प्रत्ययवाद/भाववाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ें

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ों को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ें
( the epistemological roots of idealism )

25-14-1-11-23-53-45mजब संकल्पना ( concept ) के निर्माण करने में समर्थ रचनात्मक क्रियाकलाप, वस्तुओं के वस्तुगत अनुगुणों ( objective properties ) तथा संबंधों के विरुद्ध आ टकराता है, तो अपकर्षण/अमूर्तकरण ( abstraction ) की प्रक्रिया के दौरान ऐसी असत्य संकल्पनाएं बन सकती हैं, जो वस्तुगत यथार्थता ( reality ) को विरूपित ( distorted ), त्रुटिपूर्ण ढंग से परावर्तित करती हैं। ऐसी संकल्पनाओं के पैदा होने की संभावना हमेशा मौजूद रहती है और कुछ दशाओं में यह प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) की ओर पहुंचा सकती हैं।

बेशक, प्रत्येक असत्य संकल्पना या अपकर्षण में होनेवाली हर ग़लती प्रत्ययवाद की ओर नहीं ले जाती। संकल्पनाएं ‘हरी बिल्ली’ या ‘दयालु त्रिभुज’ महज निर्रथक ( senseless ) हैं। वास्तविकता में उनके अनुरूप कुछ नहीं होता है। जो लक्षण या अनुगुण वास्तविकता से असंबद्ध है, उन्हें ग़लत ढंग से परस्पर चस्पां कर दिया गया है। जो संकल्पनाएं, वस्तुगत यथार्थता में विद्यमान पृथक अनुगुणों के स्वयं यथार्थता से,  अधिभूतवादी विलगाव ( metaphysical separation ) के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं, वे प्रत्ययवाद की ओर पहुंचाती हैं। यानी जब वस्तुओं से संबद्ध अनुगुणों को, वस्तुओं से अलग कर दिया जाता है फिर उसे पृथक रूप से विस्तारित या अतिरंजित ( exaggerated ) बना कर, ऐसी संकल्पना में आबद्ध कर दिया जा सकता है जो कि यथार्थ को ग़लत तरीक़े से पेश करती हैं, या एक अयथार्थ कल्पनालोक ( mythological fantasy ) को अभिव्यक्त करती हैं।

किसी व्यक्ति में जीवन की प्रत्याशा ( expectation ) कम या ज़्यादा हो सकती है, वह विभिन्न बातों के बारे में कम या ज़्यादा जानकार हो सकता है, उसमें निश्चित शारीरिक बल होता है, आदि। किंतु एक सर्वज्ञ ( omniscient ), सर्वशक्तिमान, अमर सत्व ( immortal being ) – ईश्वर – की अतिकाल्पनिक संकल्पना की उत्पत्ति के लिए, जानकारी या बलशालिता के अनुगुण को, या जीवन की प्रत्याशा को वास्तविक लोगों से पृथक करना, पराकाष्ठा ( extreme ) तक अतिरंजित तथा विस्तारित ( inflate ) करना काफ़ी है। इसी प्रकार, भूतद्रव्य ( matter ) से स्वतंत्र ( independent ) तथा उसके मुक़ाबले में खड़ी, गति और ऊर्जा की संकल्पनाओं के उत्पन्न होने के लिए, गतिमान भूतद्रव्य का अध्ययन करते समय गति को भौतिक पिंड़ों से पृथक करना, पदार्थ को ऊर्जा के मुक़ाबले खड़ा करना और काल ( time ) को देश ( space ) से पृथक करना पर्याप्त है ; और यह ‘भौतिक’ प्रत्ययवाद की ओर, इस मत की ओर सीधा क़दम है कि भौतिक जगत ग़ायब हो सकता है और उस का अस्तित्व नहीं रह जायेगा, जबकि ऊर्जा उसके बिना भी भी अस्तित्वमान और शाश्वत रहेगी ; जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ऊर्जा अभौतिक ( immaterial ) है, यानी प्रत्ययिक ( ideal ) है।

प्रत्ययवाद की ज्ञानमीमांसीय, यानी संज्ञानात्मक जड़ें इस बात में निहित हैं कि संज्ञान ( cognition ) की जटिल ( complex ), द्वंद्वात्मक प्रक्रिया ( dialectical process ) में ऐसी सरलीकृत असत्य प्रविधियां ( techniques ) पैदा हो सकती हैं, जिनसे ऐसी संकल्पनाएं बन सकती हैं, जो यथार्थता को विरूपित ढंग से परावर्तित ( reflect ) करती हैं और यह सोचना संभव बना देती हैं कि विचार ( ideas ) और संकल्पनाएं ख़ुद भूतद्रव्य से स्वतंत्र रूप में विद्यमान ( exist ) होती हैं या उससे भी पहले विद्यमान थीं।

परंतु ज्ञानमीमांसीय जड़ें किसी भी हालत में स्वयं अपने आप प्रत्ययवाद की ओर अवश्यमेवतः नहीं ले जाती। यह प्रत्ययवाद की केवल एक संभावना ( possibility ) है। प्रत्ययवाद के वस्तुतः ( actually ) उत्पन्न तथा घनीभूत ( consolidated ) होने के लिए निश्चित सामाजिक दशाओं और निश्चित वर्गों ( classes ) और समूहों ( groups ) का होना जरूरी है जिन्हें अपने वर्ग के प्रभुत्व ( dominance ) के आधार के रूप में प्रत्ययवादी विश्वदृष्टिकोण ( idealistic world outlook ) में दिलचस्पी होती है। इन दशाओं को प्रत्ययवाद की सामाजिक जड़े ( social roots of idealism ) कहते हैं।

अलंकारिक भाषा ( figurative language ) में ऐसा कहा जा सकता है कि प्रत्ययवाद, ज्ञान के जीवंत वृक्ष ( living tree ) पर होनेवाला एक बंध्या फूल ( sterile flower ) है ( जिसे सामाजिक व ज्ञानमीमांसीय दोनों जड़ों की जरूरत होती है )। प्रत्ययवाद की सामाजिक जड़ों का नाश, सामाजिक जीवन के रूपांतरण ( transformation ) के ज़रिये ही किया जा सकता है जिसमें कि इसकी ज्ञानमीमांसीय जड़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष ( struggle ) अग्रभूमि पर रहे। इनके समूल नाश के लिए, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और संज्ञान के द्वंद्ववादी सिद्धांत में सक्रियता ( actively ) और सचेतनता ( consciously ) से पारंगति हासिल करना आवश्यक है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -२

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान सिद्धांत पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -२
( theory of knowledge by classical idealism – 2 )

img_2689काण्ट का दर्शन अंतर्विरोधों ( contradictions ) से भरपूर था। एक ओर, प्रकृतिविज्ञान के सामने झुकते हुए वह यथार्थ ( real ) वस्तु-निजरूपों के अस्तित्व ( existence ) को स्वीकार करते थे और उन्हें अनुभूतियों का स्रोत ( source ) मानते थे। मगर दूसरी ओर, तर्कबुद्धिवाद के सिद्धांतों पर अडिग रहने की कोशिश में वह इस बात से इनकार करते थे कि अनुभूतियां और इन्द्रियजन्य कल्पनाएं यथार्थ विश्व का काफ़ी-कुछ सही प्रतिबिंब करती हैं, और इसलिए वह निर्णायक स्थान संज्ञान के प्रागनुभव ( pre-experience forms ) रूपों को ही देते थे। काण्ट की ज्ञानमीमांसा ( epistemology ) की इस विरोधपूर्णता का उल्लेख करते हुए जर्मन दार्शनिक फ़्रीडरिख़ जैकोबी ( १७४३-१८१९ ) ने लिखा कि ‘वस्तु-निजरूप’ के बिना काण्ट के दर्शन में प्रवेश नहीं किया जा सकता, किंतु उसी ‘वस्तु-निजरूप’ के साथ इस दर्शन के अंदर रहा भी नहीं जा सकता।

महान जर्मन द्वंद्ववादी हेगेल ने काण्ट के दर्शन के अंतर्विरोध को ख़त्म करने और उसे अधिक सुसंगत बनाने की कोशिश में जर्मन क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान के सिद्धांत को ‘वस्तु-निजरूप’ से और उसके साथ ही प्रकृतिविज्ञान पर आधारित भौतिकवाद के तत्वों से भी पूर्ण मुक्ति दे दी। हेगेल के अनुसार, आंतरिक विरोधों से प्रेरित होकर, मानव संज्ञान निरंतर विकास करता रहता है। विश्व संज्ञेय है किंतु हमारा चिंतन, सत्ता के रहस्यों में जितना ही गहरा पैठेगा, उतना ही अधिक यह स्पष्ट होगा कि संज्ञान की प्रक्रिया की सहायता से परम चित् परिवेशी विश्व में ख़ुद अपने नियमों को उद्घाटित करता है। दूसरे शब्दों में, विश्व के संज्ञान का मतलब है उसके आध्यात्मिक, प्रात्ययिक अन्तर्य का संज्ञान करना।

मानव संज्ञान की सक्रिय और द्वंद्वात्मक प्रकृति के निरूपण में हेगेल के बहुत बड़े योगदान के बावजूद उनका संज्ञान सिद्धांत आदि से लेकर अंत तक प्रत्ययवादी ( idealistic ) था और इसलिए प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञान को वह मान्य नहीं हुआ। इसके अलावा, चूंकि हेगेल को अपने काल की भौतिकी और गणित की उपलब्धियों का भरपूर ज्ञान नहीं था, इसलिए प्रकृति विकास के नियमों के बारे में उनके निष्कर्ष प्रायः १९वीं सदी के वैज्ञानिकों की अवधारणाओं से मेल नहीं खाते थे।

प्रत्ययवादी दार्शनिक ऐसा संज्ञान सिद्धांत न बना सके, जो सैद्धांतिक और प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञानों की आवश्यकताओं और निष्कर्षों के अनुरूप होता। ऐसा सिद्धांत तत्कालीन भौतिकवादी ( materialistic ) दार्शनिक भी न बना पाये, यद्यपि उनके बीच कई प्रतिभाशाली विचारक थे। व्यापक प्रसार तथा विज्ञान और संस्कृति के विकास पर अपने बड़े प्रभाव के बावजूद ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ ( dialectical materialism ) से पूर्व का भौतिकवाद भी संज्ञान प्रक्रिया की समझ के मामले में कई दोषों से मुक्त नहीं था।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -१

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान विषयक तर्कबुद्धिवाद के विचारों पर संक्षिप्त विवेचना प्रस्तुत की थी, इस बार हम क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान सिद्धांत पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -१
( theory of knowledge by classical idealism – 1 )

56-185987-cobra-4अज्ञेयवाद ( agnosticism ) और तर्कबुद्धिवाद ( rationalism ) में से कोई भी संज्ञान का एकीभूत, संपूर्ण चित्र प्रस्तुत न कर सका। दोनों में से प्रत्येक ने अनुभूति ( sensation ) या तर्कबुद्धि ( reason ) के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में रखा और उस संबंध को अनदेखा किया, जो संज्ञान की प्रक्रिया में इन दोनों पहलुओं ( aspects ) के बीच मौजूद रहता है।

उदाहरण के लिए, भौतिकीवेत्ता यंत्र की मापनी पर सूई के इन्द्रियगोचर दोलनों ( sensible oscillations ) को देखते हुए उन्हें विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र के परिवर्तनों ( changes ) से जोड़ता है और इस तरह तार्किक व्याख्या ( logical explanation ) और दृश्यानुभूति ( visual sensation ) को एकीभूत प्रक्रिया में संयुक्त ( unified ) बनाता है। किंतु जो संज्ञान की प्रक्रिया के अनुभूतिमूलक ( sense-oriented ) और तर्कमूलक ( logic-oriented ) पक्षों को एक दूसरे के मुक़ाबले में रखता है, वह संज्ञान की प्रक्रिया ( process of cognition ) का अति सरलीकरण करता है और संज्ञानकारी कार्यकलाप की असली तथा जटिल प्रकृति को बिगाड़कर दिखाता है।

जर्मन क्लासिकी प्रत्ययवाद के प्रवर्तक एमानुएल काण्ट ने अज्ञेयवाद और तर्कबुद्धिवाद के वैपरीत्य ( contrariety ) को ख़त्मकर संज्ञान सिद्धांत को तत्कालीन प्रकृतिविज्ञान और गणित के निष्कर्षों के अनुरूप बनाने की कोशिश की थी। जैसा कि ज्ञात है, प्राकृतिक विज्ञान प्रेक्षणों और प्रयोगों का सहारा लेता है। किंतु इस तरीक़े से पाया गया ज्ञान परिवेशी विश्व की घटनाओं के बाह्य, परिवर्तनशील और सांयोगिक पक्ष की ही सूचना देता है।

काण्ट के शब्दों का इस्तेमाल करें, तो बाह्य, प्रतीयमान और दृश्य पक्ष अर्थात परिघटना के पीछे यथार्थ वस्तुएं या ‘वस्तु-निजरूप’ ( ‘thing in itself’ ) छिपे होते हैं। ये वस्तु-निजरूप ही परिघटनाओं ( phenomena ) को जन्म देते हैं। किंतु परिघटना और वस्तु-निजरूप के बीच बहुत बड़ी खाई है। परिघटना अनुभूतिगम्य है, जबकि वस्तु-निजरूप केवल मन ( मस्तिष्क ) द्वारा ही जाना जा सकता है। मन में अनुभवनिरपेक्ष प्रवर्ग होते हैं, जिनकी संख्या १२ है, जैसे अनिवार्यता, कारण, आदि। विज्ञान के नियमों की रचना में ये प्रवर्ग ( categories ) ही भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार काण्ट के अनुसार इन्द्रियबोध हमें वस्तु-निजरूपों की जानकारी नहीं देता और इस प्रश्न को असमाधित ( unresolved ) ही छोड़ देता है कि हम उनके अस्तित्व के बारे में कहां से जानते हैं।

काण्ट ने संज्ञान के अनुभवनिरपेक्ष या प्रागनुभव रूपों ( pre-experience forms ) में दिक् और काल ( space and time ) को भी सम्मिलित किया था, जिनकी सहायता से ही अनुभूतियों पर आधारित अनुभवसिद्ध ज्ञान को क्रमबद्ध और व्यवस्थित किया जाता है। किंतु काण्ट का दर्शन इसका कोई उत्तर नहीं दे पाता कि प्रवर्गों तथा अन्य अनुभवनिरपेक्ष रूपों को, इन्द्रिय दत्त रूपों ( sensuous forms ) के अनुरूप कैसे और क्यों बनाया जाता है। और साथ ही यह भी कि इन्द्रिय दत्त रूप, सिद्धांततः असंज्ञेय ( non-cognizable ) वस्तु-निजरूपों के बारे में क्या सूचना देते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय अविराम

द्वंद्ववाद

हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां द्वंद्ववाद पर एक श्रृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश हेतु एक संक्षिप्त भूमिका प्रस्तुत की जा रही है, अगली बार ‘द्वंद्ववाद’ संकल्पना के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा शुरू करेंगे और इस तरह से श्रृंखला चल निकलेगी।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


द्वंद्ववाद – भूमिका
( Dialectics – a preface )

dialectic_giottoमानवजाति के सर्वोत्तम चिंतक ब्रह्मांड़ को समझने, प्राकृतिक व सामाजिक प्रक्रियाओं तथा घटनाओं के नियामकों का पता लगाने के लिए शताब्दियों से प्रयत्न करते रहे। विश्व की वैज्ञानिक समझ तक पहुंचने का रास्ता लंबा और टेढ़ा-मेढ़ा था। अज्ञान के ख़िलाफ़, संज्ञान-विरोध के ख़िलाफ़, युगों-पुराने धार्मिक मतों तथा प्रत्ययवादी ( भाववादी idealistic ) दृष्टिकोणों के ख़िलाफ़ कटु संघर्ष करते हुए, मानवजाति वास्तविक ज्ञान के कणों को चुनते हुए, अपने परिवेशी विश्व, यानि प्रकृति, समाज तथा संज्ञान ( cognition ) के सच्चे वैज्ञानिक स्पष्टीकरण के निकटतर पहुंचती गई, मनुष्य के आंतरिक सार और विश्व में उसकी स्थिति की यथार्थ ( real ) और वस्तुगत ( objective ) समझ के निकटतर पहुंचती गई। आज मानवजाति के पास, संज्ञान के एक शक्तिशाली साधन के रूप में द्वंदात्मक तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद ( dialectical and historical materialism ) का दर्शन है। यह सिर्फ़ विश्व को समझने की एक कुंजी के रूप में ही नहीं, विश्व के और विशेषतः समाज के रूपांतरण की, बदलने की एक पद्धति के रूप में भी मानवजाति के हाथ में एक महत्त्वपूर्ण सैद्धांतिक उपकरण है।

दर्शन और उसके बुनियादी प्रश्नों पर हम यहां पहले ही विचार कर चुके हैं। भूतद्रव्य ( matter सरलतः पदार्थ ) और चेतना ( consciousness ) के बीच, भौतिक और प्रत्ययिक ( सरलतः वैचारिक ) के बीच के अंतर्संबंधों के सार का प्रश्न, दर्शन का बुनियादी प्रश्न है। इसके दो पक्ष या पहलू हैं, पहला विश्व के स्वरूप, उसके सारतत्व के बारे में है कि प्राथमिक क्या है – भूतद्रव्य या चेतना, कि क्या भूतद्रव्य चेतना को जन्म देता है अथवा चेतना भूतद्रव्य को। दूसरा, इस बारे में प्रश्न है कि यह विश्व संज्ञेय ( cognizable ) है या नहीं, यानि मानव मस्तिष्क अपने आस-पास के जगत को समझ सकता तथा उसके विकास के नियमों को जान सकता है अथवा नहीं। हम यहीं पर अपने पूर्व की ‘दर्शन’ वाली श्रृंखला में, इन प्रश्नों पर विस्तार से विवेचना कर चुके हैं। इन प्रश्नों के अपने उत्तरों के हिसाब से ही दर्शन की दुनिया दो खेमों में बंटी है, प्रत्ययवादी ( भाववादी, अध्यात्मवादी idealistic ) तथा भौतिकवादी ( materialistic )। भौतिकवाद प्रकृति का, आस-पास के जगत का सही और वैज्ञानिक स्पष्टीकरण देता है, लेकिन प्रत्ययवाद मिथ्या और अवैज्ञानिक।

प्रत्ययवादी दार्शनिक चेतना को प्राथमिक मानते हैं, उनके विचारों के अनुसार चेतना भूतद्रव्य से स्वाधीनतः अलग अस्तित्वमान है और वही भौतिक जगत की ‘रचना करती है’ तथा उस पर नियंत्रण रखती है, साथ ही इसकी मुख्य धाराओं के अनुसार विश्व मूलतः संज्ञेय नहीं है, या सीमित रूप से संज्ञेय है, यानि कि विश्व और इसके विकास के नियमों को जाना-समझा नहीं जा सकता, अतएव इसके बजाए वे स्वयं अपने विचारों व अनुभूतियों के तथा किसी अस्तित्वहीन अलौकिक ‘विश्वात्मा या परमात्मा’ के, किसी रहस्यमय ‘परम प्रत्यय’ आदि के संज्ञान की ओर उन्मुख होने की ओर जोर देते हैं।

भौतिकवादियों के अनुसार भूतद्रव्य शाश्वत और प्राथमिक है, चेतना इसी के ऐतिहासिक विकास का उत्पाद है, यह मनुष्य के उद्‍भव के साथ प्रकट और विकसित होती है। भूतद्रव्य चेतना से स्वतंत्र रूप से विद्यमान है, वहीं चेतना भूतद्रव्य से विलग कहीं विद्यमान नहीं हो सकती, वह भूतद्रव्य पर निर्भर है। भौतिकवाद के अनुसार विश्व संज्ञेय है, मानव मस्तिष्क परिवेशी जगत की वस्तुओं, प्रक्रियाओं तथा घटनाओं के मूलतत्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है, समझ सकता है, नियमों का संज्ञान हासिल करके इसका रूपांतरण कर सकता है, इसे बदल सकता है। विश्व के व्यावहारिक रूपांतरण में मानवजाति की उपलब्धियां सर्वोत्तम ढंग से यह दर्शाती हैं कि वह विश्व का सही ज्ञान हासिल कर रहा है और उस ज्ञान का उपयोग कर रहा है।

3 brillanti 2pasupati_15440दर्शन के मूल प्रश्न के साथ ही दार्शनिकों, वैज्ञानिकों ने एक और प्रश्न का भी उत्तर देने की हमेशा कोशिश की है। यह प्रश्न है कि विश्व को क्या हो रहा है? क्या यह सर्वदा ऐसा ही रहा है, जैसा कि आज है, या किसी प्रकार से यह प्रकट होता, बदलता, पुनर्नवीकृत तथा विकसित होता रहता है? इतिहास में इस प्रश्न के जितने भी उत्तर दिए गए हैं, वे दो विरोधी समूहों में शामिल हैं : द्वंद्वात्मक ( dialectic ) और अधिभूतवादी ( metaphysical ), इनकी दो तदनुरूप पद्धतियां द्वंद्ववाद ( dialectics ) तथा अधिभूतवाद ( metaphysics ) कहलाती हैं।

अधिभूतवाद की वकालत करनेवाले मानते हैं कि प्रथमतः, विश्व मूलतः अपरिवर्तनीय है, कि प्रकृति कभी बदलती नहीं ; और, द्वितीयतः, वस्तुओं तथा घटनाओं का एक दूसरे से संबंध नहीं होता, कि उनका अलग-अलग अस्तित्व है। वे परिवर्तन और विकास को महज़ उसकी घटती-बढ़ती मानते हैं, जो पहले से विद्यमान है। उनके लिए विकास का उद्‍गम या तो विभिन्न वस्तुओं के बाहरी टकराव में निहित है, या अलौकिक, दैवीय शक्तियों में।

विश्व के स्पष्टीकरण में द्वंद्ववाद के पक्षधर यह मानकर चलते हैं कि, पहला, सारी वस्तुएं, प्रक्रियाएं तथा घटनाएं एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं, कि वे परस्पर क्रिया करती हैं तथा एक दूसरे को दशानुकूलित करती हैं और दूसरा, कि वे अविरल गतिमान व विकासमान हैं। वे विकास को मात्रात्मक ( quantitative ) परिवर्तनों के संचयन तथा गुणात्मक ( qualitative ) परिवर्तनों में उनके रूपांतरण की प्रक्रिया के रूप में, कुछ वस्तुओं तथा घटनाओं के अन्य में रूपातंरण की शक्ल में देखते हैं, पुरातन व मरणासन्न के विनाश तथा नूतन के उद्‍भव व दृढ़ीकरण के रूप में देखते हैं। द्वंद्ववादियों के अनुसार विकास का स्रोत आंतरिक अंतर्विरोध ( contradictions ) हैं, प्रत्येक विषय तथा घटना में अंतर्निहित ( inherent ) विरोधी पक्षों या प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष है। द्वंद्ववाद यह कहता है कि प्रकृति और समाज के विकास का कारण या स्रोत बाहर से लाया नहीं जाता, बल्कि उन्हीं के अंदर निहित होता है।

द्वंद्ववाद विश्व को ठीक वैसा ही देखता है, जैसा कि वह वस्तुतः ( literally ) है। विकास की प्रक्रियाओं, उनके कारणों और रूपों का स्पष्टीकरण देते तथा नूतन की अवश्यंभावी विजय को दर्शाते हुए द्वंद्ववाद समाज के अंदर प्रगतिशील विकास ( progressive development ) के लिए निरंतर चलने वाले संघर्ष में प्रगतिशील शक्तियों की सेवा करता है। इसके विपरीत अधिभूतवाद विकास की प्रगतिशील प्रकृति और नूतन की अवश्यंभावी विजय को मान्यता नहीं देता और इस प्रकार प्रगति के ख़िलाफ़ संघर्ष में रूढ़िवादी तथा प्रतिगामी ( orthodox and regressive ) शक्तियों का हितसाधन करता है।

दैनिक जीवन, विज्ञान, तथा सामाजिक व्यवहार द्वंद्ववाद की सचाई की तथा उसे संज्ञान की वैज्ञानिक पद्धति व व्यवहार के रूप में इस्तेमाल करने की आवश्यकता की पुष्टि करते हैं। द्वंद्ववाद की जीवंतता आज के सामाजिक विकास के द्वारा सर्वोत्तम ढंग से प्रदर्शित होती है। राष्ट्रीय स्वाधीनताओं की प्राप्ति, राष्ट्रीय विकास के नियत कार्यों की पूर्ति, भौतिक व आत्मिक जीवन में गहन परिवर्तन, अनेक जनगणों का युगों पुराने पिछड़ेपन से निकलकर स्वाधीन तथा प्रगतिशील विकास के आधुनिक रूपों की ओर क़दम बढ़ाना – ये सभी इसके सुस्पष्ट उदाहरण हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

दर्शन का बुनियादी सवाल और इसकी प्रवृत्तियां

हे मानवश्रेष्ठों,
पिछली बार हमने दर्शन और विश्व को देखने के मनुष्य के नज़रिए यानि उसके विश्वदृष्टिकोण के बीच क्या संबंध होता है, इसे समझने की कोशिश की थी।
चर्चा आगे बढ़ाते हैं।
आज हम दर्शन के बुनियादी सवाल से गुजरेंगे।
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प्रत्येक विज्ञान का अपना प्रमुख बुनियादी सवाल होता है, यानि उन घटनाओं और प्रक्रियाओं का परास (range) जिनका वह अध्ययन करता है और अंत में अनुसंधान की उसकी अपनी विशेष विधि होती है। फलतः दर्शन की गहन समझ के लिए जरूरी है कि उसके बुनियादी सवाल, विषयवस्तु तथा अध्ययन-विधि को परिभाषित किया जाए।

जर्मनी के दार्शनिक इमानुएल कांट का विश्वास था कि दार्शनिक को तीन प्रश्नों का उत्तर देना ही चाहिए: “मैं क्या जान सकता हूं?”, “मुझे क्या करना चाहिए?” और “मैं किसकी उम्मीद कर सकता हूं?” आइए, यह देखें कि इन तीन प्रश्नों में कोई अधिक सामान्य प्रश्न तो छुपा नहीं है।

वास्तव में मनुष्य सीखता है, उम्मीदें करता है और केवल इसी कारण से कि वह एक मन, चेतना और संकल्प से संपन्न है और अपने इर्द-गिर्द होने वाले सब कुछ का अवबोध व व्याख्या करने में समर्थ है। मनुष्य पेशियों और तंत्रिकाओं का ढे़र मात्र नहीं है, केवल एक शरीर नहीं है, वह जैसा कि प्राचीन काल में कहा जाता था, एक “आत्मा” से भी संपन्न है। सारे विशेष प्रश्नों का उत्तर इस बात पर पूर्णतः निर्भर है कि इस मुख्य प्रश्न का उत्तर किस तरह से दिया जाता है कि आत्मा, चित्त या चेतना क्या है? यह कहां से आती है और अजैव प्रकृति से किस प्रकार जुड़ी है? परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या वह उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है?

यही दर्शन के बुनियादी सवाल का सार है। चूंकि अन्य प्राणियों से भिन्न चिंतनशील, तर्कबुद्धिसंपन्न, सचेत सत्व होने की अपनी विशेषता को लोग बहुत पहले ही जान गए थे, इसलिए विश्व के साथ मनुष्य के संबंध की समस्या को आम तौर पर इस प्रकार निरुपित किया जाता था: सत्व के साथ आसपास की वास्तविकता के या भूतद्रव्य के साथ चेतना और चिंतन का संबंध।

अतः दर्शन का मूल प्रश्न मन और प्रकृति, चेतना और पदार्थ के अंतर्संबंध का प्रश्न है। दर्शन के उपरोक्त बुनियादी सवाल के दो पक्ष हैं जिनके आधार पर दर्शन के क्षेत्र की दिशाओं का निर्धारण होता है। आइए उन्हें समझने की कोशिश करते हैं।
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दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष:

भूतद्रव्य तथा चिंतन के संबंध पर विचार व्यक्त करते समय यह समुचित प्रश्न पैदा होता है कि इनमें से प्राथमिक कौन है? निर्धारक तत्व कौनसा है? भौतिक जगत या चिंतन और चेतना? दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष यही है।

हमारा जीवन अनुभव यह दर्शाता है कि प्रत्येक ठोस मामले में इस प्रश्न का उत्तर देना बिल्कुल सहज है। मसलन, चंद्रमा की संकल्पना ( विचार ) तथा उसके कविता बिंबों के प्रकट होने से बहुत पहले ही चंद्रमा विद्यमान था। फलतः यह कहा जा सकता है भौतिक वस्तु ( चंद्रमा ) अपने वैज्ञानिक या कवित्वमय रूप की, यानि चंद्रमा के प्रत्यय ( संकल्पना ) की पूर्ववर्ती थी।

इसके विपरीत चंद्रमा पर साक्षात पदार्पण करने से पहले वहां पहुंचने की कल्पना, साधनों के अभिकल्पन ( design ) का विचार निश्चय ही पहले पैदा हुआ और इसके बाद ही इन्हें मूर्त रूप दिया जा सका। फलतः इस मामले में यह कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक प्रत्यय ( विचार ), रॉकेटों तथा स्वचालित प्रयोगशालाओं के रूप में भौतिक वस्तुओं की रचना का पूर्ववर्ती था।

यदि यह ऐसी ही स्थितियों का मामला होता, तो दर्शन के बुनियादी सवाल का पहला पक्ष निहायत ही सरल होता। लेकिन दर्शन में ऐसे सरल मामलों की पड़ताल नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के प्रति मनुष्य के रुख़ पर विचार किया जाता है। यह स्पष्ट है कि सवाल के इस पहले भाग को समझना और सार्विक रूप में व्याख्यायित करना इतना आसान नहीं है। वास्तव में यह स्पष्ट करना आवश्यक है के ब्रह्मांड़ के संपूर्ण ऐतिहासिक क्रमविकास के पैमाने पर प्राथमिक और निर्धारक है: चिंतन या भौतिक जगत, और मनुष्य के क्रियाकलाप के किसी भी रूप में निर्धारक कौन है? केवल इसी संदर्भ में यह प्रश्न सार्थक है।

इस प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिकगण दो बड़े शिविरों या प्रवृत्तियों – भौतिकवाद ( Materialism ) और प्रत्ययवाद ( Idealism ) – में बंटे हुए हैं। भौतिकवादी इस बात पर जोर देते हैं कि भूतद्रव्य, पदार्थ प्राथमिक व निर्धारिक है और चेतना द्वितीयक तथा निर्धारित है। प्रत्ययवादी ( भाववादी, आदर्शवादी पर्याय शब्द भी काम में लिए जाते हैं ) विचार, चेतना को प्राथमिक और भूतद्रव्य, पदार्थ को द्वितीयक मानते हैं।

दर्शन के इतिहास में ऐसे भी चिंतक हुए हैं, जिन्होनें एक मध्यवर्ती स्थिति अपनाने की कोशिश की। उन्होंने दोनो विश्व तत्वों , अर्थात भूतद्रव्य तथा चेतना के बीच एक प्रकार की समांतरता, स्वाधीनता तथा समानता को मान्यता दी। इन्हें द्वेतवादी कहा जाता है। द्वेतवाद का कोई स्वाधीन महत्व नहीं है क्योंकि इसके महान प्रवक्ता देर-सवेर या तो प्रत्ययवाद की स्थिति पर जा पहुंचे या भौतिकवाद की।

दर्शन के बुनियादी सवाल का दूसरा पक्ष:

जब हम भूतद्रव्य और चिंतन तथा चेतना के बीच संबंध की जांच करते हैं, तो यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या हमारा चिंतन बाह्य जगत का सही-सही संज्ञान प्राप्त कर सकता है, क्या हम अपने आसपास की घटनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में सही अंदाज़ा लगा सकते है और कि क्या हम उनके संबंध में सच्ची राह जाहिर कर सकते हैं और अपने निर्णयों तथा कथनों के आधार पर सफलतापूर्वक कर्म कर सकते हैं?

यह प्रश्न कि क्या विश्व संज्ञेय है और अगर ऐसा है, तो किस सीमा तक तथा क्या मनुष्य बिल्कुल सही या लगभग सही ढ़ंग से अपने आसपास की यथार्थता का संज्ञान प्राप्त कर सकता है, उसे समझ तथा उसकी छानबीन कर सकता है। यही दर्शन के बुनियादी सवाल का दूसरा पक्ष है।

विश्व की संज्ञेयता के प्रश्न के उत्तर के अनुसार सारे दार्शनिक दो प्रवृत्तियों में विभाजित हो जाते हैं। एक प्रवृत्ति में विश्व की संज्ञेयता के समर्थक शामिल हैं ( भौतिकवादियों तथा प्रत्ययवादियों की एक विशेष धारा, वस्तुगत प्रत्ययवादियों की एक बड़ी संख्या ) ; दूसरी प्रवृत्ति में इस संज्ञेयता के विरोधी शामिल हैं, जो यह मानते हैं कि विश्व पूर्णतः या अंशतः अज्ञेय है ( वे प्रत्ययवादियों की एक विशेष धारा, आत्मगत प्रत्ययवादी होते हैं )। विश्व की ज्ञेयता के विरोधियों को सामान्यतः अज्ञेयवादी कहते हैं।
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अधिकांश लोग साधारण जीवन के व्यवहार में स्वाभाविक तथा अचेतन रूप से भौतिकवादी होते हैं। वे ज़िंदगी के भौतिक पक्ष से भली-भांति परिचित होते हैं और अपने दैनन्दिनी कार्यकलापों में भौतिक सिंद्धांतों से परिचालित होते हैं। यह बात दीगर है कि जब जीवन से जुड़ी जिन चीज़ों में अनिश्चितता या असुरक्षा शामिल हो जाती है, तब वे पारंपरिक रूप से प्राप्त अपनी समझ के हिसाब से प्रत्ययवादी चिंतन का सहारा लेते हैं।

इसलिए समस्त भौतिकवादी गतिविधियों के बाबजूद, प्रत्ययवादी चिंतन के अस्तित्व में कोई आश्चर्य की बात नहीं है। प्रत्ययवाद के उद्‍भव का कारण सामाजिक-ऐतिहासिक परिस्थितियां हैं। प्राचीन काल में जिन प्रांरभिक दार्शनिक मतों का जन्म हुआ, वे उन दशाओं में विकसित हुए, जब धर्म का प्रभाव बहुत ही प्रबल था। अधिकांश धार्मिक मतों के अनुसार, विश्व की रचना एक ईश्वर या देवताओं के द्वारा, अभौतिक, आध्यात्मिक, सर्वशक्तिमान सत्वों के द्वारा हुई। विश्व के धार्मिक-प्रत्ययवादी स्पष्टीकरण को स्वीकारने वाले अनेक दार्शनिक मतों पर इन विचारों का निश्चित प्रभाव पड़ा था।

फिर क्या कारण है कि वर्तमान युग में जब विज्ञान तथा इंजीनियरी के विकास ने भौतिकवाद की सत्यता की अनगिनत अकाट्य पुष्टियां कर दी हैं, तब भी प्रत्ययवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है? मुद्दा यह है कि स्वयं मानव जीवन में और सामाजिक जीवन की दशाओं में प्रत्ययवाद की निश्चित जड़ें विद्यमान हैं। प्रत्ययवाद, प्रभावी वर्गों के विश्वदृष्टिकोण तथा वैचारिकी के साथ जुड़ा है और कुछ सामाजिक शक्तियों के लिए उपयोगी है, क्योंकि यह मौजूदा विश्व व्यवस्था की शाश्वतता तथा निरंतरता के पक्ष में दलीले मुहैया कराता है। यथास्थिति को बनाए रखने और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों को गैरजरूरी सिद्ध कर उनकी धार को कुंद करने के लिए कटिबद्ध होता है। यह सत्ता से नाभिनालबद्ध है इसीलिए उसे भरपूर प्रश्रय, संजीवनी और प्रचार मिलता है।
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आज के लिए काफ़ी हो गया।
अब काफ़ी आधारभूत सामग्री हो गई है जो दर्शन के अवबोध के लिए एक सुसंगत स्थिति पैदा करने में सक्षम लगती है।

अगली बार दर्शन की अध्ययन विधियों पर चर्चा करते हुए आगे बढ़ेंगे।
जिज्ञासाओं और संवाद का स्वागत है।

समय