ज्ञान के स्रोतों के बारे में एक वार्ता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत  परावर्तन के रूप में संज्ञान को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम ज्ञान के स्रोतों के बारे में विभिन्न दार्शनिक मतों के बीच एक वार्ता प्रस्तुत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


ज्ञान के स्रोतों के बारे में एक वार्ता
( a talk about the sources of knowledge )

Henrique-Oliveiraदार्शनिकगण इस बात पर प्राचीनकाल से ही विचार करते रहे हैं कि ज्ञान के स्रोत क्या हैं और यथार्थता ( reality ) के ज्ञान का समारंभ कहां से होता है। कालान्तर में दो सुस्पष्ट प्रवृत्तियां बन गयीं, अर्थात अनुभववाद ( empiricism ) तथा तर्कबुद्धिवाद ( rationalism )। अनुभववाद के समर्थक संवेदनों ( sensations ) तथा उन पर आधारित अनुभवों ( experiences ) को ज्ञान का स्रोत समझते हैं। तर्कबुद्धिवादियों का विचार है कि ज्ञान स्वयं मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) से, सोचने की क्षमता से उपजता है। उनके कथनानुसार, यह क्षमता मनुष्य में प्रारंभ से ही अंतर्निहित ( inherent ) होती है। संवेदनवाद ( sensualism ), अनुभववाद के साथ घनिष्ठता से जुड़ा है; इसके प्रवक्ता संज्ञान के सैद्धांतिक व अमूर्त रूपों के महत्त्व से अक्सर इनकार करते हैं और ज्ञान को संवेदनों तक सीमित कर देते हैं। संवेदनवादियों के बीच कई भौतिकवादी ( materialists ) थे, जो यह समझते थे कि संवेदन बाह्य जगत के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, लेकिन संवेदनवाद का उग्र रूप यह मान लेता है कि एकमात्र यथार्थता संवेदन है, फलतः वे आत्मगत प्रत्ययवाद ( subjective idealism ) तथा अज्ञेयवाद ( agnosticism ) पर जा पहुंचते हैं।

अनुभववादियों तथा तर्कबुद्धिवादियों की दलीलों और दृष्टिकोण से परिचित होने के लिए हम यहां एक अनुभववादी, एक तर्कबुद्धिवादी तथा एक द्वंद्वात्मक भौतिकवादी ( dialectical materialist )  के बीच एक काल्पनिक वार्ता को समझने की कोशिश करते हैं :

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अनुभववादी – किसी भी सामान्य व्यक्ति से पूछिये कि उसे यह कैसे मालूम कि गुलाब लाल होता है और मधुर सुगंध देता है, तो वह अपने संवेदनों का हवाला देगा। मैं एक लाल फूल देखता हूं, उसकी सुगंध को महसूस करता हूं। फलतः संवेदन ही ज्ञान के सच्चे स्रोत हैं।

तर्कबुद्धिवादी – लेकिन असल बात यह है कि हमारा वास्ता सिर्फ़ उससे नहीं है, जिससे संवेद ग्रहण किये जा सकते हैं और जिसका प्रेक्षण ( observation ) हो सकता है। मसलन, हमें इस तथ्य का ज्ञान कहां से प्राप्त होता है कि एक त्रिभुज के तीन कोणों का योग दो समकोणों के बराबर होता है, मूल कणों का या सामाजिक विकास के नियमों का ज्ञान कहां से प्राप्त होता है? हम उन्हें देख नहीं सकते, सूंघ नहीं सकते और उनको महसूस नहीं कर सकते।

अनुभववादी – हम कई भिन्न-भिन्न त्रिकोण बना सकते हैं, उनके कोणों को कई बार माप सकते हैं और फिर सामान्यीकरण ( generalization ) करके आंतरिक कोणों के योग के बारे में एक प्रमेय ( theorem ) का निरूपण कर सकते हैं। जहां तक मूल कणों ( elementary particles ) का संबंध है, हम विभिन्न उपकरणों के संकेतों और प्रमाणों ( evidence ) को देखते हैं और उसके जोड़ को एक मामले में इलैक्ट्रोन तथा दूसरे में प्रोटोन, तीसरे में पोज़ीट्रोन, आदि कहते हैं। केवल उपकरणों की सुइयों के संवेद प्रभावों का ही वास्तविक अस्तित्व होता है और ‘इलैक्ट्रोन’, ‘प्रोटोन’, आदि संकल्पनाएं ( concepts ) इन संवेदनों के द्योतक ( signifying ) शब्द मात्र हैं। जहां तक सामाजिक विकास के नियमों का संबंध है, वे भी ऐसी संकल्पनाएं है जो विविध संवेदों के प्रभावों का सामान्यीकरण करती हैं। इन शब्दों की कोई और वास्तविकता नहीं है और इस बात को ईमानदारी से मान लेना चाहिए।

तर्कबुद्धिवादी – किंतु ऐसी हालात में हम विभिन्न संवेदनों के बंदी भर बनकर रह जाते हैं। उनके बीच निश्चय ही अनेक त्रुटियां होंगी। हम जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के मतिभ्रम ( hallucinations ) होते हैं, चाक्षुष भ्रांतियां ( optical illusions ) होती है, सुनने की ग़लतियां होती हैं, आदि। यदि हम उन सब पर विश्वास करें, तो हम लगातार अंतर्विरोधों ( contradictions ) में उलझे रहेंगे। प्रश्न यह है कि हम वास्तविक संवेदनों को मिथ्या संवेदनों से विभेदित ( distinguish ) कैसे कर सकते हैं? कुछ संवेदनों को दूसरे वैसे ही अविश्वसनीय संवेदों से कैसे अलग किया जा सकता है?

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी – ( संवाद में भाग लेते हुए ) यहां यह बात जोड़ना जरूरी है कि विज्ञान तथा दैनिक जीवन में ऐसे अनेक कथन ( statement ) तथा संकल्पनाएं हैं, जिन्हें किसी भी सरल तरीक़े से संवेद प्रत्यक्षों ( sense perceptions ) या संवेदनों ( sensations ) में परिणत नहीं किया जा सकता है। मसलन, भौतिकी में हम कहते हैं कि प्रकाश का वेग ३ लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है। हम यह तो समझ सकते हैं कि यह क्या है, किंतु हमारे संवेद अंग ऐसी गति के बोध के लिए अक्षम हैं, क्योंकि हमारे अंग इसके लिए अनुकूलित ( adapted, conditioned ) नहीं है। हम जानते हैं कि रंगाध ( colour-blind ) लोग लाल और हरे रंग में फ़र्क नहीं कर सकते। किसके संवेदों पर यक़ीन किया जाये? गणित में बहुआयामीय देश ( multidimensional space ) में आकृतियों के बारे में प्रमेयों को प्रमाणित किया जाता है, किंतु इन प्रमेयों के बिल्कुल सटीक होने के बावजूद ऐसे देश की संवेदनात्मक छवि ( sensory image ) की रचना करना असंभव है।

अनुभववादी – परंतु ऐसे प्रमेयों का क्या महत्त्व जिन्हें संवेदनों में परिणत नहीं किया जा सकता?

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी – उनके तथा संवेदों में परिवर्तित नहीं किये जा सकने वाले अन्य कथनों के ज़रिये कई महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक परिणाम हासिल किये जा सकते हैं और भौतिक व रासायनिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसा ही सामाजिक विज्ञानों में भी होता है। यदि ‘सामाजिक विकास के नियम’ जैसी संकल्पना संवेदनों के एक समुच्चय का नाम भर होती, तो संवेदनों में फेर-बदल करके उनसे छुटकारा पाना आसान होता। किंतु मुद्दा यह है कि समाज का विकास, अलग-अलग लोगों के संकल्प ( will ) व चेतना, संवेदनों व अनुभवों से स्वतंत्र रूप में होता रहता है।

तर्कबुद्धिवादी – इस हालत में मैं यह सुझाता हूं कि ज्ञान का स्रोत मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) को समझा जाना चाहिए।

अनुभववादी – इसका क्या मतलब?

तर्कबुद्धिवादी – हमें यह मानना चाहिए कि मनुष्य में सोचने की अंतर्जात ( inborn ) क्षमता होती है। वह ईश्वर या प्रकृति द्वारा उसके मन में बैठाये हुए विश्व के आधारभूत, गहन ज्ञान की खोज करने में समर्थ है। उदाहरण के लिए, देकार्त का विचार था कि इस ज्ञान की रचना ईश्वर ने की है, जबकि भौतिकवादी स्पिनोज़ा इसे भौतिक पदार्थ का परिणाम या नतीजा समझते थे। बात जो भी हो, जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसका अन्वेषण ( invent ) व खोज करते हैं, तो हम तर्कशास्त्र के नियमों के द्वारा उससे अन्य सभी कुछ निगमित ( deduce ) कर सकते हैं और जिस हद तक वह विश्व से संबंधित है, उसे प्रयोगों से या प्रेक्षणों से परख सकते हैं। मुख्य बात है बूंद-बूंद कर, क़दम-ब-क़दम, संगत रूप से ( consistently ) तथा आनुक्रमिक ढंग से ( consecutively ), किसी बात को नज़रअंदाज़ किये बग़ैर ज्ञान को व्युत्पन्न ( derive ) करना।

अनुभववादी – इस तरह से तो कोई भी मिथकीय दंतकथा ( mythical legend ) निश्चय ही विज्ञान कही जा सकती है। किसी भी कपोल-कथा ( fairytale ) या आस्था की कल्पना को स्वीकार करने के लिए जादूगरों, झाड़ुओं पर बैठी उड़ान भरती जादूगरनियों, आदि के बारे में संगत और तार्किक ढंग से बातें करना और यह कह देना ही काफ़ी है कि आपने अपने प्रारंभिक ज्ञान को अपने मन में देखा था।

तर्कबुद्धिवादी – लेकिन मैंने तो प्रयोगों ( experiments ) और प्रेक्षणों से जांचने की बात भी कही थी।

अनुभववादी – आप इस मामले में असंगत ( inconsistent ) हैं, क्योंकि आपने ख़ुद यह भी कहा था कि संवेदन और फलतः उन पर आधारित प्रेक्षण भ्रामक ( deceptive ) हो सकते हैं। मेरी यह समझ में नहीं आता कि तर्कबुद्धिवाद से क्या फ़ायदे हासिल होते हैं।

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी – दरअसल आप दोनों के दृष्टिकोण एकतरफ़ा है और देर-सवेर वे दोनों प्रत्ययवाद पर पहुंचा सकते हैं। संवेदनों को ज्ञान का एकमात्र स्रोत बताकर अनुभववाद, अज्ञेयवाद की तरफ़ सरकता जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि संवेदनों के पीछे कुछ नहीं हो और भौतिक जगत लापता हो जाये। तर्कबुद्धिवाद भी वस्तुगत प्रत्ययवाद ( objective idealism ) की तरफ़ ले जाता है, क्योंकि यह ऐसे शाश्वत ( eternal ), अंतर्जात ज्ञान के अस्तित्व को मान्यता देता है, जो वास्तविक सामाजिक दशाओं पर या लोगों के भतपूर्व अनुभव और व्यावहारिक क्रियाकलाप पर निर्भर नहीं होता।

अनुभववादी – फिर आप क्या कहते हैं?

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी – दोनों दृष्टिकोण संवेदनात्मक ( आनुभविक ) तथा बौद्धिक ज्ञान के विच्छेदन तथा एक को दूसरे के मुक़ाबले में खड़ा करने का परिणाम है। लेकिन मुख्य त्रुटि यह है कि आप सारे ज्ञान पर सरलीकृत दोसदस्यीय रूप आरोपित कर रहे हैं, अर्थात ‘मनुष्य और उसके मुक़ाबले में खड़ी दुनिया’ और आप इन दो सदस्यों के बीच किसी भी संपर्क सूत्र को नहीं देख पा रहे हैं। परंतु, वास्तव में मनुष्य तथा बाह्य जगत के बीच एक जटिल संपर्क सूत्र है, जो विशेष मानव क्रियाकलाप में, यानी व्यवहार में व्यक्त होता है और यह व्यवहार है – श्रम, भौतिक उत्पादन और वस्तुओं तथा औज़ारों के साथ तरह-तरह के काम। यह व्यवहार ( practice ) ही है, जो ज्ञान का आधार और स्रोत है तथा उसकी सत्यता को परखने का साधन है

इस दृष्टिकोण की सत्यता से, स्वयं अपने को विश्वास दिलाने के लिए हमें इस बात की अधिक विस्तार से जांच करनी होगी कि ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, यानी इसमें संवेदन क्या भूमिका अदा करता है, अपकर्षित ( अमूर्त ) संकल्पनाएं ( abstract concepts ) तथा ज्ञान कैसे उत्पन्न होते हैं और इस प्रक्रिया में लोगों के भौतिक क्रियाकलाप ( material activity ) क्या भूमिका अदा करते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

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परावर्तन के रूप में संज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तत्वमींमासीय भौतिकवाद की संज्ञान विषयक अवधारणा पर संक्षिप्त विवेचना प्रस्तुत की थी, इस बार हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि परावर्तन के रूप में संज्ञान आख़िर क्या है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


परावर्तन के रूप में संज्ञान
( cognition as reflection )

grhedgeविश्व की ज्ञेयता ( knowability ) का, सत्य ( truth ) को समझने की मानव चिंतन की क्षमता का प्रश्न, विज्ञान और व्यवहार ( practice ) के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि विश्व और उसके विकास के नियम संज्ञेय हैं और हमारा ज्ञान वास्तविकता का सही परावर्तन ( reflection ) है, तो प्रकृति तथा समाज की संज्ञात शक्तियों को मानवजाति की सेवा में लगाया जा सकता है। संज्ञान की प्रकृति को समझने की कोशिशों में हम देखते हैं कि सारे भौतिकवादी ( materialistic ) इस बात पर सहमत हैं कि संज्ञान, यथार्थता ( reality ) के परावर्तन का एक विशेष रूप ( form ) है। परंतु यह विशेष रूप क्या है? हम यहां पहले इस पर विस्तार से देख चुके हैं कि परावर्तन भूतद्रव्य ( matter ) का एक सार्विक अनुगुण ( universal property ) है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि परावर्तन के हर स्तर पर संज्ञान होता है। संज्ञान केवल मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही उत्पन्न हुआ।

हमारा सारा ज्ञान या तो किन्हीं घटनाओं और प्रक्रियाओं से संबंधित होता है, या मानवीय क्रियाकलाप ( human activity ) के कुछ कार्यों तथा रूपों से। जब हम दो संख्याओं को जोडने या गुणा करने की आवश्यकता की बात करते हैं, तो हमें सिर्फ़ यही जानना नहीं होता कि संख्याएं क्या हैं, बल्कि यह भी जानना होता है कि योग या गुणा की संक्रिया ( operation ) कैसे की जाती है। जब हम एक इमारत का निर्माण शुरू करते हैं, तो हमें सिर्फ़ यही नहीं जानना होता कि ईटें तथा संरचनात्मक ( structural ) तत्व, आदि क्या होते हैं, बल्कि यह भी जानना होता है कि इमारत बनाने का काम कैसे किया जाता है।

ज्ञान को हमेशा उन अलग-अलग शब्दों या शब्द समूहों के रूप में भाषा द्वारा व्यक्त किया जाता है, जिनके ज़रिये संकल्पनाएं ( concepts ) निरूपित की जाती हैं और उन वाक्यों तथा प्रस्थापनाओं ( propositions ) से व्यक्त किया जाता है, जिनके ज़रिये वस्तुओं के अनुगुणों, विविध प्रकार के मानवीय कर्मों तथा उनके बीच संबंधों का वर्णन किया जाता है। अमुक-अमुक वाक्य किसी के आंतरिक संवेदनों ( sensations ) या मानसिक प्रक्रियाओं का वर्णन भी कर सकते हैं। एक तरफ़, पृथक-पृथक शब्दों, शब्द समूहों या वाक्यों के और, दूसरी तरफ़, बाह्य जगत की घटनाओं के बीच ऐसी बाहरी सादृश्यता ( likeness ) या समानता नहीं होती है, जिसे संवेद अंगों ( sense organs ) से जाना जा सके।

इसलिए जब हम कहते हैं कि हमारा ज्ञान वास्तविकता को परावर्तित करता है, तो हमारा तात्पर्य बाह्य जगत की घटनाओं तथा मनुष्यों द्वारा किये गये कुछ कर्मों के साथ, संकल्पनाओं तथा निर्णयों ( कथनों ) की विशेष अनुरूपता ( correspondence ) से होता है। इसका यह मतलब है कि कुछ घटनाएं, प्रक्रियाएं या क्रियाओं के रूप, कुछ निश्चित संकल्पनाओं के अनुरूप होते हैं। इसका यह मतलब भी है कि हम कुछ कथनों ( statements ) के ज़रिये वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) की घटनाओं और प्रक्रियाओं के नितांत निश्चित अनुगुणों का तथा उनके बीच संबंधों का वर्णन कर सकते हैं और उन्हें पहचान सकते हैं। और अंत में, इसका यह मतलब है कि कार्यकलाप के कुछ नियमों को निरूपित करते तथा आदेश और हिदायतें देते या लेते समय हम जानते हैं ( समझते हैं ) कि अमुक-अमुक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्या-क्या कार्य किये ही जाने चाहिए और क्या-क्या कार्य नहीं किये जाने चाहिए। यह इस कथन का अर्थ है कि हमारा ज्ञान वस्तुगत यथार्थता का एक परावर्तन है।

IMG_0887यानि इस बात को एक प्रस्थापना के रूप में कहा जा सकता है कि ‘बाह्य जगत का वस्तुगत अस्तित्व है और वह मानव चेतना में परावर्तित होता है’। इसका मतलब है कि वास्तविकता की वस्तुएं और घटनाएं मनुष्य के संवेदी अंगों पर प्रभाव डालकर संवेदों ( sensations ) और अवबोधनों ( perceptions ) की उत्पत्ति करती हैं, जिनके आधार पर मनुष्य संकल्पनाओं का विस्तारण करता है। अतएव यह कहा जा सकता है कि हमारे ज्ञान का स्रोत बाह्य जगत है। लेकिन संज्ञान की प्रक्रिया आस-पास के जगत का एक निष्क्रिय ( passive ) परावर्तन नहीं है। लोग प्रकृति और समाज को सक्रियता से रूपांतरित ( transform ) करते हैं और यह सक्रियता उनके सामने विभिन्न समस्याएं पैदा कर देती है, जिनके समाधानार्थ प्राकृतिक और सामाजिक नियमों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। फलतः संज्ञान वास्तविकता का निष्क्रिय अवलोकन नहीं, बल्कि उसका सक्रिय तथा सोद्देश्य परावर्तन है

ज्ञान, स्वयं अपने आप या स्वयं अपने में अस्तित्वमान नहीं होता है। यह एक विशेष प्रक्रिया का, संज्ञान या जानने की प्रक्रिया, यानी मनुष्य की संज्ञानात्मक क्रिया का परिणाम ( result ) है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) मानव संज्ञान को सामाजिक विकास के एक उत्पाद ( product ) के, आस-पास के जगत के मनुष्य द्वारा रूपांतरण के परिणाम के रूप में देखता है। प्रकृति और समाज के रूपांतरण के उद्देश्य से किये जाने वाले मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप संज्ञान का आधार और लक्ष्य हैं। संज्ञान के सारे प्रकार व्यवहार ( practice ) के, संयुक्त मानवीय श्रम ( labour ) के दौरान रूप ग्रहण करते हैं। मनुष्य, समाज में रहते हुए विश्व को जानता-पहचानता है और पूर्ववर्ती पीढ़ियों द्वारा संचित ( accumulated ) और उत्पादन के औज़ारों में घनीभूत ( condensed ) तथा भाषा, विज्ञान, संस्कृति, आदि में अभिलिखित अनुभव का उपयोग करता है।

फलतः ज्ञान के सार ( essence ) को अधिक गहराई तथा सटीकता से समझने के लिए और इस प्रश्न कि जानने का क्या मतलब है, का उत्तर देने के लिए संज्ञान की प्रक्रिया, उसके स्रोतों तथा उन मुख्य अवस्थाओं का अध्ययन करना जरूरी है, जिनमें मानवीय ज्ञान निरूपित ( formulated ) होता तथा रचा जाता है। यह समझना भी महत्त्वपूर्ण है कि वस्तुगत यथार्थता के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता को कैसे परखा जाता है और कैसे उसकी पुष्टि की जाती है तथा इस अनुरूपता को गहनतर ( deeper ) और पूर्णतर ( fuller ) बनाने के लिए क्या करना जरूरी है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

ज्ञान और समझ को निर्धारित करने वाले कारक

तो हे मानव श्रेष्ठों,
कहानी आगे बढाते हैं…..

मैं भी चाह ही रहा था, और एक बंधु ने भी मेरे ई-मेल पर सफ़ाई चाहते हुए कारकों के निर्धारण की ऐसी ही मांग रखी थी,
अतएव…
अब इस बात को बिंदुबार तरीके से रेखांकित किया जा सकता है कि मनुष्य के ज्ञान का स्तर कैसा होगा, यानि मनुष्य मानव जाति द्वारा समेटे गये ज्ञान के सापेक्ष किस स्तर पर होगा। इसका निर्धारण करने वाले कारकों को यूं सूचिबद्ध किया जा सकता है:
१. मनुष्य के निकट का परिवेशी समाज, जिसमें सबसे पहले उसका परिवार, माता-पिता रिश्तेदार शामिल होते हैं, वे खुद ज्ञान और सभ्यता के किस स्तर पर हैं? उन्हें इस बात की कितनी समझ और जिम्मेदारी है कि एक सुव्यवस्थित लालन-पालन किस प्रकार मनुष्य के जीवन की दशा और दिशा का निर्धारण करता है?
२. मनुष्य से संबंधित वृहद समाज, जहां वह रहता और अंतर्क्रियाएं करता है, की सामाजिक चेतना का स्तर क्या है? ज्ञान और सभ्यता का सामान्य स्तर पर क्या है? सामाजिक क्रियाकलापों को उद्वेलित और नियमित करने वाले मूल कारकों का नैतिक स्तर क्या है?
ये दोनों बिंदु मनुष्य के सामान्य व्यक्तित्व एवं समाज के साथ अंतर्क्रियाओं के मूल्यों का निर्धारण करते हैं और मनुष्य के व्यवहार की मूल कसौटी तय करते हैं।
३. मनुष्य को व्यवस्थित रूप से प्रकृति के वृहद ज्ञान से परिचित कराने वाली शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली का मूल उद्देश्य और उसकी सामान्य संरचना कैसी है? वह ज्ञान और व्यवहार की एकता निश्चित करने में कितना सक्षम है? वह मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास, ज्ञानवृद्धि, उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने और व्यवस्थित चिंतन प्रणाली से लैस उसे एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी के रूप में तैयार करने के मूल उद्देश्य के लिए कितना अभिकल्पित है?
४. मनुष्य के मस्तिष्क के साथ अंतर्क्रिया करने वाले अन्य साधन जैसे सूचना और संचार माध्यम, मीडिया, सहज उपलब्ध पुस्तकें आदि उसके सूचना संसार और चिंतन प्रक्रिया को किस तरह और दिशा में प्रभावित कर रहे हैं? वे एक सोचने समझने वाले, बुद्धिमान और स्वतंत्र मनुष्य को विकसित करना चाहते हैं या कुंद और कुंठित, भावातिरेक से भरे हुए ऐसे मंदबुद्धि व्यक्तित्वों का निर्माण, जिनकी सोच और समझ का नियंत्रण भी उनके हाथों में हो?
५. सभी जीवों की प्राथमिकता उनकी जिजीविषा होती है, ऐसे ही मनुष्य की प्राथमिकता भी जीवनयापन हेतु मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती ही होती है। इनकी पूर्ती की सुनिश्चितता के बाद ही मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर को परिष्कृत करने हेतु प्रवृत हो सकता है। अतएव किसी भी मनुष्य के ज्ञान और समझ के स्तर की संभावना इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसकी सामाजिक और राजानैतिक व्यवस्था में इस जिजीविषा की तुष्टि के आयाम कितने विस्तृत हैं, साथ ही यह भी कि इस तुष्टि की चिंताओं से मुक्त मनुष्यों के लिए व्यवस्था किन सभ्यता और संस्कृतिगत मूल्यों को प्रश्रय देती है।

देखिए, बात बडी होती ही जाती है।
खैर, समय के पास तो बहुत समय है परंतु मुझे पता है आपके पास इसकी बहुत कमी होती है।
इसलिए आज इतना ही. बाकि फ़िर।

एतिहासिक क्रम-विकास का दोहराव…

हां तो हे मानव श्रेष्ठों,
समय फिर आपकी सेवा में हाज़िर है।

पिछली बार बात यहां छोडी़ थी कि मनुष्य अपने जीवन में, खासकर जीवन की शुरुआत में मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास को जैसे क्रमबद्ध तरीके से दोहराता है।

चलिए बात आगे बढाते है….

मनुष्य अपने जीवन की शुरुआत में लगभग एक मांस के लोथडे़ की तरह होता है, एक संवेदनशील हरकतशुदा ज़िंदा मांस। वह धीरे-धीरे अपने पैरों और हाथों की क्रियाओं को मस्तिष्क के साथ समन्वित करना सीखता है। दृष्टि, श्रवण, घ्राण, स्वाद और स्पर्श इन्द्रियों का प्रयोग और संबंधित अनुभवों का नियमन सीखता है एवं इनकी संवेदनशीलता को परिष्कृत करता है। शरीर का संतुलन साधता है, खडा़ होता है, चलना सीखता है, भाषा सीखता है, सारे जीवन संबंधी क्रिया-व्यवहार सीखता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे कि मनुष्य जाति अपने क्रमिक विकास से गुजरी है। मनुष्य के पास चूंकि इन सारी संभावनाओं से युक्त प्राथमिक ढांचा पहले से ही है अतः प्रत्येक कदम उसके विकास में गुणात्मक परिवर्तन लाता है जिससे कि शारीरिक क्रियाओं और उनसे संबंधित तंत्रिका-मस्तिष्क प्रणाली के समन्वय की सामान्य उन्नत अवस्था उसे समय के छोटे अंतराल में ही प्राप्त हो जाती है परन्तु इसमें परिवेशी समाज द्वारा जीवन के सामान्य व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर उसकी मदद की भूमिका निर्णायक होती है।
अब बात आती है, मानव जाति द्वारा समेटे गए प्रकृति के बृहद ज्ञान, विशिष्ट ज्ञान एवं क्रियाकलाप, विज्ञान, तकनीक, व दर्शन के संदर्भ में। इस ज्ञान की परास बहुत अधिक है, इसीलिए अब यह संभव नहीं रह गया है कि मनुष्य का परिवेशी समाज, जो खु़द भी संपूर्ण ज्ञान स्रोतों से बावस्ता नहीं होता, उसको ज्ञान का हर पाठ सिखा सके, उसकी जिज्ञासाओं का पूर्णतया समाधान कर सके, जिम्मेदारी से उसकी ज्ञान पिपासा की सही दिशा निर्धारित कर सके। वह उसे सिर्फ़ वहीं तक पहुंचा सकता है जहां तक खु़द परिवेशी समाज के ज्ञानऔर समझ की सीमाएं हैं, सभ्यता और संस्कृति का स्तर है, और खु़द समाज के भीतर इन सीमाओं और स्तरों के अपने-अपने व्यक्तिगत स्तर हैं।
मानव-समाज ने इन सीमाओं को समझा, और परिवेशी समाज से इतर एक शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली विकसित की, ताकि उपलब्ध ज्ञान का सामान्य सत्व, मानव जाति के नये सदस्यों को क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित रूप में दिया जा सके और फ़िर उन्हें ज्ञान की शाखा विशेष में विशेषज्ञता भी ताकि वे उसका अतिक्रमण कर मानव जाति को और समृद्ध कर सकें। यानि कि अब मनुष्य और ज्ञान की संभावनाओं के बीच एक सामाजिक व्यवस्था विकसित हो जाती है, और यह संभावना भी कि इस तंत्र का नियमन कर रही राजनैतिक व्यवस्था इन संभावनाओं को अपने हितों के हिसाब से नियंत्रित और निर्धारित कर सकती है।

उफ़ ! फ़िर ज़ियादा हो गया, समय हूं ना, इधर-उधर भटकने और समय खींचने की आदत है।
पर ये बात ही ऐसी है कि नहीं चाहते हुए भी बात बढ़ रही है।
चलिए, फ़िर बात करेंगे।

कोई उलझन हो तो समय को मेल कर सकते हैं।
अभी तक प्राप्त जिग्यासाओं का समाधान कुछ तो साथ-साथ चल रहा है,
और कुछ का बाद में होगा, धेर्य रखें।