सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत क़ानूनी चेतना और क़ानून पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक चेतना के रूप में नैतिकता
(Morality as a form of Social Consciousness)

सामाजिक चेतना का एक और रूप ‘नैतिकता’ (morality) है जो क़ानून (law) तथा क़ानूनी चेतना (legal consciousness) के साथ घनिष्ठता के साथ जुड़ी है। नैतिकता क्या है ?

किसी भी व्यक्ति से पूछिये कि क्या झूठ बोलना, चोरी करना, कमज़ोर को सताना, ठगना या बड़े अधिकारियों की चापलूसी करना अच्छी बात है? उससे पूछिये कि क्या ग़द्दारी करना, दूसरे लोगों की कमाई खाना अच्छी बात है और कि क्या पाखंड, धृष्टता, लोभ तथा लोलुपता उचित है? व्यवहार, कर्म तथा चरित्र की इन विशेषताओं को अधिकांश लोग नकारात्मक, हानिकर तथा अत्यंत अवांछित (undesirable) मानते हैं। दूसरी तरफ़, उद्यमशीलता तथा अध्यवसाय (diligence), ईमानदारी, परोपकारिता, नम्रता, उदारता, मैत्रीपूर्णता, कर्तव्य के प्रति निष्ठा, देशभक्ति, समान उद्देश्य में दिलचस्पी, आदि को सकारात्मक कर्म तथा सद्‍गुण समझा जाता है। इस प्रकार के मूल्यांकन नैतिक माने जाते हैं और किसी भी समाज में, लोगों की हर समष्टि (collective) में विद्यमान नैतिक मूल्यों तथा व्यवहार के क़ायदों (rules) की प्रणाली के अंग हैं और इनकी उत्पत्ति मूलतः मानव समाज की रचना के दौरान हुई।

फलतः नैतिकता, लोगों के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में एक दूसरे के, अपनी श्रम समष्टि के, वर्ग, राज्य और संपूर्ण समाज के प्रति उनके व्यवहार के क़ायदों, मानकों, मूल्यों और आदर्शों की एक प्रणाली है। क़ानून तथा क़ानूनी चेतना और नैतिकता के बीच क्या अंतर है? सबसे पहला अंतर तो यह है कि क़ानून, राज्य द्वारा निरूपित (formulate) तथा लागू किया जाता है, जबकि नैतिकता के मानक जनमत के प्राधिकार (authority of public opinion) पर आधारित होते हैं। क़ानून निश्चित ऐतिहासिक दशाओं में बनता है, प्रभुत्वशाली वर्ग (dominant class) के संकल्प (will) को व्यक्त करता है। इसके विपरीत, विगत, वर्तमान तथा भावी, कोई भी समाज नैतिकता के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकता है, क्योंकि लोग किन्हीं भी हालतों में विभिन्न कर्म करते हैं, भिन्न-भिन्न तरीक़ों से व्यवहार करते हैं, अन्य लोगों के व्यवहार का मूल्यांकन करते हैं और उन्हें स्वयं अपने व्यवहार का मूल्यांकन तथा उसका समर्थन करवाना होता है। किंतु इससे यह नतीजा नहीं निकलता कि नैतिकता और उसकी मुख्य प्रस्थापनाएं शाश्वत (eternal) और अपरिवर्तनीय (immutable) हैं। नैतिकता के उसूल (principle), क़ायदे और मानदंड (norms) लोगों के सामाजिक सत्व (social being) द्वारा निर्धारित होते हैं और उसके साथ-साथ बदलते हैं

इस प्रकार के उसूलों, जैसे ‘हत्या मत कर’ और ‘चोरी मत कर’ का उद्‍गम ऐतिहासिक है। सामूहिकतावादी आदिम समाज में, जहां निजी स्वामित्व (private property) नहीं था, चोरी करना असंभव था और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात निरर्थक थी। कुछ जातियों में एक शत्रु की या अपने ही क़बीले के सदस्य की या सहधर्मी की ही हत्या करना ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में क़बीले के मुखिया की भी आनुष्ठानिक (ritual) हत्या करना बहुत समय तक नैतिकता के मानकों के विरुद्ध नहीं था। किंतु वर्गीय तथा ऐतिहासिक अंतरों के ( जिन्हें विभिन्न युगों और जातियों की प्रणाली में स्पष्टतः देखा जा सकता है, जैसे मध्ययुगीन कुलीनों की नैतिकता द्वारा व्यापार की भर्त्सना अथवा अन्य धर्मों के अनुयायियों के साथ कठोर बर्ताव को उचित ठहराना ) बावजूद सामान्य मानवीय नैतिक मूल्यों, मानदंडों और उपदेशों (precepts) का अस्तित्व भी है, जो विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं (socio-economic formations) तथा विभिन्न जातियों (nations) और समाज के वर्गों के लिए उचित हैं।

हमारे युग में ऐसे मूल्य हैं – व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा (dignity), व्यक्ति की अनुल्लंघनीयता (inviolability), स्वास्थ्य रक्षा, भावात्मक जगत और बच्चों की सुरक्षा, विश्व शांति का संरक्षण और नाभिकीय महाविनाश से मानवजाति का उच्छेदन (extinction) न होने देना। समान मानवीय हितों तथा स्थायी नैतिक मूल्यों का अस्तित्व ही वह चीज़ है, जो महत्वपूर्ण मानवीय लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए लोगों के सहयोग के आधार की रचना करती है। नैतिकता के वर्गीय स्वभाव (class nature) को मान्यता देने से, सामान्य मानवीय मूल्यों और हितों का अस्तित्व खारिज (rule out) नहीं होता है।

वर्ग समाज में नैतिक उसूलों का एक वर्गीय-समूहगत स्वरूप होता है। वर्ग की और सर्वोपरि शोषक वर्ग की स्थितियों की पेचीदगी (complexity) तथा आंतरिक अंतर्विरोधात्मकता (contradictoriness) के कारण प्रतिरोधी विरचनाओं (antagonistic formations) में नैतिकता भी आंतरिक रूप से अंतर्विरोधात्मक (contradictory) होती है। मसलन, ये उसूल कि ‘हत्या मत कर’, ‘आंख के बदले आंख’ और ‘दांत के बदले दांत’ एक दूसरे का ही खंडन ही नहीं करते, बल्कि धर्म-शास्त्रों के प्राधिकार द्वारा दोषमुक्त ठहराये जाते भी है। नैतिकता की यह अंतर्विरोधात्मक प्रकृति अक्सर ऐसी कार्रवाइयों व कर्मों को उचित ठहराने में समर्थ बना देती है, जो प्रदत्त स्थिति में किसी के हितों के सर्वाधिक अनुरूप हों। प्रभुताशाली, शासक वर्गों की नैतिक चेतना की सबसे लाक्षणिक विशेषता है नैतिक उसूलों, मानकों तथा मतों और वास्तविक, असली व्यवहार के बीच अंतर्विरोधों तथा गहरे विचलन (divergence) का होना। उदाहरण के लिए, पूंजीवादी नैतिकता शब्दों में अध्यवसाय, कठोर कार्य और व्यापारिक ईमानदारी को सर्वोच्च सद्‍गुण घोषित तो करती है, किंतु इस तथ्य के साथ अनायास समझौता कर लेती है कि पूंजीपति वर्ग का अधिकांश, भ्रष्टाचार, स्टॉक-एक्सचेंज की बेईमानियों में आकंठ डूबा है और अन्य लोगों के श्रम पर जीवित है।

इसके विपरीत, समाजवादी नैतिकता के मुख्य लक्षण हैं नैतिक उसूलों तथा नैतिक व्यवहार के बीच एकता और आंतरिक सहमति। यह नैतिकता मूल रूप से, मेहनतकशों के नैतिक उसूलों तथा व्यावहारिक मानकों की प्रणाली के रूप में उत्पन्न होने की वजह से समाजवादी समाज में सार्विकता (universality) का रूप ग्रहण करती है। निष्ठापूर्ण कार्य, ईमानदारी, परोपकारिता, पारस्परिक सम्मान, अपनी औक़ात का अहसास, मानवाधिकारों के लिए सम्मान, अंतर्राष्ट्रीयतावाद, सामूहिकता, व्यक्ति की क्षमताओं तथा प्रतिभाओं का आदर और पाखंड व ढोंगीपन का अस्वीकार, इसके सर्वोच्च सद्‍गुण तथा उसूल हैं। ऐसे उसूलों की घोषणा करना आसान है, किंतु उन्हें कार्यान्वित करना एक पेचीदा और अंतर्विरोधात्मक मामला है। इसलिए, समाजवादी समाज का एक मुख्य कार्य एक ओर, ऐसे नैतिक मानदंडो को कार्यान्वित करने के वास्तविक पूर्वाधारों का, यानी वस्तुगत दशाओं (objective conditions) का निर्माण व अंतर्विरोधों का समाधान करना और दूसरी ओर, प्रत्येक व्यक्ति को स्व-अनुशासन की तथा वास्तविक कर्मों व नैतिक उसूलों के बीच विचलन के प्रति असहिष्णुता (intolerance) की भावना में दीक्षित करना।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम