प्रेम व्यापक होता है और व्यापकता देता है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


प्रेम व्यापक होता है और व्यापकता देता है

लेकिन इससे पता चलता है कि लैला-मजनू जैसे किस्से सम्भव नहीं हैं क्योंकि प्रेम अस्थायी होगा ही। कुछ समय के लिए वह भले रहे या बना रहे लेकिन उसे समाप्त होना ही है।

प्रेम के आधार यदि वस्तुगत ( objective ) नहीं है, यदि वह काल्पनिकता के आसमान पर परवान चढ़ाया हुआ है, कोरी भावुकता से परिपूर्ण है, तभी हम कह सकते हैं कि प्रेम अस्थायी होगा, उसे वास्तविकता की कठोर ज़मीन पर आते ही समाप्त होना ही होगा।

प्रेम का होना बहुत जरूरी है। प्रेम ही है जो मनुष्य को अपने अस्तित्व का, अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है। उसे विशुद्ध मानवीयता का पहला पाठ पढ़ाता है, परंपराओं और यथास्थिति से विद्रोह सिखाता है, दुनिया को और बेहतर बनाए जाने की आकांक्षाओं और जुंबिशों से भर देता है। यदि प्रेम वास्तविकता के वस्तुगत आधारों पर परवान चढ़ता है, तो वह इसे सारी मानवता के दायरे तक विस्तार देता है। एक के प्रति प्रेम का अहसास, सभी के प्रति प्रेम के अहसासों से मनुष्य को भर देता है। वह सही मायने में तभी मनुष्य बनने की राह में कदम बढ़ा सकता है। सही समझ के साथ, प्रेम व्यापक होता है, और मनुष्य को व्यापकता देता है

हमारा मंतव्य प्रेम के वस्तुगत आधारों को समझने और समझाने का था, इसे सही राह दिखाने का था। ना कि इसके नकार के प्रतिमान रचना।

आपने प्रेम के मामले में कहा था कि किसी को किसी की मासूमियत पर तो किसी को खास तरह की मुस्कुराहट पर या किसी को अंग विशेष की बनावट पर दिल आ जाता है…….इस खास किस्म की पसन्द के पीछे की प्रक्रिया क्या है? यानी क्यों किसी को किसी खास किस्म की विशेषता पसन्द है? जैसे मान लेते हैं कि हमें हरा रंग अच्छा लगता है, तो हरा ही क्यों? कैसे? इसके पीछे का कारण? या फिर भोजन के मामले में खास तरह की सब्जी ही क्यों पसंद होती है या नहीं भी होती है? यह तो लगता है कि यह दीर्घकालीन संचय है। धीरे-धीरे ऐसा व्यवहार हमारे अचेतन में जमा हो जाता होगा, शायद ऐसा होता हो। इस पर आप ही सुझाएंगे।

हमने पहले यह कहा था, “यानि कि मनुष्य यदि दस व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव सांयोगिक रूप से करता हुआ लगता हो, और यह प्रश्न खड़ा होता हो कि वही क्यों? तो हमें यह समझना होगा कि चुनाव की इस सांयोगिकता के पीछे उस व्यक्ति के सौदर्यबोध के अपने मानदंड़ ( standards ) और अंतर्संबधों के बारे में उसकी मान्यताएं जाने-अनजाने पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही होती हैं।”

यहां साफ़ बात है कि व्यक्ति के इस संदर्भ में अपने विशिष्ट मानदंड और मान्यताएं विकसित हो जाती हैं। आप जानना चाह रहे हैं कि ये कैसे विकसित हो जाते हैं? आपने जो सुझाया बात लगभग वैसी ही है, यानि कि व्यवहार का, सक्रियता का, परिवेश के साथ अंतर्गुथन का दीर्घकालीन अनुकूलन। हमारे उपलब्ध परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं में यह अनुकूलन हमें उसका अभ्यस्त बनाता है और हम वैसी ही परिस्थितियों में सहज महसूस करते हैं, अच्छा महसूस करते हैं। इसलिए हमें हमारे परिवेश की चीज़ों की खास बुनावट, आकार, अन्य गुणधर्मों के प्रति एक खास क़िस्म का अनुराग पैदा हो जाता है, उसके पीछे होता यह है कि परिचित, अभ्यस्त बुनावट हमें सहज रखती है जबकि अपरिचित बुनावट हमारा ध्यान बांटती है, हमें उत्तेजित करती है, सहज नहीं रहने देती।

आगे बढ़ते हैं, जैसे कि मान लेते हैं किसी को अपनी मां से विशेष स्नेह है, सभी को होता है, मां एक विशेष अंदाज़ में मुस्कुराती है, मां के आंचल के सुरक्षाबोध के साथ, स्नेह और अपनत्व के साथ, सुक़ून के अहसास के साथ वह विशेष मुस्कुराहट उसकी चेतना में इतना घुलमिल जाती है कि धीरे-धीरे सिर्फ़ वह मुस्कुराहट ही इन सभी अहसासों का भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगती है। मतलब कि उस मुस्कुराहट को देखते ही, दिमाग़, मन इन्हीं भावनाओं और अहसासों ( सुरक्षा, स्नेह, अपनत्व, सुक़ून आदि ) की अवस्था में आ जाता है और वह मुस्कुराहट इन सबका पर्याय बनती जाती है। अब यह विशेष मुस्कुराहट यदि और भी कहीं उसे देखने को मिलती है, यानि अपनी मां से अलग, किसी और के चहरे पर, तो वहां भी उसके मानस में यही अहसास पैदा होते हैं। जाहिर है, जिसके चहरे पर ये मुस्कान की यह विशिष्ट अदा होगी वह उसे अच्छा लगेगा, पसंद आएगा। वह उसके अंदर वैसे ही व्यक्तित्व की आशा से भर उठेगा।

बाकी सौन्दर्यबोधों को भी ऐसे ही समझा जा सकता है। रंगों और स्वादों के मामलों को भी। बचपन से ही हरे रंग के बीच पला-बढ़ा बच्चा उसी रंग के साथ सहजता और सुक़ून महसूस करता है और वह उसकी पसंद बन जाता है। दादी द्वारा चूल्हे पर दाल पर हींग और लहसुन के छौंक की गंध उसके मानस पर और उसकी स्मृति में इस तरह समा जाती है कि वह हमेशा उसी तरह की प्रिय लगने वाली गंध और स्वाद के लिए हमेशा लालायित रह सकता है। एक विशेष परिवेश में पले व्यक्ति में बचपन से ही चिकन करी की गंध और स्वाद उसकी पसंद से इस तरह नाभीनालबद्ध हो सकते है कि वही उसके लिए दुनिया का बेहतरीन स्वाद हो सकता है, वहीं दूसरे परिवेश का व्यक्ति के लिए यह घृणा पैदा करने वाली गंध और स्वाद हो सकता है और वह बचपन से ही खाते आ रहे बैंगनों के साथ अधिक पसंद का लगाव रखा हो सकता है।

अब आप शुक्रिया शब्द लिखने की कृपा न करें क्योंकि मैं आपका समय ले रहा हूँ और मेरे लिए कुछ दे रहे हैं। मेरे लायक कुछ सहायता बन पड़े तो बताइएगा।

शुक्रिया, आपसी संवाद के चलते रहने और हमारी स्वयं की समझ तथा चेतना के परिष्कार की संभावनाएं देते रहने की महत्त्वपूर्ण बात पर व्यक्त किये जानेवाला औपचारिक आभार है।

संवाद हमें भी अवसर देता है आपस में कुछ सीखने का, अपने विषयगत विचारों को स्थिर और अभिव्यक्त कर पाने का। कई बार यह होता है कि समझाने की प्रक्रिया में कई चीज़ों पर हमारी समझ भी साफ़ और तार्किक होती जाती है। हमें भी कई चीज़ें और बेहतरी से समझ में आती हैं। कई नये अंतर्संबंध और बेहतर तार्किकताएं सामने आती हैं।

और आप, आपसे संवाद, यह अवसर उपलब्ध करवा रहा है, तो हमारा आपके प्रति शुक्रगुज़ार होना लाज़िमी है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

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प्रेमपात्र के चुनाव में सांयोगिकता की पृष्ठभूमि

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।


प्रेमपात्र के चुनाव में सांयोगिकता की पृष्ठभूमि

एक सवाल है प्रेम पर। जैसाकि आपने कहा है और मैं सबको सही मानता हूँ लेकिन ऐसा लोग कहते हैं कि दस सुन्दर व्यक्ति हैं तब भी आपका प्रेमपात्र कोई एक ही क्यों? और अगर शरीर महत्व का है तब प्रेमपात्र से बहुत सुन्दर शरीर के लोग होग सामने होते हुए भी और अन्य सभी गुणों में भी प्रेमपात्र से आगे होते हुए भी एक ही व्यक्ति क्यों और कैसे पसन्द आ जाता है। कुछ तो समझ में आया लेकिन ये सवाल है।

इस चीज़ को आप यदि दूर से, निरपेक्षता से देखेंगे तो इसे समझने में इस तरह के भ्रम पैदा हो सकते हैं। जब हम चीज़ों को समझने की प्रक्रिया में होते हैं, तो हमें उस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर मिलती जुलती प्रक्रियाओं को दूरस्थ परिवेश की जगह अपने पास के, अपनी ख़ुद की ज़िंदगी, या अपनी ज़िंदगी के निकट और जुड़ी हुई चीज़ों और प्रक्रियाओं पर दृष्टिपात करना चाहिए।

प्रेम की भावना भी, अन्य भावनाओं की तरह ही मनुष्य की जैविक और जीवनीय आवश्यकताओं और उनकी तुष्टि की संभावनाओं के आधार पर ही पैदा होती और परवान चढ़ती है

हम देखते हैं ( और हमें अपने स्वयं के जीवन में झांकना चाहिए, अपनी ख़ुद की भावनाओं की पडताल करनी चाहिए ) कि अक्सर प्रेम दो ऐसे विपरीत लिंगियों के बीच में पनपता है, जो किसी ना किसी रूप में एक दूसरे के साथ अंतर्संबद्ध हैं, यानि कि उनके बीच ऐसे संबंध पनपने की संभावनाएं है। अक्सर वे एक दूसरे के परिचित परिवेश के होते हैं, अडौस-पडौस के, एक ही गांव के आदि, यानि कि जहां उनकी दैनिक आपसी अंतर्क्रियाएं सम्पन्न होती हों। यह स्वाभाविक परिणति है।

यानि किन्हीं भी दस को खड़े करने और उनमें से चुनने की बात नहीं है, यह स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होगी वरन अपने किन्हीं सौन्दर्यबोध के प्रतीकों के चलते प्रबलीकृत ( forced ) आकांक्षाएं होंगी। यह अधिकतर सक्रियता का दायरा बढ़ने और समझ बढ़ने के बाद की नियतियां है। जैसे कि स्कूल या कॉलेजों में सहपाठी विपरीत लिंगियों के बीच संभावनाएं होती हैं। वहां अक्सर आपको ऐसे लड़के या लड़कियां मिल जाएंगी जो किसी ना किसी गुण को लक्षित करके, जिसमें अधिकतर दिखता सौन्दर्य शामिल होता है, किसी को अपने प्रेम का लक्षित बना लेते हैं, एकतरफ़ा भावनाएं पाल लेते हैं। पर यदि उनके बीच संपर्क नहीं है, तो बात को आगे बढ़ने की नौबत नहीं आने पाती।

एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी, लगाव और समरसता की भावना के रूप में शुरुआती आकर्षण तभी ढल सकता है जब उनके बीच अंतर्क्रिया होती हों, एक दूसरे के गुणों और व्यवहार के बीच धीरे-धीरे सम्मान और संपात की स्थिति पैदा होती हो।

यानि कि मनुष्य यदि दस व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव सांयोगिक रूप से करता हुआ लगता हो, और यह प्रश्न खड़ा होता हो कि वही क्यों? तो हमें यह समझना होगा कि चुनाव की इस सांयोगिकता के पीछे उस व्यक्ति के सौदर्यबोध के अपने मानदंड़ ( standards ) और अंतर्संबधों के बारे में उसकी मान्यताएं जाने-अनजाने पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही होती हैं।

सुंदरता के भी अपने-अपने मानदंड बन जाते हैं, और वह उन्हीं से मिलते जुलते संरूपों को पसंद करता है। हो सकता है कि कोई ऐश्वर्या की सुंदरता के आगे, दीप्ति नवल को प्राथमिकता देता हो। किसी को मासूम मुस्कुराहट में दिलचस्पी हो सकती है, किसी को शक्ल या उसके अंगों की एक खास बनावट में, कोई घरेलू मासूमियत के भावों को वरीयता देता हो वहीं कोई सैक्सी दर्शनीयता को, किसी के मन में छरहरता ( slimness ) की संकल्पना ज़्यादा हावी हो सकती है, आदि-आदि। यानि कि उसका चुनाव इन्हीं जैसी कई चीज़ों पर निर्भर होता है, ना कि एकदम सांयोगिक और किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा के।

