मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत किया था, इस बार हम उसी संवाद का अगला हिस्सा प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद – २
(A dialogue on the Essence of Man and the Sense of Life -2)

यह काल्पनिक संवाद यहां की अब तक की सामग्री को भली भांति पढ़ चुके एक पाठक (पा०) तथा एक दार्शनिक (दा०) के बीच हो रहा है, जो द्वंद्ववाद और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाता है। पिछली बार से अब और आगे।

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पा० – तो फिर ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन (historical materialistic philosophy), मनुष्य के सार (essence) तथा जीवन के अर्थ (sense) को किस तरह से समझता है?

दा० – ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन यह मानकर चलता है कि मनुष्य मुख्यतः एक सामाजिक प्राणी है। वह श्रम की प्रक्रिया के द्वारा विकसित तथा जंतु जगत से अलग हुआ। उसके कर्म, लक्ष्य, दृष्टिकोण और इरादे अंततः उस समाज के संबंधों (social relations) से और सर्वोपरि उत्पादन संबंधों (relations of production) से निर्धारित होते हैं।

पा० – यदि किसी प्रदत्त युग (given age) में लोगों का सार सामाजिक संबंधों से निर्धारित होता है, तो क्या सब लोग, कम से कम एक प्रदत्त समाज में, जुड़वां बच्चों की तरह एक समान नहीं होने चाहिए क्या? तो फिर लोग अपने व्यवहार, रुचियों, दृष्टिकोणों, जीवन के लक्ष्यों और स्वभाव में एक दूसरे से भिन्न क्यों होते हैं?

दा० – यह मत भूलिए कि यह ही सार भिन्न-भिन्न ढंग से प्रदर्शित हो सकता है, क्योंकि उसके लिए पूर्वावस्थाएं हमेशा भिन्न होती हैं। मसलन, सारे हीरों का सार एक ही है और इस बात से निर्धारित होता है उनमें कार्बन के आयन निश्चित मणिभ-जालकों (crystal lattices) में समाहित होते हैं। किंतु प्रकृति में दो पूर्णतः समरूप हीरे नहीं पाए जाते। वे अपने आकार, रंग, पारदर्शिता, आकृति, दरारों की उपस्थिति, आदि में एक दूसरे से भिन्न होते हैं चाहे यह भिन्नता कितनी ही न्यू्न क्यों ना हो। इसका कारण यह है कि वे भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में बने। निश्चय ही लोग इससे अरबों गुना अधिक जटिल और विविध होते हैं। मानवीय सार की अभिव्यक्ति आदमी का व्यक्तित्व (personality) है। संसार में ऐसे दो व्यक्तियों का अस्तित्व नहीं है जिनके व्यक्तित्व पूर्णतः समान हों।

पा० – लेकिन व्यक्तित्व क्या है? उसे कौन निर्धारित करता है?

दा० – यह मुख्यतः मनुष्य के सार पर, यानी ऐतिहासिक दृष्टि से परिवर्तित होते हुए सामाजिक संबंधों पर निर्भर होता है। इसलिए एक युग का या किसी एक वर्ग (class) का व्यक्तित्व (व्यक्ति), दूसरे युग या वर्ग के व्यक्तित्व (व्यक्ति) से मूलतः भिन्न होता है। काम के, अपने वर्ग, परिवार, स्कूली शिक्षा-दीक्षा के प्रति रुख़ (attitude) और शिक्षा का स्तर तथा व्यक्ति की जानकारी का दर्जा एवं उसकी क्षमताओं के विकास का स्तर, व्यक्तित्व के निर्माण को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा इस पर, व्यक्ति के मिज़ाज (temperament), अन्य लोगों के प्रति रुख़, अपना स्वमूल्यांकन (self-estimation), आदि भी उसे प्रभावित करते हैंइसलिए, एक सामान्य सार के होते हुए भी प्रत्येक व्यक्ति मौलिक (original) और अद्वितीय (imitable) होता है। इसमें सामान्य, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की द्वंद्वात्मकता (dialectic) अभिव्यक्त होती है।

पा० – तो इससे यह निष्कर्ष निकला कि प्रत्येक विशिष्ट व्यक्ति को समझने के लिए हमें एक सामाजिक-ऐतिहासिक सत्व (social and historical being) के रूप में उसके मात्र सार की ही नहीं, बल्कि उसके जीवन के वृतांतों, उसकी शिक्षा-दीक्षा की विशिष्टताओं, जीवन से संबंधित ब्यौरों, आदि की जानकारी भी होनी चाहिए।

दा० – बिल्कुल सही।

पा० – यहां एक नया प्रश्न है। सामाजिक संबंध और मनुष्य का सार भी युग-दर-युग बदलते जाते हैं। इसके अलावा, यह सार अरबों भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में अभिव्यक्त होता है जिनके लक्ष्य तथा जीवन के प्रति रुख़ भिन्न-भिन्न होते हैं। तो क्या हम मानवता के लिए, कम से कम अपने युग की मानवजाति के लिए जीवन के एक एकल अर्थ (single sense) तथा लक्ष्य की बात कर सकते हैं?

दा० – बेशक कर सकते हैं। यह सर्वोच्च लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति तथा सकल (whole) समाज की स्वतंत्रता (freedom) की उपलब्धि है।

पा० – यह स्वतंत्रता हमें क्या देगी?

दा० – यह हमें एक समृद्ध, ओजस्वी, यानी रचनात्मक (creative) जीवन का, पूर्ण आत्मविकास (self-realisation) का अवसर देगी।

पा० – परंतु रचनात्मकता और रचनात्मक जीवन इतने महत्वपूर्ण क्यों है? और यह आत्मविकास क्या है?

दा० – जैसा कि आप जानते हैं, विकास की कोई भी प्रक्रिया नूतन (new) का उद्‍गम है। प्रकृति में नये महाद्वीपों, पर्वतों, या नदियों की रचना में करोड़ों या सैकड़ों हज़ारों वर्ष लगे। पौधों और जानवरों की नयी जातियों की रचना में हजारों या सैकड़ों वर्ष लगे। आधुनिक मनुष्य कृत्रिम नदियों और झीलों की रचना तथा भूदृश्यावलियों में परिवर्तन कुछ ही वर्षों या महीनों के अंदर कर डालता है। हमने थोड़ी ही अवधि में जीवित अंगियों की ऐसी नयी जातियों की रचना करना सीख लिया है, जिनके गुण पूर्वनियोजित होते हैं।

रचनात्मकता, मनुष्य के हित में और उसकी भौतिक तथा बौद्धिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए नूतन की सचेत, सोद्देश्य रचना है। लोग हमेशा रचनात्मक रहे हैं, किंतु सामान्यतः यह रचनात्मकता स्वतःस्फूर्त (spontaneous) रही है। इसके अलावा, शोषक समाजों में यह कुछ ही लोगों की क़िस्मत होती थी और हमेशा मनुष्यजाति के हितार्थ नहीं होती थी। किसी अन्य की ज़रूरतों और संकल्पों (will) से संचालित करोड़ों लोगों ने ऐसे उद्देश्यों के लिए काम किया जिन्हें वे समझ नहीं पाते थे। उनकी अंतर्जात (inborn) क्षमताएं अपविकसित या एकतरफ़ा विकसित थीं। उत्पादक शक्तियों (productive forces) का स्तर, जीवन पद्धति और उत्पादन संबंधों का स्वरूप भौतिक श्रम और सामाजिक जीवन के दौरान लोगों के इरादों, क्षमताओं, आशाओं और आदर्शों को वास्तविक नहीं बनने देते थे। इसके लिए वस्तुगत दशाएं (objective conditions) सामान्यतः विद्यमान नहीं थीं।

आत्मविकास, वस्तुतः भौतिक वस्तुओं और आत्मिक मूल्यों तथा स्वयं व्यक्ति के जीवन में इंजीनियरी तथा तकनीकी विचारों, नैतिक व कलात्मक मानकों (standards) तथा न्यायोचित सामाजिक प्रणाली के आदर्शों का साकार होना है। यह रचनात्मकता से और इससे भी अधिक, रचनात्मक चेतना से अविभाज्य (inseparable) है। ऐसी रचनात्मकता केवल तभी संभव है जब वास्तविक (real), सच्ची स्वतंत्रता (genuine freedom) हो जो केवल मानव जाति के दीर्घ, जटिल विकास के द्वारा ही उपलभ्य (attainable) है।

पा० – किंतु अगर लोग स्वतंत्र हों और प्रत्येक अपने ही ढंग से जीवन को समझता हो, अपने ही लक्ष्यों, आदि का अनुसरण करता हो, तो क्या उससे अंतहीन झगड़े नहीं होंगे? एक व्यक्ति आत्मविकास के लिए संगीत रचने की इच्छा रखता हो और सुबह से शाम तक पियानो को ठकठकाता रहता हो, तो वह संगीत किसी अन्य को परेशान तथा उसके काम में दखलअंदाज़ी कर सकता है, जिसे गणितीय समस्या हल करने के लिए पूरी ख़ामोशी की जरूरत है। किंतु अगर हर कोई आत्मविकास में जुटा हो और अन्य लोगों की परवाह किए बिना उन्मुक्त रूप से कार्य करता हो, तो सारी मानव जाति को क्या उपलब्ध होगा? आख़िर समाज में अप्रिय, कष्टसाध्य तथा अरचनात्मक काम होंगे।

दा० – आप अराजकता (anarchy) और सच्ची स्वतंत्रता को गड्डमड्ड कर रहे हैं। जो भी व्यक्ति अन्य लोगों या समाज के अहित में काम करता है, वह स्वतंत्र नहीं हो सकता है। यह समझने के लिए कि मानवजाति के प्रत्येक सदस्य के रचनात्मक श्रम तथा आत्मविकास से स्वयं मानवजाति को क्या फ़ायदा होगा और उससे व्यक्ति को क्या मिलेगा, हमें इन प्रश्नों की अधिक विस्तृत समझ हासिल करनी चाहिए और इसके लिए हम ‘स्वतंत्रता और आवश्यकता’ से बात आगे शुरू करेंगे।

इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत आत्मगत कारक की भूमिका में बढ़ती पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘मनुष्य और समाज’ के अंतर्गत मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य और समाज

मनुष्य के सार और जीवन के अर्थ पर एक संवाद – १
(A dialogue on the Essence of Man and the Sense of Life -1)

यह काल्पनिक संवाद यहां की अब तक की सामग्री को भली भांति पढ़ चुके एक पाठक (पा०) तथा एक दार्शनिक (दा०) के बीच हो रहा है, जो द्वंद्ववाद और ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाता है।

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पा० – यहां प्रारंभ में आपने कहा था कि दर्शन का और सर्वोपरि द्वंद्वात्मक एवं ऐतिहासिक भौतिकवाद (dialectical and historical materialism) का ज्ञान मनुष्य के सार (essence) को, आधुनिक जगत में उसके स्थान को तथा उसके जीवन व उद्देश्य को समझने के लिए, अतः आधुनिक युग की सर्वाधिक विकट समस्या को समझने के लिए आवश्यक है।

दा० – बिल्कुल ठीक। और हमने इन समस्याओं पर वस्तुतः लगातार विचार-विमर्श किया। यहां हमने दर्शन के बुनियादी सवाल पर, चेतना (consciousness) तथा भूतद्रव्य (matter) के संबंध के सवाल पर ध्यान दिया। यह मूलतः समस्त विश्व के साथ मनुष्य के संबंध का सवाल है। हमने सामाजिक सत्व (social being) तथा सामाजिक चेतना के, लोगो के भौतिक उत्पादन तथा आत्मिक क्रियाकलाप के संबंध की जांच करते हुए अपने विचार-विमर्श को जारी रखा। हमने यहां प्रकृति के साथ मानव समाज के संबंध पर विचार किया। द्वंद्ववाद के नियमों का अध्ययन करने तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के ज्ञान के सिद्धांत से परिचित होने के बाद हम अन्य अनसुलझे सवालों को समझने के लिए तैयार हुए।

पा० – तो आइये, उनसे निबटने और उन्हें हल करने की कोशिश करें। मसलन, मनुष्य का सार क्या है? उसके जीवन का अर्थ क्या है? मनुष्य किसके लिए जी रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर पाना अत्यंत कठिन है।

दा० – आपकी राय में, उनका उत्तर देना किस वजह से कठिन है?

पा० – हम जानते हैं कि दुनिया में कई अरब लोग, अनेक अनेक देशों में रहते हैं – विभिन्न जातियों (nationalities), नस्लों (race) के लोग, पुरुष और नारियां, बूढ़े और जवान, विभिन्न वर्गों (classes) और सामाजिक समूहों के लोग। उनकी शिक्षा-दीक्षा भिन्न है, चरित्र और लक्ष्य भिन्न हैं और वे जीवन को तथा उसमें अपने स्थान को भिन्न-भिन्न ढंगो से समझते हैं। इस स्थिति में क्या हम मनुष्य के, एक एकल सार (single essence) की सामान्य बात कह सकते हैं? समाज की बात तो दूर, जब हम केवल दो भिन्न आदमियों ही को लें, तो भी हम उनके, कम से कम कोटि (degree) के सामान्य लक्ष्यों के बारे में या जीवन के अर्थ के बारे में क्या बातें कर सकते हैं?

दा० – आपके प्रश्न में एक ग़लती की संभावना निहित है। आपकी राय में ये विभिन्नताएं इतनी बड़ी हैं कि आप सामाजिक समूहों और वर्गों के समान लक्ष्यों या किसी प्रकार के सामान्य जीवन के अर्थ की बात स्वीकार नहीं करते। आप यह सुझाते हैं कि मनुष्य का कोई समान सार नहीं है या ऐसा कुछ नहीं है, जो लोगों को एकता में बांध सके। यह बात ऐसी ही अतिवादी (extreme) है, जैसे यह सोचना कि सब लोग एकसमान हैं, कि वे नन्हे, अवैयक्तिक (impersonal), सामाजिक पेंच हैं। किंतु सामान्य, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की एक द्वंद्वात्मक एकता होती है। हमारा दर्शन लोगों के लिए उनके सारे लक्ष्यों या उनके प्रत्येक पृथक कर्म, आदि के लिए नुस्खे़ (prescriptions) तैयार करने का लक्ष्य नहीं रखता है। मनुष्य और समाज एक द्वंद्वात्मक एकत्व (dialectical unity) है, अतः इन प्रश्नों का उत्तर इस शर्त पर ही दिया जा सकता है कि हम लोगों के अंतर तथा समानता को, व्यक्तिगत और सामाजिक हितों के अंतर्संयोजन (interconnections) को, सामाजिक और व्यक्तिगत क्रियाकलाप की अंतर्निर्भरता को मान्यता दें। हम केवल ऐसे ही एक उपागम (approach) से यह समझ सकते हैं कि मनुष्य का सार क्या है और कि उसके जीवन का अर्थ क्या है।

पा० – तो बताइए यह सार क्या है?

दा० – दर्शन के इतिहास ने इसके कई भिन्न-भिन्न उत्तर दिये हैं। मसलन, प्राचीन यूनानी दार्शनिकों का विचार था कि मनुष्य का सार यह है कि वह स्वयं में एक सूक्ष्म ब्रह्मांड (microcosm) है, यानी एक नन्हा, जीवित गतिमान जगत है, जो अपनी परिवेशीय दुनिया को, बॄहत ब्रह्मांड (macrocosm) को सूक्ष्मीकृत रूप में दोहराता है। लेकिन तब से अब तक विज्ञान के विकास ने यह दर्शाया है कि मनुष्य की जीवन क्रिया सामाजिक विकास के नियमों से संचालित है, जबकि बाह्य जगत प्रकृति के नियमों के अनुसार विकसित होता है। जीवन ने मनुष्य के सार की प्राचीन यूनानी समझ का खंडन कर दिया। मध्ययुगीन ईसाई दर्शन ने उसका सार दैवी उत्पत्ति (divine origin) में, उनके अनुसार इस तथ्य में देखा कि उसमें आत्मा (soul) का निवास है। किंतु आत्मा का सृजन हमेशा के लिए ईश्वर ने किया है, जबकि लोग नितांत भिन्न हैं। लोग वैर पालते हैं, लड़ते हैं और अत्यंत अधार्मिक कार्य करते हैं, दैव विरोधी कर्म करते हैं। इससे बड़ी बात यह है कि मनुष्य की जीवन पद्धति, रुचियां, दृष्टिकोण तथा स्वयं जीवन की समझ युग-दर-युग बदलती रहती हैं। मनुष्य के सार की ईसाई संकल्पना भी काल कसौटी में खरी नहीं उतरी। अपने विचारों की विभिन्नता के बावजूद पूंजीवादी दार्शनिक मनुष्य के सार को तथा उसके मुख्य लक्ष्य को, प्रकृति पर और अन्य लोगों पर प्रभुत्व (domination) में देखते हैं।

पा० – (बात काटते हुए) तो फिर जीवन का अर्थ और मानवता की सर्वोच्च अभिव्यक्ति (supreme manifestation) क्या है?

दा० – लोगों की सबसे बड़ी संख्या मेहनतकशों (working people) की है और प्रतिरोधी वर्ग समाजों (antagonistic class societies) में उनका शोषण होता है। वे कोई मुनाफ़ा (profit) नहीं कमाते और इस प्रभुत्व से कोई हितलाभ (benefits) हासिल नहीं करते हैं। इसके अलावा यह प्रभुत्व, मनुष्यों को नीचा बनाता है, उनकी हैसियत गिराता है और प्रकृति को नष्ट तथा अस्तव्यस्त करता है। इसलिए प्रभुत्व और किसी भी क़ीमत पर मुनाफ़ा कमाना अधिकांश लोगों के लिए जीवन का सार या अर्थ नहीं हो सकता है। वे केवल चंद शोषकों (exploiters) के सार तथा लक्ष्यों को निर्धारित करते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम