मनोविज्ञान-श्रृंखला समाप्ति और डाउनलोडेबल पीडीएफ़ सामग्री

हे मानवश्रेष्ठों,

मनोविज्ञान पर यहां चल रही श्रृंखला अब समाप्त की जा रही हैं। व्यक्ति और व्यक्तित्व पर कुछ सामग्री और दी जानी थी, परंतु उसे यहां बाद में एक नई श्रृंखला के रूप में अधिक विस्तार से प्रस्तुत करने की योजना है।

यहां पेश की जा रही सामग्री के बारे में कुछ मानवश्रेष्ठों द्वारा यह आकांक्षा व्यक्त की गई है कि मनोविज्ञान पर प्रस्तुत हो चुकी सामग्री को पीडीएफ़ फ़ाइल-रूप में डाउनलोड किये जाने की व्यवस्था कर दी जाए।

पूर्व में इसी हेतु यहां की तब तक की सामग्री को पांच भागों में समेकित कर उनके डाउनलोड करने के लिंक प्रस्तुत किए जा चुके हैं, इस बार बाकी सामग्री को तीन और भागों में समेकित कर, उनके पीडीएफ़ डाउनलोड करने के लिए लिंक इस बार यहां दिये जा रहे हैं।

इन्हें साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेंगे।


मनोविज्ञान – भाग ६ – संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं
संवेदन, स्मृति, चिंतन और कल्पना
इस भाग में हम देखेंगे कि संवेदन क्या है और मनुष्य की सक्रियता में इनकी भूमिका क्या है? एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष क्या है? प्रत्यक्ष की स्थिरता, सार्थकता और निर्भरता क्या है? स्मृति क्या है? उसके भेद क्या हैं? स्मृति की प्रक्रियाएं क्या हैं? स्मरण क्या है? अनैच्छिक और ऐच्छिक स्मरण क्या है? चिंतन और इसकी विशेषताएं क्या हैं? चिंतन की अभिप्रेरणा कहां से आती है? चितन के भेद क्या हैं? कल्पना क्या है? कल्पना के भेद और उसकी प्रक्रियाएं क्या हैं? सक्रियता में कल्पना की क्या भूमिका हैं?

मनोविज्ञान – भाग ७ – व्यक्तित्व का संवेगात्मक-संकल्पनात्मक क्षेत्र
भावनाएं और इच्छाशक्ति
इस भाग में हम देखेंगे कि भावनाएं क्या हैं? भावनाओं और आवश्यकताओं में क्या संबंध हैं? भावनाओं के रूप क्या-क्या हैं? व्यक्तित्व में भावनाओं की क्या भूमिका है? आवेश और प्रेम क्या हैं? ऐच्छिक और संकल्पात्मक क्रियाएं क्या हैं? इच्छाशक्ति क्या है? इच्छाशक्ति और जोखिम में क्या संबंध हैं? संकल्पात्मक क्रियाओं की संरचना क्या है? इच्छाशक्ति की व्यक्तिपरक विशिष्टताएं क्या हैं?

मनोविज्ञान – भाग ८ – व्यक्तित्व के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षण
स्वभाव, चरित्र और योग्यताएं
इस भाग में हम देखेंगे कि स्वभाव क्या हैं? स्वभावों के भेद क्या हैं? तंत्रिका तंत्र के भेद और स्वभाव में क्या संबंध हैं? पढ़ाई तथा श्रम-सक्रियता में स्वभाव की भूमिका क्या है? स्वभाव और शिक्षा में क्या संबंध हैं? मनुष्य का चरित्र क्या हैं? चरित्र की संरचना क्या है? चरित्र का स्वरूप तथा अभिव्यंजनाएं क्या हैं? योग्यता और उसकी संरचना क्या है? प्रतिभा, उसका मूल तथा संरचना क्या है? योग्यताओं तथा प्रतिभा के नैसर्गिक पूर्वाधार क्या हैं? योग्यताओं का गठन किस तरह होता हैं?


यदि सभी भाग एक साथ, यानि संपूर्ण आठ भागों की सामग्री एक साथ समग्र रूप से चाहें तो इस लिंक से डाउनलोड की जा सकती है:

मनोविज्ञान – समग्र ( सभी भाग एक साथ )

पूर्व में प्रस्तुत किए गए लिंक भी यहां पुनः नीचे दिए जा रहे हैं। रुचि की सामग्री के लिए अलग-अलग भाग भी डाउनलोड किए जा सकते हैं।


मनोविज्ञान – भाग १ – मनोविज्ञान की विषयवस्तु
इस भाग में हम जानेंगे कि मनोविज्ञान क्या है? इसकी विषयवस्तु क्या है? हम देखेंगे कि मनोविज्ञान संबंधी धारणाओं का इतिहास क्या है? मन, मस्तिष्क और चेतना क्या है?

मनोविज्ञान – भाग २ – समकालीन मनोविज्ञान और शोध प्रणालियां
इस भाग में हम जानेंगे कि समकालीन मनोविज्ञान की प्रवृत्तियां कौनसी हैं? व्यवहारवाद और मनोविश्लेषण क्या है? सामान्य मनोविज्ञान की संकल्पना क्या है? इसकी शोध प्रणालियां क्या है?

मनोविज्ञान – भाग ३ – मन और चेतना का विकास

इस भाग में हम जानेंगे कि मन, चिंतन र चेतना क्या हैं? मन और चेतना का विकास कैसे हुआ? सहजवृत्तियां और अनुकूलित संबंध क्या है? पशुओं के बौद्धिक व्यवहार के मूल में क्या है? मानस की परिवेश पर निर्भरता क्या है? पशुओं और मनुष्य के मानस में क्या भेद हैं? चेतना के विकास में श्रम और भाषा की क्या भूमिका है?

मनोविज्ञान – भाग ४ – मनुष्य की सक्रियता
इस भाग में हम देखेंगे कि सक्रियता के स्रोत के रूप में आवश्यकताएं क्या हैं? आवश्यकताओं की क़िस्में क्या हैं? उनका विकास कैसे हुआ? सक्रियता और उसके लक्ष्य क्या हैं? सक्रियता की संरचना क्या है? आदतें और उनकी संरचना क्या है? अभ्यास क्या है? कौशल क्या है? मनुष्य की सक्रियता के प्रमुख रूप क्या हैं और उनका विकास कैसे हुआ? खेल और उनकी सक्रियता में भूमिका क्या है? अधिगम और अध्ययन क्या है? श्रम क्या है?

मनोविज्ञान – भाग ५ – संप्रेषण और मनुष्य
इस भाग में हम देखेंगे कि संप्रेषण की अवधारणा क्या है? संप्रेषण और सक्रियता के संबंध क्या हैं? संप्रेषण के साधन के रूप में भाषा क्या है? शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण क्या है? वाक् का विकास किस तरह होता है? सक्रियता और संप्रेषण में सामाजिक प्रतिमानों की क्या भूमिका है? संप्रेषण में भूमिका अपेक्षाएं क्या हैं? मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव क्या हैं? मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण क्या है? एक दूसरे को जनने के क्रियातंत्र क्या होते हैं? संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रशिक्षण क्या है?


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

अगली बार से फिर कुछ गंभीर और नवीन लेकर हाजिर हुआ जाएगा।
शुक्रिया।

समय

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योग्यताएं तथा रुचियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यता के गठन में शिक्षण प्रणालियों पर निर्भरता को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम योग्यताएं तथा रुचियों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताएं तथा रुचियां
( abilities and interests )

स्थिरताप्राप्त विशेष रुचियां ( stable special interests ) मनुष्य की योग्यताओं के विकास का महत्त्वपूर्ण कारक होती हैं। विशेष रुचियां, मानव कार्यकलाप के निश्चित क्षेत्र को अपना केंद्र बनानेवाली रुचियां हैं, जो इस प्रकार के कार्यकलाप में व्यावसायिक ढंग ( professional manner ) से जुटने का रुझान ( trend ) पैदा करती हैं। यहां संज्ञानात्मक रुचि ( cognitive interests ) मनुष्य को संबद्ध क्षेत्र की विधियों तथा तकनीकों में सक्रिय रूप से पारंगत करने के लिए प्रेरित करती है।

यह लक्षित किया जा चुका है कि अध्ययन अथवा किसी प्रकार के श्रम में रुचि का जन्म तदनुरूपी योग्यताओं का आधार-बिंदु होता है। बच्चे की स्थिरताप्राप्त रुचि उसकी आरंभिक योग्यताओं का सूचक, ऐसा संकेत होता है, जिसे उसके आस-पास के लोगों को बच्चे में अंतर्निहित संभावनाओं की ओर सूक्ष्मतापूर्वक ध्यान देने के लिए बाध्य करना चाहिए।

किशोरों में ऐसी रुचियां अल्पकालिक शौक़ों ( short-term passion ) का स्वरूप धारण करती हैं, हालांकि वे सशक्त आवेगमय ( impulsive ) होती हैं। किशोरों की विभिन्न और बहुधा अल्पकालीन रुचियां व्यक्तित्व की गठित होती जाती योग्यताओं के सुदृढ़ीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। शिक्षाशास्त्र के लिए इस बात का बहुत महत्त्व है कि किशोरों की रुचियों के क्षेत्र के प्रति शिक्षा-दीक्षा देनेवालों का दृष्टिकोण ऐसा हो, जो उनकी संज्ञानात्मक आवश्यकताओं को गहन बनाए तथा प्रसारित करे। परंतु अध्यापक तथा अभिभावकों को किशोरों के शौक़ों के अल्पकालीन स्वरूप के प्रति अपना असंतोष व्यक्त न करने की सावधानी बरतनी चाहिए।

निस्संदेह, यदि स्कूली बच्चा समुचित परिवेशी परिस्थितियों में है, तो वह बहुत कम उम्र में ही स्थिरताप्राप्त विशेष रुचि ( बड़ो की सहायता से ) प्रदर्शित करने लगता है, अपनी तदनुरूपी योग्यताओं को विकसित करता है, जो उसके लिए अपना जीवन-पथ बिना किसी ग़लती के निर्धारित करना संभव बनाती है। परंतु खेद है कि ऐसा सबके साथ नहीं हो पाता। फिर भी कोई किशोर किसी व्यवसाय में स्थिर रुचि के बिना ( परंतु ज्ञान के आवश्यक भंडार तथा श्रम के लिए मानसिक रूप से तत्परता के साथ ) स्कूल से बाहर निकलता है, तो उसके लिए अपनी तरह के उस दूसरे छात्र की तुलना में जीवन में सफलता की बेहतर संभावनाएं उपलब्ध होती हैं, जो बाहरी चमक-दमक से युक्त व्यवसायों के मोह में आकर ग़लत और जल्दबाज़ी में अपना रास्ता चुनता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

योग्यता का गठन और शिक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताएं तथा आनुवंशिकता पर चर्चा की थी, इस बार हम योग्यता के गठन में शिक्षण प्रणालियों पर निर्भरता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यता का गठन और शिक्षण प्रणालियां

प्रवृत्तियों ( tendencies ) तथा योग्यताओं ( abilities ) के पारस्परिक संबंधों का विवेचन यह दर्शाता है कि यद्यपि योग्यताओं का विकास नैसर्गिक पूर्वाधारों पर निर्भर होता है, जो लोगों में एकसमान नहीं होते, फिर भी वे ( योग्यताएं ) इतनी प्रकृति की देन नहीं है, जितनी कि मानव इतिहास की उपज हैं। पशुओं के विपरीत, जिनमें एक पीढ़ी की उपलब्धियां दूसरी पीढ़ी के पास शरीर में आनुवंशिक आकृतिक परिवर्तनों के रूप में स्थानान्तरित होती है, मनुष्य में यह सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से, यानि श्रम के औजारों, भाषा, कलाकृतियों, आदि की सहायता से होता है।

प्रत्येक मनुष्य को अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से उपलब्धियों की मशाल प्राप्त होती है : उसके लिए श्रम के औजारों में पारंगत बनना, भाषा का उपयोग करना, कलाकृतियों से आनंद प्राप्त करना आवश्यक है, आदि। ऐतिहासिक उपलब्धियों के विश्व का ज्ञान प्राप्त करते हुए लोग अपनी योग्यताएं गठित करते हैं। मनुष्य किस हद तक अपनी योग्यताएं प्रदर्शित कर सकता है, यह सीधे उन प्रणालियों ( systems ) पर निर्भर करता है, जो उसे पूर्वजों द्वारा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए विगत इतिहास के दौरान विकसित ज्ञान तथा कौशल को आत्मसात करने में सहायता देने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं

यदि इस प्रश्न को मानवजाति के इतिहास की दृष्टि से देखा जाए, तो उपरोक्त प्रस्थापना की सत्यता को देखना सुगम है। उदाहरण के लिए, आज इस कथन पर कोई संदेह नहीं करता कि पांच से लेकर सात वर्ष की आयु का प्रत्येक सामान्य बच्चा लिखना-पढ़ना सीख सकता है। परंतु दो सौ वर्ष पहले आम तौर पर यह विचार काफ़ी प्रचलित था कि केवल असाधारण विशेषताओं से संपन्न बच्चे ही ऐसा कर सकते हैं। शेष बच्चों ( लगभग दो तिहाई ) को शुरू से ही साक्षरता के रहस्यों के संसार में प्रवेश करने में असमर्थों की कोटि में रख दिया जाता था। यह दृष्टिकोण अध्यापन की वास्तविक कठिनाइयां प्रतिबिंबित करता था, क्योंकि उस समय विद्यमान विधियां ( methods ) आदतों के गठन में रुकावट डालती थीं। कालांतर में शिक्षा की प्रणालियों के परिष्करण ( refinement ) ने “आनुवंशिक व्याकरणीय योग्यताओं” की समस्या हल करना संभव बनाया। व्यवहार ने दर्शाया कि सभी बच्चे लिखना-पढ़ना सीख सकते हैं

इस कथन के संबंध में क्या निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं? यह मानने का आधार है कि संबद्ध सक्रियता के लिए योग्यताओं का गठन पूरी तरह शिक्षण की प्रणालियों पर निर्भर करता है। नियमतः, हर बार, जब शिक्षण की प्रणाली अपर्याप्त सिद्ध होती है, और शिक्षकों को अपनी विफलता स्वीकार करनी पड़ती है, तो योग्यताओं के जन्मजात स्वरूप की चर्चा की जाने लगती है। स्वभावतः प्रणालियां परिष्कृत होती जाएंगी तथा ‘जन्मजात’ योग्यताओं का दायरा अधिकाधिक संकुचित होता जाएगा। और यह माना जा सकता है कि काव्यात्मक, सांगीतिक, कलात्मक, अध्यापकीय, संगठनात्मक, आदि योग्यताएं अंततः ‘व्याकरणीय’ अथवा ‘गणितीय’ योग्यताओं के समकक्ष हो जाएंगी। इस संबंध में बहुत-से मनोविज्ञानी प्रयोग कर रहे हैं।

इस बात की मिसालें मौज़ूद हैं, जो बताती है कि संगीत की मानो ज़रा भी पकड़ न रखनेवाले छात्रों में, याने संगीत की प्रवृत्तियों से सर्वथा वंचित छात्रों में मनोविज्ञानी, संगीत की समझ पैदा करने में सफल रहे। व्यक्तिगत अभ्यासों ( संगीत के सुरों के श्रवण तथा उसके एक साथ अनुकरण ) की सहायता से ऐसी योग्यता के, जिसे जन्मजात गुणों का क्लासिकीय उदाहरण माना जाता रहा, विकास में सफलता प्राप्त हुई है।

इसी तरह की सफलता मास्को के एक स्कूल में प्राप्त हुई, जहां मनोविज्ञानियों तथा शिक्षकों का एक समूह छात्रों में कई वर्षों में गणितीय योग्यताओं गठित करने के काम में जुटा रहा ; उनके निदेशन में पहली कक्षा में ही बच्चे अमूर्त अवधारणाओं में पारंगत बनने में सफल रहे, हालांकि बीजगणित के मूल सिद्धांतों के बारे में आम तौर पर यह माना जाता था कि उन्हें केवल पांचवीं और छठी कक्षाओं के छात्र ही समझ सकते हैं।

योग्यताओं तथा प्रतिभाओं का गठन समग्र रूप से समाज तथा राज्य का महत्त्वपूर्ण कार्य है। तमाम बच्चों में योग्यताओं के चहुंमुखी विकास के कार्यभार का, विशेष रूप से गुणी बच्चों में विशेष प्रतिभाओं के विकास से कोई अंतर्विरोध ( contradiction ) नहीं है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

योग्यताएं तथा आनुवंशिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम योग्यताएं तथा आनुवंशिकता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताएं तथा आनुवंशिकता
( abilities and heredity )

यह तथ्य कि योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों – प्रवृत्तियों – का तंत्रिका-तंत्र की संरचना तथा प्रकार्य से सह-संबंध होता है, इस मान्यता में विश्वास करने का आधार प्रस्तुत करता है कि वे भी समस्त अन्य प्राकृतिक तथा शरीरक्रियात्मक गुणों की भांति आनुवंशिकता के सामान्य नियमों के अधीन होते हैं। परंतु प्रवृत्तियों के आनुवंशिक स्वरूप की प्राक्कल्पना ( hypothesis ) को, योग्यताओं के आनुवंशिक स्वरूप के सदृश ( similar ) नहीं माना जाना चाहिए

लक्षित समस्या का बहुत लंबा इतिहास है। १८७५ में अंग्रेज मनोविज्ञानी फ्रांसिस गाल्टन ने `आनुवंशिक प्रतिभा’ शीर्षक एक पुस्तक लिखी थी। सैकड़ो लोगों की रिश्तेदारी विषयक संबंधों का अध्ययन करनेवाले लेखक ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रतिभाएं विरासत के रूप में या तो पिता से अथवा मां से मिलती हैं। परंतु गाल्टन के निष्कर्ष का कोई वैज्ञानिक मूल्य नहीं था। वह न्यायिक, राजनीतिक और सैन्य प्रतिभाओं के आनुवंशिक होने के पक्ष में कोई विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके। गाल्टन की सामग्री के आधार पर निकाला जा सकनेवाला एकमात्र निष्कर्ष यह है कि दौलतमंद, कुलीन तथा सुशिक्षित लोगों के परिवारों में बौद्धिक कार्यों में जुटने के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध होती हैं। कोई भी ईमानदार अनुसंधानकर्ता गाल्टन की तथ्य-सामग्री के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि इस या उस व्यवसाय के प्रति मनुष्य में पहले से ही कोई आनुवंशिक झुकाव होता है।

तथ्यात्मक-सामग्री से कुछ सामान्य निष्कर्ष निकालना संभव हो जाता है। अधिकांश मामलों में सचमुच मेधावी लोगों की वंश-वृक्षावली के अनुसंधान से जैविक आनुवंशिकता ( biological heredity ) की नहीं, अपितु जीवन की अवस्थाओं की, यानि उन सामाजिक अवस्थाओं की आनुवंशिकता प्रमाणित होती है, जो योग्यताओं के विकास के लिए अनुकूल रहती हैं। जाहिर है, यदि परिवार की रुचियां संगीत पर केन्द्रित हों, यदि जीवन के सारे पहलू बच्चे के मन पर यह छाप छोड़ें कि संगीत का अध्ययन करना आवश्यक है, यदि हरेक संगीत के प्रति निष्ठा को सर्वोत्तम योग्यता मानता हो, तो इसमे अचरज की कोई बात नहीं कि इस परिवार में संगीत की प्रतिभा ( talent ) जन्म लेगी। कुछ परिवारों के उदाहरण यह मानने का भी आधार प्रदान करते है कि सांगीतिक प्रवृत्तियां ( tendencies ) कुछ हद तक निस्संदेह वंशानुगत होती हैं। यह संभव है कि इस परिवार में श्रवणेंद्रिय ( auditory-sense ) की संरचना तथा प्रकार्य में कुछ विशेषताओं ( यानि आंशिक प्ररूपात्मक विशेषताओं ) को एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती चली गई हो।

जीवन ऐसे परिवारों के नाना उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिनके सदस्यों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी में मात्र एक ही व्यवसाय के प्रति निष्ठा रही है और वे उसके लिए आवश्यक योग्यताएं विकसित करते रहे हैं। रंगमंच और सर्कस के कलाकारों, अनुसंधानकर्मियों, जहाज़ियों, इस्पातकर्मियों, लकड़ी पर नक़्क़ाशी करनेवालों और दूसरे बहुत-से अत्यंत उल्लेखनीय कारीगरों के वंश सुविदित हैं। स्वभावतः, ऐसे परिवारों में बेटा पिता तथा दादा का व्यवसाय अपनाता है और परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाता है। परंतु इसके साथ ही ऐसे मेधावी लोगों की संख्या अनगिनत है, जिनके बच्चे और नाती-पोते अपने पूर्वजों की विशेष योग्यताएं प्राप्त नहीं करते और उनके जीवन का पथ नहीं चुनते।

यह सिद्ध करने के लिए गंभीर तथ्य उपलब्ध नहीं हैं कि योग्यताएं तथा प्रतिभाएं उत्तराधिकार में प्राप्त की जा सकती है। योग्यताओं के आनुवंशिक स्वरूप का विचार, विज्ञानसम्मत सिद्धांत के भी विरुद्ध है। विज्ञान ने अकाट्य रूप से सिद्ध किया है कि आधुनिक प्रकार के मनुष्य का, यानि पिछले एक लाख वर्षों से विद्यमान क्रोमेगनान मनुष्य का विकास, उसके आविर्भाव के समय से लेकर आज तक नैसर्गिक वरण तथा अपने नैसर्गिक संगठन में परिवर्तनों की आनुवंशिकता के ज़रिए नहीं हुआ – मनुष्य तथा उसकी योग्यताओं का विकास सामाजिक-ऐतिहासिक नियमों से शासित होता आया है


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता पर चर्चा की थी, इस बार हम योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताओं के नैसर्गिक पूर्वाधारों के रूप में प्रवृत्तियां

योग्यताओं ( abilities ) के जन्मजात स्वरूप का खंडन निरपेक्ष नहीं है। जन्मजात योग्यताओं को अस्वीकार करते हुए भी मनोविज्ञान मस्तिष्क की संरचना में अंतर्निहित कतिपय ( certain ) विशेषताओं के आनुवंशिक स्वरूप को स्वीकार करता है, जो सक्रियता की कुछ क़िस्मों में ( आम तौर पर कुछ व्यवसायों, धंधों, श्रम-सक्रियता, आदि में ) मनुष्य की सफलता के के पूर्वाधार का काम दे सकती हैं। मस्तिष्क की संरचना की इन प्रकार्यात्मक ( functional ) विशेषताओं को, ज्ञानेन्द्रियों तथा प्रेरक क्षेत्रों को, जो योग्यताओं के विकास के नैसर्गिक पूर्वाधार होते हैं, प्रवृत्तियां ( tendencies ) कहा जाता है

योग्यताओं तथा प्रवृत्तियों के बीच संबंधों पर घ्राणबोध ( olfactory sense ), यानि सूंघने की सूक्ष्म अनुभूति के उदाहरण से प्रकाश डाला जा सकता है। सूंघने की असामान्य रूप से तीक्ष्ण अनुभूति, यानि घ्राणविश्लेषक की अत्यधिक उच्च संवेदनशीलता, जन्मजात प्रवृत्तियों में से एक है। क्या यह योग्यता है? यक़ीनन नहीं, क्योंकि हर योग्यता किसी निश्चित विषय से, ठोस मानव सक्रियता से अथवा नाना कार्यकलापों से संबंधित होती है। यदि ऐसा न होता, तो ‘योग्यता’ शब्द ही अर्थहीन हो जाता। इसलिए मनुष्य के तंत्रिकीय-मानसिक गठन की ऐसी विशेषता, एक सामान्य प्रवृत्ति है। वस्तुतः, मस्तिष्क की संरचना उसकी पूर्वकल्पना नहीं कर सकती कि यह विशेषता, जो मनुष्य की तीक्ष्ण संवेदनशीलता का कारण है, मानव-समाज में इतिहास के प्रवाह के दौरान बने व्यवसायों तथा धंधों से किसी भी प्रकार जुड़ी हुई नहीं है, जो घ्राण की अतीव संवेदनशीलता की अपेक्षा करते हों।

मस्तिष्क की संरचना इस बात की पूर्वकल्पना नहीं कर सकती कि मनुष्य अपने लिए कार्यकलाप का कौन-सा क्षेत्र चुनेगा और वह क्या लक्षित प्रवृत्तियों के विकास की संभावना प्राप्त कर पाएगा। परंतु समाज यदि ऐसे व्यवसायों को, जिनमें विशेष रूप से तीक्ष्ण घ्राण-शक्ति की आवश्यकता पडती है, विकसित करता है और यदि संबद्ध मनुष्य विशेष में तदनुरूपी नैसर्गिक प्रवृत्तियां विद्यमान हैं, तो वह अपने अंदर तदनुरूपी योग्यताओं का विकास करना दूसरों की अपेक्षा अधिक सुगम पाएगा। उदाहरण के लिए, इत्रफ़रोशों का, जो एक बहुत ही विरल तथा अत्यंत मूल्यवान व्यवसाय में काम करते हैं, काम भिन्न-भिन्न प्रकार की महकों को मिलाकर मौलिक सुगंध तैयार करना है, ताकि नये प्रकार के इत्रों का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सके। स्वभावतः, इन लोगों की व्यवसायगत योग्यताएं उन प्रवृत्तियों के विकास का परिणाम हैं, जिनमें उनकी ध्राणेंद्रिय की रचना तथा उसके प्रकार्य शामिल हैं। मस्तिष्क उनका जीवन-पथ, व्यवसाय, तदनुरूपी योग्यताओं का विकास पूर्वनिर्धारित नहीं करता।

प्रवृत्तियां बहुआयामी ( multidimensional ) होती हैं। एक ही प्रवृत्ति नाना योग्यताओं में विकसित हो सकती है। यह कार्यकलाप की अपेक्षाओं के स्वरूप पर निर्भर करता है। साथ ही जन्मजात तथा कम उम्र में ग्रहण की जानेवाली नाना गंभीर मस्तिष्कीय अनियमितताओं ( ओलिगोफ़्रेनिया ) के फलस्वरूप प्रवृत्तियां प्रायः असाध्य रूप से दोषपूर्ण हो सकती हैं और योग्यताओं के विकास की लगभग कोई संभावना नहीं रह जाती।

आज योग्यताओं के विकास के पूर्वाधारों के नैसर्गिक विकास के सार से संबंधित प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की न्यूनाधिक फलप्रदता की बात करना संभव है। अनुसंधानों ने इस प्राक्कल्पना की पुष्टि नहीं की है कि मस्तिष्क की शरीररचनात्मक विशेषताएं निश्चित योग्यताओं से संबंधित होती हैं। यद्यपि यह विचार कि बौद्धिक विशेषताएं, प्रतिभा तथा योग्यताएं मस्तिष्क गोलार्धों तक में स्थित होती हैं, विज्ञान द्वारा बहुत पहले ही खंडित किया जा चुका है और उसमें केवल इतिहासकारों की ही दिलचस्पी रह गई है, परंतु आम मनुष्य के मन में यह विश्वास अभी तक मजबूती से जमा हुआ है कि मनुष्य की बुद्धि उसके मस्तिष्क के आकार पर निर्भर करती है।

निस्संदेह, अंतर्वैयक्तिक संबंधों में बड़े माथेवाले मनुष्य के बारे में आम तौर पर यह माना जाता है कि उसमें बुद्धि का स्तर बहुत ऊंचा है और उससे बुद्धिमतापूर्ण ढंग से बातें करने तथा अच्छी सलाह देने की अपेक्षा की जाती है – और जब उससे की जानेवाली अपेक्षाएं निराधार सिद्ध होती हैं, तो धोर निराशा होती है। इसके विपरीत, कम चौड़े माथेवाला मनुष्य अपनी मानसिक योग्यताओं के विषय में दूसरे लोगों में विश्वास पैदा नहीं करता, हालांकि उनका संशय आम-तौर पर आधारहीन सिद्ध होता है।

यह विचार कि योग्यता जैसी संजटिल मानसिक विशेषता मस्तिष्क के निश्चित भागों में अवस्थित हो सकती है, शरीरक्रियाविज्ञान तथा मनोविज्ञान के बारे में ज्ञान की आरंभिक मंज़िल को प्रतिबिंबित करता था और आगे चलकर उसे पूर्णतः ठुकरा दिया गया। जीवन ने मस्तिष्क के आकार, उसकी संहति पर प्रवृत्तियों की आश्रितता की प्राक्कल्पना को भी ग़लत सिद्ध कर दिया है। वयस्क मनुष्य के मस्तिष्क का औसत वज़न १४०० ग्राम होता है, परंतु कई महापुरुषों के मस्तिष्कों को तौले जाने पर परिणाम निकला कि मेधा, योग्यता का वज़न से कोई रिश्ता नहीं है। कईयों के मस्तिष्क के वज़न औसत से अधिक निकले तो ऐसी महान हस्तियों की भी कोई कमी नहीं थी जिनके मस्तिष्क के वज़न औसत से काफ़ी कम थे। जल्द ही यह भी पता चला कि कि सबसे बड़ा तथा सबसे भारी मस्तिष्क ऐसे मनुष्य का था, जिसमें केवल बौद्धिक योग्यताओं का ही अभाव नहीं था, अपितु जो मानसिक दृष्टि से अपूर्ण भी था।

वर्तमान काल में वे प्राक्कल्पनाएं सर्वाधिक फलप्रद सिद्ध हुई हैं, जो प्रवृत्तियों को मस्तिष्क की सूक्ष्म-संरचना तथा ज्ञानेन्द्रियों से जोड़ती हैं। प्रवृत्तियों को तंत्रिकीय प्रक्रियाओं ( उनकी शक्ति, संतुलन तथा गतिशीलता ) के कतिपय चरों ( variables ) से जोड़नेवाली प्राक्कल्पनाएं और उच्च तंत्रिका-तंत्र की क़िस्में भी अत्यधिक दिलचस्पी का विषय बन गई है। कई मनोविज्ञानियों ने यह स्पष्ट करने का प्रयत्न किया कि उच्च तंत्रिका-सक्रियता का रूप योग्यताओं की संरचना के गुणात्मक पहलू पर कैसे प्रभाव डालता है। यह भी प्रदर्शित किया गया कि तंत्रिकीय प्रक्रियाओं की निर्बलता तंत्रिका-तंत्र की नकारात्मक विशेषता मात्र नहीं है, अपितु वह तो सकारात्मक विशेषता भी है, क्योंकि तंत्रिका-प्रक्रियाओं की दुर्बलता उसकी उच्च अनुक्रियात्मकता ( high responsiveness ) का परिणाम है।

कतिपय परिस्थितियों में तंत्रिका-तंत्र की उच्च संवेदनशीलता ( याने उसकी दुर्बलता ) ऐसी प्रवृत्ति के रूप में प्रकट हो सकती है, जिसके आधार पर श्रम-सक्रियता की ऐसी क़िस्मों से जुड़ी योग्यता का विकास होता है जो उच्च अनुक्रियात्मकता, संवेदनशीलता, सह्रदयता की अपेक्षा करती हैं।

यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें मनुष्य के व्यक्तित्व की विशिष्टता बहुत स्पष्ट रूप में निखरती है। पशु के विपरीत, जिसको अपने तंत्रिका-तंत्र के निर्बल होने की सूरत में अस्तित्व के लिए घोर संघर्ष करना पड़ता है, मनुष्य को ऐसी ही अभिलाक्षणिकताओं ( characteristics ) की दशा में “अपंग” नहीं बनना पड़ता, क्योंकि उसका सामाजिक-ऐतिहासिक परिवेश पशु से सर्वथा भिन्न होता है। इसके अलावा, इस शरीरक्रियात्मक आधार पर विकसित होने वाली योग्यताएं उसके जीवन तथा विकास के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर सकती हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत प्रतिभा तथा शिल्पकारिता पर चर्चा की थी, इस बार हम योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


योग्यताओं तथा प्रतिभा के नैसर्गिक पूर्वाधार
योग्यताओं की नियतिनिर्दिष्ट अवधारणा की आधारहीनता

मनुष्य की योग्यताओं के स्वरूप को ठीक तरह से समझने के लिए सबसे पहले मस्तिष्क – समस्त मानसिक प्रक्रियाओं, अवस्थाओं, गुणों तथा विशेषताओं के अधःस्तर – के साथ उनके संबंध की स्थापना करना आवश्यक है। व्यक्ति के समस्त निजी मानसिक गुणों की भांति योग्यताएं भी मनुष्य द्वारा तैयारशुदा अवस्था में, किसी ऐसी वस्तु के रूप में प्राप्त नहीं की जातीं, जो जन्मजात ( inborn ) हो, प्रकृति की देन हो। वे तो सक्रियता के दौरान निर्मित होती हैं। मनुष्य मानसिक गुणों के बिना जन्म लेता है, उनके ग्रहण किए जाने की केवल सामान्य संभावना होती है। केवल सक्रियता में ही, परिवेश के साथ अन्योन्यक्रिया में ही मानव मस्तिष्क बाह्य विषयों को परावर्तित करना आरंभ करता है, योग्यताओं समेत अपने निजी मानसिक गुण तथा विशेषताएं प्रकट करता है। अतः इस अर्थ में वैज्ञानिक मनोविज्ञान द्वारा स्वीकृत यह प्रस्थापना सही है कि योग्यताएं जन्मजात नहीं होती

योग्यताओं के जन्मजात होने के प्रत्ययवादी ( भाववादी, idealistic ) सिद्धांत का खंडन सामान्य रूप से मनुष्य के अस्तित्व तथा विशेष रूप से उसकी योग्यताओं की समस्या के प्रति विज्ञानसम्मत दृष्टिकोण अपनाने के लिए नितांत आवश्यक है। मानव-योग्यताओं के जन्मजात स्वरूप के विचार ने प्लेटो  के समय में ही जन्म ले लिया था, जिन्होंने दावा किया था कि योग्यताएं जन्मजात होती हैं और वह समस्त ज्ञान, जिसका वह उपयोग करता है, “निरपेक्ष ज्ञान” के आदर्श जगत में अपने वास के बारे में उसकी स्मृतियों के अलावा और कुछ नहीं है। लगभग ऐसा ही अन्य सभी जगहों के धार्मिक-दार्शनिक मतों में भी कहा गया। जन्मजात योग्यताओं के इस मत को धर्म-सिद्धांत के रूप में अपना लिया गया।

१७वीं शताब्दी में फ्रांसीसी दार्शनिक देकार्त  की कृतियों में भी इस तरह का मत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हुआ। मनुष्य की योग्यताओं के जन्मजात स्वरूप को, जिसे धर्म की सत्ता का समर्थन प्राप्त था, लोगों की सामाजिक, क़ानूनी तथा राजनीतिक असमानता को न्यायोचित ठहराने के लिए और निम्न श्रेणियों को शिक्षा देने की निरर्थकता में नियतिनिर्दिष्ट ( destiny directed ) विश्वास की पुष्टि करने के लिए उपयोग में लाया गया। भौतिकेतर तथा अनश्वर आत्मा के साथ, जो मनुष्य को तैयारशुदा गुणों तथा विशेषताओं समेत मानों जन्म के समय प्राप्त होती है, घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए इस प्रतिक्रियावादी तथा वैज्ञानिक दृष्टि से आधारहीन दृष्टिकोण को वैज्ञानिक मनोविज्ञान साफ़-साफ़ ठुकराता है।

यह व्यापक रूप से प्रचलित मत ग़लत है कि योग्यताएं मनुष्य को जन्म के समय ही तैयारशुदा रूप में प्राप्त होती हैं। इस मत का मूल इतना प्रतिक्रियावादी मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षाशास्त्रीय सिद्धांतों में नहीं, जितना कि मनोवैज्ञानिक तथा शिक्षाशास्त्रीय अज्ञान में निहित है। कभी-कभी वह कतिपय अध्यापकों की शिक्षाशास्त्रीय उदासीनता और बेबसी पर पर्दा डालने का काम देता है। प्रकृति के तैयारशुदा वरदान के रूप में योग्यताओं की यह सुविधाजनक “मनोवैज्ञानिक प्राक्कल्पना” वस्तुतः अध्यापक को इस या उस छात्र के ठीक तरह काम न कर पाने के कारणों की जांच करने और उन्हें दूर करने के लिए कारगर कदम उठाने के दायित्व से मुक्त कर देती है।

अतः जन्मजात योग्यताओं की अवधारणा को अस्वीकार करते हुए वैज्ञानिक मनोविज्ञान सबसे पहले नियतिवाद ( fatalism ) का – किसी अपरिवर्तनीय नैसर्गिक कारक के रूप में नियति द्वारा पूर्वनिर्धारित योग्यताओं से संबंधित विचारों का – विरोध करता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

प्रतिभा तथा शिल्पकारिता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘योग्यता’ के अंतर्गत प्रतिभा की संरचना को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम प्रतिभा तथा शिल्पकारिता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रतिभा तथा शिल्पकारिता
( talent and craftsmanship )

सामान्य तथा विशेष गुणों के योग के रूप में प्रतिभा ( talent ), जैसा कि यहां पहले कहा जा चुका है, सफल सृजन-सक्रियता ( successful creation-activity ) से अधिक और कुछ नहीं है, वह शिल्पकारिता का मात्र पूर्वाधार है, स्वयं शिल्पकारिता ( craftsmanship ) नहीं। किसी न किसी शिल्प ( craft ) में प्रवीण बनने के लिए ( यानि अध्यापक, डॉक्टर, विमानचालक, लेखक, जिम्नास्ट, शतरंज का खिलाड़ी, आदि बनने के लिए ) अत्यधिक परिश्रम करना आवश्यक है। प्रतिभा गुणी व्यक्ति को श्रम से मुक्त नहीं करती, अपितु उससे और ज़्यादा, सृजनशील, कठिन श्रम की अपेक्षा करती है। जिन लोगों की प्रतिभा को पूरे संसार की मान्यता मिली, वे सब बिना किसी अपवाद के श्रम-क्षेत्र के महारथी थे। केवल श्रम की बदौलत ही वे प्रवीणता के उच्चतम स्तर पर पहुंचे और पूरे विश्व में विख्यात बने।

श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य जीवन का अनुभव, कौशल तथा आदतें ग्रहण करता है, जिनके बिना किसी भी क्षेत्र में सृजनशील कार्यकलाप असंभव है।

सृजन-सक्रियता में प्रेरणा, उत्साह की अवस्था, मानसिक शक्तियों का उभार महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। प्रेरणा को परंपरागत रूप से प्रतिभा का अविच्छेद्य अंग माना जाता है। परंतु सृजन-सक्रियता में प्रेरणा को श्रम के, जो उसका आधार होता है, मुक़ाबले में रखने का कोई कारण नहीं है। प्रेरणा इल्हाम जैसी कोई चीज़ नहीं है, वह तो केवल सृजनात्मक कार्यकलाप का ऐसा तत्व है, जो गहन प्रारंभिक कार्य से उत्पन्न होता है। विज्ञान, कला अथवा इंजीनियरिंग में किसी प्रमुख समस्या के समाधान के लिए ध्यान का अत्यधिक संकेन्द्रण ( concentration ), स्मरण-शक्ति, कल्पना-शक्ति तथा बौद्धिक शक्तियों की एकजुटता प्रेरणा की अभिलाक्षणिकताएं ( characteristics ) हैं।

यदि प्रतिभा संभावना ( possibility ) है, तो शिल्पकारिता यथार्थ ( reality ) बननेवाली संभावना है। अतः शिल्पकारिता सक्रियता में प्रतिभा की अभिव्यक्ति है। वह कतिपय कौशलों तथा आदतों के कुल में ही नहीं, अपितु किसी भी तरह की श्रम-संक्रियाओं को, जो किसी कार्यभार के सृजनशील समाधान के लिए आवश्यक सिद्ध हो सकती हैं, पूर्ण करने के लिए मानसिक तत्परता में भी प्रदर्शित होती है। यह ठीक ही कहा जाता है कि शिल्पकारिता उसे कहते हैं, जब क्या और कैसे एक साथ चलते हैं, और इसमें साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया जाना चाहिए कि शिल्पकारिता सृजनशील समस्या के सार के मूर्तकरण तथा उसके समाधान की विधियों की खोज के बीच की खाई पाट देती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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