मनोविज्ञान और इसकी विषय-वस्तु

हे मानवश्रेष्ठों,

अब फिर से कुछ गंभीर हुआ जाए, हालांकि आप निश्चित ही गंभीर अध्येता हैं इसमें कोई दोराय नहीं है। इस बार से यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में दिये जाने की योजना है। चेतना की उत्पत्ति वाली श्रृंखला में मन, मस्तिष्क तथा मनुष्य और पशु  पर कुछ संक्षिप्त चर्चाएं यहां हो चुकी हैं। कभी संक्षिप्तिकरण करते हुए, कभी विस्तार देते हुए हम यहां, मनुष्य की गहन दिलचस्पी के इस विषय पर मानवजाति के अद्युनातन ज्ञान को, उसकी ऐतिहासिकता के साथ जानने और समझने का प्रयत्न करेंगे।

इस बार यहां खु़द मनोविज्ञान और उसके कार्यक्षेत्रों के संबंध में चर्चा की जा रही है। अगली बार यहां इसके विकास का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया जाएगा, और श्रृंखला चल निकलेगी।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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मनोविज्ञान जिन परिघटनाओं का अध्ययन करता है, उनके विशिष्ट लक्षणों को परिभाषित करना थोड़ा कठिन होता है क्योंकि इन परिघटनाओं की व्याख्या काफ़ी हद तक अनुसंधान में लगे व्यक्तियों के विश्व-दृष्टिकोण पर, नज़रिए पर निर्भर करती है।

सर्वप्रथम कठिनाई यह है कि मनोविज्ञान जिन परिघटनाओं की जांच करता है, वे मानव-मस्तिष्क द्वारा बहुत पहले ही विशेष परिघटनाओं के रूप में पहचानी और जीवन की अन्य अभिव्यक्तियों से अलग की जा चुकी हैं। वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है कि कंप्यूटर का हमारा बोध अथवा प्रत्यक्ष एक ऐसी चीज़ है, जो बहुत ही विशिष्ट है और हमारे सामने मेज़ पर रखी वास्तविक वस्तु से भिन्न है। हम बाहर खाने के लिए जाना चाहते हैं, किंतु हमारी यह इच्छा खाने के लिए वस्तुतः बाहर जाने से भिन्न चीज़ है। नये साल की पार्टी की हमारी याद और नये साल की वास्तविक पार्टी, दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं।

इस तरह लोगों ने धीरे-धीरे उनके बीच भेद करना सीखा, जिन्हें हम मानसिक परिघटनाएं ( मानसिक कार्य, गुण, प्रक्रियाएं, अवस्थाएं, आदि ) कहते हैं। लोगों की नज़रों में उनकी विशिष्टता यह थी कि वे मनुष्य के बाह्य परिवेश की बजाए अंतर्जगत से संबंध रखती हैं। उन्हें वास्तविक घटनाओं और तथ्यों से भिन्न मानसिक जीवन का अंग माना गया और ‘प्रत्यक्षों’, ‘स्मृति’, ‘चिंतन’, ‘इच्छा’, ‘संवेगों’, आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया। ये सभी मिलकर ही मन, मानस, मनुष्य का अंतर्जगत, आदि कहे जाते हैं।

दूसरों से रोज़मर्रा के संपर्क में लोगों का प्रत्यक्ष वास्ता उनके विभिन्न व्यवहार रूपों ( कार्यों, चेष्टाओं, श्रम-संक्रियाओं, आदि ) से ही पड़ता है। किंतु व्यवहारिक अन्योन्यक्रियाओं की आवश्यकताएं यह तक़ाज़ा करती हैं कि लोग, बाह्य आचरण के पीछे छिपी मानसिक प्रक्रियाओं को भी पहचानें। परिणामस्वरूप मनुष्य के हर कार्य के पीछे उसके इरादों अथवा जिन कारणों से प्रेरित होकर उसने दत्त कार्य किया था, उनके संदर्भों में देखा जाने लगा और विभिन्न घटनाओं के संबंध में उसकी प्रतिक्रिया को उसके स्वभाव तथा चरित्र की विशेषताओं का परिचायक माना गया। इस प्रकार लोगों ने मानसिक प्रक्रियाओं, गुणों तथा अवस्थाओं के वैज्ञानिक विश्लेषण का विषय बनने से बहुत पहले ही, एक दूसरे के बारे में व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक ज्ञान संचित कर लिया।

उसे कई कहावतों और लोकोक्तियों में अभिव्यक्ति दी गई और लोगों के बीच अक्सर यह सुना जा सकता है कि ‘एक बार देखना सौ बार सुनने से बेहतर है’ या ‘ आदतें आदमी का दूसरा स्वभाव होती हैं’, वगैरह। मनुष्य का ज़िंदगी द्वारा सिखाया गया ज्ञान भी मानस के बारे में जानने में उसकी काफ़ी हद तक मदद करता है। उदाहरण के लिए, अनुभव से उसे मालूम होता है कि कोई पाठ यदि बार-बार पढ़ा जाए, दोहराया जाए, तो वह बेहतर याद हो जाता है।

व्यक्तिगत और सामाजिक अनुभव से प्राप्त मनोवैज्ञानिक सूचना को प्राक्-वैज्ञानिक मनोवैज्ञनिक ज्ञान कहा जाता है। उसका दायरा काफ़ी अधिक व्यापक हो सकता है और वह कुछ हद तक आसपास के लोगों के व्यवहार को समझने और निश्चित सीमाओं के भीतर यथार्थ का सही प्रतिबिंब पाने में सहायक हो सकता है। किंतु कुल मिलाकर यह ज्ञान क्रमबद्ध, गहन तथा निश्चयात्मक नहीं होता और इसीलिए वह लोगों के साथ ऐसे किसी शैक्षिक, चिकित्सीय, संगठनात्मक तथा अन्य मानवीय कार्यकलाप के लिए ठोस आधार नहीं बन सकता है, जिसके लिए मानव मस्तिष्क के वैज्ञानिक, अर्थात वस्तुपरक एवं प्रामाणिक ज्ञान की आवश्यकता होती है, यानि ऐसा ज्ञान कि जो किन्हीं प्रत्याशित परिस्थितियों में व्यक्ति के व्यवहार का पूर्वानुमान करने की संभावना देता है

तो मनोविज्ञान में वैज्ञानिक अध्ययन की विषय-वस्तु क्या है? सर्वप्रथम, मनुष्य के मानसिक जीवन के ठोस तथ्य, जिनके गुणात्मक और परिमाणात्मक, दोनों ही पहलुओं का वर्णन किया जा सकता है। किंतु वैज्ञानिक मनोविज्ञान अपने को किसी मनोवैज्ञानिक तथ्य का, चाहे वह कितना भी दिलचस्प क्यों ना हो, वर्णन करने तक ही सीमित नहीं रख सकता। वैज्ञानिक संज्ञान के लिए परिघटना के वर्णन से आगे जाकर उसकी व्याख्या करने, अर्थात उस परिघटना के मूल में जो नियम कार्य कर रहे हैं, उन्हें उद्‍घाटित करने की भी जरूरत होती है। इसलिए मनोविज्ञान में अध्ययन का विषय मनोवैज्ञानिक तथ्य ही नहीं, मनोवैज्ञानिक नियम भी होते हैं।

नियम अपने को जिन विशिष्ट क्रियातंत्रों के माध्यम से व्यक्त करते हैं, उन क्रियातंत्रों के बारे में जानने के लिए नियमों का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। इसलिए मनोविज्ञान का कार्य मनोवैज्ञानिक तथ्यों एवं नियमों की खोजबीन के अलावा मानसिक कार्यकलाप के क्रियातंत्रों का अध्ययन करना भी है। मानसिक क्रिया के तंत्र अनिवार्यतः किन्हीं निश्चित मानसिक प्रकार्यों को पैदा करने वाले शारीरिक-शरीरक्रियात्मक प्रणालियों से जुड़े होते हैं। इसलिए मनोविज्ञान इन क्रियातंत्रों की प्रकृति और कार्य का अध्ययन शरीरक्रियाविज्ञान, जीवभौतिकी, जीवरासायनिकी, साइबरनेटिकी, आदि अन्य विज्ञानों के साथ मिलकर करता है।

इस प्रकार एक विज्ञान के नाते मनोविज्ञान मानस ( मन, मस्तिष्क ) के तथ्यों, नियमों और क्रियातंत्रों का अध्ययन करता है।

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तो मानवश्रेष्ठों, मनोविज्ञान के जरिए हमारे मानस और इसके क्रियाकलापों का विश्लेषण और अध्ययन, हमारे जीवन में इनके संबंध में एक व्यापक और सार्विक वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न करता है। यह हमें हमारे और दूसरों के मन को समझने, मानसिक संक्रियाओं को व्याख्यायित करने और इस प्रकार उन्हें व्यवस्थित और नियंत्रित करने में हमारी मदद करता है

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

इस बार इतना ही।

समय

सपनों के बहाने कुछ प्रवृतियों पर बातचीत

हे मानवश्रेष्ठों,

फिलहाल भारी-भरकम स्थगित। चलिए कुछ हल्का-फुल्का कुछ किया जाए, पर इसका क्या किया जा सकता है कि यहां से भी आप काफ़ी गंभीर इशारे पा सकते हैं। अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में जद्दोज़हद पैदा कर सकते हैं, और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं।

बहुत पहले सपनों के मनोविज्ञान पर दो आलेख प्रस्तुत किये थे, ‘आखिर क्या है सपनों का मनोविज्ञान’ और ‘कुछ सपने आखिर सच होते क्यों प्रतीत होते हैं’। प्रसंग पुराना है पर आप जानते ही हैं बात कभी पुरानी नहीं होती। विचार हमेशा पहली बार मुख़ातिब हो रहे और आत्मसात नहीं कर पाये मानवश्रेष्ठों के लिए नया ही रहता है। तो फिलहाल मुद्दा यह है कि उसी आलेख के बाद एक मानवश्रेष्ठ से मेल के जरिए, उन्हीं संदर्भों में एक संवाद स्थापित हुआ था। यहां उसे व्यक्तिगत संदर्भों के बिना सार्वजनिक किया जाना इसलिए जरूरी लग रहा है कि कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर और मानवश्रेष्ठों का भी ध्यानाकर्षण किया जा सके। यह बताना शायद ठीक रहे कि उनकी पूर्वानुमति इस हेतु प्राप्त कर ली ही गई थी।
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उनका प्रश्न/संवाद कुछ इस प्रकार था:

सपने इस तरह का सच क्यों बता जाते हैं ?
नमस्ते जी ,आपके ब्लाग पर …आप लिखते ही हैं कि मेल पर भी आपसे चर्चा की जा सकती है ..मैंने आपके ब्लाग पर दोनों लेख भी पढ़े हैं …कमेंट्स पढ़े है …कुछ समझ में आया कुछ नहीं ..पर मेरा अनुभव यह है कि जब जब बुरा सपना देखा है वह सच हुआ है …

( इसके बाद उन मानवश्रेष्ठ ने अपने कुछ सपनों का जिक्र किया, जिनके सच हो जाने के कारण वे अचंभित और प्रश्नाकुल थे। वे व्यक्तिगतता का आधार रखते थे, अतएव उन्हें यहां प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है )

क्या यह सच होता है ..? मैंने इसको कभी सीरियस क्यों नही लिया ? नही जानता ..पर क्या सच में कोई मुझे संकेत कर जाता है इन बुरे सपनों से ..हम अकसर इन्हे नज़रंदाज़ क्यों कर देते हैं ? बहुत से सवाल है दिल में .और अब भी कोई सपना बुरा आए तो डर जाता हूँ ..अब यह मानता हूँ कि  कोई शक्ति हमारे अन्दर की ही हमे सूचना जरुर देती है पर शायद    हम उस को पहचान नही पाते ….पर यह सपने आते हैं .इस मेल में सिर्फ अपने आने वाले सपनो का जिक्र किया है ..आगे भी कुछ प्रश्न है जो अगली मेल में जारी रहेंगे….
शुक्रिया

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इस प्रश्न पर समय द्वारा किये गए इशारों को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यक्तिगत संदर्भ हटा दिये गये हैं, अतएव कहीं-कहीं लय टूटती सी नज़र आ सकती है। आप भी देखिए, कि आप यहां से क्या पा सकते हैं। सपनों के मनोविज्ञान संबंधी दिलचस्पी हो ( जिसका कि जिक्र यहां स्पष्ट नहीं है) के लिए आप शुरूआत में दिये गये आलेख-लिंक पर जा सकते हैं।
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आदरणीय,
आप इस पर बेहद गंभीर हैं, और अपनी गुत्थियों पर असमंजस में।
यह इस लंबे खत से पता चलता है। समय अभी तय नहीं कर पा रहा है, कि वह किस हद तक आपसे संवादरत हो सकता है, और कितना अनौपचारिक। चलिए कुछ कोशिश तो की ही जा सकती है।

सपनों की उलझनों ने समय को भी काफ़ी परेशान किया था, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह से आप अपने बचपन में और अभी भी इनसे बावस्ता हैं। ज़िंदगी से जुडे और भी कई पहलू थे जिनपर प्रचलित दृष्टिकोण समय को नाकाफ़ी लगता था जाहिर है समय ने काफ़ी जिज्ञासाएं की है और दर्शन और विज्ञान का एक सर्वकालिक छात्र है,  बहुतेरे विषयों पर दुनिया भर के अनेक लेखकों की सैकड़ों पुस्तकों से समय का गुजरना हुआ है जिनमें मनोविज्ञान विषय भी शामिल रहा है। यह अपने मुंह मियां-मिट्ठू बनना इसलिए हो रहा है ताकि समय आपको यह बता सके कि समय का दृष्टिकोण वहां और यहां भी पूरी गंभीरता लिए हुए है, ताकि आपको यह लग सके कि चलताऊ ढंग से यूं ही कुछ भी नहीं लिख दिया गया है, ताकि आपसे भी यह उम्मीद कर सकूं कि आप समझें कि गुत्थियों को सुलझाने के लिए सतही प्रयास हमेशा नाकाफ़ी होते हैं

साथ ही इसलिए भी कि, वस्तुगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों वाली पुस्तकों में भी ऐसी गुत्थियों पर कोई सीधी-सीधी बात नहीं होती, या यूं कह लीजिए कि जरूरी नहीं कि आपकी समस्या उसी समरूपता में वहां उपलब्ध हो। वहां इनके ऊपर, मनोजगत के व्यापारों पर पूरा सटीक विश्लेषण उपलब्ध है परंतु इनकी रौशनाई में अपनी उलझनों से प्राप्त इशारों से खु़द ही जूझना पडता है। अब मानवजाति के अद्यानूतन ज्ञान ने मानसिक प्रक्रियाओं की कार्यप्रणालियों की काफ़ी सुसंगत समझ विकसित कर ली है जिसके जरिए अधिकतर गुत्थियों को सुलझाया जा सकता है। वहां भी एक समझ है, एक दृष्टिकोण है, एक पद्धति है और कुछ इशारे हैं जिनके आधार पर मनुष्य अपने एकांतिक विशेष मानसिक व्यापारों को समझने की कोशिश कर सकता है। जाहिर है पर यह कोशिश तो स्वयं को ही करनी होगी, क्योंकि हमारी पसंद का पका-पकाया हलुवा कहीं भी उपलब्ध नहीं है।

अब होता यह है कि यह एक लंबा रास्ता है, पहले तो एक असली वैज्ञानिक वस्तुगत दृष्टिकोण पैदा करना वह भी अपने भाववादी संस्कारों से लडाई के साथ, फिर उसके हिसाब से दुनिया की हर चीज़ से पुनः माथापच्ची करना और उस पर टांग खीचता परिवेश। और समय भी तो चाहिए ही। साधारणतया मानसिक प्रवृति हमेशा एक लघुप्रतिरोध की राह खोजना चाहती है, ताकि तात्कालिक रूप से, शीघ्रता से एक आत्मसंतुष्टि मिले, दिमागी़ तनाव कम हो और दैनन्दिनी क्रियाकलापों में आसानी से जुट जाया जा सके। इसलिए अधिकतर हम बिना किसी गंभीर अध्ययन के अपनी सीमित समझ के मुताबिक अटकलबाज़ी करते हैं, और तुरत किसी कामचलाऊ निष्कर्ष पर पहुंच कर दिमाग़ को अपनी दूसरी, सापेक्षतः जरूरी, इच्छित सरगोशियों में लगा देते हैं।

यही कारण है कि ईश्वर, भाग्य, नियति, अलौकिकता, अध्यात्म आदि-आदि के तुरंत तसल्ली देने वाले क्रिया-व्यापार समाज में हमेशा जोरों पर रहते हैं। यहां हर गुत्थी के सरल, स्थापित से, पूर्व तैयार, एक साधारण सी तार्किकता की श्रृंखला में व्यवस्थित से हल हमेशा तैयार हैं। इसके साथ ही ये हमारे संस्कारों में होते हैं, पूर्वपरिचित होते हैं, अधिकतर परिवेश की सहमति भी साथ होती है अतएव इनके साथ तादात्मय बैठा लेना हमारे लिए ज्यादा सहज होता है

ऐसा ही आपके साथ हो रहा है। सांयोगिक संवृत्तियां आपको इस तरह सोचने पर विवश कर रहीं है, और साथ ही आपकी जिज्ञासु समझ थोडा-बहुत संदेह भी पैदा कर रही है। आप अंतर्द्वंद में हैं।

पहले एक बात बताता हूं। हमारी दादी जी इस तरह से ही सपनों के सच वाले मामले में और टैलीपैथी जैसे मामलों में गांव में और परिवेश में बहुत लोकप्रिय थीं। वे अक्सर कुछ पुराने संकेतों के जरिए भविष्यवाणियां भी करके चौंकाया करती थी। जैसे आज कोई आयेगा, आज वहां मत जाओ, आज यूं होगा, आदि-आदि। घर में ही साक्षात उदाहरण मौजूद था, इसीलिए हमारे लिए यह अंतर्द्वंद काफ़ी भारी था। उनके आप जैसे ही कई किस्से हम सुना करते थे। दादा जी एक किस्सा तो इतना सटीक सुनाया करते थे कि आश्चर्य से मन मसोस कर रह जाता था, जैसे कि तब होता है कि हम जानते हैं कि जादू दिखाने वाला कोई ट्रिक लगाकर भ्रम पैदा कर रहा है और फिर भी हम उस ट्रिक का अंदाज़ा नहीं लगा पाते और यह सोचते रह जाते हैं कि आखिर यह संभव कैसे हो पाया होगा

यह जबरदस्त चुनौती होती है और यहीं, हमारे दृष्टिकोण, हमें दो अलग राहों पर ले जाने की संभावनाएं रखते हैं। यदि हम किसी भी तरह की अलौकिकता में, चमत्कारों में, जरा सा भी यकी़न रखते हैं तो हम इस जादू को भी उन्हीं से जोडकर शांति पा सकते हैं, इसे भी उसी अलौकिकता का एक उदाहरण मानकर श्रृद्धानवत हो सकते हैं। दूसरी ओर यदि हम जगत की वस्तुगतता के बारे में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हैं तो हम यह यक़ीन तो रखते हैं कि यह भी किसी भ्रमात्मक ट्रिक का ही मामला है पर हमारे पास इसका कोई जबाब नहीं होता और एक संदेह, एक उलझन लेकर वहां से उठते हैं। पहला रास्ता सुरक्षित रास्ता है, जिस पर और भी बहुतेरे राही होते हैं, वहीं दूसरा रास्ता हमें और भी अकेला कर देता है तथा एक अनवरत बैचैनी छोड जाता है

पहले तो हमें यह सब रहस्यमयी लगता था, धीरे-धीरे इन भविष्यवाणियों के पीछे के प्राचीन संकेतों की भाषा हम भी समझने लगे और फिर सच होने के अवसरों और आवृतियों को जांचने लगे। तब जाकर इनकी सांयोगिकताओं के प्रतिशत हमें समझ में आने लगे। परंतु हमारी माताजी उनमें अभी भी एक अलौकिक शक्ति का आभास पाती हैं और उन पर कोई तर्क काम नहीं करते। आस्थाएं, तर्क से संतुष्ट नहीं होती।

तो आदरणीय, यह आप पर है कि इन सांयोगिकताओं में किसी नियति की संभावनाएं टटोलते हैं और इनके पीछे किसी अलौकिक शक्ति के भावी इशारे ढूढ़ते हैं या फिर सपनों की वैज्ञानिक वस्तुगतता को समझ कर इनके सच के रूप में घट जाने को एक संयोग के रूप में देखते हैं। यह आप ही भली भांति जानते हैं कि इन सांयोगिकताओं के कितने रूप आपके सामने सच के हिस्से में आये, कितनों का आपने नोटिस लिया, और जो सच नहीं होते उनका नोटिस आप लेते हैं या नहीं।

समय ने अपने लेख में कई बातों को काफ़ी विस्तार से समझाने की कोशिश की थी। टिप्पणियों के जबाब में की गयी टिप्पणियों में और भी कई इशारे किये थे। कुछ फ़र्जी सपनों का जिक्र भी किया था जो कि हमेशा सच होने ही होते हैं।

यह आपने लिखा ही है कि कुछ सपने तो हूबहू घटते देखें हैं आपने, और कुछ हूबहू नहीं थे। दोनों ही मामलों में सारी व्याख्याएं घटनाएं घट जाने के बाद की हैं और उनके आपसी अंतर्संबंध भी आपने बाद में ही खोजे हैं। इसके अलावा यह भी ध्यान देने की बात है, इन सब सपनों को आप उम्र और समझ के इस दौर में पुनः नये सिरे से व्याख्यायित कर रहे हैं, ऐसे में हमारे पूर्वाग्रह अनुकूल परिस्थितियां ही चुनते हैं, कई नई अनुकूल बातें भी गढ़ ली जाती हैं। इस पर भी सोचा जाना चाहिए कि यह अधिकतर हमारे बुरे सपनों के साथ ही क्यों होता है?

हमारी चिंताएं वास्तविक परिस्थितियों के कारण ही उपजती है। जैसे की बच्चा जब झूले पर बैठा हो तो हमें उसके डूब कर मर जाने की चिंता सता ही नहीं सकती, हमें इस वक्त उसके गिर जाने की चिंता ही हो सकती हैं। यानि कि हर घटना के साथ हमारी स्मृति में उससे संबंधित चिंताओं के भावों की स्मृति भी बनती है और बाद में उस घटना का स्मरण उन चिंताओं से भी हमें पुनः रूबरू कराता है। यही सपनों में भी होता है, छवियों के साथ जुडी हुई चिंताएं भी हमें सालती हैं और यदि हमारी प्रवृति इन पर पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पाले हुए होती है तो चिंतन में भी और सपनों में भी हम उसी के अनुसार मानसिक प्रक्रियाएं करते हैं।

काफ़ी कुछ इशारे किए हैं समय ने।

आप यदि गंभीर है सत्य के अन्वेषण हेतु तो आपको अपने मन की गहराइयों को टटोलना चाहिए, अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं की वास्तविक पृष्ठभूमि को समझने की कोशिश करनी चाहिए, इसी से आपकों अपनी मानसिक प्रक्रियाओं और सपनों के रहस्यों की परतें खोलने में मदद मिल सकती है। जहां आपकी समझ, गुत्थियों के विश्लेषण और यथार्थ तथा वस्तुगत हल प्राप्त करने में अपनी सीमाएं महसूस करे, तो इसे उस विषय संबंधी अधिकृत तथा सिद्ध स्रोतों से और अधिक अध्ययन-मनन करने का इशारा समझना चाहिए। जब तक आप संतुष्ट नहीं महसूस करते, उस पर अपनी अंतिम मान्यताओं और निष्कर्षों को स्थगित रखना चाहिए।

यदि आप अपनी मानसिकताओं औए मान्यताओं के साथ संतुष्ट है, और अलौकिक शक्तियों के इशारों पर वास्तव में यक़ीन करते हैं तो फिर काहे इस समझ-वमझ के पचडे में पडते हैं? इसका आनंद लीजिए और ऐसे लोग जाहिर है कम ही होते हैं तो इसका जिक्र करके अपने अंदर भी अलौकिक शक्ति होने का भ्रम पालिए, लोगों के बीच चमत्कारी समझे जाने का मज़ा लीजिए और खुद भी अलौकिक होने के अहसास का गर्व महसूसिए। मिल रहा है, तो ज़िंदगी का मज़ा लूटिए।

यदि समय से कुछ और मदद चाहिए तो संवाद बनाए रखें। समय हमेशा हाज़िर है।
कुछ अनुचित और कठोर कह दिया गया हो तो मुआफ़ी की गुंजाईश बनाए रखें। मुझे मेरी सीमाएं बता दें।

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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

चेतना श्रृंखला का समाहार और दर्शन का संश्लेषक कार्य

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने चिंतन और चेतना को कंप्यूटर के संदर्भ में देखने की कोशिश की थी, और विचार किया था कि क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?  इस बार यहां चेतना पर शुरू हुई इस श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत किया जा रहा है तथा दर्शन के संश्लेषक कार्य पर चर्चा की जा रही है। इस समाहार में अभी तक की पोस्टों के सभी लिंक हैं।

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।
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चेतना श्रृंखला का समाहार : दर्शन का संश्लेषक कार्य

हमारी यह श्रृंखला चेतना की बातचीत से शुरू हुई थी, जिसे दर्शन के परिप्रेक्ष्य में ही बेहतर जाना जा सकता है। दर्शन के समेकन के जरिए हम विश्व को एक समष्टि के रूप में समझना सीखते हैं और अपना एक नज़रिया एक दृष्टिकोण विकसित करते हैं। दर्शन का बुनियादी सवाल हमारे सामने यह चुनौती रखता है कि चेतना और भूतद्रव्य में प्राथमिक और निर्धारक कौन हैं। इसके जवाब के अनुसार ही दर्शन की दो मूल प्रवृतियों भौतिकवाद और प्रत्ययवाद से हमारा सामना होता है। हम दर्शन की अध्ययनविधियों द्वंदवाद और अधिभूतवाद से परिचित हुए, और हमने संकल्पनाओं और प्रवर्गों के बारे में जाना। फिर हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को समझने के लिए भूतद्रव्य की संकल्पना से विस्तार से गुजरे। इससे संबंधित दृष्टिकोणों और उनके विकास की प्रक्रिया को समझते हुए, हमने इसके एक मूलभूत गुण परावर्तन को जाना समझा।

अजैव जगत में परावर्तन को समझते हुए हमने उसके जटिलतर होते जाने की विकास प्रक्रिया को जानने की कोशिश की, और जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन के रूपों से परिचित हुए। फिर जीवन के क्रमविकास के दौरान परावर्तन की प्रक्रिया के साधनों के रूप में तंत्रिकातंत्र की उत्पत्ति तक की यात्रा हमने तय की। यह यात्रा आगे बढ़ी और हमने परावर्तन के सक्रिय और निष्क्रिय रूपों को समझने की कोशिश की। फिर हमने परावर्तन के उच्चतम जटिल रूप में मानसिक क्रियाकलापों और इसी की संदर्भ में मन, चिंतन और चेतना के बीच बारीक फ़र्कों को समझने की कोशिश की।

यह सफ़र आगे बढा और हमने मानसिक क्रियाकलापों के भौतिक अंग के रूप में मस्तिष्क पर एक संक्षिप्त नज़र ड़ाली, तथा जैव जगत में पशुओं और मनुष्य के मानस में मुख्य भेदों को जाना। अंतत्वोगत्वा हम मनुष्य की चेतना के मुख्य आधारों के रूप में श्रम की चर्चा तक पहुंचे तथा भाषा और चिंतन के अंतर्संबंधों को कुछ विस्तार से जाना। इस तरह हमने भूतद्रव्य के क्रमिक विकास के परिणाम स्वरूप चेतना की उत्पत्ति को अद्यतन स्तर पर समझने की कोशिश की और भूतद्रव्य और चेतना के बीच की प्रतिपक्षता और सापेक्षता को ह्र्दयंगम किया। इसी कड़ी में हमने मशीनों और उनके चेतना संपन्न हो सकने की संभावनाओं पर भी गौर किया और जाना कि चेतना किस तरह से सिर्फ़ मनुष्य का लाक्षणिक गुण हो सकती है।

इस श्रृंखला के अंतर्गत हमने जिन संकल्पनाओं (concepts) और प्रवर्गों (categories) को समझने की कोशिश की है, उनका विधितंत्रीय (methodological) महत्व बहुत अधिक है। वे दर्शाते हैं कि हमारे संज्ञानात्मक (cognitive) क्रियाकलाप की सामान्य दिशा क्या है। किसी भी गंभीर अध्येता और सक्रिय सचेत व्यक्तित्व के लिए, बाह्य विश्व का अध्ययन करते समय यह जरूरी है कि वह विश्व को संयोगिक घटनाओं के बेतरतीब ढ़ेर की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी अविभक्त और अंतर्संबंधित भौतिक प्रक्रिया के रूप में जांचे-परखे, जो वस्तुगत रूप से विद्यमान है और अपने ही नियमों के अनुसार विकसित होता है।

यह विश्व, ना केवल साकल्य के रूप में (as a whole) एक विराट भौतिक प्रणाली है, बल्कि इसके अलग-अलग हिस्से भी विशेष प्रणालियां हैं, जिनमें आवश्यक, अंतर्निहित, स्थायी संयोजन (connections) होते हैं और जिनकी अपनी ही संरचनाएं और तत्व होते हैं। इसीलिए विश्व को प्रत्ययवादी ( भाववादी, Idealistic) दृष्टिकोण से जाना और समझा नहीं जा सकता है, क्योंकि वह हमारे परिवेश की घटनाओं के वस्तुगत (Objective) स्वभाव से इंकार करता है, क्योंकि वह परिवर्तन और विकास के सार्विक स्वभाव से इंकार करता है, क्योंकि वह इस बात को समझे बिना कि चिंतन और चेतना स्वयं भौतिक विश्व के जटिल विकास का उत्पाद हैं, वह सारी परिवेशी घटनाओं में चेतना की अभिव्यक्ति और नियमितताओं को देखता है।

प्रत्ययवाद हमारी तर्कबुद्धि को गति और विकास के वस्तुगत नियमों के अध्ययन की ओर नहीं ले जा सकता है जो कि आधुनिक विज्ञान का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। जो लोग परिवर्तन, गति तथा विकास के सार्विक, सामान्य स्वभाव को नहीं देख पाते, वे व्यावहारिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं के अपने विश्लेषण और निर्णयों में गलती करेंगे। तेज़ी से बदलती हुई आधुनिक दुनिया में सामाजिक प्रणालियों और संरचनाओं के वस्तुगत नियमों का ज्ञान, समुचित तथा सफ़ल क्रियाकलापों और हस्तक्षेपों की अनिवार्य शर्त है।

इस श्रृंखला में प्रस्तुत द्वंदात्मक भौतिकवाद के प्रवर्ग और संकल्पनाएं, मनुष्य का एक विश्वदृष्टिकोण विकसित करने और विश्व को समझने के विधितंत्रीय कार्यों के अलावा एक और महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। इनके द्वारा सर्वाधिक विविधतापूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान को विश्व के एकल चित्र में संश्लेषित तथा संयुक्तिकृत किया जाता है, जिससे भूतद्रव्य ( matter ) की गति के सारे रूपों ( सरलतम व यांत्रिक गति से लेकर जटिलतम तक ) को एक ही साकल्य की शक्ल में जांचा जा सकता है। अजैव वस्तुएं तथा जीवित प्राणी, परावर्तन के निम्नतम रूप तथा उसका उच्चतम रूप चेतना, जीवन की उत्पत्ति की प्रक्रिया, सामाजिक क्रियाकलाप के रूप में श्रम, चिंतन के भौतिक वाहक के रूप में भाषा – ये सभी एक एकल विश्वदृष्टिकोण में एकीकृत तथा संश्लेषित, एक ही तस्वीर में अंकित सिद्ध होते हैं।

भौतिकी, रसायन, जैविकी, खगोलविद्या, इतिहास, साइबरनेटिकी तथा अन्य विज्ञान अपनी समस्याओं को अपनी ही विधि से हल करते हैं और अध्ययनाधीन वस्तुओं के बारे में अपनी ही विशेष व्यापक संकल्पनाओं और धारणाओं का विकास करते हैं। किंतु इनमें से एक भी, इन सभी विज्ञानों के परिणामों को विश्व की एकल तस्वीर के अंदर संश्लेषित और एकीकृत करने का कार्य नहीं करता है। दर्शन इन सभी अलग-अलग विज्ञानों के प्रमुख बुनियादी निष्कर्षों को संश्लेषित करता है और उनके आधारों पर विश्व को एक साकल्य के रूप में समझने की राह प्रशस्त करता है। यह हमें बदलती हुई दुनियां में अलग-अलग विज्ञानों के स्थान तथा उनके अंतर्संबंधों को तथा आगे के विकास को सही ढ़ंग से समझने में समर्थ बनाता है। इस तरह, दर्शन ज्ञान के संश्लेषण का कार्य भी निष्पादित ( perform ) करता है

मानवश्रेष्ठों, चेतना की संकल्पना और इसके भूतद्रव्य के साथ अंतर्संबंधों को जाने बगैर तथा भूतद्रव्य के जटिल विकास के फलस्वरूप चेतना की उत्पत्ति को समझे बगैर, हम अपने परिवेश की अंतर्गुथित परिघटनाओं और जटिल सामाजिक अंतर्संबंधों के सटीक विश्लेषण की योग्यता हासिल नहीं कर सकते। हमारा प्रत्ययवादी ( भाववादी, Idealistic) मानसिक अनुकूलन और अध्ययन की अधिभूतवादी ( metaphysical ) विधि के कारण हमें घटनाओं में किसी अलौकिक चेतना की उपस्थिति और रहस्यमयता नज़र आती है। और ऐसे में जबकि आज वैज्ञानिक से लगते उपागमों और शब्दावलियों के सहारे प्रत्ययवादी दर्शन की सिद्धी तथा पुष्टि के अनगिनत, संगठित और बहुप्रचारित प्रयासों का जो अंबार लगाया जा रहा है, मनुष्य जाति के भावी सामूहिक विकास के लिए दर्शन की सुसंगत समझ तथा एक समुचित वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और भी जरूरी हो गया है।

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इस बार इतना ही।
आगे दिमाग़ को कष्ट देने के लिए हम कोई और राह ढूंढ निकालेंगे। दर्शन और मनोविज्ञान की और कई संकल्पनाओं और प्रवर्गों पर यथासंभव चर्चा करते रहेंगे। देखते हैं समय के हाथ क्या लगता है।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा की थी। इस बार जैसा कि पिछली बार कहा था, हम देखेंगे कि चिंतन और चेतना को कंप्यूटर के संदर्भ में हम कहां पाते हैं। क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।
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क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

वर्तमान में विज्ञान के क्षेत्र में साइबरनेटिकी, सूचना सिद्धांत, कृत्रिम बुद्धि का सिद्धांत, आदि का विकास द्रुत इलैक्ट्रोनिक कंप्यूटरों के निर्माण से जुड़ा हुआ है। इनका विशिष्ट लक्षण यह है कि अन्य यंत्रों से भिन्न इन्हें मनुष्य के दैहिक श्रम के बजाए मानसिक श्रम को हल्का करने के लिए बनाया गया। आधुनिक कंप्यूटर अपने पूर्वर्तियों से हजारों गुना श्रेष्ठ हैं, और एक सेकंड़ में करोड़ो संक्रियाएं कर सकते हैं। सुपर कंप्यूटर भी हैं, जो बेहद अल्प समयावधि में ऐसी अत्यंत जटिल तार्किक तथा संगणकीय संक्रियाएं कर सकते हैं जिनमें सूचना का विराट परिणाम निहित होता है।

सूचना सिद्धांत और कृत्रिम बुद्धि सिद्धांत कंप्यूटरों के लिए ऐसे जटिल प्रोग्रामों के विकास में मदद कर रहे हैं, जिन्हें विशिष्ट कृत्रिम गणितीय भाषाओं में लिखा जाता है और जो एक समस्या का समाधान करते समय कंप्यूटर द्वारा की जाने वाली संक्रियाओं के सेट और अनुक्रम का निर्धारण करने वाले हजारों नियमों के समुच्चय होते हैं। आधुनिक कंप्यूटर उत्पादन प्रक्रिया की एक बड़ी संख्या तथा बेहद जटिल गणनाओं को पूर्णतः स्वचालित करने में समर्थ होते हैं। अपने प्रोग्राम स्वयं बना सकने वाले ऐसे कंप्यूटर हैं, जो उनमें प्रविष्ट कराये गये प्रोग्रामों के आधार पर उनसे बेहतर प्रोग्राम बाणा लेते हैं, वे प्रोग्रामरों द्वारा की हुई ग़लतियां सुधारते हैं और अन्य स्वचालित इलैक्ट्रोनिक यंत्रों की रचना भी कर सकते हैं। इस समय संसार में लाखों इलैक्ट्रोनिक स्वचालित यंत्र तथा रोबोट काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में निरंतर कार्य चल रहा है, नये और अधिक जटिल प्रोग्राम बन रहे हैं और अधिक सटीक व द्रुततर कंप्यूटर तथा संचालन यंत्र बन रहे हैं।

इस सिलसिले में अक्सर यह प्रश्न उठते हैं कि क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकते हैं? क्या एक इलैक्ट्रोनिक मशीन में चेतना और चिंतन का अस्तित्व हो सकता है? क्या वे मनुष्य की तर्कबुद्धि तथा अक़्ल को प्रतिस्थापित कर सकती हैं? क्या वे चिंतनशील सत्व के रूप में मनुष्य को ही तो विस्थापित नहीं कर देंगे? इन प्रश्नों की केवल दार्शनिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संगतता भी है। कृत्रिम बुद्धि के सिद्धांत के क्षेत्र में खोजबीन, जटिल कार्यों को संपन्न करने में समर्थ विशेषज्ञ प्रणालियों की रचना और स्वचालित रोबोटों के निर्माण में बहुत तरक़्क़ी हो जाने के बावज़ूद, कम से कम निकट भविष्य में, इस तरह की आशंका के लिए कोई आधार नहीं हैं।

चलिए हम इस समस्या पर चिंतन और चेतना के स्वभाव के विश्लेषण की दृष्टि से देखते हैं। मनुष्य के मानसिक क्रियाकलाप में उसके उच्चतम रूप, निश्चित नियमों के अनुसार होने वाला तार्किक चिंतन ही शामिल नहीं है, बल्कि यथार्थता के परावर्तन के अनेक भावनात्मक रूप ( जैसे सुख, क्रोध, भय, संतोष, प्रेम, मैत्री, शत्रुता, भूख, तुष्टि, आदि ) और विविध प्रकार की अचेतन मानसिक प्रक्रियाएं भी शामिल हैं।

इसी तरह मनुष्य की रचनात्मकता ( creativity ) विशेष दिलचस्पी की चीज़ है। यह एक ऐसी घटना ( phenomenon ) है, जो पहले से निर्धारित क़ायदों से संनियमित ( governed ) नहीं होती। इसके विपरीत इस रचना प्रक्रिया में ही, इसके दौरान ही नये क़ायदे बनाए जाते हैं, गुणात्मकतः नये विचारों तथा सक्रियता के उसूलों को विकसित किया जाता है। यदि ऐसा न होता, तो लोग पशुओं की तरह आनुवंशिकता से उन तक संप्रेषित क्रियाकलाप के अंतर्जात ( innate ) प्रकारों के एक ही समुच्च्य को लगातार करते रहते। रचनात्मकता मनुष्य की मानसिक, चित्तवृतिक ( psychic ) विशेषता ही है, जो पर्यावरण को गुणात्मकतः परिवर्तित करने की, कोई सर्वथा नई चीज़ रचने की उसकी क्षमता में व्यक्त होती है और जो उसे अन्य सारे जीवित प्राणियों से मूलतः विशिष्ट बना देती है

यहां एक ऐसी सुस्पष्ट सीमा रेखा है, जो सर्वोत्तम कंप्यूटरों तथा किसी भी सामान्य व्यक्ति की संभावनाओं को विभाजित करती है। कंप्यूटर स्वयं चिंतन नहीं कर सकता है, वह पूर्ण परिपथों और इलैक्ट्रोनिक यांत्रिक विधियों के ज़रिए सिर्फ़ उन क़ायदों का पालन करता है, जो मनुष्य द्वारा उसमें ड़ाले गये प्रोग्रामों में शामिल होते हैं। कंप्यूटर संक्रियाओं की गति के मामले में और अपनी स्मृति ( स्मृति की युक्तियां ), अपनी अनथकता में और अनेक वर्षों तक काम करने की क्षमता, आदि में मनुष्य से बेहतर होता है। किंतु, जैसा कि हम जानते हैं, रचना प्रक्रिया को पूर्णतः क़ायदों के मातहत नहीं रखा जा सकता है और उनके जरिए वर्णित नहीं किया जा सकता है. इसलिए उसका प्रोग्रामन करके उसे कंप्यूटर के ‘हवाले’ नहीं किया जा सकता है। जाहिर है कि विज्ञान, इंजीनियरी तथा कला को रचना के बिना विकसित नहीं किया जा सकता है : इसी तरह, वास्तविक चिंतन भी उसके बिना असंभव है

कोई भी कंप्यूटर, नियत क़ायदों के मुताबिक संगीत बनाने वाला कंप्यूटर भी, ए. आर. रहमान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है। बोधगम्य पाठ तैयार करने के लिए प्रोग्रामित कंप्यूटर प्रेमचंद की कृति ‘गोदान’ नहीं लिख सकता है। कुल मिला कर लाबलुब्बोआब यह कि एक कंप्यूटर सामान्यतः ऐसी कोई समस्या नहीं सुलझा सकता है, जो उसमे प्रविष्ट कराये गए प्रोग्राम में शामिल नहीं हो।

विक्टर ह्यूगो के पंद्रहवीं सदी के अंत की घटनाओं का वर्णन करने वाले एक उपन्यास ‘नोत्रे देम’ का एक पात्र एक पांडुलिपी तथा एक छपी हुई पुस्तक की तुलना करते हुए यह आशंका व्यक्त करता है कि छापे की मशीन ( जिसका अविष्कार हुआ ही था ) के कारण लोग लिखना भूल जाएंगे और साक्षरता लुप्त हो जाएगी। आज हम जानते हैं कि यह आशंका और भविष्यवाणी सत्य साबित नहीं हुई। पढ़ना-लिखना जानने लोगों की संख्या संसार भर में लगातार बढ़ रही है, शिक्षा का सामान्य स्तर बढ़ रहा है और ऐसा छापे की मशीन के कारण ही हो रहा है।

‘चिंतनशील’ कंम्प्यूटरों के बारे में भी इससे मिलती जुलती कोई बात कही जा सकती है। कुछ कलनीय तार्किक संक्रियाओं को निष्पादित करके रोबोट व कंम्प्यूटर लोगों को दैनंदिन, उबाऊ तथा भारी काम से छुटकारा दिलाते हैं। जिस प्रकार पुस्तक प्रकाशन से सार्वभौमिक साक्षरता में वृद्धि हुई, उसी प्रकार से कंम्प्यूटरों का फैलाव मानव चिंतन के और अधिक विकास को बढ़ावा दे रहा है। एक सही और सामाजिक प्रतिबद्धता से सम्पन्न व्यवस्था में इसके सदुपयोग के द्वारा लोगों की शिक्षा और संस्कृति में और उनकी रचनात्मक क्षमताओं के विकास में छलांगनुमा प्रगति ही होगी।

कंप्यूटर के द्वारा मानवजाति को अपने मानसिक क्रियाकलाप को विकसित और परिष्कृत बनाने की दिशा में तथा जनगण की विशाल बहुसंख्या के हित में विश्व को समझने तथा तर्कसम्मत ढ़ंग से इसे बदलने की दिशा में एक और कदम बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसलिए कंम्प्यूटरों के और विशेषतः सूक्ष्म इलैक्ट्रोनिकी के विकास में मानव चिंतन के प्रतिद्वंद्वी के ख़तरे को नहीं, बल्कि उसके और अधिक विकास तथा सुधार के आधारों को देखना चाहिए।

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इस बार इतना ही।
अगली बार हम चेतना संबंधी इस श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के एक रूप में भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा की थी। इस बार हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा करेंगे। चेतना पर शुरू हुई यह श्रृंखला धीरे-धीरे अपने अंत की ओर बढ़ रही है।

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।

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भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव
( the Relative character of the Opposition of Matter and Consciousness )

अब तक का श्रृंखलित विवेचन, दर्शन के बुनियादी सवाल के जवाब के मद्देनज़र चेतना की उत्पत्ति और भूतद्रव्य के साथ उसके संबंधों की विस्तृत पड़ताल कर रहा था। हमने यह जाना कि भूतद्रव्य के विपरीत चेतना शाश्वत नहीं है। यह भूतद्रव्य के विकास का एक उत्पाद है। यह भी कि चेतना भूतद्रव्य के एक विशेष अनुगुण, अर्थात परावर्तन ( reflection ), का उच्चतम और सर्वाधिक जटिल रूप है।

भूतद्रव्य चेतना के बिना विद्यमान हो सकता है और क्रमिक विकास के दौरान चेतना से पहले मौजूद था, किंतु चेतना भूतद्रव्य के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकती है। इस अर्थ में यह द्वितीयक तथा व्युत्पन्न है, और इसी में भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता निहित है। हमारे गिर्द वस्तुएं भौतिक हैं, जबकि चेतना ( जो हमारे मस्तिष्कों में उत्पन्न होती है ) प्रत्ययिक ( ideal ) है, इसमें भी इनकी प्रतिपक्षता व्यक्त होती है। परंतु यह प्रतिपक्षता स्वयं में निरपेक्ष ( absolute ) नहीं, वरन सापेक्ष ( relative ) होती है। यह प्रतिपक्षता दर्शन के बुनियादी सवाल के संदर्भ में ही सार्थक है, यानि जब हमें यह जानने में दिलचस्पी होती है कि इनमें से कौन प्राथमिक है, चेतना भूतद्रव्य से कैसे संबधित है और क्या यह हमारे परिवेशीय जगत को जान सकती है।

मान लीजिए के हम अपने आसपास की वस्तुओं पर विचार कर रहे हैं, उन्हें जांच रहे हैं और उनका अध्ययन कर रहे हैं। चूंकि वे हमसे परे हैं और हमारे चेतना पर निर्भर नहीं हैं और हम अपने संवेद अंगों के जरिए उनके बारे में सूचना प्राप्त करते हैं, इसलिए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि ये सब भूतद्रव्य ( matter ) हैं, यानि वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) हैं। इन वस्तुओं के बिंब, उनकी संकल्पनाएं और हमारे ज्ञान को व्यक्त करने वाले निर्णय और कथन हमारे मस्तिष्क में हैं, हमारी चेतना के अंग हैं और उस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) हैं। इसलिए कुछ दशाओं में आत्मगतता, वस्तुतः हमारी चेतना में वस्तुगत यथार्थता का परावर्तन है। और इसी अर्थ में, चेतना, वस्तुगत यथार्थता के रूप में भूतद्रव्य के प्रतिपक्ष में है।

अब आगे यह मान लीजिए कि अपनी दिलचस्पी की भौतिक वस्तुओं के हमारे अध्ययन के दौरान कोई अन्य व्यक्ति हमारा निरिक्षण कर रहा है, हमें जांच रहा है और हमारे क्रियाकलाफ पर विचार कर रहा है। इस व्यक्ति और उसकी चेतना के लिए हम स्वयं और हमारे मस्तिष्क व उनके क्रियाकलाप उतने ही भौतिक हैं, जितने कि हमारे परिवेशीय जगत की अन्य वस्तुएं। फलतः वह हमें और हमारे मस्तिष्कों के क्रियाकलाप के उत्पादों को वस्तुगत यथार्थता मान सकता है, ऐसी चीज़ समझ सकता है, जो उसकी चेतना से परे तथा उसके मानसिक क्रियाकलाप के बाहर है। अतएव, हमारे क्रियाकलाप के संदर्भ में हमारा चिंतन और मन एक तरफ़ तो हमारे मस्तिष्क के परावर्तन के रूप में काम करते हैं और दूसरी तरफ़ , एक अन्य प्रेक्षक के लिए उसी समय वह उसकी चेतना से परे की वस्तुगत यथार्थता के रूप में भी हो सकते हैं। इसी तरह अपनी बारी में, हम भी इस प्रेक्षक की चेतना तथा मानसिक क्रिया को, ठीक वैसे ही, वस्तुगत यथार्थता मान सकते हैं।

इस तरह, हम देखते हैं कि भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक्त, वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं और इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।

हमने यह भी देखा कि यह प्रतिपक्षता सापेक्ष होती है, और चिंतन तथा मानसिक क्रियाकलाप की संकल्प तथा अनुभूतियों जैसी अन्य अभिव्यक्तियों के वैज्ञानिक अध्ययन के वक्त इस प्रतिपक्षता को अतिरंजित करना भारी भूल होगी। चूंकि मन, मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप में, काम में, भाषा संबंधी क्रियाकलाप आदि में प्रकट होता है, इसलिए भूतद्रव्य और चेतना की, दैहिक और मानसिक की प्रतिपक्षता तथा एक का दूसरे से पूर्ण बिलगाव, चेतना तथा अन्य मानसिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन में ही बाधक होगा। भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का स्वभाव सापेक्ष होता है। दर्शन के बुनियादी सवाल से निपटने के बाद इन्हें इसी अंतर्द्वंद में देखना चाहिए।
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इस बार इतना ही।
अगली बार हम चर्चा को आगे एक रूचिकर मोड़ देंगे और इस पर चर्चा करेंगे कि क्या कंप्यूटर भी सोच विचार कर सकते हैं। उसके बाद श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

भाषा और चिंतन

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम की महत्वपूर्णता और उपयोगिता पर विचार किया था। इस बार हम, मानव चेतना के आधार रूप के एक और महत्वपूर्ण पहलू यानि मानव की भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा करेंगे।

चलिए आगे बढते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्तमात्र उपस्थित है।
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भाषा और चिंतन

मनुष्य की चेतना ( consciousness ) के विकास का एक और प्रबल साधन उसकी भाषा है। यह चिंतन ( thoughts ) की प्रत्यक्ष वास्तविकता ( direct reality ) है। विचार हमेशा शब्दों में व्यक्त किए जाते हैं, अतः यह कहा जा सकता है कि भाषा विचार की अभिव्यक्ति का रूप है

भाषा एक विशेष संकेत प्रणाली है। प्रत्येक भाषा अलग-अलग शब्दों, अर्थात उन पारंपरिक ध्वनि संकेतों से बनी होती है, जो विभिन्न वस्तुओं और प्रक्रियाओं के द्योतक होते हैं। भाषा का दूसरा संघटक अंग है व्याकरण के कायदे, जो शब्दों से वाक्य बनाने में मदद करते हैं। ये वाक्य ही विचार व्यक्त करने का साधन हैं। एक भाषा के शब्दों से, व्याकरणीय कायदों की बदौलत असंख्य सार्थक वाक्य बोले या लिखे जा सकते हैं और पुस्तकों या लेखों की रचना की जा सकती है।

जीव-जंतु केवल किसी ठोस स्थिति तक सीमित परिघटनाओं के बारे में अपने साथियों को संकेत दे सकते हैं, जबकि मनुष्य भाषा के माध्यम से अन्य मनुष्यों को विगत, वर्तमान तथा भविष्य के बारे में सूचित कर सकता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात कि उन्हें सामाजिक अनुभव बता सकता है। इस तरह भाषा विविधतम विचारों की अभिव्यक्ति, लोगों की भावनाओं और अनुभवों का वर्णन, गणितीय प्रमेयों का निरूपण तथा वैज्ञानिक व तकनीकी ज्ञान की रचना करना संभव बनाती है।

यद्यपि चिंतन और चेतना प्रत्ययिक ( ideal ) हैं, परंतु उन्हें व्यक्त करने वाली भाषा भौतिक ( material ) है। यह इसलिये कि मौखिक और लिखित भाषा को मनुष्य अपने संवेद अंगों, इन्द्रियों से समझ सकता है। सामूहिक श्रम की प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न और विकसित भाषा चिंतन के विकास का एक महत्वपूर्ण साधन बन गई। भाषा की बदौलत मनुष्य विगत पीढ़ियों द्वारा संचित अनुभव को इस्तेमाल कर सकता है और अपने द्वारा पहले कभी न देखी या न महसूस की गई परिघटनाओं के संग्रहित ज्ञान से लाभ उठा सकता है। भाषा का जन्म समाज में हुआ, यह एक सामाजिक घटना है और दो अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य पूरे करती है, चेतना की अभिव्यक्ति और सूचना के संप्रेषण का। भाषा के द्वारा ज्ञान को संग्रहित, संसाधित और एक व्यक्ति से दूसरे को तथा एक पीढ़ी से दूसरी को अंतरित किया जाता है

उच्चतर जानवरों में आवाज़ से संकेत देने के कुछ सरल रूप पाये जाते हैं। मुर्गियां कई दर्जन ध्वनियां पैदा करती हैं, जो भय या आशंका के, चूज़ों को पुकारने और भोजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति के संकेत हैं। डोल्फिन जैसे अत्यंत विकसित स्तनपायियों में कई सौ ध्वनि संकेत हैं। परंतु फिर भी ये सच्चे अर्थों में भाषा नहीं है, जानवरों का संकेत देना संवेदनों पर आधारित है।
इन्हें प्रथम संकेत प्रणाली की संज्ञा दी जाती है। इनमें संयुक्तिकरण के कायदे नहीं होते, इसलिए इनके द्वारा प्रेषित सूचना बहुत सीमित होती है। जानवरों की संकेत व्यवस्था में सूचना की लगभग उतनी ही इकाइयां होती हैं, जितनी की अलग-अलग संकेतों की संख्या, जबकि मानवीय भाषा विविधतापूर्ण ज्ञान के असीमित परिमाण को संप्रेषित और व्यक्त कर सकती है।

मानवीय भाषा द्वितीय संकेत प्रणाली है। यह श्रम की प्रक्रिया और लोगों के सामाजिक क्रियाकलाप के दौरान इतिहासानुसार उत्पन्न हुई तथा बाह्य विश्व और स्वयं मनुष्य को जानने और रूपांतरित करने का एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गई। इस संकेत प्रणाली का प्रमुख विभेदक लक्षण यह है कि पारिस्थितिक संकेत शब्दों  तथा उनसे बने वाक्यों के आधार पर मनुष्य के लिए सहजवृत्तियों से परे निकलना और ज्ञान को असीमित परिमाण और विविधता में विकसित करना संभव हो जाता है।

मानवसम वानरों को मौखिक भाषा सिखाने के सारे प्रयत्न विफल रहे हैं, क्योंकि इन जानवरों के ध्वनि उपकरण मनुष्य की वाणी की विविधतापूर्ण, सुपष्ट उच्चारित ध्वनियों का उत्पादन करने में समर्थ नहीं होते हैं। हाल के वर्षों में यह संभव साबित हो गया है कि कुछ चिंपाज़ियों को सरलतम भावनाएं ( भूख, भय, आदि ) व्यक्त करने के लिए मूक-बधिर भाषा की अलग-अलग भाव-भंगिमाओं का इस्तेमाल करना सिखलाया जा सकता है। ये वानर भाव-भंगिमाओं की इस भाषा में ज़्यादा से ज़्यादा इस तरह की बातें व्यक्त कर सकते हैं, “मुझे पीने को दो”, “गुडिया को ले आओ”, आदि। अधिक जटिल प्रस्थापनाएं उनके लिए बहुत कष्टप्रद होती हैं, जिनमें ऐसी अमूर्त संकल्पनाएं शामिल होती हैं, जिनके बिना चिंतन का विकास असंभव है।

वानरों के बोलने के क्रियाकलाप के विकास की एक बड़ी बाधा यह है कि उनके मस्तिष्क मनुष्य की वाणी को आत्मसात करने लायक काफ़ी बड़े और विकसित नहीं होते हैं। इस प्रकार के जो अध्ययन किये गए हैं, वे निश्चय ही वैज्ञानिक दिलचस्पी के विषय हैं, किंतु साथ ही वे यह दर्शाते हैं कि उच्चतर मानवसम वानर, मनुष्य के मानसिक क्रियाकलाप में अंतर्निहित द्वितीय संकेत प्रणाली को स्वाधीन रूप से विकसित करने में असमर्थ होने के अलावा उसमें पारंगत होने में भी अक्षम हैं।

श्रम की प्रक्रिया के दौरान चिंतन और चेतना के विकास के आधार व साधन के रूप में उत्पन्न भाषा मनुष्य का एक विशेष और विभेदक लक्षण है।

यह श्रम क्रिया ही थी, जिसके दौरान पारस्परिक समझ की, अनुभव के विनिमय की आवश्यकता तथा समन्वित ढंग से आदेशों का पलन करने की और महत्वपूर्ण सूचनाओं को संचित व संचारित करने की आवश्यकता पैदा हुई। इसके फलस्वरूप उस भाषा का शनैः शनैः विकास तथा जटिलीकरण होता गया, जो प्रारंभ में श्रम क्रिया के साथ सीधे-सीधे गुंथी थी।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वास्तविकता के परावर्तन के उच्चतम रूप में मानव चेतना के विकास को आगे बढ़ानेवाले बुनियादी कारक थे श्रम और भाषा।
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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

चेतना के आधार के रूप में श्रम

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजक रेखा को, उनके मानस के तात्विक अंतरों को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम, मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम की महत्वपूर्णता और उपयोगिता पर विचार करेंगे।

चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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चेतना के आधार के रूप में श्रम

पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के मानस में भेदों को समझने की कोशिश की थी। परंतु, इसका क्या कारण है कि जानवरों में चिंतन के केवल प्रारंभिक रूप होते हैं और वे ना तो समस्याओं को हल कर सकते हैं. ना उन कार्यों को कर सकते हैं, जिन्हें मनुष्य कर सकता है, करता है? दरअसल काम के कारण मनुष्य का चिंतन और चेतना जानवरों के मानसिक क्रियाकलाप से गुणात्मक रूप से भिन्न है। किंतु क्या यह सुनिश्चित है कि जानवर काम नहीं कर सकते?

एक विशेष प्रकार का उकाब अपनी चोंच में एक गोल पत्थर उठाए, शुतुरमुर्ग के अंडे के ऊपर उड़ता है, और उसे गिराकर अंड़े को तोड लेता है, जिसे वह अपनी चोंच से तोड़ने में असमर्थ था। चिंपाजी ऊंचाई में लटके हुए केलों को तोडने के लिए एक छड़ी या ड़ड़े का तत्परता से इस्तेमाल कर लेते हैं। उद्यमी मधुमक्खियों तथा चींटियों के बारे में अनेक कथाएं गढ़ी गयी हैं। परंतु इस सब के बावज़ूद, जानवर काम ( यानि श्रम ) नहीं करते। वे जीवित रहने, भोजन पाने, अपने प्राकृतिक अंगों ( दांतों, पंजों, चोंचों, आदि ) से घोंसले औए बिल बनाने के लिए आवश्यक प्राकृतिक सामग्री को ही काम में लाते हैं।

मनुष्य के काम का विशिष्ट लक्षण यह है कि वह अपने और प्रकृति के बीच औज़ारों को ले आता है। मनुष्य औज़ारों के जरिए प्रकृति से प्राप्त सामग्री का अनुकूल इस्तेमाल ही नहीं करता, बल्कि उसमें फेरबदल भी करता है और उसे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक विशेष रूप प्रदान करता है। श्रम की प्रक्रिया में वह प्रकृति का मानवीकरण करता है और अक्सर ऐसी वस्तुओं की भी रचना करता है, जिनका प्रकृति में कोई अस्तित्व नहीं होता।

प्रकृति के साथ जानवरों का संबंध अपरोक्ष ( direct ) होता है। जानवर स्वयं प्रकृति के अंग हैं। किंतु मनुष्य और प्रकृति के बीच उत्पादन के औज़ार हैं ( उपकरण, औज़ार, जटिल यांत्रिक विधियां और मशीनें )। इसलिए प्रकृति और मनुष्य के बीच का रिश्ता परोक्ष और व्यवहित ( indirect & mediated ) है, यानि उसे औज़ारों के द्वारा कार्यरूप दिया जाता है। इस तरह से मनुष्य अपने को प्रकृति से विलग कर लेता है और स्वयं को उसके मुकाबले में खड़ा कर लेता है। लेकिन क्या उकाब और चिंपाजी के उपरोक्त उदाहरण इसका खंड़न नहीं करते?

काम करने या श्रम की जिस प्रक्रिया से हमारे दूर के पूर्वज मनुष्यों में परिवर्तित हुए वह ठीक इसी काम के लिए विशेष औज़ारों को बनाने और ढ़ालने के साथ संबंधित थी, ना कि प्रकृति में आसानी से उपलब्ध वस्तुओं के उपयोग से। उकाब ने अपने पत्थर को बनाया-संवारा नहीं। चिंपाजी अपने ड़ंड़े को रंदे या छैनी से नहीं संवारता है। किंतु हमारे पुरानतम पूर्वजों तक ने पत्थर के आदिम औज़ार बनाए, वे एक पत्थर की मदद से दूसरे को संवारते थे। यही कारण है कि जानवरों के कोई भी क्रियाकलाप, जिनमें वे कभी-कभी प्राकृतिक वस्तुओं का उपयोग करते हैं, मनुष्य के काम से गुणात्मक भिन्न होते हैं।

श्रम आसपास की वस्तुओं को रूपांतरित तथा उनमें फेर-बदल करना ही संभव नहीं बनाता, बल्कि स्वयं मनुष्य के रूपांतरण तथा विकास की और ले जाता है

परिवेशी परिस्थितियों के घातक परिवर्तन ने मनुष्य के पूर्वजों के लिए अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि बड़ी कठिन बना दी थी, जलवायु के बिगड़ते जाने के कारण आहार प्रचुर मात्रा में नहीं मिल पाता था। उनके सामने दो ही विकल्प थे, या तो एक जाति के तौर पर विलुप्त हो जाएं या फिर अपने व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन लाकर परिस्थितियों को अपने लिए बेहतर और अनुकूलित करें। आवश्यकता ने प्राज्ञ मानव के वानरसदृश पूर्वजों को सामूहिक श्रमपूर्व सक्रियता का सहारा लेने को विवश किया।

यूथ के भीतर मनुष्य के पुरखों का सहजवृत्तिमूलक संपर्क शनैः शनैः श्रम सक्रियता पर आधारित सहजीवन में विकसित हुआ। एक ही समुदाय के सदस्यों के आपसी संबंधों में यह परिवर्तन, यानि संयुक्त सक्रियता, सहजीवन और उत्पादों के विनिमय की शुरूआत, यूथ से समाज में संक्रमण का आधार और साधन बनीं। इस प्रकार श्रम की उत्पत्ति और समाज के निर्माण ने मनुष्य के वानराभ पूर्वजों का मानवीकरण किया

श्रम ने मानव चेतना के विकास को भी प्रेरित किया। कुछ निश्चित संक्रियाओं को सैंकड़ों हज़ारों वर्षों की अवधि में अरबों बार दोहराकर मनुष्य ने अपने अंगों विशेष रूप से हाथों, को परिष्कृत बनाया और इन्हीं अंगों की सक्रियता के कारण मस्तिष्क के विकास की अन्योन्यक्रिया भी शुरू हुई। श्रम-सक्रियता में मनुष्य का ध्यान बनाए जा रहे औज़ार पर, या औज़ारों द्वारा किये जा रहे प्रकृति में बदलाव पर, यानि अपनी सक्रियता पर संकेन्द्रित होता है। सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के मद्देनज़र यह जरूरी हो जाता है कि व्यक्ति अपनी सक्रियता कों आलोचनात्मक दृष्टि से देखे। इस तरह मनुष्य की सक्रियता, चेतना पर आधारित सक्रियता बन जाती है, फलतः चेतना के विकास का पूर्वाधार बनती है

अपनी सक्रियता से, श्रम से परिवेश को प्रभावित करते और बदलते हुए मनुष्य ने साथ ही अपनी प्रकृति को भी बदला। श्रम के प्रभाव से हाथ के नये प्रकार्य पैदा हुए, जिससे उसमें और भी परिष्कृतता आती गई, मस्तिष्क के साथ सटीक समन्वय से उसमें और भी दक्षता बढ़ती गई। हाथ न केवल पकड़ने का साधन, बल्कि स्वयं प्रकृति को, वस्तुपरक यथार्थ को जानने का उपकरण भी बन रहा था। श्रम के प्रभाव से सक्रिय हाथ शनैः शनैः सक्रिय स्पर्श से संबंधित एक विशेषिकृत अंग में परिवर्तित हो गया और स्पर्श, विश्व के संज्ञान का केवल मनुष्य द्वारा प्रयुक्त तरीका है। इसीलिए कहा गया है कि मनुष्य का हाथ श्रम करने वाला अंग ही नहीं, श्रम का उत्पाद भी है

हाथ का विकास सारे शरीर के विकास के साथ हुआ। हाथ के कार्यों के विशेषीकरण से हमारे रोमिल पुरखों को खड़े होकर चलने की आदत ड़ालने में मदद मिली। काम करते हुए हाथों पर निरंतर आंखों का नियंत्रण रहता है, जो दृष्टि का अंग है। जाहिरा तौर पर दृष्टि और स्पर्श के बीच कई तादात्मयता पैदा हुई। और यह सब मस्तिष्क के जरिए हो रहा था। नये तंत्रिका केंद्रों के निर्माण के फलस्वरूप मस्तिष्क का आयतन ही नहीं बढ़ा, उसकी संरचना भी जटिलतर होती गई। मस्तिष्क के जो भाग हाथों की क्रिया का नियंत्रण करते हैं, वे ही मनुष्य की वाणी तथा भाषा का, जो मनुष्य की मानसिक क्रियाकलाप का केंद्र हैं, भी नियमन करते हैं।

अपनी बारी में, मस्तिष्क के विकास से, काम की प्रविधियों ( techniques ), औज़ार बनाने के तरीकों, सामूहिक अंतर्क्रिया की आदतों तथा परिवेशीय जगत के बारे में सूचनाओं का संचय करना और उन्हें आने वाली पीढ़ीयों को हस्तांतरित करना संभव हुआ। श्रम की प्रक्रिया में मनुष्य ने जिन विविध वस्तुओं में फेर-बदल तथा रूपांतरण किये, उनके अनुगुणों को जानने तथा उनका अध्ययन करने में मदद मिली। यह ऐसी चीज़ है, जो जानवरों की पहुंच से बाहर है।

इस प्रकार, श्रम की प्रक्रिया मानसिक क्रियाकलाप के उच्चतम रूप यानि चिंतन और चेतना का आधार बनी। अपने को प्रकृति से विलग करके मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी विरोधी स्थिति से ही अवगत नहीं हुआ, बल्कि यह भी जान गया कि वह चेतना युक्त विशेष प्राणी है और इसी कारण से अन्य जीवित प्राणियों से भिन्न है।

चेतना की उत्पत्ति का अर्थ था वास्तविकता के परावर्तन के एक उच्चतर रूप में संक्रमण। यह संक्रमण प्रकृति के प्रति अपने को निष्क्रियता से अनुकूलित करने के बजाए वास्तविकता को अपने अनुकूल बनाना और अपने लक्ष्यों के अनुरूप वास्तविकता में परिवर्तन करना तथा ऐसी वस्तुओं की रचना करना सीखने में निहित था, जो प्रकृति में नहीं होती। अपनी पीढ़ी का अनुभव अगली पीढ़ी को सिखाने, सहजातियों को श्रम-प्रणालियों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण देने और उनके बीच कार्यों का बंटवारा करने की आवश्यकता ने संप्रेषण की आवश्यकता पैदा की। सहजवृत्तियों की भाषा इसके लिए स्पष्टतः अपर्याप्त थी।

अतः श्रम के साथ और श्रम की प्रक्रिया में मानवीय भाषा भी उत्पन्न हुई, जो संप्रेषण का उच्चतर रूप है।
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अगली बार हम चेतना के विकास के एक और साधन के रूप में भाषा पर चर्चा करेंगे।
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इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

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