प्रकृति और समाज पर प्राचीन विचार

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद प्रस्तुत किया था, इस बार हम प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में प्राचीन मतों पर संक्षेप में चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रकृति और समाज पर प्राचीन विचार
( ancient ideas on nature and society )

cave-art-color-paintingसमाज के विकास के साथ, प्रकृति के प्रति मनुष्य का रुख़ ( attitude ) बदल गया है जो समाज और प्रकृति के संबंधों के बारे में विभिन्न मतों में परावर्तित ( reflect ) हुआ है।

आदिम मनुष्य प्राकृतिक संपदा के उपभोक्ता थे। सैकड़ों हज़ारों वर्षों तक वे जानवरों तथा पौधों का आहार करते, गुफाओं में सोते, चमड़े के वस्त्र पहनते, लकड़ी, पत्थर और हड्डियों के औज़ारों का इस्तेमाल करते रहे। वे केवल प्राकृतिक पदार्थ का स्वांगीकरण ( assimilation ) करते, किंतु ऐसी किसी वस्तु की रचना नहीं करते थे जो प्रकृति में नहीं पायी जाती। उत्पादक शक्तियों के विकास का वह स्तर तत्कालीन धार्मिक धारणाओं, मिथकों, पुराणकथाओं की एक प्रणाली में परावर्तित होता था, जिसमें अपने परिवेशीय जगत के प्रति मनुष्य के जटिल, अंतर्विरोधी ( contradictory ) रुख़ को अभिव्यक्ति मिलती थी।

एक तरफ़, प्रकृति जीवनदायी थी, मनुष्य को पोषित करती थी अतः वह पूजा की, दैवीकरण की पात्र थी। दूसरी तरफ़, वह प्रकृति की भयोत्पादक, अबोधगम्य शक्तियों के ख़िलाफ़ लगातार संघर्ष करता, उन पर काबू पाने तथा उन्हें अपने अधीन लाने का प्रयास करता और अक्सर कई प्राकृतिक घटनाओं को वैरभाव से देखता था। आदिम समाज के भंग होने और प्रारंभिक दास-प्रथावाले राज्यों के उद्‍भव की अवधि में लोगों ने खेती करना, फ़सल उगाना, घरेलू जानवरों को पालना व उनका प्रजनन करना शुरू कर दिया था। धातु के औज़ारों, कुम्हारी चक्के के अविष्कार तथा आग के उपयोग की क्षमता अर्जित करने के बाद मनुष्य ने वस्तुओं, खाद्य पदार्थों, मकानों तथा परिवहन साधनों का निर्माण करना शुरू कर दिया जो प्रकृति में विद्यमान नहीं थे। उत्पादन शक्तियों और तकनीक के विकास के फलस्वरूप प्रकृति का रूपांतरण ( transformation ) शुरू हो गया।

प्रागैतिहास के सैकड़ों हज़ारों वर्षों के दौरान लोगों ने प्रकृति को ज़ोरशोर से बदलना शुरू कर दिया था : उन्होंने जंगल काट दिये, जानवरों की कई प्रजातियों का मूलोच्छेदन कर दिया, सैकड़ों सड़कें और रास्ते बना दिये। मनुष्य के श्रम तथा सामाजिक क्रियाकलाप के दौरान प्रकृति को बदलने की प्रक्रिया वर्ग समाज में कई गुना अधिक त्वरित ( accelerated ) हो गयी। परंतु ये क्रियाकलाप नियमतः स्वतःस्फूर्त थे और उसके परिणाम नितांत अनपेक्षित थे, न कि वे, जिनके लिए लोग शुरू में प्रयत्नशील थे। यह पूर्ववर्ती विरचनाओं ( formations ) की तथा उनके अनुरूप संस्कृतियों की लाक्षणिक विशेषता थी।

प्राचीन काल के दर्शन, विशेषतः प्राचीन भौतिकवाद का लक्ष्य सकल विश्व को समझना था। इस विश्व ( ब्रह्मांड ) को एक विकासमान साकल्य मानते तथा इसके मूलाधारों और उद्‍गम को समझने का प्रयत्न करते हुए प्राचीन दार्शनिक परिवेशीय प्रकृति को रूपांतरित करने में मनुष्य की सक्रिय भूमिका को नहीं समझ पाये। वे उसे सचेत, सोद्देश्य, रूपांतरणकारी क्रियाकलाप का नहीं, बल्कि प्रेक्षण ( observation ) का विषय मानते रहे।

ईसाई धर्म तथा ईश्वरमीमांसा और मध्ययुग में प्रभावी अन्य विश्व धर्मों की लाक्षणिकता थी प्रकृति के प्रति नकारात्मक रुख़। मध्ययुग के दार्शनिकों की राय में ईश्वर ने मनुष्य की सेवा के लिए प्रकृति की रचना की। केवल मनुष्य में ही दैवी आत्मिक मूल का एक छोटा-सा अंश होता है जबकि प्रकृति में हीन मूल निहित होता है।

केवल पुनर्जागरण काल में तथा उसके बाद प्रकृतिविज्ञान के द्रुत विकास के समय, प्रकृति में वैज्ञानिक दिलचस्पी तेज़ी से बढ़ी। किंतु वह दिलचस्पी धनलोलुपता ( money-grubbing ) और मुनाफ़े की चाह के कारण धूमिल हो गयी। नये जमाने के दर्शन तथा विज्ञान के एक संस्थापक फ्रैंसिस बेकन समाज के कल्याणार्थ प्रकृति के ज्ञान को आवश्यक समझते थे। उनका कहना था कि समाज में उत्पन्न होनेवाला कोई भी असंतोष ग़रीबी और कुशासन का फल होता है। ये दोनों खामियां केवल विज्ञान की मदद से ही मिटायी जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान एक बल है। विज्ञान का लक्ष्य प्रकृति को जानना और उस पर नियंत्रण को सुनिश्चित बनाना है। प्रकृति पर नियंत्रण से समाज में ख़ुशहाली और स्थायित्व लाया जा सकता है। बेशक, उनके मन में निजी स्वामित्व तथा मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित समाज था और प्रकृति के प्रति समाज के रुख़ की बुर्जुआ संकल्पना इन दृष्टिकोणों से अभिपुष्ट ही हुई।

वे प्रकृति से जितना संभव था उतना खसोट लेना चाहते थे, लेकिन किसी ने भी समाज के सामने प्रकृति के संरक्षण का लक्ष्य पेश नहीं किया। प्रकृति पर नियंत्रण का विचार बुर्जुआ दर्शन की आधारशिला बन गया। उसने प्रकृति के प्रति लूट-खसोट के रुख़ और प्राकृतिक संपदा के क्षयीकरण को उचित ठहराया। जब आधुनिक पूंजीवाद में अंतर्निहित मुनाफ़े की प्रबल पूंजीवादी चाह के कारण सारी मानवजाति के विनाश का ख़तरा पैदा करनेवाला पर्यावरणीय संकट उत्पन्न हो गया, तो इस रुख़ की तह में पहुंचने तथा इस पर क़ाबू पाने की जरूरत विशेष तीव्रता से महसूस की जाने लगी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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प्रेम और इसके प्राकृतिक एवं सामाजिक अंतर्संबंध

तो हे मानव श्रेष्ठों,

समय फिर हाज़िर है…

एक पुरानी जिज्ञासा थी एक भाई की..
प्रेम और इसके प्राकृतिक एवं सामाजिक अंतर्संबंध और अंतर्विरोधों के संबंध में…
समय ने सोचा क्यूं न इस बार इस पर ही माथापच्ची की जाए..
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प्रेम
की भावना मनुष्यों के दिमाग़ और उसके सभ्यतागत सामाजिक विकास की पैदाइश है। पर हम प्राकृतिक सापेक्षता से अपनी चर्चा की शुरुआत करेंगे।
प्रकृति के नज़रिये से देखा जाए तो वहां यह आसानी से देखा और समझा जा सकता है कि प्रकृति की हर शै एक दूसरे से आबद्ध है, अंतर्संबंधित है। प्रकृति में श्रृंखलाबद्ध तरीके से कुछ घटकों का विनाश, कुछ घटकों के निर्माण के लिए निरंतर चरणबद्ध होता रहता है। यहां विचार और भावना को ढूंढ़ना कोरी भावुकता है।
यदि जैविक प्रकृति के नज़रिए से देखें तो हर जीव अपनी जैविक उपस्थिति को बनाए रखने के लिए प्रकृति से सिर्फ़ जरूरत और दोहन का रिश्ता रखता है, और अपनी जैविक जाति की संवृद्धि हेतु प्रजनन करता है। प्रजनन की इसी जरूरत के चलते कुछ जीवों के विपरीत लिंगियों को साथ रहते और कई ऐसे क्रियाकलाप करते हुए देखा जा सकता है जिससे उनके बीच एक भावनात्मक संबंध का भ्रम पैदा हो सकता है, हालांकि यह सिर्फ़ प्रकॄतिजनित प्रतिक्रिया/अनुक्रिया का मामला है। कुछ विशेष मामलों में जरूर यह अहसास हो सकता है कि कुछ भावविशेषों तक यह अनुक्रियाएं पहुंच रही हैं।
मनष्य भी प्रकृति की ही पैदाइश है, इसलिए प्रकॄतिजनित स्वाभाविक प्रतिक्रिया/अनुक्रिया के नियमों से यह भी नाभिनालबद्ध है। परंतु बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, वरन् यहीं से शुरू होती है।

अब थोड़ा सा मनुष्य और प्रकृति के अंतर्द्वन्दों को देखें…
मनुष्य के मनुष्य-रू में विकास को देखें, तो यह इसलिए संभव हो पाया कि इस प्राणी ने प्रकृति के नियमों में बंधने के बजाए, इस नाभिनालबद्धता को चुनौती दी। प्रकृति के अनुसार ढ़लना नहीं वरन् प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास किए, प्रकृति के अंतर्जात नियमों को समझना और उन्हें अपनी जरूरतों के अनुसार काम में लेना शुरू किया। इस लंबी प्रक्रिया के दौरान ही मनुष्य की चेतना का विकास हुआ और वह आज की सोचने-समझने की शक्ति तक पहुंचा।
यानि कि प्रकृति से विलगता के प्रयासों ने मनुष्य को सचेतन प्राणी बनाया और इसकी चेतना ने प्रकृति के साथ अपने अंतर्संबंधों को समझ कर पुनः इसे प्रकृति की और लौटना सिखाया। मनुष्य और प्रकृति के आपसी संबंधों के अंतर्गुथन को समझने या निर्धारित करते समय, इस अंतर्विरोध को ध्यान में रखना चाहिए।
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आज के लिए इतना ही बहुत है, समय के लिए एक साथ इतनी टाईपिंग करना और आपके लिए एक साथ इतना पढ़ पाना थोडा़ कठिन है।
अगली बार बात आगे बढ़ाएंगे और मनुष्य की सामाजिक सापेक्षता पर चर्चा करेंगे….

समय