आप देखेंगे कि शुरुआती आकर्षण और चुनाव में शारीरिक गुणों की महती भूमिका होती है, पर असली परीक्षा तो आपसी अंतर्क्रियाओं में, यानि व्यक्तित्व के आंतरिक व्यावहारिक गुणों के परीक्षण में होती है। आपके पास ऐसे कई उदाहरण होंगे, जिनमें कुछ ही मुलाकातों में शारीरिक आकर्षण गायब हो जाता है और व्यवहार की एकरसता नहीं पैदा हो पाने के कारण अलगाव हो जाता है। ऐसा भी होता है, कि शारीरिक आकर्षण या किन्हीं विशेष गुणों पर व्यक्ति की दीवानगी के कारण, वह दूसरी चीज़ों को जबरन स्थगित करता रहे और संबंधों को आगे बढ़ाता रहे। पर ऐसे में यह भी अवश्यंभावी है कि फिर उनकी तुष्टि होते ही, मोहभंग पैदा हो सकता है, और बाकी ज़मीनी सच्चाइयां हावी होने लगती है और बहुत बाद में भी अलगाव की संभावनाएं होती है।

व्यक्ति किसी विशेष सौन्दर्य का उपासक होने के नाते, अडौस-पडौस में स्थित कई सारे विपरीत लिंगियों में से अपनी मानदंड़ों के अनुसार किसी एक का सचेतन चुनाव कर सकता है, परंतु होता यह है कि उस विपरीत लिंगी के भी इसी चुनाव के मामले में अपने मानदंड होते है जो जरूरी नहीं कि संपाती हो जाएं। तो जाहिर है कुछ शुरुआती अंतर्क्रियाओं के बाद ही शनैः शनैः जाने-अनजाने में, यह छंटनी की प्रक्रिया चलती है और किसी एक व्यक्ति के साथ बाह्य और आंतरिक गुणों के बीच एक सामंजस्य, एक सहजता स्थापित हो जाती है। और हम इसे निरपेक्ष रूप से देखते वक्त इसकी गहराई में जाने के बजाए सिर्फ़ एक रहस्यमयी, पहले से नियत संयोग के रूप में देख सकते हैं। जैसी कि प्रवृत्ति आपके सवाल में परिलक्षित हो रही है।

तो यदि आप इसी दिशा में और चिंतन-मनन करेंगे, तो शायद आप समझ पाएंगे कि किसी दैवीय या रहस्यमयी प्रेरणा की उपस्थिति के असली मायने क्या हैं। शायद इसे हेतु हम पर्याप्त इशारे कर पाए हों। कोई और शंका हो तो बात आगे बढ़ाई जा सकती है।


इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

प्रेम एक भौतिक अवधारणा है…..

हे मानव श्रेष्ठों,

पिछली बार हमने प्रेम पर बात करते हुए मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता की चर्चा की थी, इस बार हम प्रेम की भौतिक अवधारणा को समझने की कोशिश करेंगे….

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प्रेम मनुष्य का, विशेषतः युवावस्था में, एक स्थायी भावनात्मक संवेग है। इसे मनुष्य की प्राकृतिक और सामाजिक सापेक्षताओं, जिनका कि पूर्व में थोडा़ विवेचन हुआ है, की सीमाओं के संदर्भ में ही सही-सही समझा जा सकता है।
मनोविज्ञान में ‘प्रेम’ शब्द को इसके संकीर्ण और व्यापक अर्थों में प्रयोग किया जाता है। अपने व्यापक अर्थों में प्रेम एक प्रबल सकारात्मक संवेग है, जो अपने लक्ष्य को अन्य सभी लक्ष्यों से अलग कर लेता है और उसे मनुष्य अपनी जीवनीय आवश्यकताओं एवं हितों का केंद्र बना लेता है। मातृभूमि, मां, बच्चों, संगीत आदि से प्रेम इस कोटि में आता है।
अपने संकीर्ण अर्थों में प्रेम मनुष्य की एक प्रगाढ़ तथा अपेक्षाकृत स्थिर भावना है, जो शरीरक्रिया की दृष्टि से यौन आवश्यकताओं की उपज होती है। यह भावना, मनुष्य में अपनी महत्वपूर्ण वैयक्तिक विशेषता द्वारा दूसरे व्यक्ति के जीवन में इस ढंग से अधिकतम स्थान पा लेने की इच्छा में अभिव्यक्त होती है कि उस व्यक्ति में भी वैसी ही प्रगाढ़ तथा स्थिर जवाबी भावना रखने की आवश्यकता पैदा हो जाये।
इस तरह प्रेम के दो पहलू सामने आते हैं, एक आत्मिक और दूसरा शारीरिक। प्रेम को या तो केवल कामवृति का पर्याय मान लिया जाता है, या फिर उसके शारीरिक पहलू को नकारकर अथवा महत्वहीन बताकर उसे मात्र एक ‘आत्मिक’ भावना का दर्जा दे दिया जाता है। सत्य यह है कि शारीरिक आवश्यकताएं निश्चय ही पुरूष तथा स्त्री के बीच प्रेम की भावना के पैदा होने तथा बने रहने की एक पूर्व अपेक्षा है, किंतु अपनी अंतरंग मानसिक विशेषताओं की दृष्टि से प्रेम एक समाजसापेक्ष भावना है, क्योंकि मनुष्य के व्यक्तित्व में शारीरिक तत्व दब जाता है, बदल जाता है और सामाजिक रूप ग्रहण कर लेता है।

यहां किशोरावस्था के प्रेम का भी अलग से जिक्र किया जाना चाहिये, क्योंकि अपने विशिष्ट स्वरूप के कारण यह विशेष महत्व रखता है। व्यस्कों की तरह ही, किशोर अवस्था में किया जाने वाला प्रेम भी यौन आवश्यकता की उपज होता है परंतु यह व्यस्क प्रेम से बहुत भिन्न होता है। आम तौर पर किशोर इसके मूल में निहित आवश्यकताओं के बीच स्पष्ट भेद नहीं कर पाते और यह भी पूरी तरह नहीं जानते कि इन्हें कैसे तुष्ट किया जाता है। अक्सर व्यस्क लोग उनकी इस कोमल भावना को अपने निजी यौन अनुभवों की दृष्टि से देखते है, और यह अहसास की उन्हें गलत नजरिए से देखा जा रहा है किशोरों के अंदर अविश्वास, अवमानना और धृष्टता के भाव पैदा होने की संभावना देता है। हालांकि इस आयु में प्रेम वस्तुपरक रूप से कामेच्छा पर आधारित होता है पर प्रेमियों के व्यवहार का स्वरूप इस कामेच्छा की बात को नकारता है और प्रेम की भावना को मानसिक ताने-बाने में उलझाकर एक ऐसा घटाघोप तैयार कर लेता है, जिसकी परिणति नकारात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेती है।

अब मनोविज्ञान से बाहर निकलते हैं और देखते हैं कि उपरोक्त विवेचना के आधार पर और भावनाओं के भौतिक आधार के मद्दे-नज़र, यह कहा जा सकता है कि प्रेम वस्तुतः एक भौतिक अवधारणा है जिसका कि सार अंत्यंत समृद्ध तथा विविध है। लोगों के बीच प्रेम एक ऐसे अंतर्संबंध का द्योतक है, जो एक दूसरे की संगति के लिए लालायित होने, अपनी दिलचस्पियों और आकांक्षाओं को तद्‍रूप करने, एक दूसरे को शारीरिक और आत्मिक रूप से समर्पित करने के लिए प्रेरित करता है। प्रेम की भावना प्राकृतिक आधार रखती है परंतु मूलतः यह सामाजिक है।

जो मनुष्य प्रेम की इस भावना को सिर्फ़ प्राकृतिक आधारों पर निर्भर रखते है, जिनके लिए व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति ही सबसे महत्वपूर्ण होती है, वे इसके सामाजिक पहलू और सरोकारों को जबरन नज़रअंदाज करते हैं और अपनी भौतिक जरूरतों और अहम् की तुष्टि के लिए आसमान सिर पर उठा लेते हैं। जो मनुष्य प्रेम इस भावना को सिर्फ़ सामाजिक आधारों के हिसाब से तौलते हैं, वे अपने सामाजिक सरोकारों के सामने इसका दमन करते हैं, और कुंठाओं का शिकार बनते हैं।

जो मनुष्य प्रेम की इस भावना के प्राकृतिक आधारों को समझते हुए सामाजिक आधारों तक इसे व्यापकता देते हैं, प्रेम के सही अर्थों को ढूढ़ने की कोशिश करते हैं, इसे व्यक्तिगत और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में समझने की कोशिश करते हैं वे इस अंतर्विरोध से भी जिम्मेदारी से जूझते हैं और अपनी व्यक्तिगत जरूरतों और सामाजिक सरोकारों के बीच एक तारतम्य बिठाते हैं। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि ये भावनाएं, ये अंतर्विरोध, ये द्वंद वास्तविक भौतिक परिस्थितियों से निगमित हो रहे हैं, इसलिए इनका हल भी वास्तविक भौतिक क्रियाकलापों और परिस्थितियों के अनूकूलन से ही निकल सकता है न कि मानसिक क्रियाकलापों और कुंठाओं से जो कि अंततः गहरे अवसादों का कारण बन सकते हैं।
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इस तरह प्रेम की चर्चा फिलहाल खत्म करते हैं।
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कॄपया संवाद करें।
समय आपकी सेवा में हाज़िर है।

समय