दिमाग़ और दिल, एक दूसरे के रूबरू

हे मानव श्रेष्ठों,
समय फिर हाज़िर है।
ब्लोग का नाम बदल करमै समय हूंसेसमय के साये मेंकर दिया है। खैर, क्या फ़र्क पड़ता है।
चलिए, अपन तो अपनी चौपाल लगाते हैं…..
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समय के साये में एक सम्माननीय आगन्तुक ने एक टिप्पणी में क्या खू़ब बात कही है, एक खू़बसूरत अंदाज़ में…..आप देखिए
दिमाग को कभी दिल के रूबरू करके देखिये.. फिर कहिए..

समय ने सोचा चलो आज इस बेहद प्रचलित जुमले पर ही बात की जाए।
अक्सर इसका कई विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जाता है। दिल की सुनों….दिल से सोचोदिमाग़ और दिल के बीच ऊंहापोह….दिमाग़ कुछ और कह रहा था, दिल कुछ और….मैं तो अपने दिल की सुनता हूंदिल को दिमाग़ पर हावी मत होने दो….दिल अक्सर सही कहता है, पर हम दिमाग़ लगा लेते हैंबगैरा..बगैरा..
इस तरह दिल और दिमाग़ दो प्रतिद्वन्दी वस्तुगत बिंबों, अलगअलग मानसिक क्रिया करने वाले दो ध्रुवो के रूप में उभरते हैं, जो हमारे अस्तित्व से बावस्ता हैं।

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चलिए देखते हैं, वस्तुगतता क्या है।
अधिकतर जानते हैं कि शारीरिक संरचना के बारे में मानवजाति के उपलब्ध ग्यान यानि शरीरक्रिया विग्यान के अनुसार दिमाग़ यानि मस्तिष्क सारी संवेदनाओं और विचारों का केन्द्र है जबकि दिल का कार्य रक्तसंचार हेतु आवश्यक दबाब पैदा करना है, यह एक पंप मात्र है जिसकी वज़ह से शरीर की सारी कोशिकाओं और मस्तिष्क को भी रक्त के जरिए आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति होती है।
ऐसा नहीं है कि इन जुमलों को प्रयोग करने वाले इस तथ्य को नहीं जानते, फिर भी इनका प्रयोग होता है।
एक तो भाषागत आदतों के कारण, दूसरा कहीं ना कहीं समझ में यह बात पैठी होती है कि मनुष्य के मानस में भावनाओं और तार्किक भौतिक समझ के वाकई में दो अलगअलग ध्रुव हैं।

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अक्सरदिल के हिसाब सेका मतलब होता है, प्राथमिक रूप से मनुष्य के दिमाग़ में जो प्रतिक्रिया या इच्छा उत्पन्न हुई है उसके हिसाब से या अपनी विवेकहीन भावनाओं के हिसाब से मनुष्य का क्रियाशील होना। जबकिदिमाग के हिसाब सेका मतलब होता है, मनुष्य का प्राप्त संवेदनों और सूचनाओं का समझ और विवेक के स्तर के अनुसार विश्लेषण कर लाभहानि के हिसाब से या आदर्शों के सापेक्ष नापतौल कर क्रियाशील होना।
कोईकोई ऐसे सोचता है कि प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा शुद्ध होती है, दिल की आवाज़ होती है अतएव सही होती है, जबकि दिमाग़ लगाकर हम अपनी क्रियाशीलता को स्वार्थी बना लेते हैं। कुछकुछ ऐसे भी सोचते हैं कि दिमाग़ से नापतौल कर ही कार्य संपन्न करने चाहिए।

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क्या सचमुच ही प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा अर्थात दिल की आवाज़ शुद्ध और सही होती है?
चलिए देखते हैं।
आप जानते हैं कि एक ही वस्तुगत बिंब लगअलग मनुष्यों में अलगअलग भावना का संचार करता है। एक ही चीज़ अगर कुछ मनुष्यों में तृष्णा का कारण बनती है तो कुछ मनुष्यों में वितृष्णा का कारण बनती है जैसे कि शराब, मांस आदि। जाहिर है ऐसे में इनके सापेक्ष क्रियाशीलता भी अलगअलग होगी। किसी स्त्री को देखकर पुरूष मन में, नरमादा के अंतर्संबंधों के सापेक्ष उसे पाने की पैदा हुई प्राथमिक प्रतिक्रिया या इच्छा अर्थात दिल की आवाज़ को सामाजिक आदर्शों के सापेक्ष कैसे शुद्ध और सही कहा जा सकता है? ऐसे ही कई और चीज़ों पर भी सोचा जा सकता है।

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दरअसल, एक जीव होने के नाते हर नुष्य अपनी जिजीविषा हेतु बेहद स्वार्थी प्रवृत्तियों और प्राथमिक प्रतिक्रियाओं या इच्छाओं का प्रदर्शन करता है या करना चाहता है, परंतु एक सामाजिक प्राणी होने के विवेक से संपन्नता और आदर्श प्रतिमानों की समझ उसे सही दिशा दिखाती है और उसके व्यवहार को नियमित और नियंत्रित करती है। अब हो यह रहा है कि आज की व्यवस्था द्वारा प्रचलित और स्थापित मूल्यों में सामाजिकता गायब हो रही है और व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति के हितसाधन को प्रतिष्ठित किया जा रहा है अतएव जब सामान्य स्तर का मनुष्य जब दिमाग़ लगाता है तो नापतौल कर अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति हेतु प्रवृत होता है। इसीलिए यह विचार पैदा होता है कि वह यदि अपने दिल की आवाज़ पर जो कि साधारणतयाः अपने विकास हेतु समाज पर निर्भर होने के कारण कुछकुछ सामाजिक मूल्यों से संतृप्त होती है, के हिसाब से कार्य करे तो शायद ज़्यादा बेहतर रहेगा।

समय के उक्त सम्माननीय आगन्तुक की टिप्पणी का शायद यही मतलब है।

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जाहिर है, जिस मनुष्य का ग्यान और समझ का स्तर अपेक्षाकृत निचले स्तर पर होता है, उसके व्यवहार का स्तर इन प्राथमिक प्रतिक्रियाओं या इच्छाओं या दिल की आवाज़ पर ज़्यादा निर्भर करता है और जो अपने ग्यान और समझ के स्तर को निरंतर परिष्कृत करते एवं विवेक को ज़्यादा तार्किक बनाते जाते हैं, उनके व्यवहार का स्तर भी तदअनुसार ही ज़्यादा संयमित, विवेकसंगत और सामाजिक होता जाता है।

आज के लिए इतना ही…..