ज्ञान और समझ को निर्धारित करने वाले कारक

तो हे मानव श्रेष्ठों,
कहानी आगे बढाते हैं…..

मैं भी चाह ही रहा था, और एक बंधु ने भी मेरे ई-मेल पर सफ़ाई चाहते हुए कारकों के निर्धारण की ऐसी ही मांग रखी थी,
अतएव…
अब इस बात को बिंदुबार तरीके से रेखांकित किया जा सकता है कि मनुष्य के ज्ञान का स्तर कैसा होगा, यानि मनुष्य मानव जाति द्वारा समेटे गये ज्ञान के सापेक्ष किस स्तर पर होगा। इसका निर्धारण करने वाले कारकों को यूं सूचिबद्ध किया जा सकता है:
१. मनुष्य के निकट का परिवेशी समाज, जिसमें सबसे पहले उसका परिवार, माता-पिता रिश्तेदार शामिल होते हैं, वे खुद ज्ञान और सभ्यता के किस स्तर पर हैं? उन्हें इस बात की कितनी समझ और जिम्मेदारी है कि एक सुव्यवस्थित लालन-पालन किस प्रकार मनुष्य के जीवन की दशा और दिशा का निर्धारण करता है?
२. मनुष्य से संबंधित वृहद समाज, जहां वह रहता और अंतर्क्रियाएं करता है, की सामाजिक चेतना का स्तर क्या है? ज्ञान और सभ्यता का सामान्य स्तर पर क्या है? सामाजिक क्रियाकलापों को उद्वेलित और नियमित करने वाले मूल कारकों का नैतिक स्तर क्या है?
ये दोनों बिंदु मनुष्य के सामान्य व्यक्तित्व एवं समाज के साथ अंतर्क्रियाओं के मूल्यों का निर्धारण करते हैं और मनुष्य के व्यवहार की मूल कसौटी तय करते हैं।
३. मनुष्य को व्यवस्थित रूप से प्रकृति के वृहद ज्ञान से परिचित कराने वाली शिक्षण-प्रशिक्षण प्रणाली का मूल उद्देश्य और उसकी सामान्य संरचना कैसी है? वह ज्ञान और व्यवहार की एकता निश्चित करने में कितना सक्षम है? वह मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास, ज्ञानवृद्धि, उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विकसित करने और व्यवस्थित चिंतन प्रणाली से लैस उसे एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी के रूप में तैयार करने के मूल उद्देश्य के लिए कितना अभिकल्पित है?
४. मनुष्य के मस्तिष्क के साथ अंतर्क्रिया करने वाले अन्य साधन जैसे सूचना और संचार माध्यम, मीडिया, सहज उपलब्ध पुस्तकें आदि उसके सूचना संसार और चिंतन प्रक्रिया को किस तरह और दिशा में प्रभावित कर रहे हैं? वे एक सोचने समझने वाले, बुद्धिमान और स्वतंत्र मनुष्य को विकसित करना चाहते हैं या कुंद और कुंठित, भावातिरेक से भरे हुए ऐसे मंदबुद्धि व्यक्तित्वों का निर्माण, जिनकी सोच और समझ का नियंत्रण भी उनके हाथों में हो?
५. सभी जीवों की प्राथमिकता उनकी जिजीविषा होती है, ऐसे ही मनुष्य की प्राथमिकता भी जीवनयापन हेतु मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती ही होती है। इनकी पूर्ती की सुनिश्चितता के बाद ही मनुष्य ज्ञान और समझ के स्तर को परिष्कृत करने हेतु प्रवृत हो सकता है। अतएव किसी भी मनुष्य के ज्ञान और समझ के स्तर की संभावना इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसकी सामाजिक और राजानैतिक व्यवस्था में इस जिजीविषा की तुष्टि के आयाम कितने विस्तृत हैं, साथ ही यह भी कि इस तुष्टि की चिंताओं से मुक्त मनुष्यों के लिए व्यवस्था किन सभ्यता और संस्कृतिगत मूल्यों को प्रश्रय देती है।

देखिए, बात बडी होती ही जाती है।
खैर, समय के पास तो बहुत समय है परंतु मुझे पता है आपके पास इसकी बहुत कमी होती है।
इसलिए आज इतना ही. बाकि फ़िर।

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