परिमाण की संकल्पना ( concept of quantity )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत दूसरे नियम के व्यवस्थित निरूपण की दिशा में गुण की संकल्पना को प्रस्तुत किया था, इस बार हम परिमाण तथा छलांग की संकल्पना पर चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


परिमाण तथा छलांग की संकल्पना
( concept of quantity and leap )

2010-08-20-LISAADAMSAMorassofContradictionsगुण ( quality ) के अलावा चीज़ों तथा प्रक्रियाओं में एक निश्चित परिमाण ( मात्रा ) में होने की विशिष्टता भी होती है। हम अपने अनुभवों से जानते हैं कि इस तरह की घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को, जो कुछ हद तक स्थायी ( constant ) व अपरिवर्तनीय ( invariable ) होती हैं, किसी अन्य में संपरिवर्तित ( converted ) किये बिना भी ऐसे बदला जा सकता है, जिससे वे पहले की ही तरह निज रूप में बनी रहती हैं। इस विशेषता को संकल्पना ‘परिमाण’ ( quantity ) से द्योतित किया जाता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के जीवन के दौरान उसके रंगरूप में विभिन्न परिवर्तन आ सकते हैं, उसकी चमड़ी का रंग बदल जाता है. बाल सफ़ेद हो जाते है या गिर जाते है, वज़न बदल जाता है, चहरे पर झुर्रियों की संख्या और वितरण में परिवर्तन हो जाता है, आदि। इन परिवर्तनों को परिमाणात्मक ( मात्रात्मक ) कहा जाता है, क्योंकि व्यक्ति को देखने, विभिन्न कालों में लिये गये उसके छायाचित्रों पर नज़र डालने पर यह कहा जा सकता है कि यह वही चहरा है और एक ही व्यक्ति है और फलतः उसके गुणात्मक लक्षण अधिकांशतः संरक्षित है, उसमें कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है।

इस तरह हम देखते हैं कि समय के साथ किसी भी घटना या प्रक्रिया में कमोवेश उल्लेखनीय परिवर्तन होते हैं। उम्र के साथ व्यक्ति के रुधिर की संविरचना ( composition ) बदल जाती है, विभिन्न शरीरकार्यिक क्रियाएं ( physiological function ) प्रकट तथा ग़ायब होती हैं, विभिन्न अंगों का आकार परिवर्तित होता है, आदि। कारखानों में नयी मशीनें, नयी लाइनें, पूरी की पूरी कार्यशालाएं तथा कार्यदल बदल जाते हैं। लेकिन व्यक्ति और कारख़ाने की गुणात्मक निश्चायकता बनी रहती है। जिन संयोजनों ( connections ) तथा संबंधों ( relations ) के परिवर्तन, एक प्रणाली ( system ) के अलग-अलग अनुगुणों ( properties ) तथा लक्षणों ( characteristics ) में निश्चित सीमाओं के अंदर रद्दोबदल ( alteration ) कर देते हैं, किंतु उसकी गुणात्मक निश्चायकता ( qualitative definiteness ) को नहीं बदलते, उन्हें परिमाणात्मक कहा जाता है और उन्हें परावर्तित करने वाले प्रवर्ग को ‘परिमाण’ ( quantity ) या ‘परिमाणात्मक निश्चायकता’ ( quantitative definiteness ) कहते हैं

परिमाणात्मक निश्चायकता गुणात्मक की ही भांति वस्तुगत ( objective ) होती है। एक गुण के अंदर अलग-अलग अनुगुणों या लक्षणों में क्रमिक ( gradual ) परिमाणात्मक परिवर्तन हो सकते हैं। इस तरह परिमाण एक ऐसी निर्धार्यता है, जो प्रदत्त ( given ) गुण के विकास के मान, रफ़्तार तथा कोटि ( degree ) के बारे में बताती है। उन्हें नापा जा सकता है और उनकी तुलना की जा सकती है। नापजोख के परिणामों को हमेशा अंकों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है, जिससे परिमाणात्मक परिवर्तनों के अध्ययन व वर्णन में गणित ( mathematics ) का अनुप्रयोग ( application ) किया जा सकता है। परिमाणात्मक परिवर्तनों का अध्ययन प्रकृति, समाज और चिंतन की अत्यंत भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं पर गणित को लागू करने का आधार हैं।

IMG_6393-he-caused-the-revolution-webपरिमाण की उपरोक्त परिभाषा में एक महत्त्वपूर्ण पद, यानि ‘निश्चित सीमाएं’ ( certain limits ) शामिल है। इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। बात यह है कि परिमाणात्मक परिवर्तन, यानि संयोजनों, तत्वों तथा उपप्रणालियों में होनेवाले वे परिवर्तन जो एक घटना की गुणात्मक निश्चायकता को प्रभावित नहीं करते, वे ऐसी निश्चित सीमाओं के अंदर ही हो सकते हैं, जिनके परे ( beyond ) परिमाणात्मक परिवर्तन, गुणात्मक संयोजनों व संबंधों को भंग ( break ) या विखंडित ( rupture ) कर सकते हैं और मुख्य तत्व तथा उपप्रणालियों में गड़बड़ी ( disturbance ) पैदा कर सकते हैं। इन विशिष्ट सीमाओं के अस्तव्यस्त होने पर गुण भी गड़बड़ा जाता है। पुराने संयोजन और संबंध टूट जाते हैं और पूरी तरह से या आंशिक रूप से ग़ायब हो जाते हैं तथा भूतपूर्व ( former ) तत्व और उपप्रणालियां परिवर्तित हो जाती हैं। उनके स्थान पर नये मुख्य संयोजनों, संबंधों, उपप्रणालियों तथा तत्वों की स्थापना हो जाती है और फलतः एक नया गुण उत्पन्न हो जाता है। पुराने गुणात्मक संबंधों तथा संयोजनों का यह विघटन ( break ) और इन तत्वों व उपप्रणालियों का नयी से प्रतिस्थापन ( replacement ) छलांग ( leap ) कहलाता है

संकल्पना ‘छलांग’ भी दैनिक जीवन से ली गई है, लेकिन दर्शन में इसने एक विशेष अर्थ ग्रहण कर लिया है, जो कि किसी प्रकार के द्रुत परिवर्तन ( rapid shift ) या सामान्य कूद ( jump ) से नहीं है, बल्कि इसका अर्थ घटना के मुख्य स्थायी गुणात्मक संयोजनों के रूपांतरण ( transformation ) से होता है। बेशक, यह विघटन परिमाणात्मक परिवर्तनों की पूर्ववर्ती अवधि की तुलना में सापेक्षतः शीघ्रता से होता है। इसलिए हम परिमाणात्मक परिवर्तनों को समरस ( even ), क्रमिक ‘सुचारू’ ( smooth ) या धीमा भी समझते हैं और छलांगों या गुणात्मक परिवर्तनों को तात्क्षणिक ( instantaneous ) या ‘विस्फोटक’ ( explosive ) मानते हैं। किंतु ठोस मामलों में एक छलांग कमोबेश दीर्घकालिक ( protracted ) और जटिल ( complex ) हो सकती है। इसका ‘अल्पकालिक’ ( short-term ) स्वभाव सोपाधिक ( conditional ) होता है और इस अल्पकालिकता की बात केवल पूर्ववर्ती गुणात्मक परिवर्तनों के साथ तुलना के रूप में ही की जा सकती है। उदाहरण के लिए, एक भूवैज्ञानिक युग ( geological age ) से दूसरे में संक्रमण ( transition ) की अवधि लाखों वर्ष ही थी। वे केवल सापेक्षतः उन मंद परिमाणात्मक परिवर्तनों की अवधियों की तुलना में ही अल्पकालिक या तात्क्षणिक प्रतीत हो सकते हैं जिन्हें संपन्न होने में करोड़ो वर्ष लगे।

इस तरह दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि ‘परिमाणात्मक परिवर्तन’ तथा ‘गुणात्मक परिवर्तन’ ( छलांग ) में परावर्तित प्रक्रियाओं के प्रमुख लक्षण प्रक्रिया की लंबाई या अवधि ( length or duration ) नहीं, बल्कि उसकी अंतर्वस्तु ( content ), उसका सार ( essence ) है। समाज में इन परिवर्तनों की समझ के लिए यह निष्कर्ष ( conclusion ) विशेष महत्त्वपूर्ण है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय