कोरी भावुक राष्ट्रीयता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


कोरी भावुक राष्ट्रीयता

एक जानकारी के तहत मैकाले ने कहा था कि पूरे भारत और अरब की सारी किताबें यूरोपियन पुस्तकालय के एक शेल्फ़ इतनी भी काम की नहीं है। अब बताइए कि यह बात क्या अपमान नहीं है।….ब्रूनो और गैलीलियो को कहाँ जलाया या जान से मार दिया गया। यूरोप में या भारत में? यह कोई लफ़्फ़ाजी नहीं है, यह तो इतिहास ही बताता है। क्या अपने अतीत की खोज का काम बुरा है?

वही प्रवृत्तियां जिन्होंने हमारे यहां वस्तुगत ज्ञान का भरसक रास्ता रोका, बाहर भी, हर जगह हावी हैं। उनमें से कुछ लोग अपने श्रेष्ठताबोधों, दंभों में हैं और हम भी इसके जवाब में अपने श्रेष्ठताबोधों, दंभों से उनका सामना करना चाहते हैं। यानि कि जो प्रवृत्तियां हमें खु़द बुरी लग रही हैं, हम भी वैसे ही हो जाना चाहते हैं। शायद बेहतर हो, आप स्वयं देखिए।

जो धार्मिक-भाववादी प्रवृत्तियां यहां चार्वाकों और लोकायतिकों को नष्ट कर रही थी, बौद्धों का अपने उत्स देश से ही समूल नाश कर रह थीं, वही प्रवृत्तियां वहां भी ब्रूनों, गैलीलियों की राह का नाश करना चाहती थी। पर यह तो तथ्य हैं ही, अंतत्वोगत्वा वहां वस्तुगत वैज्ञानिक प्रवृत्तियों ने लड़ाई लड़ी और अपनी सीमाओं को लांघते हुए अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करवाई। वहां की भौतिक परिस्थितियों ने जो जरूरत पैदा की उसकी वज़ह से इनकी राह थोड़ा आसान हुई, और धीरे-धीरे जीवन के साधन जुटाने की मानवाकांक्षा निर्णायक साबित हुई। धर्म को उन्हें राह देनी ही पड़ी।

अपने अतीत की खोज जरूरी है, पर यह प्रश्न अपनी जगह है कि, क्या यह खोज सिर्फ़ गौरवगान के आत्मपरक लक्ष्यों तक ही सीमित होनी चाहिए?

भाषाओं का इतिहास समझने की बात तो है ही। वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं कि संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक उचित है……यह समझ नहीं आता कि वह कौन से कारक थे जिसके चलते भारत में नागरी लिपि या भाषा पैदा हुई और अब तक की समृद्धतम और वैज्ञानिक लिपि क्यों है?………अगर आप बता सकें तो कृपा कर के कुछ कहें वरना भाषा विज्ञान का इतिहास आदि देखना पड़ेगा।

आप जानते ही हैं कि कंप्यूटर की अपनी कोई भाषा नहीं होती। वह उर्जा की उपलब्धता या अनुपलब्धता ( वोल्टेज नहीं हैं या हैं, यानि ० या १ ) के आधार पर इसी भाषा में समझता और काम करता है। अब आप कंप्यूटर की इस भाषा को किसी भी निर्गम ( output ) संकेतों, भाषाओं में कोडित कर लें जो आपको समझ में आता हो। इसी तरह इसे उसकी भाषा में कोडित करके उसे देदें, वह अपना काम अपनी ही भाषा में करेगा। तो अब यह कहने की क्या उपयोगिता होगी कि कौनसी भाषा उसके लिए अधिक या कम उचित होगी, यह आप ही ज़्यादा बेहतर से समझ सकते हैं।

हमारे पास ऐसी कोई आत्मपरकता नहीं थी कि हम इस श्रेष्ठताबोधी सवाल पर कि ‘भारत में ही नागरी लिपि या भाषा पैदा हुई और अब तक की समृद्धतम और वैज्ञानिक लिपि क्यों है?’ पर माथापच्ची करना चुनते, इसलिए इसके बारे में हमारी सीमाएं हैं। आपको भाषावैज्ञानिक अध्ययनों से गुजरना होगा। और यदि आपको वाकई इस सवाल से इसी नज़रिए के साथ जूझना हो तो वैज्ञानिक अध्ययन को नहीं बल्कि किसी ऐसे ही नज़रिए वाले विद्वान का शोध चुनना होगा जिसने भाषाई श्रेष्ठता के आधारों को ढूढ़ने के आधार पर काम किया हो नाकि वस्तुगत वैज्ञानिक आधारों पर।

विज्ञान पर या मानव के किसी खोज पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता लेकिन पेटेंट जैसी व्यवस्था भी पश्चिम की है जिसके चलते लोगों का शोषण आज भी किया जाता है। वैज्ञानिक आविष्कारों को भी पैसों से तौलने का काम भी पश्चिमी देन है।

विज्ञान खोजें करता है, उनका उपयोग करना और उनमें उद्देश्य भरना मानवजाति का काम है। और स्पष्ट कहें तो समाज के प्रभुत्व प्राप्त वर्गों का काम है। यानि कि विज्ञान की सार्विकता को यदि कुछ समूह इस तरह नियंत्रित कर पाते हैं तो यह उनकी पूंजीगत साम्राज्यवादी व्यवस्था की देन है। सारी ताकत का पूंजी में सिमटा होना है। यानि कि मुख्य लड़ाई इसी पूंजीवादी साम्राजी व्यवस्था से होनी चाहिए जो पूरी मानवजाति की थाति को अपने नियंत्रण में रख कर इसे मनुष्य द्वारा मनुष्य का, और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण का साधन बनाए हुए है। और यही प्रवृत्तियां हमारे यहां भी काम कर रही हैं, उनसे भी। यानि इस साझा दुश्मन को पहचानना और उससे संघर्ष करना हमारा ध्येय होना चाहिए। वह देश के बाहर हो या देश के अंदर। सिर्फ़ कोरी भावुक राष्ट्रीयता देश के अंदर की इसी पूंजीवादी और साम्राजी प्रवृत्ति को नहीं देख पाती, जो आजकल धार्मिक-भाववादी शक्तियों के साथ नाभिनालबद्ध हुई पड़ी है और प्रभुत्व में है, निर्णायक बनी हुई है।

एक बात और जानने की इच्छा है। यूरोप की संस्कृति पर कहा गया है कि वहाँ दास जैसी अमानवीय प्रथा रही है।………….यूरोप में स्त्री को आत्माहीन माना गया। हमारे यहाँ भी बहुत कुछ कहा गया। लेकिन मेरा सवाल है कि यूरोप में ऐसी संस्कृति रही तो इसे क्या कहें?

अगर आप पूरी मानवजाति के इतिहास को वस्तुगत रूप से समग्रता से देखने की कोशिश करेंगे तभी आप यह समझ पाएंगे। लगभग समान रूप से ही, थोड़े से अंतरों के साथ सभी जगह इसी तरह के विकास संस्तरों से मानवजाति गुजरी है। आज की नैतिकता और मूल्यों के सापेक्ष जब हम इतिहास पर नज़र डालते हैं तो सभी संस्कृतियों में ऐसी अवस्थाएं रही हैं।

यूरोप में अमानवीय दासप्रथा रही, तो हमारी संस्कृति में शुद्रों, दलितों और महिलाओं के हालात भी मानवीय नहीं रहे हैं। अभी भी हमारे यहां के सामाजिक जातीय संस्तरों के हालातों से आप भली-भांति परिचित ही होंगे। जो बुरा है, सभी जगह बुरा है, उसे सभी जगह ही बदल देना, त्याज्य देना चाहिए। जो अच्छा है, वह कहीं का भी है, उसे अपना ही लेना चाहिए।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

अतार्किक आधारों से तार्किक पुनर्रचना संभव नहीं

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


अतार्किक आधारों से तार्किक पुनर्रचना संभव नहीं

विकासवाद के आधार पर सोचें तो हम अपनी भाषा के लिए क्यों लड़ते हैं कि विदेशी भाषा हम नहीं थोपेंगे।….तो क्या हम पश्चिमी प्रभाव में मैकाले को सही ठहरा दें? अगर इन चीजों के लिए राष्ट्रवाद शब्द इस्तेमाल करता है तो बुरा क्या है?

मैकाले की शिक्षापद्धति की एक प्रवृति अंग्रेजों के लिए क्लर्क पैदा करने के लिए लक्षित थी। यह एक वास्तविकता है, किसी भी प्रभाव से देखें। मैकाले से मुक्ति पाने, और शिक्षा-पद्धतियों को स्वतंत्रचेता वैज्ञानिक मस्तिष्क पैदा करने की ओर लक्षित होना चाहिए। पर जैसा कि पहले था, सत्ता अपने आपको बनाए रखने के लिए गुलाम मानसिकता और मस्तिष्क ही पैदा करते रहना चाहती है, अभी भी वही है, आज की सामंती मानसिकता वाली पूंजीवादी सत्ताएं भी यही चाहती हैं। स्वतंत्रचेता मस्तिष्क उनकी सत्ताओं को उखाड़ फैंकने के लिए लामबंद हो सकते हैं। इसलिए वे उन्हीं उपविवेशवादी, साम्राज्यवादी पद्धतियों को बनाए रखना चाहते हैं। समाज में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही नहीं चाहते।

इसका मतलब यह कि सत्ता-व्यवस्था में परिवर्तन लाए बिना, एक ऐसी जनपक्षधर सत्ता के अस्तित्व में आए बिना इन राजनैतिक और सामाजिक आमूल-चूल परिवर्तनों को वाकई में कर पाना संभव नहीं है। पूरी व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन अपेक्षित है।

पश्चिमी प्रभाव का मतलब, क्या साम्राज्यवादी मानसिकता में ही देखा जाना चाहिए। हमारे वर्तमान का अधिकतर पश्चिमी वैज्ञानिक और वस्तुगत दृष्टिकोण की ही देन है। जरूरत इसके उपनिवेशवादी तथा साम्राज्यवादी रवैये को बाहर निकालने की, गुलाम मानसिकता पैदा करने वाली पद्धतियों से मुक्ति पाने की है। समग्र को ही पश्चिमी प्रभाव कहकर नकारा नहीं जा सकता।

आप कल्पना कीजिए, लोकतांत्रिक समानता स्वतंत्रता के मूल्यों को, तकनीकी-वैज्ञानिक विकास को, रूढ़ियो और परंपराओं के विरोध को, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों आदि को निकाल फैंकिए, हम हज़ारों साल पहले वाली सामंतवादी सामाजिक संरचना में पहुंच जाएंगे, जहां धर्म-आधारित बर्बर राज्य अस्तित्व में थे, वर्ण-व्यवस्था अपने चरम पर थी, छुआछूत और अस्पृश्यता का बोलबाला था, जीवनीय और चिकित्सीय पद्धतियां अविकसित थीं, आदि-आदि।

गर्व नहीं करने पग-पग पर लोगों में हीनता की भावना आ सकती है और इस तरह की भावनाओं ने ही तो देश की आजादी में लाखों लोग झोंक कर शहीद हुए और महान कहलाये।

यह कोई बेहतर तर्क नहीं है, हीनता की भावना को कम करने या रोकने के लिए कोई भी समाज या व्यक्ति अपने लिए श्रेष्ठताबोध के अवास्तविक आधार स्थापित करले। ऐसे अतार्किक. असत्य,और असहज श्रेष्ठताबोध से हम किस तरह से समाज की एक तार्किक, सहज और वास्तविक पुनर्रचना कर सकते हैं।

इसीलिए हमने कहा था कि इतिहास और परंपरा के वस्तुगत और निरपेक्ष अध्ययन के पश्चात, वास्तविकताओं से दोचार होने के बावज़ूद हमारे पास ऐसी कई चीज़ें बचेंगी जो हमें एक वास्तविक गर्व का बोध देने वाली होंगी। नहीं भी हो, तो ना हो, क्या श्रेष्ठ को ही एक सम्माननीय जीवन जीने का अधिकार मिलेगा। हम श्रेष्ठता की उत्तरजीविता के प्राकृतिक सिद्धांतों को अपनाएंगे या मानवसमाज के मानवीय मूल्यों के आधार पर हर किसी को सम्मान से जीने के अवसर उपलब्ध कराना चाहते हैं।

हमारे श्रेष्ठ होने से य़ा नहीं होने से, हमारी अस्मिता, हमारे सम्मानपूर्ण जीवन, हमारी समानता और स्वतंत्रता के हमारे अधिकार कहीं कम या ज़्यादा नहीं हो सकते। हमारी ही क्या, पूरे विश्व में भी किसी भी देश, समाज या समूह के भी नहीं हो सकते। सभी मानवो को ये अधिकार हैं, और उन्हें पाना सभी का कर्तव्य। इसलिए इस संघर्ष को जातीय, भाषिक, धार्मिक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय श्रेष्ठताबोधों की सीमाओं से मुक्त होना ही होगा जो मानव-मानव में विरोध, अंतर्विरोध और अलगाव पैदा करते हैं। राष्ट्रीय सीमाओं में जातीय, भाषिक, धार्मिक, क्षेत्रीय आदि श्रेष्ठताबोधों से और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं में राष्ट्रीय श्रेष्ठताबोधों से निजात पानी होगी।

हमारी इसी राष्ट्रीय चेतना का विकास, अंग्रेजों के उपनिवेश के विरोध और उससे मुक्ति पाने की प्रक्रियाओं में हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन में पूरे राष्ट्र को इन विरोधों से उठाकर एक राष्ट्रीय चेतना के अंतर्गत लाना जरूरी था। इस राष्ट्रीय चेतना का भी क्रमिक विकास हुआ था। वहां भी कई अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आई थीं, अलग-अलग भी बची रही और उनका समन्वय भी हुआ। शुरुआत धार्मिक मुद्दों के आसपास हुई तो अंततः धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय चेतना का भी निर्माण भी हुआ।

इसके लिए कई तरह की अवास्तविक श्रेष्ठताबोधों की रचना भी की गई। इन-सबके सह-अस्तित्व के साथ तात्कालीन परिस्थितियों में इनके अंतर्विरोध भी चलते रहे। धार्मिक राष्ट्रीय चेतना के द्विध्रुवीय उभार के कारण ही देश का विभाजन भी ऐतिहासिक सत्य बना। भाषाई राष्ट्रीय चेतना के अंतर्विरोध दक्षिण में हिंदी-विरोधी आंदोलनों में देखने को मिले।

लाखों लोग शहीद हुए, आज़ादी मिली। अवास्तविक आधारों पर मिली आज़ादी कितनी अवास्तविक थी, यह अब काफ़ी लोगों को समझ में आ रहा है। तो हमें वास्तविक श्रेष्ठताबोधों और मानवीय मूल्यों के आधारों वाली राष्ट्रीय चेतना की परंपरा को समझना चाहिए, ( क्रांतिकारी समूहों में विकसित हुई समझदारी को देखना चाहिए, जिनकी परिणति भगतसिंह के यहां देखी जा सकती है ), उनकी परंपरा से जुडना चाहिए, उसका और विकास करना चाहिए, और अधूरे लक्ष्यों यथा मानव द्वारा मानव के शोषण और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र के शोषण से मुक्ति के लक्ष्यों से अपने आपको जोड़ना चाहिए।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

राष्ट्र की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


राष्ट्र की अवधारणा

अब हम राष्ट्र का सिद्धान्त बिना माने कैसे छोड़ सकते हैं। इसकी आवश्यकता नहीं है?  मेरी बातों में अंधराष्ट्रवाद अगर लगा तो यह राष्ट्रवाद क्या है?  क्या राष्ट्रवाद लाभकारी नहीं? मैं मानता हूँ किसी द्वेष के बिना यह होना चाहिए।

शायद आप राष्ट्र की अवधारणा को सुनिश्चित करना चाहते हैं। इस पर काफ़ी विद्वानों द्वारा काफ़ी कुछ कहा जा चुका है, आप देखिए और इसे समझिए। एक नज़र यहां भी डाल लेते हैं।

मानव-समुदाय अपने प्रारंभिक रूपों, रक्त-संबंधों से उत्पन्न हुए गोत्र तथा कबीलों के रूप में सहजीवन किया करते थे। उत्पादक शक्तियों के विकास तथा विनिमय-व्यापार में वृद्धि के कारण धीरे-धीरे रक्त संबंधों की अपेक्षा क्षेत्रीय संबंध अधिक महत्त्वपूर्ण होते चले गए और इसके परिणामस्वरूप जातियों तथा बाद में राष्ट्रों का आविर्भाव हुआ।

एक क्षेत्र में दीर्घकालीन सामुदायिक निवास, साझी भाषा तथा रीति-रिवाज़ बड़े जनसमुदायों की ऐतिहासिक नियति को सूत्रबद्ध करते हैं, एक सा चरित्र निरूपित करते हैं और एक समान संस्कृति के निर्माण में योग देते हैं। इस प्रकार जाति का निर्माण होता है ( इस अवधारणा को आपको भारतीय परिप्रेक्ष्य में श्रम-विभाजन के फलस्वरूप पनपने वाली शाब्दिक रूप से ‘जाति’ की अवधारणा से थोड़ा भिन्न देखना होगा )। दासप्रथा काल और सामंतवादी युग में जातियों का आविर्भाव हुआ। जैसे कि, प्राचीन मिस्री, यूनानी, रोमन जातियां, सामंतवादी युग में पश्चिमी यूरोपीय जातियां, पूर्वी स्लाव क़बीलों से रूसी जाति, भारतीय वैदिक आर्य-जाति।

जाति, समुदाय का अस्थिर रूप है। कई प्राचीन जातियों का कालांतर में विघटन हुआ, कुछ जातियों ने अन्य भिन्न जातियों का सूत्रपात किया। जाति के अस्थिर होने का कारण यह है कि उसके पास एकीकृत अर्थव्यवस्था नहीं होती, एकसमान संस्कृति के स्थानीय रूपों में बड़ा अंतर होता है और भाषा एक न रहकर स्थानीय बोलियों में बंट जाती है।

पूंजीवादी संबंधों के विकास के साथ जातियां राष्ट्र के रूप में उभरती हैं। पूंजीवाद स्थानीय सीमाओं को तोड़ डालता है, एक या अनेक जातियों को समान आर्थिक जीवन के बंधनों से आपस में सूत्रबद्ध करता है। क्षेत्रीय एकत्व के अलावा आर्थिक एकत्व भी उत्पन्न होता है और इस आधार पर समान राष्ट्रीय संस्कृति का आविर्भाव होता है, राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना का विकास होता है।

राष्ट्र लोगों की स्थायी समष्टि को कहते हैं, जिन्हें आर्थिक, क्षेत्रीय, भाषाई, सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक संबंध एकजुट करते हैं

बात ऐसी ही है, परंतु कुछ सिद्धांतकार राष्ट्र की इस अवधारणा को इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों में नहीं देखकर, इसे नस्ली लक्षणों के, धर्म के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। इसी प्रवृति को आप फ़ासिस्टों, नाज़ियों की आर्य नस्ल की श्रेष्ठता के मानवद्वेषी सिद्धांतों में और इसी तरह के भारत में हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी शक्तियों के धार्मिक हिंदू-राष्ट्रवादी सिद्धांत में देख सकते हैं।

इतिहास बताता है कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में नस्ली, या धार्मिक लक्षण मुख्य भूमिका अदा नहीं करते। लैटिन अमरीका में कई देशों में तीन नस्लों के लोगों से एक राष्ट्र का निर्माण हुआ है। उत्तर अमरीकी राष्ट्र में गोरे लोगों के साथ नीग्रों भी शामिल हैं। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के उपनिवेश से स्वतंत्रता के संघर्षों में भारतीय राष्ट्रीयता धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि से ऊपर उठकर ही विकसित हुई। ये बात अलग है कि ये सवाल और इनके अंतर्विरोध साथ-साथ चल रहे थे, इसीलिए स्वतंत्रता के सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात कई संबंधित समूहों में अभी भी ये सवाल अहम बने हुए हैं, बनाए रखे हुए हैं।

राष्ट्रीय संबंधों के विकास के लिए दो प्रवृत्तियां लाक्षणिक होती हैं। पहली प्रवृत्ति राष्ट्रीय है, यानि लोगों के ऐतिहासिक समुदाय के रूप में राष्ट्र की चेतना का जागरण, राजनीतिक तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने, सृजनात्मक शक्तियों का विकास करने, साझी संस्कृति का उत्थान करने की इच्छा। दूसरी प्रवृत्ति अंतर्राष्ट्रीय होती है, यानि राष्ट्रों के बीच संबंध बढ़ाने, बाधाएं हटाने, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और समूचे सामाजिक जीवन का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की प्रवृत्ति। अंततः इन दोनों प्रवृत्तियों से मानव सभ्यता की प्रगति में योग मिलता है। परंतु अभी की साम्राज्यवादी शक्तियां इन दो शक्तिशाली धाराओं को आपस में मिलने न देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाती हैं। अपनी स्वार्थ-सिद्धी के लिए राष्ट्रीय चेतना तथा भावनाओं का उपयोग करने के लिए कुछ राष्ट्रों के अन्य जातियों से श्रेष्ठ होने का प्रचार करती हैं, विभिन्न राष्ट्रों के संकीर्ण-राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रश्रय देती हैं उन्हें भड़काती हैं।

राष्ट्रवाद की भूमिका, अपनी स्वतंत्रता के लिए, साम्राज्यवादी आधिपत्य के विरुद्ध संघर्षरत उत्पीडित जातियों के राष्ट्रवादी आंदोलन में प्रगतिशील होती है। मगर अनुभव से पता चलता है कि बाद में यह अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के दृढीकरण में, संपूर्ण मानवजाति की प्रगति की राह में बाधा बनकर खड़ी हो जाती है, और सत्ताधारी वर्ग अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं। कई देशों में तो सरकारें इसी राष्ट्रीयता विरोध के भावनात्मक ज्वार में अपने -आपको बनाए रखने में सहूलियत महसूस करती हैं, दूसरे देशों के साथ अपने तनावों को बना कर युद्ध की स्थितियां सी बनाए रखती हैं, इससे राष्ट्रीय-भावना को उभारकर अपनी सत्ता को दूसरे सवालों से अक्षुण्ण बनाए रखती हैं। आप इसे भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में समझ सकते हैं।

यानि राष्ट्रवाद को संकीर्ण अर्थों में ना लेकर, इसे सभी धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई सवालों से ऊपर उठकर एक राष्ट्रीय चेतना के निर्माण, राजनीतिक तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने, सृजनात्मक शक्तियों का विकास करने, साझी संस्कृति का उत्थान करने की दिशा में लक्षित होना चाहिए। जो कि अंततः अंतर्राष्ट्रीयकृत साम्राज्यवाद के विरुद्ध लक्षित संघर्षों के अंतर्राष्ट्रीयकरण से हमसाया हो सके, और एक शोषण रहित अंतर्राष्ट्रीय मानव संस्कृति का निर्माण संभव हो सके।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय