी हैं। अंगी में, एक ओर तो, आनुवंशिक लक्षणों को धारण किये रहने की प्रवृत्ति होती है और दूसरी तरफ़, वह बदलती हुई दशाओं के अनुरूप नये लक्षणों के विकास की ओर प्रवृत्त रहता है।

वर्ग आधारित मानव समाजों में भी विरोधी वर्ग ( opposites classes ) होते हैं। मसलन, दासप्रथात्मक समाज में दास और दास-स्वामी, सामंती समाज में किसान और सामंत, पूंजीवादी समाज में बुर्जुआ और सर्वहारा वर्ग। संज्ञान ( cognition ) की प्रक्रिया में, चिंतन की प्रक्रिया में भी अंतर्विरोधी पहलू होते हैं। इस प्रकार, वास्तविकता ( reality ) की सारी घटनाओं और प्रक्रियाओं में विरोधी पहलू होते हैं। प्रकृति में अंतर्विरोधात्मकता सर्वव्यापी है। यहां यह भी समझ लेना महत्त्वपूर्ण है कि विश्व में सारी घटनाएं एक दूसरे के संदर्भ में विरोधियों, प्रतिपक्षों के रूप में नहीं आती, केवल वे ही घटनाएं विरोधी हैं, जो किसी तरह से परस्पर जुड़ी हैं और अपने कार्यों तथा विकास के दौरान एक दूसरे से अंतर्क्रिया करती हैं।

घटनाओं तथा वस्तुओं में निहित विरोधी किस प्रकार से पारस्परिक क्रिया करते हैं? विभिन्न वस्तुओं के विरोधी पहलू महज सहअस्तित्व ( co-existence ) में नहीं होते, बल्कि एक विशेष द्वंद्वात्मक अंतर्क्रिया में भी रहते हैं, जो विरोधियों के पारस्परिक रूपांतरण ( transformation ) या संपरिवर्तन ( conversion ) की प्रक्रिया होती है। इस अंतर्क्रिया में उनकी एकता और उनका संघर्ष, दोनों शामिल होते हैं।

विरोधियों की एकता का मतलब है कि एक दूसरे के बगैर उनका अस्तित्व नहीं हो सकता है और वे परस्पर निर्भर हैं। उनकी एकता की एक अभिव्यक्ति यह है कि वे निश्चित दशाओं में संतुलित होते हैं। ऐसा संतुलन, जिसमें इन दो विरोधियों में से कोई एक अन्य पर हावी नहीं होता, किसी एक चीज़ के विकास में स्थायित्व ( stability ) की अवस्था का द्योतक ( indicator ) होता है। परंतु विरोधियों का ऐसा संतुलन केवल सापेक्ष और अस्थायी होता है। विकास के दौरान संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिसके अंतिम परिणामस्वरूप एक चीज़ या अवस्था का विलोपन और विरोधियों की नयी एकता से सज्जित दूसरी चीज़ या अवस्था का आविर्भाव हो जाता है। मिसाल के लिए, जवान हो रहे जंतुओं के शरीरों में उपचयन हावी होता है, परिपक्व शरीर में उपचयन और अपचयन संतुलित होते हैं, और वृद्ध शरीर में अपचयन हावी हो जाता है।

विरोधी पहलू एकता के बावजूद एक दूसरे के साथ ‘संघर्ष’ की स्थिति में भी होते हैं, यानि वे एक दूसरे का परस्पर निषेध ( prohibition ) तथा अपवर्जन ( exclusion ) भी करते हैं। जहां विरोधियों की एकता सापेक्ष होती है, वहां उनका संघर्ष, वैसे ही निरपेक्ष तथा स्थायी होता है, जैसे कि गति और विकास। बेशक, अंतर्विरोधों के अस्तित्व का ही अर्थ है कि एक विरोधी पहलू का दूसरे पर क्रिया करना और फलतः पारस्परिक परिवर्तन होना। विरोधियों के पारस्परिक संक्रमण ( transition ) तथा संपरिवर्तन ( conversion ) के दौरान घटनाओं या प्रक्रियाओं के लिए लाक्षणिक अंतर्विरोध उत्पन्न होते हैं और उनका समाधान ( solution ) होता है। अंतर्विरोधों की उत्पत्ति, वृद्धि तथा समाधान की प्रक्रिया के अध्ययन से हमें विकास के वास्तविक स्रोतों की समझ हासिल होती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय