मन और मस्तिष्क

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। पिछली बार यहां मन के परावर्ती स्वरूप पर एक संक्षिप्त दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया था। इस बार मन और मस्तिष्क पर थोड़ी और चर्चा करेंगे। पहले यहां इसी संदर्भ में कुछ चर्चाएं की जा चुकी हैं जिनके लिंक यथोचित स्थान पर दे दिये गये हैं, जो भी मानवश्रेष्ठ चाहें उनसे भी लाभांवित हो सकते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मन और मस्तिष्क

मन मस्तिष्क का प्रकार्य है। किसी भी अवयवी की मानसिक क्रिया बहुसंख्य विशिष्ट शारीरिक युक्तियों के माध्यम से संपन्न होती है। इनमें से कुछ बाह्य प्रभावों को ग्रहण करने वाली युक्तियों का काम करती हैं, कुछ इन प्रभावों को संकेतों में बदलती, व्यवहार की योजना बनाती तथा उसे क्रियान्वित करती हैं, कुछ का काम व्यवहार को आवश्यक ऊर्जा तथा आवेग प्रदान करना होता है और कुछ पेशियों, आदि को सक्रिय बनाती हैं। अवयवी का यह सारा जटिल कार्य, उसे अपने को परिस्थिति के अनुकूल ढ़ालने और जीवनीय समस्याएं हल करने की संभावनाएं देता है।

जीवजगत के, अमीबा से लेकर मनुष्य तक दीर्घ उदविकास के दौरान व्यवहार के शरीरक्रियात्मक तंत्र उत्तरोत्तर ज़्यादा पेचीदे, विभेदीकृत, लचीले और पर्यावरण के अनुकूल बनते गये हैं। अंगों के विशिष्टीकरण और जीवन के लिए उनके बीच निरंतर संपर्क और गतियों के समन्वय की जरूरत के चलते,  मुख्य नियंत्रण पटल अर्थात केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क का विकास हुआ। केंद्रीय तंत्रिका-तंत्र के सभी भागों की संरचना अत्यंत जटिल है और शरीररचनाविज्ञान और ऊतकविज्ञान उनका अध्ययन करते हैं। यहां हम उनके विस्तार में नहीं जाएंगे, परंतु यदि कुछ जिज्ञासू चाहें तो पूर्व की प्रविष्टियों : “जीवन का क्रम-विकास और तंत्रिका तंत्र की उत्पत्ति”, “सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन”, तथा “मानसिक क्रियाकलाप के भौतिक अंगरूप में मस्तिष्क” को पढ़ कर कुछ इशारे पा सकते हैं, जिज्ञासा को थोड़ा तुष्ट कर सकते हैं।

आधुनिक विज्ञान मेरू-रज्जु तथा प्रमस्तिष्कीय स्कंध को मुख्य रूप से परावर्ती क्रिया के सहज रूपों ( अननुकूलित प्रतिवर्तों ) के अधिष्ठान मानता है, जबकि प्रमस्तिष्कीय गोलार्धों की प्रांतस्था व्यवहार के मन द्वारा नियंत्रित तथा जन्मोपरांत उपार्जित रूपों का अंग है। यह जानना दिलचस्प रहेगा कि, मनुष्य के प्रमस्तिष्कीय गोलार्धों की प्रातंस्था के काफ़ी बड़े भाग में हाथों और विशेषतः अंगु्ठों की, जो मनुष्यों में अन्य सभी उंगलियों के आमने-सामने आने की क्षमता रखते हैं, क्रिया से जुड़ी हुई कोशिकाएं और वाक् के अंगों – होठों तथा जिह्वा – की पेशियों के कार्य से जुड़ी हुई कोशिकाएं होती हैं। इस प्रकार मनुष्य के प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध मुख्य रूप से उन प्रेरक अंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी श्रम तथा संप्रेषण में मुख्य भूमिका होती है

मनुष्य की मानसिक प्रक्रियाओं के मस्तिष्कीय तंत्रों और पशुओं के मानस के तंत्रों में काफ़ी समानताएं हैं। सभी स्तनपायी प्राणियों में तंत्रिका तंत्र की संरचना तथा संक्रिया के सामान्य सिद्धांत एक जैसे हैं। इसलिए शरीरक्रियाविज्ञान और मनोविज्ञान, दोनों के लिए पशुओं के मस्तिष्क का अध्ययन बहुत ही महत्वपूर्ण है। किंतु हमें मनुष्य की मानसिक प्रक्रिया और पशुओं की मानसिक ल्रिया के बीच जो बुनियादी भेद हैं, उन्हें नहीं भूलना चाहिए। ये भेद परिमाणात्मक ही नहीं, बल्कि गुणात्मक भी हैं। वे श्रम की प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से आगे बढ़े और श्रम एक ऐसा सशक्त भौतिक कारण था कि जिसने मस्तिष्क समेत मनुष्य के शरीर के सभी अंगों की संरचना और कार्यों को बदल डाला। मनुष्य और पशुओं के मानस में भेदों पर एक चर्चा हम यहां पहले ही कर चुके हैं, और बाद में भी इसे विस्तार से देखने की कोशिश करेंगे।

मनुष्य के मनोजीवन में ललाट खंडों की भूमिका विशेषतः महत्वपूर्ण है। प्रांतस्था की तीस प्रतिशत सतह पर ये ही खंड स्थित हैं। बीमारी या चोट आदि के कारण उन्हें पहुंची क्षति से व्यवहार के सामान्य ही नहीं, अपितु उच्चतर रूप भी प्रभावित होते हैं। उदाहरणार्थ, जिन रोगियों के ललाट खंड क्षतिग्रस्त हैं, उनकी देखने, बोलने तथा लिखने की क्षमता तो बनी रहती है, किंतु यदि उनसे गणित का कोई सवाल हल करने को कहा जाए तो वे उसकी शर्तों का विश्लेषण करने का प्रयत्न भी नहीं करते। हल की योजना बनाते हुए वे अंतिम प्रश्न तक को भूल जाते हैं और अपनी त्रुटियों पर ध्यान नहीं देते हैं। बहुत से नैदानिक तथ्य दिखाते हैं कि मस्तिष्क के ललाट खंडों को क्षति पहुंचने से बौद्धिक योग्यताओं के घटने के साथ-साथ कई तरह की व्यक्तित्व तथा स्वभाव संबंधी गड़बड़ियां पैदा हो जाती हैं। इस तरह जो पहले शिष्ट तथा संयतस्वभाव माने जाते थे, वे अब असंयत, अशिष्ट और सहसा तैश में आ जानेवाले बन जाते हैं।

यह पाया गया है कि प्रमस्तिष्क के दायें तथा बायें गोलार्धों के मानसिक प्रकार्य कुछ हद तक बँटे हुए हैं। बिंबों और शब्दों के रूप में सूचना का ग्रहण तथा संसाधन दोनों गोलार्धों द्वारा किया जाता है, फिर भी वे जो कार्य करते हैं उनमें काफ़ी स्पष्ट अंतर है। इस तरह कहा जा सकता है कि मस्तिष्क में क्रियात्मक असममिति होती है। बायां गोलार्ध पढ़ने, गिनने और सामान्यतः संकेतों ( शब्दों, प्रतीकों, आकृतियों, आदि ) से काम लेने से संबंध रखता है। उसकी बदौलत तार्किक निर्मितियां बनायी जाती हैं, जिनके बिना विश्लेषणात्मक  चिंतन असंभव है। बायें गोलार्ध की क्रिया में गड़बड़ी से वाग्दोष ( भाषणघात ) पैदा होते हैं, सामान्य संप्रेषण कठिन हो जाता है और यदि तंत्रिका ऊतक को व्यापक क्षति पहुंची है, तो सोचने की क्षमता में भारी कमी आ जाती है। दायां गोलार्ध बिंबात्मक सूचना से काम लेता है, दिगविन्यास तथा संगीत की रसानुभूति में मदद करता है और जानी तथा समझी जा रही वस्तुओं के प्रति मनुष्य के भावात्मक रवैये का निर्धारण करता है। दोनों गोलार्धों के बीच क्रियात्मक अंतर्संबंध होते हैं। किंतु क्रियात्मक असममिति केवल मनुष्य में पाई जाती है।

प्रमस्तिष्क बहुत सारे अंगों की एक जटिल प्रणाली है, जिनकी क्रिया उच्चतर प्राणियों और मनुष्यों के मन अथवा मानस का सारतत्व है। मन की अंतर्वस्तु बाह्य विश्व से निर्धारित होती है, जिससे जीवधारी अन्योन्यक्रिया करता है। मानव-मस्तिष्क के लिए बाह्य विश्व मात्र जैव परिवेश ही नहीं है ( जैसा कि यह पशुओं के मस्तिष्क के लिए भी है ), बल्कि अपने सामाजिक इतिहास के दौरान लोगों द्वारा बनायी गई वस्तुओं एवं परिघटनाओं का विश्व भी है। मनुष्य जब जीवन में पहले डग भरता है, तभी से उसके मानसिक विकास की जड़े मानव संस्कृति के इतिहास की गहराईयों में होती हैं

मनुष्य के मस्तिष्क में यथार्थ के प्रतिबिंब के तौर पर मन के कई स्तर होते हैं, जिन पर हम पूर्व में भी चर्चा कर चुके हैं। इसके लिए चेतना की संकल्पना नामक प्रविष्टि को देखा जा सकता है। आप मन, चिंतन और चेतना शीर्षक प्रविष्टि पर भी नज़र डाल सकते हैं।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मन का परावर्ती स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। पिछली बार यहां मन के संदर्भ में पैदा हुई धारणाओं के विकास का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण का दूसरा हिस्सा प्रस्तुत किया गया था। इस बार मन के परावर्ती स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मन का परावर्ती स्वरूप
सचेतन और अचेतन जीवन की सभी क्रियाएं अपने मूल की दृष्टि से प्रतिवर्त ( reflex ) हैं। इस प्रकार चेतना का कार्य ( मानसिक परिघटना ) अमूर्त आत्मा का गुण नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है जो अपनी उत्पत्ति के तरीके की दृष्टि से प्रतिवर्त के सदॄश है। मानसिक परिघटना सिर्फ़ वह नहीं है, जो मनुष्य अपने संवेदनों, विचारों और भावनाओं का प्रेक्षण करने पर पाता है। प्रतिवर्त की भांति उसमें भी बाह्य क्षोभक ( exciter ) का प्रभाव और इसके उत्तरस्वरूप हुई क्रिया शामिल रहते हैं। हमारी चेतना में विद्यमान बिंब, धारणाएं और विचार, उन अविभाज्य मानसिक प्रकियाओं के केवल कुछ पहलू ही हैं, जो परिवेश के साथ अवयवी की अन्योन्यक्रिया का एक विशेष रूप हैं। यह एक बड़ा भ्रम है कि मानसिक प्रक्रियाएं चेतना में आरंभ होती हैं और चेतना में ही ख़त्म भी हो जाती हैं।

प्रतिवर्त की मस्तिष्क से संबद्ध कड़ी को उसके नैसर्गिक मूल ( ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव ) और अंत ( अनुक्रियात्मक गति ) से अलग करना ठीक नहीं है। मानसिक परिघटना एक अविभाज्य परावर्ती क्रिया में उत्पन्न होती है, उसका उत्पाद बनती है, किंतु इसके साथ ही वह एक ऐसा कारक भी होती है, जिसका कोई कार्यमूलक परिणाम ( क्रिया, गति ) अवश्य निकलता है

मानसिक प्रक्रियाओं की भूमिका क्या है? वे संकेत ( indicator ) अथवा नियामक ( regulator ) का कार्य करती हैं। इसका मतलब उनकी भूमिका, क्रिया को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप बनाना और इस तरह उपयोगी एवं अनुकूली प्रभाव सु्निश्चित करना है। मानसिक क्रियाएं स्वयंमेव नहीं, अपितु बाह्य जगत से संबंधित सूचनाएं मस्तिष्क के जिन प्रभागों में पहुंचती हैं, सुरक्षित रहती हैं तथा संसाधित होती हैं, उन प्रभागों के गुण अथवा प्रकार्य के रूप में ही , जवाबी क्रिया की नियामक होती हैं। इस प्रकार प्रतिवर्त की क्रिया में मनु्ष्य का परिवेश विषयक ज्ञान तथा धारणाएं, अर्थात व्यक्ति का समस्त अनुभव भी सम्मिलित रहता है। मानसिक परिघटना बाह्य, अर्थात परिवेश के प्रभाव और आंतरिक, अर्थात एक शारीरिक तंत्र के रूप में अवयवी की अवस्थाओं के प्रभाव का, मस्तिष्क द्वारा प्रदत्त उत्तर ( मस्तिष्क की प्रतिक्रिया ) है।

मानसिक परिघटनाएं, मनुष्य के क्षोभों के उत्तर में पैदा होनेवाली क्रियाशीलता के वे स्थायी नियामक हैं, जो इस समय सक्रिय हैं ( संवेदन, प्रत्यक्ष ) अथवा पहले कभी, यानि विगत अनुभव में सक्रिय थे ( स्मृति ) , जो इन प्रभावों का सामान्यीकरण करते तथा वे जिन परिणामों पर पहुंचाएंगे, उनका पूर्वानुमान सुनिश्चित बनाते हैं ( चिंतन, कल्पना ), जो कुछ प्रभावों के अंतर्गत क्रियाशीलता को बढ़ाते हैं तथा कुछ के अंतर्गत उसे घटाते अथवा अवरुद्ध करते हैं ( भावनाएं, इच्छा ) और जो लोगों के व्यवहार में भिन्नता पैदा करते हैं ( स्वभाव, चरित्र, इत्यादि )

इस तरह मन के परावर्ती स्वरूप और मनुष्य के क्रियाकलाप के मन द्वारा नियमन का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। आगे चलकर इस महती सैद्धांतिक प्रस्थापना की प्रयोगों द्वारा पुष्टि हुई, और बाह्य परिवेश से जीवों की और मनुष्य की भी अन्योन्यक्रिया का मस्तिष्क द्वारा नियंत्रण किये जाने के नियमों का अविष्कार किया गया। इन नियमों की समष्टि को सामान्यतः दो संकेत पद्धतियों का सिद्धांत कहा जाता है।

वस्तु का बिंब ( दृश्य, श्रव्य, घ्राणजनित, इत्यादि ) जीव के लिये किसी क्षोभक के संकेत का कार्य करता है, जिससे उसके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है और यह अनुकूलित प्रतिवर्त कहलाता है।

जैसा कि ज्ञात है, अनुकूलित ( conditioned ) प्रतिवर्त इससे पैदा होता है कि किसी अनुकूलित क्षोभक ( उदाहरणार्थ जलती-बुझती बत्ती ) का किसी अननुकूलित ( unconditioned ) उत्तेजक की क्रिया ( उदाहरणार्थ, खाने की वस्तु देना ) से संयोजन किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क में दो केंद्रों ( दृष्टि और आहार से संबंधित केंद्रों ) के बीच अल्पकालिक तंत्रिका संपर्क उत्पन्न हो जाता है और जीव के दो क्रियाकलाप ( दृष्टि और आहार से संबंधित क्रियाकलाप ) आपस में जुड़ जाते हैं। बत्ती का जलना-बुझना जीव के लिए खाना दिये जाने का संकेत बन जाता है और उसके मुंह से लार टपकने लग जाती है।

जीव-जंतु अपने व्यवहार में संकेतों से निर्देशित होते हैं, जिन्हें पहली संकेत प्रणाली के संकेत ( “पहले संकेत” ) कहा गया। जीवों का सारा मानसिक क्रियाकलाप पहली संकेत प्रणाली के स्तर पर संपन्न होता है। मनुष्य के मामले में भी पहली संकेत प्रणाली के संकेत ( ठोस बिंब, धारणाएं ) काफ़ी बड़ी भूमिका निभाते हैं और उसके व्यवहार का नियमन व निर्देशन करते हैं। उदाहरण के लिए, चौराहे की लाल बत्ती, वाहन के चालक के लिए संकेतमूलक क्षोभ होती है तथा उससे कई सारी आंगिक क्रियाएं करवाती है, जिनके फलस्वरूप चालक ब्रेक लगाता है और वाहन को रोक देता है। उल्लेखनीय है कि संकेतमूलक क्षोभ स्वयं ही यांत्रिकतः मनुष्य के व्यवहार का नियमन नहीं करते, बल्कि यह कार्य मस्तिष्क में उनके बिंबरूप संकेतों द्वारा किया जाता है। ये पहले से अनुकूलित बिंबरूप संकेत वस्तुओं के बारे में सूचना देते हैं और इस तरह से मनुष्य के व्यवहार का नियमन करते हैं।

जीवों के विपरीत मनुष्य में पहली संकेत प्रणाली के अतिरिक्त दूसरी संकेत प्रणाली भी होती है, जो केवल उसी की खूबी है। इस प्रणाली के संकेत हैं शब्द ( “दूसरे संकेत” ), जिन्हें बोला, सुना या पढ़ा जाता है। शब्द की मदद से से पहली संकेत प्रणाली के संकेतों, बिंबरूप संकेतों को संप्रेषित अथवा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। शब्द उनकी जगह ले लेता है, उनका सामान्यीकरण करता है और वे ही क्रियाएं करवा सकता है, जो पहली संकेत प्रणाली के संकेतों द्वारा करवायी जाती है। इस तरह शब्द “संकेतों का संकेत” है। संकेतमूलक क्षोभों ( उच्चारित ध्वनि, लेख ) का इन शब्दमूलक क्षोभों के बिंब के नाते मस्तिष्क में शब्द के अर्थ के रूप में विद्यमान संकेतों से अंतर किया जाना चाहिए। मनुष्य द्वारा समझे जाने पर शब्द उसके व्यवहार का नियमन करता है तथा परिवेशी विश्व में उसे मार्ग दिखाता है। यदि शब्द को समझा नहीं जाता तथा वह बेमानी ही रहता है, तो वह मनुष्य को मात्र पहली संकेत प्रणाली के संकेत के तौर पर प्रभावित करेगा अथवा उदासीन ही छोड देगा। इसी से संबंधित करके कुछ पशुओं को ध्वनि-शब्दों के जरिए किसी विशेष व्यवहार को किये जाने के लिए दी जाने वाली प्रशिक्षण प्रक्रिया को समझा जा सकता है, पशुओं के लिए उच्चारित किये जाने वाले शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता, वे सिर्फ़ अनुकूलित प्रतिवर्त के लिए क्षोभकों का कार्य करते हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि परावर्तन का सिद्धांत ( पहले इस पर चर्चा की जा चुकी है ) ही वैज्ञानिक मनोविज्ञान का ज्ञानमीमांसीय आधार है। दार्शनिकतः परिभाषा दी जाए तो मन वस्तुगत विश्व का आत्मपरक बिंब है, मस्तिष्क में यथार्थ की प्रतिछाया है। मन परावर्तन की प्रक्रिया है और परावर्तन मस्तिष्क का गुण है। परावर्तन सिद्धांत मानसिक परिघटनाओं के बारे में प्रत्ययवादी और यंत्रवादी, दोनों तरह के दृष्टिकोणों का खंड़न करता है। प्रत्ययवाद मन को पदार्थ से अलग करके परिवेशी वास्तविकता से स्वतंत्र, बंद, अंतर्जगत बना ड़ालता है, वहीं यंत्रवाद पदार्थ से मन के गुणात्मक अंतर को नहीं देख पाता और उसे मात्र तंत्रिकीय प्रक्रियाओं तक सीमित कर देता है।

क्रियाशीलता मन की विशेषता है। अभिप्रेरण, सर्वोत्तम समाधान की सक्रिय खोज और संभावित व्यवहार के विभिन्न रूपांतरों में से किसी एक का चयन उसका एक अनिवार्य पहलू है। मानसिक परावर्तन दर्पणवत् या निष्क्रिय नहीं होता, अपितु उसके साथ तलाश, चयन, क्रिया के विभिन्न रूपांतरों का मूल्यांकन जुड़े होते हैं। वह व्यक्ति के क्रियाकलाप का एक अनिवार्य पक्ष है। व्यवहार के सक्रिय नियमन के लिए प्रतिपुष्टि ( feedback ) के तंत्र का काम करना आवश्यक है। मनोविज्ञान और शरीरक्रियाविज्ञान में इसका अर्थ यह है कि मस्तिष्क द्वारा हर प्रतिक्रिया को हल की जा रही समस्या के दृष्टिकोण से आंका जाता है। प्रतिपुष्टि-तंत्र की मदद से क्रिया के परिणाम की उस बिंब से तुलना की जा सकती है, जो इस परिणाम से पहले पैदा होता है और यथार्थ के एक विशिष्ट मॉडल के नाते उसका पूर्वाभास देता है।

मन मनुष्य को क्रमबद्ध क्रियाओं की योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन से पहले कई सारी मानसिक क्रियाएं ( जैसे कि सर्वोत्तम तरीके के चयन से संबंधित क्रियाएं ) पूरी करने में समर्थ बनाता है। जैव उद्‍विकास की प्रक्रिया में आचरण के एक नियंत्रण-तंत्र के रूप में विकसित हो्कर मनुष्य का मन, गुणात्मकतः बिल्कुल भिन्न बन जाता है। सामाजिक जीवन के नियमों के प्रभाव से लोग व्यक्ति बन जाते हैं और हर कोई अपने पर उन ठोस ऐतिहासिक परिस्थितियों की छाप लिये होता है, जिनमें उसका व्यक्तित्व ढ़ला था। परिणाम के तौर पर मनुष्य के व्यवहार में व्यक्तित्वमूलक विशेषताएं आ जाती हैं

अब हम मनोविज्ञान की विषय-वस्तु की पहले दी गयी परिभाषा को अधिक ठोस और सुस्पष्ट बना सकते हैं: मनोविज्ञान मन, जो कि मस्तिष्क में बनने वाला और मनुष्य को अपने व्यक्तित्वमूलक विशेषताओं से युक्त व्यवहार तथा क्रियाकलाप का नियंत्रण करने में समर्थ बनानेवाला यथार्थ का बिंब है, के तथ्यों , नियमों और क्रियातंत्रों का अध्ययन करता है
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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

मन, चिंतन और चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने यथार्थता के सक्रिय और निष्क्रिय परावर्तन में अंतर को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम परावर्तन के विकास की अब तक की चर्चा को भी संदर्भित करते हुए मानसिक और दैहिक, प्रत्ययिक और भौतिक संदर्भों में, ‘मन’ की संकल्पना को समझने की कोशिश करेंगे।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मानसिक और दैहिक, प्रत्ययिक और भौतिक

तंत्रिकातंत्र और मस्तिष्क भौतिक है। उनमें विभिन्न विविध भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रियाएं होती हैं, जैसे उपापचयन, जैव-विद्युत आवेगों का प्रस्फुटन और संचरण, आदि। मस्तिष्क और बाहरी भौतिक जगत की अंतर्क्रिया को ही हम सामान्यतयाः चित् या मन कहते हैं और इसके कार्य को मानसिक क्रिया कहते हैं।

अगर मन की वस्तुगत अवधारणा को थोड़ा समझना चाहे तो इसमें निम्नांकित बाते शामिल होती हैं : ( १ ) वस्तुओं तथा वस्तुगत जगत में विभिन्न प्रक्रियाओं के हमारी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त, यानि दृश्य, संवेदक, प्रकाशिक, श्रव्य, स्पर्शमूलक तथा गंधात्मक बिंब ; ( २ ) लक्ष्यों के चयन तथा उनकी उपलब्धि की क्षमता ( मनुष्य में संकल्प तथा ऐच्छिक व्यवहार इसी क्षमता से विकसित हुए हैं ) जो केवल सोद्देश्य व्यवहार करने वाले उच्चतर जानवरों में ही अंतर्निहित होती हैं ; ( ३ ) भावावेग, अनुभव, अनुभूतियां, जिनके द्वारा जानवर पर्यावरणों के प्रभावों के प्रति सीधे-सीधे अनुक्रिया करते हैं ( मसलन क्रोध, उल्लास, भय, लगाव, आदि ) ; ( ४ ) सूचना, और सर्वोपरी व्यवहार का नियंत्रण करने और पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होना संभव बनाने वाले कायदों, मानकों, मापदंड़ों को संचयित तथा उनका विश्लेषण करने की क्षमता ( मनुष्य में चेतना और चिंतन इसी क्षमता से उत्पन्न होते हैं ) ।

यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि मस्तिष्क के क्रियाकलाप का उत्पाद होने के कारण मन को बाहरी वास्तविकता के सरल निष्क्रिय परावर्तन में सीमित नहीं किया जा सकता है। मन बाहरी वास्तविकता की हूबहू, दर्पण-प्रतिबिंब जैसी छवि नहीं होता है। उसमें सूचना ग्रहण तथा उसे रूपातंरित करने की क्षमता और मानसिक बिंबों व क्रियाओं को, सक्रियता से मिलाने और तुलना करने तथा इसके आधार पर मानसिक बिंबों और क्रियाओं का पुनर्गठन करने की क्षमता होती है।

दीर्घ क्रमविकास के फलस्वरूप ये क्षमताएं, मनुष्य के उद्‍भव के साथ, रचनात्मक कार्य या क्रियाकलाप की विशिष्ट मानवीय क्षमता में तब्दील हो गयीं। परंतु इसके आदि रूपों को उच्चतर जानवरों के मानसिक क्रियाकलापों में देखा जा सकता है।

मानव चेतना की उत्पत्ति के बाद भी, मनुष्य में मानसिक क्रियाकलाप के ऐसे कई स्तर तथा रूप शेष हैं, जिनमें चेतना शामिल नहीं होती और जो सचेत नियंत्रण के अधीन नहीं होते तथा अचेतन मानसिक क्रियाकलाप का क्षेत्र बने रहते हैं। मन की उत्पत्ति तथा कार्यकारिता और मानसिक क्रियाकलाप में चेतन तथा अचेतन के संबंधों का विस्तार से अध्ययन मनोविज्ञान के विषयान्तर्गत किया जाता है।

संकल्पनाएं ‘चेतना’ ( consciousness ) तथा ‘चिंतन’ ( thinking ) अक्सर पर्यायों की भांति इस्तेमाल की जाती हैं। किंतु इनके बीच कुछ अंतर है। चिंतन का अर्थ, मुख्यतः, बाहरी वास्तविकता के बारे में ज्ञान की सिद्धी की प्रक्रिया, संकल्पनाओं, निर्णयों और निष्कर्षों की प्रक्रिया है, जिसकी प्रारंभिक अवस्था संवेदनों ( sensations ) तथा संवेद प्रत्यक्षों ( संवेदनों के जरिए हासिल सीधे अनुभवों ) की रचना है, जबकि चेतना का अर्थ है चिंतन की इस प्रक्रिया का परिणाम और पहले से ही रचित संकल्पनाओं, निर्णयों तथा निष्कर्षों को बाह्य जगत पर लागू करना, ताकि उसे समझा और परिवर्तित किया जा सके

इस तरह, चिंतन और चेतना मन के और मानसिक क्रियाकलाप के उच्चतम स्तर हैं। वे केवल मनुष्य में अंतर्निष्ठ ( inter-engrossed ) हैं। जानवरों में केवल उसके वे आद्य रूप, सरलतम तत्व या वे क्षमताएं होती हैं, जिनसे विकास की एक दीर्घावधि में मानव चिंतन और चेतना का जन्म हुआ।

चिंतन और चेतना सहित मन प्रत्ययिक ( idealistic ) है। यद्यपि वे भौतिक मस्तिष्क और भौतिक बाह्य जगत की अंतर्क्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न हुए, तथापि उनमें वे अनुगुण और विशेषताएं नहीं होती जो सारी भौतिक घटनाओं में अंतर्निहित होती हैं। भौतिक घटनाएं किसी प्राणी की मानसिकता या उसमें हुए परिवर्तनों से निरपेक्ष होती है और लगातार सतत रूप से गतिमान हैं। इसके विपरीत मन में होने वाला कोई भी परिवर्तन, भौतिक मस्तिष्क तथा बाहरी भौतिक वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों पर निर्भर होता है।

भूतद्रव्यीय भौतिक जगत के संदर्भ में मन द्वितीयक है, क्योंकि भौतिक जगत उस पर निर्भर नहीं है और प्राथमिक है। मन सारे भूतद्रव्य में अंतर्निहित परावर्तन के अनुगुण के विकास का परिणाम है, परंतु यह सारे भूतद्रव्य द्वारा विकसित नहीं हुआ, बल्कि केवल जैव-पदार्थ के सबसे जटिल रूप- मस्तिष्क के द्वारा हुआ। यह दर्शाता है कि मन अपने भौतिक पात्र के बिना, उसे विकसित करने वाले मस्तिष्क के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकता है।

आधुनिक विज्ञान के तथ्यों पर भरोसा करते हुए, की द्वंद्वात्मक भौतिकवादी धारा यह दावा करती है कि मन द्वितीयक होते हुए भी अपने ही नियमों के अनुसार विकसित होता तथा संक्रिया करता है और उसे यांत्रिक रूप से भौतिक, रासायनिक या जैविक घटनाओं और प्रक्रियाओं में परिणत नहीं किया जा सकता।
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परावर्तन के विकास का साररूपी विवेचन और अवलोकन करने के पश्चात हम इस स्थिति में हैं कि मानव चेतना की विशिष्ट प्रकृति पर चर्चा शुरू की जा सके। अगली बार हम यही करेंगे।
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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय