चरित्र निर्माण के लिए प्राकृतिक-सामाजिक पूर्वाधार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के प्रबलन को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम चरित्र का स्वरूप तथा अभिव्यंजनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चरित्र का स्वरूप तथा अभिव्यंजनाएं

प्रकृति तथा स्वभाव

स्वभाव की भांति चरित्र मनुष्य की शरीरक्रियात्मक विशेषताएं ( physiological features ) और, सबसे पहले, उसके तंत्रिका-तंत्र की क़िस्म ( type of nervous system ) पर अपनी निर्भरता प्रकट करता है। स्वभाव के गुण चरित्र की अभिव्यंजनाओं पर अपनी छाप डालते हैं, उसके मूल तथा रूपों की गत्यात्मक ( dynamic ) विशेषताएं निर्धारित करते हैं। अंततः, स्वभाव तथा चरित्र के गुण मनुष्य के सामान्य रूप-आकृति को, उसके व्यक्तित्व की अखंड अभिलाक्षणिकता ( characteristics ) को निर्धारित करते हुए एक अखंड समष्टि ( integrated, monolithic collectivity ) में मिल जाते हैं।

स्वभाव की विशेषताएं, चरित्र के निश्चित गुणों के विकास में सहायता दे सकती हैं अथवा उसे अवरुद्ध ( blocked ) कर सकती हैं। भावशून्य मनुष्य, क्रोधी तथा उत्साही मनुष्य की तुलना में अपने अंदर पहलकदमी और इच्छाशक्ति का विकास करना कठिन पाता है। भीरूता और चिंता पर क़ाबू पाना उदास मनुष्य के लिए गंभीर समस्या है। सामूहिक गतिविधियों में गठित चरित्र, क्रोधी मनुष्य में अधिक संयतता ( moderation ) तथा आत्मालोचना ( self-criticism ) का, उत्साही मनुष्य में धैर्य का, भावशून्य मनुष्य में क्रियाशीलता का विकास करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है।

चरित्र निर्माण के लिए प्राकृतिक तथा सामाजिक पूर्वाधार

चरित्र का स्वरूप, उसे बदलने की संभावना अथवा असंभावना तथा उनके गुणों का गठन, मनोवैज्ञानिकों के लिए लंबे अरसे से वाद-विवाद का विषय रहे हैं और बहुधा दैनंदिन चेतना के लिए लाक्षणिक निरुपाधिक कथनों ( typical unconditional statements ) का कारण रहे हैं।

व्यक्ति अपने चारित्रिक गुणों के गठन के बाद सामाजिक परिपक्वता ( social maturity ) प्राप्त करता है। गठन की यह प्रक्रिया दृष्टिगोचर नहीं होती, इसलिए मनुष्य को यह लगता है कि वह तो हमेशा से वही रहा है, जो वह आज है। अतः यह मत उत्पन्न होता है कि मनु्ष्य के चारित्रिक गुण उसे प्रकृति से प्राप्त होते हैं, वे अंतर्जात ( inborn ) होते हैं। इस तरह के कथन अत्यंत प्रचलित हैं : “वह अपनी प्रकृति से ही कायर और बदमाश है”, अथवा ” झूठ बोलना उसकी जन्मजात विशेषता है”, अथवा यहां तक कह दिया जाता है कि “यह तो उसका पुश्तैनी गुण है”। दरअसल यह बात असामान्य नहीं है कि दो भाई, जिनका एक ही परिवार में जन्म हुआ है, जिनकी लगभग एकसमान सी परवरिश हुई है, जिनकी आयु में दो-तीन साल का अंतर है, जो एक ही स्कूल में पढ़ते हैं, जिनके साथ उनके मां-बाप आम तौर पर एकसमान व्यवहार करते हैं, अपने चारित्रिक गुणों में एक दूसरे से ज़रा भी नहीं मिलते। इससे यह मत विश्वसनीय सा बन जाता है कि मनुष्य को अपने चारित्रिक गुण प्रकृति से मिलते हैं।

इसका क्या कारण है कि लगभग एक जैसी परिस्थितियों के होते हुए भी जीवन मनुष्य के व्यक्तित्व को भिन्न-भिन्न प्ररूपों के अनुसार “ढाल दिया करता है”? सबसे पहले यह मानना और जानना आवश्यक है कि “स्रोत सामग्री” ( source material ) भिन्न-भिन्न लोगों के मामले में सचमुच एक जैसी नहीं होती।

मनुष्य मस्तिष्क के, जो उच्च तंत्रिका-सक्रियता की एक या दूसरी क़िस्म से युक्त होता है, प्रकार्यों की भिन्न-भिन्न विशेषताओं के साथ जन्म लेता है। ये मानसिक नहीं, अपितु शरीरक्रियात्मक विशेषताएं होती हैं, फिर भी वे इस बात का पहला कारण होती हैं कि बच्चों पर एक जैसे प्रभाव भिन्न-भिन्न मानसिक परिणामों को जन्म दे सकते हैं। ये विशेषताएं वे अवस्थाएं निर्धारित करती हैं, जिनमें मन तथा चेतना का विकास होता है। शरीरक्रियात्मक अवस्थाओं से ये अंतर लोगों के चरित्र में अंतरों का पहला कारण मात्र है।

यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि “एक जैसी अवस्थाओं” की धारणा ( एक ही परिवार तक में ) नितांत सापेक्ष ( relative ) है। अकेला यही तथ्य कि बड़ा भाई अपने को बड़ा मानने और कुछ मामलों में छोटे भाई से ( जो रक्षा के लिए उसकी ओर देखता है या उसके निरंकुश व्यवहार के ख़िलाफ़ विद्रोह करता है ) श्रेष्ठ समझने का आदी है, बहुत ही असमान मानसिक परिस्थितियों को जन्म दे देता है, जो हेकड़ी अथवा चिंताशीलता, उत्तरदायित्व अथवा उदासीनता, निःस्वार्थपरता अथवा ईर्ष्या जैसे चारित्रिक गुणों के गठन में सहायक अथवा बाधक बनती हैं।

परिवार में अन्य परिस्थितियां भी भाइयों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डाल सकती हैं। पहले और दूसरे बच्चे ( अक्सर मां-बाप से दूसरे या छोटे बच्चे को ज़्यादा लाड़-प्यार मिलता है ) के जन्म के बीच परिवार के हालात में परिवर्तन, परिवार के अंदर संबंधों में परिवर्तन, लालन-पालन के दौरान के परिवेश के साथ अलग-अलग सुखद या दुखद अनुभव, अच्छे मित्र, जो एक भाई पर ज़्यादा ध्यान दे सकते हैं और दूसरे को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं, उनके अध्यापकों की शिक्षाशास्त्रीय प्रतिभा में अंतर, आदि, ये सब चीज़ें दो व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न मानसिक गुणों तथा वैयक्तिक विशेषताओं के गठन में मदद दे सकती हैं।

अंतरिक्षयान की कक्षा के निर्धारण में शुरुआती आधार-सामग्री ( दिशा, आरंभिक वेग, आदि ) में जरा सी ग़लती के घातक परिणाम होते हैं, यान कभी वहां नहीं पहुंच पाएगा, जिस ओर उसको भेजा जाता है। यही बात मनुष्य के साथ होती है। बच्चे के लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा में छोटी-सी चूक, वयस्क हो जाने पर जीवन के उसके आरोहण-पथ ( progression route ) पर ऐसे चारित्रिक गुणों में प्रकट हो सकती है, जो उसे किसी बंद गली में पहुंचा सकते है, और उसकी ही नहीं, अपितु उसके नज़दीकी लोगों तक की नींद हराम कर सकते हैं।

चरित्र बहुत हद तक आत्म-शिक्षा का परिणाम होता है। उसमें मनुष्य की आदतें संचित होती हैं। चरित्र लोगों के कार्यकलाप में प्रकट होता है, परंतु उसमें ही वह गठित भी होता है। यदि कोई व्यक्ति आत्म-आलोचना जैसे चारित्रिक गुण का विकास करना चाहता है, तो उसे आत्म-आलोचना करनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि उसे दूसरे लोगों की ही नहीं, अपितु अपनी त्रुटियों के प्रति भी असहिष्णु ( intolerant ) होना चाहिए, यानि उन पर पर्दा नहीं डालना चाहिए, अपनी आंखें खुली रखनी चाहिए। जैसा कि एक मानवश्रेष्ठ ने कहा था, “जीना सिर्फ़ तभी सीखा जा सकता है, जब तदनुरूप ढंग से जीया जाए।”

श्रम तथा अध्ययन की तो बात ही क्या, दैनंदिन जीवन, परिवार सदस्यों के बीच संबंध, मानव चरित्र का विद्यालय होते हैं। अध्यापकों तथा मां-बाप के समक्ष एक दायित्वपूर्ण कार्य सदैव उपस्थित रहता है : बच्चों के चरित्र में होनेवाले परिवर्तनों को ठीक समय पर देखना और उन्हें ध्यान में रखते हुए आचरण-व्यवहार तथा शिक्षा-दीक्षा के मामले में अपने लिए दिशा तय करना। शिक्षा-दीक्षा के मामले में शिक्षाशास्त्रीय व्यवहार के घिसे-पिटे सांचे ऐसे मामलों में ख़ास तौर पर ख़तरनाक होते हैं, जब बच्चे की ओर व्यक्तिगत ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

एक परिवार में दूसरे शिशु, लड़के का जन्म तब हुआ, जब उसकी बहिन १२ वर्ष की हो चुकी थी। बेटी की परवरिश मां-बाप के प्रति पूर्ण आज्ञा-पालन के वातावरण में हुई थी, उसने कभी भी मां-बाप की अवज्ञा नहीं की – इसलिए नहीं कि इसके वास्ते कोई कारण रहा हो। मां-बाप की अपेक्षाएं बहुत ही विवेकसम्मत होती थीं। परंतु जिस रूप में ये अपेक्षाएं की जाती थीं, वह कठोर और कड़ा होता था तथा हर आपत्ति के प्रति असहिष्णुता बरती जाती थी। मां-बाप ने बेटे की भी इसी तरह परवरिश की। परंतु जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि जिस चीज़ को बेटी शिरोधार्य कर लेती थी, उनका बेटा मौन, परंतु हठपूर्वक प्रतिरोध करता था। यह कहना कठिन है कि इसकी शुरुआत कब हुई – स्वयं मां-बाप इसे उस समय से जोड़ते हैं, जब बेटा दादी के पास गया था। परंतु स्कूल में उसके आरंभिक वर्षों में ही दोनों पक्षों का यह विकट, क्लांतिकर ( fatiguing ) संघर्ष शुरू हो गया था। लड़का अपने मन की बात प्रकट नहीं करता था, अशिष्टता से पेश आता था, शक्की हो गया था। धीरे-धीरे हालात और खराब होते गए। 

मां-बाप एक मनोविज्ञानी से मिले और हैरानीभरे स्वर में बोले : “यह रही आपके सामने उसकी बहिन। उससे ही पूछकर देखिए। क्या हमने उसकी किसी और ढंग से परवरिश की? बिल्कुल वैसे ही परवरिश की। बेटी के रूप में हमें किस तरह का इन्सान मिला ! और बेटा – उसने हमारी नाक कटवा दी है !”

 “बिल्कुल वैसे ही परवरिश की !” बच्चों की परवरिश के लक्ष्यों तथा अंतर्वस्तु ( contents ) की दृष्टि से बात ऐसी ही है। इस मामले में मां-बाप का व्यवहार उच्च कोटि का था। परंतु परवरिश की उन विधियों ( methods ) को, जो बेटी के चरित्र के शायद कुछ अनुरूप रही होंगी, विवेकहीन ढंग से बेटे की, जिसका चरित्र बिल्कुल भिन्न प्रकार का था, परवरिश पर लागू करने से टकराव का होना अवश्यंभावी था। परिवार को झटके न लगते, अगर मां-बाप ने अपने बेटे के चरित्र को ठीक से आंका होता और उसके लिए तदनुरूप ही सही ‘कुंजी’ का उपयोग करने की कोशिश की होती।

एक जैसी शिक्षाशास्त्रीय विधियों को यदि भिन्न-भिन्न वैयक्तिक ( individual ) गुणोंवाले लोगों पर लागू किया जाए, तो सर्वथा विपरीत परिणाम निकल सकते हैं। यह तो शैक्षणिक कार्य की विधियों का स्वयंसिद्ध तथ्य है। बच्चे के व्यक्तित्व के गठन में घिसे-पिटे सांचों से बचने के लिए उसके चरित्र को गढ़ने के प्रति सृजनशील रुख़ ( creative approach ) अपनाना आवश्यक है। यह कंटीला पथ हो सकता है, परंतु गंभीर, सोच-समझकर, लीक से हटकर लिए जाने वाले निर्णय घिसे-पिटे शिक्षाशास्त्रीय सूत्रों से अधिक फलप्रद हो सकते हैं, यदि उसके प्रभावों पर अलग-अलग कार्रवाइयों से नहीं ( ‘बच्चे से यह या वह कराया’), अपितु चरित्र गढ़ने की प्रक्रिया के परिणामों के आधार पर निर्णय दिया जाए।

अतः चरित्र मनुष्य को प्रकृति से नहीं मिलता। ऐसा कोई चरित्र नहीं है, जिसे न बदला जा सके। इस बात का हवाला देना कि “मेरा चरित्र ही ऐसा है और मैं इस मामले में कुछ भी नहीं कर सकता”, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सर्वथा आधारहीन है। प्रत्येक मनुष्य अपने चरित्र की समस्त अभिव्यक्तियों के लिए उत्तरदायी होता है और प्रत्येक मनुष्य उसे आत्म-शिक्षा के माध्यम से सुधारने की स्थिति में होता है।

यदि चारित्रिक गुणों को नैसर्गिक, शरीरक्रियात्मक पूर्वाधारों के साथ जोड़ना ग़लत है ( हालांकि चरित्र के नैसर्गिक पूर्वाधारों को ध्यान में रखना भी आवश्यक है ), तो उनका पुश्तैनी मूल होने का दावा करना और भी ग़लत होगा। एकयुग्मज जुड़वों के, जिनमें शरीररचनात्मक-शरीरक्रियात्मक विशेषताओं का एक जैसा आनुवंशिक आधार होता है, अध्ययनों ने उनके स्वभावों में सादृश्य सिद्ध किया है, परंतु चरित्रों में नहीं। यदि एकयुग्मज जुड़वां भिन्न-भिन्न परिवारों में पाले-पोसे जाएं, तो उनके चरित्र भिन्न-भिन्न सिद्ध होते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः इस तरह की रिपोर्टें पढ़ने को मिलती हैं कि एकयुग्मज जुड़वां कितनी भी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में रखे जाएं, उनमें एक जैसी रुचियों, रुझानों तथा चारित्रिक गुणों का ही विकास होता है। किंतु इस तरह की भी रिपोर्टें हैं कि कतिपय मनोविज्ञानियों द्वारा तथ्यों का जानबूझकर मिथ्याकरण किया गया है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व की जैविक प्रकृति को सिद्ध करने के लिए किसी तरह की हितबद्धता में हैं। तथ्य बताते हैं कि भिन्न-भिन्न अवस्थाएं तथा परिस्थितियां एकसमान आनुवंशिक आधार होने के बावजूद भिन्न-भिन्न ही नहीं, अपितु परस्परविरोधी चारित्रिक गुणों का गठन कर सकती हैं।

अतः, चरित्र मनुष्य के पूर्ण जीवन के दौरान निर्मित होता है। मनुष्य सामाजिक संबंधों की प्रणाली में, अन्य लोगों के साथ संयुक्त सक्रियता तथा संप्रेषण में स्वयं अपने व्यक्तित्व का विकास करता है


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

चारित्रिक गुणों का प्रबलन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत ‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र को समझने की कोशिश  की थी, इस बार हम चारित्रिक गुणों के प्रबलन पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चारित्रिक गुणों का प्रबलन

चारित्रिक गुणों की, जिनका मनुष्य के अनुभव ने पता लगाया है तथा भाषा में दर्ज किया है, संख्या बहुत बड़ी है। अतः उन सबको गिनाने और उनका वर्णन करने से कोई लाभ नहीं है, इसकी और बड़ी वज़ह यह भी है कि मनोविज्ञान में उनका कोई सटीक वर्गीकरण ( उन्हें छोड़कर, जिन्हें वह व्यक्ति के दृष्टिकोंणों के साथ जोड़ देता है ) नहीं है। चारित्रिक गुणों को की बहुविविधता ( multi-diversity ) उनकी गुणगत विविधता तथा मौलिकता ( originality ) में ही नहीं, अपितु संख्यागत मात्रा में भी प्रकट होती है। दरअसल लोग कम या अधिक संदेहशील, कम या अधिक उदार, कम या अधिक स्पष्टवादी हो सकते हैं। जब इस या उस चारित्रिक गुण की संख्यागत मात्रा चरम सीमा पर पहुंच जाती है और मानक ( standard ) के छोर (end ) को स्पर्श कर लेती है, तब हम चरित्र प्रबलन ( character reinforcement ) की बात करते हैं।

चरित्र प्रबलन, व्यक्तित्व के कतिपय गुणों की अतिरंजना ( exaggeration ) के फल के रूप में मानक के चरम रूपांतर ( extreme transmutation of standard ) होते हैं। तब व्यक्ति में एक प्रकार के खिंचाव-कारक ( stretch factor ) के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि प्रकट होती है, जब कि अन्य प्रकार के ऐसे कारकों के मामले में उसमें भावनात्मक स्थिरता दिखायी देती है। मनुष्य के चरित्र में कमज़ोर कड़ी अक्सर केवल कठिन परिस्थितियों में प्रकट होती है, जो अनिवार्य रूप से अपेक्षा करती हैं। शेष सारी अन्य कठिनाइयां, जो संबद्ध व्यक्ति के चरित्र के संवेदनशील बिंदु को स्पर्श नहीं करतीं, उसके द्वारा बिना तनाव और क्रम-भंग के झेली जा सकती हैं और वे उसके लिए और उसके आस-पास के लोगों के लिए किसी तरह की मुसीबत पैदा नहीं करतीं। घोर प्रतिकूल परिस्थितियों में चरित्र प्रबलन, विकृतिजन्य रोगों, व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तनों को, यानि मनोविकृति को ( चारित्रिक विकृति व्यक्तित्व के सामाजिक अनुकूलन को अवरुद्ध कर देती है और व्यवहारतः उसे अपरिवर्त्य ( immutable ) बना देती है, हालांकि सही ढंग से उपचार किए जाने पर उसे कुछ हद तक दुरस्त किया जा सकता है ) जन्म देता है, परंतु उसे मानसिक रोग मानना ठीक नहीं है।

चरित्र प्रबलन का वर्गीकरण बहुत जटिल कार्य है तथा भिन्न-भिन्न अनुसंधानकर्मियों ने उसके भेदों को भिन्न-भिन्न नाम दिए हैं। चरित्र प्रबलन के सबसे महत्त्वपूर्ण भेद निम्नलिखित हैं : अंतर्मुखी ( introversive ) चरित्र, जिसकी अभिलाक्षणिकताएं अल्पभाषिता, अन्य लोगों के साथ संप्रेषण में कठिनाई और अपनी ही बंद दुनिया में रहना है ; बहिर्मुखी ( extrovert ) चरित्र, जिसकी अभिलाक्षणिकताएं हैं भावावेशपूर्ण उत्तेजना, संप्रेषण तथा सक्रियता की कामना ( बहुधा उसकी आवश्यकता तथा महत्त्व की ओर ध्यान दिए बिना भी ), अभिरुचियों की अस्थिरता, कभी-कभी डींगबाज़ी, सतहीपन, नैष्ठिक आचरण ( loyal conduct ) ; अनियंत्रणीय ( uncontrollable ) चरित्र, उसकी अभिलाक्षणिकताएं हैं आवेगशीलता ( impulsiveness ), टकराव की प्रकृति, आपत्तियों के प्रति असहिष्णुता ( intolerance ) और कभी-कभी संदेहशीलता।

किशोरों के चरित्र के तंत्रिकातापी प्रबलन की मुख्य विशेषताएं हैं ख़राब मिज़ाज, चिड़चिड़ापन, बेहद थकावट, रोगभ्रम। अपने परिवेश से चिड़चिड़ाहट और अपने पर तरस खाने के कारण थोड़ी देर के लिए क्रोध का उफान आ जाता है, परंतु तंत्रिका-तंत्र के जल्द थक जाने से क्रोध शीघ्र ठंड़ा पड जाता है और उसका स्थान मेल-मिलाप और पश्चाताप की भावना तथा अश्रुधारा ले लेती है।

संवेदनशील ( sensitive ) चरित्र की विशेषताएं हैं भीरूता, मन की बात मन में रखना, शर्मीलापन। संवेदनशील किशोर अधिक, खास तौर पर नये संगी-साथियों से कतराते हैं, हमउम्रों की शरारतों के ऐसे साहसिक कार्यों में भाग नहीं लेते, जिनमें जोखिम उठाना पड़ता है, वे छोटे बच्चों के साथ खेलना पसंद करते हैं। वे परीक्षाओं से डरते हैं, बहुधा कक्षा में उत्तर देने से इसलिए डरते हैं कि कहीं उनसे ग़लती न हो जाए अथवा अपने उत्तर बहुत बढ़िया होने से वे अपने सहपाठियों की ईर्ष्या का पात्र न बन जाएं। किशोरों में अपनी त्रुटियों पर काबू पाने की सशक्त कामना का विशेष कारण होता है। वे उन क्षेत्रों में नहीं, जिनमें वे अपनी योग्यता प्रदर्शित कर सकते हैं, अपितु उन क्षेत्रों में अपने व्यक्तित्व की प्रतिष्ठापना करने का प्रयास करते हैं, जिनमें वे अपनी दुर्बलता अनुभव करते हैं। लड़कियां यह दिखाने का प्रयास करती हैं कि वे प्रफुल्लचित्त हैं। भीरू और शर्मीले बालक हेकड़ी और अकड़ की मुद्रा अपनाते हैं तथा अपनी स्फूर्ति और इच्छा-शक्ति का प्रदर्शन करने का प्रयत्न करते हैं। परंतु जब स्थिति उनसे साहसपूर्ण संकल्प की अपेक्षा करती है, तो उनका तुरंत दम सूख जाता है। अगर कोई उनका विश्वास पाने में सफल हो जाए और वे यह अनुभव करने लगें कि मिलनेवाले की उनसे सहानुभूति है और वह उनका समर्थन कर रहा है, तो वे ‘मैं किसी की परवाह नहीं करता’ का मुखौटा उतार फैकते हैं और उनका कोमल तथा संवेदनशील चित्त, अपने से हद से ज़्यादा कठोर अपेक्षाएं करने की उनकी भावना, आत्म-भर्त्सना तथा आत्म-ताड़ना से परिपूर्ण उनका जीवन, सब कुछ प्रकट हो जाता है। अप्रत्याशित रुचि तथा सद्‍भावना हेकड़ी और अक्खड़पन को सहसा अविरल अश्रुधारा में बदल सकती है।

निदर्शनात्मक ( exemplary ) चरित्र की अभिलाक्षणिकताएं हैं आत्म-केंद्रिकता, दूसरे लोगों का ध्यान निरंतर अपनी ओर खींचने, अपने को प्रशंसा तथा सहानुभूति का पात्र बनाने की उभरी हुई प्रवृत्ति। झूठ बोलना, दिखावा करने और इतराने की प्रवृत्ति, नाटकबाज़ी ( ठीक आत्म-हत्या की हद तक जाने का स्वांग भरना ) – ये सब किसी भी तरह के साधन से अपने को हमउम्रों से भिन्न रूप में दिखाने की इच्छा से निर्धारित होते हैं। उदाहरण के लिए, एक ऊंची कक्षा की छात्रा को गुमनाम चिट्ठियां मिलने लगीं, जिनमें उसे धमकियां दी जाती थीं, उस पर आक्षेप किए जाते थे। वह आंखों में आंसू लिए हुए ये चिट्ठियां अध्यापकों तथा सहेलियों को दिखाती, उनसे सहायता तथा रक्षा की याचना करती। परंतु जांच-पड़ताल से जल्द पता चल गया कि वह पूरे स्कूल का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए अपने नाम ये चिट्ठियां ख़ुद लिखती थी। इस तरह उसने चरित्र के निदर्शनात्मक गुण प्रकट किए।

सही ढंग की शिक्षा-दीक्षा से चरित्र प्रबलनों की प्रवृत्तियों को रोकना संभव है। अध्यापकों तथा मां-बाप को, जिन्हें पता होता है कि बच्चे में ‘सबसे कम प्रतिरोध का पहलू’ कौन सा है, उसे मनोजन्य खिंचावों के प्रतिकूल प्रभावों से बचाना चाहिए। संवेदनशील किशोर-किशोरियां अपने प्रति बुरे कामों के लिए संदेह किए जाने, आक्षेप लगाए जाने को सहन नहीं कर पाते, जो उनके अतिरंजित नहीं, अपितु वास्तविक आत्म-मूल्यांकन के विपरीत होते हैं। इसके साथ ही शिक्षा-दीक्षा के वे प्रभाव बहुत सहायक होते हैं, जो संवेदनशील किशोरों की भीरूता की प्रतिपूर्ति करते हैं : उन्हें कक्षा के सक्रिय सहपाठियों के समूह की सामाजिक गतिविधियों में शामिल किया जा सकता है, जहां उनके लिए अपनी तुनकमिज़ाजी और शर्मीलेपन पर काबू पाना आसान होता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति के दृष्टिकोण पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



‘मनुष्य के आचरण-व्यवहार के कार्यक्रम’ के रूप में चरित्र

मनुष्य की सक्रियता, उसका आचरण-व्यवहार ( conduct – behavior ), सबसे पहले, उन लक्ष्यों से निर्धारित होता है, जो वह अपने समक्ष रखता है। उसके आचरण-व्यवहार तथा कार्यक्रम का मुख्य निर्धारक सदैव उसका व्यक्तित्व-रुझान ( personality-trends), यानि उसके हितों, आदर्शों तथा विश्वासों का कुल योग होता है। परंतु दो मनुष्य, जिनके बहुत ही एक जैसे वैयक्तिक रुझान में एक जैसे लक्ष्य एक दूसरे से मेल खाते हैं, अपने लक्ष्यों की सिद्धी के साधनों के चयन में एक दूसरे से सारभूत रूप से भिन्न हो सकते हैं। इन अंतरों के पीछे व्यक्ति के चरित्र की विशिष्टताएं होती हैं।

मनुष्य के चरित्र में, यह कहा जा सकता है, लाक्षणिक परिस्थितियों में उसके लाक्षणिक आचरण-व्यवहार का कार्यक्रम होता है। एक अध्यापक अपने छात्र के चरित्र के बारे में भली-भांति जानने के कारण उसके बारे में यह बताता है, ‘मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वह असंयत हो जाएगा, बहुत-सी बेकार की बाते करेगा, शायद अशिष्ट और अन्यायपूर्ण ढंग से पेश आएगा, पर फिर अपने आचरण-व्यवहार पर उसे खेद होगा, प्रायश्चित की मुद्रा धारण किए हुए इधर–उधर चक्कर काटता रहेगा और अंततः अपने अपराध का निवारण करने के लिए यथासंभव सब कुछ करेगा।’ चारित्रिक गुणों में, अतएव, कोई निश्चित प्रेरक शक्ति होती है, वह तनावभरी परिस्थितियों में पूरी मात्रा में प्रकट होती है, जब मनुष्य को विवश होकर निर्णय करना पड़ता है, बड़ी कठिनाइयों पर काबू पाना पड़ता है।

चरित्र की दृष्टि से कृतसंकल्प ( resolute ) मनुष्य, अभिप्रेरणों ( motivations ) के किसी लंबे संघर्ष के बिना ही उत्प्रेरणा ( inducements ) से आगे बढ़कर कार्य-क्षेत्र में पदार्पण ( debut ) करता है। चरित्र के एक गुण के रूप में व्यवहार-कुशलता के कारण मनुष्य दूसरे लोगों के साथ संवाद में सावधानी बरतता है और नाना परिस्थितियों तथा समस्याओं को ध्यान में रखता है, जो उसके लिए सारभूत हो सकती हैं।

उपलब्धिमूलक प्रेरणा ( achievement oriented motivation ) को भी चरित्र का एक गुण माना जा सकता है, उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यकलाप में, विशेष रूप से दूसरे लोगों के साथ प्रतिद्वंद्विता में सफलता प्राप्त करने की कर्ता की आवश्यकता आ जाती है। यह गुण, बच्चे की परवरिश की प्रक्रिया में, सफलताओं के लिए विधिवत तथा वैयक्तिक रूप से उल्लेखनीय प्रशंसा और विफलताओं के लिए दंड के फलस्वरूप गठित होता है।

चरित्र संबंधी गुणों के प्रथम शोधकर्मियों के अनुसार, उपलब्धिमूलक अभिप्रेरणा स्कूलपूर्व आयु में गठित होती है, फिर भी यह दावा नित्यप्रति के जीवन के तथ्यों से मेल नहीं खाता, जो बताते हैं कि अन्य गुणों की भांति व्यक्तित्व के इन या उन गुणों का गठन आरंभिक बाल्यकाल तक सीमित नहीं होता। संबद्ध व्यक्तित्व के विकास के इतिहास पर निर्भर करते हुए वह या तो सफलता की उपलब्धि की ओर उन्मुख हो सकता है ( इस सूरत में मनुष्य जोखिम मोल लेता है, पहल, प्रतियोगितात्मक क्रियाशीलता, आदि प्रदर्शित करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देता ), अथवा विफलता से बचने की ओर उन्मुख हो सकता है ( इस सूरत में वह जोखिम मोल लेने, दायित्व ग्रहण करने से कतराता है, पहल दिखाने से बचता है, किसी अनिश्चित हालात में अहस्तक्षेप की स्थिति अपनाता है, आदि )।

चरित्र में विशेष विधियों की सहायता से प्रकाश में लायी जाने वाली उपलब्धिमूलक अभिप्रेरणा एक निश्चित आचरण-व्यवहार कार्यक्रम इंगित करती है और लाक्षणिक परिस्थितियों में मनुष्य के कार्यकलाप की दिशा को पहले से बताना संभव बना देती है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के संबंधों को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति के दृष्टिकोण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



चारित्रिक गुण तथा व्यक्ति का दृष्टिकोण

चरित्र ( character ) , जो कर्ता की कार्रवाइयों और व्यवहार में, संयुक्त सक्रियता में उसकी सहभागिता ( participation ) के स्तर में अभिव्यक्त होता है, सक्रियता की अंतर्वस्तु ( content ) पर, कठिनाइयों पर क़ाबू पाने में कर्ता की सफलता या विफलता पर, आधारभूत जीवंत ध्येयों की सिद्धि में दूर तथा निकट के परिप्रेक्ष्यों ( perspectives ) पर निर्भर करता है।

अतः चरित्र इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य ( पहले बन चुकी चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर ) अपनी सफलताओं तथा विफलताओं, जनमत तथा अन्य परिस्थितियों के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाता है। इस तरह एक ही कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों में अथवा एक ही उत्पादन-समूह में बराबरी के दर्जे पर काम करने वाले लोगों में चरित्र के भिन्न-भिन्न गुणों का विकास होता है। यह चीज़ इस बात पर निर्भर करती है कि वे अपना कार्य किस प्रकार निबटाते हैं। कुछ लोग सफलता से प्रेरित होते हैं और पहले से ज़्यादा अच्छी तरह काम या अध्ययन करने के लिए प्रेरित होते हैं, कुछ में आगे आगे मैदान जीतने की कामना नहीं होती, कुछ का विफलताओं से हौसला पस्त हो जाता है, जबकि दूसरों में जुझारू भावना उद्दीप्त होती है।

अतः चरित्र के निर्माण में सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व यह होता है कि मनुष्य परिवेश के प्रति, स्वयं अपने प्रति, दूसरों के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाता है। ये दृष्टिकोण चरित्र के प्रमुख गुणों के वर्गीकरण के आधार का काम देते हैं।

मनुष्य का चरित्र, पहले इस चीज़ में प्रकट होता है कि वह दूसरे लोगों ( अपने सगे-संबंधियों तथा मित्रों, सहयोगियों तथा सहपाठियों, परिचितों तथा अजनबियों, आदि ) के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाता है। वह स्थिर अथवा अस्थिर अनुरक्तियों ( attachments ) में, सिद्धांतनिष्ठता अथवा सिद्धांतहीनता में , मिलनसार अथवा गैर-मिलनसार स्वभाव में, सत्यप्रियता अथवा मिथ्यावादिता में, व्यवहारकुशलता अथवा अभद्रता में प्रकट होता है। केवल समूहों में ही, सामाजिकता में ही, दूसरों लोगों से दैनंदिन संसर्ग-संपर्क की प्रक्रिया में ही मनुष्य के ह्र्दय की व्यापकता अथवा संकीर्णता, गैर-मिलनसार स्वभाव अथवा नमनशीलता ( flexibility ), शांतिप्रियता अथवा विवादप्रियता जैसे चारित्रिक गुण सुस्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं।

दूसरे, चरित्र मनुष्य के स्वयं अपने प्रति दृष्टिकोण में, अर्थात आत्मगौरव तथा आत्मसम्मान में अथवा विनम्रता तथा अपनी शक्ति में अविश्वास में प्रकट होता है। कुछ लोगों में स्वार्थ की तथा आत्म-केन्द्रिकता ( अपने को समस्त घटनाओं के बीच में रखने ) की भावना अधिक बलवती होती है, जबकि कुछ अपने हितों को समूह के हितों के मातहत कर देते हैं, संयुक्त ध्येय के लिए संघर्ष में निस्स्वार्थ भाव से भाग लेते हैं।

तीसरे, चरित्र काम के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण में प्रकट होता है। चरित्र के सबसे महत्त्वपूर्ण गुणों में निर्मल अंतःकरण, कार्य-कुशलता, गंभीरता, उत्साह, प्राप्त कार्य के प्रति उत्तरदायित्व ( responsibility ) की भावना तथा उसके परिणामों के लिए चिंता शामिल है। परंतु कुछ लोगों के चरित्र में कैरियरपरस्ती, छिछोरापन, श्रम के प्रति कोरा औपचारिक दृष्टिकोण पाया जाता है।

चौथे, चरित्र व्यक्ति के वस्तुओं के प्रति दृष्टिकोण मे, केवल सामाजिक संपत्ति के प्रति ही नहीं, अपितु अपने निज़ी माल-असबाब, वस्त्रों, जूतों, आदि के प्रति दृष्टिकोण में भी प्रकट होता है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

चारित्रिक गुणों के संबंध

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों की कड़ी के रूप में चरित्र की अवधारणा पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘चरित्र’ की संरचना के अंतर्गत चारित्रिक गुणों के संबंधो को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चरित्र की संरचना
चारित्रिक गुणों के संबंध

मनुष्य का चरित्र सदैव बहुआयामी ( multidimensional ) होता है। उसके पृथक-पृथक गुणों या पहलुओं का चयन किया जा सकता है, जो एक दूसरे से अलग-अलग रूप में विद्यमान नहीं होते, अपितु एक सूत्र में जुड़े होते हैं, उनसे चरित्र की एक अखंड संरचना बनती है।

चरित्र की संरचनात्मकता, उसके पृथक-पृथक गुणों के बीच नियमसंगत निर्भरता में उजागर होती है। यदि कोई मनुष्य कायर है, तो उसके बारे में हम यह भी मान सकते हैं कि उसमें पहलकदमी ( initiative ) का अभाव है ( यानि वह डरता है कि उसके प्रस्ताव या कार्रवाई के प्रति, जिनके लिए उसने पहलकदमी की, प्रतिकूल प्रतिक्रिया हो सकती है ), उसमें दृढ़ संकल्प तथा स्वावलंबन नहीं है ( क्योंकि निर्णय लेने का अर्थ व्यक्तिगत दायित्व ग्रहण करना है ), उसमें आत्मत्याग तथा उदारता का अभाव है ( दूसरों की सहायता से उसके निजी हितों को आंच आ सकती है, जो उसके लिए खतरनाक है )। इसके साथ ही चरित्र की दृष्टि से कायर व्यक्ति में हीन-भावना तथा चापलूसी ( अधिक बलवान के प्रति ), अनुरूपता ( औरों से अलग न दिखाई देने के लिए ), लालच ( भविष्य में अपनी भौतिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ), गद्दारी की तत्परता ( कम से कम उन परिस्थितियों में, जब उसकी सुरक्षा खतरे में हो ), अविश्वास की भावना तथा अतिसतर्कता, आदि लक्षण भी पाए जाते हैं।

जाहिर है, प्रत्येक व्यक्ति में, जिसके चरित्र पर कायरता हावी होती है, ये सब चर्चित लक्षण प्रकट नहीं होते। जीवन की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में मनुष्य के चरित्र की संरचना सारतः रूपांतरित ( convert ) हो सकती है और उसमें वे लक्षण तक शामिल हो सकते हैं, जो प्रतीयमान ( seeming ) रूप से हावी लक्षण के विपरीत होते हैं ( उदाहरण के लिए, कायर उद्धत भी हो सकता है )। परंतु कायर मनुष्य में समग्र रूप से चरित्र के ऐसे ही गुणों की ओर आम रूझान देखने को मिलता है।

चरित्र के नाना गुणों में से कुछ बुनियादी, अग्रणी गुणों के रूप में पेश आते हैं, जो उसकी अभिव्यक्तियों के विकास की पूर्ण समग्रता ( totality ) की आम दिशा निर्धारित करते हैं। उनके साथ-साथ द्वितीयक गुण भी विद्यमान होते हैं, जो कुछ सूरतों में मुख्य गुणों से निर्धारित होते हैं और दूसरी सूरतों में उनका मुख्य गुणों के साथ सामंजस्य नहीं होता। वास्तविक जीवन में अधिक अखंड तथा अधिक विरोधपूर्ण, दोनों तरह के चरित्र देखने को मिलते हैं। चरित्रों की अपार विविधता में अखंड चरित्रों के अस्तित्व की बदौलत कुछ निश्चित क़िस्में निर्धारित की जा सकती हैं, जिनमें कतिपय लक्षण एक समान होते हैं। चरित्र की अखंडता उसमें विरोधात्मकता को पूर्णतः वर्जित नहीं करती : सह्र्दयता की कभी-कभी सिद्धांतनिष्ठता से और विनोद की भावना की उत्तरदायित्व से टक्कर हो सकती है।

चारित्रिक गुणों को आस्थाओं, जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा व्यक्तित्व के रूझान ( trends ) की अन्य विशेषताओं के सदृश नहीं माना जा सकता। एक बहुत नेक स्वभाववाला और ख़ुशमिज़ाज मनुष्य बहुत सदाचारी तथा शिष्ट हो सकता है, जबकि वैसा ही दूसरा सदाचारी तथा ख़ुशमिज़ाज मनुष्य टुच्चा धंधेबाज़ हो सकता है, जो केवल अपनी ही सुख-समृद्धि की चिंता करता है और अपने लक्ष्यों की सिद्धि के लिए हर तरह के गंदे साधनों तक का उपयोग करने में नहीं चूकता।

परंतु चरित्र के कुछ लक्षण व्यक्तित्व के रूझान से निर्धारित होते हैं। अतः कुछ लक्षण निश्चित नैतिक सिद्धांतों तथा आस्थाओं से मेल खा सकते हैं, कभी-कभी वे अनिवार्य रूप से उनके साथ संलग्न होते हैं, कुछ मामलों में वे संबद्ध परिवेश में विद्यमान विचारों, नैतिकता के मापदंडों तथा सिद्धांतों के विपरीत हो सकते हैं। उदाहरण के रूप में ईमानदारी जैसा महत्त्वपूर्ण, प्रमुख गुण उनके साथ मेल खा भी सकता है और नहीं भी खा सकता है।

अक्सर हमें इस या उस मनुष्य की असाधारण ईमानदारी के क़िस्से सुनने को मिलते हैं। उदाहरण के लिए, किसी टैक्सी-ड्राइवर को अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर एक बड़ा हैंडबैग पड़ा मिला, जिसमें बहुत बड़ी धनराशि थी। उसने मुसाफ़िर को ढूंढ निकाला, और धनराशि लौटा दी गई। ईमानदारी की ऐसी अभिव्यक्तियां लोगों के मन में आम तौर पर आदर की भावना पैदा करती हैं, परंतु वे असामान्य भी नहीं प्रतीत होतीं। फिर भी हमें ऐसे लोग मिल सकते हैं, जो ऐसी कार्रवाइयों से सचमुच चकित हो उठते हैं अथवा उनका मखौल तक उड़ा सकते हैं।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

चरित्र की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने व्यक्ति के वैयक्तिक-मानसिक अभिलक्षणों को समझने की कड़ी के रूप में स्वभाव और शिक्षा पर चर्चा की थी, इस बार से हम “चरित्र” पर चर्चा शुरू करेंगे और चरित्र की अवधारणा को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


चरित्र की अवधारणा
चरित्र की परिभाषा

चरित्र ( character ) शब्द उन अभिलाक्षणिक चिह्नों ( characteristic signs ) का द्योतक है, जिन्हें सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ग्रहण करता है। जिस प्रकार मनुष्य की वैयक्तिकता ( individuality ) अपने को मानसिक प्रक्रियाओं ( अच्छी स्मृति, फलप्रद कल्पना, हाज़िर जवाबी, आदि ) की विशिष्टताओं और स्वभाव के लक्षणों में प्रकट करती है, उसी प्रकार वह मनुष्य के चरित्र के गुणों को प्रदर्शित करती है।

चरित्र की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है : चरित्र मनुष्य के स्थिर वैयक्तिक गुणों का कुल योग है, जो उसके कार्यकलाप तथा संसर्ग-संपर्क में उत्पन्न तथा उजागर होते हैं और उसके आचरण के अभिलाक्षणिक रूपों को निर्धारित करते हैं।

मनुष्य का व्यक्तित्व केवल इसी बात से अभिलक्षित नहीं होता है कि वह क्या करता है, अपितु इस बात से भी अभिलक्षित होता है कि वह उसे किस तरह करता है। साझे हितों तथा आस्थाओं को अपना आधार बनाते हुए तथा जीवन में साझे ध्येयों की सिद्धी की कामना करते हुए लोग अपने सामाजिक आचरण-व्यवहार तथा कार्यकलाप में सर्वथा भिन्न-भिन्न, कभी-कभी तो एक-दूसरे के विपरीत वैयक्तिक गुण प्रदर्शित करते हैं।

एक जैसी कठिनाइयां झेलते हुए, एक जैसे दायित्व निभाते हुए, एक जैसी वस्तुएं पसंद या नापसंद करते हुए भी कुछ लोगों में नरमी और सुनम्यता होती है, तो कुछ कठोर और असहिष्णु होते हैं, कुछ प्रफुल्लचित्त होते हैं, तो कुछ उदास रहते हैं, कुछ में आत्मविश्वास होता है, तो कुछ कायर होते हैं, कुछ सब को साथ लेकर चल सकते हैं, तो कुछ ऐसा नहीं कर पाते। छात्रों को संबोधित एक ही अर्थ से युक्त व्याख्याएं कुछ अध्यापकों द्वारा नरमी, भद्रतापूर्वक और प्रीतिकर ढंग से, तो कुछ द्वारा कर्कश और शिष्टताहीन ढंग से की जाती हैं। ऐसे अंतर्निहित वैयक्तिक गुण उन लोगों में तो आम तौर पर और भी अधिक स्पष्ट रूप से पाये जाते हैं, जिनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है, जिनकी रुचियां, सांस्कृतिक स्तर तथा नैतिक सिद्धांत भिन्न-भिन्न होते हैं।

वैयक्तिक गुण, जिनसे मनुष्य का चरित्र बनता है, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि इच्छा ( उदाहरण के लिए, संकल्प अथवा अनिर्णय, भीरूता ) और अनुभूतियों ( उदाहरण के लिए, प्रफुल्लचित्तता अथवा विषाद ) और कुछ हद तक बुद्धि ( उदाहरण के लिए, चंचलता अथवा विचारशीलता ) से जुड़े होते हैं। परंतु चरित्र की अभिव्यक्तियां संजटिल ( complex ) प्रक्रियाएं हैं और सांकल्पिक ( volitional ), भावनात्मक अथवा बौद्धिक गुणों के अर्थ में उनका बहुधा वर्गीकरण नहीं किया जा सकता ( उदाहरण के लिए, संदेही स्वभाव, ह्र्दय की विशालता, उदारता, विद्वेष, आदि को इन तीन प्रवर्गों ( categories ) में से किसी के भी अंतर्गत नहीं रखा जा सकता )।

चरित्र, सामाजिक संबंध तथा सामाजिक समूह

व्यक्तिगत चरित्र का निर्माण विकास के भिन्न-भिन्न स्तरोंवाले भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों में ( परिवार में, मित्रमंडली में, अध्ययन-समूहों अथवा व्यवसायिक कार्य-समूहों में, किसी समाज-उदासीन संगठन, आदि में ) होता है। किसी व्यक्ति में, उदाहरण के लिए, किसी किशोर में खुलेपन, बेलागपन ( mindedness ), साहस तथा अडिगता के गुण, तो दूसरे मामले में घुन्नेपन, मिथ्यावादिता, कायरता, लीकपरस्ती और ढीलेपन के गुण विकसित हो सकते हैं। यह संदर्भ-समूह में मनुष्य की वैयक्तिकता तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों ( interpersonal relationship ) के स्तर पर निर्भर करता है। विकास के उच्च स्तरवाला सामाजिक-समूह, सर्वोत्तम मानव गुणों के विकास तथा सुदृढ़ीकरण के लिए सबसे अधिक अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता हैं। यह प्रक्रिया व्यक्तित्व के समूह के साथ इष्टतम समेकन ( optimize integration ) तथा स्वयं समूह के आगे विकास को बढ़ावा देती है।

व्यक्ति के चरित्र को जानने पर यह पहले से कहा जा सकता है कि वह इन या उन परिस्थितियों में किस तरह से पेश आएगा। और इसके फलस्वरूप उसके व्यवहार का निदेशन किया जा सकता है। अतः अध्यापक को अपने छात्रों को सामाजिक कार्य सौंपते समय उनके ज्ञान तथा हुनर को ही नहीं, अपितु उनके चरित्र को भी ध्यान में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोई छात्र अपनी धुन का पक्का और अध्यवसायी ( diligent ), परंतु साथ ही कुछ मंथर ( slow ) और आवश्यकता से अधिक सावधान होता है। दूसरा स्फूर्तिवान है, उसे साझा ध्येय बहुत प्रिय हैं, परंतु अपने से ज़रा भी भिन्न रायों के प्रति असहिष्णु ( intolerant ) होता है और इस कारण वह अकारण रूखा और अशिष्ट हो सकता है। छात्र के चरित्र के मूल्यवान गुणों को ध्यान में रखते हुए अध्यापक द्वारा उन्हें सुदृढ़ और सशक्त बनाने का तथा उनके नकारात्मक गुणों को निर्बल बनाने या कम से कम उनका प्रतिकार करने का प्रयास करना चाहिए और इसके लिए वह उनमें निहित अन्य समाजोपयोगी गुणों का विकास कर सकता है।

प्रत्येक बालक-बालिका के चरित्र तथा स्वभाव के विषय में अध्यापक की जानकारी प्रत्येक पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिए जाने की पूर्वशर्त है। अध्यापन और शिक्षा के क्षेत्र में यह बात अत्यधिक महत्त्व रखती है।


इस बार इतना ही।

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