पूंजीवादी विरचना -२

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत पूंजीवादी विरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समाहार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


पूंजीवादी विरचना -२
(The Capitalist Formation – 2)

साम्राज्यवाद (imperialism) की लाक्षणिक विशेषताएं हैं: इजारेदारियों (monopolies) का प्रभुत्व, औद्योगिक-वित्तीय अल्पतंत्र (industrial-financial oligarchy) का सत्ता में आना, उपनिवेशों के पुनर्वितरण के लिए संघर्ष, वर्ग संघर्ष (class struggle) का तीव्रीकरण, मेहनतकशों के शोषण का गहनीकरण, आर्थिक तथा सामाजिक विकास की विषमता, आदि। जैसा कि पहले विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) से प्रदर्शित हुआ, साम्राज्यवाद की अवस्था में पूंजीवाद मनुष्यजाति के शांतिपूर्ण प्रगतिशील विकास को सुनिश्चित बनाने में अक्षम है। उसके सामाजिक अंतर्विरोध पराकाष्ठा तक तीव्र हो गये। रूस में, जो साम्राज्यवाद की प्रणाली में दुर्बलतम कड़ी साबित हुआ, १९१७ में एक समाजवादी क्रांति हुई और समाजवाद का निर्माण शुरू हुआ। यह पूंजीवाद के आम संकट की, विश्व पूंजीवादी प्रणाली के ध्वस्त होने की पहली मंज़िल थी।

दूसरे विश्वयुद्ध (१९३९-१९४५) के बाद, जिसे सबसे आक्रामक साम्राज्यवादी राज्यों ( फ़ासिस्ट जर्मनी, इटली और सैन्यवादी जापान ) द्वारा भड़काया गया था, पूंजीवाद के आम संकट की दूसरी अवस्था शुरू हुई। समाजवाद एक अकेले देश की सीमाओं से बाहर आ गया; एक ऐसी समाजवादी प्रणाली का विकास हुआ जिसमें यूरोप, एशिया और लैटिन अमरीका के कई देश शामिल हो गये। उपनिवेशी प्रणाली के ध्वस्त होने के फलस्वरूप कई आज़ाद देश अस्तित्व में आये, जिनमें से कई समाजवादी विकास के रास्ते पर चले।

आधुनिक पूंजीवाद, उस पूंजीवाद से मूलतः भिन्न है, जो २०वीं सदी के प्रारंभ तथा मध्य में था। राजकीय इजारेदार पूंजीवाद (state-monopoly capitalism) के अंतर्गत विराट पैमाने पर विकसित उत्पादक शक्तियों (production forces) और पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के बीच अंतर्विरोध अधिकाधिक तीव्र होता जा रहा है। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि उत्पादक शक्तियों और विशेषतः नवीनतम प्रविधि तथा टेक्नोलॉजी का विकास बंद हो गया है। इसके विपरीत जैव-तकनीक, इलैक्ट्रोनिकी, अंतरिक्ष व सूचना तकनीक पर्याप्त तेज़ी से विकसित हो रही हैं। तो प्रश्न उठता है कि यह अंतर्विरोध किसमें है? इसके नकारात्मक परिणाम स्वयं को कैसे व्यक्त करते हैं?

मुद्दा यह है कि बड़े पूंजीपति मुख्यतः उन उद्योगों का विकास कर रहे हैं, जिनसे अधिकतम मुनाफ़ा (profit), ऊंची प्रतियोगिता क्षमता और घरेलू व विश्व बाज़ार में प्रभुता (dominance) हासिल होती है। और उनमें, मुख्यतः वे सब शामिल हैं, जो समाज के सैन्यीकरण (militarisation) को बढ़ावा देते हैं और पूंजीवादी राज्यों की सैनिक शक्ति को बढ़ाते हैं। बड़ी इजारेदारियां स्वयं अपने देशों के और इससे भी अधिक विकासशील देशों के मेहनतकशों के हितों पर कोई ध्यान नहीं देती है। पूंजीवाद की दशाओं में कंप्यूटरीकरण तथा रोबोटीकरण से बेरोजगारी में अभूतपूर्व बढ़ती हो जाती है। पश्चिम के प्रमुख विशेषज्ञों के पूर्वानुमान ठीक इसी बात का संकेत देते हैं।

एक नकारात्मक परिणाम और भी है। पूंजीवादी समाजों में विकास की दरें उससे कहीं नीची होती हैं, जो सामाजिक स्वामित्व (social ownership) पर आधारित उत्पादन संबंधों के अंतर्गत हो सकती हैं। पूंजीवादी विकास में बढ़ती हुई मंदियां (slumps), चक्रिक (cyclic) और संरचनात्मक संकट, बढ़ते हुए राजकीय ऋण, बजट के घाटे तथा बेलगाम मुद्रास्फीति (inflation) शामिल होती है। इसके साथ ही पूंजी, संकेन्द्रित और अंतर्राष्ट्रीयकृत होती जा रही है तथा विश्वभर के जनगण का शोषण करने तथा विकासशील और विकसित पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी नियंत्रण रखनेवाले बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशन अधिकाधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। आधुनिक समाज की विराट संपदा तथा वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों को सामाजिक न्याय की उपलब्धि, ग़रीबी का उन्मूलन करने तथा विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से अपने विकास में पिछड़े हुआ देशों और जातियों को सहायता देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, परंतु पूंजीवाद के अंतर्गत ऐसा करना असंभव है

समसामयिक पूंजीवादी समाज के नेतागण इन अंतर्विरोधों की तीक्ष्णता को घटाने और उनके प्रतिकूल प्रभावों को मिटाने के प्रयत्न में विभिन्न आर्थिक तथा राजनीतिक तिकड़मों का सहारा लेते हैं। किंतु आधुनिक पूंजीवाद के गहरे प्रतिरोधी अंतर्विरोधों (antagonistic contradictions) से निबटने के लिए समाज में आमूल सामाजिक सुधारों की ज़रूरत है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

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पूंजीवादी विरचना – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामंतवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम पूंजीवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


पूंजीवादी विरचना – १
(The Capitalist Formation – 1)

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति मूलतः सामंतवाद के अंदर ही एक विशिष्ट संरचना (structure) या रूप (form) की तरह उत्पन हुई। जब यह एक नयी सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) का आधार बनी, तो उसने सारे सामाजिक संबंधों के आमूल पुनर्निर्माण (radical restructuring)  तथा पुनर्संगठन (reorganisation) को प्रेरित किया। पूंजीवाद के अंतर्गत समाज का वर्गीय ढांचा बदल गया। सामंत और भूदास की जगह पूंजीपति और मज़दूर ने ले ली। उजरती मज़दूर (hired or waged labour) वर्ग और बुर्जुआ (bourgeoisie) वर्ग, प्रमुख वर्ग (classes) बन गये। पूर्णतः अधिकारहीन दास और सीमित अधिकारों वाले भूदास की तुलना में मज़दूर क़ानूनन स्वतंत्र होता है। किंतु पूंजीपति पर उसकी निर्भरता किसी तरह कम नहीं है, हालांकि इस निर्भरता का रूप ज़रूर भिन्न होता है। मज़दूर उत्पादन साधनों से वंचित होता है, उसके पास अपना कहने के लिए केवल उसकी श्रमशक्ति होती है, जिसे बेचकर ही वह जीवननिर्वाह कर सकता है। पूंजीवादी समाज में पूंजीपति ही श्रमशक्ति को ख़रीद सकता है और इस्तेमाल कर सकता है। अतः मज़दूर को मजबूर होकर उसके चंगुल में फंसना पड़ता है।

पूंजीवाद की स्थापना के साथ उत्पादक शक्तियां (productive forces) तेज़ी से बढ़ने लगीं। यह तीव्र विकास नये, पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के कारण हुआ। ये संबंध उत्पादन के साधनों (means of production) पर बुर्जुआ वर्ग के निजी स्वामित्व (private ownership) और उत्पादन साधनों से वंचित तथा अपनी श्रम शक्ति बेचने को विवश उज़रती मज़दूरों के श्रम के शोषण पर आधारित होते हैं। पूंजीपति, बेशी (surplus) मूल्य ( यानी वह मूल्य जिसे मज़दूर अपनी श्रम शक्ति के मूल्य के अतिरिक्त निर्मित करता है ) मुफ़्त में हस्तगत कर लेता है। इस तरह पूंजीवादी विरचना में वर्गों के बीच संबंध वैरभावपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे अमीरों द्वारा ग़रीबों के शोषण पर आधारित होते हैं।

परंतु विकसित होती हुई उत्पादक शक्तियां अपने स्वभाव बदलती थीं। मशीनी उत्पादन सामूहिक, संयुक्त श्रम की अपेक्षा करता था। पूंजीवादी विकास के साथ-साथ, उत्पादन अधिकाधिक सामाजिक स्वरूप ग्रहण करता जाता है। उत्पादक शक्तियों का सामाजिक स्वरूप और उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व के बीच बढ़ता हुआ तीव्र अंतर्विरोध पैदा हो गया। यह अंतर्विरोध, वर्ग संघर्ष की बढ़ती तीव्रता में व्यक्त हुआ।

पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप मज़दूर वर्ग में तेज़ी से वृद्धि हुई और समाज के जीवन में उसका सापेक्ष महत्व बढ़ गया। मज़दूर वर्ग की वर्ग चेतना भी बढ़ी। औद्योगिक उत्पादन, सर्वहारा (proletariat) से महती एकजुटता, संगठन, क्रियाकलाप के समन्वय (co-ordination) तथा उच्चस्तरीय व्यवसायिक प्रशिक्षण और ज्ञान की अपेक्षा करता था। पूंजीवाद ने सामंती फूट का, समाज के जटिल सोपानक्रमिक (hierarchical) संगठन, क़ानूनों की विभिन्नता का उन्मूलन कर दिया और श्रम तथा पूंजी के एक अविभक्त बाज़ार (market) की रचना की। इन सब बातों से मज़दूर वर्ग के लिए यह समझना अधिक आसान हो गया कि उसके हित पूंजीपतियों के हितों के आमूलतः विरोधी हैं। मार्क्स और एंगेल्स द्वारा विकसित वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत, यानी मौजूदा प्रणाली के क्रांतिकारी रूपांतरण (transformation) तथा एक वर्गहीन (classless) समाज के निर्माण के सिद्धांत ने सर्वहारा की वर्ग चेतना में वृद्धि को प्रोत्साहित किया। वैज्ञानिक समाजवाद, मज़दूर वर्ग की पार्टियों के ज़रिये मज़दूर आंदोलन के साथ जुड़ गया। इस तरह वैज्ञानिक समाजवाद ने सर्वसाधारण की क्रांतिकारी चेतना की बढ़ती में मदद की और फलतः वर्ग संघर्ष को विस्तृततर तथा गहनतर बनाया।

१९वीं सदी के अंत तथा २०वीं सदी के प्रारंभ में पूंजीवाद, प्रगतिशील तथा द्रुत गति से विकासमान विरचना नहीं रहा। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों और सामाजिक स्वरूप की उत्पादक शक्तियों के बीच गहरे अंतर्विरोधों के कारण उत्पादक शक्तियों का विकास उससे कहीं ज़्यादा मंद गति से होने लगा, जो निजी पूंजीवादी स्वामित्व के उन्मूलन के बाद होता। पूंजीवाद के विकास में एक नयी अवस्था, साम्राज्यवाद (imperialism) की अवस्था चालू हो गयी।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम