कारण और कार्य – ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसका समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य – ३
( Cause and Effect ) – 3

IMG_2025जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, कार्य-कारण संबंध की एक लाक्षणिक विशेषता यह है कि कारण और कार्य आपस में स्थान-परिवर्तन कर सकते हैं। कोई घटना, जो एक स्थिति में किसी कारण का परिणाम है, किसी दूसरी स्थिति या काल में एक कारण भी हो सकती है। मसलन, वर्षा निश्चित मौसमी दशाओं का परिणाम होने के साथ ही अच्छी फ़सल का कारण भी हो सकती है और अच्छी फ़सल ख़ुद अर्थव्यवस्था में सुधार का कारण हो सकती है, आदि, आदि।

सारी घटनाओं के, मुख्यतः पेचीदा ( complicated ) घटनाओं के कई कारण होते हैं। लेकिन कारणों के महत्त्व में अंतर होता है। कारण बुनियादी ( basic ), निर्णायक हो सकते हैं या ग़ैर-बुनियादी, सामान्य हो सकते हैं या प्रत्यक्ष। बुनियादी कारणों को अन्य सारे कारणों में से यह ध्यान में रखते हुए खोज निकालना महत्त्वपूर्ण है कि वे आम तौर पर भीतरी होते हैं। वैज्ञानिक संज्ञान ( scientific cognition ) तथा परिवर्तनकामी व्यवहार के लिए उनकी निश्चित जानकारी का बहुत महत्त्व है।

कार्य-कारण संबंधों में एक और बात की जानकारी आवश्यक है, वह इस प्रेक्षण से संबंधित है कि एक ही कारण हर बार एक ही निश्चित कार्य को उत्पन्न कर पाये यह जरूरी नहीं होता। एक कारण कार्य को उत्पन्न कर सके इसके लिए कुछ निश्चित पूर्वापेक्षाएं ( prerequisites ), कुछ निश्चित परिस्थितियों का संयोग आवश्यक हो सकता है, जिन्हें पूर्वावस्थाएं ( preconditions ) कहा जाता है। “कारण” और “कार्य” के प्रवर्ग, “पूर्वावस्था” के साथ घनिष्ठता से संबंधित हैं। पूर्वावस्था, विविध भौतिक घटनाओं और प्रक्रियाओं का ऐसा समुच्चय होती है, जिसके बिना एक कारण, कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता है। किंतु इसके बावजूद पूर्वावस्थाएं कार्य की उत्पत्ति में सक्रिय ( active ) और निर्णायक ) decisive ) नहीं होती हैं। पूर्वावस्थाओं, कारणों और कार्यों के अंतर्संयोजनों ( interconnections ) की समझ घटनाओं के सही-सही मूल्यांकन ( evaluation ) के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है।

प्रकृति में हर चीज़ प्राकृतिक, वस्तुगत नियमों के अनुसार और ख़ास तौर से घटनाओं की कारणात्मक निर्भरता ( causal dependence ) के अनुसार चलती है। प्रयोजन ( goal, purpose ) केवल वहीं पर उत्पन्न होता है, जहां मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी काम करना शुरू करता है, यानी सामाजिक विकास के दौरान। परंतु यद्यपि लोग अपने लिए विभिन्न लक्ष्य नियत करते हैं, तथापि इससे सामाजिक विकास की वस्तुगत, कारणात्मक तथा नियमबद्ध प्रकृति का निराकरण ( obviate ) नहीं हो सकता। हम कार्य-कारण संबंध की सटीक जानकारियों के उपयोग से अपने इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति के पूर्वाधारों के निर्माण के प्रयास कर सकते हैं, अपनी सफलताओं की गुंजाइश बढ़ा सकते हैं।

कार्य-कारण संबंध सार्विक हैं। लेकिन वास्तविकता के सारे संयोजन इसी तक सीमित नहीं हैं, क्योंकि यह सार्विक संयोजनों का एक छोटा अंश मात्र हैं। विश्व में कारणात्मक संबंधों के जटिल जाल ( intricate network ) में आवश्यक और सांयोगिक संयोजन सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। अगली बार हम इन्हीं “आवश्यकता और संयोग” के प्रवर्गों पर चर्चा करेंगे।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

कारण और कार्य – २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य – २
( Cause and Effect ) – 2

SaSeoJungकार्य-कारण संबंध के कई मूलभूत लक्षण ( basic features ) होते हैं। सबसे पहले, घटनाओं की कारणात्मक निर्भरता ( causal dependence ) सार्विक है। ऐसी कोई भी घटना या वाक़या नहीं होता है, जिसका कोई कारण न हो। वस्तुओं और घटनाओं के बीच अंतर्संबंधों की अपरिमित श्रृंखला ( infinite chain ) में कारणात्मक संपर्क एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। दूसरे, कारणात्मक संबंध वस्तुगत ( objective ) होता है, यानी यह भौतिक जगत की घटनाओं के अंदर निहित होता है। इसका मुख्य लक्षण यह है कि निश्चित दशाओं के अंतर्गत, एक निश्चित कारण अनिवार्यतः एक निश्चित कार्य तक पहुंचायेगा। मसलन, लोहे के टुकड़े को गर्म करने पर वह निश्चय ही फैलेगा, लेकिन स्वर्ण में परिवर्तित नहीं होगा। यदि अन्न का एक दाना उपयुक्त मिट्टी पर गिरता है, तो समुचित दशाओं ( appropriate conditions ) के अंतर्गत वह उस अन्न के पौधे को तो निश्चय ही जन्म देगा, लेकिन किसी अन्य पौधे को नहीं।

कार्य-कारण संबंध का एक अन्य प्रमुख लक्षण इसकी अनम्य कालक्रमिकता ( strict sequence in time ) है। यानी जो घटना कारण बनती है, वह उसके कार्य से हमेशा पहले होती है और वह कार्य उस घटना से पहले या उसके साथ-साथ कभी भी नहीं हो सकता है, लेकिन कुछ समय बाद होता है। किसी घटना को किसी कार्य का कारण मानने के लिए कालक्रम में पूर्ववर्तिता आवश्यक तो है, लेकिन एक अपर्याप्त ( inadequate ) शर्त है। किसी घटना से पहले होने वाली हर चीज़ उस घटना का कारण नहीं होती, केवल वे ही पूर्ववर्ती घटनाएं कारण हो सकती हैं जो कार्य के साथ संपर्क ( contact ) और संबद्धता ( association ) में हो, और जिनके पास उस कार्य को उत्पन्न करने के समुचित पूर्वाधार और नियमितताएं मौज़ूद हों।

जब विज्ञान अपर्याप्त रूप से विकसित था और वैज्ञानिक ज्ञान अधिकांश लोगों की पहुंच से बाहर था, तब वे कालक्रम और कारणात्मक संबंध को स्पष्टतः समझने में अक्सर असफल हो जाते थे और फलतः कई असंबद्ध कारणात्मक धारणाएं प्रचलित हो जाती थीं। यह उन अंधविश्वासों तथा पूर्वधारणाओं का एक उद्‍गम ( source ) था, जिनके अवशेष किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। आज भी समुचित वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव, इस तरह की कई भ्रांतियां पैदा करता है और लोगों द्वारा ऐसी भ्रांतियों को मानने तथा मानते रहने के आधार पैदा करता है, जहां कि सिर्फ़ कालक्रम के आधार पर किन्हीं पूर्ववर्ती असंबद्ध घटनाओं या परिस्थितियों को प्रदत्त घटनाओं का कारण समझ लिया जाता है।

कारणात्मक संबंध पर विचार करते समय यह ध्यान में रखना चाहिये कि कारण बाहरी भी हो सकते हैं और भीतरी भी। किसी वस्तु के परिवर्तन के भीतरी कारण उसके पक्षों की एक अंतर्क्रिया ( interaction ) होने के सबब से उस वस्तु के अपने स्वभाव में ही बद्धमूल ( rooted ) होते हैं। भीतरी कारण बाहरी कारणों से अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह हम अंतर्विरोधों ( contradictions ) की विवेचना के अंतर्गत भली-भांति देख ही चुके हैं।

किसी बाहरी कारण से उत्पन्न कार्य, कारण तथा उस घटना के बीच अंतर्क्रिया का परिणाम होता है, जिस पर कारण की क्रिया होती है। फलतः एक ही कारण विभिन्न कार्यों को उत्पन्न कर सकता है। मसलन, एक ही समय में धूप के कारण बर्फ़ पिघलती है, पौधों में कार्बन डाइआक्साइड का स्वांगीकरण ( assimilation ) व वृद्धि होती है, किसी आदमी की त्वचा का रंग गहरा हो जाता है और उसके शरीर में जटिल शारीरिक क्रियाएं होती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि भिन्न-भिन्न कारणों का फल एक ही कार्य हो। मसलन, ख़राब फ़सल सूखे का परिणाम हो सकती है या खेती की त्रुटिपूर्ण विधियों का, यथा, फ़सलों का ग़लत हेरफेर, बीजों का अच्छा न होना, ग़लत समय में बोआई करना, आदि, या ये सभी या कुछ एक साथ भी। अतः किसी एक घटना का कारण या तो विभिन्न वस्तुओं की अंतर्क्रिया या एक ही वस्तु के विभिन्न पक्षों की आपसी अंतर्क्रिया, अथवा ये दोनों साथ-साथ भी हो सकते हैं, यानी बाहरी और भीतरी कारकों का सम्मेल ( combination ) हो सकता है।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

कारण और कार्य – १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘आभास और सार’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य – १
( Cause and Effect ) – 1

dominoesहम यह भली-भांति जानते हैं कि विश्व निरंतर गतिमान है और इसमें निरंतर घटनाएं घटती रहती हैं, कई प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। हमारे प्रेक्षण हमें यह भी स्पष्टतः दिखाते हैं कि प्रकृति, समाज और चिंतन की सारी घटनाएं या प्रक्रियाएं, किन्हीं अन्य घटनाओं या प्रक्रियाओं की वज़ह से या उनके द्वारा उत्पन्न और विनियमित ( governed ) होती हैं। जो पहली घटना, दूसरी को जन्म देती है, उसे दूसरी घटना का कारण ( cause ) कहा जाता है। एक घटना ( प्रक्रिया ) को उस हालत में, दूसरी घटना ( प्रक्रिया ) का कारण कहते हैं, जब ( १ ) पहली, काल में दूसरी की पूर्ववर्ती ( preceding ) हो ; ( २ ) और जब पहली, दूसरी की उत्पत्ति ( rise ), परिवर्तन ( change ) या विकास ( development ) के लिए एक आवश्यक पूर्वावस्था ( precondition ) या आधार ( basis ) हो। जो किसी घटना को उत्पन्न करता है, वह उस घटना का कारण कहलाता है। किसी एक घटना की उत्पत्ति, उसकी अवस्था में परिवर्तन तथा उसका विलोपन ( elimination ), कारण पर निर्भर होता है। कारण की संक्रिया ( operation ) का परिणाम कार्य ( effect ) कहलाता है।

विश्व में कारणहीन कुछ नहीं होता। सारी घटनाएं निश्चित कारणों का परिणाम होती हैं। किसी एक घटना के कारण का पता लगाना उसके संज्ञान ( cognition ) का एक प्रमुख तत्व है। कार्य-कारण संबंध ( cause-and-effect connection ) एक प्रकार का सार्विक ( universal ) संबंध है, अर्थात संबंध का एक ऐसा प्रकार है, जिसके अंतर्गत एक घटना या परिस्थिति, अन्य को स्वयं पर आश्रित करती है अथवा उसे उत्पन्न ( engender ) करती है। कारण और कार्य वस्तुगत ( objective ) हैं। उनके बीच संबंध को कारणता संबंध ( causal connections ) कहते हैं। दार्शनिक प्रवर्ग “कारण” और “कार्य” वस्तुगत कारणता संबंधों को परावर्तित करते हैं, जिनका सार्विक महत्त्व है और जो भूतद्रव्य ( matter ) की गति के सारे रूपों में विद्यमान होते हैं। कार्य-कारण संबंध की खोज से विज्ञान की शुरुआत होती है। इन संबंधों का अध्ययन प्राकृतिक, तकनीकी और सामाजिक विज्ञानों का एक महत्त्वपूर्ण काम है।

१८वीं सदी में विज्ञान जगत में ज्ञान की तत्कालीन सीमाओं के अंतर्गत कई अजीब धारणाएं प्रचलित थी। जैसे कि पिण्ड दहनशील ( combustible ) इसलिए होते हैं कि उनमें फ़्लोजिस्टोन नामक द्रव्य पाया जाता है। फ़्लोजिस्टोन हमेशा दहन का कारण है और दहन हमेशा फ़्लोजिस्टोन का कार्य ( परिणाम ) है। इस दृष्टि से फ़्लोजिस्टोन दहन का कार्य नहीं हो सकता, और दहन फ़्लोजिस्टोन का कारण नहीं हो सकता। इसी तरह, लगभग उसी काल में यह धारणा भी प्रचलित हुई कि पिण्डों ( bodies ) के तपने की वजह उनमें तापजनक नामक एक भारहीन पदार्थ का होना है। यह माना जाता था कि तापजनक सदैव तापीय परिघटनाओं ( thermal phenomena ) का कारण और तापीय परिघटनाएं सदैव तापजनक का कार्य हैं। उस काल में सभी ज्ञात विद्युतीय ( electrical ) परिघटनाओं को कुछ विशिष्ट अदृश्य विद्युतीय द्रवों ( liquids ) की क्रिया का परिणाम माना जाता था और सोचा जाता था कि इन द्रवों के कुछ पिण्डों से दूसरे पिण्डों में बहने से ही विद्युत पैदा होती है। तत्कालीन धारणाओं के अनुसार ये विद्युतीय द्रव सदैव विद्युतीय परिघटनाओं के कारण थे और विद्युतीय परिघटनाएं सदैव इन द्रवों का कार्य।

तापीय, विद्युतीय और अन्य परिघटनाओं की ऐसी समझ के आधारों पर ही कारण और कार्य की तत्कालीन समझ पैदा हुई, जिसके अनुसार यदि वस्तु ‘क’ वस्तु ‘ख’ का कारण है, तो यह असंभव है कि वस्तु ‘क’ वस्तु ‘ख’ का कार्य हो। यानी कि कुछ घटनाएं हमेशा अन्य का कारण और अन्य उनके केवल कार्य ( परिणाम ) होती है, अर्थात उनके बीच के संबंध और स्थान अपरिवर्तनीय ( unchangeable ) होते हैं। इस तरह इस द्वंद्ववादविरोधी तत्वमीमांसीय दृष्टिकोण का सार यह था कि एक ही वस्तु में दो विलोम ( यानी कारण और कार्य ) नहीं हो सकते। किंतु ज्ञान के आगे के विकास ने कारण और कार्य के प्रवर्गों ( categories ) की इस तत्वमीमांसीय समझ को भ्रामक ( misleading ) ठहराया। उसने दिखाया कि विश्व तैयार वस्तुओं का जमघट नहीं, अपितु प्रक्रियाओं, संबंधों और संपर्कों की समष्टि है।

आज हम जानते हैं कि पनबिजलीघर में जो बिजली पैदा की जाती है उसका कारण जलधारा की यांत्रिक गति है। जब कोई मशीन, जैसे कि लेथ चालू की जाती है, तो बिजली की धारा उसकी यांत्रिक गति का कारण बनती है। पहले दृष्टांत ( illustration ) में बिजली की धारा यांत्रिक गति का कार्य है और दूसरे दृष्टांत में यही धारा यांत्रिक गति का कारण है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद, मानवजाति के अनुभव व ऐतिहासिक व्यवहार तथा विज्ञान की ऐसी उपलब्धियों पर आधारित होने की वजह से यह दर्शाता है कि कोई एक घटना ( मसलन, वर्षा के बादलों में आर्द्रता का संचयन ) जो किसी अन्य घटना का परिणाम है और स्वयं भी एक अन्य घटना ( वर्षा ) का कारण हो सकती है। इस अर्थ में यह कहा जा सकता है कि वस्तुतः कार्य और कारण स्थान परिवर्तन करते हैं ; जो एक समय पर किसी घटना का कार्य है, वह अगले क्षण पर दूसरी घटना का कारण हो सकता है।

यदि कारण-कार्य श्रृंखला की कड़ियों को प्रक्रियाओं ( processes ) के रूप में देखा जाए, तो पता चलेगा कि जब एक प्रक्रिया ‘क’, प्रक्रिया ‘ख’ पर प्रभाव डालकर उसमें परिवर्तन लाती है, तो अपनी बारी में प्रक्रिया ‘ख’ भी प्रक्रिया ‘क’ पर प्रभाव डालकर उसमें परिवर्तन लाती है। इसलिए हर प्रक्रिया दूसरी प्रक्रिया को प्रभावित करते हुए स्वयं भी प्रभावित होती है। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति और समाज में भी, संबंध अन्योन्यक्रियाएं ( mutual actions ) हैं तथा एक ही वस्तु या प्रक्रिया में दो विलोम ( कारण और कार्य ) होते हैं।


इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय