एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष की प्रत्यक्षकर्ता पर निर्भरता पर विचार किया था, इस बार हम एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


एक क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष

प्रत्यक्ष में प्रेरक-घटकों की भूमिका

( role of motivational components in perception )

प्रत्यक्ष एक विशेष प्रकार की क्रिया है, जिसका लक्ष्य वस्तु का अन्वेषण ( exploration ) तथा उसका समेकित परावर्तन है। प्रत्यक्ष का एक अनिवार्य घटक ( component ) गतिशीलता है। वस्तु को हाथ से अनुभव करना, उसकी दृश्य रूपरेखा पर नज़र दौड़ाना, कंठ से ध्वनि निकालना गतिपरक क्रियाओं की मिसालें है।

स्पर्श की क्रिया में प्रेरक-घटकों की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है। ज्ञात है कि मनुष्य के शरीर के सारी त्वचा में निष्क्रिय ( passive ) स्पर्श की क्षमता होती है। किंतु अधिकतम प्रभावी सक्रिय ( active ) स्पर्श होता है और वह हाथ की त्वचा की एक विशेषता है। इसीलिए किसी भी वस्तु की सतह पर हाथ की गति उसका पूर्ण परावर्तन सुनिश्चित करती है। आंख और हाथ के कार्यों में काफ़ी समानता है। हाथ की भांति आंख भी चित्र अथवा वस्तु की रूपरेखा को जांचती और ‘टटोलती’ है। देखते समय आंख की और टटोलते समय हाथ की गतिपरक प्रतिक्रियाएं प्रयोजन की दृष्टि से बिल्कुल समान है। हाथ आंख को अन्वेषण की प्रणाली, कार्यनीति और व्यूहनीति सिखाता है।

स्पर्श की प्रक्रिया में हाथ की गतियों और देखने की प्रक्रिया में आंख की गतियों के विश्लेषण ने दिखाया है कि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में खोजने, रखने तथा सही करने से संबंधित गतियां आती हैं, जिनके ज़रिए हाथ प्रत्यक्ष की दत्त वस्तु को खोजता, अपने को ‘मूल स्थिति’ में रखता और इस स्थिति को सही करता है ( ऐसा ही आंख के साथ भी होता है )। दूसरी श्रेणी में बिंब के निर्माण, वस्तु की अवस्थिति ( location ) के निर्धारण, परिचित वस्तुओं की पहचान, आदि में भाग लेने वाली गतियां आती हैं। इन्हें संज्ञानात्मक गतियां या प्रात्यक्षिक क्रियाएं कहा जाता है।

मनुष्य के प्रत्यक्षमूलक बिंब की पूर्णता के मापदंड उसके परिवेश तथा शिक्षा पर निर्भर होते हैं और स्थिर नहीं रहते। इसकी पुष्टि, मिसाल के लिए, उन लोगों के ऑपरेशन के बाद के अनुभव से भी होती है, जो जन्म से अंधे थे और जिन्होंने बहुत वर्षों बाद अपनी आंखों का इलाज करवाया था।

१० महिने की अवस्था में अंधे हुए और ५१ वर्ष की अवस्था में जाकर पुनः दृष्टिलाभ करनेवाले एक रोगी के मामले में पाया गया कि ऑपरेशन के बाद जब उसकी आंखों से पट्टियां खोली गईं, तो उसे धुंधली रूपरेखाओं के अलावा कुछ न दिखाई दिया। उसे वस्तुओं की दुनियां वैसी नहीं दिखाई दी, जैसी हमें आंखें खोलने पर दिखाई देती है। शनैः शनैः उसकी दृष्टि लौट आई, किंतु विश्व उसे फिर भी धुंधला तथा अस्पष्ट दिखता रहा। बहुत समय तक उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष  उसके पहले के स्पर्शमूलक प्रत्यक्ष के अनुभवों तक सीमित रहा। वह आंखों से देखकर पढ़ना न सीख पाया, उसके बनाए चित्र दिखाते थे कि वह ऐसी वस्तुओं के चित्र नहीं बना सकता, जिन्हें उसने स्पर्श के ज़रिए नहीं जाना था। दृष्टिलाभ के एक वर्ष बाद भी वह किसी पेचीदी वस्तु का चित्र तब तक नहीं बना सकता था, जब तक पहले उसे हाथ से पूरी तरह टटोल न ले।

इस तरह के अनुभव बताते है कि प्रत्यक्ष की क्षमता केवल सीखने से आती है। प्रत्यक्ष प्रात्यक्षिक क्रियाओं की पद्धति है और ऐसी क्रियाएं सीखने के लिए विशेष प्रशिक्षण तथा अभ्यास की आवश्यकता होती है।

प्रेक्षण

( observation )

प्रेक्षण ( observation ) ऐच्छिक प्रत्यक्ष का एक महत्त्वपूर्ण रूप और बाह्य विश्व की वस्तुओं तथा परिघटनाओं का सोद्देश्य तथा सुनियोजित अवबोधन है। प्रेक्षण में प्रत्यक्ष एक स्वतंत्र क्रिया का रूप ले लेता है। प्रेक्षण के लिए मनुष्य को अपनी स्पर्श, दृष्टि, श्रवण, आदि इंद्रियों का बखूबी इस्तेमाल करना आना चाहिए। हम प्रायः विदेशी भाषा की अलग-अलग ध्वनियों के बीच भेद नहीं करते, संगीत रचना में ग़लत सुर को नहीं देखते। प्रेक्षण सीखा जा सकता है और ज़रूर सीखा जाना चाहिए। परिष्कृत वाक् ( refined speech ) जैसे परिष्कृत प्रत्यक्ष तथा प्रेक्षण भी हो सकते हैं। इस संबंध में एक मानवश्रेष्ठ ने जो कि प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी थे, कहा है: ‘देख पाना आपके अपने हाथ में है। इसके लिए आपको अपनी आंखों पर बस वह जादू की छड़ी घुमानी होगी, जिसपर लिखा है: मैं जानता हूं कि मैं क्या देख रहा हूं।’

सचमुच प्रेक्षण में सफलता काफ़ी हद तक अपने कार्यभार ( assignment ) के स्पष्ट निर्धारण पर निर्भर होती है। प्रेक्षक को एक क़ुतुबनुमा ( compass ) की आवश्यकता होती है, जो उसे प्रेक्षण की दिशा दिखा सके। कार्यभार अथवा प्रेक्षण की योजना ऐसी ही क़ुतुबनुमा है।

प्रेक्षण में प्रारंभिक तैयारी और प्रेक्षक का विगत अनुभव तथा ज्ञान बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मनुष्य जितना ही अनुभवी तथा जानकार होगा, उसका प्रत्यक्ष उतना ही पूर्ण होगा। अपने छात्रों की सक्रियता का संगठन व निदेशन करते हुए शिक्षक को प्रेक्षण के इन नियमों को ध्यान में रखना चाहिए। छात्र नई सामग्री को समझ सकें, यह सुनिश्चित करने के लिए शिक्षक को उन्हें इसके लिए तैयार करना, उनके विगत अनुभव को सक्रिय बनाना, इसे नई सामग्री से जोड़ने में उनकी मदद करना और उनके सामने नये कार्यभार रखकर उनके ध्यान को उस दिशा में प्रवृत्त करना चाहिए। प्रेक्षण को किसी निश्चित दिशा में मोड़ने और नई सामग्री में पैठ बनाने का एक अन्य ज़रिया शिक्षण में दॄश्यता (visualization) के सिद्धांत को अधिकतम लागू करना है।

शिक्षण में दॄश्यता शिक्षक के शब्दों के साथ विशेष साधनों ( दृश्य सामग्री, विशेष उपकरण, निदर्शन ( simile ), यात्राएं व भ्रमण, आदि ) का संयोजन करके हासिल की जाती हैं। आजकल नई जानकारी के आत्मसात्करण में दृश्यता सिद्धांत के इस तरह के क्रियान्वयन से बेहतर परिणाम हासिल करने के कई नये पहलू सामने आ रहे हैं। शिक्षण को यों संगठित किया जाना चाहिए वह छात्र की ओर से चिंतन की एक सक्रिय प्रक्रिया हो। इस सक्रियता का परिणाम छात्रों द्वारा नई सामग्री का आत्मसात्करण होता है और यही शिक्षण का लक्ष्य भी है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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प्रत्यक्ष की निर्भरता ( dependence of perception )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष की स्थिरता और सार्थकता पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष की प्रत्यक्षकर्ता पर निर्भरता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रत्यक्ष की निर्भरता
( dependence of perception )

प्रत्यक्ष क्षोभकों पर ही नहीं, प्रत्यक्षकर्ता पर भी निर्भर होता है। प्रत्यक्ष अपने आप में आंख या कान द्वारा नहीं, बल्कि एक निश्चित जीवित मनुष्य द्वारा किया जाता है। प्रत्यक्ष सदा किसी न किसी हद तक प्रत्यक्षकर्ता के व्यक्तित्व, उसकी विशेषताओं, प्रत्यक्ष की वस्तु के प्रति उसके रवैये, आवश्यकताओं, रुचियों, इच्छाओं, आकांक्षाओं तथा भावनाओं के प्रभाव को व्यक्त करता है। प्रत्यक्ष की, प्रत्यक्षकर्ता के मानसिक जीवन तथा उसके व्यक्तित्व की अंतर्वस्तु पर निर्भरता को सामान्यतः समवबोधन अथवा संप्रत्यक्ष कहते हैं

बहुसंख्य अध्ययन दिखाते हैं कि मनुष्य द्वारा देखा हुआ चित्र क्षणिक संवेदनों का योगफल नहीं होता, उसमें प्रायः ऐसी चीज़ें भी होती हैं कि जो प्रत्यक्षण के क्षण में मनुष्य के दृष्टिपटल पर होती ही नहीं, किंतु जिन्हें वह जैसे कि अपने पहले से अनुभव की वजह से देखता है।

प्रत्यक्ष एक सक्रिय प्रक्रिया है, जो मनुष्य को प्राक्कल्पनाओं ( hypothesis ) के निर्माण व जांच के लिए सामग्री प्रदान करती है। किंतु इन प्राक्कल्पनाओं की अंतर्वस्तु मनुष्य के विगत अनुभव पर निर्भर करती है। जब किसी आदमी को सीधी रेखाओं और वक्रों के कई यादृच्छिक ( random ) संयोजन दिखाए जाते हैं और पूछा जाता है कि ‘वह क्या हो सकता है ?’, तो उसके प्रत्यक्ष में शुरु से ही उन शीर्षों की खोज शामिल रहती है, जिनके अंतर्गत दत्त आकृतियों को रखा जा सकता है। उसका मस्तिष्क अनेक प्राक्कल्पनाएं पेश करता तथा जांचता है और आकृति को इस या उस श्रेणी से जोड़ने का प्रयत्न करता है।

इस प्रकार किसी भी वस्तु का प्रत्यक्ष विगत प्रत्यक्षों के निशानों को सक्रिय बनाता है। अतः यह स्वाभाविक ही है कि एक ही वस्तु का अलग-अलग मनुष्यों द्वारा अलग-अलग ढंग से प्रत्यक्ष किया जाता है। प्रत्यक्ष मनुष्य के विगत अनुभव पर निर्भर होता है। मनुष्य का अनुभव तथा ज्ञान जितना ही समृद्ध होगा, उसका प्रत्यक्ष उतना ही बहुआयामी ( multidimensional ) होगा और वस्तु में वह उसकी उतनी ही ज़्यादा विशेषताएं देखेगा।

प्रत्यक्ष की अंतर्वस्तु ( content ) भी मनुष्य के कार्यभार ( assignment ) से, उसकी सक्रियता के अभिप्रेरकों ( motives ) से निर्धारित होती है। उदाहरण के लिए, जब हम आर्केस्ट्रा द्वारा बजाई जा रही कोई संगीत रचना सुनते हैं, तो हम सारी रचना को उसकी समग्रता में और अलग-अलग वाद्ययंत्रों की ध्वनियों में भेद किये बिना ग्रहण करते हैं। किसी निश्चित वाद्ययंत्र द्वारा निभाई जानेवाली भूमिका हमारी चेतना में प्रमुखता तभी पायेगी और पृथक प्रत्यक्षण की वस्तु तभी बनेगी, जब हम अपने सामने ठीक ऐसा ही कार्यभार निश्चित करेंगे। तब और बाकी सभी कुछ प्रत्यक्ष की पृष्ठभूमि ( background ) में होगा।

इसी तरह प्रत्यक्ष की अंतर्वस्तु को प्रभावित करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण कारक प्रत्यक्षकर्ता का रवैया ( attitude ) है, साथ ही यह भी कि प्रत्यक्ष की क्रिया में भाग लेने वालों संवेगों द्वारा भी प्रत्यक्ष की अंतर्वस्तु को बदला जा सकता है। मनुष्य के विगत अनुभव, अभिप्रेरकों तथा कार्यभारों और उसकी संवेगात्मक अवस्था ( और यहां विश्वास, विश्व-दृष्टिकोण, रुचियों, आदि को भी शामिल किया जा सकता है ) का प्रभाव स्पष्टतः दिखाता है कि प्रत्यक्ष एक सक्रिय प्रक्रिया है और उसे नियंत्रित किया जा सकता है

संवेदन की भांति प्रत्यक्ष भी एक परावर्तनात्मक प्रक्रिया ( reflectional process ) है। यह अनुकूलित प्रतिवर्तों ( conditioned reflexes ) पर आधारित होता है, जो बाह्य विश्व की वस्तुओं अथवा परिघटनाओं की विश्लेषक ग्राहियों पर क्रिया के उत्तर में प्रमस्तिष्कीय गोलार्ध की प्रांतस्था में बननेवाले कालिक तंत्रिका-संबंध हैं। विश्लेषण ( analysis ) करते हुए मस्तिष्क प्रत्यक्ष की वस्तु का अभिज्ञान ( recognition ) और पृष्ठभूमि से पृथक्करण ( separation ) करता है और इसके बाद उसकी सभी विशेषताओं का एक समेकित बिंब में संश्लेषण ( synthesis ) करता है।

संवेदनों की तुलना में प्रत्यक्ष मस्तिष्क की विश्लेषणमूलक तथा संश्लेषणमूलक सक्रियता का उच्चतर रूप है। विश्लेषण के बिना सार्थक प्रत्यक्ष असंभव है। यही कारण है कि अज्ञात विदेशी भाषा उसके श्रोता को ध्वनियों की एक अनवरत धारा के अलावा कुछ नहीं लगती। उन ध्वनियों को सार्थक बनाने यानी समझ पाने के लिए उन्हें अलग-अलग वाक्यों तथा शब्दों में तोड़ना आवश्यक है। फिर भी वाक्-प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में विश्लेषण और संश्लेषण, दोनों काम साथ-साथ चलते हैं, जिससे हम पृथक असंबद्ध ध्वनियों को नहीं, बल्कि शब्दों तथा वाक्यों को ग्रहण करते तथा समझते हैं।

संवेदनों की भांति ही प्रत्यक्षों का वर्गीकरण भी प्रत्यक्षण में भाग लेने वाले विश्लेषकों के भेद पर आधारित है। यह देखते हुए कि किस प्रत्यक्ष में कौन-सा विश्लेषक मुख्य भूमिका अदा करता है, हम प्रत्यक्षों को चाक्षुष, श्रवणमूलक, स्पर्शमूलक, गतिबोधक, घ्राणमूलक और आस्वादमूलक प्रत्यक्षों में विभाजित करते हैं। सामान्यतः प्रत्यक्ष परस्परक्रिया करने वाले कई विश्लेषकों के कार्य का परिणाम होता है। गतिबोधक ( पेशीय ) संवेदन न्यूनाधिक मात्रा में सभी प्रकार के प्रत्यक्षों में भाग लेते हैं। एक ही प्रकार का प्रत्यक्ष विरले ही मिलता है। आम तौर पर सभी प्रत्यक्ष, विभिन्न प्रकार के प्रत्यक्षों का सम्मिश्रण ही होते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

प्रत्यक्ष की स्थिरता तथा सार्थकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष और उसके विशिष्ट स्वरूप पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष की स्थिरता और सार्थकता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रत्यक्ष की स्थिरता
( stability of perception )

प्रत्यक्षकर्ता से अपनी स्वतंत्रता के असंख्य स्तरों और उसके सामने अत्यंत विभिन्न परिस्थितियों में प्रकट होने के कारण बाह्य जगत की वस्तुएं अपना रूप निरंतर बदलती और अपने नये-नये गुण व विशेषताएं दिखाती रहती हैं। इसी के अनुसार प्रत्यक्षमूलक प्रक्रियाएं भी बदलती रहती हैं। किंतु प्रत्यक्ष-तंत्र ( अर्थात प्रत्यक्षण की दत्त क्रिया सुनिश्चित करनेवाले विश्लेषकों की समष्टि ) की इन परिवर्तनों का प्रतिसंतुलन ( counterbalance ) करने की योग्यता की बदौलत हम वस्तुओं की आकृति, आकार, रंग, आदि को अपेक्षाकृत स्थिर, अपरिवर्तित समझते हैं।

प्रत्यक्ष के इस गुण को आकार की विशिष्ट मिसाल लेकर समझा जा सकता है। ज्ञात है कि किसी भी वस्तु का बिंब ( दृष्टिपटल पर पड़नेवाला बिंब भी ) उसके और ग्राही के बीच की दूरी घटने के साथ बढ़ता और दूरी बढ़ने के साथ घटता जाता है। किंतु प्रेक्षण की दूरी के साथ दृष्टिपटल ( retina ) पर पड़नेवाले बिंब ( image ) में परिवर्तन होबे पर भी वस्तु के प्रत्यक्षीकृत आयाम ( percepted dimension ) लगभग अपरिवर्तित रहते हैं। किसी भी थियेटर में दर्शकों पर दृष्टिपात करें, सभी के चहरे आकार में लगभग एक बराबर लगते हैं, हालांकि पीछे की क़तारों में बैठे लोगों के चहरों के बिंब वास्तव में हमारे नज़दीक स्थित अगली क़तारों के लोगों के चहरों के बिंबों से छोटे हैं। अब अपने हथेलियों को आगे-पीछे थोड़ा दूर रखकर उंगलियों को देखें, वे आपको समान आकार की लगेंगी, हालांकि उनके दृष्टिपटल पर बनने वाले बिंब असमान आकार के होंगे।

प्रत्यक्ष की स्थिरता का स्रोत क्या है ? क्या यह उसका सहज गुण ( innate properties ) है ?

इस प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की जांच के लिए मनोविज्ञानियों ने ऐसे लोगों के प्रत्यक्ष का अध्ययन किया, जो एक घने जंगल में रहते थे और जिन्होंने वस्तुओं को बहुत अधिक दूरी पर कभी नहीं देखा था। जब इन लोगों को ऐसी दूर की वस्तुएं दिखाई गईं, तो उन्हें वे दूर नहीं, बल्कि छोटी लगीं। प्रत्यक्ष के ऐसे ही दोष बहुत अधिक ऊंचाई से नीचे देखनेवाले मैदानी लोगों में भी मिले। जब हम किसी गगनचुंबी इमारत की एक ऊपरी मंज़िल से नीचे सड़क पर लोगों या कारों को देखते हैं, तो हमें उनका आकार छोटा लगता है। किंतु ऐसी ऊंचाइयों पर काम करनेवाले निर्माण मज़दूरों को भूतल की वस्तुएं उनके वास्तविक आकार की ही दिखाई देती हैं।
प्रत्यक्ष की स्थिरता के उसका एक सहज गुण होने की प्राक्कल्पना का खंडन निम्न तथ्य से भी होता है। बचपन में अंधा हुआ एक आदमी जब प्रौढ़ावस्था में आंखों के ऑपरेशन के बाद फिर से देखने लगा, तो वह सोचता था कि वह अपने वार्ड़ की खिड़की से नीचे ज़मीन पर कूद सकता है और उसे कोई चोट नहीं पहुंचेगी, हालांकि खिड़की ज़मीन से १०-१२ मीटर की ऊंचाई पर थी। ऊंचाई का उसका ग़लत अनुमान शायद दूर ज़मीन की चीज़ों को मात्र छोटा समझने का परिणाम था।

प्रत्यक्ष की स्थिरता का वास्तविक स्रोत स्वयं प्रत्यक्ष-तंत्र ( perception-system ) की क्रियाशीलता है। ग्राहियों की गतियों के बहुविध और परिवर्तनशील प्रवाह ( multifarious and variable flow ) और जवाबी संवेदनों में से मनुष्य प्रत्यक्ष का विषय बनी हुई वस्तु की एक अपेक्षाकृत स्थिर तथा अपरिवर्तनशील संरचना को चुनता है। उन्हीं वस्तुओं का विभिन्न परिस्थितियों में बार-बार प्रत्यक्षण इन परिवर्तनशील परिस्थितियों और ग्राही की गतियों के संदर्भ में प्रात्यक्षिक बिंब की निश्चरता को सुनिश्चित करता है और इस बिंब को स्थायित्व तथा स्थिरता प्रदान करता है।

वस्तुओं के प्रत्यक्ष को प्रभावित करनेवाली परिवेशी परिस्थितियों की अंतहीन विविधता के परिणामस्वरूप होनेवाली अपरिहार्य त्रुटियों को ठीक करने और सही बिंब बनाने की हमारे प्रत्यक्ष-तंत्र की योग्यता का प्रमाण ऐसे विशेष चश्मों की मदद से किये जानेवाले प्रयोगों से मिलता है, जो बिंबों को उलटकर, सीधी रेखाओं को वक्र रेखाएं बनाकर या किसी और ढंग से चाक्षुष प्रत्यक्षों को विकृत कर देते हैं। जब मनुष्य ऐसे चश्में लगाता है और उसे अपरिचित परिवेश में रखा जाता है, तो वह पहले शनैः शनैः विकृतियों को सही करना सीखता है और फिर उनपर ध्यान देना ही बंद कर देता है, हालांकि उसके दृष्टिपटल पर वे पूर्ववत् परावर्तित होती रहती हैं।

इस प्रकार स्थिरता का स्रोत प्रतिपुष्टि के तंत्र ( feedback system ) और अपने को प्रत्यक्षीकृत वस्तु तथा उसके अस्तित्व की परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की योग्यता से युक्त एक विशिष्ट स्वनियामक ( self regulatory ) क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष की प्रकृति ( nature ) ही है। मनुष्य की वस्तुसापेक्ष सक्रियता के दौरान पैदा होनेवाली प्रत्यक्ष की स्थिरता उसके जीवन की एक अनिवार्य शर्त है। ऐसी स्थिरता के बिना मनुष्य इस अति वैविध्यपूर्ण तथा परिवर्तनशील विश्व में दिग्भ्रमित ( confused ) हो जाएगा। प्रत्यक्ष की स्थिरता वस्तुओं और उनके अस्तित्व की परिस्थितियों की एकता को प्रतिबिंबित करते हुए परिवेशी विश्व की आपेक्षिक स्थिरता को सुनिश्चित करती है।

प्रत्यक्ष की सार्थकता
( meatiness or meaningfulness of perception )

यथार्थ प्रत्यक्ष ग्राहियों पर क्षोभकों की क्रिया का परिणाम होता है, फिर भी प्रात्यक्षिक बिंब उनके कर्ता के लिए किसी न किसी रूप में सदा सार्थक होते हैं। मनुष्य में प्रत्यक्ष, चिंतन से, वस्तु के सारतत्व ( essence ) की समझ से घनिष्ठतः जुड़ा हुआ होता है। किसी वस्तु का सचेतन रूप से प्रत्यक्षण करने का अर्थ है मन में उसे कोई नाम देना, अर्थात उसे वस्तुओं के एक निश्चित समूह अथवा श्रेणी में रखना, उसे शब्द में सामान्यीकृत ( generalized ) करना। जब हम कोई अज्ञात वस्तु देखते हैं, तो हम उसका ज्ञात वस्तुओं से कोई साम्य खोजने और उसे किसी श्रेणी में रखने का प्रयत्न करते हैं। प्रत्यक्ष हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डलनेवाले क्षोभकों पर निर्भर नहीं होता, बल्कि वह उपलब्ध जानकारी की सर्वोत्तम व्याख्या या स्पष्टीकरण की एक सक्रिय खोज है। इस संबंध में वे तथाकथित द्वयर्थक चित्र उल्लेखनीय हैं, जिन्हें कभी आकृति माना जाता है और कभी पृष्ठभूमि ( देखें साथ का चित्र )। ये चित्र स्पष्ततः दिखाते हैं कि वस्तु के प्रत्यक्ष में उसका अभिज्ञान ( recognition ) और वर्गीकरण ( classification ) शामिल रहते हैं ( दो पार्श्वचित्र और एक आधारयुक्त कटोरा )।

कहने का सार यह है कि प्रत्यक्ष बहुत सारी प्रत्यक्षज्ञानात्मक क्रियाओं से युक्त एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य किसी वस्तु का तदनुरूप बिंब बनाना है। प्रत्यक्ष की क्रियाशीलता मुख्यतः विश्लेषकों के प्रेरक-घटकों की प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में भाग लेने में व्यक्त होती है ( जैसे स्पर्श में हाथ चलना, चाक्षुष प्रत्यक्ष में नेत्रों का गति करना, आदि )। क्रियाशीलता इसके अलावा बृहदस्तर पर भी आवश्यक है, ताकि प्रत्यक्षकर्ता मनुष्य वस्तु के संबंध में अपन स्थिति तुरंत बदल सके।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

प्रत्यक्ष और उसका विशिष्ट स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में संवेदन और मनुष्य के जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष और उसके विशिष्ट स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रत्यक्ष और उसका विशिष्ट स्वरूप
( perception and its specific format )

प्रत्यक्ष ( perception ) वस्तुओं या परिघटनाओं का ज्ञानेन्द्रियों पर उनके सीधे प्रभाव के फलस्वरूप मनुष्य की चेतना में होने वाला परावर्तन हैं। प्रत्यक्ष के दौरान संवेदन ( sensation ) वस्तुओं और घटनाओं के बिंबों में समेकित ( consolidated ) हो जाते हैं।

संवेदनों के विपरीत, जो क्षोभकों के अलग-अलग गुणधर्मों को परावर्तित करते हैं, प्रत्यक्ष वस्तु को समग्रतः और उसके गुणधर्मों की एकता के रूप में परावर्तित करता है। प्रत्यक्ष अलग-अलग संवेदनों की समष्टि नहीं, बल्कि ऐंद्रिक ज्ञान की एक गुणात्मकतः नई अवस्था है, जिसके अपने विषिष्ट लक्षण होते हैं। प्रत्यक्ष की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताएं वस्तुपरकता ( objectiveness ), समग्रता ( totality ), संरचनात्मकता ( structuredness ), स्थिरता ( stability ) तथा सार्थकता ( meaningfulness )। हम इन्हें थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

प्रत्यक्ष की वस्तुपरकता तथाकथित वास्तवीकरण ( realization ) की क्रिया में, यानि बाह्य जगत से प्राप्त जानकारी को इस बाह्य जगत से संबद्ध ( related ) करने में व्यक्त होती है। ऐसी वस्तुसापेक्षता के बिना प्रत्यक्ष मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप में दिग्दर्शन ( referent ) तथा नियमन ( regulation ) का कार्य नहीं कर पाएगा। प्रत्यक्ष की बाह्य वस्तुओं से संबद्धता सहज गुण नहीं है। मनुष्य क्रियाओं की एक निश्चित पद्धति के ज़रिए, जिसमें स्पर्श और गति मुख्य भूमिका अदा करते हैं, विश्व के वस्तुपरक रूप का पता करता है। वस्तुपरकता का गुण उन प्रक्रियाओं के आधार पर पैदा होता है, जो अपने को हमेशा स्वयं वस्तु से संपर्क सुनिश्चित करनेवाली बाह्य प्रेरक क्रियाओं में प्रकट करती हैं। गति के बिना हमारे प्रत्यक्ष वस्तुसापेक्ष, अर्थात वस्तुजगत से संबद्ध नहीं होंगे।

एक ऐसे ही विशेष केस में, जिसमें रोगी का चाक्षुष प्रत्यक्ष क्षतिग्रस्त होने पर भी उसके चाक्षुष विश्लेषक की क्षमता ज्यों की त्यों बनी हुई थी। मस्तिष्क पर आघात से उसके नेत्रगोलक पूरी तरह गतिशून्य हो गये थे। वह जो कुछ भी देखता था, उसे लगता था कि यह या तो प्रकाश की अजस्र धारा है या ऐसा कुहरा कि जिसे एक प्रकाश किरण भेदने की कोशिश कर रही है। शुरुआती ईलाज़ के दौरान उसे धब्बे दिखाई देने लगे, जो अस्पष्ट तथा निरर्थक और चमक तथा आकार की दृष्टि से अलग-अलग तरह के थे। फिर भी रोगी की दृष्टि संवेदनों से आगे न जा सकी और वह किसी भी वस्तु अथवा उसकी विशेषताओं का मौखिक अथवा काग़ज़ पर चित्र प्रस्तुत करने में असमर्थ था। केवल तीन महिने बाद ही वह प्रत्यक्ष की क्षमता पुनः प्राप्त कर सका।

यानि कि यहां ग्राही पर क्षोभक द्वारा पड़ने वाले प्रभाव से दृष्टि संवेदन तो पैदा हो रहे थे, पर प्रत्यक्षमूलक क्षमता के बिना रोगी उस क्षोभक वस्तु का प्रत्यक्ष करने में, उसका वस्तुपरक बिंब अपनी चेतना में परावर्तित करने में असमर्थ था। इससे स्पष्ट है कि दृष्टि संवेदन स्वयं ही वस्तु का चेतना में परावर्तन सुनिश्चित नहीं कर देते।

अक्सर मेंढ़क के दृष्टिपटल को ‘कीटों का संसूचक’ कहा जाता है। ज्यों ही, उदाहरणार्थ किसी मक्खी की छाया दृष्टिपटल पर पड़ती है, यह ‘संसूचक’ जिह्वा में परावर्ती गतियां पैदा कर देता है। मेंढ़क की आंख किसी भी वस्तु के कुछेक लक्षणों को ही दर्ज करती है, मस्तिष्क को उसकी गति तथा उसकी आकृति में कोणों की मौजूदगी की ही सूचना पहुंचाती है और अन्य सभी जानकारियों की उपेक्षा कर देती है। ऐसी स्थिति में क्या मेंढक मक्खी का वस्तुपरक बिंब बना सकता है? उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक होगा और उसके सही होने की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि चारों ओर मरी हुई मक्खियां पड़ी होने पर भी मेंढक भूख से मर सकता है।

प्रत्यक्ष के एक गुण के रूप में वस्तुपरकता, व्यवहार के नियमन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मिट्टी की ईंट या बारूद का डला देखने या छूने में एक जैसे हो सकते हैं, किंतु उनके गुण बिल्कुल भिन्न हैं। हम वस्तुओं को सामान्यतः बाह्याकृति से नहीं, बल्कि व्यवहार में हम उन्हें जिस ढंग से इस्तेमाल करते हैं, उससे या उनके मुख्य गुणों से पहचानते हैं। इसमें प्रत्यक्ष की वस्तुपरकता हमारी मदद करती हैं। वस्तुपरकता स्वयं प्रत्यक्षमूलक प्रक्रियाओं के आगे के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। जब मनुष्य बाह्य जगत और उसके परावर्तन के बीच असंगति पाता है, तो उसे प्रत्यक्ष की ऐसी नई प्रणालियां खोजनी पड़ती हैं, जो अधिक सही परावर्तन सुनिश्चित कर सकें।

प्रत्यक्ष की एक और विशेषता उसकी समग्रता है। जहां संवेदन ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डालने वाली वस्तु के अलग-अलग गुणों को परावर्तित करता है, वहीं प्रत्यक्ष दत्त वस्तु का एक समेकित बिंब प्रस्तुत करता है। निस्संदेह यह समेकित बिंब विविध संवेदनों के रूप में प्राप्त वस्तुओं की विशेषताओं और गुणधर्मों के हमारे ज्ञान के सामान्यीकरण से पैदा होता है।

प्रत्यक्ष की समग्रता से ही घनिष्ठतः जुड़ी हुई उसकी संरचनात्मकता है। प्रत्यक्ष हमारे क्षणिक संवेदनों से तात्विकतः भिन्न होता है और वह उनका योगफल भी नहीं है। वास्तव में हम इन संवेदनों के एक अपाकर्षण का ही प्रत्यक्षण करते हैं, जो एक ऐसी सामान्यीकृत संरचना है कि जिसके पैदा होने में समय लगता है। जब आदमी कोई धुन सुनता है, तो पहले के स्वर उसके कानों में तब भी गूंजते रहते हैं, जब वह वास्तव में नया स्वर सुन रहा होता है। प्रायः श्रोता संगीत-रचना को समझता है, अर्थात उसकी संरचना को समग्रता में ह्रदयंगम करता है। स्पष्ट है कि अंत में सुने हुए स्वर ही रचना को समझने का आधार नहीं बन सकते, श्रोता का मस्तिष्क सभी परस्परसंबद्ध घटकों सहित धुन की समस्त संरचना को याद रखता है।

लय के प्रत्यक्षण की प्रक्रिया भी इसी से मिलती-जुलती है। हम एक बार में एक ही ताल सुन सकते हैं, किंतु लय तालों का योगफल नहीं, बल्कि एक दूसरी से एक निश्चित ढंग से जुड़ी हुईं तथा थिरकन पैदा कर देनेवाली तालों की पद्धति है। तालों की इस परस्परसंबद्धता पर ही लय का प्रत्यक्ष निर्भर होता है। प्रत्यक्ष की समग्रता तथा संरचनात्मकता का स्रोत, एक ओर, परावर्तित वस्तुओं के गुण हैं और, दूसरी ओर, मनुष्य की वस्तुसापेक्ष सक्रियता


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय