प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग” पर चर्चा शुरू करते हुएप्रवर्ग’ की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण
( philosophical approaches on categories )

IMG_6393-he-caused-the-revolution-webप्राचीन काल में ही अन्य संप्रत्ययों ( concepts ) से प्रवर्गों ( categories ) का भेद जान लिया गया था और तबसे ही प्रवर्गों के बारे में दार्शनिकों के बीच निरंतर विवाद चल रहा है। विभिन्न दार्शनिकों ने प्रवर्गों के बारे में विभिन्न सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं।

इनमें से एक सिद्धांत की विवेचना करें, जिसे काण्ट  ने प्रतिपादित किया था। काण्ट इस बात पर विशेष बल देते हैं कि चूंकि हर प्रवर्ग उसमें सम्मिलित बहुसंख्य संकीर्णतर संप्रत्ययों की समष्टि है, इसलिए वह हमारे समस्त ज्ञान ( knowledge ) को एक सूत्र में पिरोता है और उसका संश्लेषण ( synthesis ) करता है और इसीलिए संज्ञान ( cognition ) में प्रवर्गों की बहुत ही बड़ी भूमिका है। इस निष्कर्ष के पीछे काण्ट का यह तर्क है : जब लोगों ने पहली बार ऐसी धातु देखी, जिसे जंग नहीं लगता, तो उन्होंने ‘सोना’ संप्रत्यय बनाया। सागरयात्रियों ने जब आर्कटिक महासागर में विराट तैरते हिमपर्वत देखे, तो ‘हिमशैल’ संप्रत्यय पैदा हूआ। इस तरह सभी आम संप्रत्यय भौतिक वस्तुओं के साथ लोगों के संपर्क के परिणाम, हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर इन वस्तुओं के प्रभाव, अर्थात अनुभव ( experience ) के परिणाम हैं। इसलिए वे सब भौतिक विश्व की परिघटनाओं ( phenomena ) के बारे में हमारा ज्ञान हैं।

किंतु प्रवर्ग के साथ दूसरी ही बात है। जिस परिघटना को हम पहले नहीं जानते थे, उससे साक्षात्कार होने पर हम तुरंत उसका कारण ( cause ) ढूंढ़ने लगते हैं, यह जानने की कोशिश करते हैं कि उसमें सांयोगिक ( coincidental ) क्या है और अनिवार्य ( essential ) क्या है, आदि। इन प्रवर्गों के इस्तेमाल के बिना वस्तुओं के साथ कोई भी संपर्क नहीं होता, कोई भी अनुभव हासिल नहीं किया जाता : हम अभी नहीं जानते कि दत्त ( given ) परिघटना का कारण क्या है, मगर हमें विश्वास है कि उसमें कुछ सांयोगिक और कुछ न कुछ अनिवार्य अवश्य है। इस आधार पर काण्ट  निष्कर्ष निकालते हैं कि हम भौतिक विश्व की वस्तुओं के साथ संपर्क में आने, उनका अनुभव प्राप्त करने से पहले ही अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण आदि के प्रवर्गों से परिचित रहते हैं। काण्ट के अनुसार, प्रवर्ग अनुभव का परिणाम नहीं होता, अपितु अनुभव से पहले ही विद्यमान रहता है, यानि वह अनुभव की पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) है।

काण्ट  आगे कहते हैं : चूंकि प्रवर्ग हमारे मस्तिष्क में अनुभव से पहले ही विद्यमान रहते हैं ( जो बात आम संप्रत्ययों के लिए नहीं की जा सकती ), इसलिए उनमें भौतिक विश्व का कोई ज्ञान नहीं होता ; यथार्थ वास्तविकता ( actual reality ) में ऐसा कुछ नहीं है, जो प्रवर्गों से मेल खाता हो। वे सब, यानी अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण, आदि प्रवर्ग मनुष्य के मस्तिष्क में ही कल्पित ( assumed ) किये जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय – प्रवर्ग – भौतिक विश्व पर निर्भर नहीं है और इसी को आगे बढ़ाएं तो चिंतन पदार्थ पर निर्भर नहीं है। इस प्रत्ययवादी ( idealistic ) धारणा के आधार पर काण्ट दावा करते हैं कि प्रवर्ग पैदा नहीं होते, अपितु मानवजाति की उत्पत्ति के क्षण से ही मानव चेतना में शाश्वत रूप से विद्यमान हैं। फिर प्रवर्गों की संख्या और उनका अर्थ भी सदा अपरिवर्तित रहते हैं : आज जितने प्रवर्ग हैं, उतने ही हजारों साल पहले भी थे और आज उनका जो अर्थ है, वही हमारे प्राचीनतम पुरखों के काल में भी था।

अब आइये, देखें कि प्रवर्गों के प्रति यह प्रत्ययवादी दृष्टिकोण कहां तक सही है, जो कि आज भी प्रत्ययवादियों के द्वारा किसी न किसी रूप में काम में लिया जाता है। हममे से हर कोई प्रतिदिन भौतिक विश्व की परिघटनाओं के संपर्क में आता है और पाता है कि संप्रत्ययों – मोटर, स्विच, विद्युत धारा, टेलीविज़न, उद्योग, मूल्य, श्रम उत्पादिता, आक्सीजन, जीवाणु, आदि-आदि के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। इनमें से कोई भी संप्रत्यय हमने स्वयं अपने अनुभव के आधार पर नहीं बनाया है। इनके बारे में हमने अपने शिक्षकों, किताबों, इत्यादि से जाना है। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाये कि ये संप्रत्यय अनुभव की उपज नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क में किसी भी अनुभव से पहले ही विद्यमान थे? निस्संदेह, नहीं। यद्यपि हमने और अपने ही अनुभव से किसी संप्रत्यय की रचना नहीं की है, किंतु हमसे बहुत पहले अन्य लोगों ने अपने अनुभव से उनकी रचना अवश्य की थी और बाद में और लोगों ने नये अनुभव-दत्तों के आधार पर उनमें कुछ और जोड़ा, सटीक बनाया और आगे विकास किया।

इस प्रकार जब हम कहते हैं कि हम जीवन में बने-बनाये संप्रत्यय इस्तेमाल करते हैं, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वे किसी के भी अनुभव का परिणाम नहीं हैं। लोगों द्वारा बने-बनाये संप्रत्ययों का इस्तेमाल उनके अनुभवेतर ( beyond experience ) मूल का प्रमाण नहीं है। इसके उलट इसके प्रबल प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि सभी प्रवर्गॊं का स्रोत ( source, origin ) अनुभव है।

यदि सभी प्रवर्ग मानव मस्तिष्क में मानवजाति के आविर्भाव ( emersion ) के क्षण से ही मौजूद होते, तो वे उन जनजातियों के चिंतन में भी पाये जाने चाहिए, जो आदिम ( primitive ) गोत्रात्मक व्यवस्था के चरणों में अभी भी विद्यमान हैं। किंतु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। जैसे कि न्यू गिनी के पपुआ लोग अनेक प्रवर्गों को नहीं जानते, यद्यपि कार्य और कारण, इत्यादि कुछ प्रवर्गों से वे परिचित थे। मालों के विनिमय ( exchange of goods ) के समय वे उन्हें एक दूसरे के सामने रखते थे, क्योंकि उन्हें गिनना नहीं आता था। न केवल परिमाण ( quantity ) का प्रवर्ग, अपितु संख्या ( number ) का प्रवर्ग भी उनके लिए अपरिचित था। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि बहुत सी आदिम जातियों को न ऐसा अनुभव था और न संख्या का ज्ञान ही, परिमाण और पदार्थ जैसे प्रवर्गों की जानकारी तो और भी दूर की बात है।

दूसरे, यदि प्रवर्ग अनुभव से पहले ही मस्तिष्क में होते, तो बच्चे को भी उनका ज्ञान होना चाहिए था। किंतु वास्तविकता तो यह है कि दो वर्षीय बच्चा बहुत से दूसरे संप्रत्ययों को सीख-जान जाने के बावजूद संख्या के संप्रत्यय ( और इसलिए परिमाण के संप्रत्यय से भी ) से परिचित नहीं होता। ये तथ्य अकाट्यतः प्रमाणित करते हैं कि अन्य सभी संप्रत्ययों की भांति प्रवर्ग भी अनुभव की उपज होते हैं, कि कुछ प्रवर्ग पहले पैदा होते हैं और कुछ बाद में और इसलिए उनकी संख्या स्थायी कतई नहीं है। निस्संदेह, नये प्रवर्गों की उत्पत्ति में संकीर्ण सप्रत्ययों की अपेक्षा कई गुना समय लगता है और यह प्रक्रिया ( process ) आज भी जारी है।

इस तरह हम देखते हैं कि सामान्यतः सभी संप्रत्ययों की भांति सभी प्रवर्ग अनुभव से निकाले गये हैं और वे वास्तविकता के प्रतिबिंब ( reflection, image ) हैं। इन अत्यधिक व्यापक संप्रत्ययों की विशिष्टता यह है कि वे यथार्थ वास्तविकता के लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं, जो ब्रह्मांड की कुछेक नहीं, अपितु सभी परघटनाओं में पाये जाते हैं। इसीलिए इन मूल व्यापक संप्रत्ययों यानि प्रवर्गों का इतना बड़ा संज्ञानकारी महत्त्व है। प्रवर्ग, मनुष्य के समक्ष फैले हुए प्रकृति की परिघटनाओं के जाल में पृथक्करण ( segregation ), अर्थात विश्व के संज्ञान के चरण हैं और इस जाल के वे मुख्य बिंदु हैं जो उसे जानने और उसपर काबू पाने में मनुष्य की मदद करते हैं।

प्रवर्गों का भी विकास होता है और सभी प्रवर्ग परस्पर संबद्ध ( associated ) भी होते हैं, क्योंकि वे परिवेशी विश्व की, जिसकी सभी परिघटनाएं मिलकर एक समष्टि ( a whole ) बनाती हैं, विभिन्न प्रक्रियाओं, पक्षों और लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं। यहां हम अगली बार से भौतिकवादी द्वंद्ववाद के कुछ प्रमुख प्रवर्गों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम’ का सार प्रस्तुत किया था, इस बार हम ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग” पर चर्चा शुरू करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्रवर्ग होते क्या हैं ?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
( categories of materialistic dialectics )

भौतिकवादी द्वंद्ववाद, विकासमान वास्तविकता ( developing reality ) के सर्वाधिक सामान्य और महत्त्वपूर्ण संयोजनों को व्यक्त करनेवाले उसूलों ( principles ) और नियमों ( laws ) तक ही सीमित नहीं है। यह भौतिक जगत और संज्ञान ( cognition ) के विकास के उन अनिवार्य संयोजनों और पक्षों का भी अध्ययन करता है, जो दार्शनिक प्रवर्गों ( philosophical categories ) में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रवर्ग ( category ) क्या है?

6a00d8341c66f153ef011570914f04970b-500wiआइये थोड़ा विस्तार से समझते हैं। उपग्रह पृथ्वी का ही नहीं होता ( पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा है ), सौरमण्डल के अन्य ग्रहों के भी अपने उपग्रह हैं। उदाहरण के लिए, शनि के नौ उपग्रह हैं, जिनमें सबसे बड़ा टाइटन है। शनि का उपग्रह होने के नाते टाइटन को सौरमण्डल के ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में और इसीलिए नक्षत्रों के गिर्द घूमनेवाले ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में भी गिना जा सकता है। फिर स्वयं उपग्रह कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड हैं और जैसा ज्ञात है कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड सामान्यतः अंतरिक्षीय पिण्डों का ही एक हिस्सा है। इस तरह उत्तरोतर व्यापक संप्रत्ययों ( concepts ) की ओर बढ़ने पर हम एक श्रृंखला बनती देखते हैं, जिसकी हर अगली कड़ी ( संप्रत्यय ) पहली से अधिक व्यापक है : टाइटन –> शनि का उपग्रह –> सौरमण्डल के ग्रह का उपग्रह –> ग्रह का उपग्रह –> कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड –> अंतरिक्षीय पिण्ड –> भौतिक पिण्ड –> पदार्थ।

एक अन्य संप्रत्यय लें – गेंहूं। गेंहूं अनाज है और सभी अनाज एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियां हैं, जो द्विबीजपत्री वनस्पतियों के साथ आवृत्तबीजियों का वर्ग बनाती हैं। आवृत्तबीजी और अनावृत्तबीजी, दोनों बीजधारी वनस्पतियों के वर्ग में शामिल हैं, जो स्वयं सामान्यतः वनस्पतियों का ( जिनमें बीजधारी और बीजरहित, सभी वनस्पतियां शामिल हैं ) अंग हैं। यहां व्यापकतर संप्रत्यय की ओर बढ़ने का क्रम इस प्रकार है : गेंहूं –> अनाज –> एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पति –> आवृत्तबीजी वनस्पति –> अवयवी –> स्वनियंत्रित तंत्र –> भौतिक पिण्ड –> पदार्थ।

इस तरह हम देख सकते हैं कि सभी संप्रत्यय ऐसी ही श्रृंखलाओं की कड़ियां हैं और ये श्रृंखलाएं आपस में संबद्ध ( associated ) होती हैं। चूंकि गेंहूं अनाज है, इसलिए ‘गेंहूं’ संप्रत्यय में अनाज के सभी लक्षण और इसके साथ ही केवल गेंहूं में पाये जानेवाले लक्षण ( जो उसे अन्य अनाजों से भिन्न बनाते हैं ) शामिल हैं। इसी तरह ‘अनाज’ संप्रत्यय में एकबीजपत्री आवृत्तबीजियों के लक्षणों के साथ-साथ उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो अनाजों को शेष एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियों से भिन्न बनाते हैं।

यही बात अन्य संप्रत्ययों पर भी लागू होती है : अधिक व्यापक संप्रत्यय का अर्थ अधिक संकीर्ण संप्रत्यय के अर्थ में पूर्णतः शामिल होता है। इसके अलावा अधिक संकीर्ण संप्रत्यय में उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो इस उपवर्ग को, उस व्यापक वर्ग के ( जिसमें यह शामिल है ) अन्य उपवर्गों से भिन्न बनाते हैं। इसीलिए, उदाहरणार्थ, अवयवी ( organism ) के लक्षणों की कल्पना सभी वनस्पतियों ( अब तक पांच लाख से अधिक वनस्पतियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में और सभी जीवों ( उनकी दस लाख से अधिक जातियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में की जाती है। किंतु भौतिक वस्तुओं से संबंधित सभी संप्रत्ययों में ‘पदार्थ’ ( matter ) के संप्रत्यय का विशिष्ट स्थान है। चूंकि यह सबसे अधिक व्यापक, अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय है, इसलिए उसका अर्थ जीवों और अजीवों, प्राकृतिक और मनुष्यनिर्मित कृत्रिम भौतिक वस्तुओं से संबंधित करोड़ों विविध संप्रत्ययों में शामिल किया जाता है।

पदार्थ ही ऐसा एकमात्र अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय नहीं है, जिसकी परिधि में सभी ज्ञात संकीर्णतर संप्रत्यय आते हों। दर्शनशास्त्र के अनुसार अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय निम्न हैं : पदार्थ और चेतना, गति और गतिशून्यता, सामान्य और विशिष्ट, सार और परिघटना, गुण और परिमाण, क्रमभंग और सातत्य, कार्य और कारण, अनिवार्यता और संयोग, संभावना और वास्तविकता, अंतर्वस्तु और रूप, ढांचा और प्रकार्य, आदि-आदि। यही अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय ही दार्शनिक प्रवर्ग कहलाते हैं। हर प्रवर्ग में विशाल संख्या में संकीर्णतर संप्रत्यय शामिल होते हैं, और यदि सभी प्रवर्गों को एक साथ लिया जाये, तो उनकी परिधि में मानवजाति को ज्ञात सभी संप्रत्यय आ जायेंगे।

यहां यह बात भी समझने की है कि सामान्यतः प्रवर्ग इस या अन्य विज्ञान की आधार संकल्पनाएं ( basic concepts ) होते हैं। मसलन, द्रव्यमान, ऊर्जा और आवेश भौतिकी के प्रवर्ग हैं, इसी तरह उत्पादन के संबंध, पण्य ( commodity ) और मूल्य राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रवर्ग हैं, आदि-आदि। किंतु दार्शनिक प्रवर्गों की अपनी विशेषता यह है कि वे सर्वाधिक सामान्य संकल्पनाएं होते हैं। उनका सह-संबंध ( correlation ) सार्विक नियमों ( universal laws ) तथा घटनाओं के बीच स्थायी संयोजनों ( permanent connections ) को व्यक्त करता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

दर्शन : संकल्पनाएं और प्रवर्ग

हे मानवश्रेष्ठों,
दार्शनिक शब्दावलियों, संकल्पनाओं से परिचय की इस श्रृंखला में आज कुछ और संकल्पनाओं से परिचय करते हैं। उनकी निश्चित परिभाषाओं से गुजरते हैं।

जब मनुष्य अपनी संवेदनाओं और ज्ञान को समृद्ध करता है तो उसकी भाषा में जटिल परिस्थितियों और क्रियाकलापों के लिए थोडे़ क्लिष्ट शब्द जुड़ते चले जाते हैं, क्योंकि पारंपरिक सरल शब्दावली इनका सही और सुनिश्चित परावर्तन करने में सक्षम नहीं रह जाती। कई बार मनुष्य, बिना इनका सही अर्थ समझे, क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग प्रचलन के अंतर्गत करने लगते हैं और अपने विचारों का सटीक निरूपण नहीं कर पाते।

चलिए संकल्पना शब्द से ही शुरू करते हैं
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जब मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन की कुछ घटनाओं या सार्वजनिक मामलों के बारे में बहस करते हैं या किसी समस्या पर सोच-विचार करते हैं, तो वे संकल्पनाओं के जरिए अपने इरादों, इच्छाओं और विचारों को व्यक्त करते हैं। सामान्य जीवन में मनुष्य ‘शिशु’, ‘मकान’, ‘जूते’, ‘टेलीविजन’, आदि संकल्पनाओं का उपयोग करते हैं, उद्योग में ‘मशीन’, ‘श्रमिक’, ‘उत्पाद’ आदि संकल्पनाओं का प्रयोग होता है, इनके अलावा विशिष्ट वैज्ञानिक संकल्पनाएं भी हैं जैसे ‘इलैक्ट्रोन’, ‘रासायनिक क्रिया’, आदि।

प्रत्येक संकल्पना एक अलग शब्द या शब्दों के योग से व्यक्त की जाती है जो बाह्य जगत की वस्तुओं या प्रक्रियाओं को सामान्यीकृत करते हैं। ये वस्तुएं और प्रक्रियाएं संकल्पना के आशय हैं और जो लक्षण उनके महत्वपूर्ण अनुगुणों का वर्णन करते हैं तथा जिनसे हम उन्हें अन्य वस्तुओं या प्रक्रियाओं से विभेदित करते हैं, वे संकल्पनाओं के गुणार्थ हैं।

जैसे “मनुष्य” संकल्पना का आशय जीवित मनुष्यों का संपूर्ण समुदाय है तथा इसका गुणार्थ इस पद से व्यक्त किया जा सकता है: एक बुद्धिसंपन्न सामाजिक प्राणी, जो श्रम औजारों की मदद से अन्य श्रम औजारों तथा विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने और प्रकृति में बदलाव करने में समर्थ है।
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दर्शन की भी ऐसी ही विशेष संकल्पनाएं हैं, जिन्हें दार्शनिक प्रवर्ग या केवल प्रवर्ग कहते हैं। प्रवर्गों तथा अन्य वैज्ञानिक व दैनिक जीवन की संकल्पनाओं के बीच मुख्य अंतर यह है कि प्रवर्गों का आशय अत्यंत व्यापक होता है। दार्शनिक प्रवर्ग मनुष्य के गिर्द विश्व की सारी घटनाओं से संबंधित होते हैं।

चूंकि प्रवर्ग अत्यंत व्यापक, सर्वसमावेशी, सार्विक संकल्पनाएं हैं जो प्रकृति, समाज और चिंतन में अस्तित्व, गति तथा घटनाओं के विकास की सामान्य, सार्विक दशाओं को व्यक्त करती हैं, अतएव इनका सुपरिभाषित होना अत्यंत आवश्यक है।

यदि कोई संकल्पना सही-सही परिभाषित नहीं है, या तो बहुत व्यापक है या बहुत संकीर्ण, और उसका अर्थ या तो विसरित है या अस्पष्ट, तो उसका आशय निश्चित नहीं किया जा सकता है। ऐसी संकल्पनाओं को वैज्ञानिक, व्यावहारिक और सामाजिक क्रिया-कलाप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वे गलतियों तथा उलझन की तरफ़ ले जाती हैं।

अतएव दर्शन की, दुनिया की सही समझ को विकसित करने के लिए यह जरूरी है कि सर्वप्रथम उसकी संकल्पनाओं और प्रवर्गों को ठीक-ठीक परिभाषित किया जाए और उन्हें सटीक बनाया जाए। इनमें सबसे महत्वपूर्ण और व्यापकतम प्रवर्ग हैं “भूतद्रव्य” और “चेतना”, जिन्हें लेकर दर्शन के बुनियादी सवाल को पिछली पोस्टों में निरूपित किया गया था।
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उपरोक्त बात सामान्य ज़िंदगी में भी लागू होती है, मनु्ष्य की भाषा में प्रयुक्त संकल्पनाएं जितना ही सुपरिभाषित और स्पष्ट होंगी, उसकी समझ और दृष्टिकोण भी उतना ही स्पष्ट और सटीक होगा।

सामन्यतयः प्रचलित चलताऊ प्रवृत्तियों में संकल्पनाओं को जब सुपरिभाषित नहीं किया जाता तो कैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती है, इसका अंदाज़ा वर्तमान भारतीय परिवेश में आसानी से लगाया जा सकता है।

जैसे कि यहां, ‘धर्म’, ‘आत्मा’, ‘हिंदुत्व’, साम्प्रदायिकता’, ‘धर्मनिरपेक्षता’, ‘भौतिकवादी’, ‘ आदर्शवादी’, ‘ज्ञान’, ‘अध्यात्म’, ‘राष्ट्र’ आदि-आदि कई संकल्पनाओं के संदर्भ में होता है। सामान्य जीवन में इनका सुपरिभाषित रूप पहुंच में नहीं है, यूं भी कहा जा सकता है कि इनका सुपरिभाषित रूप उपलब्ध ही नहीं है, अतएव अधिकतर लोग अपने मंतव्यों के हितार्थ इनका मनचाहा आशय निकालते हैं, विभिन्न-विभिन्न रूप से व्याख्यायित करते हैं और अपनी तद्‍अनुकूल दुकानदारी चलाते हैं। इनके मामलों में सबकी अपनी-अपनी अनुकूलित समझ है, और अक्सर इनको सार्विक रूप से परिभाषित नहीं किया जाता। ऐसी परिस्थितियों में प्रभुत्व प्राप्त या प्रभुत्व आकांक्षी व्यक्तियों या समूहों द्वारा आम जन को बरगलाया जाना आसान हो जाता है। यहां समय सिर्फ़ इशारा कर रहा है, बाकि स्वयं ही समझा जा सकता है।
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आज इतना ही।
अगली बार हम उपरोक्त प्रवर्गों पर ही अपनी चर्चा आगे बढ़ाएंगे।

संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय