निषेध के निषेध का नियम का सार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम’ पर चर्चा करते हुए निषेध के निषेध’ की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘निषेध के निषेध का नियम का सार” प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


निषेध के निषेध का नियम – चौथा भाग
निषेध के निषेध का नियम का सार

images (1)अभी तक की विवेचना के आधार पर, अब हम निषेध के निषेध ( negation of the negation ) के द्वंद्वात्मक नियम की प्रमुख प्रस्थापनाओं ( prepositions ) को निरूपित ( formulate ) कर सकते हैं। यह नियम प्रकृति, समाज और चिंतन में विकास की दिशा का निर्धारण ( determines ) करता है।

हेगेल  के कृतित्व से उपजे इस नियम को परंपरानुसार निषेध के निषेध का नियम कहते हैं, किंतु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialist dialectics ) में इसे परस्पर अपवर्जक निषेधों ( mutual exclusive negations ) का एक युग्म ( pair ) नहीं, बल्कि विकास की ऐसी असीम प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें द्वंद्वात्मक निषेध, पुरातन ( old ) से नूतन ( new ) की ओर रास्ते को खोलते हैं और साथ ही पुरातन से नूतन के संबंध ( link ) को तथा उनके बीच सातत्य ( continuity ) को सुनिश्चित बनाते हैं। इस नियम की मुख्य प्रस्थापनाएं साररूप में इस प्रकार हैं:

( १ ) विकास के दौरान ऐसा नूतन लगातार उत्पन्न होता रहता है, जो पहले विद्यमान नहीं था और जो पुरातन का द्वंद्वात्मक निषेध होता है।

( २ ) निषेध के दौरान हर मूल्यवान और जीवंत ( viable ) चीज़ संरक्षित ( preserved ) रहती है और परिवर्तित रूप में नूतन में सम्मिलित ( include ) होती है। पुरातन के केवल उसी अंश का उन्मूलन ( elimination ) होता है, जो गतावधिक ( outlived ) हो गया है और विकास में बाधा डालता है।

( ३ ) विकास में पहले की बीती अवस्थाओं की एक निश्चित वापसी और पुनरावर्तन ( repetition ) होता है, किंतु एक नये और उच्चतर स्तर ( higher level ) पर और इसीलिए उसका स्वरूप वृत्ताकार या रैखिक नही, सर्पिल ( spiral ) होता है।

( ४ ) विकास की प्रक्रिया के दौरान पुराने से नये में संक्रमण ( transition ) के समय वस्तुगत स्वरूप की प्रगतिशील तथा पश्चगामी ( प्रतिगामी ) प्रवृत्तियां ( progressive and regressive tendencies ) होती हैं। सारी घटना का परिवर्तन प्रगतिशील होगा या पश्चगतिक, यह इस बात पर निर्भर होता है कि इन द्वंद्वात्मक्तः संबंधित दो प्रवृत्तियों में से कौनसी प्रभावी ( dominant ) है।

miro5जब हम निषेध के निषेध के नियम की तुलना द्वंद्ववाद के अन्य बुनियादी नियमों ( विरोधियों की एकता और संघर्ष का नियम तथा परिणाम से गुण में रूपांतरण का नियम ) से करते हैं, तो उनको परस्पर जोड़नेवाले गहरे संबंध को आसानी से देखा जा सकता है। ‘अंतर्विरोधों के समाधान’, ‘गुणात्मक छलांग’ तथा ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ जैसे प्रवर्गों ( categories ) के साथ तुलना में यह बात स्पष्टतः सामने आती है। वास्तव में कोई भी गुणात्मक छलांग ( qualitative leap ) सारतः घटना के प्रमुख आंतरिक अंतर्विरोधों ( internal contradictions ) का समाधान ( resolution ) होती है। इसी प्रकार, एक द्वंद्वात्मक निषेध यह बतलाता है कि पुराने गुण से नये में छलांगनुमा ( leap-like ) संक्रमण में संरक्षण या निरंतरता का और साथ ही उन्मूलन और विनाश का एक घटक विद्यमान होता है। इस तरह द्वंद्ववाद के मुख्य नियम विकास के स्रोतों, रूप और दिशा के बारे में पूर्ण ज्ञान प्रदान करते हैं और इसी से उनकी आंतरिक एकता निर्धारित होती है।

प्रकृति, समाज तथा चिंतन के विकास के इन सबसे सामान्य नियमों का विराट व्यावहारिक तथा राजनीतिक महत्त्व भी है। इनमें पारंगता हमें सारी घटनाओं को उनके आंतरिक, पारस्परिक संयोजन तथा उनकी पारस्परिक कारणता में देखना सिखाती है। ये बताते हैं कि व्यावहारिक जीवन में उत्पन्न होनेवाली समस्याओं को अधिभूतवादी ( metaphysical ) ढंग से, अन्य से पृथक ( isolated ) रूप में देखना-समझना एक सही नज़रिया नहीं है। अंतर्संबंधित ( interconnected ) समस्याओं और कार्यों को सतत गति तथा विकास में भी देखना चाहिए, क्योंकि स्वयं जीवन, यानि उन्हें जन्म देनेवाली वास्तविकता भी परिवर्तित और विकसित हो रही है।

द्वंद्ववाद के ये नियम सिखलाते हैं कि हमें जीवन के अंतर्विरोधों को नजरअंदाज़ ( ignore ) नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें खोजना, उनका उद्‍घाटन करना तथा उनके समाधान की प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि आंतरिक, बुनियादी अंतर्विरोधों का समाधान ही किसी भी विकास का असली स्रोत होता है। जब हमारा सामना क्रमिक, कभी-कभी महत्त्वहीन, गुणात्मक परिवर्तनों से होता है, तो हमें इस बात पर लगातार ध्यान देना चाहिए कि वे देर-सवेर आमूल गुणात्मक परिवर्तनों को जन्म दे सकते हैं। साथ ही गुणात्मकतः नयी घटनाओं का उद्‍भव पुरानी घटनाओं के पूर्ण उन्मूलन का द्योतक नहीं होता। पूर्ववर्ती विकास के दौरान रचित हर मूल्यवान और जीवंत चीज़, छलांग और निषेध की प्रक्रिया में संरक्षित रहती है तथा और भी अधिक विकसित होती है। समाज के सही वैज्ञानिक, राजनीतिक नेतृत्व का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह जानना है कि पुरातन में नूतन के बीजों को कैसे देखा जाये, उन्हें समय रहते कैसे समर्थन दिया जाये तथा विकसित होने एवं उचित स्थान पर पहुंचने में कैसे सहायता दी जाये।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

निषेध का निषेध

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम’ पर चर्चा करते हुए ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘निषेध के निषेध’ की अवधारणा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


निषेध के निषेध का नियम – तीसरा भाग
निषेध का निषेध

main-qimg-15080eaa6d9ffcd547a8be1d536028dcविकास प्रक्रिया ( development process ) की दार्शनिक व्याख्या में द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negation ) को ही, केवल निषेध ( negation ) ही कह दिया जाता है, परंतु इसका विशिष्ट अभिप्राय यही होता है। निषेध के सबसे महत्त्वपूर्ण अनुगुण ( properties ) और विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

सबसे पहले, निषेध सार्विक ( universal ) है। यह प्रकृति और समाज में, किसी भी विकास में अंतर्भूत ( immanent ) होता है, ऐसे विकास का एक आवश्यक पहलू है। जैव प्रकृति में शताब्दियों के दौरान हुए विकास में, पुरानी जैविक जातियां उन नयी जातियों से निषेधित हो जाती हैं, जो पुरानी जातियों की बुनियाद पर पैदा होती हैं और उनसे अधिक जीवनक्षम ( sustainable ) होती हैं। समाज के ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में नये और उच्चतर समाजों द्वारा पुरानों का प्रतिस्थापन है – आदिम-सामुदायिक समाज का दास-प्रथा वाले समाज से, दास-प्रथा वाले समाज का सामंती से, सामंती समाज का पूंजीवादी समाज से और पूंजीवादी समाज का समाजवादी समाज से। संज्ञान के क्षेत्र में भी, कुछ वैज्ञानिक प्रस्थापनाएं उन अन्य प्रस्थापनाओं के लिए स्थान छोड़ देती हैं, जिनमें वास्तविकता ( reality ) के संपर्कों का अधिक सही परावर्तन ( reflection ) होता है।

दूसरे, निषेध विरोधियों ( opposites ) की एकता व संघर्ष में अंतर्निहित है। एक अंतर्विरोध ( contradiction ) के विरोधी पक्षों का भिन्न-भिन्न महत्त्व होता है और वे किसी वस्तु या घटना के विकास में भिन्न-भिन्न भूमिकाएं अदा करते हैं। इनमें एक वस्तु या घटना को परिवर्तित करने की और संधान ( colligation ) में होता है और फलतः प्रगतिशील भूमिका ( progressive role ) अदा करता है। दूसरा वस्तु या घटना के स्थायित्व को व्यक्त करता है और इसलिए रूढि़पंथी भूमिका ( orthodox, conservative role ) अदा करता है। निषेध उस आंतरिक अंतर्विरोध का समाधान है, क्योंकि उसमें पुरातन, रूढिपंथी पक्ष पर काबू पा लिया जाता है और नूतन, प्रगतिशील पक्ष प्रभावी हो जाता है।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि निषेध के बिना कोई विकास नहीं होता। कोई भी, किसी भी क्षेत्र में अस्तित्व के अपने पूर्ववर्ती रूपों का निषेध किये बगैर विकसित नहीं हो सकता है। द्वंद्वात्मक निषेध का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण यह है कि यह किसी भी विकास-प्रक्रिया में ही अंतर्निहित ( inherent ) होता है और कभी भी बाह्य या बाहर से समाविष्ट ( incorporated ) किया हुआ नहीं होता।

इस द्वंद्वात्मक निषेध की प्रक्रिया क्या है? यदि बीज से उत्पन्न पौधे के नीचे ज़मीन खोदी जाए तो बीज वहां नहीं मिलेगा। वह कहां गया? नये पौधे की पैदा होने की प्रक्रिया में पहले छोटी-छोटी हरी पत्तियां और नन्हीं-नन्हीं जड़ें उस सामग्री से बनती हैं, जो बीज में मौज़ूद रहती हैं। इस पौष्टिक सामग्री को ढके रहने वाला बाहरी छिलका सचमुच नष्ट हो जाता है और नई वनस्पति की संरचना में शामिल नहीं होता। इस प्रकार बीज के विलोपन की प्रक्रिया में हालांकि एक भाग नष्ट हो जाता है, मगर दूसरा, महत्त्वपूर्ण भाग परिवर्तित रूप में सुरक्षित रहता है : वे अंकुर में परिवर्तित हो जाते हैं। फिर ज्यों ही नन्हीं सी जड़े प्रकट होती हैं, वे आसपास की मिट्टी से अपने लिए पौष्टिक पदार्थ लेने लग जाती हैं, पत्तियां भी हिस्सा लेने लगती हैं और इस तरह एक पौधा प्रकट हो जाता है, जो निश्चित ही बीज का निषेध है। लुप्त बीज की जगह पैदा हुए इस पौधे में बीज से लिए गए पदार्थ ही नहीं, बल्कि आसपास की मिट्टी से लिए गए पदार्थ भी मौज़ूद होते हैं।

images (2)द्वंद्वात्मक निषेध में आंतरिक कारक ( internal factors ) निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। परंतु उसकी तैयारी के क्रम में, बाह्य कारकों ( external factors ) की भी काफ़ी बड़ी भूमिका हो सकती है। मसलन, अपर्याप्त गर्मी या नमी बीज के विकास को तथा अंकुरित होकर उगनेवाले पौधे से उसके निषेध को विलंबित ( delayed ) कर सकती है या रोक भी सकती है। द्वंद्वात्मक निषेध पुरातन ( old ) का विलोपन ही नहीं करता, बल्कि नूतन ( new ) को प्रभावी भी बनाता है। पुरातन नूतन द्वारा कभी भी पूर्णतः नष्ट नहीं किया जाता, द्वंद्वात्मक निषेध पुरातन के सकारात्मक तत्वों को संरक्षित ( preserved ) रखता है और अतीत के विकास की उपलब्धियां नूतन द्वारा स्वांगीकृत ( assimilated ) हो जाती हैं। द्वंद्वात्मक निषेध का सार यही है कि निषेध किए गये चरण में से कुछ छोड़ दिया जाता है, कुछ ग्रहण कर लिया जाता है ( चाहे परिवर्तित रूप में ही सही ) और कुछ ऐसा नया जोड़ा जाता है, जो पहले बिल्कुल नहीं था।

एक जीव नस्ल के विलोपन और उसके स्थान पर दूसरी नस्ल के आविर्भाव की प्रक्रिया में भी ये तीन तत्व प्रत्यक्षतः पाए जाते हैं। जीवों तथा वनस्पतियों की असंख्य जातियों का, जो करोड़ों वर्षों तक एक दूसरे का स्थान लेती रहीं, अध्ययन करने के बाद भी जीवाश्मविज्ञानियों को इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है कि कोई जाति एक बार विलुप्त हो जाने के बाद पुनः उत्पन्न हुई हो। प्रकृति में पूरी तरह आवृति किसी की नहीं होती। यद्यपि बाद में उत्पन्न जातियों में लुप्त जातियों के कुछ लक्षण होते हैं, फिर भी वे हमेशा अपने पूर्वजों के कुछ लक्षणों से वंचित और कुछ सर्वथा नये लक्षणों से युक्त होती हैं। लंबी अवधियों में इन भिन्न लक्षणों का संचय ( accumulation ) पुनः नयी जातियों के आविर्भाव का कारण बनता है। वैज्ञानिक तथ्य इस तत्वमीमांसीय दृष्टिकोण का पूर्णतः खंडन करते हैं कि विकास बारंबार आरंभिक बिंदु पर पहुंचनेवाले एकसमान चक्रों की पुनरावृत्ति, अर्थात चक्राकार गति है।

समाज के विकास में भी नये चरण के आविर्भाव का मतलब पुराने समाज के सभी लोगों, उनके द्वारा निर्मित सभी तकनीकों तथा उनके द्वारा अर्जित सभी जानकारियों का विलोपन नहीं है। यदि सब नष्ट हो जाता है, तो सामाजिक विकास का नया चरण शुरू न होता। नये चरण के समारंभ के लिए आवश्यक है, पुरानी, अनुपयोगी सामाजिक रीतियों, उनके रक्षक राज्य तथा उनकी समर्थक विचारधारा का उन्मूलन ( abolition ), पुराने लोगों का नये समाज में सम्मिलन ( inclusion ) और पूर्ववर्ती चरण में प्राप्त उत्पादन-तकनीकी उपलब्धियों एवं वैज्ञानिक जानकारियों का समुचित उपयोग, गुणात्मक रूप से भिन्न नये उत्पादन संबंधों, नये राज्य तथा नयी विचारधारा का निर्माण ( construction ) और विज्ञान तथा तकनीक की नयी उपलब्धियों के आधार पर अधिक विकसित उत्पादक शक्तियों का सृजन ( creation )।

इस प्रकार हम देखते हैं कि विकास की प्रक्रिया में कोई भी चरण शाश्वत नहीं है। हर चरण देर-सवेर ख़त्म हो जाता है और अगले चरण द्वारा उसका ‘निषेध’ कर दिया जाता है। द्वंद्वात्मक निषेध ( किसी वस्तु या प्रक्रिया के स्वभावगत नियमों के अनुसार होने वाला विकास के चरणों का परिवर्तन ) निषेध किए गये चरण के कालातीत लक्षणों का विलोपन ही नहीं, अपितु उसके कुछ लक्षणों का सुरक्षित रहना और साथ ही ऐसे नये लक्षणों का आविर्भाव भी है, जो पहले कतई नहीं थे। इन्हीं सब कारणों से विकास के चरणों का परिवर्तन अग्रगामी होता है। यद्यपि कोई भी चरण पूरी तरह कभी नहीं दोहराया जाता, फिर भी अधिक बाद के चरणों में काफ़ी पहले के चरणों के लक्षण बदले हुए रूप में दिखाई दे जाते हैं, जिसके फलस्वरूप विकास सर्पिल ( spiral ) बनता है।

विकास की ऊपर वर्णित सभी विशेषताएं निषेध का निषेध ( negation of the negation ) कहलाती हैं। यानि विकास किसी भी प्रक्रिया में केवल एक नहीं, बल्कि कई निषेधों के निषेध, यानि अनेक अनुक्रमिक ( successive ) निषेध होते हैं। वास्तव में, एक गुणात्मक अवस्था से दूसरी अवस्था में होने वाला प्रत्येक संक्रमण ( transition ) पूर्ववर्ती अवस्था का द्वंद्वात्मक निषेध होता है, जिसमें प्रत्येक मूल्यवान ( valuable ) तथा जीवंत ( viable ) चीज़ संरक्षित होती है, प्रतिधारित ( retained ) होती है और बदले हुए गुण में समाविष्ट हो जाती है। इस संरक्षण ( preservation ) और प्रतिधारण ( retention ) को ही सामान्यतः सातत्य ( continuity ) कहते हैं। प्रत्येक नये द्वंद्वात्मक निषेध को सर्पिल की एक नयी कुंडली ( loop ) के रूप में देखा जा सकता है। फलतः सातत्य पुरातन का सीधा-सादा पुनरावर्तन ( repetition ) नहीं है और यांत्रिक उन्मूलन ( mechanical abolition ) भी नहीं है। यह दो विरोधी अनुगुणों की एकता का द्योतक है, अर्थात मूल्यवान तथा जीवंत अनुगुणों के संरक्षण तथा विकास को रोक रहे गतावधिक ( outlived ) अनुगुणों का अस्वीकरण ( rejection ) है। फलतः ‘सातत्य’ एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रवर्ग है, जो किसी भी विकासमान घटना में पुरातन और नूतन के बीच संबंध और अंतर को परावर्तित करता है।

इस तथ्य को कि द्वंद्वात्मक निषेध एक बहुआवर्तित ( multi-repetitive ) प्रक्रिया है, विकास की किन्हीं लंबी प्रक्रियाओं में स्पष्टता से देखा जा सकता है। बारंबार पुनरावृत निषेध ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में भी होता है। प्रत्येक सामाजिक-आर्थिक विरचना ( socio-economic formation ), अपनी पूर्ववर्ती विरचना का द्वंद्वात्मक निषेध होती है। किसी भी विकासमान घटना या प्रक्रिया के सर्पिल की प्रत्येक कुंडली या घुमाव पर नूतन जन्म लेता है, पुराना भंग होता है और साथ ही द्वंद्वात्मक पुनरुत्पादन ( reproduction ) होता है, यानि पूर्ववर्ती विकास में रचित हर मूल्यवान चीज़ का सातत्य होता है और आगे की उन्नति ( advance ) सुनिश्चित होती है। निषेध तथा सातत्य की द्वंद्वात्मक एकता और द्वंद्वात्मक निषेध की रचनात्मक क्रिया इसी में प्रकट होती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

द्वंद्वात्मक निषेध

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम’ पर चर्चा करते हुए ‘विकास की दिशा और उसके सर्पिल स्वरूप’ पर बातचीत की थी, इस बार हम ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ को समझने का प्रयास करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


निषेध के निषेध का नियम – दूसरा भाग
द्वंद्वात्मक निषेध

sand plantद्वंद्ववाद का तीसरा नियम – निषेध के निषेध का नियम ( the law of negation of the negation ) – विकास की प्रक्रिया में निषेध की भूमिका को स्थापित और व्याख्यायित करता है। इसके सार को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम निषेध की अवधारणा को समझ कर इस बारे में सुनिश्चित हो लें कि द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negation ) का क्या अर्थ है और विकास की प्रक्रिया में उसका क्या स्थान है।

जब किसी बीज से अंकुर फूटता है, तो जो नन्हा सा पौधा पैदा होता है, वह देखने में इतनी सरल बनावटवाला और इतना कमजोर होता है कि हल्की सी चोट भी उसके अस्तित्व को ख़त्म करने के लिए क़ाफ़ी है। किंतु यदि वह बीज बरगद जैसे वृक्ष का हो, तो हम देखते हैं कि सदियां बीत जाती हैं, लोगों की कई पीढि़यां गुजर जाती हैं और वही नन्हा सा पौधा इतने विराट व ज़बर्दस्त वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है कि हम उसकी मज़बूती, उसकी जड़ों, तने, टहनियों, पत्तों की जटिल बनावट देखकर दंग रह जाते हैं। हमारी धरती पर अरबों वर्ष पहले पैदा हुए एककोशीय जीव कितने मामूली, अल्पजीवी, कमज़ोर और बनावट तथा व्यवहार की दृष्टि से सरल थे और आधुनिक उच्च विकसित स्तनपायियों की शरीररचना, शरीरक्रिया, मानस तथा व्यवहार कितने अधिक जटिल और टिकाऊ हैं !

ऐसी बात क़दम-क़दम पर देखी जा सकती हैं। प्रकृति और समाज, दोनों का इतिहास इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि विकास पुरातन ( old ) के अवसान तथा नूतन ( new ) के उद्‍भव के साथ जुड़ा है। पृथ्वी की पर्पटी में नयी भौमिक संरचनाएं बनती हैं और वनस्पति और प्राणी जगतों में नये तथा अधिक पूर्णताप्राप्त रूप, पुराने रूपों को प्रतिस्थापित करते हैं। जीव शरीरों में कोशिकाएं पुनर्नवीकृत ( renewed ) होती हैं, यानि पुरानी कोशिकाओं का ह्रास ( deterioration ) होता है और नयी अस्तित्व में आती जाती हैं। मानव समाज भी अपनी आदिम अवस्था से वर्तमान अवस्था तक कितना लंबा फ़ासला तय कर चुका है ! मनुष्यजाति आदिम झुंड़ों, कबिलाई समाजों, दास प्रथा, सामंती और उजरती श्रम ( hired labour ) की व्यवस्था से गुजरती हुई एक लंबा रास्ता तय करके ऐसी अवस्थाओं में पहुंच गई है जहां समानता आधारित सामाजिक व्यवस्था एक जरूरत और हकीकत बनती जा रही है। एक समय था जब मनुष्य पूरी तरह प्रकृति की अनियंत्रित शक्तियों पर निर्भर था और आज उसने नाभिक ऊर्जा समेत इन शक्तियों को मनुष्य की सेवा करने पर बाध्य कर दिया है, कृत्रिम सागरों, वनों और यहां तक कि पृथ्वी के कृत्रिम उपग्रहों की रचना की है।

केवल प्रकृति और ही नहीं, बल्कि स्वयं मानव मन भी परिवर्तित होता है, विश्वदृष्टिकोण ( world outlook ), प्रयत्नों और मनोवेगों में भी फेर-बदल हो जाते हैं। इतनी ही स्तंभितकारी हमारे ज्ञान की प्रगति भी है, जो आज अपनी गहनता, व्यापकता और वृद्धि की रफ़्तार की दृष्टि से हमारे आदिम पूर्वजों के ज्ञान की अपेक्षा अकल्पनीय रूप से उत्कृष्ट ( excellent ) है। नूतन से पुरातन का प्रतिस्थापन ( replacement ) प्रकृति, समाज और चिंतन के क्रम-विकास का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। द्वंद्ववाद सारी वस्तुओं और घटनाओं में उनके अवश्यंभावी अवसान ( निषेध ) के चिह्न देखता है, उद्‍भव और विनाश की प्रक्रिया से नूतन के आविर्भाव, निम्नतर से उच्चतर में निर्बाध गति को देखता है। निषेध, अर्थात नूतन द्वारा पुरातन का प्रतिस्थापन सर्वत्र होता है।

pumpkin_seed_sproutकभी-कभी किसी एक वस्तु या घटना के सामान्य विनाश को, जिससे वह ख़त्म हो जाती है और उसका विकास बंद हो जाता है, निषेध समझ लिया जाता है। मसलन, यदि एक बीज को पीस दिया जाये, फूलों को कुचल दिया जाये, यदि जंगल और उद्यान काट दिये जायें, तो यह विनाश के समकक्ष होगा। इतिहास में बेहतरी के संघर्षों, यहां तक की पूरी की पूरी सभ्यताओं, संस्कृतियों के सर्वनाश के तथ्य दर्ज हैं। किंतु निषेध को केवल विनाश तक सीमित करना अधिभूतवादियों की लाक्षणिकता है। बेशक, निषेध के ऐसे रूप भी होते हैं। परंतु विकास की प्रक्रिया में निषेध क्रमविकास का निराकरण नहीं करता, बल्कि उसकी दशाओं का निर्धारण करता है। यह पुराने रूपों, चरणों का ऐसा निषेध है, जिसके साथ नये रूपों, चरणों का आविर्भाव नाभिनालबद्ध है। यह विकास की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है, निषेध द्वारा प्रगति में एक सकारात्मक भूमिका अदा की जाती है। निम्नतर रूपों से उच्चतर रूपों की ओर प्रगति ( progress ), विकास के एक चरण के स्थान पर सारतः भिन्न अन्य दूसरे चरण के आने की अन्तहीन प्रक्रिया के फलस्वरूप होती है।

विकास का कोई चरण उसके स्थान पर आनेवाले दूसरे, नये चरण में परिवर्तित कैसे होता है?

अमीबा पर कई हज़ार डिग्री ताप का असर इस जीव का विलोपन ( निषेध ) कर देगा। इससे अमीबा के विकास का नया चरण पैदा नहीं होगा, उल्टे इससे जीवन बिल्कुल समाप्त हो जाएगा और उसके स्थान पर जड़ प्रकृति की भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाएं ले लेंगी। अमीबा का स्वभावगत विकास क्रम अमीबा का विभाजन है ( जो कुछ निश्चित परिस्थितियों में होता है ), जिसके परिणामस्वरूप पुराना एककोशीय सूक्ष्मजीव लुप्त हो जाता है ( निषेध ) और उसके स्थान पर दो नई कोशिकाएं, नये सूक्ष्मजीव प्रकट हो जाते हैं। इसी तरह किसी बीज को चारे की तरह पशुओं को खिलाया जाए, या खाने की पौष्टिक चीज़ की तरह मनुष्य खा जाए, तो यह निश्चय ही उस बीज का निषेध, विलोपन होगा। इससे मात्र पशुओं या मनुष्यों के विकास में मदद मिलेगी और जहां तक बीज के स्वभावगत विकास का सवाल है, तो वह यहीं पर ख़त्म हो जाएगा। बीज के स्वभावगत विकास का क्रम यह है कि वह अपने पौधे या वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो।

किसी वस्तु के स्वभावगत नियमों के अनुसार होनेवाले विकास के चरणों के अनुक्रम में, दूसरे चरण के आविर्भाव की प्रक्रिया में ही, पहले चरण के विलोपन को द्वंद्वात्मक निषेध कहते हैं। द्वंद्वात्मक निषेध एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक पुराने गुण का पूर्ण उन्मूलन नहीं होता, बल्कि उसमें जो चीज़ सर्वाधिक मूल्यवान है व सारभूत है तथा घटना के और अधिक विकास को सुनिश्चित बनाने में समर्थ है, उसे संरक्षित रखा जाता है, उसकी पुष्टि की जाती है और वह नये गुण का अंग बन जाता है। इस तरह, एक द्वंद्वात्मक निषेध गुणात्मक संक्रमण ( qualitative transition ) के दौरान होता है। यह यांत्रिक मूलोच्छेदन से, बाह्य शक्तियों के हस्तक्षेप से पैदा हुए विकास चरणों के अनुक्रम से मूलतः भिन्न है, जो गति के दत्त रूप को नष्ट ही करता है। विकास प्रक्रिया की दार्शनिक व्याख्या में इस द्वंद्वात्मक निषेध को ही, केवल निषेध ही कह दिया जाता है, परंतु इसका विशिष्ट अभिप्राय यही होता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

विकास की दिशा और उसका सर्पिल स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत दूसरे नियमपरिमाण से गुण में रूपांतरण के नियम’ का सार प्रस्तुत किया था, इस बार हम द्वंद्ववाद के तीसरे नियम पर चर्चा शुरू करेंगे और इसी के अंतर्गत ‘विकास की दिशा और उसका सर्पिल स्वरूप’ को समझने का प्रयास करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


निषेध के निषेध का नियम – पहला भाग
विकास की दिशा और उसका सर्पिल स्वरूप

Unknown-5अब हम द्वंद्ववाद ( dialectics ) के तीसरे नियम – निषेध के निषेध का नियम ( the law of negation of the negation ) – के व्यवस्थित निरूपण की ओर बढ़ेंगे। यह नियम विकास की प्रक्रिया में निषेध ( negation ) की भूमिका और विकास की दिशा से संबंधित है। इसलिए यह बेहतर होगा कि इस नियम को निरुपित करने से पहले हम विकास की दिशा और उसके सर्पिल स्वरूप ( spiral-like character ) की अवधारणा से परिचित होलें।

गति ( motion ) के एक विशेष प्रकार के रूप में, विकास की विशेषताएं उसके आंतरिक स्रोत तथा रूप ही नहीं, बल्कि उसकी दिशा भी है। विश्व में होनेवाले परिवर्तनों की एक निश्चित दिशा होने का विचार प्राचीन काल में उत्पन्न हुआ। कई चिंतक इतिहास को एक ही धरातल पर होनेवाले अनुवृत्तों का एक क्रम समझते थे। उन्होंने सोचा कि विकास एक सरल रेखा में, जन्म से प्रौढ़ता की, बुढ़ापे और मृत्यु की ओर चलता है और फिर सब कुछ नये सिरे से शुरू होता है। कभी-कभी गति को एक ऐसे बंद वृत्त के अंदर, एक ऐसे अंतहीन परिपथ में होनेवाला परिवर्तन माना जाता था, जिसमें हर वस्तु अपने प्रथम प्रस्थान-बिंदु पर फिर-फिर वापस लौटती है।

प्राचीन यूनानी गणितज्ञ और दार्शनिक पायथागोरस  और उसके शिष्यों ने एक सिद्धांत की रचना की, जिसके अनुसार प्रत्येक ७६,००,००० वर्ष बाद हरेक वस्तु पूर्णरूपेण अपनी ही भूतकालीन अवस्था में वापस आ जाती है। अफ़लातून  और अरस्तू  भी यह सोचते थे कि समाज का विकास एक वृत्ताकार पथ में आवर्ती ( recurring ) अवस्थाओं से गुजरते हुए होता है। प्राचीन चीनी दार्शनिक दोङ्‍ जोङ्‍ शू  का कहना था कि इतिहास चक्रों में आवर्तित होता है। १७वीं सदी के इतालवी चिंतक जियोवानी बतिस्ता वीको  ने इस परिपथ का एक विशेष सिद्धांत पेश किया, जिसके अनुसार समाज चक्रों में विकसित होता है, जिनमें प्रत्येक चक्र समाज के संकट तथा ह्रास में समाप्त होता है और उसके बाद सर्वाधिक आदिम रूप से प्रारंभ करते हुए एक नया चक्र शुरू हो जाता है।

इस तरह, अधिभूतवादी दृष्टिकोण ( metaphysical standpoint ) से विकास या तो वृत्ताकार गति है, जिसमें सारी अवस्थाएं पुनरावर्तित ( repeated ) होती हैं, या सीधी रेखा में गति है, जिसमें पुनरावर्तन repetition ) पूर्णतः अनुपस्थित होता है, किंतु साथ ही इन अवस्थाओं के बीच कोई पारस्परिक निर्भरता नहीं होती। पुरातन ( old ) और नूतन ( new ) के संपर्क टूट जाते हैं और अतीत तथा वर्तमान भविष्य के साथ जुड़े हुए नहीं होते।

सामाजिक विकास के बारे में अन्य दृष्टिकोण भी प्रचलित थे ; मसलन यह दावा किया जाता था कि समाज प्राचीन ‘स्वर्णिम युग’ से लगातार ह्रास की, पश्चगति की स्थिति में है। इस दृष्टिकोण को माननेवालों में प्राचीन यूनानी दार्शनिक हेसिओद  तथा सेनिका  शामिल थे, वे गति को पश्चगामी ( backward ) मानते थे। उच्चतर से निम्नतर की ओर बढ़ने की हरकत के रूप में गति की व्याख्या करनेवाले ऐसे ही अन्य सिद्धांत आज के युग में भी पेश किये जाते हैं। निस्संदेह, इतिहास में ऐसी अवधियां ( durations ) भी हो सकती हैं, होती हैं जब पश्चगामी शक्तियां हावी हो जाती हैं और समाज पीछे की ओर जाने लगता है। किंतु वे मरणोन्मुख या ह्रासमान ( diminishing ) रूपों से अधिक कुछ नहीं होती हैं और उनकी सफलता केवल अस्थायी ( temporary ) होती है। समाज के विकास में, किसी तात्कालिक अवधि में भले ही हम यह पा सकते हैं कि जैसे पश्चगामिता हावी है परंतु, मानव-समाज के इतिहास की लंबी अवधियों के अनुसार देखने पर हम पाते हैं कि अंततोगत्वा नूतन, पुरातन को अटल रूप में प्रतिस्थापित कर देता है और विकास की कुल परिणामी दिशा अग्रगामी ( forward ) ही होती है।

विकास प्रगतिशील ( progressive ) होता है, यह निम्नतर से उच्चतर की, सरक से जटिलतर की ओर जाता है। प्रकृति में अजैव से जैव जगत में संक्रमण ( transition ) होता दिखाई देता है। पृथ्वी पर तापमान तथा वातावरण की दशाओं के इष्टतम ( optimal ) मेल से जीवन का उद्‍भव संभव हुआ। संचित अनुभवात्मक जानकारी की मदद से वैज्ञानिकगण यह निष्कर्ष निकालने में कामयाब हो गये कि सजीव प्रकृति का क्रमविकास ( evolution ) सरल से जटिल की ओर होता है। इस संदर्भ में जे० लामार्क  द्वारा निरुपित सिद्धांत तथा चार्ल्स डार्विन  का क्रमविकास का सिद्धांत बहुत महत्त्वपूर्ण है।

Spiral with New Arrowद्वंद्वात्मक प्रगतिशील विकास की दिशा कैसी है? विकास की दिशा से तात्पर्य देशिक विस्थापन नहीं, बल्कि गुणात्मकतः ( qualitatively ) नयी परिघटनाओं ( phenomena ) के बनने से है। विकास की दिशा पुरातन से नूतन की ओर गति है। यह एक अविपर्येय ( irreversible ) प्रक्रिया है, फलतः नूतन घटना को फिर से पूर्ववर्ती में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। इसे एक सर्पिल गति ( spiral motion ) कहा जा सकता है। यह ऊपर की ओर एक सरल रेखा में नहीं, बल्कि सर्पिल वक्र रेखा में ऐसे होता है, मानो बारंबार पुनरावर्तित हो रहा है।

एक ऊर्ध्व सर्पिल ( vertical spiral ) की किसी एक कुंडली (  loop ) में यदि हम आरंभिक स्थिति में कोई एक बिंदु ‘क’ लें, और उससे सर्पिल में आगे की तरफ़ ऊपर बढ़ाते जाये, तो हम पाते हैं कि एक कुंडली से दूसरी कुंडली में संक्रमण करता हुआ बिंदु ‘क’ एक तरफ़, तो प्रारंभिक स्थिति से इस तरह से अधिकाधिक दूर होता जायेगा, मानो वह सीधी रेखा हो और वह प्रारंभिक स्थिति पर वापस कभी नहीं लौटेगा। दूसरी तरफ़, प्रत्येक कुंडली के साथ वह एक ऐसी स्थिति से गुज़रेगा, जो प्रारंभिक स्थिति का प्रक्षेपण ( projection), उसका वस्तुतः एक पुनरावर्तन ( repetition ) सा ही होगा, परंतु ऊपरी कुंडली की स्थिति में यानि उच्च स्तर पर, यानि यह उसका आंशिक उच्च स्तरीय पुनरावर्तन जैसा होगा।

इस तरह द्वंद्वात्मक प्रगतिशील विकास का स्वरूप सर्पिल होता है ; उसमें हमेशा कुछ नूतन होता है और साथ ही पुरातन की ओर एक प्रतीयमान ( ostensibly ) वापसी भी होती है। सर्पिल रूप इस तथ्य को स्पष्ट कर देता है कि उसका प्रत्येक घुमाव वस्तुतः निचले घुमाव को दोहराता है, पर साथ ही सर्पिल के अर्धव्यास में बढ़ती तथा चक्र का विस्तृततर होना विकास के परिमाण ( quantity ) में वृद्धि तथा उसकी गति में त्वरण ( acceleration ) का द्योतक है और इस तथ्य को दर्शाता है कि यह अधिकाधिक जटिल ( complex ) होता जा रहा है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम – दूसरा भाग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत दूसरे नियम परिमाण से गुण में रूपांतरण के नियम पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और उसका सार प्रस्तुत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियमदूसरा भाग
( पिछली बार से जारी…)

210-009परिमाणात्मक ( quantitative ) और गुणात्मक ( qualitative ) परिवर्तनों के अंतर्संबंध ( interrelation ) को व्यवहार में ध्यान में रखना चाहिए। कोई भी वांछित गुण ( desired quality ) केवल परिमाणात्मक तैयारियों के आधार पर ही हासिल किया जा सकता है, कि नये गुणों का आविर्भाव, एक निश्चित परिमाणात्मक संचय ( accumulation ) पर निर्भर होता है। इसी तरह एक नये परिमाण का रास्ता सामान्यतः नये गुण से होकर गुजरता है।

परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम ( law of transformation from quantity to quality ) सार्विक ( universal ) होते हुए भी विभिन्न ठोस दशाओं में विभिन्न तरीक़ो से प्रकट होता है। गुणात्मक परिवर्तनों की छलांगे ( leaps ), प्रकृति, कालावधि तथा महत्त्व में भिन्न-भिन्न होती हैं। पुराने गुण से नये में सीधे संक्रमण होने पर वे तीव्र हो सकती है तथा जब वह संक्रमण कई मध्यवर्ती अवस्थाओं में क़दम ब क़दम हो, तो वे शनैः शनैः हो सकती हैं। मसलन, सामाजिक क्रांति के दौरान राजनीतिक सत्ता का रूपांतरण सामान्यतः द्रुत गति से होता है, जबकि आर्थिक, सामाजिक और विचारधारात्मक रूपांतरण कई अवस्थाओं से गुजरते हुए आम तौर पर धीरे-धीरे होते हैं।

शनैः शनैः होनेवाले परिमाणात्मक तथा शनैः शनैः होनेवाले गुणात्मक परिवर्तनों में भेद करना जरूरी है। पहले में किसी एक चीज़ के गुण में बदलाव नहीं होता और वह एक निश्चित सीमा तक एक-सा बना रहता है, क्योंकि परिमाणात्मक परिवर्तन बुनियादी, गुणात्मक रूपांतरणों के लिए महज एक रास्ता भर बनाते हैं। दूसरे मामले में, वस्तु के गुण में ही सिलसिलेवार शनैः शनैः परिवर्तन होते हैं और उनके फलस्वरूप पुराने से सर्वथा भिन्न नया गुण पैदा हो जाता है। इस प्रकार, किसी भी विकास के दो पक्ष होते हैं – परिमाणात्मक और गुणात्मक परिवर्तन – और यह उनकी अटूट एकता है। विकास केवल परिमाणात्मक या मात्र गुणात्मक परिवर्तन नहीं, बल्कि दोनों की एक अंतर्क्रिया ( interaction ) है। सामाजिक जीवन में क्रमविकास ( evolution ) एक क्रांति ( revolution ) को प्रेरित करता है, जो अपनी बारी में क्रम-विकास को पूर्ण बनाती है।

अभी तक जो कुछ बताया गया है उसका समाहार करने के लिए हम द्वंद्ववाद के दूसरे महत्त्वपूर्ण नियम, परिमाण से गुण में रूपांतरण के नियम को, निम्न सार के रूप में निरूपित कर सकते हैं:

( १ ) प्रत्येक घटना या प्रक्रिया, परिमाण तथा गुण का एकत्व ( unity ) है, दूसरे शब्दों में, इसकी अपनी ही विशिष्ट गुणात्मक और परिमाणात्मक निश्चायकता ( definiteness ) होती है।

( २ ) परिमाणात्मक परिवर्तन क्रमिक ( gradual ), सुचारू ( smooth ) और एक ख़ास सीमा तक सतत ( continuous ) रूप में होते हैं, इस सीमा के अंदर वे गुण में परिवर्तन नहीं लाते। परिमाणात्मक परिवर्तन नियमतः विपर्येय ( reversible ) होते हैं और उनकी विशेषताएं है मान ( magnitude ), कोटि ( degree ) तथा तीव्रता ( intensity )। उन्हें माप ( measurement ) की समुचित इकाइयों ( units ) के द्वारा एक निश्चित संख्या से मापा तथा व्यक्त ( express ) किया जा सकता है।

( ३ ) प्रदत वस्तु या प्रणाली में, इस अंतर्निहित ( inherent ) परिमाप की सीमा से परे के परिमाणात्मक परिवर्तन ऐसे आमूल गुणात्मक परिवर्तनों को जन्म देते हैं, जिनके फलस्वरूप नये गुण का जन्म होता है।

( ४ ) गुणात्मक परिवर्तन एक छलांग ( leap ) में या निरंतरता में क्रमभंग ( break in continuity ) की शक्ल में होते हैं, किंतु छलांग का एक तात्क्षणिक ( instantaneous ) विस्फोट के रूप में होना जरूरी नहीं है। यह कमोबेश काफ़ी समय भी ले सकती है।

( ५ ) छलांग के ज़रिये उत्पन्न नये गुण ( quality ) की विशेषताएं है उसके नये परिमाणात्मक अनुगुण ( properties ) या प्राचल ( parameters ), और परिमाण तथा गुण के एकत्व का एक नया परिमाप।

( ६ ) परिमाणात्मक परिवर्तनों के गुणात्मक में तथा विलोमतः संक्रमण ( transition ) का स्रोत विरोधियों ( opposites ) की एकता और संघर्ष तथा अंतर्विरोधों ( contradictions ) की वृद्धि और उनका समाधान है।

इस तरह, परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम यह दर्शाता है कि विकास के दौरान एक गुणात्मक अवस्था से दूसरी में संक्रमण कैसे होता है। दूसरे शब्दों में, यह नियम विकास के अत्यंत महत्त्वपूर्ण मोडों की विशेषताओं का चित्रण करता है। यह नूतन की उत्पत्ति की प्रक्रिया के एक प्रमुख पक्ष को प्रकाश में लाता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम – पहला भाग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत दूसरे नियम की दिशा में परिमाण तथा छलांग की संकल्पना पर चर्चा की थी, इस बार हम दूसरे नियम ‘परिमाण से गुण में रूपांतरण के नियम’ पर चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


२. परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियमपहला भाग
( परिमाणात्मक परिवर्तनों से गुणात्मक परिवर्तनों में संक्रमण )

transformation-jaqstoneपरिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम ( law of transformation from quantity to quality ) विकास के तरीक़े को, उस प्रक्रिया की क्रियाविधि को दर्शाता है। यह वस्तुओं और प्रक्रियाओं के परिणामात्मक ( quantitative ) व गुणात्मक ( qualitative ) पक्ष जैसे विरोधियों ( opposites ) के अंतर्संबंध ( interrelation ) को व्यक्त करता है। हम यहां पहले भी ‘क्रमविकास क्या होता है’ के अंतर्गत इन परिवर्तनों पर काफ़ी चर्चा कर ही चुके हैं। एक बार पुनः उसका समाहार कर लेते हैं।

किसी भी चीज़ के परिमाणात्मक और गुणात्मक पहलू घनिष्ठता से अंतर्संबंधित होते हैं। इस संबंधों का रूप द्वंद्वात्मक ( dialectical ) होता है। अपनी अटूट एकता में वे किसी भी चीज़ या घटना के दो पक्षों के रूप में एक दूसरे पर आश्रित ( dependent ) होते हैं। किसी एक वस्तु या घटना के परिमाणात्मक और गुणात्मक पक्षों की एकता को परिमाप कहते हैं। परिमाप की संकल्पना का यह तात्पर्य है कि कोई एक निश्चित परिमाण ही एक गुण के तदनुरूप होता है। गुण में परिवर्तन के बग़ैर परिमाण केवल कुछ निश्चित सीमाओं तक ही बदल सकता है, जो वस्तु की परिमाप होती हैं। जब परिमाण में परिवर्तन उन परिमापों तक पहुंच जाते हैं, तो परिमाप गडबड़ा जाता है और वस्तु का गुण बदलने लगता है। मसलन, सामान्य वायुमंडलीय दबाब के अंतर्गत ० डिग्री से १०० डिग्री तक का तापमान पानी की तरलावस्था का परिमाप है। जब तापमान शून्य से नीचे जाता है, तो पानी जमकर बर्फ़ बन जाता है, ठोस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। और जब पानी को १०० डिग्री से अधिक तापमान तक गर्म किया जाता है, तो वह वाष्प बन जाता है, यानि गैसीय अवस्था में परिवर्तित हो जाता है।

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( socio-economic formations ) का अनुक्रमण ( succession ) भौतिक नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक प्रक्रिया है, किंतु फिर भी परिमाणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों की द्वंद्वात्मक कड़ी उनमें भी पायी जाती है। आदिम-सामुदायिक प्रणाली ( primitive communal system ), उत्पादक शक्तियों के अत्यंत धीमे विकास के प्रभावांतर्गत शनै- शनैः बदली। जब परिमाण में ये परिवर्तन एक विशेष सीमा पर पहुंच गये और उत्पादन संबंधों ( relations ) और उत्पादक शक्तियों ( forces ) के बीच सामंजस्यहीनता ( disharmony ) पैदा हो गयी, तब विकास अवरुद्ध हो गया और गुणात्मक परिवर्तनों की प्रक्रिया शुरू हुई, इसके फलस्वरूप सामुदायिक-गोत्रीय ( communal-clan ) प्रणाली के सारे सामाजिक संयोजन और संबंध टूट गये। पुराना आधार तथा उस पर निर्मित अधिरचना खंड-खंड हो गयी और समाज में गुणात्मक परिवर्तन हो गये, और निजी स्वामित्व वाले उत्पादन संबंधों और विरोधी वर्गों के आधार वाली एक नयी दास-प्रथात्मक सामाजिक अधिरचना प्रकट हुई। इतिहास की दृष्टि से यह पहली सामाजिक क्रांति ( social revolution ) है। इसी तरह आगे दासप्रथात्मक समाज से, एक नयी गुणात्मक अवस्था, सामंती ( feudal ) समाज अधिरचना में रूपांतरण संभव हुआ। उत्पादन संबंधों और उत्पादक शक्तियों के नये अंतर्विरोधों ( contradictions ) की तीव्रता तथा बढ़ती ने सामंती समाज पर असर डाला और परिमाणात्मक परिवर्तनों में संपरिवर्तन ( conversion ) की प्रक्रिया फिर हुई और बुर्जुआ क्रांतियों के रूप में पूंजीवादी ( capitalist ) विरचनाओं का जन्म हुआ। पूंजीवादी समाज में अंतर्निहित अंतर्विरोधों की परिमाणात्मक वृद्धि ने एक क्रांतिकारी, गुणात्मक संक्रमण ( transition ) यानी नयी, समाजवादी ( socialist ) विरचनाओं को जन्म दिया। समाज के रूपांतरण की यह प्रक्रिया अभी भी जारी है और शनैः शनैः सामाजिक-सामुदायिक हितों के अनुकूल नियोजित आर्थिक प्रणाली और समतामूलक समाज की स्थापना का लक्ष्य निकटतर होता जा रहा है।

चिंतन ( thought ) और चेतना ( consciousness ) के विकास में भी परिमाण और गुण के द्वंद्वात्मक संबंध भी सामने आते हैं। एक नवजात शिशु में बोलने, सोचने और सुस्पष्ट भाषण द्वारा अपने विचार व्यक्त करने की क्षमता नहीं होती। उसके जीवन के पहले वर्षों के दौरान समुचित आदतों का क्रमिक संचयन ( gradual accumulation ) होता है। पहली गुणात्मक छलांग ( leap ) इस अवधि के बाद लगती है और सुस्पष्ट भाषण में व्यक्त होती है – बच्चा अलग-अलग शब्दों का उच्चारण करने लगता है। बाद में उसके चिंतन में इतना परिवर्तन होता है कि बच्चा अपनी कामनाओं , भावनाओं और बाह्य जगत के बारे में अपने प्राप्त ज्ञान को व्यक्त करने के लिए कमोबेश सम्मिश्र तार्किक युक्तियों या अनुमानों का संबंधित अनुक्रमिक ढंग ( sequential manner ) से उच्चारण करने लगता है और, इस तरह, चिंतन की रचना की एक मूलतः नयी अवस्था में प्रवेश करता है।

इस तरह हम देखते हैं कि जब परिमाणात्मक परिवर्तनों से परिमाप गड़बड़ा जाता है, तब पुराना गुण नये परिमाण के तदनुरूप नहीं रहता है और उनके बीच एक अंतर्विरोध पैदा हो जाता है। यह अंतर्विरोध बढ़ता चला जाता है और अंत में नये गुण की रचना तथा नये परिमाप के आविर्भाव से उसका समाधान ( solution ) होता है। इसे ही परिमाणात्मक परिवर्तन का गुणात्मक परिवर्तन में रूपांतरित होना कहते हैं। परिमाणात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तन के बीच का संपर्क एक प्राकृतिक नियमनुवर्तिता है। परिमाण के गुण में रूपांतरित होने का यह नियम सार्विक ( universal ) है। जैसा हम देख चुके हैं, यह वस्तुजगत में भी काम करता है और मानव संज्ञान में भी। प्रकृति के बारे में हमारे ज्ञान के शनैः शनैः संचय से ही मानवजाति, विज्ञान और दर्शन के विकास की नयी गुणात्मक अवस्थाओं में पहुंच सकी है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय

परिमाण की संकल्पना ( concept of quantity )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत दूसरे नियम के व्यवस्थित निरूपण की दिशा में गुण की संकल्पना को प्रस्तुत किया था, इस बार हम परिमाण तथा छलांग की संकल्पना पर चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


परिमाण तथा छलांग की संकल्पना
( concept of quantity and leap )

2010-08-20-LISAADAMSAMorassofContradictionsगुण ( quality ) के अलावा चीज़ों तथा प्रक्रियाओं में एक निश्चित परिमाण ( मात्रा ) में होने की विशिष्टता भी होती है। हम अपने अनुभवों से जानते हैं कि इस तरह की घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को, जो कुछ हद तक स्थायी ( constant ) व अपरिवर्तनीय ( invariable ) होती हैं, किसी अन्य में संपरिवर्तित ( converted ) किये बिना भी ऐसे बदला जा सकता है, जिससे वे पहले की ही तरह निज रूप में बनी रहती हैं। इस विशेषता को संकल्पना ‘परिमाण’ ( quantity ) से द्योतित किया जाता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के जीवन के दौरान उसके रंगरूप में विभिन्न परिवर्तन आ सकते हैं, उसकी चमड़ी का रंग बदल जाता है. बाल सफ़ेद हो जाते है या गिर जाते है, वज़न बदल जाता है, चहरे पर झुर्रियों की संख्या और वितरण में परिवर्तन हो जाता है, आदि। इन परिवर्तनों को परिमाणात्मक ( मात्रात्मक ) कहा जाता है, क्योंकि व्यक्ति को देखने, विभिन्न कालों में लिये गये उसके छायाचित्रों पर नज़र डालने पर यह कहा जा सकता है कि यह वही चहरा है और एक ही व्यक्ति है और फलतः उसके गुणात्मक लक्षण अधिकांशतः संरक्षित है, उसमें कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है।

इस तरह हम देखते हैं कि समय के साथ किसी भी घटना या प्रक्रिया में कमोवेश उल्लेखनीय परिवर्तन होते हैं। उम्र के साथ व्यक्ति के रुधिर की संविरचना ( composition ) बदल जाती है, विभिन्न शरीरकार्यिक क्रियाएं ( physiological function ) प्रकट तथा ग़ायब होती हैं, विभिन्न अंगों का आकार परिवर्तित होता है, आदि। कारखानों में नयी मशीनें, नयी लाइनें, पूरी की पूरी कार्यशालाएं तथा कार्यदल बदल जाते हैं। लेकिन व्यक्ति और कारख़ाने की गुणात्मक निश्चायकता बनी रहती है। जिन संयोजनों ( connections ) तथा संबंधों ( relations ) के परिवर्तन, एक प्रणाली ( system ) के अलग-अलग अनुगुणों ( properties ) तथा लक्षणों ( characteristics ) में निश्चित सीमाओं के अंदर रद्दोबदल ( alteration ) कर देते हैं, किंतु उसकी गुणात्मक निश्चायकता ( qualitative definiteness ) को नहीं बदलते, उन्हें परिमाणात्मक कहा जाता है और उन्हें परावर्तित करने वाले प्रवर्ग को ‘परिमाण’ ( quantity ) या ‘परिमाणात्मक निश्चायकता’ ( quantitative definiteness ) कहते हैं

परिमाणात्मक निश्चायकता गुणात्मक की ही भांति वस्तुगत ( objective ) होती है। एक गुण के अंदर अलग-अलग अनुगुणों या लक्षणों में क्रमिक ( gradual ) परिमाणात्मक परिवर्तन हो सकते हैं। इस तरह परिमाण एक ऐसी निर्धार्यता है, जो प्रदत्त ( given ) गुण के विकास के मान, रफ़्तार तथा कोटि ( degree ) के बारे में बताती है। उन्हें नापा जा सकता है और उनकी तुलना की जा सकती है। नापजोख के परिणामों को हमेशा अंकों के द्वारा व्यक्त किया जा सकता है, जिससे परिमाणात्मक परिवर्तनों के अध्ययन व वर्णन में गणित ( mathematics ) का अनुप्रयोग ( application ) किया जा सकता है। परिमाणात्मक परिवर्तनों का अध्ययन प्रकृति, समाज और चिंतन की अत्यंत भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं पर गणित को लागू करने का आधार हैं।

IMG_6393-he-caused-the-revolution-webपरिमाण की उपरोक्त परिभाषा में एक महत्त्वपूर्ण पद, यानि ‘निश्चित सीमाएं’ ( certain limits ) शामिल है। इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। बात यह है कि परिमाणात्मक परिवर्तन, यानि संयोजनों, तत्वों तथा उपप्रणालियों में होनेवाले वे परिवर्तन जो एक घटना की गुणात्मक निश्चायकता को प्रभावित नहीं करते, वे ऐसी निश्चित सीमाओं के अंदर ही हो सकते हैं, जिनके परे ( beyond ) परिमाणात्मक परिवर्तन, गुणात्मक संयोजनों व संबंधों को भंग ( break ) या विखंडित ( rupture ) कर सकते हैं और मुख्य तत्व तथा उपप्रणालियों में गड़बड़ी ( disturbance ) पैदा कर सकते हैं। इन विशिष्ट सीमाओं के अस्तव्यस्त होने पर गुण भी गड़बड़ा जाता है। पुराने संयोजन और संबंध टूट जाते हैं और पूरी तरह से या आंशिक रूप से ग़ायब हो जाते हैं तथा भूतपूर्व ( former ) तत्व और उपप्रणालियां परिवर्तित हो जाती हैं। उनके स्थान पर नये मुख्य संयोजनों, संबंधों, उपप्रणालियों तथा तत्वों की स्थापना हो जाती है और फलतः एक नया गुण उत्पन्न हो जाता है। पुराने गुणात्मक संबंधों तथा संयोजनों का यह विघटन ( break ) और इन तत्वों व उपप्रणालियों का नयी से प्रतिस्थापन ( replacement ) छलांग ( leap ) कहलाता है

संकल्पना ‘छलांग’ भी दैनिक जीवन से ली गई है, लेकिन दर्शन में इसने एक विशेष अर्थ ग्रहण कर लिया है, जो कि किसी प्रकार के द्रुत परिवर्तन ( rapid shift ) या सामान्य कूद ( jump ) से नहीं है, बल्कि इसका अर्थ घटना के मुख्य स्थायी गुणात्मक संयोजनों के रूपांतरण ( transformation ) से होता है। बेशक, यह विघटन परिमाणात्मक परिवर्तनों की पूर्ववर्ती अवधि की तुलना में सापेक्षतः शीघ्रता से होता है। इसलिए हम परिमाणात्मक परिवर्तनों को समरस ( even ), क्रमिक ‘सुचारू’ ( smooth ) या धीमा भी समझते हैं और छलांगों या गुणात्मक परिवर्तनों को तात्क्षणिक ( instantaneous ) या ‘विस्फोटक’ ( explosive ) मानते हैं। किंतु ठोस मामलों में एक छलांग कमोबेश दीर्घकालिक ( protracted ) और जटिल ( complex ) हो सकती है। इसका ‘अल्पकालिक’ ( short-term ) स्वभाव सोपाधिक ( conditional ) होता है और इस अल्पकालिकता की बात केवल पूर्ववर्ती गुणात्मक परिवर्तनों के साथ तुलना के रूप में ही की जा सकती है। उदाहरण के लिए, एक भूवैज्ञानिक युग ( geological age ) से दूसरे में संक्रमण ( transition ) की अवधि लाखों वर्ष ही थी। वे केवल सापेक्षतः उन मंद परिमाणात्मक परिवर्तनों की अवधियों की तुलना में ही अल्पकालिक या तात्क्षणिक प्रतीत हो सकते हैं जिन्हें संपन्न होने में करोड़ो वर्ष लगे।

इस तरह दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि ‘परिमाणात्मक परिवर्तन’ तथा ‘गुणात्मक परिवर्तन’ ( छलांग ) में परावर्तित प्रक्रियाओं के प्रमुख लक्षण प्रक्रिया की लंबाई या अवधि ( length or duration ) नहीं, बल्कि उसकी अंतर्वस्तु ( content ), उसका सार ( essence ) है। समाज में इन परिवर्तनों की समझ के लिए यह निष्कर्ष ( conclusion ) विशेष महत्त्वपूर्ण है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

गुण की संकल्पना ( concept of quality )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार प्रस्तुत किया था, अब हम द्वंद्ववाद के दूसरे नियम की ओर बढ़ेंगे और इस बार गुण की संकल्पना पर चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


गुण की संकल्पना

अब हम द्वंद्ववाद ( dialectics ) के दूसरे नियम के व्यवस्थित निरूपण की ओर बढ़ेंगे। यह नियम परिमाणात्मक परिवर्तनों ( quantitative changes ) से गुणात्मक परिवर्तनों ( qualitative changes ) में रूपांतरण का नियम है। अतः इस नियम को समझने और निरुपित करने से पहले गुण ( quality ) और परिमाण ( quantity ) से द्योतित संकल्पनाओं ( concepts ) के अर्थ को स्पष्ट और निश्चित करना जरूरी है।

IMG_0543हम अनगिनत वस्तुओं और घटनाओं ( phenomena ) से घिरे हुए हैं। ये सब अनवरत गति और परिवर्तन की स्थिति में हैं, परंतु इसके बावजूद हम उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करते हैं, पहचानते हैं और एक दूसरे के मुक़ाबले में रखना सीखते हैं। ऐसा इसलिए संभव होता है कि गति और परिवर्तनों के बावजूद भी उनमें कोई विशिष्ट बात, उनमें से प्रत्येक की कोई ऐसी विशेषता बची ही रहती है, जो उन्हें अन्य चीज़ों से भिन्न बनाती है। मसलन, जैव प्रकृति अजैव प्रकृति से भिन्न होती है, पौधों और जानवरों की भिन्न-भिन्न जातियां हैं तथा विभिन्न युगों में मनुष्य और समाज भिन्न-भिन्न होते हैं। इसके साथ ही सब चीज़ों में कुछ सर्वनिष्ठ ( common ) बातें भी होती हैं। जैव और अजैव प्रकृति, दोनों ही भूतद्रव्यीय ( of matter ) हैं। पौधों और जानवरों की सारी जातियों के जीवन की एकसमान खासियतें होती हैं, इत्यादि।

यानी स्वयं वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) में विभिन्न घटनाओं में एक निश्चित सातत्य ( constancy ) और स्थिरता ( stability ) होती है। उन्हें अन्य घटनाओं व प्रक्रियाओं से विभेदित करनेवाले लक्षण ( features ) दीर्घ तथा अल्पकालावधियों के लिए अपरिवर्तित बने रहते हैं। उनकी इस विशेषता को सामान्यतः संकल्पना ‘गुण’ ( quality ) से द्योतित किया जाता है। यानी वस्तुओं के भेद तथा समानताएं, गुण की संकल्पना से व्यक्त किये जाते हैं। गुण किसी चीज़ के स्वभाव तथा विशिष्टताओं को व्यक्त करनेवाले मूलभूत लक्षणों की समग्रता ( aggregate ) है। गुण किसी चीज़ के सापेक्ष स्थायित्व और निर्धार्यता की ओर ध्यान दिलाता है, जो कि उस चीज़ के अस्तित्व से संबंधित होती है। चीज़ के गुण में कोई परिवर्तन स्वयं उस चीज़ में होनेवाला परिवर्तन है। मसलन, किसी जीवित अंगी में उपापचयन ( metabolism ) के बंद होने का मतलब है उसकी मृत्यु और विनाश, यानी अंगी के अस्तित्व की समाप्ति।

हमें जिस किसी भी घटना से सरोकार होता है, उसे एक प्रणाली ( system ) माना जा सकता है। दर्जनों अंगों तथा उनके उपांगों, उनके विविध संयोजनों तथा उनके बीच संबंधों सहित मानव शरीर, एक चिकित्सक के लिए एक प्रणाली है ; अपनी सारी कार्यशालाओं, कार्यदलों, लाइनों, मशीनों और उन्हें जोड़नेवाले तकनीकि कड़ियों तथा संबंधों सहित एक कारख़ाना ( factory ), समाज के लिए एक प्रणाली है। ऐसी प्रत्येक प्रणाली के क्रियाकलाप ( activity ) तथा अस्तित्व ( existence ) को सुनिश्चित बनानेवाली मुख्य उपप्रणालियां, तत्व तथा संयोजन एक निश्चित समयावधि तक कमोबेश स्थिर रहती हैं, उनकी मुख्य विशेषताएं व लक्षण बरक़रार रहते हैं, जिससे उसका साकल्य ( wholeness ) और निजरूप से साम्य सुनिश्चित रहता है। अतः ‘गुण’ को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है; एक निश्चित कालावधि के अंदर प्रदत्त प्रणाली के स्थायित्व व अस्तित्व तथा निजरूप के साथ उसकी तद्रूपता को और साथ ही अन्य प्रणालियों से उसके अंतर को बनाये रखनेवाले मुख्य तत्वों ( elements ), संयोजनों ( connections ) तथा संबंधों ( relations ) की समग्रता को प्रवर्ग ‘गुण’ ( quality ) या ‘गुणात्मक निश्चायकता’ ( qualitative definiteness ) द्वारा परावर्तित किया जाता है

Viewfinder2गुण की पृथक-पृथक अभिव्यक्तियों ( manifestation ) को अनुगुण ( properties ) कहते हैं, इसीलिए यह अक्सर कहा जाता है कि गुण कुछ अनुगुणों की स्थायी समग्रता है। उदाहरण के लिए, कार्बनिक पदार्थ ‘शक्कर’ एक नितांत निश्चित गुण है और शक्कर में अंतर्निहित सफ़ेद रंग या मधुर स्वाद उत्पन्न करने की या पानी में घुलने की इसकी क्षमता, आदि इसके अलग-अलग अनुगुण हैं। गुण चीज़ों के अपने होते हैं और चीज़ों में परिवर्तन के साथ परिवर्तित होते हैं। किसी चीज़ का गहन ज्ञान हासिल करने तथा उसके सार को समझने के लिए उसे अन्य चीज़ों से अलग करना, उनके बीच समानताओं और अंतरों का पता लगाना और उनके अनुगुणों का वर्गीकरण आवश्यक है।

प्रत्येक चीज़ में अनेकानेक अनुगुण होते हैं और उनमें से किसी एक के बदलने या मिट जाने से स्वयं उस चीज़ में परिवर्तन नहीं होता है। मसलन, पेट्रोल के लिए रंग अनिवार्य नहीं है, वह रंगीन हो सकता है या बेरंगा, पर दोनों ही हालातों में वह पेट्रोल ही रहेगा। लेकिन दूसरी तरफ़, उसकी दहनशीलता उसका मूल अनुगुण है, और अगर किसी रासायनिक तत्व के संपर्क में आकर वह अपने इस अनुगुण को गंवा देता है, तो उसके साथ ही उसका गुण भी बदल जायेगा। जब पेट्रोल का यह गुण ख़त्म हो जाता है, तो वह ईंधन नहीं रहता।

हमारे पास-पास के जगत की सारी वस्तुओं और घटनाओं में अनेक गुण हैं, इसलिए विचाराधीन वस्तु या घटना के बुनियादी ( basic ) तथा ग़ैर-बुनियादी ( non-basic ) गुणों के बीच अंतर करना आवश्यक है। मसलन, विविध श्रम-क्रियाएं करते समय एक व्यक्ति एक कार्यशील मनुष्य के रूप में अपने अनुगुण दर्शाता है। इस संदर्भ में वह एक अकुशल मज़दूर, फ़िटर, ड्राफ़्ट्समैन, डाक्टर, इंजनियर तथा कार्यकारी अधिकारी, आदि हो सकता है और अन्य रिश्तों में वही व्यक्ति भिन्न अनुगुणों का प्रदर्शन करता है। मसलन, माता-पिता के संबंध में वह बेटा या बेटी है, पत्नी के लिए पति है और बच्चों के लिए बाप है। यदि वह किसी संगठन या राजनैतिक पार्टी से जुड़ा हुआ है तो वहां का एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हो सकता है।

लेकिन किसी एक संबंध में प्रकट होनेवाले और अन्य में ग़ायब हो जानेवाले अनुगुणों के साथ ही कुछ ऐसे अनुगुण भी होते हैं, जो हर समय मौजूद रहते हैं। इन अनुगुणों का कुल जोड़ ही वह चीज़ है, जिसे मूल गुण ( basic quality ) कहते हैं। किसी भी चीज़ का मूल गुण उस चीज़ की उत्पत्ति ( genesis ) के समय पैदा होता है और केवल तभी बदलता है, जब वह चीज़ स्वयं बदलती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत अंतर्विरोधों के अन्य रूपों पर चर्चा की थी, इस बार हम विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार

image007अभी तक जो कुछ बताया गया है उसका समाहार करने के लिए हम द्वंद्ववाद ( dialectics ) के एक सबसे महत्त्वपूर्ण नियम, विरोधियों की एकता और संघर्ष के नियम ( law of unity and struggle of opposites ) को, निम्न सार के रूप में निरूपित कर सकते हैं:

( १ ) प्रकृति, समाज तथा चिंतन की किसी भी घटना में विरोधी ( opposing ) पहलू, अनुगुण, लक्षण, उपप्रणालियां या तत्व होते हैं, जो एक दूसरे से अनिवार्यतः जुड़े होते हैं या अंतर्क्रियाशील होते हैं, यानि वे एक एकत्व ( unity ) होते हैं।

( २ ) एकत्व की रचना करने वाले विरोधियों ( opposites ) के बीच द्वंद्वात्मक अंतर्विरोध ( dialectical contradiction ) का संबंध होता है।

( ३ ) मुख्य आंतरिक अंतर्विरोधों ( internal contradiction ) की उत्पत्ति, वृद्धि और समाधान सारी गति के और विशेषतः विकास के स्रोत ( source of development ) हैं। अंतर्विरोधों का समाधान विकास का निर्णायक क्षण, विकास का मुख्य कारण होता है।

( ४ ) विकास के दौरान कुछ विरोधियों ( प्रतिपक्षों ) का अन्य में द्वंद्वात्मक संक्रमण ( transition ) होता है, और विरोधियों की टक्कर ( clash ), अंतर्क्रिया ( interaction ) व अंतर्वेधन ( interpenetration ) होता है।

( ५ ) नयी अविपर्येय ( irreversible ) घटनाएं, प्रक्रियाएं, अनुगुण या लक्षण, आदि उत्पन्न होते हैं, जो पहले विद्यमान नहीं थे और वे विरोधियों के संघर्ष ( struggle ) के द्वारा, उनके अंतर्संपरिवर्तन ( interconversion ) व अंतर्वेधन तथा एक दूसरे में संक्रमण के द्वारा तथा अंतर्विरोधों के समाधान ( solution ) के ज़रिये उत्पन्न होते हैं।

इस प्रकार, विरोधियों की एकता और संघर्ष के नियम का सार्विक स्वरूप ( universal character ) है और इसकी समझ का विश्वदृष्टिकोणीय ( world-outlook ), विधितंत्रीय ( methodological ) तथा वैचारिक ( ideological ) महत्त्व बहुत अधिक है। एक वस्तु या घटना के विश्लेषण में उसके अंतर्विरोधों से शुरुआत की जानी चाहिये और उसके विरोधी पक्षों, गुणों तथा प्रवृत्तियों की एकता व संघर्ष को समझना चाहिए और इस तरह से उनके अंतर्संबंधों ( interrelations ) को स्पष्ट करना चाहिए। वस्तुओं और घटनाओं की ऐसी जांच ही उनके सार तक पहुंचने का एकमात्र तरीका है।

विचाराधीन घटनाओं में अंतर्भूत ( immanent ) तथा बुनियादी ( basic ) अंतर्विरोधों का पता लगाने से उन घटनाओं के विकास के प्रेरक बलों का ही नहीं, बल्कि उनके विकास के नियमों का ज्ञान प्राप्त करने में भी मदद मिलती है। चूंकि अंतर्विरोध तथा उनके समाधान के तरीक़े विविधतापूर्ण हैं, इसलिए व्यवहार में उत्पन्न होनेवाले अंतर्विरोधों की विशिष्टताओं को पहचानना और प्रदत्त दशाओं में उनके समाधान के इष्टतम ( optimal ) तरीक़ों का कुशलता से पता लगाना महत्त्वपूर्ण है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

अंतर्विरोधों के विविध महत्त्वपूर्ण रूप – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत अंतर्विरोधों के रूपों पर चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए अंतर्विरोधों के अन्य रूपों पर बात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम – चौथा भाग
प्रतिरोधी और अप्रतिरोधी अंतर्विरोध

सामाजिक जीवन में अंतर्विरोध ( contradiction ) प्रतिरोधात्मक और ग़ैर-प्रतिरोधात्मक हो सकते हैं। सामाजिक अंतर्विरोधों को उनकी तीव्रता तथा उनके समाधान की विधि के अनुसार प्रतिरोधी ( antagonistic ) तथा अप्रतिरोधी ( non-antagonistic ) अंतर्विरोधों में विभाजित किया जाता है।

guernicaअंतर्विरोधों को प्रतिरोधात्मक बनाने वाली चीज़ है समाज का असंगत हितों ( inconsistent interests ) वाले वर्गों में विभाजन, ऐसा वह विभाजन जो उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व से उत्पन्न होता है। इन वर्गों के बीच के अंतर्विरोध प्रतिरोधी हुआ करते हैं। प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का विभेदक लक्षण ( distinguishing feature ) उनकी घोर तीव्रता और एक प्रदत्त समाज में विभिन्न समूहों तथा वर्गों के विरोधी हितों, लक्ष्यों तथा स्थितियों के पुनर्मेल ( reconciling ) की असंभाव्यता ( impossibility ) है। इसीलिए प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का समाधान उसी सामाजिक प्रणाली की दशाओं के अंतर्गत नहीं हो सकता है, जिसने उन्हें जन्म दिया है। उनका समाधान प्रबल तथा दृढ़ संघर्ष ( fierce and stubborn struggle ) के द्वारा होता है और नियमतः प्रतिरोधी पक्षों में से एक के उन्मूलन ( elimination ) से समाप्त होता है। यानि उन्हें वर्ग संघर्ष ( class struggle ) तथा ऐसी सामाजिक क्रांति ( social revolution ) से ही हल किया जा सकता है, जो पुरानी प्रणाली का मूलोच्छेदन तथा नयी की स्थापना करती है।

इस तरह के प्रतिरोधी अंतर्विरोध, वर्ग आधारित दास-प्रथात्मक, सामंती और पूंजीवादी समाजों के लाक्षणिक अंतर्विरोध हैं। इस तरह के हर समाज में ये अंतर्विरोध पनपते हैं, विकसित होते हैं और अंततः उसके अवश्यंभावी पतन तक पहुंचा देते हैं। मसलन, पूंजीवादी समाज में मजदूर वर्ग तथा पूंजीवादी वर्ग के बीच प्रतिरोधी अंतर्विरोधों का समाधान एक वर्ग के रूप में पूंजीवादी वर्ग के उन्मूलन द्वारा समाजवादी क्रांति से ही हो सकता है। बेशक यहां ‘उन्मूलन’ का सरलीकृत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए। यह एक प्रदत्त वर्ग के सदस्यों के भौतिक विनाश, या शारीरिक उच्छेदन का मामला नहीं है, बल्कि समाज में पूंजीपति वर्ग के उन आर्थिक व राजनीतिक आधारों की समाप्ति है जो उन्हें प्रभुत्व ( dominance ) में बनाता है, एक वर्ग के रूप में उनके समग्र प्रतिरोध के खात्मे तथा उत्पादन के साधनों ( means of production ) पर निजी पूंजीवादी स्वामित्व ( private capitalist ownership ) के उन्मूलन का मामला है। इस प्रतिरोधी अंतर्विरोध के समाधान के रूप स्वयं भी बहुत भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि वे प्रत्येक देश विशेष में उसके विकास की निश्चित अवस्था में विद्यमान ठोस ऐतिहासिक दशाओं ( concrete historical conditions ) पर निर्भर होते हैं।

अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों की विशेषता उनकी कम तीक्ष्णता ही नहीं, बल्कि उनकी समाधेयता का ढंग भी है। अप्रतिरोधी अंतर्विरोध तब उत्पन्न होते हैं, जब एक समाज में विभिन्न सामाजिक श्रेणियों के जीवन-हित सर्वनिष्ठ ( common ) होते हैं। मसलन, पूंजीवादी समाज के अंतर्गत किसानों और मजदूर वर्ग के बीच के अंतर्विरोध, प्रतिरोधी नहीं , बल्कि अप्रतिरोधी होते हैं। किसानों के पास भूमि, पशु और खेती के उपकरणों के रूप में उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है और वे उस संपत्ति को अपने पास बनाए रखने तथा बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी तरफ़, मजदूरों के पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते, उनके पास केवल अपनी श्रम-शक्ति होती है जिसे वे उत्पादन के साधनों के स्वामियों को बेचने के लिए मजबूर होते हैं, इसलिए उनका वर्गहित स्वाभाविक रूप से इनके उन्मूलन में दिलचस्पी रखता है। फलतः किसानों और मजदूरों के हितों के बीच एक निश्चित अंतर्विरोध होता है। लेकिन अपनी सामाजिक अवस्थिति के कारण मुख्य मुद्दे पर इन सामाजिक श्रेणियों के हित समान हैं, क्योंकि दोनों ही पूंजपति वर्ग द्वारा शोषित हैं। इसीलिए पूंजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में इनका एका बनता है, मजदूर वर्ग किसानों को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो जाता है, इनके संघर्ष साझे होने लगते हैं।

प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से भिन्न अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों के समाधान में विरोधियों ( opposites ) में से किसी एक का उन्मूलन करने की जरूरत नहीं होती है। उनका समाधान नियमतः शांतिपूर्ण तरीक़े से विभिन्न सामाजिक समूहों की अवस्थितियों तथा हितों को शनैः शनैः, लगातार सचेत ढंग से एक दूसरे के निकटतर लाने के ज़रिये किया जाता है। किंतु यह ‘निकटतर आना’ विरोधियों के संघर्ष के बिना नहीं हो सकता। अंतर्विरोध अप्रतिरोधी ही सही परंतु अंतर्विरोध तो हैं ही, इसलिए उनके बीच भी विरोधियों की एकता और संघर्ष का द्वंद्ववाद का नियम लागू होता ही है। चूंकि अंतर्विरोध अप्रतिरोधी हैं तो उनके समाधान एकता की ओर हल किये जाने चाहिए। समाज में विभिन्न समूहों के बीच विशेष अप्रतिरोधी अंतर्विरोध होते है, जो उसके विकास से उत्पन्न होते हैं तथा उस विकास को प्रभावित करते हैं।

यदि ऐसे अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों को समय पर समुचित रूप से सुलझाया तथा हल नहीं किया जाये, तो वे अत्यंत तीक्ष्ण ( acute ) बन सकते हैं और समाज के विकास को रोकना आरंभ कर सकते हैं। जैसे कि हमारे भारतीय समाज की विविधता के रूपों में विभिन्न जातियो, धर्मों, क्षेत्रों, भाषा समूहों आदि के बीच के अप्रतिरोधी अंतर्विरोधों की उपस्थिति से हम इसे समझ सकते हैं। इनका समाधान एकता की ओर हल करने में किया जाना चाहिए, परंतु कुछ शक्तियां इन्हें उभारने और तीक्ष्ण करने में ही अपने हित देखती हैं, और परिणाम ये सामने आता है कि मूल प्रतिरोधी अंतर्विरोधों से समाज का ध्यान हटता है, उनके समाधानों में व्यवधान उत्पन्न होते हैं, गतिरोध पैदा होते हैं, और ये सापेक्षतः गौण अप्रतिरोधी अंतर्विरोध मुख्य से होने लगते हैं, समाज की ऊर्जा इनमें ही खपाने की कोशिशे होती हैं, स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होता है और यथास्थिति ना सिर्फ़ बनी रहती है बल्कि और भी खतरनाक प्रतिगामी ( regressive ) रूप अख़्तियार करने लगती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

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