मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – २
( mankind and the natural environment – 2 )

Screen-Shot-2014-09-26-at-10.39.10-AMमनुष्य के प्राकृतिक निवास स्थल ( habitat ) में, घटनाओं के दो समूहों को विभेदित ( distinguish ) किया जा सकता है : निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत ( जंगली पौधे, फल, जानवर, आदि ) और प्राकृतिक संपदा ( कोयला, तेल, जल-शक्ति, पवन, आदि जो श्रम की वस्तुएं हैं )। मानव समाज के क्रमविकास की प्रारंभिक अवस्था में, जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) विकास के निम्न स्तर पर थीं, लोग बहुत हद तक निर्वाह के प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थे। अभी जब वे फ़सल उगाना, पालतू जानवरों का प्रजनन व पालन करना, गर्म आवास बनाना, आदि नहीं जानते थे, तब वे केवल गर्म जलवायु, प्रचुर वनस्पति, बड़े परिमाण में शिकार के जानवरोंवाले भूप्रदेशों में ही रह सकते थे। जब औज़ारों का विकास तथा परिष्करण कर लिया गया तब प्राकृतिक स्रोतों पर लोगों की निर्भरता कम हो गयी। परंतु प्राकृतिक संपदा, यानी खनिजों, ऊर्जा साधनों, आदि पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ गयी

आधुनिक उद्योग और इंजीनियरी ने पृथ्वी उन क्षेत्रों को भी सुगम बना दिया, जो पहले अगम्य ( inaccessible ) थे। रासायनिक उर्वरकों ( chemical fertilizers ) से मनुष्य अनुर्वर ( infertile ) ज़मीनों को उर्वर बना सकता है। नयी निर्माण सामग्री तथा तापन प्रणाली के उपयोग से वह ध्रुवीय क्षेत्रों पर भी नियंत्रण क़ायम कर सकता है। ऊर्जा के विभिन्न प्रकारों के उपयोग से वह उस सामान्य ईंधन ( लकड़ी ) पर निर्भर नहीं रहता, जो पहले गर्मी का एकमात्र स्रोत था। परंतु इसके साथ ही तेल, लौह खनिज, यूरेनियम, खनिज, आदि जैसी प्राथमिक सामग्री पर उद्योग और कृषि की निर्भरता बढ़ रही है। इस प्रक्रिया के मूल में, उत्पादक शक्तियों का विकास निहित है और अपनी बारी में वह काफ़ी हद तक उत्पादन संबंधों ( सर्वोपरि स्वामित्व के प्रभावी रूप ) से निर्धारित होता है

ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) मनुष्य की जीवन क्रिया पर प्राकृतिक निवास स्थल के प्रभाव से इनकार नहीं करता, किंतु यह दर्शाता है कि यह प्रभाव भौतिक संपदा के उत्पादन की विधि के ज़रिये निष्पादित होता है। फलतः इस प्रभाव का स्वरूप और उसमें परिवर्तन स्वयं प्रकृति के बजाय सामाजिक कारकों पर और सर्वोपरि भौतिक उत्पादन पर निर्भर होता है, जो सारे सामाजिक जीवन का आधार है।

मसलन, एक भावी संभावना पर विचार करते हैं। समाज पर अंतरिक्ष का प्रभाव आधुनिक अंतरिक्ष यानों के विकास के द्वारा संभव हो रहा है, जिससे निकट भविष्य में हमारी पार्थिव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर मंडल के ग्रहों के खनिजों और ऊर्जा संसाधनों को उपयोग में लाना संभव हो जायेगा। इस कारक का प्रभाव इंजीनियरी तथा उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होगा, जिसके अंतर्गत वह संक्रियाशील तथा विकसित होगा। सारे समाज के हित में अंतरिक्ष तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग, ऐसी सामाजिक प्रणाली के अस्तित्व की पूर्वापेक्षा करता है, जिसमें अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा को मनुष्यजाति की सेवा में लगाया जायेगा और पार्थिव प्रकृति के विकास तथा संरक्षण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जायेगा। इसके विपरीत, अंतरिक्ष का सैन्यीकरण ( militarization ) अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा के तर्क-सम्मत उपयोग में बाधा डाल सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने का संघर्ष विशेष ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करता जायेगा।

अतः मानवजाति के विकास पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभाव के बारे में निम्नांकित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। (१) प्राकृतिक निवास स्थल मनुष्य की जीवन क्रिया का एक सबसे महत्वपूर्ण भौतिक पूर्वाधार है। (२) इसका प्रभाव न तो प्रमुख है और न निर्णायक। इसका स्वभाव समाज की उत्पादक शक्तियों के स्तर और उत्पादन संबंधों की क़िस्म पर निर्भर करता है। (३) निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत मुख्य रूप से इतिहास की प्रारंभिक अवस्था में समाज पर उस समय असर डालते हैं, जब उत्पादक शक्तियों का विकास सापेक्षतः निम्न स्तर पर होता है, जबकि उत्पादक शक्तियों की अभिवृद्धि के साथ प्राकृतिक संपदा का प्रभाव बढ़ जाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने पर्यावरण की संरचना पर विचार किया था, इस बार हम मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण – १
( mankind and the natural environment – 1 )

3ba903d6b856ff35389f3a901e14111aजिस प्राकृतिक पर्यावरण में मनुष्यजाति रही और विकसित हुई, वह बहुत जटिल है। इसमें शामिल हैं : (१) पृथ्वी की सतह तथा उसकी विभिन्न मिट्टियां, पहाड़ियां और पर्वत, नदियां, सागर, रेगिस्तान, आदि ; (२) विभिन्न जलवायवीय क्षेत्र ( climatic zones ) ; (३) जानवरों तथा पौधों के विविध समुच्चय, आदि। इन सबकों मिलाकर आम तौर पर एक नाम दिया जाता है – भौगोलिक पर्यावरण ( geographical environment ) । दसियों और सैकड़ों हज़ारों वर्षों तक मनुष्यजाति, पृथ्वी के आभ्यंतर ( interior ) में प्रविष्ट हुए बिना तथा वायुमंडल ( atmosphere ) में उड़े बिना ( अंतरिक्ष की तो बात ही दूर ) पृथ्वी की सतह पर रही और विकसित हुई।

अतीतकाल के अनेक चिंतकों ने विभिन्न भौगोलिक दशाओं में विभिन्न क़बीलों, जनगणों तथा जातियों को रहते देखकर यह निष्कर्ष निकाला कि मानव जीवन के मुख्य लक्षण और संस्कृति का विकास तथा सामाजिक प्रणाली भौगोलिक पर्यावरण पर निर्भर है। उनमें से कुछ ने सोचा कि कठोर या नरम जलवायु सामाजिक विकास का निर्णायक कारक है ; अन्य ने विकास का मुख्य कारण ज़मीन की उर्वरता में, पौधों व जानवरों की प्रचुरता में देखा ; इनके अलावा, कुछ अन्य ने समाज के विकास को जलमार्गों ( नदियों, सागरों, झीलों, आदि ) पर निर्भर माना।

इन दृष्टिकोणों में किंचित औचित्य है। विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में लोग तथ्यतः उन देशों में अधिक सफलता से विकसित हुए जहां की जलवायु नरम थी तथा वनस्पति और जानवरों की प्रचुरता थी, जबकि कठोर जलवायु तथा अनुर्वर ज़मीनें बिना बसी रही। परंतु मनुष्यजाति के क्रमविकास ( evolution ) को केवल भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव से स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। कई हज़ार वर्षों की, और सैकड़ों की भी अवधि में एक ही भौगोलिक दशाओं के अंतर्गत विभिन्न सामाजिक विरचनाएं अनुक्रमिक रूप से बनीं। पिछली कई सदियों में, कई देशों के भौगोलिक पर्यावरण में कोई तीव्र परिवर्तन नहीं हुए हैं, फिर भी इन सदियों में इन देशों की सामाजिक विरचनाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं।

यदि सब कुछ भौगोलिक दशाओं पर निर्भर होता, तो इस बात का क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है कि वनस्पति व जानवरों की प्रचुरता तथा गर्म जलवायुवाले लैटिन अमरीकी तथा मध्य अफ़्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई है और संस्कृति का स्तर सापेक्षतः नीचा है, जबकि कई अन्य देशों में कठोर जलवायु, मिट्टी तथा अन्य प्रतिकूल दशाओं के बावजूद उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्था तथा विकसित संस्कृति का अस्तित्व है ? ये प्रश्न इस विचार को प्रेरित करते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण से संबंध तथा उस पर निर्भरता सीधी-सरल बात नहीं है। यही नहीं, समाज के विकसित होने के साथ मानवजाति पृथ्वी के आभ्यंतर में अधिक गहराइयों में पैठी और वायुमंडल की सीमा के बाहर जा पहुंची और भौगोलिक पर्यावरण की संकल्पना बहुत संकीर्ण साबित हो गयी। यह मानवजाति के प्राकृतिक पर्यावरण का मात्र एक भाग है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

पर्यावरण की संरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मत पर चर्चा की थी, इस बार हम पर्यावरण की संरचना पर विचार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


पर्यावरण की संरचना
( the structure of the environment )

2B093D8C00000578-0-image-a-35_1438513924830किसी महानगर की ऊंची इमारत की छत से दृश्यावलोकन करने पर क्षितिज तक फैला छतों का सागर, सड़कों व वीथियों पर चलती मोटरगाडियों की धाराएं और पैदल पथों पर चलते लोगों की छोटी-छोटी आकृतियां दिखायी देती हैं। विशाल नगर और इनकी लाखों की आबादी, जटिल तकनीकी प्रणालियां और शहरी परिवहन प्रत्येक नागरिक को अपने घेरे में लपेटे हुए हैं। यहां प्रकृति केवल पार्कों, हरी घास तथा हरियाली के अलग-अलग खंडों के रूप में ही विद्यमान है। विकसित एवं विकासशील देशों में अधिकांश आबादी नगरों में रहती है और मनुष्य द्वारा निर्मित नगरीय संरचनाओं तथा तकनीकी प्रतिष्ठानों ( installations ) से घिरी होती है। प्रकृति से सीधे संपर्क में रहनेवाले जंगलों, खेतों, स्वच्छ नदियों व झीलों से घिरे देहातवासियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

पर्यावरण एक जटिल प्रणाली ( complex system ) है, जिसमें सब वस्तुएं एक निश्चित ढंग से अंतर्संबधित और तदनुसारी नियमों से संचालित होती हैं। इसकी प्रमुख उपप्रणालियां मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम निवास स्थल ( habitat ) हैं।

प्राकृतिक पर्यावरण ( natural environment ) प्रकृति का एक भाग है जिसके साथ समाज अपने विकास तथा क्रियाकलाप के दौरान अंतर्क्रिया ( interact ) करता है। मानवजाति की शुरुआत में उसका प्राकृतिक निवास स्थल पृथ्वी की सतह का एक छोटा-सा हिस्सा भर था। परंतु अब इसमें पृथ्वी की सतह के साथ ही उसका अभ्यांतर ( interior ), विश्व महासागर, पृथ्वी निकट अंतरिक्ष तथा सौर मंडल का भाग शामिल हैं। इंजीनियरी और विज्ञान के विकास के साथ ही मनुष्य का प्राकृतिक निवास स्थल भी विस्तृत होता गया है एवं और विस्तार लेता जाएगा।

कृत्रिम पर्यावरण, ( artificial environment ) पर्यावरण का वह भाग है जिसे भौतिक उत्पादन के ऐतिहासिक विकास के दौरान मनुष्य ने बनाया ; यह उसकी जीवन क्रिया का उत्पाद है जो स्वयं अपने आप प्रकृति के रूप में विद्यमान नहीं है। कृत्रिम पर्यावरण में मनुष्य द्वारा निर्मित सारे मकानात, नगर, बस्तियां, सड़कें, परिवहन के साधन, औज़ार व उपकरण, तकनीकी यंत्र, कृत्रिम सामग्री, जिसका प्रकृति में अस्तित्व नहीं है, कारख़ाने और संयंत्र शामिल हैं।

इस प्रकार, समाज ऐसी जटिल भौतिक दशाओं ( complex material conditions ) में विकसित होता है, जिसमें मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों निवास स्थल शामिल हैं। इतिहास की भिन्न-भिन्न अवधियों में इन दो उपप्रणालियों की भूमिका और संबंध भिन्न-भिन्न थे और वे मनुष्य के जीवन के क्रियाकलाप को भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभावित करते थे। मनुष्य ने स्वयं भी विभिन्न तरीक़ों से पर्यावरण को प्रभावित किया और उसे बदला ; इस समय उसके जीवन का एक काफ़ी बड़ा भाग उस कृत्रिम माध्यम में गुजरता है जो ख़ुद भी प्राकृतिक पर्यावरण के रूपांतरण ( transformation ) तथा बदलावों ( alteration ) का उत्पाद है।

अब हम यहां कुछ अधिक विस्तार के साथ इस बात की जांच करेंगे कि इतिहास के दौरान समाज तथा पर्यावरण की विभिन्न उपप्रणालियों के बीच अंतर्क्रिया किस प्रकार संपन्न हुई और कैसे बदली।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत किया था, इस बार हम उसी संवाद के दूसरे हिस्से से गुजरेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद – २
( a dialogue about nature and society – 2 )

lascaux-redआशावादी – आपका पूर्वानुमान क्या है?

निराशावादी – दशकों पहले १९६८ में, रोम में एक स्वैच्छिक सार्वजनिक संगठन ‘ रोम क्लब’ की स्थापना हुई। उसमें सर्वोच्च स्तरीय वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री तथा राजनीतिज्ञ शामिल हैं। उनका पहला निष्कर्ष यह था कि उत्पादन की वृद्धि को रोकना, समाज के विकास की रफ़्तार को रोकना, अनेक देशों में भूखमरी पैदा करनेवाली आबादी की तीव्र बढ़ती को घटाना, अपशिष्ट रहित उत्पादन प्रक्रिया की रचना करना और ‘शून्य वृद्धि’ ( zero growth ) की स्थापना करना आवश्यक है। यह सच है कि बाद में इस क्लब तथा ऐसे ही अन्य संगठनों ने अपने विचार बदल दिये और वे सोचने लगे कि नयी आधुनिक तकनीकें स्थिति को सुधार सकती है, बशर्ते कि ऐसे उद्यम ( industries ) बनाये जायें, जो प्राकृतिक संसाधनों को बचाते हैं और उनकी किफ़ायत करते हैं।

आशावादी – क्या इसका तात्पर्य है कि अगर हम इन सिफ़ारिशों पर ध्यान दें तो मनुष्य को मौत से बचाया जा सकता है और प्रकृति का विनाश रोका जा सकता है? क्या बात ऐसी ही है? तो हमें ऐसा करने से कौन रोक रहा है?

निराशावादी – पहली बात तो यह कि मैंने यह दावा नहीं किया कि ‘रोम क्लब’ तथा प्रकृति की सुरक्षा के अन्य संगठनों की सिफ़ारिशों पर अमल करके मनुष्यजाति को बचाया जा सकता है। इससे प्रकृति को शायद ही मदद मिले। जो नष्ट हो गया है, इस्तेमाल हो गया है और जला दिया गया है, उसे फिर से वापस नहीं लाया जा सकता है। दूसरी बात यह है कि मनुष्यजाति ने अक़्लमंदी की आवाज़ कभी नहीं सुनी। आज के लक्ष्यों की प्राप्ति के प्रयत्नों में वह कल के बारे में नहीं सोचती है।

आशावादी – मैं सोचता हूं कि आप ग़लती पर हैं। मनुष्य का सार ( essence ) अपरिवर्तनीय नहीं है, यह बदलता रहता है। लोग जिन सामाजिक दशाओं, सामाजिक प्रणाली और उत्पादन पद्धति के अंतर्गत रहते हैं, उन्हीं के अनुरूप एक या दूसरे ढंग का आचरण करते हैं। जब ये बदल जायेंगी, तो कार्य पद्धति और प्रकृति के प्रति उनके रुख़ ( attitude ) में भी बदलाव हो जायेंगे। मैं सोचता हूं कि तब काफ़ी कुछ को सही करना और स्थिति को आज के मुक़ाबले बेहतर बनाना संभव हो जायेगा।

निराशावादी – परंतु अगर यह किया जा सकता है, तो पिछले कई हज़ार वर्षों के दौरान इस तरह का कुछ क्यों नहीं किया गया?

आशावादी – क्योंकि इन सारे वर्षों में निजी स्वामित्व ( private property ) का बोलबाला रहा और व्यक्तिगत, समूहगत तथा वर्ग हितों और सर्वोपरि निजी उद्यमियों तथा बड़ी इजारेदारियों के हितों को समाज के हितों के ऊपर रखा गया। इस तरह की सामाजिक प्रणालियां और राजनैतिक सत्ताएं रही जो यह सब संभव बनाती रहीं।  इस स्थिति में लोग उन दृष्टिकोणों, मानकों, मूल्यों तथा वैचारिकियों से निर्देशित होते रहे, जिनमें सारी मानवजाति के हितों को और फलतः प्रकृति के साथ तर्कबुद्धिसम्मत, ध्यानयुक्त, औचित्यपूर्ण संबंध के हितों को ध्यान में नहीं रखा गया।

निराशावादी – लेकिन क्या इस स्थिति को बदला जा सकता है?

आशावादी – निस्संदेह।

निराशावादी – कैसे?

आशावादी – मेरा विचार है कि इसका मानवजाति के सबसे बुनियादी हितों, यों कहें कि पर्यावरण के प्रति उसके रुख़ के सार से संबंधित सर्वोत्तम उत्तर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दर्शन ने दिया है। वह क्या है जो इसे अन्य दार्शनिक प्रस्थापनाओं से भिन्न बनाता है? इसका सकारात्मक कार्यक्रम तथा उसके कार्यान्वित करने की संभावनाएं क्या हैं?

इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में हम आगे थोड़ा विस्तार से विचार करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद – १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधों पर चर्चा की शुरुआत की थी, इस बार हम प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद का पहला हिस्सा प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद – १
( a dialogue about nature and society – 1 )

bicuso.reflection_lgप्रकृति तथा समाज के अंतर्संबंध तथा अंतर्विरोधों पर विभिन्न दृष्टिकोणों पर प्रकाश डालने और ऐतिहासिक आशावादियों ( historical optimists ) के विचारों की सत्यता को दर्शाने के लिए हम दो प्रतीकात्मक पात्रों, निराशावादी ( pessimist ) और आशावादी ( optimist ) के बीच एक संवाद यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

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निराशावादी – मानवजाति का सारा इतिहास बतलाता है कि समाज के विकास का नतीजा प्रकृति का विनाश है। लोग अंततः पर्यावरण को नष्ट कर देंगे और स्वयं अपने अस्तित्व की दशाओं को ख़त्म कर डालेंगे।

आशावादी – परंतु अतीत में जो कुछ हुआ, भविष्य में भी वैसा ही होना कोई जरूरी नहीं है। लोगों ने विराट अनुभव अर्जित कर लिया है, वे शक्तिशाली उपकरणों तथा वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करते हैं और उनके ज़रिये वे पर्यावरण के विनाश को रोक सकते हैं।

निराशावादी – बिल्कुल उल्टी बात। तकनीक के पीछे-पीछे प्राकृतिक संसाधनों का क्षयीकरण होता जाता है। ख़ुद देखिये : मोटरकारें, ट्रेक्टर, तापबिजलीघर, विशाल समुद्री जहाज और विमान प्रतिदिन करोड़ों बैरल तेल व तेल उत्पाद फूंक रहे हैं। उर्वरकों, दवाओं, कृत्रिम रेशों, नयी सामग्री, आदि के उत्पादन के लिए रासायनिक कारख़ाने भी तेल का इस्तेमाल कर रहे हैं। यही बात कोयले के बारे में भी कही जा सकती है। किंतु तेल और कोयले के प्राकृतिक भंडार निश्चय ही सीमित हैं। जब वे ख़त्म हो जायेंगे तो लोग क्या करेंगे?

आशावादी – किंतु इन खनिज ईंधनों के नये स्रोतों की खोज भी लगातार हो रही है।

निराशावादी – यह सच तो है, लेकिन देर-सवेर वे भी निःशेष ( exhausted ) हो जायेंगे। यही नहीं, जो यंत्र तेल के उत्पाद जलाते हैं वे साथ ही साथ वायुमंडलीय आक्सीजन भी जलाते जाते है। एक छोटी कार एक घंटे में उतनी ही आक्सीजन नष्ट करती है, जितनी कि एक बड़ा, सदियों पुराना कोई पेड़ वायुमडल में २४ घंटे के अंदर विसर्जित करता है। हम विशाल जंगलों को भी लगातार नष्ट कर रहे हैं और उनकी लकड़ी को तापन, निर्माण तथा काग़ज़ बनाने के लिए इस्तेमाल में ला रहे हैं। इसके अलावा, जंगल की आगों के कारण भी, जो हमारे युग में अधिक से अधिक बार लग रही है, जंगलों का विनाश हो रहा है। और ज़रा सारी फैक्टरियों की चिमनियों की बात सोचिये जो वायुमंडल में कार्बन डाइआक्साइड और दूसरे हानिकारक अपशिष्टों ( waste ) का विसर्जन कर रही हैं; इसमें यह बात भी जोड़ दीजिये कि पृथ्वी की सतह का हरित वानस्पतिक आवरण भी विनाशक ढंग से घट गया है और आप यह समझ लीजिये कि हम पर ऊर्जा साधनों के ख़त्म होने का ही नहीं, बल्कि आक्सीजन की भूख का ख़तरा भी मंडरा रहा है।

आशावादी – आप एक बहुत ही निराशावादी तस्वीर पेश कर रहे हैं।

निराशावादी – बात यहीं पर ख़त्म नहीं होती। पृथ्वी की, और ख़ासकर शहरों की तेज़ी से बढ़ती हुई आबादी के लिए मीठा पानी पर्याप्त नहीं है। यही नहीं, शहरी मल-पदार्थों और औद्योगिक अस्वास्थ्यकर अपशिष्टों से नदियों तथा सागरों का पानी दूषित हो रहा है। उनसे मछलियां और जलीय वनस्पति नष्ट हो रही है और प्लैंक्टन ( plankton ) मारे जा रहे हैं, जो समुद्री प्राणियों का खाद्य हैं। इसके अलावा, उर्वर ज़मीन तथा प्राकृतिक भूदृश्यावलियों, आदि का विनाश भी इस तस्वीर में जोड़ देना चाहिए।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
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