मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल – २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल – २
( the artificial habitat – 2 )

derain-2यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि कृत्रिम निवास स्थल का विकास और परिष्करण ( perfection ), सामाजिक संबंधों तथा समाज के संगठन के विकास तथा परिष्करण के साथ घनिष्ठता से जुड़ा है। जब समाज निजी स्वामित्व ( private property ) पर आधारित होता है और उसका कोई एकल लक्ष्य ( single aim ) नहीं होता, प्रतिरोधी अंतर्विरोधों ( antagonistic contradictions ) के कारण छिन्न-भिन्न हुआ रहता है और इसीलिए नियोजित ढंग ( planned way ) से विकसित नहीं हो सकता है, तब कृत्रिम निवास स्थल के निर्माण से प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्यतः अस्तव्यस्त हो जाता है क्योंकि इन हालतों में कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण, मुनाफ़ों की होड़ के चलते परिवेशीय प्रकृति के निर्मम विनाश और शोषण के ज़रिये होता है।

परंतु यदि हम सामाजिक प्रणाली ( social system ) को प्रत्येक व्यक्ति तथा सारे समाज के हितों के अनुरूप और चहुंमुखी विकास के लिए अनुकूल दशाओं की व्यवस्था करने के अंतिम उद्देश्य के अनुसार संगठित करने की कोशिश करेंगे तभी यह संभव हो सकता है कि कृत्रिम निवास स्थल को भी इसी लक्ष्य के अनुसार निर्मित, विकसित, व्यवस्थित और रूपांतरित ( transform ) किया जा सकेगा। ऐसा विकास, प्राकृतिक निवास स्थल के रख-रखाव, संरक्षण और सुधार की अपेक्षा रखता है, क्योंकि उसके बिना मानव का चौतरफ़ा और सांमजस्यपूर्ण ( harmonious ) विकास असंभव है।

अतएव मनुष्य के प्राकृतिक व कृत्रिम निवास स्थल के बीच अंतर्विरोधों में व्यक्त, समाज और प्रकृति के बीच के अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना तथा उनका समाधान किया जाना, स्वयं समाज के आमूल, क्रांतिकारी रूपांतरण के साथ जुड़ा हुआ है। कृत्रिम निवास स्थल का चहुंमुखी विकास और व्यक्ति तथा मानवजाति के विकासार्थ उसका सर्वाधिक अनुकूल दशाओं की प्रणाली में परिवर्तन, प्रबल वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की मांग तथा आह्वान करता है।

आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक तथा अन्य समस्याओं के समाधान के तरीक़े विशेष प्राकृतिक, तकनीकी तथा सामाजिक विज्ञानों का काम हैं। इसका दार्शनिक पहलू इस समझ में निहित है कि प्रकृति और समाज के बीच और कृत्रिम व प्राकृतिक निवास स्थलों के बीच अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना और उनके मध्य सामंजस्य की स्थापना करना केवल तभी संभव है, जबकि निम्नांकित तीन वस्तुगत शर्तों को पूरा किया जाये : (१) समाज के विकास की प्रक्रिया का सचेत ( conscious ), नियोजित, सबके हित में नेतृत्व और प्रबंध करना; (२) सामाजिक प्रणाली में ऐसा आमूल ( radical ) परिवर्तन करना कि व्यक्तियों, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय इजारेदारियों ( monopolies ) के निजी हित, मनुष्य की विशाल जनसंख्या के हितों का दमन ना कर सकें; और (३) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विस्तार तथा गहनीकरण ( deepening ) को हर तरह का संभव प्रोत्साहन देना क्योंकि इतिहास के स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) क्रम की पूर्ववर्ती अवस्थाओं में उत्पन्न कठिनाइयों को इसी आधार पर दूर किया जा सकता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल – १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल को और गहराई से समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल – १

( the artificial habitat – 1 )

jeremy-mannहम पिछली प्रविष्टियों में यह भली-भांति देख चुके हैं कि प्राकृतिक निवास स्थल, प्रकृति के नियम ( जैविक नियमों सहित ) समाज पर सीधा प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उत्पादन पद्धति ( mode of production) तथा उसके आधार पर उत्पन्न सामाजिक संबंधों के ज़रिये अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। भौतिक उत्पादन के विकास के साथ-साथ मनुष्य अपने आसपास की प्रकृति में फेर-बदल करता जाता है और एक कृत्रिम निवास स्थल की रचना करता है, जो उसके अपने जीवन के क्रियाकलाप का ही उत्पाद ( product ) होता है।

कृत्रिम निवास स्थल में केवल मनुष्य द्वारा निर्मित अजैव तथा प्रकृति में नहीं पायी जानेवाली वस्तुएं ही नहीं, बल्कि जीवित अंगी ( living organism ) – कृत्रिम वरण ( selection ) या जीन इंजीनियरी से मनुष्य द्वारा प्रजनित या रचित पौधे तथा जानवर – भी शामिल होते हैं। किंतु कृत्रिम निवास स्थल को केवल इस भौतिक आधार तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है। मनुष्य केवल कुछ निश्चित सामाजिक संबंधों की प्रणाली ( system ) में ही रह और काम कर सकता है। ये सामाजिक संबंध, निश्चित भौतिक दशाओं में, मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित परिस्थितियों सहित प्रकट होते हैं और दोनों मिलकर मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल बनाते हैं।

समाज के विकास के साथ ही कृत्रिम निवास स्थल की भूमिका लगातार बढ़ती जाती है और मनुष्य के जीवन में उसका महत्व निरंतर बढ़ता है। इस बात पर विश्वास दिलाने के लिए हम निम्नांकित तथ्य पर विचार कर सकते हैं। मानव निर्मित सारी अजैव चीज़ों तथा सजीव अंगियों के द्रव्यमान को तकनीकी द्रव्यमान ( technomass ) कहा जाता है जबकि प्राकृतिक दशाओं के अंतर्गत विद्यमान सारे जीवित अंगियों को जैव द्रव्यमान ( biomass ) कहते हैं। कुछ दशकों पहले अनुमान लगाया गया था कि मनुष्य द्वारा एक वर्ष में निर्मित तकनीकी द्रव्यमान क़रीब १०१३– १०१४ टन के और थल पर उत्पन्न जैव द्रव्यमान क़रीब १०१२ टन के बराबर होता है। इससे यह निष्कर्ष निकला कि मनुष्यजाति एक ऐसा कृत्रिम निवास स्थल बना चुकी है, जो प्राकृतिक निवास स्थल की तुलना में दसियों या सैकड़ों गुना अधिक उत्पादक है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं है कि अब लोग प्रकृति और प्राकृतिक निवास स्थल के बिना ही काम चला सकते हैं। प्रकृति हमेशा मनुष्य समाज के अस्तित्व की पूर्वशर्त ( precondition ) व आधार ( foundation ) बनी रहेगी। स्वयं कृत्रिम निवास स्थल केवल तभी अस्तित्वमान और विकसित हो सकता है, जब प्राकृतिक पर्यावरण मौजूद हो। किंतु आज मानवजाति की भौतिक और आत्मिक जरूरतों के एक काफ़ी बड़े अंश की पूर्ति कृत्रिम निवास स्थल से होती है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम