मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – २
( mankind and the natural environment – 2 )

Screen-Shot-2014-09-26-at-10.39.10-AMमनुष्य के प्राकृतिक निवास स्थल ( habitat ) में, घटनाओं के दो समूहों को विभेदित ( distinguish ) किया जा सकता है : निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत ( जंगली पौधे, फल, जानवर, आदि ) और प्राकृतिक संपदा ( कोयला, तेल, जल-शक्ति, पवन, आदि जो श्रम की वस्तुएं हैं )। मानव समाज के क्रमविकास की प्रारंभिक अवस्था में, जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) विकास के निम्न स्तर पर थीं, लोग बहुत हद तक निर्वाह के प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थे। अभी जब वे फ़सल उगाना, पालतू जानवरों का प्रजनन व पालन करना, गर्म आवास बनाना, आदि नहीं जानते थे, तब वे केवल गर्म जलवायु, प्रचुर वनस्पति, बड़े परिमाण में शिकार के जानवरोंवाले भूप्रदेशों में ही रह सकते थे। जब औज़ारों का विकास तथा परिष्करण कर लिया गया तब प्राकृतिक स्रोतों पर लोगों की निर्भरता कम हो गयी। परंतु प्राकृतिक संपदा, यानी खनिजों, ऊर्जा साधनों, आदि पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ गयी

आधुनिक उद्योग और इंजीनियरी ने पृथ्वी उन क्षेत्रों को भी सुगम बना दिया, जो पहले अगम्य ( inaccessible ) थे। रासायनिक उर्वरकों ( chemical fertilizers ) से मनुष्य अनुर्वर ( infertile ) ज़मीनों को उर्वर बना सकता है। नयी निर्माण सामग्री तथा तापन प्रणाली के उपयोग से वह ध्रुवीय क्षेत्रों पर भी नियंत्रण क़ायम कर सकता है। ऊर्जा के विभिन्न प्रकारों के उपयोग से वह उस सामान्य ईंधन ( लकड़ी ) पर निर्भर नहीं रहता, जो पहले गर्मी का एकमात्र स्रोत था। परंतु इसके साथ ही तेल, लौह खनिज, यूरेनियम, खनिज, आदि जैसी प्राथमिक सामग्री पर उद्योग और कृषि की निर्भरता बढ़ रही है। इस प्रक्रिया के मूल में, उत्पादक शक्तियों का विकास निहित है और अपनी बारी में वह काफ़ी हद तक उत्पादन संबंधों ( सर्वोपरि स्वामित्व के प्रभावी रूप ) से निर्धारित होता है

ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) मनुष्य की जीवन क्रिया पर प्राकृतिक निवास स्थल के प्रभाव से इनकार नहीं करता, किंतु यह दर्शाता है कि यह प्रभाव भौतिक संपदा के उत्पादन की विधि के ज़रिये निष्पादित होता है। फलतः इस प्रभाव का स्वरूप और उसमें परिवर्तन स्वयं प्रकृति के बजाय सामाजिक कारकों पर और सर्वोपरि भौतिक उत्पादन पर निर्भर होता है, जो सारे सामाजिक जीवन का आधार है।

मसलन, एक भावी संभावना पर विचार करते हैं। समाज पर अंतरिक्ष का प्रभाव आधुनिक अंतरिक्ष यानों के विकास के द्वारा संभव हो रहा है, जिससे निकट भविष्य में हमारी पार्थिव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर मंडल के ग्रहों के खनिजों और ऊर्जा संसाधनों को उपयोग में लाना संभव हो जायेगा। इस कारक का प्रभाव इंजीनियरी तथा उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होगा, जिसके अंतर्गत वह संक्रियाशील तथा विकसित होगा। सारे समाज के हित में अंतरिक्ष तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग, ऐसी सामाजिक प्रणाली के अस्तित्व की पूर्वापेक्षा करता है, जिसमें अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा को मनुष्यजाति की सेवा में लगाया जायेगा और पार्थिव प्रकृति के विकास तथा संरक्षण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जायेगा। इसके विपरीत, अंतरिक्ष का सैन्यीकरण ( militarization ) अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा के तर्क-सम्मत उपयोग में बाधा डाल सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने का संघर्ष विशेष ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करता जायेगा।

अतः मानवजाति के विकास पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभाव के बारे में निम्नांकित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। (१) प्राकृतिक निवास स्थल मनुष्य की जीवन क्रिया का एक सबसे महत्वपूर्ण भौतिक पूर्वाधार है। (२) इसका प्रभाव न तो प्रमुख है और न निर्णायक। इसका स्वभाव समाज की उत्पादक शक्तियों के स्तर और उत्पादन संबंधों की क़िस्म पर निर्भर करता है। (३) निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत मुख्य रूप से इतिहास की प्रारंभिक अवस्था में समाज पर उस समय असर डालते हैं, जब उत्पादक शक्तियों का विकास सापेक्षतः निम्न स्तर पर होता है, जबकि उत्पादक शक्तियों की अभिवृद्धि के साथ प्राकृतिक संपदा का प्रभाव बढ़ जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने पर्यावरण की संरचना पर विचार किया था, इस बार हम मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – १
( mankind and the natural environment – 1 )

3ba903d6b856ff35389f3a901e14111aजिस प्राकृतिक पर्यावरण में मनुष्यजाति रही और विकसित हुई, वह बहुत जटिल है। इसमें शामिल हैं : (१) पृथ्वी की सतह तथा उसकी विभिन्न मिट्टियां, पहाड़ियां और पर्वत, नदियां, सागर, रेगिस्तान, आदि ; (२) विभिन्न जलवायवीय क्षेत्र ( climatic zones ) ; (३) जानवरों तथा पौधों के विविध समुच्चय, आदि। इन सबकों मिलाकर आम तौर पर एक नाम दिया जाता है – भौगोलिक पर्यावरण ( geographical environment ) । दसियों और सैकड़ों हज़ारों वर्षों तक मनुष्यजाति, पृथ्वी के आभ्यंतर ( interior ) में प्रविष्ट हुए बिना तथा वायुमंडल ( atmosphere ) में उड़े बिना ( अंतरिक्ष की तो बात ही दूर ) पृथ्वी की सतह पर रही और विकसित हुई।

अतीतकाल के अनेक चिंतकों ने विभिन्न भौगोलिक दशाओं में विभिन्न क़बीलों, जनगणों तथा जातियों को रहते देखकर यह निष्कर्ष निकाला कि मानव जीवन के मुख्य लक्षण और संस्कृति का विकास तथा सामाजिक प्रणाली भौगोलिक पर्यावरण पर निर्भर है। उनमें से कुछ ने सोचा कि कठोर या नरम जलवायु सामाजिक विकास का निर्णायक कारक है ; अन्य ने विकास का मुख्य कारण ज़मीन की उर्वरता में, पौधों व जानवरों की प्रचुरता में देखा ; इनके अलावा, कुछ अन्य ने समाज के विकास को जलमार्गों ( नदियों, सागरों, झीलों, आदि ) पर निर्भर माना।

इन दृष्टिकोणों में किंचित औचित्य है। विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में लोग तथ्यतः उन देशों में अधिक सफलता से विकसित हुए जहां की जलवायु नरम थी तथा वनस्पति और जानवरों की प्रचुरता थी, जबकि कठोर जलवायु तथा अनुर्वर ज़मीनें बिना बसी रही। परंतु मनुष्यजाति के क्रमविकास ( evolution ) को केवल भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव से स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। कई हज़ार वर्षों की, और सैकड़ों की भी अवधि में एक ही भौगोलिक दशाओं के अंतर्गत विभिन्न सामाजिक विरचनाएं अनुक्रमिक रूप से बनीं। पिछली कई सदियों में, कई देशों के भौगोलिक पर्यावरण में कोई तीव्र परिवर्तन नहीं हुए हैं, फिर भी इन सदियों में इन देशों की सामाजिक विरचनाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं।

यदि सब कुछ भौगोलिक दशाओं पर निर्भर होता, तो इस बात का क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है कि वनस्पति व जानवरों की प्रचुरता तथा गर्म जलवायुवाले लैटिन अमरीकी तथा मध्य अफ़्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई है और संस्कृति का स्तर सापेक्षतः नीचा है, जबकि कई अन्य देशों में कठोर जलवायु, मिट्टी तथा अन्य प्रतिकूल दशाओं के बावजूद उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्था तथा विकसित संस्कृति का अस्तित्व है ? ये प्रश्न इस विचार को प्रेरित करते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण से संबंध तथा उस पर निर्भरता सीधी-सरल बात नहीं है। यही नहीं, समाज के विकसित होने के साथ मानवजाति पृथ्वी के आभ्यंतर में अधिक गहराइयों में पैठी और वायुमंडल की सीमा के बाहर जा पहुंची और भौगोलिक पर्यावरण की संकल्पना बहुत संकीर्ण साबित हो गयी। यह मानवजाति के प्राकृतिक पर्यावरण का मात्र एक भाग है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम