कौशल और उसकी निर्माण-प्रक्रिया

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में आदतों की अन्योन्यक्रियाओं के सिद्धांतों को समझने की कोशिश की थी इस बार हम कौशल और उसके निर्माण की प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


कौशल और उसकी निर्माण-प्रक्रिया

नई परिस्थितियों में अथवा नई वस्तुओं के संबंध में किया जाने वाला हर क़िस्म का व्यवहार संक्रियाओं के अंतरण पर आधारित होता है। अपनी बारी में संक्रियाओं का अंतरण उन परिस्थितियों अथवा वस्तुओं के गुणधर्मों के साम्य पर आधारित होता है, जो व्यक्ति की सक्रियता के लक्ष्यों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

व्यक्ति को इस साम्य का ज्ञान हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। सक्रियता जितनी ही पेचीदी होगी, लक्ष्य जितने ही दूरवर्ती होंगे और उनके लिए वस्तुओं का जितना ही अधिक रूपांतरण आवश्यक होगा, उतनी ही व्यापक सफल अंतरण कर पाने के लिए जरूरी मध्यवर्ती बौद्धिक सक्रियता होगी। फिर भी हर हालत में हम ऐसे अंतरण को कौशल की संज्ञा दे सकते हैं। कौशल को, उपलब्ध ज्ञान तथा आदतों का निर्धारित लक्ष्य के अनुसार क्रिया-प्रणालियों के चयन तथा प्रयोग के लिए इस्तेमाल करने की योग्यता कह सकते हैं

कौशल के लिए बाह्यीकरण, यानि ज्ञान का शारीरिक क्रियाओं में रूपांतरण आवश्यक है। इसका आरंभ-बिंदु प्रत्ययात्मक स्तर पर, यानि चेतना में सूचना का संसाधन होता है और परिणाम व्यवहारिक कार्यों में इस प्रत्ययात्मक सक्रियता के परिणामों का नियमन करना। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति को किसी ज्यामितीय पिंड़ का आयतन निकालना है। इसके लिए उसे पहले यह तय करना होगा कि दत्त पिंड ज्यामितीय पिंडों की किस श्रेणी में आता है। इसके बाद उसे ऐसे पिंडों के आयतन का परिकलन करने की प्रणालियां याद करनी होंगी, मालूम करना होगा कि कौन-कौन से माप लेने हैं, फिर ये माप लेने होंगे और अंत में आवश्यक परिकलन करने होंगे। इस तरह हम देख सकते हैं कि ज्ञान को कौशल में परिवर्तित करने के लिए कई सारी आदतों व संक्रियाओं की आवश्यकता होती है।

इस प्रकार कौशल का अर्थ व्यक्ति द्वारा अपने ज्ञान तथा आदतों के द्वारा सक्रियता के सोद्देश्य नियमन के लिए आवश्यक मानसिक और व्यवहारिक क्रियाओं के जटिल तंत्र में सिद्धहस्त होना है। इस तंत्र में कार्यभार से संबद्ध जानकारी का चयन, कार्यभार के लिए आवश्यक गुणधर्मों को पहचानना, इस आधार पर रूपांतरणों की एक ऐसी श्रृंखला का निर्धारण करना कि जो दत्त कार्यभार की पूर्ति की ओर ले जाती हैं, प्राप्त परिणामों का निर्धारित लक्ष्य से मिलान करने उनपर नियंत्रण रखना और इस आधार पर उपरोक्त सारी प्रक्रियाओं में सुधार करना शामिल हैं।

कौशल-निर्माण की प्रक्रिया का अर्थ ज्ञान में उपलब्ध और वस्तु से प्राप्त सूचना के संसाधन से संबद्ध सभी संक्रियाओं में भी और इस सूचना के अभिज्ञान तथा क्रियाओं से इसके सहसंबंध से जुड़ी हुई संक्रियाओं में भी प्रवीणता हासिल करना है।

उल्लेखनीय है कि कौशल-निर्माण की प्रक्रिया विभिन्न तरीक़ों से साकार बन सकती है, जिन्हें हम दो मुख्य वर्गों में विभाजित कर सकते हैं। पहले में सीखनेवाले को पहले से ही आवश्यक ज्ञान होता है। उसके सामने रखे गये कार्यभार उससे इस ज्ञान के विवेकसंगत उपयोग का तक़ाज़ा करते हैं और वह स्वयं प्रयत्न-त्रुटि प्रणाली से उचित संदर्भ-बिंदुओं, उपलब्ध जानकारी के संसाधन की प्रणालियों तथा सक्रियता की प्रणालियों का पता लगाकर स्वयं उन कार्यभारों के समाधान खोजता है। सबसे कम कारगर होने पर भी यह तरीक़ा ही आज सबसे अधिक प्रचलित है।

दूसरे वर्ग में वे तरीक़े आते हैं, जिनमें प्रशिक्षक विद्यार्थी को उपलब्ध ज्ञान का कारगर उपयोग करने के लिए प्रेरित करके उसकी मानसिक सक्रियता का नियमन करता है। इस मामले में शिक्षक उसे अर्थपूर्ण संकेतों तथा संक्रियाओं के चयन के लिए आवश्यक संदर्भ-बिंदुओं की जानकारी देता है और निर्धारित समस्याओं के समाधान के लिए उपलब्ध जानकारी के संसाधन तथा उपयोग में उसकी सक्रियता का संगठन करता है। शिक्षा मनोविज्ञान में अब इस उपागम पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है।


इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

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